Monday, 13 February 2012

अपने अपने युद्ध (भाग दो)

अपने अपने युद्ध (भाग - एक) से आगे
अपने अपने युद्ध
पृष्ठ सं.264
मूल्य-250 रुपए

प्रकाशक
जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि.
30/35-36, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2001



नीला लंबी छुट्टी पर चली गई। पर अचानक महीने भर में ही छुट्टियां कैंसिल कर वह वापस आ गई। क्या तो वह लीव विदआउट पे हो रही थी। लगातार बच्चे पैदा करने में छुट्टियां पहले ही ख़त्म हो चुकी थीं। और घर वालों को उस की तनख्वाह की आदत पड़ गई थी। सो उसे वापस ड्यूटी पर आना पड़ा। इस बीच अपने हसबैंड को राजी कर वह कापर टी भी लगवा चुकी थी।

‘‘तो अब तो हम से मिल लो।’’

‘‘नहीं।’’

‘‘क्यों ?’’

‘‘टाइम कहां है ?’’

‘‘लंच में।’’

‘‘यह कैसे हो पाएगा ?’’

‘‘तो किसी दिन छुट्टी मार दो !’’

‘‘नहीं।’’

‘‘अब इस में क्या दिक्कत है ?’’

‘‘है न !’’

‘‘क्या ?’’

‘‘अब क्या बताऊं ?’’

‘‘बताओ नहीं, मिलो।’’

‘‘अच्छा !’’

‘‘तो कब मिलोगी ?’’

‘‘बताऊंगी !’’

‘‘कैसे ?’’

‘‘फोन करूंगी।’’

पर वह फिर गायब !

एक दिन संजय ने उसे फोन किया, ‘‘तुम्हारा फोन तो आता रह गया ?’’

‘‘अब क्या बताऊं ?’’

‘‘क्यों ?’’

‘‘मैं नहीं मिल सकती ?’’

‘‘हद है।’’

‘‘असल में मेरे हसबैंड शक्की हैं।’’

‘‘यह तो तुम ने पहले नहीं बताया।’’

‘‘अब क्या बताती !’’

‘‘क्या बेवकूफी है ?’’

‘‘असल में जब से कापर टी लगवाया है तब से ज्यादा शक्की हो गए हैं।’’

‘‘यह सब मैं कुछ नहीं जानता। तुम किसी भी तरह हम से मिलो। अब रहा नहीं जाता।’’

‘‘पर मैं नहीं मिल सकती।’’

‘‘क्यों ?’’

‘‘मेरे हसबैंड दफ्तर में जब तब मुझे चेक करने आ जाते हैं। आप समझा करिए।’’

‘‘बड़ा दुष्ट है साला।’’

‘‘क्या कह रहे हैं आप।’’

‘‘कुछ नहीं, कुछ नहीं। बस एक बार दस मिनट के लिए सही तुम समय निकालो।’’

‘‘अच्छा बताऊंगी।’’

पर महीनों बीत गए नीला ने कुछ नहीं बताया।

संजय ने उसे एक दिन फिर घेरा और कहा, ‘‘आखि़र कब समय निकालोगी, और कब बताओगी ?’’

‘‘आप समझा कीजिए।’’

‘‘यह तो कोई बात नहीं हुई।’’

‘‘मैं ख़ुद भी आप से मिलना चाहती हूं।’’

‘‘गुड !’’ वह खुश होता हुआ बोला ‘‘अब तक तो चेंज का मन तुम्हारा भी करने लगा होगा ?’’

‘‘हां, पर संभव नहीं है।’’

‘‘क्यों ?’’

‘‘मेरे हसबैंड इधर बहुत शक्की हो गए हैं। देवर तक से बात करने में उन्हें शक हो जाता है।’’

‘‘लगता है उसे अपने पौरुष पर विश्वास नहीं है।’’

‘‘अब मैं क्या बताऊं ?’’

‘‘अच्छा तुम मिलो तो मैं बताता हूं।’’

‘‘मैं नहीं मिल सकती। बिलकुल नहीं।’’

‘‘ऐसा भी क्या है कि दस मिनट के लिए भी नहीं मिल सकती ?’’

‘‘ऐसा ही है।’’

‘‘क्या तुम्हारे हसबैंड को मुझ पर शक है ?’’

‘‘नहीं तो !’’

‘‘फिर क्या बात है ?’’

‘‘बताना जरूरी है ?’’

‘‘हां।’’

‘‘मेरे हसबैंड ने मुझे कसम दिलाई है कि अगर ऐसा वैसा कुछ किया या कुछ सुनाई भी दिया गलत या सही तो मेरा मरा मुंह देखोगी।’’ कह कर वह फोन पर फफक कर रोने लगी।

‘‘ऐसी बात थी तो तुम्हें पहले बताना चाहिए था। और इस कीमत पर मैं कभी तुम से नहीं मिलना चाहूंगा। यह तुम्हें बहुत पहले बताना चाहिए था। मैं कभी तुम से नहीं कहता।’’ संजय सकते में आ गया । उसे ऐसी उम्मीद तो कतई नहीं थी।

‘‘आप प्लीज माइंड मत करिएगा।’’ वह बोली।

‘‘नहीं, बिलकुल नहीं। बल्कि आई एम वेरी सॉरी। तुम मुझे माफ करना।’’ कह कर संजय ने फोन रख दिया।

इस के बाद भी नीला संजय के घर अपने हसबैंड के साथ कई बार आई। पर संजय ने उस की ओर से बिलकुल चुप्पी साध ली थी।

उस ने देखा नीला को यह अच्छा लगा था।

नीला !

और अब चेतना !

चेतना संजय की उम्मीद से उलट कोई एक महीने बाद हाजिर हो गई। बेहिसाब बदहवास ! पर बोली कुछ नहीं। संजय ही बोला, ‘‘कहिए मीरा जी कैसे राह भूल गईं?’’

‘‘नहीं, इधर से गुजर रही थी। सोचा आप से भी मिलती चलूं।’’

‘‘जेहे नसीब !’’

‘‘क्या ?’’

‘‘कुछ नहीं।’’ संजय समझ गया कि चेतना जेहे नसीब का मतलब नहीं समझ पाई।

‘‘नहीं, कुछ नसीब जैसा कह रहे थे आप।’’

‘‘अरे यही कि मेरी खुशकिस्मती जो ‘‘आप’’ आईं।’’

‘‘ओह !’’

‘‘तो तुम क्या समझी थी ?’’

‘‘आप कब क्या कह बैठें। कुछ ठिकाना है ?’’

‘‘बिलकुल है।’’

वह चुप रही।

‘‘कहीं चलें ?’’

‘‘चलिए।’’

‘‘कहां चलें ?’’

‘‘जहां आप चाहें।’’

चेतना का ‘‘जहां आप चाहें ?’’ कहना संजय को उत्साहित कर गया। पूछा, ‘‘पिक्चर ?’’

‘‘पिक्चर नहीं देखती मैं।’’

‘‘तो ?’’

‘‘वैसे ही कहीं चल कर बैठते हैं।’’

‘‘ठीक है।’’ कह कर संजय चेतना को ले कर चिड़िया घर चला गया। चिड़िया घर में थोड़ी देर बैठते ही चेतना उकता गई। बोली, ‘‘कोई और जगह नहीं मिली थी आप को ?’’

‘‘क्यों ?’’

‘‘बस यहां से चलिए ?’’

‘‘कहां ?’’

‘‘कहीं भी। पर यहां नहीं।’’ कहती हुई वह उठ खड़ी हुई।

‘‘दिलकुशा चलें।’’

‘‘चलिए।’’

‘‘यहां चिड़िया घर में तुम्हें क्या दिक्कत हो रही थी ?’’ रास्ते में संजय ने चेतना से पूछा।

‘‘देख नहीं रहे थे। वहां कितनी फेमिली थीं।’’

‘‘तो ?’’

‘‘कोई जान पहचान का मिल जाता। आप के साथ देख लेता तो ?’’

‘‘ओह !’’ संजय समझ गया था कि अब चेतना उस से दूर नहीं है।

दिलकुशा दोनों पहुंच तो गए। पर बैठने की कोई कायदे की जगह नहीं मिली। बेंचों पर धूप थी और खंडहरों में घुसने लायक नहीं था। भीतर गंदगी थी और बाहर खेलते हुए बच्चे।

फिर भी दोनों दिलकुशा के खंडहरों के बाहर टूटी दीवार पर बैठ गए। चेतना पहले तो बे-सिर पैर की बतियाती रही। इस बीच संजय ने उस की बगल में आ कर बैठने को दो-तीन बार कहा। पर वह नहीं मानी। बल्कि छिटक कर और दूर हो गई। बहुत कहने पर बोली, ‘‘ठीक हूं यहीं।’’

बावजूद इस के संजय ने देखा कि वहां खेलते हुए लड़के खेलते-खेलते संजय और चेतना के इर्द-गिर्द आ गए और वहीं पास ही खेलने लगे। खेलते-खेलते वह सब बीच-बीच में अजीब सी, ललचाई सी नजरों से चेतना को देखते रहते। और चेतना फूल, जंगल और पेड़ों के बारे में बेवजह बोलती जा रही थी। जब कि संजय उस से प्यार, इसरार और सेक्स की बातें करना चाहता था। वह उसे बढ़ कर चूम लेना चाहता था। पर एक तो चेतना फूलों, पेड़ों और पत्तों में उलझी हुई थी और दूसरे, खेलते हुए बच्चे लगातार वहीं मंडरा रहे थे। संजय उकता गया। बोला, ‘‘तुम ने भी क्या जगह चुनी है ? हुंह दिलकुशा !’’

‘‘क्यों ठीक तो है। कितनी शांत-शांत।’’

‘‘और ये बच्चे ?’’

‘‘अच्छा तो लग रहा है, उन्हें खेलते हुए देख कर।’’

‘‘क्या बेवकूफी की बात करती हो।’’

‘‘क्या मतलब है आप का ?’’

‘‘कुछ नहीं। चलो तुम कोई गाना सुनाओ।’’

‘‘गाना ?’’

‘‘हां।’’

‘‘पर मेरा मूड नहीं है।’’

‘‘क्यों ?’’

‘‘बस कह दिया कि मूड नहीं है।’’ वह उखड़ने लगी।

‘‘तो चलें ?’’

‘‘कहां ?’’

‘‘कहीं भी। पर यहां से चलो।’’

‘‘नहीं। यहीं बैठिए। मुझे अच्छा लग रहा है। प्लीज।’’

‘‘तो गाना सुनाओ।’’

‘‘नहीं, प्लीज ये बच्चे क्या सोचेंगे ?’’

‘‘क्या सोचेंगे ? गाना कोई चोरी तो नहीं।’’

‘‘फिर भी आज नहीं गाऊंगी।’’

‘‘जानती हो क्यों मैं बार-बार तुम से गाने को कह रहा हूं ?’’

‘‘क्यों भला ?’’

‘‘इस के पहले जब दिलकुशा आया था तो यहीं, बिलकुल यहीं,’’ संजय जगह दिखाते हुए बोला, ‘‘क्लासिकल जुगलबंदी रात भर सुन कर गया था। गिरिजा देवी का गायन और पंडित हनुमान मिश्र की सांरगी। और गाते-गाते गिरिजा देवी इतनी विभोर हो गईं कि पंडित जी से कहा कि छोड़िए यह सारंगी और गाइए आप भी।’’

‘‘तो गाया उन्हों ने ?’’

‘‘हां। और ऐसी जमी जुगलबंदी कि पूछो मत। उन की गायकी का जो रस बरसा, उस में श्रोता इतना भींज गए कि रात ढाई बज गए और कोई उठने का नाम नहीं ले। संगत करने वाले कलाकार थक गए, पंडित हनुमान मिश्र हाथ जोड़ने लगे, पर श्रोता ‘‘नहीं-नहीं, अभी नहीं’’ बोलते रहे और गिरिजा देवी भी गायकी की कसक कूतती बड़े इसरार से पंडित जी को मना लेतीं। इस मनाने में गिरिजा देवी की लोच, खटका, खनक और मस्ती भरा पंडित जी से इसरार का अंदाज देखने लायक था। ‘अमवा बउरलैं पिया नाहीं-अइलैं हो रामा’ चइता की गायकी में जो दोनों की लय थी, एक अजीब सा सुरूर भर गई थी। सुन कर मन बउरा गया। और कई बार तो लगा कि पंडित जी सारंगी बजाने से अच्छा गाते हैं। बल्कि वह दो टुकड़ों में गिरिजा देवी पर बुरी तरह भारी पड़ गए। जिसे गिरिजा देवी ने अपनी ठिठोली से, मुसकान से जैसे तैसे कंपलीट किया। और जब गिरिजा देवी की ठिठोलियां काफी बढ़ गईं तो पंडित हनुमान मिश्रा बोले, ‘‘जब यह बनारस में गाना सीख रही थीं तो हमारे सामने लड़की थीं !’’ पंडित जी का कहने का अंदाज इतना रसीला था कि गिरिजा देवी इस उमर में भी किसी षोडषी की तरह लजा कर हंस पड़ीं। और समां मदमस्त हो गया। इस तरह पंडित जी ने गिरिजा देवी की ठिठोली जैसे छांट कर रख दी। बिलकुल किसी माली की तरह। गोया वह गिरिजा देवी की ठिठोली नहीं, किसी पौधे की बेतरतीब पत्तियां छांट रहे हों। पर गिरिजा देवी भी हार मानने वाली नहीं थीं। ‘सेजिया चढ़त डर लागे’ गुहार कर जैसे उन्हों ने पंडित जी को ललकार दिया पर पंडित जी ने जब ‘लागे-लागे, डर लागे’ कह कर तान ली तो एक बार लगा कि गिरिजा देवी अब संभल नहीं पाएंगी। लेकिन गिरिजा देवी ने पंडित जी के पूरे सुर को आधे सुर में इस नरमी और पन से बांधा कि वह लाजवाब हो गए। हालां कि पिछली रात पंडित जसराज गा गए थे, उन की गायकी की गूंज, गूंज की याद इस दिलकुशा के खंडहरों में वैसे ही तिर रही थी। पर यह जुगलबंदी तो अनूठी थी। अप्रतिम, और लाजवाब। गिरिजा देवी के गायन और पंडित हनुमान मिश्र के सारंगी वादन की जुगलबंदी नहीं, दोनों के गायन की जुगलबंदी। सेजिया चढ़त डर लागे की पौन घंटे की गायकी ख़त्म होते ही पंडित जी उठ खड़े हुए। गिरिजा देवी को इंगित किया और बोले, ‘‘अब तो मेरा हार्ट फेल हो जाएगा !’’ कहते हुए वह मंच से उतर कर श्रोताओं के बीच आ कर बैठ गए। पर गिरिजा देवी का गायन चल रहा था। लेकिन दोनों की जुगलबंदी में जो रस और गंध गमका था, जो मन लहका और बहका था, वह महक अब नहीं रह गई थी, शायद मर गई थी।’’ संजय यह सब बताते मुग्ध था और उस ने देखा, चेतना भी मंत्रमुग्ध, एकटक उस की ओर देखती हुई सुन रही थी।

‘‘आप ने तो पूरी जुगलबंदी का दृश्य ही परोस दिया।’’

‘‘सच ?’’

‘‘बिलकुल।’’

‘‘तो अब तो गा दो।’’

‘‘अच्छा कोशिश करती हूं। क्लासिकल टुकड़े तो नहीं गा सकती। पर एक फिल्मी गीत सुना दूं ?’’

‘‘हां जानता हूं तुम फिल्मी ही गाती हो। सुनाओ।’’

‘‘कहां गिरिजा देवी और कहां मैं ?’’ वह सकुचाती हुई बोली।

‘‘तो क्या हुआ ? यह फर्क भी तो है कि कहां उतने सारे सुधी श्रोता और कहां मुझ जैसा मूढ़ अकेला श्रोता।’’ सुन कर वह पहली बार हंसी। और गाने लगी, ‘‘तुम नाचो रस बरसे !’’

‘‘तुम नाचो रस बरसे’’ चेतना ने सुर तो ठीक ही पकड़ा था। पर पहले ही अंतरे में उस का गला रूंध गया। वह रोने लगी। फूट-फूट कर। ऐसे जैसे कोई पका हुआ फोड़ा फूट कर बह चला हो, जैसे कोई हरहराती नदी बांध तोड़ कर बह निकली हो, जैसे कोई हरा पेड़ बढ़ई की आरी से कट कर औंधा गिर पड़े, ऐसे ही वह बेसुध होकर रोने लगी। रोते-रोते सुबुकने लगी। सुबुकते-सुबुकते हिचकियां लेने लगी। कोई आधा घंटा लग गया उसे सामान्य होने में। जब वह सामान्य हुई तो संजय ने पूछा, ‘‘अचानक रोने क्यों लगी! बात क्या है ?’’

‘‘बस ऐसे ही।’’ वह उदास स्वर में बोली।

‘‘फिर भी ?’’

‘‘क्या करेंगे जान कर ?’’

‘‘कुछ नहीं। पर जब कोई बात मन को दुखी करे उसे किसी और से कह देने से मन का बोझ कुछ हलका हो जाता है। इसी लिए कह रहा हूं कि अगर मुझ पर जरा भी यकीन हो तो कह डालो अपने मन का बोझ। कह लेने से मन हलका हो जाएगा।’’

‘‘कह लेने भर से अगर किसी के मन का बोझ हलका हो जाता तो दुनिया में कोई दुखी नहीं होता। सभी कह-कह कर मन का बोझ उतार कर खुश रहते।’’ वह फिर सुबुकने लगी थी।

‘‘सही है। पर कह लेने से सचमुच पूरा न सही, थोड़ा ही सही, मन हलका हो जाता है।’’

वह चुप रही।

‘‘बताओ न क्या बात है ?’’

‘‘कुछ नहीं। बस, सुकेश की याद आ गई थी।’’ वह फिर जोर जोर से सुबुकने लगी, ‘‘उसे यह गाना बहुत अच्छा लगता था।’’

‘‘यह सुकेश कौन है ?’’

‘‘मैं सुकेश से प्यार करती हूं।’’

‘‘प्यार करना बुरी बात तो नहीं। अच्छी बात है। प्यार करना और उसे पाना सब की किस्मत में नहीं होता। और फिर प्यार तो पूजा है।’’ कहते हुए संजय ने उसे नूर लखनवी का वह मशहूर शेर, ‘‘मैं तो चुपचाप तेरी याद में बैठा था, घर के लोग कहते हैं सारा घर महकता था।’’ सुनाया और कहा कि, ‘‘तुम बड़ी खुशकिस्मत हो।’’

‘‘नहीं, ऐसा नहीं है।’’ कहते हुए वह तिलमिलाई।

‘‘क्यों ?’’

‘‘क्यों कि सुकेश ने अब किसी और से शादी कर ली है।’’ वह डिप्रेस हो रही थी।

‘‘कब ?’’

‘‘पिछले हफ्ते।’’ बताते-बताते उस की आवाज फिर रूंध गई।

‘‘क्यों ?’’ पूछते हुए संजय ने सिगरेट सुलगा ली थी।

‘‘इधर मैं ने उस से बोलना बंद कर दिया था। पर क्या पता था कि वह किसी और से शादी कर लेगा ?’’ उस की रूलाई रुक नहीं रही थी।

‘‘बोलना क्यों बंद कर दिया था ?’’

‘‘यह तो हम लोगों के बीच अक्सर होता था।’’

‘‘क्यों ?’’

‘‘यूं ही छोटी-छोटी बात पर।’’

‘‘यह तो कोई बात नहीं हुई।’’

‘‘आप ही बताइए कि जिस को मैं तन-मन-धन से चाहती थी। उस से कुछ दिनों का बोलना बंद कर देना भी कोई मायने रखता था क्या ?’’

‘‘मैं क्या कह सकता हूं ?’’

‘‘मैं ने बोलना ही तो बस बंद किया था। उसे मानती तो मैं फिर भी थी।’’

‘‘करता क्या है सुकेश ?’’

‘‘आर्टिस्ट है।’’

‘‘ड्रामा आर्टिस्ट ?’’

‘‘नहीं।’’

‘‘तो ?’’

‘‘चित्र बनाने वाला आर्टिस्ट।’’

‘‘नौकरी कहां करता है ?’’

‘‘टी॰ वी॰ में।’’

‘‘क्या मतलब ?’’

‘‘इस में मतलब की क्या बात है ?’’

‘‘मतलब यह कि टेलीविजन में चित्रकार की क्या जरूरत ?’’

‘‘क्यों नहीं है। ग्राफिक्स का काम है। नाम लिखना, डिजाइन करना।’’

‘‘अच्छा-अच्छा।’’

‘‘आप इतना भी नहीं जानते ?’’

‘‘जानता हूं। पर समझ नहीं पाया।’’

‘‘आप भी बस !’’ चेतना अब तक सहज होने लगी थी।

‘‘कब से जानती हो सुकेश को। मतलब तुम लोगों के प्यार की उम्र कितने दिनों की है ?’’

‘‘अब कहां हम से प्यार करता है वह ?’’

‘‘फिर भी कुछ तो उम्र होगी।’’

‘‘हां, यही कोई तीन-साढ़े तीन साल।’’

‘‘मिले कैसे थे, पहली बार ?’’

‘‘एक सहेली के मार्फत। बस यूं ही रूटीन।’’

‘‘बात आगे कैसे बढ़ी ?’’

‘‘मैं ने तो बढ़ाई नहीं। वही आगे पीछे होने लगा। बाद में घर भी आने लगा। टी॰ वी॰ का ग्लैमर तो उस का था ही मैं भी उस के चक्कर में आ गई। नीच, कमीना, कुत्ता कहीं का।’’

‘‘इतनी घृणा हो गई उस से। इस का मतलब तुम प्यार भी बहुत करती थी। उस से।’’

वह चुप रही।

‘‘क्यों है न ?’’ संजय ने उसे कुरेदा।

‘‘हां, करती तो थी।’’ वह झिझकी, ‘‘अब भी करती हूं। शायद हमेशा करती रहूंगी पर सिर्फ मेरे प्यार करने से क्या होता है। उस ने तो मुझ से प्यार नहीं किया।’’ वह भावुक होती जा रही थी ‘‘उस को अगर किसी से शादी करनी ही थी तो कर लेता। पर कम से कम मुझे बताता तो।’’

‘‘तुम करने देती उसे शादी ? अगर तुम्हें बता कर करता ?’’

‘‘क्यों नहीं। अगर उस की खुशी इसी में थी तो मैं यह भी करती। एक नहीं दस शादियां करता वह। पर मुझ से पूछ कर करता। मैं कभी मना नहीं करती। उस की खुशी में मेरी खुशी थी।’’

‘‘बहुत बड़ा दिल है तुम्हारा !’’

‘‘पर सुकेश ने तो यह नहीं समझा।’’ वह किसी मछली की तरह छटपटा रही थी।

‘‘पर तुम्हारा दिल जब इतना बड़ा है तो झगड़ा किस बात पर हो गया ?’’

‘‘बताना जरूरी है ?’’ वह खीझी।

‘‘इसी लिए पूछ रहा हूं। क्यों कि जो तुम कह रही हो कि सुकेश एक नहीं दस शादियां करता पर तुम से पूछ कर करता तो तुम मान जाती। मुझे नहीं लगता। क्यों कि यह बात न सिर्फ नारी मनोविज्ञान से परे हैं बल्कि मानव स्वभाव से भी विपरीत है।’’

‘‘जो भी हो पर मेरे साथ तो ऐसे ही है। मैं तो ऐसे ही सोचती हूं।’’

‘‘तुम झूठ बोलती हो।’’

‘‘क्या ?’’ वह चौंकी।

‘‘यही कि तुम से पूछ कर सुकेश दस शादियां करता और तुम करने देती।’’

‘‘बिलकुल करने देती।’’

‘‘बिलकुल झूठ। सुकेश की एक शादी तो तुम से हजम हो नहीं रही। बिना पानी की मछली की तरह छटपटाती घूम रही हो। अगर वह दस कर लेता तो क्या करती ?’’

‘‘जी नहीं, पूछ कर करता, दस नहीं दस हजार भी तो मैं खुश रहती।’’

‘‘अच्छा। तो तुम से पूछता और तुम शादी करने देती?’’

‘‘हां। और नहीं तो क्या ?’’

‘‘तुम फिर झूठ बोल रही हो। हम से ही नहीं अपने आप से भी।’’

‘‘नहीं, मैं झूठ नहीं बोल रही।’’

‘‘तो बार-बार यह रट क्यों लगाई हुई हो कि वह तुम से पूछ कर ही शादी करता। वह तुम से पूछता और तुम हां कर देती ?’’

‘‘बिलकुल।’’ वह उत्तेजित हो कर बोलने लगी, ‘‘उसे अपने बेटे की तरह सजा कर, दुल्हा बना कर भेजती शादी करने।’’

‘‘मतलब यह कि वह शादी तो करता पर तुम्हारे पल्लू में बंध कर, यह कहो ना।’’

‘‘हां, बिलकुल यही !’’ वह चिढ़ कर बोली।

‘‘बस इसी लिए उस ने तुम्हें नहीं बताया।’’

‘क्या ?’’

‘‘हां। इसी लिए।’’ संजय जैसे चेतना के अहंकार को पटक कर रख देना चाहता था, ‘‘अब मैं समझ गया कि तुम सुकेश से प्यार नहीं करती थी। सिर्फ उसे पल्लू से बांधे रखना चाहती थी।’’

‘‘यह कैसे कह सकते हैं आप।’’

‘‘ऐसे कि प्यार में स्वार्थ नहीं होता। रत्ती भर भी नहीं। पर तुम्हारे प्यार में स्वार्थ था।’’

‘‘कौन सा स्वार्थ ?’’

‘‘सुकेश को पल्लू से बांधे रखने का स्वार्थ। और यहीं तुम से गलती हो गई।’’

‘‘कैसे ?’’

‘‘वो ऐसे कि औरत को पाने से पहले पुरुष चाहे उस के लाख फेरे लगाए पर औरत को पाने के बाद भी वह उस के इर्द-गिर्द चक्कर काटता रहे, जरूरी नहीं है। कुछ अपवादों को छोड़ दो तो पुरुष मानसिकता यही है। मानव स्वभाव यही है।’’ संजय उसे समझाते हुए बोला, ‘‘मेरा ख़याल है तुम यहीं चूक कर बैठी। तुम से गलती यहीं हो गई।’’ वह रुका और बोला, ‘‘तुम बुरा मत मानना पर जैसा कि तुम थोड़ी देर पहले बता रही थी कि तुम तन-मन-धन से उसे चाहती थी तो मैं समझता हूं तुम दोनों के बीच देह संबंध भी रहे होंगे ? और उस के बाद से जाहिर है तुम उम्मीद करती रही होगी कि वह उसी तरह तुम्हारे इर्द गिर्द नाचता रहे। और उस ने ऐसा किया नहीं होगा। तुम्हारी ओर से उदास रहने लगा होगा। और तुम उसे पल्लू से बांधने की फिराक में। गांठ यहीं पड़ी होगी, तुम दोनों के संबंधों में। अंततः देह संबंध ही तुम दोनों के मिलने और बिछड़ने का सबब बन गया होगा। देह संबंध !’’
देह संबंध शब्द पर संजय ने जरा ज्यादा जोर दिया पर चेतना चुप रही। और पैर की अंगुलियों से दीवार की ईंटें कुरेदने लगी।

‘‘बोलो न ? देह संबंध थे कि नहीं तुम्हारे।’’ वह किसी दारोगा की तरह तफतीश कर रहा था।

‘‘हां।’’ वह सिर झुकाए ही धीरे से बोली।

‘‘रेगुलर या कैजुअली ?’’

‘‘आप हमें गलत मत समझिए।’’

‘‘मैं गलत कहां समझ रहा हूं। मैं देह संबंध को गलत नहीं मानता। यह तो एक जरूरत है। ठीक भोजन, हवा और पानी की तरह। एक बायलाजिकल जरूरत।’’

‘‘वो तो ठीक है।’’ कहते हुए उस ने सिर झटके से ऊपर उठाया और बोली, ‘‘हम ने यह सब शादी के बाद किया।’’ वह बोली ऐसे जैसे संजय को तमाचा मार रही हो।

‘‘कब शादी की तुम लोगों ने ?’’

‘‘मिलने के कुछ दिनों बाद ही।’’

‘‘घर वालों की मर्जी से ?’’

‘‘नहीं।’’

‘‘तो फिर ?’’

‘‘मंदिर में।’’

‘‘तुम्हारे घर वाले साथ थे ?’’

‘‘नहीं।’’

‘‘और सुकेश के ?’’

‘‘नहीं।’’ वह खीझ भी रही थी और उदास भी हो रही थी।

‘‘तो ?’’

‘‘मनकामेश्वर मंदिर में वही ले गया था। वहीं शादी की थी।’’

‘‘और कोई साथ था ?’’

‘‘नहीं।’’

‘‘तो शादी की इतनी जल्दी क्या थी ?’’

‘‘मुझे नहीं, उसे थी।’’

‘‘क्यों ?’’

‘‘वह मेरे साथ सोना चाहता था। और मैं ने साफ कह दिया था कि बिना शादी के नहीं।’’

‘‘तो तुम अपने घर वालों को बता सकती थी। मना सकती थी शादी के लिए।’’

‘‘वह समय देता तब न ?’’ वह उदास होती हुई बोली, ‘‘उस के पास तो जैसे टाइम ही नहीं था। बोला आज मंदिर में कर लेते हैं फिर घर वालों की मर्जी से बैंड बाजे के साथ भी बाद में करेंगे।’’

‘‘फिर ?’’

‘‘बैंड बाजा तो बजवाया उस ने पर मेरे लिए नहीं, किसी और से शादी कर ली।’’ वह फिर रोने लग पड़ी थी, ‘‘जब कि मंदिर में हमारी शादी की बात सुकेश के घर वाले भी जानते थे। उस के भइया-भाभी तो मुझे घर की बहू की ही तरह मानते थे।’’

‘‘और तुम्हारे घर वाले ?’’

‘‘सिर्फ इतना जानते थे कि सुकेश मुझ से शादी करना चाहता है।’’

‘‘वो कैसे ? तुम ने बताया था क्या ?’’

‘‘नहीं।’’

‘‘तो ?’’

‘‘वह बेरोक टोक मेरे घर आता जाता था। मैं भी उस के घर जाती रहती थी।’’

‘‘फिर उस ने तुम से बैंड बाजे वाली शादी क्यों नहीं की ?’’

‘‘पता नहीं।’’

‘‘तुम ने उस से कभी कहा नहीं।’’

‘‘मैं तो हरदम कहती रहती थी। पर वही बार-बार ‘‘करेंगे-करेंगे’’ कह-कह कर टालता रहता था।’’

‘‘फिर ?’’

‘‘फिर क्या ? अब सब कुछ तो बता दिया आप को ?’’ कह कर वह बुरी तरह रोने लग गई।

‘‘तुम्हारे पास मंदिर वाली शादी के फोटो हैं क्या ?’’

‘‘खिंचवाई ही नहीं थी।’’

‘‘वह पंडित गवाही दे देगा ? जिस ने शादी करवाई थी।’’

‘‘पता नहीं कौन पंडित था, मुझे तो यह भी याद नहीं।’’

‘‘तब तो उस पर कोई दबाव भी नहीं डाला जा सकता। बिना किसी सुबूत के, गवाह के कुछ हो भी तो नहीं सकता ?’’

‘‘मुझे यह सब नहीं करना।’’ वह जैसे चेतावनी देती हुई बोली, ‘‘तो फिर गवाह या सुबूत की क्या जरूरत ?’’

‘‘चलो फिर बात ही ख़त्म हो गई।’’

पर बात सचमुच ख़त्म नहीं हुई थी। अलबत्ता सांझ घिर आई थी। खेलते हुए बच्चे चेतना को देख-देख कर, थक कर वहां से जा चुके थे। कहीं कोई नहीं था। था तो सिर्फ दिलकुशा का खंडहर, झाड़ियां, अपने आप में खोए हुए पेड़, थोड़ी दूर पर सांझ में सोते हुए घर, अपने नीड़ को वापस लौटते हुए झुंड के झुंड पक्षी, संजय और चेतना। माहौल तो अच्छा था। पर संजय ने देखा चेतना अभी भी सुबुक रही थी। धीमे-धीमे। वैसे ही जैसे आकाश में पक्षियों में झुंड धीमे-धीमे उड़ रहे थे। वह चाहता तो बढ़ कर चेतना को चूम सकता था, उसे चुप कराने के बहाने उस की पीठ, उस के बाल सहला सकता था, उसे बांहों में भर सकता था, वह तो इतनी बेसुध थी कि वह कुछ भी कर सकता था। पर यह सारा ख़याल ही उसे सिरे से सतही और नीचता पूर्ण लगा। उस ने एक बार चेतना को गौर से देखा वह घुटनों में सिर घुसाए सुबकती जा रही थी।

संजय को उस पर बरबस दया आ गई। एक अजीब सी सहानुभूति उस के प्रति उमड़ आई। एक ठंडी सी सांस उस ने छोड़ी, भारी कदमों से चलता हुआ वह चेतना के पास पहुंचा, उस की पीठ पर धीरे से हाथ रखा तो वह चौंक पड़ी। झटके से सिर ऊपर उठाया। बोली, ‘‘क्या है ?’’

‘‘कुछ नहीं। अब यहां से चलें ? संजय ने पूछा तो चेतना की जान में जान आई, ‘‘मन तो अभी नहीं हो रहा है।’’

‘‘सांझ घिर आई है। अंधेरा छाने वाला है। देखो मच्छर काटने लगे हैं।’’ मच्छर मारते हुए संजय बोला।

‘‘तो क्या हुआ।’’ वह इसरार करती हुई बोली, ‘‘थोड़ी देर और नहीं बैठ सकते ?’’

‘‘क्यों नहीं ?’’ कहते हुए संजय चेतना के पास बैठ गया। बैठ तो वह गया पर सोचने लगा कि या तो चेतना उठ कर दूर छिटक जाएगी या फिर उस से दूर बैठने के लिए कहेगी। पर उस ने ऐसा कुछ नहीं किया, कुछ नहीं कहा। तो संजय का मन उस के प्रति एक बार फिर डोला। पर चेतना के दुख से एक बार फिर संजय का मन विवश हो गया। और खुद को धिक्कारने लगा।

‘‘आप ठीक कह रहे थे कि दुख कह लेने से हलका हो जाता है।’’

‘‘दुख ही नहीं मन भी हलका हो जाता है।’’

‘‘हां, यही बात कहना चाह रही थी, मेरा मन हलका हो गया है।’’ वह अपने बाल ठीक करती हुई बोली, ‘‘नहीं, जब से सुकेश की शादी की बात सुनी है तब से बहुत ही अन-इजी फील कर रही थी।’’ अपने सूखे आंसुओं को गाल से छुड़ाती हुई वह बोली, ‘‘अब जा के थोड़ा इजी फील हो रहा है।’’ वह रुकी और बोली, ‘‘नहीं, लगता था कि कितना बड़ा पत्थर मन पर पड़ गया है। लग रहा था जैसे अब जी नहीं पाऊंगी। आत्म हत्या कर लूंगी।’’ वह भावुक हुई ऐसे बोले जा रही थी कि सामने की पगडंडी से जा रहे आदमी ठिठक कर उसे अजीब नजर से घूरने लगे। उन का घूरना देख कर चेतना झट से उठ खड़ी हुई। बोली, ‘‘अभी थोड़ा और रुकना चाहती थी। यहां की शांति देख कर अच्छा लग रहा था। पर अब लोग जाने क्या समझ लें। इस लिए चलिए।’’

‘‘चलो।’’ कह कर संजय भी उठ खड़ा हुआ, ‘‘मैं तो तुम से कब का कह रहा था चलने को।’’

‘‘हां, तभी मान लेना चाहिए था।’’ अपने खुल गए बाल बांध कर चिमटी लगाती हुई वह बोली।

‘‘खै़र चलो, तुम्हारा मन तो कुछ हलका हुआ।’’

‘‘हां, हुआ तो।’’ कहते हुए वह आगे बढ़ी।

‘‘मैं तुम से उसी दिन कह रहा था कि तुम प्यार में मार खाई हुई हो।’’ संजय स्कूटर स्टार्ट करते हुए बोला।

‘‘किस दिन ?’’

‘‘जिस दिन तुम ने रजनीगंधा वाला गाना सुनाया था।’’

‘‘कैसे जान गए थे आप ?’’

‘‘तुम्हारे गाने के अंदाज और लय से।’’

‘‘पर मैं तो हमेशा ऐसे ही गाती हूं। वह गीत ही ऐसा है।’’

‘‘हां, पर मुझे ऐसा लगा। ख़ास कर ‘‘अधिकार तुम्हारा’’ शब्द जिस तरह तुम उच्चार रही थी। जिस तनाव में तुम उसे गा रही थी, उस में जो दर्द छिपा था। उस से ही लग गया था।’’

‘‘पर तब तो मुझे पता ही नहीं था कि सुकेश की शादी हो गई है। और तब तो उस की शादी सचमुच हुई भी नहीं थी।’’

‘‘पर झगड़ा तो तुम्हारा चल रहा था ?’’

‘‘हां। यह जरूर था। पर फिर भी कैसे भाप गए आप ?’’

‘‘बस यही तो बात है !’’ संजय ने जैसे खुद को दाद दी।

‘‘अब चलेंगे भी ?’’ चेतना ने टोका।

‘‘क्यों डर लग रहा है ?’’

‘‘हां।’’

‘‘किस से ? मुझ से ?’’

‘‘नहीं।’’

‘‘फिर ?’’

‘‘अंधेरे से।’’

‘‘अंधेरे से क्यों ?’’

‘‘इस लिए कि अंधेरे से मुझे डर लगता है। बस, अब आगे और मत पूछिएगा कि अंधेरे से क्यों डर लगता है। क्यों कि आप तो जवाब हो या सवाल हर जगह से सवाल निकाल लेते हैं।’’

‘‘अच्छा चलो। अब मुझे भी प्रेस जाना है। आज कहीं गया भी नहीं। लगता है आज किसी उड़ते से मसले पर जलेबी बनानी पड़ेगी ?’’

‘‘आप अख़बार में काम करते हैं कि हलवाई की दुकान में ?’’

‘‘है तो दुकान ही पर, अख़बार की दुकान !’’

‘‘तो ये जलेबी बनानी पड़ेगी क्यों बोल रहे थे।’’

‘‘तुम नहीं समझोगी।’’

‘‘क्यों नहीं समझूंगी ?’’

‘‘पर यह तो ट्रेड सीक्रेट है। नहीं बताऊंगा।’’ संजय मजाक के मूड में आ गया।

‘‘मैं आप को अपने दिल का राजदार बना सकती हूं और आप अपने अख़बार की जलेबी नहीं बता सकते।’’

‘‘अख़बार की बातें न जानो तो ही अच्छा। सब कुछ जान जाओगी तो घिन आएगी।’’

‘‘सब कुछ न सही, जलेबी वाली बात तो बता ही दीजिए।’’ चेतना जिद पर अड़ गई थी।

‘‘असल में क्या है कि हम लोग जब कोई ठीक-ठाक ख़बर नहीं होती और फिर भी नौकरी करने के लिए अख़बार का पेट भरने की बात आती है तो शब्दों का एक जाल सा बुनते हैं जिस का इन टोटल कोई मतलब नहीं होता, कोई अर्थ, कोई ध्वनि, कोई मकसद नहीं होता पर पढ़ने में लोगों को मजा सा आ जाता है, उसी को जलेबी बनाना कहते हैं।’’ वह बोला, ‘‘कुछ लोग इस जलेबी को और सतह पर ला देते हैं और कह देते हैं, क्या लंतरानी मारी है।’’

‘‘यह तो धोखा है जनता के साथ।’’

‘‘जनता नहीं, पाठकों के साथ। अपने साथ।’’

‘‘पाठक जनता नहीं है क्या। आप पत्रकार लोग भी नेताओं की तरह जनता को छलते हैं।’’

‘‘नेताओं से कहीं ज्यादा छलते हैं जनता को पत्रकार।’’ संजय हकीकत बयानी पर उतर आया।

‘‘वो कैसे ?’’

‘‘ऐसे कि नेताओं पर से जनता का विश्वास उठ गया है। जानते हैं लोग कि नेता छल रहा है। पर सारी गिरावट के बावजूद लोग अख़बारों पर भरोसा करते हैं। ठीक वैसे ही जैसे बाजार में बिकने वाली दवाओं पर करते हैं। देश में ऐसे लोगों की तादाद कम नहीं है जो हर छपे अक्षर को सच मानते ही नहीं, पूरी श्रद्धा के साथ सच मानते हैं। और उन के साथ हम लोग छल करते हैं, सच की चादर ओढ़ कर सच की चादर बिछा कर, एक खोखला सच उन के दिल दिमाग पर तान कर।’’

‘‘क्यों करते हैं ऐसा आप लोग ?’’

‘‘आप लोग ?’’ संजय तंज करता हुआ बोला, ‘‘हम लोग तो छोटे-छोटे पुरजे मात्र हैं। नियंता लोग तो और हैं। जो कदम-कदम पर छल की बिसात बिछाए बैठे हैं।’’

‘‘नियंता लोग कौन हैं ?’’

‘‘पूंजीपति साले !’’ संजय जैसे फूट रहा था, ‘‘बड़े-बड़े उद्योगपति। यही अख़बारों के मालिक हैं। ये जो बेचना चाहते हैं, जो कूड़ा कचरा जनता को परोसना चाहते हैं वही सब कुछ सच का बाना पहना छपवाते हैं, बेचते हैं। ये पूंजीपति कोई देश हित में, समाज हित में अख़बार नहीं छापते, बेचते। अख़बार जब मिशन था तब था, अब तो उद्योग है। और उद्योगपति किसी के नहीं होते। वह तो सिर्फ अपने हितों को पोसते हैं, अपनी तिजोरी भरते हैं, अख़बार की आड़ में पोलिटिसियनों और ब्यूरोक्रेटों को डील करते हैं। इस तरह समूचे देश को अपने पैर की जूती बनाए फिरते हैं। पर जनता कहां जानती है यह सब?’’ संजय अपने को रोकता हुआ बोला, ‘‘अब ज्यादा नहीं बोलवाओ। नहीं, तुम्हारा दुनिया पर से यकीन उठ जाएगा। और मैं आज जलेबी भी नहीं बना पाऊंगा।’’

बोलते-बोलते वह चेतना की और मुड़ा ओर बोला, ‘‘सच बताऊं इस पत्रकारिता के पेशे में आ कर पछताता हूं। पर अफसोस कि अब वापस भी नहीं हो सकता। किसी और नौकरी की उम्र नहीं रही। कोई और काम करने लायक नहीं रहा, कर ही नहीं सकता। अब तो विवशता है इस पेशे को ढोते रहने की। ठीक वैसे ही जैसे मेहतरानी मैले की बालटी सिर पर ढोते रहने को अभिशप्त हो। मेहतरानी को तो फिर भी किसी न किसी दिन इस काम से बिलकुल छुट्टी मिल जाएगी। लगभग मिल भी चुकी है। क्यों कि समाज बदल रहा है, सुविधाएं और दृष्टि बदल रही है। पर पत्रकारिता और इस की अभिशप्तता नहीं बदलने वाली। कम से कम मुझे तो ऐसा ही लगता है। इस तंत्र में तो कभी नहीं। आगे की राम जाने। पर अभी और बिलकुल अभी तो कतई नहीं।

‘‘अजीब बात है। मैं तो आप के प्रोफेशन को बड़ा पाक साफ जानती थी। समझती थी पत्रकार देश की रीढ़ हैं। और आप लोगों की जो ग्लैमरस जिन्दगी है उस से तो सच कहूं रश्क होता था।’’

‘‘नहीं, मैं यह नहीं कह रहा कि पत्रकारिता ऐज ऐ प्रोफेशन गंदी चीज है। पत्रकारिता का प्रोफेशन तो सचमुच जो तुम कह रही हो कि पाक साफ वैसा ही है, देश की रीढ़ भी होते हैं पत्रकार, यह भी सच है। और सिद्धांततः अपने देश में यह सब कुछ है भी। चौथा स्तंभ माना जाता है प्रेस को। पर यह सब कुछ सिर्फ थियरोटिकल है। और मैं तुम्हें इस का प्रैक्टिकल यानी व्यावहारिक पक्ष बता रहा था। वह सब बातें जो तुम्हारे दिमाग में हैं वह सब तब की बातें हैं जब पत्रकारिता मिशन थी। पर अब पत्रकारिता मिशन नहीं, व्यवसाय है। व्यवसायीकरण के वह सारे दबाव पत्रकारिता पर तारी हैं। जो किसी भी व्यवसाय पर हो सकते हैं। और पूंजीपति जाहिर सी बात है कि कोई भी चीज बनाता है, बाजार में उतारता है तो अपने मुनाफे के लिए। समाज को उस का क्या-नफा नुकसान होता है यह सोचना उस का काम नहीं है। उस का काम अपना मुनाफा सोचना है सिर्फ अपना मुनाफष। तो वह गलत क्या सोचता है ?’’ संजय कंधे उचकाते हुए बोला, ‘‘त्रासदी यह है चेतना कि अख़बार भी पूंजीपतियों के मुनाफे में कैद हो गए हैं। और यह जो तुम्हारी जनता है कि चेत नहीं रही है।’’ वह व्यंग्य करता हुआ बोला, ‘‘आखि़र चेते भी कैसे तुम्हारी जनता। जनता को जागरूक करने, उसे चेताने की जिम्मेदारी भी अख़बारों के कंधे पर है !’’

‘‘हद हो गई। इस तरह देश कहां जाएगा ?’’

‘‘यह तो मुझे अभी नहीं पता। और जाएगा भी तो ज्यादा से ज्यादा रसातल। पर अब टाइम बिलकुल नहीं है सो यह बंदा अब अपने अख़बार के दफ्तर जरूर जाएगा।’’ संजय चेतना को सड़क के एक ओर छोड़ता हुआ बोला, ‘‘मायूस मत होओ। यह बहस अगली मुलाकातों में भी जारी रह सकती है। क्यों कि यह कभी ख़त्म न होने वाली बहस है।’’

‘‘ठीक है’’ चेतना बोली, ‘‘पर आज तो चलती हूं।’’

‘‘ओ के॰।’’

दफ्तर आ कर संजय ने पहले तो टेलीप्रिंटर पर नजर डाली। पर वहां कुछ काम का नहीं था। जनरल डेस्क पर मगजमारी की। पर वहां से भी कुछ टपाने लायक नहीं मिला। थक हार कर वह अपनी सीट पर आ गया। और जिस मसले पर वह जाने कितनी बार लिख चुका था, वही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के बदले जाने की ख़बर पर एक नया एंगिल खोंसते हुए, ‘‘सूत्रों के मुताबिक ’’ ‘‘समझा जाता है’’ ‘‘बताया जाता है’’ ‘‘पता चला है’’ वगैरह वगैरह जैसी भरमाने वाली और निरर्थक शब्दावलियों के घालमेल से आधे घंटे में ही स्टोरी लिख कर संपादक को थमा आया। स्टोरी देखते ही संपादक बोला, ‘‘गुड ! आज की बाटम यही बनाते हैं।’’ और जैसे एहसान जताते हुए बोला, ‘‘बाइ लाईन भी दे देता हूं।’’

‘‘अरे नहीं !’’ कहता हुआ संजय संपादक के कमरे से फूट लिया। यह सोच कर कि कहीं खुद उसी के मुंह से न निकल जाए कि, ‘‘टोटल जलेबी है, बाइ लाईन क्या दीजिएगा !’’

वापस अपनी सीट पर आ कर उस ने सिगरेट सुलगा ली।

‘‘बच्चा-बच्चा राम का, क्या प्रबंध है शाम का।’’ उच्चारता हुआ राकेश संजय की सीट से गुजरता हुआ बोला, ‘‘अभी तक यहां बैठे-बैठे सिगरेट फूंक रहे हो। क्या आज अभी तक कहीं इंतजाम नहीं हुआ ?’’

‘‘क्यों ? मेरा क्या है, तुम अपना बताओ।’’

‘‘भई अपनी तो इन दिनों चांदी है। सुबह ब्रेकफास्ट, दिन को बीयर वाला लंच और रात की काकटेली डिनर वाली सारी प्रेस कांफ्रेंस अपने ही को एसाइन हो रही हैं।’’

‘‘तो आज रात को काकटेली डिनर कहां है ?’’ संजय मुसकुराते हुए बोला।

‘‘क्लार्क !’’ राकेश सटाक से बोला।

‘‘पर क्लार्क होटल वाला एसाइनमेंट तो मुझे दिया गया है ?’’

‘‘तो क्या फर्क पड़ता है बॉस। तुम भी चलना, हम भी चलेंगे।’’

‘‘नहीं, यार। एक अख़बार से दो दो ! नहीं-नहीं। तुम चले जाना में नहीं जाऊंगा।’’

‘‘बड़े भारी कार्टून हो। डग्गे वाली काकटेली डिनरों में देखते नहीं हो और अख़बारों का पूरा का पूरा ब्यूरो ही पहुंच जाता है। और तुम दो ही में भुड़कने लगते हो।’’ राकेश बोला।

‘‘फिर भी संकोच होता है।’’

‘‘संकोच को मारो गोली। चल के भरपेट दारू और मुर्गा काटो। हमें भी काटने दो। और कौन साले महात्मा गांधी की प्रेस कांफ्रेंस है जो तुम नैतिकता बघार रहे हो। इंडस्ट्रियलिस्ट की प्रेस कांफ्रेंस है। कोई झांटू सी गिफ्ट देगा और लाखों की पब्लिसिटी बटोर लेगा। तो ऐसे सालों से क्या रियायत, कैसी नैतिकता ? चल के स्कॉच पियो, मुर्गा खाओ, डग्गा लो, ऐश करो।’’ कहता हुआ राकेश निकल गया। संजय बड़ी देर तक सोचता रहा कि वह काकटेली डिनर वाली प्रेस कांफ्रेंस में जाए कि नहीं। रही बात ख़बर की तो उस की तो विज्ञप्ति दूसरे दिन आ ही जाती। संजय अंततः क्लार्क होटल चला गया । राकेश उवाच का पालन करते हुए उस ने भरपेट स्कॉच पी, मुर्गा खाया, डग्गा ले कर, झूमता-झामता घर पहुंचा तो रात के बारह बजे थे।

दूसरी शाम चेतना के साथ वह शहीद स्मारक पर गोमती नदी के किनारे एक बेंच पर बैठा था। चेतना आज उसे अजनबी सी लग रही थी। उस ने गौर किया कि वह आज हलका सा मेकअप भी किए हुए थी। वह कोई फिल्मी गाना गुनगुना रही थी। जाने गाने की शोख़ी थी, उस के मेकअप का सुरूर था कि रात की स्कॉच की खुमारी जो अभी तक टूटी नहीं थी, संजय ने बढ़ कर चेतना को अचानक चूम लिया। संजय के चूमते ही वह उठ कर खड़ी हो गई। बोली, ‘‘यह क्या हरकत है ?’’

‘‘मैं समझा नहीं।’’ संजय अनजान बन गया।

‘‘बड़े भोले बन रहे हैं ?’’ वह अभी भी नाराज थी।

‘‘क्या मतलब ?’’

‘‘मतलब यह है कि आप ने मुझे चूमा क्यों ?’’

‘‘क्या कोई अपराध कर दिया है ?’’

‘हां अपराध है।’’

‘‘चूमना अपराध नहीं है।’’

‘‘चूमना अपराध नहीं है। पर जबरदस्ती चूमना गलत है। अपराध है।’’

‘‘मैं ने जबरदस्ती नहीं की।’’

‘‘तो क्या मैं ने कहा कि मुझे चूम लीजिए।’’

‘‘नहीं।’

‘‘तो जबरदस्ती नहीं हुई ?’’

‘‘क्या कोई लड़की किसी से कहती है कि आओ मुझे चूमो। कि तुम मुझ से कहती?’’

‘‘तो क्या मैं आप को ऐसी लगती हूं कि आप सरे आम मेरे साथ जो चाहे हरकत करें ?’’ वह हाथ जोड़ते हुए बोली, ‘‘माफ करिए मैं ‘‘वैसी’’ नहीं हूं।’’

‘‘मैंने कब कहा कि तुम ‘‘वैसी’’ हो।’’

‘‘तो आप ने चूमा क्यों ?’’

‘‘यूं ही।’’

‘‘यह क्या बात हुई ?’’

‘‘अच्छा चलो बात ख़त्म हुई।’’

‘‘बात ख़त्म नहीं हुई।’’

‘‘तो ?’’

‘‘आइंदा नोट कर लीजिए, मेरे साथ अब दोबारा ऐसी हरकत मत कीजिएगा।’’

‘‘क्यों ?’’ संजय की आंखों में शरारत थी और इसरार भी।

‘‘अब बता दिया आप को। और जो आप ने फिर दुबारा ऐसा कुछ किया तो न आप से बोलूंगी, न फिर कभी मिलूंगी।’’

‘‘अच्छा ?’’

‘‘हां, मजाक मत समझिएगा।’’

‘‘तो लो !’’ कह कर संजय ने उसे पकड़ कर भरपूर चूम लिया। इस चूमा चाटी में चेतना के बालों की क्लिप संजय की आंखों में धंसते-धंसते बची। क्यों कि चेतना बराबर प्रतिरोध दर्ज करती रही। पर संजय पर जैसे उसे चूमने का भूत सवार था।

यह सब कुछ क्षण भर में ही घटित हो गया। चेतना गुस्से से लाल हो गई। पैर पटकती हुई वह वहां से चल पड़ी। संजय चुपचाप बेंच पर बैठा रहा। उस ने गौर किया कि नदी में नाव पर बैठे कुछ लोग यह सारा नजारा देख रहे थे। पीछे से दो बूढ़े भी इधर ही नजर गड़ाए हुए थे। हार कर संजय भी चेतना के पीछे-पीछे ‘‘सुनो तो सही, सुनो तो सही’’ कहता हुआ चल पड़ा। पर चेतना ने संजय की एक नहीं सुनी। खट-खट, खट-खट सीढ़ियां चढ़ती गई। सीढ़ियां उतरते-उतरते सड़क पर संजय ने उसे घेर लिया, ‘‘यहां तमाशा करने की जरूरत नहीं है। चुपचाप मेरे साथ चलो।’’

‘‘तमाशा मैं नहीं आप कर रहे हैं। आप शादीशुदा हैं। परिवार वाले हैं। आप को शर्म आनी चाहिए। और अब मैं आप के साथ यहां नहीं बैठूंगी।’’

‘‘मैं बैठने के लिए नहीं, साथ चलने के लिए कह रहा हूं। आगे चल कर फिर भले कहीं चली जाना। अकेली। पर यहां से साथ चलो। तमाशा मत बनो।’’ संजय उसे मनाते हुए बोला, ‘‘लोग जाने क्या तुम्हारे बारे में सोचें, इस तरह अकेले जाने से।’’

‘‘सोचा करें। मुझे उस की परवाह नहीं।’’ वह तमकी।

‘‘अच्छा ठीक है। आओ थोड़ी दूर साथ चल कर अकेली चली जाना।’’

‘‘चेतना मान गई। और स्कूटर पर बैठती हुई बोली, ‘‘कालीबाड़ी चलिए।’’

‘‘यह कालीबाड़ी कहां है ?’’

‘‘यह सब फालतू बातें जानते हैं। और कालीबाड़ी नहीं जानते ?’’

‘‘नहीं जानता, तभी तो कह रहा हूं।’’

‘‘अच्छा चलिए।’’

संजय समझ गया कि चेतना टाइम टेकिंग लड़की है। लाइन पर आएगी तो, पर जरा देर से। संजय को यही नहीं सुहाता था। जाने क्यों लड़कियों को मनाने में, ज्यादा टाइम खर्च करना वह बेहयाई मानता था। यही बेहयाई वह नहीं पे कर पाता था। पर चेतना के मामले में वह जरा बेहयाई से लगा रहा। क्यों कि वह देख रहा था कि सिर्फ वही नहीं चेतना भी उस के पीछे लगी पड़ी थी। कायदे से जब पहली बार रजनीश कथा के ही मार्फत सही सीधे-सीधे सेक्स की बात संजय ने उठाई तभी उसे बुरा मान जाना चाहिए था। पर वह बुरा मानने के बजाय मीरा बनने लगी। चलिए कोई बात नहीं। बातचीत, बहस मान कर टाल गई। पर जब शहीद स्मारक पर चूम लिया। विरोध के बावजूद एक नहीं, दो-दो बार चूम लिया। तब तो वह पिंड छोड़ या छुड़ा सकती थी। पर नहीं, वह फिर भी मिलती रही। और अक्सर ख़ुद ही आती और कहती, ‘‘कहीं चलिए।’’

‘‘कहां चलें ?’’ स्कूटर स्टार्ट करता हुआ संजय पूछता।

‘‘कहीं भी। जहां आप चाहें।’’ ऐसा अक्सर जब वह करने लगी तो एक दिन नींबू पार्क में उस का हाथ थामते हुए संजय ने चेतना ने कहा, ‘‘तुम बुरा न मानो तो एक बात कहूं।’’ यह संजय का पेट डायलाग था। जो किसी लड़की के साथ सोने के लिए सीधा प्रस्ताव रखने की भूमिका में इस्तेमाल करता। जरा भी समझदार लड़की उस के इस कहने का अर्थ, उस की ध्वनि, इस ध्वनि से उपजते संकोच और आंखों से टपक रही वासना का संकेत समझ जाती। कुछ सती सावित्री टाइप लड़कियां संजय के इस डायलाग को समूचा पी जातीं और कोई जवाब देने के बजाय कन्नी काट कर निकल जातीं। फिर कभी मिलने से कतरातीं। तो कुछ ‘‘क्या कहना चाहते हैं ?’’ जैसे सवाल आंखों में आग डाल कर पूछ बैठतीं। पर धीरे-धीरे लाइन पर आ जातीं। कुछ नहीं भी आतीं। कुछ कहती, ‘‘कहिए।’’ कुछ कहतीं, ‘‘बुरा मानने वाली बात कहना ही क्यों चाहते हैं ?’’ और बुरा मानते-मानते भी वह संजय के वश में हो जातीं। पर दिल्ली में यह तरीका ज्यादा मुफीद पड़ता था। लखनऊ में वह आलोक की तरह कभी पिटा तो नहीं पर एकाध बार पिटते-पिटते जरूर बचा। पर लड़कियां उस की कमजोरी बन चुकी थीं। वह इस आदत से बाज नहीं आता। फिर जब लड़कियां खुद ही उस की ओर लार टपकाती चली आतीं तो वहउन्हें मना नहीं कर पाता था। ऐसे ही जब एक बड़े नेता की बेटी उस के गले पड़ गई तो वह चाहते हुए भी ‘‘नहीं’’ नहीं कह पाया। पर वह जल्दी ही संजय से ऊब गई कि संजय उस से ऊब गया। वह कुछ समझता कि उस की शादी तय हो गई। शादी तय होते ही संजय को कुछ गुंडों ने एक दिन घेर लिया और धमकाते हुए कहा कि, ‘‘पढ़े-लिखे आदमी हो। उस का चक्कर छोड़ दो।’’ पर उस ने जब शादी का कार्ड भिजवाया तो वह गए बिना भी नहीं रह पाया। गया वह रीना की शादी में।

हां, रीना ही नाम था उस का।

संजय को याद है एक दिन जब वह निढाल हो गया तब भी वह उस की बांहों में कसमसाती रही और, ‘‘एक बार और-एक बार और’’ फुसफुसाती रही।

‘‘तुम शादी क्यों नहीं कर लेती ?’’

‘‘तुम कर लो न ?’’ रीना बोली।

‘‘मुझ से शादी करोगी ? मैं गरीब आदमी।’’

‘‘हां, ये प्राब्लम तो है।’’ वह रुकी, छाती पर सवार होती हुई बोली, ‘‘पापा भी किसी आई॰ ए॰ एस॰ से शादी करना चाहते हैं।’’

‘‘तब बताओ !’’

‘‘पर तुम हां करो तो सही। मैं पापा को मना लूंगी।’’

‘‘पर तुम्हारे खर्चे, तुम्हारे नखरे, मेरी औकात से तो बाहर हैं।’’

‘‘क्यों ?’

‘‘जो तुम्हारा चार दिन का खर्चा है वो मेरे महीने भर की तनख्वाह है।’’

‘‘क्या फिल्मी सीन लिखने बैठ गए।’’ वह चिकोटती हुई बोली, ‘‘पापा इतना दे देंगे कि तुम्हें इस की फिकर करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।’’

‘‘पर मेरा जमीर !’’

‘‘मेरे साथ इस तरह चोरी छुपे सोने में तुम्हारा जमीर नहीं मरता ?’’ वह दांत भींचती हुई बोली, ‘‘मिडिल क्लास मेंटालिटी।’’ फिर वह बेतहाशा चूमते हुए बोली, ‘‘यह मेंटालिटी छोड़ दो।’’ वह उचकती हुई बोली, ‘‘मेरी गोद में बैठ जाओ।’’

‘‘सिंबालिक वे में क्यों तमाचा मार रही हो, सीधे मारो न।’’ संजय उस के बाल खींचता हुआ बोला।

‘‘ओह, यू स्टुपिड !’’ कराहती हुई वह बोली, ‘‘कहा न यह मेंटालिटी छोड़ दो। बी प्रैक्टिकल।’’ कह कर वह संजय की छातियों पर हाथ फेरने लगीं। संजय उस के जादू में आ गया। पर गोद में फिर भी नहीं बैठा। हां, सिर उस की गोद में जरूर रख दिया। वह संजय के बालों को सहलाती हुई बोली, ‘‘देखो जब मुझ से तुम्हारी शादी हो जाएगी तो पापा तुम्हें ऐसे रिपोर्टर ही थोड़े रहने देंगे। हो सकता है तुम्हें एडीटर लगवा दें।’’

‘‘क्या बेवकूफी की बात करती हो ?’’

‘‘देखो तुम्हारी प्रेस लाइन की कुछ बातें मैं भी जानती हूं।’’

‘‘क्या जानती हो ?’’ वह जैसे गुर्राया।

‘‘इस में फेड अप होने की क्या बात है। हकीकत यही है कि जर्नलिस्ट पोलिटिसियंस के तलवे चाट कर ही कायदे के जर्नलिस्ट बन पाते हैं।’’

‘‘माइंड योर लैंग्वेज रीना। मांइड योर लैंग्वेज !’’ संजय उस की छातियों के निप्पल दबाता हुआ बोला।’’

‘‘उस्स !’’ कह कर वह उसे काटने को झुकी तो उस ने उस के होंठ हाथों में ले लिए, ‘‘ऐसी ही तकलीफ मुझे भी हुई।’’

‘‘पर मैं ने यह तुम्हारे लिए तो कहा नहीं।’’

‘‘फिर ?’’

‘‘तुम कायदे के जर्नलिस्ट हो क्या ?’’ वह आंखों में शरारत डाल कर बोली।

‘‘तो तुम क्या समझती हो। संसद में मेरी ख़बरों पर यों ही हंगामा होता है। तुम्हारे पिता जैसे पोलिटिसियंस यूं ही भाव देते हैं।’’

‘‘जिंदगी भर बेवकूफ ही रहोगे।’’

‘‘ह्वाट यू मीन ?’’

‘‘कब तक खुशफहमी में रहोगे तुम संजय ? तुम क्या समझते हो मैं इतना भी नहीं जानती।’’

‘‘क्या जानती हो ?’

‘‘देखो मेरी राय में,’’ वह रुकी और बोली, ‘‘जरूरी नहीं तुम भी इत्तफाक करो मेरी बात से !’’ वह बोलती गई, ‘‘मेरी राय में और मैं समझती हूं दुनिया की राय में भी कायदे का जर्नलिस्ट वह जो हवाई जहाज से चले, अपनी ए॰ सी॰ कार हो, बंगला हो, नौकर चाकर हो।’’ बोलते बोलते वह ऐंठी, ‘‘कायदे का जर्नलिस्ट वह है जो साल में चार छः बार विदेश यात्राएं करे, कम से कम संसद कवर करे। यह नहीं कि संसद में हंगामा कराने वाली ख़बरें लिखे।’’ और जैसे संजय को वह भिगोती हुई बोली, ‘‘कायदे का जर्नलिस्ट वह नहीं है जो दिन रात कलम घिसे, कायदे का जर्नलिस्ट वह है जिस की कलम उस की जेब में रहे, हाथ में नहीं।’’ कह कर वह जैसे खुश हो गई।

‘‘वाह क्या बात है ! तुम तो जर्नलिस्टों की पूरी जन्म कुंडली जानती हो !’’ वह उस की जांघ पर उंगलियां फिराते हुए बोला।

‘‘मैं और भी बहुत कुछ जानती हूं।’’ वह जांघ चादर से ढंकती हुई बोली।

‘‘पर कैसे ?’’

‘‘पापा के पास क्या कम जर्नलिस्ट आते हैं,’’ वह इतराई, ‘‘एंड फार योर कांइड इनफार्मेशन तुम्हारे एक्सप्रेस ग्रुप में चार महीने मैं भी अप्रेंटिस रही हूं। और वो जो सोनू वालिया जिस की मांसलता, मादकता, आंखों और अभिनय की आह फिल्म रिव्यू में पिछले हफ्ते तुम ने टपकाई थी वह भी तब मेरे साथ ही अप्रेंटिस थी !’’ कह कर वह संजय को ऐसे देखने लगी गोया लाल किला जीत लिया हो।

‘‘क्या उमर है तुम्हारी ?’’ संजय हैरान होते हुए बोला।

‘‘क्यों हो गई न सीनियर यहां भी तुम से।’’

‘‘अप्रेंटिस सीनियर नहीं होते।’’ संजय बोला। पर वह जैसे सफाई पर उतर आई, ‘‘उम्र में ही सीनियर सही पर तुम से बहुत ज्यादा नहीं। दो चार साल बस।’’ फिर वह जैसे अपनी बढ़ी उम्र की सफाई देने पर उतर आई, ‘‘पर क्या फर्क पड़ता है। सुनील दत्त नरगिस से चौदह साल छोटे थे। आदित्य पंचोली जरीना वहाब से कोई दस बारह साल छोटा है।’’

‘‘और डिंपल राजेश खन्ना से अठारह साल, सायरा बानो दिलीप कुमार से बाइस साल छोटी हैं।’’ संजय जैसे काउंटर करता हुआ बोला।

‘‘ओह, तो तुम्हें लड़की नहीं गुड़िया चाहिए।’’ वह मटकती हुई बोली।

‘‘जी नहीं बुढ़िया !’’ संजय ने उसे चिढ़ाया तो वह विलख कर रोने लगी, ‘‘मैं तुम्हें बुढ़िया लगती हूं ?’’ वह रुकी और बिफरी, ‘‘जरा सा मुंह क्या लगा लिया, मुझे बुढ़िया कहने की हिम्मत हो गई तुम्हारी ?’’

‘‘मुंह नहीं लगाया तुम ने मुझे।’’

‘‘तो ?’’

‘‘देह लगाया है। पूरा-पूरा। बिलकुल साबुन की बट्टी की तरह।’’ संजय ने उसे फिर चिढ़ाया।

‘‘यू चीट !’’ कह कर वह उस पर टूट पड़ी, ‘‘तब तो कहते थे, एक बात कहूं, बुरा तो नहीं मानिएगा ! बड़े मासूम बनते थे।’’ वह उस के बाल नोचने लगी, ‘‘और आज ये हिम्मत कि जो मुंह में आता है बक जाते हो।’’ वह जैसे रोने लगी।

‘‘सॉरी, मेरा ये मतलब नहीं था।’’

‘‘तो ?’’ वह बिसूरती हुई बोली।

‘‘मैं तो मजाक कर रहा था।’’

‘‘ओह, श्योर !’’

‘‘एक्जेक्टली !’’

‘‘यू नॉटी !’’ कह कर वह उस पर जैसे सवार हो गई, ‘‘तो आज तुम्हें कच्चा खा जाऊंगी।’’

‘‘रुको तो सही, रुको तो सही।’’ संजय कहता रहा पर वह भला कहां मानने वाली थी। और जब शांत हुई तो फिर से शादी की बात पर वापस आ गई।

‘‘हमारी तुम्हारी शादी नहीं निभ पाएगी।’’ संजय बोला।

‘‘क्यों ?’’

‘‘मैं ठहरा लोवर मिडिल क्लास, तुम ठहरी अपर क्लास। अंततः मैं न तो कार्टून बन कर जीना चाहता हूं, न ही बेचारा बन कर तुम्हारी चाकरी करता हुआ जीना चाहता हूं।’’

‘‘तुम मिडिल क्लास !’’ वह उस का हाथ थाम कर बोली, ‘‘इस से क्यों नहीं उबर पाते।’’ वह रुकी, ‘‘हाल तक हम भी वही थे जो तुम हो। पापा अगर मिनिस्टर नहीं रहे होते तो हम भी वहीं थे, जहां तुम हो। हमारे भी वही संस्कार हैं जो संस्कार तुम्हारे हैं।’’ वह जैसे फैल गई, ‘‘और तुम भी छलांग मार सकते हो। जरूरी है मिडिल क्लास के खूंटे से किसी गाय की तरह बंधे रहो ?’

‘‘नहीं मुझे यह छलांग मंजूर नहीं है।’’

‘‘यह कहो न कि मुझ से शादी मंजूर नहीं है।’’

‘‘नहीं, कहो तो शादी अभी कर लूं। इसी वक्त। पर बात यह नहीं है।’’

‘‘तो क्या है ?’’

‘‘मैं पैरासाइट बन कर नहीं जीना चाहता।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘स्वाभिमान की कीमत पर तो कतई नहीं।’’

‘‘कौन खा रहा है तुम्हारा स्वाभिमान ?’’ वह जैसे मरहम लगाती हुई बोली, ‘‘तुम मुझे समझने की कोशिश क्यों नहीं करते।’

‘‘क्या समझूं ? कैसे समझूं ? चलो देह संबंध की बात और है पर शादी !’’

‘‘हां, शादी !’’

‘‘शादी अंसभव है !’’

‘‘चलो जब तुम ने यह सोच ही लिया है तो कोई बात नहीं।’’ वह उस का चेहरा हाथ में लेती हुई बोली, ‘‘तुम्हारे मन में जब इतना कांपलेक्स था तो मेरे पास आना ही नहीं था। क्या अधिकार था तुम्हें मेरे साथ इस तरह खेलने का ?’’

‘‘मैं तुम्हारी जिंदगी में कोई पहला पुरुष तो नहीं हूं।’’

‘‘तुम कहना क्या चाहते हो ?’’

‘‘यही कि देह संबंध का मतलब किसी से खेलना नहीं है। हां, अगर तुम्हारे साथ जबरदस्ती करता, तुम्हारा शोषण करता, तुम्हें अंधेरे में रखता, तुम से झूठे वादे करता तो खेलता। और ऐसा मैं ने कुछ भी नहीं किया तुम्हारे साथ !’’

‘‘किया तो है। खेले तो हो !’’

‘‘क्या किया है। किस से खेला हूं ?’’

‘‘मेरे मन के साथ, मेरी देह के साथ, मेरी भावनाओं के साथ।’’

‘‘गलत। खेला नहीं, जिया है, भोगा है, तुम्हारे मन को, तुम्हारी देह को, तुम्हारी भावना को। और तुम्हारी मर्जी से। तुम से पूछ कर। हर बार तुम्हारी सहमति से। तुम ने जब मना किया तो मान भी गया हूं। कभी जबरदस्ती की हो तुम्हारे साथ, मुझे याद नहीं। तुम ने जरूर यह कभी-कभार किया है। फिर कैसे कह रही हो कि तुम्हारी देह, तुम्हारे मन, तुम्हारी भावना के साथ खेला।’’

‘‘पहल मैं ने की थी कि तुम ने ?’’

‘‘एक्जेक्टली मैं ने।’’

‘‘तो ?’’

‘‘मैं इसे क्या समझूं ?’’

‘‘तुम नारी स्वातंत्र्य की बात जरूर करते हो पर नारी मन को नहीं समझते।’’

‘‘समझता हूं। इसी लिए !’’

‘‘ख़ाक समझते हो।’’

‘‘यही तो तुम्हारे साथ दिक्कत है।’’

‘‘तुम क्यों नहीं समझते, मैं तुम्हें प्यार करने लगी हूं। पहले तुम्हारे लिखे को पसंद करती थी, अब....’’

‘‘तुम्हारी देह को।’’ संजय उस की बात पूरी करता हुआ बोला।

‘‘हां, तुम्हारी देह भी शामिल है उस में, तुम्हारा मन भी शामिल है, तुम्हारी ईमानदारी, तुम्हारी निश्छलता, तुम्हें....तुम्हें इन टोटल चाहती हूं।’’

‘‘नहीं, तुम झूठ बोलती हो।’’

‘‘सच कह रही हूं।’’

‘‘तो कहो न तुम्हारे मिडल क्लास कांपलेक्स को, तुम्हारी मिडल क्लास मुफलिसी को, तुम्हारी मिडल क्लास नौकरी, मेंटालिटी वगैरह-वगैरह से भी प्यार करती हूं।’’ कहते-कहते संजय तल्ख़ हो गया।

‘‘नहीं।’’ वह नरमी से बोली, ‘‘क्यों झूठ बोलूं। मैं तुम्हारी इन चीजों से चिढ़ती हूं।’’ वह भावुक हो गई, छाती से चिपट गई, ‘‘पर मैं तुम्हें चाहती हूं।’’

‘‘ओह रीना !’’ संजय उस की भावुकता से वशीभूत उसे बांहों में भरता हुआ बोला, ‘‘जानता हूं।’’

‘‘फिर ?’’

‘‘आज इस बात को यही मुल्तवी कर दें तो ?’’

‘‘जैसा तुम्हारा हुक्म।’’ कहते हुए रीना ने उसे चूम लिया, बोली, ‘‘पर एक बात बताओ कि कहीं ऐसा तो नहीं तुम पोलिटिसियंस से चिढ़ते हो इसलिए ?’’

‘‘पोलिटिसियंस से चिढ़ता हूं पर उन की बेटियों से नहीं।’’ कहते हुए संजय ने रीना की नाक पर चिकोटी काटी और कहा कि, ‘‘मेरा फिर मन हो रहा है और अब बहस मत करो प्लीज।’’ कह कर वह उसे मथने, मसलने लगा।

‘‘भालू कहीं के।’’ वह बुदबुदाई। पंडारा रोड के उस बंगले में रीना ने उसे रात भर सोने नहीं दिया। रात भर वह कुछ न कुछ करती रही। कुछ न कुछ बतियाती रही। शादी जबरदस्ती नहीं करेगी, यह भी जताती रही। अपनी अख़बारी जिंदगी के चारों महीने का लेखा जोखा बताती रही। संजय यह जान कर हैरत में था कि रीना उस चार महीने में अप्रेंटिस की हैसियत के बावजूद अख़बारी जिंदगी के लगभग सारे स्याह-सफेद से वाकिफ हो गई थी। न सिर्फ वाकिफ हो गई थी, एनालिसिस भी उस की गौर तलब थी।

वह कहने लगी, ‘‘ये मीनिंगफुल जर्नलिज्म की वकालत करने वाले लोग भीतर से कितने खोखले, बेशर्म और मीनिंगलेस जर्नलिज्म करते थे उसे देख कर घिन आती थी।’’ कहते-कहते वह पूछ बैठी, ‘‘ये डेस्क और रिपोर्टिंग वालों का झगड़ा हरदम क्यों होता रहता है मैं तो तब समझ नहीं पाई। तुम बताओ क्यों होता है ?’’

‘‘बड़ी लंबी बहस है।’’

‘‘फिर भी।’’

‘‘छोड़ो भी क्या फायदा है।’’

‘‘नुकसान क्या है ?’’

‘‘है।’’

‘‘इस लिए कि तुम रिपोर्टर हो ?’’

‘‘इस लिए कि तुम्हारे साथ इस मुलाकात का समय बेवकूफी के बहस में नहीं गुजारना चाहता।’’

‘‘तुम बेवकूफी की बात कर रहे हो।’’ वह बोलती गई, ‘‘जैसे झुग्गी वाली औरतें पानी के लिए या किसी भी छोटी मोटी बात के लिए झौं-झौं कर के लड़ती रहती हैं, ठीक वैसे ही ये डेस्क वाले रिपोर्टरों से उलझ पड़ते थे और रिपोर्टर्स, डेस्क वालों से। गलाकाट लड़ाई ऐसे होती थी जैसे वह एक अख़बार के जर्नलिस्ट न हों। लड़ते ऐसे थे जैसे हिंदुस्तान-पाकिस्तान।’’

‘‘झुग्गी वालों को जानती हो तुम ?’’

‘‘हां, पापा जब मिनिस्टर थे तब उन के साथ दो-चार बार झुग्गी बस्तियों में गई हूं।’’

‘‘बस !’’

‘‘और नहीं तो क्या ?’’ वह उस के हिप पर पैर फेंकती हुई बोली, ‘‘तुम क्या समझते हो वहां रहने गई थी। तुम तो बस !’’

‘‘हां, तुम वहां कैसे रहती।’’ वह जांघों की ओर इशारा करते हुए बोला, ‘‘वहां रह जाती तो यहां कौन रहता ?’’

‘‘तुम्हें हर वक्त सेक्स ही क्यों सूझता रहता है।’’

‘‘इस लिए कि तुम सेक्सी हो।’’ वह उस की जांघों पर जांघ रखता हुआ बुदबुदाया, ‘‘सेक्स ही जीवन है।’’ और उसे चूम लिया।

‘‘तुम तो सरकारी स्लोगन की तरह बोल रहे हो।’’

‘‘कौन सा स्लोगन ?’’

‘‘जल ही जीवन है।’’

‘‘बिलकुल ठीक पकड़ा तुम ने।’’ सुनते ही रीना ने हड़बड़ा कर उस की जांघों के बीच से हाथ हटा लिया। उस की इस हड़बड़ाहट पर संजय हंस पड़ा, ‘‘तुम ने हाथ क्यों हटा लिया। मैं तो स्लोगन ‘‘जल ही जीवन’’ पर कमेंट कर रहा था कि तुम ने ठीक पकड़ा है।’’ वह उसे गुदगुदाता हुआ, हाथ खींचता हुआ बोला, ‘‘वैसे वो भी ठीक था।’’ उसे खींच कर अपनी देह से सटाता हुआ बोला, ‘‘आखि़र भोजन पानी के बाद आदमी को क्या सूझता है ?’’ उस ने जैसे सवाल किया और ख़ुद ही जवाब दिया, ‘‘सेक्स ही तो सूझता है।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘सेक्स न होता तो हम तुम न होते। कम से कम इस समय यहां तो नहीं होते। यह सृष्टि ही नहीं होती।’’ वह जैसे दार्शनिक हुआ जा रहा था, ‘‘पर जाने क्यों सेक्स को लोगों ने इतना सतही, बुरा, चोरी और लुका छिपी का खेल बना दिया है। पाप बना दिया है।’’

‘‘तो तुम क्या चाहते हो सरेआम सड़क पर ही सेक्स की इजाजश्त दे दी जाए। परदा, लिहाज कुछ भी न रह जाए।’’

‘‘यह किस ने कहा !’’

‘‘तो ?’’

‘‘खाना तो तुम चोरी छुपे नहीं खाती ?’’

‘‘नहीं।’’

‘‘सड़क पर खाती हो ?’’

‘‘नहीं।’’

‘‘तो क्या खाना खा कर पाप करती हो, चोरी करती हो ?’’

‘‘नहीं।’’

‘‘तो सेक्स के बाबत भी ऐसा क्यों नहीं सोचती ?’’

‘‘पर खाना तो लोगों के सामने खा सकते हैं, सेक्स नहीं हो सकता सब के सामने।’’

‘‘किस ने कहा सब के सामने। परदा, लिहाज करने को किस ने मना किया। पर पाप तो न समझो। पिता के सामने मत करो ठीक। पर पिता के आगे, सब के आगे इस के लिए सिर झुकाओ यह ठीक नहीं है। सेक्स चोरी नहीं है, पाप नहीं है। सेक्स एक आदिम जरूरत है। एक नैसर्गिक जरूरत।’’ वह बोलता रहा, ‘‘जिस दिन सेक्स को लोग सामान्य अर्थ में लेने लगेंगे बिलकुल भोजन और पानी की तरह, देखना, ज्यादातर समस्याएं, ज्यादातर अपराध पृथ्वी से खुद-ब-खुद ख़त्म हो जाएंगे। क्यों कि ज्यादातर अपराध और जटिलताएं सेक्स, दमित सेक्स की उपज हैं। क्यों कि सेक्स एक टैबू बन कर रह गया है हमारे समाज में। हम हर क्षण जीते हैं पर सार्वजनिक जीवन में हर क्षण सेक्स को धकियाते रहते हैं।’’

‘‘शाबास !’’ वह अपनी हिप खुजलाती हुई बोली, ‘‘अलका बताती तो थी कि तुम रजनीश के दीवाने हो, पर रजनीश दर्शन बघारते भी हो यह नहीं बताया था।’’

‘‘वह क्या बताती !’’ संजय करवट बदलते हुए बोला, ‘‘जरा सा भर आंख देख क्या लिया राखी बांधने पर आमादा हो गई।’’

‘‘अच्छा ! यह तो उस ने नहीं बताया। पर बताओ राखी बंधवाई क्या तुम ने ?’’ चुहुलबाजी करती वह बोली।

‘‘हद हो गई। इतनी नैतिकता तो मुझ में है।’’

‘‘तो बंधवा ली ?’’

‘‘सवाल ही नहीं खड़ा होता !’’

‘‘क्यों ?’’

‘‘राखी की पवित्रता कैसे तोड़ता भला ?’’ वह बोला, ‘‘जब उसे एक बार ही सही देह की नजर से देख लिया तो यह तो अपने साथ छल होता।’’

‘‘तो क्या अलका के साथ भी तुम्हारा लफड़ा चला ?’’ उस की जिज्ञासा जागी।

‘‘नहीं।’’

‘‘क्यों ?’’

‘‘वह मेरे दोस्त की बीवी थी आखि़र। और इतनी नैतिकता तो मुझ में हमेशा शेष रहेगी।’’

‘‘ओह ! लवली।’’ वह बोली, ‘‘पर रजनीश तो फिर यहां फेल हो गए।’’

‘‘कैसे ?’’

‘‘तुम ने अलका को चाह के भी जो नहीं गहा।’’

‘‘कहा न नैतिकता।’’ वह बोला, ‘‘ऐसा भी नहीं था। चाहता तो गह सकता था। पर कहा न फिर वही नैतिकता।’’

‘‘पर रजनीश के सेक्स दर्शन में नैतिकता का बखान तो है नहीं।’’

‘‘तुमने रजनीश को पढ़ा है ?’’

‘‘हां, थोड़ा बहुत।’’

‘‘तभी !’’ वह रुका और बोला, ‘‘अच्छा रजनीश ने यह कहां लिखा कि सेक्स में नैतिकता नहीं बरतनी चाहिए।’’

‘‘मैं ने यह तो कहीं नहीं पढ़ा। पर यह भी कहां लिखा है कि सेक्स में नैतिकता बरतनी चाहिए।’’

‘‘पता नहीं।’’ वह रीना के तर्क से लाजवाब होता हुआ बोला, ‘‘देखो कायदे से सेक्स न तो नैतिक होता है न अनैतिक। सेक्स सिर्फ सेक्स होता है। और जो आफर ख़ुद अलका का होता तो मैं नहीं, नहीं कहता।’’ वह उस के बालों में अंगुलियां फिराता हुआ बोला, ‘‘जैसे तुम्हें नहीं, नहीं कहा।’’

‘‘बड़े मुहफट हो।’’

‘‘बट कम आन द प्वाइंट कि सेक्स में नैतिकता बरतनी चाहिए। मैं ने भी अक्षरशः यह कहीं नहीं पढ़ा। पर रजनीश का सारा दर्शन ही संभोग से समाधि का है। संभोग यानी सम-भोग, वह उस की छातियां मसलता हुआ बोला, ‘‘जो हम यहां भोग रहे हैं।’’

‘‘स्टाप योर नानसेंस।’’ वह कुढ़ती हुई बोली।

‘‘क्या मतलब ?’’

‘‘सम-भोग का दर्शन बखान रहे हो। और मुझे पीड़ा भी दे रहे हो।’’ वह उस की ओर मुड़ी, ‘‘कितनी बार कहा कि कस के मत दबाया करो दुखता है।’’

‘‘सॉरी !’’ वह बोला, ‘‘दबाया तो अनायास ही था पर रेफरेंस अच्छा मिल गया। अलका के साथ सेक्स संबंध मैं कायम करता तो शायद उसे पीड़ा होती। उसे तो भर आंख देख लेना ही पीड़ा दे गया था। फिर सम-भोग कैसे हो सकता था भला ?’’

‘‘चलो मान गई रजनीश बाबा !’’

‘‘मैं रजनीश नहीं, संजय हूं।’’ उस ने रीना के गाल पर चिकोटी काटी।

‘‘उफ् ! तुम्हारी यह आदत कब जाएगी ?’’

‘‘जब तुम चाहो !’’ कहते हुए वह उस की देह पर चढ़ गया।

‘‘तुम्हारा पेट जल्दी से नहीं भरता ?’’

‘‘किस चीज से ?’’

‘‘सेक्स से।’’

‘‘पेट सेक्स से नहीं, भोजन और पानी से भरता है।’’

‘‘आई मीन दिल नहीं भरता ?’’

‘‘किस से ?’’

‘‘सेक्स से ?’’

‘‘गाना नहीं सुना है अभी न जाओ छोड़ के, कि दिल अभी भरा नहीं।’’

‘‘यह तो मुहम्मद रफी ने गाया है देवानंद के लिए, तुम्हारे लिए नहीं।’’

‘‘यह तुम्हें किस ने बताया ?’’ बुदबुदाता हुआ वह हांफने लगा। थोड़ी देर बाद फिर बुदबुदाया, ‘‘मतलबवा एक है नैनन पुकार का।’’ उस की देह पर से उतरते हुए वह धीरे से बोला, ‘‘मुकेश ने यह तो मेरे लिए गाया है।’’

‘‘तुम भी !’’ कह कर रीना हंसी और तकिए में मुंह धंसा लिया। थोड़ी देर बाद संजय उठा, बाथरूम गया, आ कर पानी पिया और आ कर रीना जो चादर ओढ़ कर पेट के बल लेटी हुई थी, चादर हटा कर उस की पीठ पर लंबा लेट गया।

‘‘तुम भी अजीब शै हो।’’ तकिए पर सिर मोड़ती हुई बोली, ‘‘कहां से ट्रेनिंग ली?’’

‘‘किस चीज की?’’

‘‘इसी चीज की।’’

‘‘किस चीज की।’’

‘‘अरे, यही।’’ वह फुसफुसाई।

‘‘क्या यही।’’ वह बुदबुदाया। वह समझ तो गया था। पर उस से स्पष्ट कहलवाना चाहता था।

‘‘क्या रजनीश आश्रम हो आए हो ?’’

‘‘नहीं तो।’’

‘‘फिर कहां से ट्रेनिंग ली ?’’

‘‘क्या इस की भी ट्रेनिंग ली जाती है ?’’ कहते हुए वह उस के बालों से खेलने लगा।

‘‘क्या पता ?’’

‘‘तुम ने ली है क्या ?’’ संजय फुसफुसाया।

‘‘ली तो नहीं थी, पर आजकल ले रही हूं।’’

‘‘किस से ?’’ उस ने छेड़ा।

‘‘है एक आदमी !’’

‘‘क्या मतलब ?’’

‘‘कोई और भी है इस समय तुम्हारी जिंदगी में ?’’ वह जैसे चौंका।

‘‘बस !’’ वह खुश होती हुई बोली, ‘‘इतने में ही रजनीश दर्शन धूल चाट गया ?’’

‘‘नहीं तो, नहीं तो !’’ संजय जैसे सफाई पर उतर गया। वह रीना की देह पर से भी उतर कर औंधा लेट गया।

‘‘सारा सेक्स दर्शन एक क्षण में भहरा गया ?’’ वह संजय को चिकोटती हुई बोली, ‘‘एक छोटा सा छेद नहीं बर्दाश्त कर पाया तुम्हारा सेक्स दर्शन। तिस पर कहते हो सम-भोग।’’ कहती हुई वह उस की पीठ पर लद गई। बोली, ‘‘तुम्हारा दोष नहीं, पुरुष मानसिकता का ‘‘प्रताप’’ है यह। जो औरत को एकाधिकार की वस्तु मानता रहता है। पुरुष जिस-तिस औरत के साथ सोए तो वह ‘‘सम-भोग’’ है। पर स्त्री जो कहीं गलती से भी किसी और के बारे में सोच ले तो, और न भी सोचे तो भी, वह ‘‘सम-भोग’’ नष्ट हो जाता है। ऐसा क्यों होता है ?’’ वह जैसे चिरौरी करती हुई बोली, ‘‘सच-सच बताना संजय। ठीक वैसा ही सच जैसा महाभारत में धृतराष्ट्र को संजय ने सच-सच बताया था। ठीक वैसा ही सच संजय ! वैसा ही सच !’’

संजय निरुत्तर था।

‘‘बोलो संजय !’’

‘‘ऐसा नहीं है।’’ वह कुछ रीना के सवाल के बोझ से, कुछ रीना की देह के बोझ से कसमसाता हुआ बोला, ‘‘ऐसा ही नहीं है।’’

‘‘ऐसा ही नहीं तो कैसा है ?’’

‘‘सच बताऊं।’’

‘‘बिलकुल सच !’’ वह बोली, ‘‘और तुम अब यह मत पूछना कि बुरा तो नहीं मानोगी। सच मानो मैं बुरा नहीं मानूंगी। बुरा मानने की बात भी नहीं है। यह तो जस्ट ए डिवेट !’’

‘‘तो सुनो।’’ संजय रीना को अपने ऊपर से हटाता हुआ बोला, ‘‘मेरे पास उस संजय सी दिव्य दृष्टि तो नहीं है पर एक सोच है, एक समझ है एक साधारण सी दृष्टि है उस के हिसाब से पुरुष मानसिकता एक सच है, सम-भोग दूसरा सच !’’ अब की उस ने न तो रीना के गाल में चिकोटी काटी, न छाती मसली, न जांघ में चिकोटी काटी बल्कि उस ने एक हाथ से उस की हिप पर थपथपाया दूसरे हाथ से उस के बालों को सहलाया और बोला, ‘‘पर सारा सच यह है कि पुरुष मानसिकता का सच एक हद के बाद छद्म है, छद्म सच है, शीशे में दिखने वाला सच है, शीशे के पार का सच नहीं है, शीशा टूटने के बाद का सच नहीं है।’’ संजय बोलता गया, ‘‘एक गढ़ा हुआ सच है पुरुष मानसिकता, जिस को आज कल सुविधा के तौर पर ह्यूमन बीइंग मान लिया गया है, बना लिया गया है। पर सम-भोग का सच पार ब्रह्म है, अलौकिक और अनूठा। पुरुष मानसिकता का सच शायद कोई ऐसा समय आए जिस में वह भस्म हो जाए। पर संभोग का सच तो अमिट है, अतुलनीय है, चाहे जितना समय आए-जाए, सृष्टियां बदल जाएं पर सम-भोग का सच नहीं बदलेगा, कभी नहीं बदलेगा।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘और सम-भोग कोई सिर्फ सेक्स ही नहीं है। सम-भोग बराबर का आनंद। चाहे वह जिस भी क्रिया में हो। सम-भोग का विस्तार बहुत है। पर एक सच यह भी है कि हमारे यहां सम-भोग को सिर्फ देह और उस के भोग से जोड़ कर उस का सतहीकरण कर लिया गया है। बस दिक्कत यही है। सतहीकरण की दिक्कत।’’

‘‘तो तुम सचमुच संभोग को उस के विराट अर्थ में मानते हो ?’’

‘‘आफकोर्स, !’’

‘‘सच !’’

‘‘फिलहाल तो यही सच है। आगे की राम जानें।’’

‘‘कि रजनीश जानें ?’’

‘‘नहीं, अभी जो मैं ने कहा वह रजनीश के किसी प्रवचन का अंश नहीं है। रजनीश से अनुप्रेरित बात हो सकती है। पर सोच समूची मेरी है।’’

‘‘अच्छा ऐसा सोचने के बावजूद तुम्हारे साथ ऐसा क्या है कि तुम मुझ से मिलते ही शुरू हो जाते हो। और शुरू ही रहते हो ?’’

‘‘क्या मतलब ?’’

‘‘तो अब पूरा भाष्य समझाना पड़ेगा तुम्हें ?’’ कहते हुए उस का हाथ शरारतन संजय की जांघों के बीच पहुंच गया तो संजय छिटक गया।

‘‘अच्छा, अच्छा।’’ कहते हुए संजय बोला, ‘‘मैं ने कहा न सेक्स ही जीवन है।’’ अब की संजय का हाथ रीना की जांघों के बीच पहुंच गया। जिसे रीना ने दोनों जांघों में हलके से दबा लिया और बोली, ‘‘सेक्स और पत्रकारिता, पत्रकारिता और सेक्स। इस के अलावा भी तुम्हें कुछ आता है ?’’

‘‘जिस को सेक्स की समझ हो, पत्रकारिता की समझ हो, समझो वह दुनिया जानता है।’’

‘‘कैसे ?’’

‘‘सेक्स दुनिया का सब से बड़ा सच है।’’ उस ने रीना की कमर पर हाथ फिराते हुए पूछा, ‘‘यह तो मानती हो ?’’

‘‘माना।’’ अभिनेत्री फा्रीदा जलाल की तरह गालों में गड्ढा डाल कर, आंखों में शरारत भर कर जबान पर कैंची रख कर वह फुदकती हुई बोली ‘‘माना।’’

‘‘तो जैसे सेक्स दुनिया का सब से बड़ा सच है वैसे ही पत्रकारिता दुनिया का सब से मासूम झूठ।’’ वह हंसा, ‘‘अब इस के बाद जानने को रह क्या जाता है ?’’ वह विस्तार में आ गया, ‘‘जैसे सेक्स के बिना सृष्टि नहीं संवरती, जैसे सेक्स के बिना जीवन नहीं चलता, सेक्स के बिना कोई घोटाला, कोई कांड नहीं होता वैसे ही दुनिया की कोई भी छोटी बड़ी घटना हो, घोटाला हो, सेक्स हो, खेल हो, व्यापार हो, फिल्म हो, रानजीति हो, कूटनीति और अपराध हो पत्रकारिता के ही कंधे पर बैठ कर देश दुनिया में उसे पहुंचना होता है।’’ संजय बिलकुल मजाक के मूड में था।

‘‘तुम तो खेलने लगे।’’ वह मायूस सी बोली।

‘‘झूठ, बिलकुल झूठ।’’ वह राजेश खन्ना स्टाइल में बोला, ‘‘अभी-अभी तो आऊट हुआ हूं। विश्वास न हो तो ‘इन से’ से पूछ लो।’’

‘‘क्या डबल मीनिंग वाले डायलाग बोलने लगते हो।’’ वह बोली, ‘‘मजा ख़राब हो जाता है।’’ वह जैसे नींद से जागी, ‘‘अच्छा सेक्स का सच बहुत हो गया अब पत्रकारिता के कुछ सच भी बता दो।’’

‘‘प्रश्न करो !’’ वह बिलकुल मजाक के मूड में था।

‘‘प्रश्न पुराना है गुरुदेव !’’ वह भी मूड में आ गई।

‘‘क्या ?’’

‘‘वही जिज्ञासा कि डेस्क और रिपोर्टिंग के लोग भारत-पाकिस्तान की तरह क्यों लड़ते हैं ?’’

‘‘क्या बेवकूफी का सवाल ले बैठी। वह भी बासी।’’

‘‘फिर भी जिज्ञासा तो जिज्ञासा !’’

‘‘अच्छा बताओ भारत-पाकिस्तान के बीच क्या झगड़ा है ?’’

‘‘मेरी समझ से तो कुछ नहीं। बस इगो का झगड़ा है ?’’

‘‘करेक्ट !’’ संजय बोला, ‘‘तुम ने ठीक पकड़ा।’’

‘‘क्या ?’’ वह चुटकी काटते हुए बोली, ‘‘फिर डबल मीनिंग ?’’

‘‘हद है !’’ संजय बोला , ‘‘मुझ पर आरोप लगाती हो और ख़ुद हरदम सेक्स ही सोचती रहती हो, वही करती रहती हो तो मैं क्या करूं ?’’ वह उस का हाथ पकड़ता हुआ बोला, ‘‘हटाओ नहीं, अच्छी आदत है। मुझे भी अच्छा लगता है।’’

‘‘स्टुपिड !’’ वह उस का बाल नोचते हुए बोली, ‘‘तो बार-बार प्वांइट आऊट करने की क्या जरूरत है।’’

‘‘मैं तुम्हारा भारत-पाकिस्तान के बीच इगो वाला प्वाइंट पकड़ने को प्वाइंट आउट कर रहा था।’’ उस के हाथों में से अपने बालों को छुड़ाता हुआ बोला, ‘‘एंड डोंट बी सिली, लेट मी कंपलीट ! इन फैक्ट डेस्क और रिपोर्टिंग क्या है ? अख़बार की दोनों दो भुजाएं हैं। पर जो इगो प्राब्लम भारत-पाकिस्तान के बीच, जो एक पट्टीदारी की लड़ाई है, मुझे ऐसा लगता है कि अख़बारों में डेस्क और रिपोर्टिंग के बीच भी जो झगड़ा है, वह यही इगो प्राब्लम है, यही पट्टीदारी है। एक कुंठा है जिस के तहत दोनों एक दूसरे से सुपीरियर मानते हैं और दिलचस्प यह कि दोनों एक दूसरे को गधा समझते हैं।’’ संजय रुका और बोला, ‘‘बाइ द वे चार महीने सही, तुम डेस्क पर थी कि रिपोर्टिंग में ?’’

‘‘बट नेचुरल डेस्क !’’

‘‘तब तो तुम ने यह भी देखा होगा कि अंततः इस लड़ाई में डेस्क ही जीतता रहता है।’’ वह बोलता रहा, ‘‘इस लिए नहीं कि डेस्क कोई सुप्रीमो होता है। बल्कि इस लिए कि बाई नेचर डेस्क पर जिम्मेदारियां ज्यादा होती हैं। पूरे अख़बार की जिम्मेदारी डेस्क की ही होती है। अख़बार ठीक छपा डेस्क की क्रेडिट, ख़राब छपा, कहीं कुछ गलत छपा तो डेस्क की रिस्पांसिबिलिटी। दूसरे कौन सी ख़बर कहां जाएगी, कितनी जाएगी यानी डमी, पूरा डिसप्ले डेस्क को ही तय करना होता है। यहां तक तो ठीक है। पर सिद्धांततः। व्यावहारिक पक्ष यह है कि अमूमन डेस्क अपनी रिस्पांसिबिलिटी की आड़ में रिपोर्टरों से पर्सनल हो जाती है। रिपोर्टर से कोई सिफारिश या काम कराने को कहा, रिपोर्टर ने नहीं किया, नहीं करवा पाया तो उस की ‘‘सेवा’’ शुरू। उस की ख़बरें कट पिट कर गलत जगह पेस्ट होने लगती हैं, या कोयरी लग कर संपादक की मेज पर पहुंच जाती हैं; बाद में भले छप जाए, पर उस दिन तो वह ख़बर रुक ही गई न ! रिपोर्टर की सब से बड़ी कमजोरी है बाई लाइन। मतलब कोई अच्छी ख़बर हो तो उस के साथ उस का नाम छपे। पर यहां भी डेस्क की मेहरबानी पर ही बाई लाइन मिलती है। इसी लिए तुम ने देखा होगा बड़ा से बड़ा रिपोर्टर जो बाहर फील्ड में तो बड़ा तोप बना फिरता है, तीसमार खां बनता है, डेस्क पर आते ही ख़ाली कारतूस बन जाता है, किसी पालतू कबूतर की तरह गुटर गूं करने लगता है। क्यों कि रिपोर्टर की कोर डेस्क से हमेशा दबी रहती है। एक प्राब्लम यह भी है कि ग्रेड, फेसेल्टी सब कुछ एक होते हुए भी डेस्क वाले जर्नलिस्ट और रिपोर्टिंग वाले जर्नलिस्ट की सामाजिक हैसियत में काफी फर्क रहता है। कभी-कभी आर्थिक भी। फील्ड में रहने के नाते रिपोर्टिंग के लोगों को दस लोग जानने लगते हैं, वह चार काम भी करा लेता है, कुछ तो दलाली पर भी उतर जाते हैं। उधर डेस्क के लोगों को कंपरेटिवली कम लोग जानते हैं। वह छोटा-छोटा काम कराने में भी असफल रहते हैं। तो फ्रष्स्ट्रेशन भी डेस्क वालों को खाए रहता है कि मेहनत हम करें और मजा यह लूटें। यह कुंठा भी कम नहीं होती।’’ संजय बोला, ‘‘पत्रकारिता की यह सब बड़ी पुरानी समस्याएं हैं। प्राचीनतम शब्द ज्यादा ठीक है। डेस्क अपने को सुपीरियर समझता है, रिपोर्टिंग वाले अपने को सुपीरियर समझते हैं। डेस्क वालों का तर्क है कि हम न हों तो अख़बार न निकले। वे जब-तब कहते ही रहते हैं कि लगा दो चार रिपोर्टरों को एक दिन डेस्क ड्यूटी पर, अख़बार निकल नहीं पाएगा। तो रिपोर्टिंग वाले कहते हैं, भिड़ा दो हफ्ते भर के लिए सारी डेस्क को रिपोर्टिंग में, छठी का दूध न याद आ जाए तो कहना, नौकरी छोड़ के भाग जाएंगे और जो पूरे देश की डेस्क लग गई रिपोर्टिंग में तो अख़बार ही नहीं निकल पाएंगे। क्यों कि डेस्क वाले कोई ख़बर ही नहीं भेज पाएंगे तो छपेगा क्या ?’’ संजय बोला, ‘‘ऐसे ढेर सारे तर्क, वितर्क और कुतर्क हैं जिन का कोई पार नहीं है। और यह लड़ाई न कभी ख़त्म हुई है, न कभी ख़त्म होगी। और यह कोई अकेले दिल्ली के किसी एक अख़बार, किसी एक भाषा की नहीं, सभी भाषाओं, सभी अख़बारों की देशव्यापी समस्या है।’’ वह बोला, ‘‘यह कभी ख़त्म न होने वाली लड़ाई है। डेस्क वाले रिपोर्टरों को और रिपोर्टस डेस्क वालों को गधा साबित करने का कोई मौका भले न चूकें। पर एक नंगा सच यह भी है एक रिपोर्टरों की कोर हमेशा डेस्क वालों के हाथ में रहेगी।’’ वह चद्दर ओढ़ता हुआ बोला, ‘अब मेरे ही अख़बार का मामला ले लो। जो समाचार संपादक है, महाजाहिल। अव्वल तो उसे ख़बर से कोई ख़ास सरोकार नहीं रहता। उस की सारी दिलचस्पी स्टोर से साबुन, फाइल, कागज वगैरह मंगाने में रहती है। न्यूज को आर्डिनेटर तो उसे न्यूज एडीटर स्टोर खुले आम कहता फिरता है। हफ्ते भर का एक ड्यूटी चार्ट बनाने में उसे चार दिन लग जाते हैं। जो बमुश्किल आधे घंटे का काम है। पर वही न्यूज एडीटर स्टोर कभी कभार रिपोर्टरों की ख़बर पास करने का काम पा जाता है तो पहला काम वह दांत किचकिचा कर रिपोर्टर का नाम यानी बाई लाइन काटने का करता है। नाम काट कर वह इस तरह खुश होता है जैसे कोई खुजली खुजा कर। फिर दूसरा काम वह यह करता है कि लाल पेन ले कर पूरी ख़बर रंग डालता है। रंगने के नाम पर भी करता यह है कि अगर कोई फिगर शब्दों में लिखा है तो उसे काट कर अंकों में लिखेगा, या फिर अंकों में लिखा है तो उसे काट कर शब्दों में कर देगा। पानी लिखा है तो उसे काट कर जल कर देगा। जल लिखा है तो उसे काट कर पानी कर देगा। पूरी ख़बर में वह ऐसा ही कुछ काट पीट मचाएगा और अंत में रिपोर्टर को बुलाएगा, उसे लाल रंगी उस की ख़बर दिखाएगा, सीना फुलाते हुए जताएगा कि उस की बाई लाइन काट दी गई है और फिर कहेगा, हेडिंग लगाइए। सजेस्टिव हेडिंग। हेडिंग लगाने तक में उसे पसीने आते हैं। पर जब कभी एकाध हेडिंग वह लगा लेगा, दूसरे दिन, दिन भर बैठा अपनी लगाई हेंडिंग को मंत्र मुग्ध निहारता रहेगा। जिस तिस को बताता रहेगा, मैं ने हेडिंग लगाई है। फोन कर-कर के लोगों को बताता रहेगा कि फला हेडिंग मैं ने लगाई है। अब उस उल्लू के पट्ठे से कौन बताए कि अगर अपनी लिखी हेडिंग छपी देख कर उसे इतनी खुशी होती है तो जिस ने वह ख़बर लिखी है, उस के साथ अगर उस का नाम भी छपे तो उसे कितनी खुशी होगी।’’

‘‘हां, मुझे भी अक्सर यही लगता था कि रिपोर्टरों को डेस्क वाले बिलकुल दरिद्रों की तरह ट्रीट करते थे।’’

‘‘रिपोर्टरों की भी गलती है। साले ज्यादा पढ़ते लिखते नहीं हैं। इसी लिए डेस्क वाले दौड़ाए रहते हैं।’’

‘‘तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे डेस्क वाले बड़ा लिखते-पढ़ते हैं। ?’’

‘‘अब काबुल में भी तो गधे होते हैं।’’ संजय बोला, ‘‘सच कहो तो जर्नलिस्टों में ज्श्यादातर गधे ही भर्ती हैं। पढ़े लिखे कम ही लोग हैं।’’

‘‘चलो तुम ने माना तो। नहीं, यही मैं कहती तो बुरा मान जाते तुम !’’

‘‘चलो बहुत घिसाई हो गई। अब सो लेने दो जरा देर।’’

‘‘तुम फिर डबल मीनिंग पर आ गए ?’’

‘‘क्या कह दिया भई ?’’

‘‘ये ‘‘घिसाई’’ क्या है ?’’

‘‘ओफ् मैं तो बात चीत के लिए घिसाई बोल रहा था।’’ वह हंसा, ‘‘पर तुम्हारा दोष नहीं है। रजनीश का वह संन्यासी और कपड़े वाला किस्सा पढ़ा है न तुम ने ?’’

‘‘हां, पढ़ा है। तो ?’’

‘‘तो यही कि ‘वस्त्र’ के बारे में कोई बातचीत नहीं। पर मैं क्या करूं जब तुम्हारे दिमाग में ‘वस्त्र’ ही घूम रहा है।’’ रीना को छेड़ते हुए संजय बोला, ‘‘वस्त्र जो ज्यादा घूम रहा हो तो बोलो वस्त्र उतार दूं ?’’

‘‘नहीं !’’ वह जोर दे कर बोली।

‘‘क्यों ?’’

‘‘तुम्हारी तरह कोई जानवर नहीं हूं। कि जब देखो तब वही।’’

‘‘तो देवी जी, फार योर काइंड इनफार्मेशन यह काम हरदम जानवर नहीं, आदमी ही करते रहते हैं जब-तब। जानवरों का तो कोई मौसम, कोई वक्त तय रहता है, प्रकृति की ओर से। यह जब-तब की छूट आदमियों को ही रहती है। अब कहिए तो ‘वस्त्र’ के बारे में बात चीत शुरू करूं ?’’

‘‘नहीं !’’ वह फिर जोर दे कर बोली और चादर को अपने चारों ओर कस कर लपेट लिया। बोली, ‘‘पता नहीं क्या करते हो, जलन हो रही है।’’

‘‘कहां ?’’ वह मजाक में बोला।

‘‘तुम्हारे मुंह में।’’ वह खीझ कर बोली।

‘‘डॉक्टर को तो नहीं दिखाना पड़ेगा ?’’

‘‘क्या पता ?’’ कह कर संजय की छाती से चिपटती हुई बोली, ‘‘क्यों तंग करते रहते हो ?’’

‘‘एक जोक सुनोगी ?’’

‘‘सुनाओ।’’ वह बोली, ‘‘पर घिसा पिटा न हो।’’

‘‘नहीं-नहीं, बिलकुल नया है। सेक्स और पत्रकारिता फील्ड का।’’

‘‘इंटरेस्टिंग।’’ वह बोली, ‘‘मींस नानवेज।’’ कह कर वह चहकी, ‘‘अलका से तुम्हारे कुछ नानवेज जोक सुन चुकी हूं।’’

‘‘अलका को तो कभी नानवेज जोक सुनाया नहीं, जरूर अजय के मार्फत....! बाई द वे अलका ने तुम्हें और क्या-क्या सुनाया है ?’’

‘‘बोर मत करो। बाद में अलका और अपने डिटेल ले लेना। अभी तो तुम वह ताजा जोक सुनाओ।’’

‘‘कौन सा ?’’

‘‘वही।’’

‘‘वही, मींस ?’’ उस ने भूलने का नाटक करना चाहा।

‘‘सेक्स और पत्रकारिता के फील्ड का।’’

‘‘अच्छा, अच्छा। बहुत मुख़्तसर सा है और तुम्हें मैं जानता हूं, बड़े में लुत्फ आता है।’’ वह उस की हिप में चिकोटी काटता हुआ बोला।

‘‘शैतानी नहीं। अच्छे बच्चों की तरह जोक सुनाओ।’’ वह उस का हाथ हटाती हुई बोली, ‘‘फटाफट।’’

‘‘तो सुनो।’’ एक हिंदी पत्रिका के नामी संपादक एक अंगरेजी अख़बार की नामी विशेष संवाददाता से संभोग के बाद बोले, ‘‘आज मेरी सेंचुरी पूरी हो गई।’’

‘‘मतलब ?’’

‘‘मतलब यह बालिके कि संपादक जी उन विशेष संवाददाता महोदया समेत सौ महिलाओं को भोगने का रिकार्ड बना गए थे।’’

‘‘इंटरेस्टिंग ! फिर तो यह सुन कर मोहतरमा नाराज हो गई होंगी।’’

‘‘इसी लिए कहा गया है कि जोक के बीच में नहीं बोलना चाहिए।’’

‘‘आल राइट !’’

‘‘तो जब संपादक जी ने बहुत विह्वल हो कर उन विशेष संवाददाता मोहतरमा को अपनी सेंचुरी बताई और बड़ी मासूमियत से पूछा, ‘‘तुम्हारा स्कोर क्या है ?’’ मोहरतमा ने ठंडी सांस छोड़ी। बोलीं, ‘‘कुछ याद नहीं।’’ संपादक जी की जिज्ञासा बलवती हुई, नहीं माने। पूछा, ‘‘फिर भी ?’’ मोहतरमा बोलीं, ‘‘जब सेंचुरी बनाई थी, तब से गिनना छोड़ दिया।’’

‘‘मजा आया ?’’ जोक सुना कर संजय ने रीना से पूछा।

‘‘बोर भी नहीं हुई। पर यह जोक है कि सच ?’’

‘‘लगता तो सच ही है।’’ वह बोला, ‘‘बुरा मत मानो तो तुम से एक बात पूछूं ?’’

‘‘अब क्या बाकी है जो बुरा मानूंगी ? पूछो।’’ वह एक झटके से बोली।

‘‘पूछूं ?’’

‘‘हां, पूछो।’’

‘‘सचमुच बुरा नहीं मानोगी ?’’

‘‘नहीं मानूंगी। कह तो दिया।’’

‘‘तो बताओगी, तुम्हारा स्कोर क्या है ?’’

‘‘तुम शैतानी से बाज नहीं आओगे ?’’ कहते हुए वह उस के ऊपर चढ़ गई।

‘‘मैं ने स्कोर पूछा था, बैटिंग करने को नहीं कहा था।’’

‘‘अभी बताती हूं स्कोर।’’ कह कर वह स्टार्ट हो गई।

‘‘पर अब की वह सिर्फ उधम मचा कर ही रह गई। संजय अभी उस की गुदाज देह का आनंद ले ही रहा था कि वह उचक कर बिस्तर से उतरी और खड़ी हो गई, माई गाड चार बज गए।’’ घड़ी देखती, गाऊन पहनती हुई बोली, ‘‘अब तुम जाने की तैयारी करो।’’

‘‘क्यों ?’’

‘‘पापा आज सुबह की फ्लाइट से आने वाले हैं।’’ वह घबराती हुई बोली, ‘‘अगर वह जान गए कि रात तुम यहीं रहे हो तो मुश्किल हो जाएगी।’’

‘‘क्यों, क्या खा जाएंगे ?’’

‘‘बहस नहीं, जल्दी से कपड़े पहनो और निकल लो।’’

‘‘हां, भई, रात गई-बात गई।’’

‘‘तुम हर बात को निगेटिव एप्रोच से ही क्यों देखते थे।’’ कहते हुए वह खूंटी से उस की टी शर्ट और कुर्सी पर से पैंट बिस्तर पर फेंकती हुई बोली, ‘‘बी क्विक।’’

‘‘अच्छा अगर सर्वेंटस ने बता दिया ?’’

‘‘उन्हें क्या मालूम कि तुम रात यहां रहे हो ?’’

‘‘क्यों रात आते समय देखा तो था।’’

‘‘ओफ, इस डिटेल्स में मत पड़ो। इट्स माई हेडेक। बट नाऊ यू प्लीज गो।’’

‘‘फिर कब मिलोगी ?’’ पैंट पहनते हुए उस ने पूछा।

‘‘आई विल कांटेक्ट यू।’’ वह बालों में क्लिप लगाती हुई बोली, ‘‘बट यू डोंट।’’

‘‘तुम्हारी यही अदा दुखी करती है।’’

‘‘इसी लिए शादी के लिए कहती हूं।’’

‘‘रह-रह कर तुम भी क्या रिकार्ड बजा देती हो।’’ वह उस की हिप पर हाथ मारते हुए बोला, ‘‘वो जो तुम्हें आज कल ट्रेनिंग दे रहा है, उस से क्यों नहीं कर लेती।’’

‘‘कौन सी ट्रेनिंग ? कौन दे रहा है ट्रेनिंग ?’’

‘‘तुम्हीं तो रात बता रही थी।’’

‘‘क्या ?’’

‘‘क्या कई चीजों की ट्रेनिंग ले रही हो आज कल ?’’

‘‘ओह !’’ वह फिर फरीदा जलाल की तरह शरारती हंसी हंसी। बोली, ‘‘तो तुम्हारी भी यही राय है !’’

‘‘हां, कर लो।’’ वह पैरों में जूते की जिप बंद करते हुए बोला।

‘‘तो पक्का रहा।’’ कहती हुई वह बोली, ‘‘पापा से बात करूं ?’’ वह खुश हो गई थी।

‘‘शादी का कार्ड हमें भी भेजना।’’

‘‘पर क्यों ?’’

‘‘अच्छा तो शादी में बुलाओगी भी नहीं ?’’ वह कंधे उचकाता हुआ बोला, ‘‘होता है, होता है !’’

‘‘बुलाऊंगी तो पर कार्ड दे कर नहीं।’’ वह उछल कर उस के गले से लटक कर झूल गई, ‘‘क्यों कि वो ट्रेनिंग मास्टर तुम ही हो।’’

‘‘क्यों फिल्मी स्टाइल का सतही सस्पेंस क्रिएट करती रहती हो ?’’ वह उसे बिस्तर पर पकड़ कर बैठाता हुआ बोला,‘‘ आखि़र क्या है ऐसा जो तुम मुझ पर इतना मेहरबान होना चाहती हो ?’’

‘‘तुम्हारा खुलापन। तुम्हारी साफगोई।’’ वह बोली, ‘‘तुम और मर्दों की तरह घाघ नहीं हो। बिस्तर पर भी औरत की चापलूसी नहीं करते हो। स्वाभिमानी हो।’’

‘‘बस, पढ़ चुकी कसीदा !’’ वह उठा और बोला, ‘‘अब चलूं ?’’

‘‘अभी चले जाना।’’ कहती हुई उसे पास की बेंत वाली कुर्सी पर बिठा कर खुद उस की गोद में बैठती हुई बोली, ‘‘तुम्हारी तरह मुझ में वो एक्सप्रेशन पावर नहीं है। जिस से ठीक-ठीक शब्दों में अपनी बात कह सकूं।’’ वह संजय के बालों में उंगलियां उलझाती हुई बोली, ‘‘बस कुछ ऐसा है तुम में। नहीं, मेरे इर्द गिर्द घूमने वालों की कमी नहीं है। पर मैं किसी को लिफ्ट नहीं देती हूं।’’

‘‘ऐसा !’’ वह लापरवाही से बोला।

‘‘ऐसा !’’ वह भी उसी लापरवाही से बोली, ‘‘रही बात पोलिटिसियंस से तुम्हारी एलर्जी की तो तुम्हें मालूम है नैय्यर जैसे लोग भी राजनीति को गाली राजनीति की बैसाखी पर ही खड़े हो कर देते हैं ?’’ वह टेंस होती हुई बोली, ‘‘यू नो नैय्यर की तरक्की का राज क्या है ?’’

‘‘क्या है ?’’

‘‘उन के ससुर।’’ वह जैसे राज खोलती हुई बोली, ‘‘जो पंजाब गवर्मेंट में मिनिस्टर रहे हैं।’’ वह जैसे संजय को टेंस कर देना चाहती थी, ‘‘जिस देश में आदमी की पहली लड़ाई भी रोटी दाल हो और आखि़री लड़ाई भी रोटी दाल। वहां का आदमी कैरियर क्या ख़ाक बनाएगा ? वह भी पत्रकारिता में, बनियों की चाकरी कर के ?’’

‘‘ख़़ूब ! मेरा डायलाग, मुझी को सुना रही हो ?’’

‘‘कोई कॉपीराइट है इस डायलाग पर तुम्हारा ? यह तो एक नंगी सच्चाई है, जिसे कोई भी बयान कर सकता है।’’

‘‘नंगी सच्चाई जानना चाहती हो ?’’

‘‘हां।’’

‘‘सचमुच ?’’

‘‘बिलकुल।’’

‘‘तो नंगी सच्चाई यह है कि अपने देश में कोई एक भी पत्रकार नहीं है।’’ वह बोला, ‘‘मैं तो कहता हूं कि कोई एक पत्रकार तुम्हें मिले तो मुझे भी बताना !’’

‘‘क्या ?’’ वह जैसे चौंक पड़ी।

‘‘हां। क्यों कि पत्रकारिता के नाम पर अब सिर्फ दो प्रजातियां मुझे दिखती हैं। एक पूंजीपतियों के चाकरों की जिन में हमारे जैसे लोग शुमार होते हैं।’’

‘‘और दूसरी ?’’

‘‘दूसरी प्रजाति है भड़वों और दलालों की। बस ! जो पूंजीपतियों से लगायत राजनीतिज्ञों और अफसरों के आगे दुम हिलाते, तलवे चाटते फिरते हैं।’’ वह तमतमाता हुआ बोला, ‘‘और ये राजनीतिज्ञ, ये अफसर इन्हें कुत्तों से ज्यादा अहमियत नहीं देते।’’ वह बोलता रहा, ‘‘ज्यादा से ज्यादा कोई अल्सीसियन ब्रांड का कुत्ता होता है तो कोई गली वाला ! बस ब्रीड का फर्क होता है।’’ वह बोला, ‘‘किसी ‘कुत्ते’ के आगे वह पुचकार कर सुविधाओं की हड्डी फेंक देते हैं तो किसी के आगे हिकारत से। पर यह तय है कि इन राजनीतिज्ञों, अफसरों के आगे इन सो काल्ड पत्रकारों की हैसियत एक कुत्ते से ज्यादा की नहीं है।’’ उस ने फिर से जोड़ा जैसे हथौड़ा मार कर कील को पूरी तरह ठोंक देना चाहता हो, ‘‘क्या नेता, क्या अभिनेता सब पत्रकारों को कुत्ता ही समझते हैं। कुत्ते से ज्यादा कुछ नहीं। वह अपनी सुविधा और जरूरत के ही मुताबिक ‘पत्रकार’ को कोई ख़बर या सुविधा देते हैं।’’

‘‘बड़ी तल्ख़ी है तुम में अपने पेशे को ले कर !’’ वह ऊबती हुई बोली।

‘‘पेशा है न क्या करें ?’’ उस ने ‘पेशा’’ शब्द पर ज्यादा जोर दिया और बोला, ‘‘अभिशप्त हैं अश्वत्थामा की तरह इस पेशे को झेलने के लिए क्या करें ?’’ वह बोला, ‘‘नहीं तुम भी जानती हो कि पढ़ने-लिखने वालों के इस पेशे में पढ़ने-लिखने वालों की कितनी कदर है और दलालों भड़ओं की कितनी ?’’ उस ने जोड़ा ‘‘अख़बार मालिकों को भी अब एडीटर या रिपोर्टर नहीं पी॰ आर॰ ओ॰ चाहिए होता है। नाम भर एडीटर, रिपोर्टर का होता है !’’

‘‘हां, डिवैल्यूवेशन तो हुआ है !’’ वह बोली।

‘‘मैं नहीं कह रहा कि यह अवमूल्यन सिर्फ पत्राकारिता में हुआ है। हो तो हर हलके में रहा है। पर जितना यहां हुआ है इतना कहीं और नहीं !’’

‘‘ये तो है !’’

‘‘अब क्या करोगी यह इस देश का दुर्भाग्य ही है कि कोई सांसद संसद में अपनी परफार्मेंस के बूते वोट नहीं पाता। वोट पाता है तो जोड़-तोड़ से गुण-दोष से नहीं। कोई बहुत काबिल मंत्राी है और कहे कि मैं ने देश के लिए यह-यह और ऐसी-ऐसी योजनाएं बनाईं, यह-यह किया तो मुझे वोट दो ! तो कोई वोट नहीं देगा उसे। क्यों कि वोट तो अब हिंदू, मुसलमान, पिछड़ों और दलितों के खाने में बंट गया है !’’ वह कहने लगा, ‘‘तो देश में सही मायने में कोई एक नेता नहीं है !’’ वह बोला, ‘‘नेता ही क्यों मैं तो कहता हूं देश में कोई एक जज नहीं है, कोई एक वकील नहीं है ! कोई एक डॉक्टर, कोई एक शिक्षक नहीं है ! तो अगर देश में कोई एक पत्रकार नहीं है तो हम क्या कर सकते हैं ! क्यों कि सब कुछ तो गुण-दोष के बजाय जोड़-तोड़ में फिट हो गया है।’’

‘‘तो क्या अब तुम सब को सुधार लोगे ?’’ वह बोली, ‘‘नहीं न !’’

‘‘बिलकुल नहीं।’’ वह बोला, ‘‘और बंद कमरे में इस एकालाप से तो कतई नहीं।’’

‘‘चलो यह सब किसी सेमिनार के लिए संभाल कर रखो। काम आएगा !’’

‘‘तुम्हारी ऊब को मैं समझ सकता हूं। पर यह सारी चीजें अब सेमिनारों से तय नहीं होने वाली, न नपुंसक अख़बारों से।’’ वह बोला, ‘‘इस के लिए तो सिस्टम को ही तोड़ना होगा !’’

‘‘तो तोड़ो !’’

‘‘पर दिक्कत यह है कि सिस्टम टूटता दिखाई नहीं देता और मेरे जैसे इक्का दुक्का सिस्टम तोड़ने जो चलते भी हैं तो सिस्टम उन्हें तोड़ देता है। मान लिया गया है कि सिस्टम नहीं, सिस्टम तोड़ने वाला व्यक्ति ही टूटेगा !’’

‘‘यह तो है। पर कुछ क्रांति आगे की मुलाकातों के लिए छोड़ो।’’ कह कर वह मुसकुराई।

‘‘ओ॰ के॰ !’’ वह उसे गोद से उठाता हुआ बोला, ‘‘अब चलूं ? नहीं, तुम्हारे पापा आ जाएंगे।’’ कह कर वह खड़ा हुआ तो वह उसे पीछे से पकड़ कर लिपट गई। उस की बड़ी-बड़ी छातियां जैसे उस की पीठ को कुचल देना चाहती थीं। थोड़ी देर वह दोनों ऐसे खड़े रहे। फिर संजय ने उस का हाथ छुड़ाया, उसे आगे किया और पीछे से खुद लिपट कर खड़ा हो गया। जांघों, से उस के भारी हो रहे नितंबों को रगड़ते हुए, पीछे से ही उसे चूमते हुए बोला, ‘‘अच्छी सी रात साथ गुजारने के लिए शुक्रिया।’’ कह कर जब वह कमरे के दरवाजे पर आ गया तो रीना दौड़ कर फिर चिपट गई और उसे बेतहाशा चूमने लगी। संजय भी उसे चूमने लगा। इस चूमा चाटी में उस का फैंसी झुमका संजय की नाकों में खरोंच लगा गया। संजय खीझ गया, ‘‘कितनी बार कहा यह सब मत पहना करो।’’ वह झल्लाता हुआ बोला, ‘‘मेरे जाने के बाद भी पहन सकती हो।’’ तब तक वह ड्रेसिंग टेबिल से कोई क्रीम ट्यूब निकाल कर उस की नाक पर मलने लगी। क्रीम मल कर वह सेंट स्प्रे करने लगी। बोली, ‘‘तुम्हारी सिगरेट और पसीने की गंध मेरी देह में जैसे चिपक गई हैं।’’ वह सेंट उस पर भी स्प्रे करती हुई बोली, ‘‘कितनी बार कहा है मेरे पास आया करो तो सिगरेट सुलगा कर नहीं, बुझा कर आया करो।’’

‘‘अब चलूं ?’’ वह दरवाजा खोलते हुए बोला, ‘‘तुम्हारे कुत्ते तो बंधे होंगे ?’’

‘‘रुको, एक मिनट मैं चेक कर लेती हूं।’’

‘‘हां, नहीं कहीं साले दौड़ा लें तो सुबह-सुबह मुसीबत !’’

संजय पैर नीचे कर बिस्तर पर लेट गया। जरा देर बाद वह गाउन की बेल्ट बांधती हुई आई। बोली, ‘‘खुले थे, पर मैं ने बांध दिया है। पर तुम दबे पांव जाना माली जाग गया है।’’ फिर जब संजय चलने लगा तो बोला, ‘‘जरा झुमके और बालों की चिमटियां निकालो।’’

‘‘क्यों ?’’

‘‘निकालो तो सही।’’ उस के झुमके निकालते ही वह उसे आहिस्ता-आहिस्ता चूमने लगा। रीना ने भी उस का माथा धीरे से चूम लिया। संजय चल ही रहा था कि वह बुदबुदाई, ‘‘मेरे प्रपोजल पर मन करे तो एक बार फिर गौर करना।’’

‘‘ठीक है सोचूंगा। पर तुम एक बात अच्छी तरह नोट कर लो।’’ वह जरा सख्ती से बोला।

‘‘क्या ?’’

‘‘मैं नैय्यर नहीं हूं।’’ वह पूरी सख़्ती से बोला, और बाहर आ गया।

बहुत दिनों बाद वह ऐसी सुबह देख रहा था। पौ फटती सुबह। रीना के देह की मादक गंध, उस के सेंट की गमक, सड़क के दोनों ओर के बंगलों में लगे फूलों की दिल को बहका देने वाली सुगंध भी तिर रही थी इस सुबह में। सड़क पर आ कर संजय ने सिगरेट सुलगा ली थी।
पंडारा रोड पर।

तब वह दिल्ली में जंगपुरा एक्सटेंशन में रहता था। घर पहुंच कर संजय ने रगड़-रगड़ कर नहाया। पर रीना की देह गंध जैसे उस के अंग-अंग में समा गई थी, निकल ही नहीं रही थी।

‘‘रात भर कहां थे ?’’ होंठ गोल करते हुए उस के ऊपर रहने वाले श्रीवास्तव ने पूछा। श्रीवास्तव भी एक न्यूज एजेंसी में रिपोर्टर था। यह कमरा उसी ने संजय को दिलवाया था। श्रीवास्तव भी अजीब चीज था। एक से एक बेढब काम करता रहता। जैसे बिना रेजर के, बिना शेविंग क्रीम के हाथ में ब्लेड ले कर शेव बना डालता। जाने कैसे? गंजे सिर वाले श्रीवास्तव का नाम बहुत कम लोग लेते थे। सब उसे ‘‘लाला, लाला’’ बोलते। तो संजय लाला का सवाल पीते हुए बोला, ‘‘लाला, आज जरा मेरे दफ्तर फोन कर देना। कह देना तबीयत ठीक नहीं है, आज नहीं आऊंगा।’’ कहते हुए संजय सोने के लिए बिस्तर की चादर ठीक करने लगा।

‘‘पर रात थे कहां ?’’ लाला का सवाल उस के होंठों से अभी छूटा नहीं था।

‘‘बस ! वैसे ही रतजगा हो गया।’’

‘‘पर थे कहां ?’’ जैसे वह किसी रहस्य का पर्दाफाश कर देना चाहता था।

‘‘कुछ नहीं, माडल टाऊन वाले अंचल के यहां रह गया था।’’ वह झूठ को सच बनाते हुए बोला, ‘‘गपियाते-गपियाते रात ज्यादा हो गई तो उस ने कहा यहीं सो जाओ। सुबह चले जाना।’’

‘‘कौन अंचल ? वही दिल्ली प्रेस वाला ?’’

‘‘हां।’’

‘‘पर रात को तो वह तुम से मिलने यहीं आया था।’’ लाला उस पर रौब मारते हुए बोला।

‘‘हां, बता रहा था कि तुम ने कोई थर्ड क्लास रम भी पिला दी थी।’’ संजय यूं ही अंधेरे में तीर मारता हुआ बोला। पर निशाना ठीक लग गया था।

‘‘ओल्ड मंक भी अगर घटिया रम है तो बात ही ख़त्म !’’ कहता हुआ लाला मायूस सा कमरे से बाहर जाने लगा, ‘‘मैं ने तो तुम्हारे लिए बड़ा इंतजार किया। तुम्हारी भाभी ने चिकन भी बनाया था।’’

‘‘अच्छा !’’ संजय लाला का एहसान मानते हुए बोला, ‘‘कोई बात नहीं, मेरे हिस्से की बची तो होगी, इस समय खा लूंगा।’’

‘‘ख़ाक बचेगी !’’ लाला झल्लाया, ‘‘वो साला अंचल बचने देता तब न ! आधी बोतल ओल्ड मंक भी घसीट गया और चिकन की लेग पीसें भी।’’ वह हाथ नचाता हुआ बोला, ‘‘फिर भी घटिया रम बताया साले ने।’’

‘‘अरे नहीं, नहीं। वह तो बड़ी तारीफ कर रहा था।’’ संजय ने बात मोड़ते हुए कहा, ‘‘वो तो मैं ही जरा तुम्हें छेड़ने के लिए झूठ बोल गया।’’

‘‘तो रात कहां थे ?’’ लाला ने जैसे म्यान से तलवार निकाल ली।

‘‘अंचल के घर। और कहां ?’’ संजय फिर भी अडिग रहा। लाला जब मायूस जाने लगा तो संजय उसे बुलाते हुए बोला, ‘‘लाला, फोन जरूर कर देना। और, हां, एक इनायत और कर देना !’’

‘‘क्या ?’’

‘‘भाभी से कह देना, दिन का मेरा खाना भी बना देंगी। अब होटल जाने में आलस लग रही है।’’

‘‘ठीक है।’’ लाला उसी मायूसी से बोला। और दरवाजा बंद करता हुआ चला गया।

दूसरे दिन संजय जब आफिस पहुंचा तो रिसेप्शनिस्ट ने बताया रीना कल दो बार आई थी। संजय ने सोचा कि रीना को फोन करे। पर उस का काशन ‘‘यू डोंट’’ याद आ गया। दफ्तर में एडीटर वैसे ही भन्नाया पड़ा था।

दो हफ्ते बीत गए। रीना का कहीं पता नहीं था। एक शाम उस का फोन आया। हाल चाल पूछा तो बोली, ‘‘बाहर गई थी।’’ फिर, ‘‘दो दिन बाद भेंट होगी।’’ कह कर उस ने फोन रख दिया। एक दिन बाद उस का फोन आया, ‘‘कल का दिन मेरे लिए खा़ली रखना।’’

‘‘मिलोगी कहां ?’’

‘‘मैं फोन कर के बताऊंगी। और हां, फार गाड शेक कल सिगरेट मत पीना।’’ कह कर उस ने फोन रख दिया।

दूसरे रोज उस का फोन आया, ‘‘ओबेराय होटल आ जाओ। तुरंत।’’

‘‘ओबेराय में कहां ?’’

‘‘लॉबी में। और कहां।’’ वह बोली, ‘‘और हां, अगर लॉबी में न मिलूं तो हेयर ड्रेसर के पास आ जाना।’’

‘‘हेयर ड्रेसर ?’’

‘‘भूल गए ?’’ वह चहकी, ‘‘वही जिस का तुम ने इंटरव्यू लिया था।’’

‘‘अच्छा-अच्छा हबीब।’’

‘‘हां। वही।’’ और ‘‘ओ॰ के॰’’ कह कर उस ने फोन रख दिया।

हबीब ! जो कहता था कि राह चलते भी अगर औरतों के बालों की स्टाइल उसे बेढंगी दिखती है तो उस का मन करता है उसे वह वहीं ठीक कर दे। वह कहता अगर कुदरत ने ख़ूबसूरत घने और लंबे बाल दिए हैं तो उस के प्रति लापरवाही माफ नहीं की जा सकती। रीना को इंटरव्यू में छपी हबीब की बात क्लिक कर गई। और वह ओबेराय होटल में हबीब की शाप पर पहुंच गई। बन गई उस की परमानेंट क्लाइंट। रीना के बाल थे भी घने, ख़ूबसूरत और लंबे। जब वह कभी कभार जींस-टी शर्ट पहन कर निकलती तब जरूर उस के लंबे बाल उस का मजाक उड़ाते। एक बार संजय ने कहा भी कि, ‘‘थोड़े छोटे करवा लो।’’ तो वह बिदक गई, ‘‘क्यों ?’’

‘‘तो जींस-टी शर्ट मत पहना करो।’’

‘‘क्यों ?’’

‘‘क्यों क्या, पूरी कार्टून लगती हो।’’ संजय मुंह बिगाड़ते हुए बोला, ‘‘लंबी-लंबी काया, लंबे लंबे केश, तिस पर जींस-टी शर्ट और....।’’

‘‘और ?’’

‘‘कुछ नहीं बुरा मान जाओगी।’’ पर वह बुरा मान गई थी।

‘‘आज कह दिया, फिर कभी नहीं कहना।’’

‘‘क्या ?’’

‘‘बाल कटवाने को।’’ वह रुआंसी हो गई थी।

‘‘क्यों, क्या बात हुई ?’’

‘‘मेरी मां को मेरे बाल बहुत पसंद थे।’’ वह भावुक हो गई थी, ‘‘मां ने कहा था कि कभी कटवाना नहीं।’’

‘‘वेरी सॉरी !’’ संजय ने रीना को इतना भावुक पहले कभी नहीं देखा था। रीना मां-बाप की इकलौती थी। चार साल पहले उस की मां कैंसर से मर गई थी। तब से वह जब कभी भी मां की चरचा करती तो रो पड़ती।

रीना के घने, लंबे बाल संजय को भी अच्छे लगते। ख़ास कर जब वह शैंपू कर के बाल खोले मिलती तो गजब का कहर ढाती। बड़े-बड़े काले-काले बालों और कजरारे नयनों के बीच उस के गोरे-गोरे गाल ऐसे लगते जैसे कोई सी-बिच। संजय सोचता क्या वह फिर से कविताएं लिखना शुरू कर दे ?

आज ओबेराय होटल की लॉबी में चिकन की कलफ लगी बादामी साड़ी में बाल खोले रीना मिली तो संजय को वह बिलकुल किसी अप्सरा-सी लगी। लपक कर वह उस का हाथ थाम लेना चाहता था। उस के लहराते खुले बालों को प्यार कर लेना चाहता था। पर उस की कजरारी नशीली आंखों के जादू भरे संकेत ने उसे रोक दिया।

‘‘यहां कैसे ?’’ संजय ने पूछा।

‘‘आते ही डिटेल्स लेने शुरू कर दिए ?’’ वह अपनी आंखों में जैसे ढेर सारा नशा उडेलती हुई बोली, ‘‘रिपोर्टिंग के लिए नहीं बुलाया यहां तुम्हें।’’ वह पल्लू संभालती हुई बोली, ‘‘आओ पहले कुछ खा पी लेते हैं।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘तुम बड़ा भुखाए दिखते हो।’’

‘‘हां, पर तुम्हारी भूख भी नहीं देखी जा रही।’’

‘‘डबल मीनिंग डायलाग से मुझे कोफ्त होती है ! यू नो ?’’ कहती हुई वह चलने लगी।

‘‘देखो मैं चला जाऊंगा।’’ संजय तैश में आता हुआ बोला, ‘‘बार-बार इस तरह ह्यूमिलिएट मत किया करो।’’

रीना कुछ बोली नहीं और हाथ जोड़ कर खड़ी हो गई।

‘‘चलो।’’ संजय पसीजते हुए बोला।

खाने के दौरान दोनों चुप रहे। यंत्रवत कमरे में आए। कमरे में भी देर तक दोनों चुप बैठे रहे। यह पहली बार हो रहा था कि दोनों कमरे में अकेले थे और अलग-अलग, चुप-चुप बैठे थे। रीना के खुले-खुले बाल, उस का रूठा-रूठा चेहरा, संजय को ऊब हो रही थी। आखि़रकार संजय उठा, रीना के पास गया और खड़े-खड़े ही उस ने रीना के बालों से खेलना शुरू किया। पर रीना कुछ नहीं बोली। उसे चूमा वह फिर भी कुछ नहीं बोली। उस ने उस के ब्लाऊज में हाथ डाल दिया वह फिर भी चुप रही। धीरे-धीरे संजय ने उस की साड़ी उतार दी, ब्लाउज उतार दिया, पेटीकोट पर उस ने हलका सा प्रतिरोध जताया। पर जब ब्रा और पेंटी पर उस ने हाथ लगाना चाहा तो उस ने दोनों हाथों से उस का हाथ पकड़ लिया। हालां कि संजय अब बेसब्र हो रहा था, पर रीना पूरी की पूरी उदासीन थी। संजय ने उसे उठा कर खड़ा कर दिया। कमरे में लगे आइने में वह अपनी देह घूरने लगी। उस का भरा-भरा बदन देख कर संजय जैसे बउरा गया। पर रीना ने कोई रिस्पांस नहीं दिया। संजय ‘‘रूपदंभा बड़ी कृपण हो तुम, अल्पव्यसना कसे वसन हो तुम’’ जैसी कविताएं भी पढ़ गया पर वह निश्चेष्ट खड़ी-खड़ी अपने आप को देखती रही। संजय उसे सिर से पांव तक अनवरत चूमता रहा, उसे बाहों में भरता रहा पर रीना तो जैसे बुत बनी खड़ी रही तो खड़ी रही। संजय ने आहिस्ता से उस के बांलों को कंधों पर से हटाया और गोद में उठाते हुए बिस्तर पर लिटा दिया। उस की बांहों को सहलाते हुए, ‘‘ये तुम्हारी कोपलों सी नर्म बांहें और मेरे गुलमुहर से दिन’’ वाला गीत पढ़ा तो रीना के होंठ हलके से मुसकुरा कर रह गए। क्षण भर ख़ातिर। पर वह बोली फिर भी नहीं। ‘‘इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं’’ और ‘‘गुलमुहर गर तुम्हारा नाम होता, मौसमे गुल को हंसाना भी हमारा काम होता’’ जैसे फिल्मी गीत भी उस की देह को सहलाता हुआ संजय सुना गया। पर रीना के मन में, रीना की देह में कहीं कोई स्पंदन नहीं हुआ। ‘‘मैं ने तुम्हें छुआ, और कुछ नहीं हुआ’’ कहने पर भी वह जब कुछ नहीं बोली, बर्फ की तरह ठंडी पड़ी रही तो संजय का धैर्य टूट गया। उस के भीतर का जानवर जैसे जाग गया। उस ने लगभग जबरिया रीना की पैंटी उतारी, उस की देह से ब्रा नोची उस की टांगें उठाई और हांफने लगा। रीना जैसा कि हमेशा करती थी उसे दबोच लेती थी, उस की पीठ दोनों बांहों से जकड़ लेती थी, सिर के बाल एक ख़ास स्टाइल में सहलाने लगती थी, ऐसा कुछ भी नहीं किया उस ने। हां, पर उस ने विरोध भी नहीं किया। अलबत्ता जब वह हांफता-हांफता उस की देह पर बेसुध होकर ढीला पड़ गया तो वह उसे अपनी देह पर से सरकाते हुए चिपट गई। चिपट कर सुबकने लगी। पर संजय कुछ नहीं बोला। थोड़ी देर बाद जैसे वह होश में आई तो उठ कर लिहाफ ओढ़ कर संजय से चिपट गई। पर अब बारी संजय के उदासीन रहने की थी। थोड़ी देर बाद रीना फुसफुसा रही थी, ‘‘संजय प्लीज, संजय प्लीज।’’ पर संजय लाख कोशिश के बावजूद उत्तेजित नहीं हो पा रहा था। उस का मन उचट गया था। और जब रीना ने उसे बहुत परेशान कर दिया तो वह उसे उलटा कर उस की पीठ पर लेट गया। वह फिर भी कसमसाती रही। रीना की पीठ पर लेटे-लेटे वह ऊब ही रहा था कि रीना की हिप कुछ अजीब ढंग से उछलने लगी। संजय सहसा उत्तेजित हो गया। फिर तो जैसे अनायास रीना की हिप और उठती गई और संजय बेकाबू हो कर उस पर सवार हो गया। संजय के लिए इस तरह का यह पहला अनुभव था। संजय जब थक कर बिस्तर पर गिरा तो रीना उसे चूमते हुए बोली, ‘‘फैंटास्टिक !’’

संजय ने देखा बिस्तर की चद्दर, गद्दा तकिया सब कुछ अस्त व्यस्त हो गया था। पर उस ने नोट किया रीना सहज हो गई थी।

अब वह बोलने लगी थी।

‘‘होटल का कमरा लेने की क्या जरूरत थी ?’’ संजय ने पूछा।

‘‘मैं ने नहीं लिया।’’

‘‘तो ?’’

‘‘मेरे पापा के दोस्त राजस्थान में मिनिस्टर हैं। उन की फेमिली आई है।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘वही लोग यहां ठहरे हुए हैं। मैं जानती थी वह लोग घूमने जाएंगे। साथ मुझे भी जाना था। मैं ने प्रोग्राम तो बनाया पर ऐन वक्त पर दिमाग काम कर गया। मैं ने कल ही तुम से यहां मिलने का प्रोग्राम बना डाला। और जब सुबह आज वह लोग घूमने जाने लगे। मैं ने अचानक तबीयत ख़राब होने का बहाना बनाया। रुक गई। और तुम्हें बुला लिया।’’ कहते-कहते जैसे उस ने बात पूरी की, ‘‘एनीथिंग एल्स ?’’

ऐसे ही इस या उस बहाने रीना मिलती रही संजय से। बीच-बीच में वह अपनी शादी का जिक्र करती। बताती कि लड़के वाले देखने आ रहे हैं। कभी बताती कि लड़के वालों ने हां कर दी है। एक बार उस ने यह सूचना भी दी कि उस की शादी तय हो गई है। और जैसे अल्टीमेटम देती हुई बोली, ‘‘अभी कोई बात नहीं बिगड़ी है। तुम हां, कर दो तो मैं मना कर दूंगी।’’ वह यह और ऐसे कई किस्म के दबाव बनाती रहती। पर संजय हर बार या तो चुपचाप उस की ऐसी सूचनाएं पी जाता या फिर, ‘‘क्या फायदा ?’’ जैसे संक्षिप्त संवाद बोल कर बात टाल जाता। ऐसे ही एक बार वह बिलकुल चरम क्षणों में बुदबुदाई, ‘‘देख रही हूं तुम्हारे नसीब में मेरे लिए आह भरना ही लिखा है।’’

‘‘वो तो है।’’ संजय लापरवाही से बोला।

‘‘तो क्या तुम ने मेरे बच्चों का मामा बनने का फैसला कर लिया है ?’’ वह जैसे संजय को बिच्छू की तरह डंक मारती हुई बोली, ‘‘मामा बनना ही चाहते हो तो मैं क्या कर सकती हूं।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘पर मुझे अच्छा नहीं लगेगा।’’

‘‘क्या बेवकूफी की बातें करती हो ?’’ कहते हुए संजय ने बात टाल दी। पर इस वाकये के बाद वह रीना के बारे में गंभीरता से सोचने लगा।

शिद्दत से।

उन्हीं दिनों रमेश शर्मा की फिल्म ‘‘न्यू डेलही टाइम्स’’ की शूटिंग दिल्ली में हो रही थी। संजय ने उस शूटिंग पर सर्रे की शूटिंग रिपोर्ट लिखने के बजाय एक दिलचस्प रिपोर्ताज लिखा। साथ में फिल्म के हीरो शशी कपूर से एक बेलौस इंटरव्यू भी। इस इंटरव्यू में शशी कपूर ने बड़ी मासूमियत से उस बात का भी जिक्र किया था कि जब वह छोटे थे तो कैसे अपने पापा जी यानी पृथ्वी राज कपूर की एक हिरोइन को दिल दे बैठे थे। और संयोग देखिए कि शशी कपूर का एक बेटा भी छुटपन में ही उन की एक हिरोइन से प्यार कर बैठा था। इस पूरे प्रसंग को जिस मन से, जिस मासूमियत और मुहब्बत से शशी कपूर ने बयान किया था, लगभग उसी मन और पन से संजय ने लिखा भी था। इंटरव्यू में शशी कपूर की फिल्मों पर, उन की जिंदगी पर भी विस्तार से चरचा थी। उन्हों ने बताया था कि अपनी लगातार फ्लाप फिल्मों से वह एक समय बहुत परेशान हो गए थे। उन्हीं परेशानी के क्षणों में वह एक बार एस॰ डी॰ बर्मन से मिले। बर्मन दा ने उन्हें दिलासा दिलाया और कहा कि घबराओ नहीं हम कुछ करेंगे। और उन्हों ने किया। शर्मीली में बर्मन दा ने जो संगीत दिया उस ने शशी कपूर के गिरते कैरियर को थाम लिया। ‘‘खिलते हैं गुल यहां, खिल के बिखरने को, मिलते हैं दिल यहां’’ गीत जो शशी कपूर पर फिल्माया गया था, शशी कपूर ने उसे अपने कैरियर का महत्वपूर्ण पड़ाव माना था। ‘‘जुनून’’ ‘‘36 चौरंगी लेन’’ और ‘‘कलयुग’’ जैसी उन की महत्वपूर्ण फिल्मों की चरचा भी संजय ने विस्तार से और कई शेड्स में की थी। संजय ने शशी की यह बात भी हाईलाइट की थी कि अब उन्हें अपनी बेटी की उम्र के बराबर की लड़कियों के साथ झाड़ियों के आगे पीछे गाना गाते दौड़ना ख़ुद भी अच्छा नहीं लगता।
यह सब पढ़ कर रीना का दिमाग ख़राब हो गया। वह कहने लगी कि वह उसे भी क्यों नहीं साथ ले गया। उस ने लगभग जिद पकड़ ली कि वह उसे शशी कपूर से अभी चल कर मिलवाए।

‘‘क्या बंबई चलोगी ?’’

‘‘क्यों ?’’

‘‘क्यों कि शशी बंबई जा चुके हैं।’’ संजय ने उसे बताया , ‘‘चलो अगली बार जब वह आएंगे तो जरूर मिलवा दूंगा।’’

‘‘जाओ मैं तुम से नहीं बोलती।’’ वह किसी छोटे बच्चे की तरह तुनक कर बोली।

‘‘क्या शशी कपूर की हिरोइन बनने की तमन्ना है ?’’ संजय ने उसे चिढ़ाया, ‘‘कि अब अगला प्रपोजल शशी कपूर को देना है ?’’

‘‘तुम से मतलब ?’’ वह फिर तुनकी।

‘‘नहीं, शशी कपूर को भी अगर अपने ‘‘स्कोर बोर्ड’’ में शुमार करने की तैयारी हो तो बताओ उन्हें फोन करके फौरन बुला दूं।’’ संजय रीना को छेड़ता हुआ बोला।

‘‘फौरन बुला दूं !’’ उस की बात दुहराती हुई वह मटकी, ‘‘शर्म भी नहीं आती यह कहते।’’ कहते हुए उस ने संजय की बांह में जोर से काट लिया। संजय जोर से चिल्लाया और लपक कर उस ने मुंह पर हाथ रख दिया और काटी हुई जगह पर फूंक मार-मार कर सहलाने लगी। बोली, ‘‘तुम ने ऐसी बात की ही क्यों ?’’ वह उसे घूरती हुई बोली, ‘‘तुम क्या मुझे करेक्टरलेस समझते हो ?’’

‘‘अच्छा चलो, तुम्हें ए॰ के॰ हंगल से मिलवा दूं।’’ संजय रीना को खुश करता हुआ बोला, ‘‘वह दिल्ली में अभी हैं।

‘‘मुझे नहीं मिलना।’’

‘‘क्यों ?’’

‘‘बस, कह दिया कि नहीं मिलना !’’

‘‘पछताओगी।’’ संजय बोला, ‘‘हंगल साहब से मिलना एक अनुभव से गुजरना है। वह स्टार नहीं न सही, पर अभिनेता जबरदस्त हैं। बिरले ही होते हैं ऐसे अभिनेता। और आदमी वह अपने अभिनेता से भी अच्छे हैं।’’

‘‘ठीक है।’’ वह उठती हुई बोली, ‘‘फिर कभी।’’ वह ठीक वैसे ही बोली जैसे लाइफब्वाय प्लस साबुन के विज्ञापन में पसीने की बदबू से उकताई लड़की बोलती है, ‘‘फिर कभी।’’ और जैसे दूसरे दृश्य में वह तरल और मादक बन जाती है कुछ-कुछ वही हाल रीना ने किया। वह संजय से लिपट गई।

मंडी हाउस के श्री राम सेंटर में एक ड्रामा फेस्टिवल के दौरान रीना जब संजय से पहली-पहली बार अलका के साथ मिली थी तो संजय ने उसे भर आंख देखा भी नहीं था। अलका की उपस्थिति मात्रा से ही संजय की आंखें नत हो जाती थीं। तब से जब से अलका ने उसे पुरुष मानसिकता से संचालित होने वाला व्यक्ति बता कर राखी बांधने की मंशा जता दी थी।
उस रोज श्री राम सेंटर के गलियारे में रीना से बड़ा रूटीन सा परिचय इस तरह के संबंध में बदल जाएगा संजय ने सोचा भी नहीं था। गिरीश कर्नाड लिखित हयबदन नाटक की समीक्षा में संजय ने स्त्री-पुरुष संबंधों को जो नाटक में इंगित और वर्णित था, उस की एक नई व्याख्या, एक नया भाष्य भाखते हुए, उसे रेखांकित करते हुए कुछ दृष्टिगत बातें गौरतलब कराई थीं। रीना को वह सारी संभावनाएं और स्थापनाएं जो संजय ने बतौर बहस रेखांकित की थीं, इतनी भा गई थीं कि दूसरे दिन वह संजय से ऐसे लपक कर मिली, जैसे वह उसे कितने वर्षों से मिलती रही हो। पर संजय को तो यह भी ठीक से याद नहीं था कि यह रीना वही रीना है जो कल मिली थी। अलका ने उसे छेड़ा, ‘‘क्या रजनीश सिर से उतर गए जो लड़कियों की नोटिस लेना भी श्रीमान भूल गए ?’’ उस ने जोड़ा, ‘‘कि कहीं समाधि अवस्था में तो नहीं पहुंच गए ?’’ वह बोली, ‘‘अगर ऐसा है तो बड़ा बुरा हुआ। क्या होगा देश का, क्या होगा बेचारे रजनीश का ?’’ अलका लगातार चुटकी लेती जा रही थी। बात किसी तरह अजय ने संभाली, ‘‘क्यों परेशान करती हो बेचारे को।’’ पर रीना तो जैसे इन सारी चीजों से बेख़बर अपनी ही धुन में थी, ‘‘पहली बार किसी प्ले की रिव्यू इस तरह पढ़ने को मिली। रिव्यू में इस तरह की इमैजिनेशंस, प्ले से भी आगे की बात करना आसान नहीं है।’’

‘‘पर यह तो अक्सर ऐसे ही रिव्यू लिखता है।’’ अजय ने हस्तक्षेप करते हुए कहा, ‘‘शायद पढ़ा नहीं तुम ने ?’’

‘‘नहीं, रिव्यूज तो मैं अक्सर पढ़ती हूं।’’ रीना बोल रही थी, ‘‘पर हमेशा एक ही ढर्रा । कि स्टोरी सच एंड सच, फला-फला ने ठीक काम किया, फला-फला ने सो एंड सो। और कुछ ऐसी ही कील कांटे वाली बातें गोया रिव्यू नहीं किसी मशीन का नट बोल्ट कस रहे हों।’’ वह कंधे उचकाती हुई बोली, ‘‘बिलकुल रूटीन-रूटीन सी रिव्यू। बासी बासी बातें।’’ वह संजय की ओर मुख़ातिब होती हुई बोली, ‘‘पर आप की रिव्यू ने तो सोचने पर मजबूर कर दिया।’’ वह चहकी, ‘‘बाई गाड इस तरह की रिव्यू अब तक तो पढ़ने को नहीं मिली थी।’’

‘‘ज्यादा तारीफ मत करो।’’ अजय रीना से बोला, ‘‘इस से भी अच्छी रिव्यू भारद्वाज ने लिखी है।’’

‘‘आप अंगरेजी अख़बार पढ़ती हैं ?’’ संजय ने रीना से पूछा।

‘‘आफकोर्स !’’

‘‘तो अंगरेजी अख़बार पढ़ना बंद कर दीजिए।’’ संजय बोला, ‘‘अगर कचरा रिव्यू पढ़ने से बचना चाहती हों तो।’’

‘‘अच्छा ?’’ रीना सोच में पड़ गई।

‘‘क्यों कि एक प्रसिद्ध चित्रकार का कहना है कि सपने हमेशा मातृभाषा में आते हैं।’’ संजय ने जोड़ा, ‘‘और आप लाख कंधे उचकाएं, अंगरेजी में गिटपिटाएं, मैं समझता हूं आप की मां हिंदी ही बोलती होंगी। मतलब साफ है कि आप की मातृभाषा हिंदी होगी।’’ संजय ने कहा, ‘‘अगर हिंदी न सही कोई और भाषा सही, जो भी हो आप वह भाषा पढ़िए, बंगला, पंजाबी, असमी, तेलगु जो भी हो। वह पढ़िए।’’ उस ने लगभग चेताते हुए कहा, ‘‘पर अंगेरजी छोड़ दीजिए।’’

‘‘इस की बातों में मत आना।’’ अजय बोला, ‘‘यह तो लोहियावादी है।’’

‘‘सवाल सिर्फ लोहियावादी का नहीं है यहां।’’ संजय तुनका, ‘‘सवाल मातृभाषा का है, सवाल हिंदी का है, सवाल अपनी भाषा के प्रति सम्मान का है, अपने आत्म सम्मान का है, सवाल अंगरेजी की गुलामी से छुट्टी पाने का है। क्यों कि अंगरेजी में न तो कोई संभावनाएं हैं, न कोई सपने हैं हमारे लिए।’’

‘‘अच्छा चलो, रीना पर तुम्हारी इन बातों का इंप्रेशन नहीं जमने वाला।’’ अजय संजय को खींचते हुए बोला, ‘‘नाटक की घंटी बज गई है।’’

‘‘सॉरी !’’ कहते हुए संजय ने सिगरेट सुलगा ली थी।

नाटक के बाद रीना फिर संजय की ओर लपकी। ऐसे हिल मिल के बात करने लगी कि संजय खुद भी मुश्किल में आ गया था। दो ही संक्षिप्त मुलाकातों में कोई सुंदर सी लड़की किसी फंटूश के गले पड़ जाए, यह उस के लिए पहला अनुभव था। फिल्मों में तो ऐसे फ्रेम उस ने देखे थे, पर ख़ुद के साथ यह फिल्मी फ्रेम घटित होते हुए वह पहली बार महसूस कर रहा था। उस के भीतर ही भीतर एक अजीब-सी हलचल, एक अजीब-सी गुदगुदी हो रही थी, अजीब-सी रासायनिक क्रिया हो रही थी, उस के भीतर ही भीतर। यह क्या हो रहा था।?

तुरंत-तुरंत कोई निष्कर्ष वह नहीं निकाल पा रहा था।

इस सब के बावजूद संजय फिर संयत था। रीना की मादक और उत्सुक उपस्थिति उसे बहका तो रही थी पर अलका की उपस्थिति उसे ऊहापोह में डाले हुए थी। वह एक अजीब से संकोच में सकुचाया, रीना के खिंचाव में भकुआया, किसी बंद दरवाजे जैसा चुप-चुप था पर रीना जैसे अपने भीतर बाहर की सारी बात, ‘‘यू नो, यू नो ’’ कह-कह कर खोल कर रख देना चाहती थी। अजय जैसे संजय को चिढ़ाते हुए रीना से बोला, ‘‘बशीर बद्र का वह शेर सुना है कि, कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से। तो तुम इतना इस के गले में मत पड़ो।’’

‘‘स्साले।’’ संजय अजय को खींचता हुआ उस के कान में धीरे-से बुदबुदाया, ‘‘मेरी लाइन काटता है।’’

‘‘तुम क्या गंदे आदमी का शेर ले कर बैठ गए ?’’ अजय कुछ कहता, उस के पहले ही अलका अपना पुराना राग ले कर बैठ गई।

‘‘क्यों प्रोग्रेसिव शायर हैं बशीर बद्र तो।’’ रीना बोली, ‘‘और उन के शेर भी एक से एक होते हैं।’’

‘‘जैसे बबर शेर।’’ संजय ने टांट कर रीना की बात पूरी की।

‘‘एक्जेक्टली।’’ रीना चहकी।

‘‘पर वो आदमी मुझे पसंद नहीं।’’ अलका बोली, ‘‘जो आदमी किसी औरत के लिए अपने बीवी-बच्चों को यतीम बना कर सड़कों पर भीख मांगने के लिए छोड़ सकता है। वह आदमी, अच्छा आदमी कैसे हो सकता है।’’ वह बिफरी, ‘‘और जो अच्छा आदमी नहीं हो सकता वह अच्छी शायरी कैसे कर सकता है, अच्छा शायर कैसे हो सकता है ? प्रोग्रेसिव तो कतई नहीं।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘ऐसे लोगों का तो सोशली बायकाट होना चाहिए।’’

‘‘क्या अलका तुम भी ?’’ अजय उसे गुरेरता हुआ बोला।

‘‘देखो अलका, तुम चाहे जो कहो, बशीर बद्र का शायरी में जवाब है नहीं।’’ संजय भावुक होता हुआ बोला, ‘‘फिराक और फैज के बाद इतने बोलते हुए शेर, जिंदगी के बदलते हुए तेवर को शायरी में ढालने का काम जिस शऊर, संवेदनशीलता और शिद्दत से बशीर बद्र और हां, दुष्यंत कुमार ने किया है, मुझे कोई और नहीं दिखता।’’ संजय बोलता रहा, ‘‘रही बात निजी जिंदगी की, तो होगी कोई बात। क्या पता कहां और किस पक्ष से गलती हुई हो। और क्या पता, ‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, वरना यूं कोई बेवफा नहीं होता।’ जैसा शेर इन्हीं स्थितियों में लिखा गया हो।’’

‘‘जो भी हो, पर मैं ऐसे लोगों को माफ नहीं कर सकती।’’ अलका ने माहौल काफी गंभीर कर दिया था।

‘‘अच्छा, मैं चलूं ?’’ संजय बोला, ‘‘मुझे प्रेस भी जाना है।’’ अलका की ओर घूरते हुए उस ने कहा, ‘‘यह बहस फिर कभी।’’

‘‘फिर कभी !’’ वह ऐंठी, ‘‘आप घर भी आते हो कभी ?’’

‘‘आऊंगा, आऊंगा।’’ संजय चलने लगा।

‘‘मैं छोड़ दूं आप को ?’’ रीना फिर लपक कर बोली।

‘‘नो थैंक्यू ! मैं चला जाऊंगा।’’ संजय हाथ जोड़ते हुए बोला, ‘‘आप क्यों तकलीफ करती हैं।’’

‘‘नहीं, तकलीफ की कोई बात नहीं।’’ रीना बोली, ‘‘बहादुर शाह जफर मार्ग पर ही तो जाएंगे आप ?’’

‘‘जाहिर है।’’

‘‘तो आइए।’’ रीना अपनी फिएट का फाटक खोलती हुई बोली, ‘‘दो मिनट में पहुंचाती हूं।’’

‘‘सुनो !’’ संजय रीना की कार में बैठने लगा तो अजय धीरे से उस के कान में फुसफुसाया, ‘‘फिसल मत जाना राजा जी !’’

‘‘चुप्प स्साले !’’ संजय बुदबुदाया और रीना से झटके से बोला, ‘‘चलिए !’’

‘‘ओह, श्योर।’’ कहते हुए रीना ने कार स्टार्ट कर दी।

रास्ते में भी संजय शर्माया-शर्माया कनखियों से रीना को देख लेता। रीना की मादक देह से बिलकुल सनका देने वाले सेंट की खुशबू आ रही थी। पर संजय का मन नहीं डोला। क्यों कि रीना, अलका की सहेली थी। और अलका साइक्लॉजिकली संजय की पुरुष मानसिकता क्या सहज मानसिकता पर भी सांकल चढ़ाए खड़ी रहती। पर रीना पर कोई सांकल नहीं चढ़ी थी। वह इस छोटे से रास्ते में, ‘‘कहां रहते हैं, कहां के हैं, घर में कौन-कौन है, दिल्ली में कब से हैं ?’’ जैसे ढेरों सवालों में लगी रही। चलते-चलते उस ने अपने घर का पता बताया और कहा, ‘‘कभी फुर्सत से आइएगा। इट्स माइ प्लेजर।’’ और ‘‘बाय-बाय’’ कह कर चली गई।
पर वह नहीं गया। रीना के घर।

कुछ दिन बाद अलका का फोन आया। उस ने घर बड़े आग्रह से बुलाया।

‘‘बात क्या है ?’’ पूछने पर वह बोली, ‘‘एक खुशी सेलीब्रेट करनी है।’’

‘‘क्या हो गया ?’’ पूछा संजय ने।

‘‘आना, ख़ुद ही पता चल जाएगा।’’ कह कर उस ने फोन रख दिया।

संजय उस शाम जल्दी से काम काज निपटा कर जब अलका-अजय के घर पहुंचा तो देखा उपेंद्र सूद, वीना वगैरह एन॰ एस॰ डी॰ यन॰ तो थे ही रीना भी थी। पता चला टी॰ वी॰ से एक डांस कंसायनमेंट अलका को मिली थी, रीना के पापा के सौजन्य से, वही सेलीब्रेट हो रहा था।
संजय बहुत दिनों बाद अलका-अजय के घर आया था। पहुंचते ही उस ने गिलास, बर्फ और बोतल मांगी। अजय पहले ही से शुरू था। बना बनाया पेग ले कर संजय को थमा दिया। संजय ने मना कर दिया, ‘‘जूठी नहीं पीऊंगा।’’

‘‘साले अभी शुरू भी नहीं हुआ। और चढ़ गई ?’’ अजय बोला।

‘‘देखो, मैं अपना पेग ख़ुद बनाऊंगा।’’ संजय बोला, ‘‘एंड नो फरदर डिसकसन।’’

‘‘अंगरेजी बोल रहा है लोहियाइट। दे दो भाई।’’ अजय उपेंद्र से बोला।

संजय अभी पहले पेग पर ही था और रीना पर बराबर ध्यान दिए था। पर शो यही कर रहा था कि उस ने उस की नोटिस नहीं ली है। अभी वह कुछ इधर उधर की हांक रहा था कि उपेंद्र पेशाब करने चला गया और अजय फ्रिज से पानी निकालने लगा। इसी बीच रीना संजय के पास आई। और लगभग सट कर बैठती हुई धीरे से बोली, ‘‘आप आए नहीं ?’’ रुकी और बोली, ‘‘नाराज हैं क्या ?’’

‘‘नहीं तो।’’ वह रीना की देह से सेंट सूंघता हुआ बोला, ‘‘सॉरी आ नहीं पाया।’’ उसने जोड़ा, ‘‘पर आऊंगा।’’

‘‘कब ?’’ कहते हुए रीना उठने लगी।

‘‘जल्दी ही।’’

‘‘मैं इंतजार करूंगी।’’ वह आंखों में अजीब-सा इसरार उडेलती हुई बोली, ‘‘बहुत-सी बातें करनी हैं।’’ कह कर वह वहां से उठ गई थी।

‘‘क्या बातें हो रही थी ?’’ अजय पानी की बोतल रखता हुआ बोला।

‘‘कुछ नहीं बस यूं ही ।’’

‘‘वही रिव्यू, वही फिसलन, वही फसाना ?’’ अजय ऐसे बोल रहा था जैसे किसी नाटक का संवाद बोल रहा हो।

संजय अभी दूसरे पेग पर था कि उस ने देखा रीना जा रही थी। उस ने गौर किया रीना को उस की यह मयकशी अच्छी नहीं लग रही थी। और वह जैसे उकता सी गई थी। उसे जाते देख संजय बोला, ‘‘जा रही हैं ?’’

‘‘हां।’’ वह संक्षिप्त सा बोली।

‘‘आज हमें घर नहीं छोड़ेंगी ?’’

‘‘चलिए, अभी छोड़ देती हूं।’’ वह चहकी ऐसे जैसे उस की ताजगी लौट आई हो।

‘‘अभी नहीं, जरा देर रुकिए तो चलूं।’’

‘‘सॉरी, मुझे जल्दी घर पहुंचना है।’’

‘‘रीना तुम जाओ।’’ अलका किचन से हाथ पोंछती हुई आई, ‘‘इन शराबियों के चक्कर में मत पड़ो। नहीं रात भर तुम्हें घुमाते रहेंगे।’’

‘‘ओ॰ के॰।’’ कहती हुई रीना अलका के घर से ऐसे भागी जैसे वह दंगाइयों से बच कर भाग रही हो।

दूसरे दिन सचमुच संजय भरी दुपहरिया में रीना के घर पहुंच गया, पंडारा रोड पर।

उस ने बड़ी ख़ातिरदारी की। ख़ूब खिलाया पिलाया। अपने घर में भी वह मादक अदाएं बिखेरती रही।

अमूमन नौकर चाकर और एक बूढ़ी दाई के अलावा कोई उस के घर में नहीं होता था। उस के पिता कभी होते, कभी नहीं होते। ज्यादातर वह अपने राजनीतिक दौरों पर रहते। संजय जब-तब जाने लगा। उस ने देखा रीना कभी-कभी जान बूझ कर आते-जाते उस से सट जाती, पर अभिनय ऐसा करती जैसे वह अनायास ही छू गया हो। अनायास ही सही, संजय की देह में करंट सा दौड़ जाता। उस की पूरी देह में जैसे तनाव भर जाता। उस का चेहरा बिगड़ जाता। पर मारे संकोच के वह चुप ही रहता। फिल्म, थिएटर, राजनीति, कला और दुनिया की तमाम बातें वह बतियाता रहता। पर उस के भीतर क्या घट रहा है, कौन सा ज्वालामुखी भीतर ही भीतर दहक रहा है, वह उस के बारे में नहीं बतिया पाता। वह सोचता, क्या पता रीना खुले दिमाग की लड़की है, खुद ही प्रपोज करे! पर ऐसा हो नहीं रहा था। हो यह रहा था कि जब कभी रीना की देह से वह छू जाता उस की देह दहकने लगती। एक अजीब सी उथल-पुथल मच जाती, भीतर ही भीतर। ऐसे ही किसी क्षण में एकांत पा कर उस ने रीना से कह दिया, ‘‘अगर बुरा न मानिए तो एक बात कहूं।’’ संजय ने यह बात इतने संकोच, इतनी शिद्दत और नरमी से कही थी कि रीना शायद उस की बात का अर्थ समझ गई थी या क्या पता नहीं, पर मुंह से वह बोली कुछ नहीं, आंखों ही आंखों में सिर हिला कर होंठ गोल कर मानो पूछा कि, ‘‘क्या बात है ?’’

संजय चुप रहा। तो वह ‘‘ऊं’’ कर के फुसफुसाई। संजय कहना चाहता था कि आप के साथ सोना चाहता हूं। पर उस के मुंह से जो अस्फुट सा कुछ निकला यह था, ‘‘आप को चूमना चाहता हूं।’’

‘‘बस !’’ कह कर उस ने संजय को ख़ुद ही इतने कस कर चूमा कि क्षण के लिए वह स्तब्ध रह गया। फिर तो सहज ही वह सब कुछ घट गया जो संजय चाहता था। और इतना जल्दी घट गया कि वह कुछ समझ ही नहीं पाया। उस ने पाया कि उस से कहीं ज्यादा तो रीना आतुर थी उस के साथ संभोग के लिए। पर नारी सुलभ संकोच उसे विवश किए हुए था। और वह चाहती थी कि पहल संजय की ओर से ही हो। ऐसा उस ने बाद में बताया कि, ‘‘पर तुम वक्त इतना लंबा खींचते जा रहे थे कि उस दिन या किसी और दिन तुम नहीं प्रपोज करते तो मैं ही प्रपोज कर देती।’’ वह बोली, ‘‘तुम्हारी मासूमियत पर कभी तरस आता तो कभी गुस्सा।’’

हां, वह दोनों आप-आप से अब तुम पर आ गए थे।

पर यहां चेतना अभी आप-आप पर ही थी। जाने यह लखनऊ की नफासत थी, उस का सलीका था या वह उस से एक ख़ास दूरी बनाए रखना चाहती थी। चेतना के साथ-साथ लखनऊ में घूमते हुए संजय को एक दिक्कत यह भी महसूस होती कि लखनऊ दिल्ली नहीं था। दिल्ली में जहां-तहां आप को पहचानने वाले लोग नहीं मिलते। पर लखनऊ में कदम-कदम पर पहचानने वाले ‘‘भाई साहब, भाई साहब’’ कहने वाले मिल जाते। दिल्ली में भारी आबादी के बावजूद निर्जन और एकांत जगहों की लंबी फेहरिस्त थी। पर लखनऊ में निर्जन और एकांत जगहें थीं ही नहीं।

बुद्धा पार्क, नीबू पार्क, शहीद स्मारक, रेजीडेंसी, इमामबाड़ा से लगायत, चिड़ियाघर, कुकरैल तक वही भीड़, वही जान पहचान के चेहरे चहुं ओर घूमते मिल जाते। लखनऊ का छोटा शहर होना संजय को साल जाता। आखि़र कहां बैठे वह चेतना को ले कर ? उसे रह-रह दिल्ली, रीना, नीला और साधना की याद आ जाती। ऐसा भी नहीं था कि लखनऊ में इन जगहों पर जोड़े नहीं घूमते थे, बल्कि वह देखता चिड़ियाघर में तो सुबह-सुबह दस बजे ही स्कूली लड़कियां ड्रेस पहने ही अपने साथियों के साथ आ जातीं, दफ्तर जाने वाली लड़कियां दफ्तर बाद में जातीं, पहले वह अपने प्रेमी से मिलतीं। पर हर कोई उन्हें पहचानने वाला नहीं होता। क्यों कि उन की पहचान नहीं थी। पर संजय का सार्वजनिक जीवन जीने की एक पहचान थी। पुलिस से ले कर, मिनिस्टर्स, तक उसे पहचानते थे। चेतना के साथ रास्ते चलते तो कोई बात नहीं थी, पर किसी ऐसी जगह वह उस के साथ बैठता तो झेंप आती। ऐसे ही एक दिन नींबू पार्क में बैठे-बैठे संजय ने सोचा कि वह अब और समय ख़राब करने के बजाय चेतना को सीधे प्रपोज कर दे। उस ने आंखों में कुछ वैसा ही भाव भरा और बोला, ‘‘तुम से एक बात करनी है।’’

‘‘पर मैं अब चलना चाहती हूं।’’

‘‘क्यों ?’’

‘‘क्यों कि अंधेरा हो रहा है।’’

‘‘क्या अंधेरे से डर लगता है ?’’

‘‘नहीं।’’

‘‘तो क्या मुझ से डर लग रहा है ?’’

‘‘नहीं।’’

‘‘तो ?’’

‘‘बस चलिए।’’

‘‘चलो।’’ संजय थोड़ा नाराज होता हुआ उठ खड़ा हुआ।

‘‘नाराज क्यों हो रहे हैं ?’’

‘‘क्यों, नाराज क्यों होऊंगा ?’’

‘‘अच्छा बैठिए।’’ वह फिर से बैठती हुई बोली।

‘‘नहीं, अब चलो।’’ संजय बैठा नहीं।

‘‘कुछ कहना चाहते थे आप ?’’

‘‘नहीं।’’

‘‘कुछ कहना तो चाहते थे आप।’’ वह मायूस होती हुई, मनाती हुई सी बोली।

‘‘अब मूड ख़राब मत करो, चलो।’’ संजय का मूड सचमुच ख़राब हो रहा था।

वह उठ खड़ी हुई और पहली बार संजय से आगे-आगे चलने लगी। बाहर आ कर वह स्कूटर पर नहीं बैठी। संजय ने कहा भी कि, ‘‘बैठो।’’

‘‘नहीं, मैं चली जाऊंगी।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘आप जाइए।’’

‘‘ड्रामा मत करो, चलो बैठो।’’ थोड़ा-सा ना-नुकुर के बाद वह बैठ गई। पर रास्ते भर दोनों चुप रहे।

संजय उस शाम दफ्तर नहीं गया।

दूसरे दिन दफ्तर गया तो उस की एक ख़बर पर हंगामा मचा हुआ था। वह ख़बर जो संजय एक दिन पहले दे गया था। ख़बर एक अधिकारी के बारे में थी। जाते ही रिपोर्टर्स मीटिंग में संजय की ख़बर ली गई कि, ‘‘यह ख़बर कैसे लिखी आप ने ?’’ पूछा सरोज जी ने।

‘‘ख़बर थी इस लिए लिखी।’’

‘‘पर इस तरह की ख़बर छपने की परंपरा नहीं रही है हमारे अख़बार में।’’ सरोज जी दहाड़े।

‘‘ख़बर क्या होती है, आप जानते भी हैं ?’’ संजय भी उखड़ गया। पर उस ने गौर किया तो त्रिपाठी वहां बैठा-बैठा, मंद-मंद मुसकुरा रहा था। वह समझ गया यह सारी खुराफात त्रिपाठी की थी। सरोज जी को उसी ने ‘‘पंप’’ किया हुआ था। यह तो वह जान गया। पर सरोज जी के आगे वह घुटने टेकने को तैयार नहीं था। वह डटा रहा और दुबारा तिलमिलाया, ‘‘ख़बर की समझ भी है आप को ?’’

‘‘अब आप हम को ख़बर समझाएंगे ?’’ सरोज जी आदतन अचकचा गए।

‘‘नहीं।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘हम को क्या गरज पड़ी है।’’ वह तंज करते हुए बोला, ‘‘जिंदगी बीत गई आप की और ख़बर नहीं समझ पाए अब तक तो, अब मैं क्या समझाऊंगा।’’

‘‘तो अब अइसी ख़बर नहीं छपेगी हमारे अख़बार में।’’ सरोज जी का ‘‘हमारे’’ शब्द पर जोर ज्यादा था। सरोज जी को कभी इस तरह मोर्चा लेते नहीं देखा था संजय ने। पर आज उन का मोर्चा लेना संजय को विस्मय में डाल रहा था। तो उस ने सोचा सरोज जी की भांग सुबह-सुबह बोलने लगी है। सरोज जी लगातार उच्चारते रहे, ‘‘हमारे अख़बार में ऐसा नहीं छपेगा। ई सब अब नहीं चलेगा हियां।’’

‘‘क्या पहाड़ टूट पड़ा है ?’’ संजय सरोज जी पर उबल पड़ा, ‘‘आखि़र क्या गड़बड़ है उस ख़बर में।’’ वह रुका और सरोज जी को समझाते हुए बोला, ‘‘हफ्ते भर हो गया उस अधिकारी का ट्रांसफर हुए और उसे चार्ज नहीं दिया जा रहा है। क्यों कि अधिकारियों की एक लॉबी नहीं चाहती कि वह वहां चार्ज ले। वह लॉबी अपनी पसंद का कोई अधिकारी उस की कुर्सी पर बैठाना चाहती है। और एक सीनियर आई॰ ए॰ एस॰ अफसर जो इन दिनों लंदन में है वह लंदन से ही इस लॉबी का नेतृत्व कर रहा है।’’ संजय फिर रुका और बोला, ‘‘बस यही तो है ख़बर में ?’’ उस ने जैसे पूछा, ‘‘तो इस में गड़बड़ क्या है ? गलत क्या है ?’’

‘‘ये ठाकुर लॉबी का क्या मतलब है ?’’ सरोज जी जैसे सुलग गए।

‘‘अब ठाकुर लॉबी ऐसा कर रही है तो लिखने में क्या हर्ज है ?’’

‘‘हर्ज है !’’ सरोज जी की आंखों में जैसे आग छलकने लगी, ‘‘आप का ई ब्राह्मणवाद नहीं चलेगा हियां।’’ सरोज जी बोलते-बोलते हांफने लगे, ‘‘अब ई सब नहीं चलेगा हमारे अख़बार में।’’

‘‘देखिए सरोज जी, यहां सवाल ब्राह्मणवाद या ठाकुरवाद का नहीं, नियम और कानून का है।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘सरकार का एक आदेश है और उस का अनुपालन हफ्ते भर से नहीं हो रहा है तो यह ख़बर है।’’ संजय उत्तेजित हो गया, ‘‘रही बात ब्राह्मणवाद, ठाकुरवाद की तो यह सब घटिया और सतही बातें आप ही कह सकते हैं, मैं इन सब चीज़ों को नहीं मान पाता, न ही मुझे इस तरह की घटिया बातें पसंद हैं।’’

‘‘पर अब मैं यह सब नहीं होने दूंगा।’’ सरोज जी हांफते जा रहे थे, ‘‘देखता हूं कैसे लिखते हैं अइसी ख़बरें आप ?’’

‘‘देखिए, आप हम से ऐसी ऊट पटांग बातें मत करिए। ख़बर संपादक को मैं ने दी थी, संपादक ने ही उसे पास किया है, आप संपादक से ही इस बारे में बात करिए तो बेहतर होगा।’’ संजय सरोज जी को इंगित करता हुआ बोला, ‘‘आज का जो एसाइनमेंट हो तो बताइए।’’

‘‘कुछ नहीं है।’’ सरोज जी तमतमाए।

संजय मीटिंग से उठ कर चला गया। उस का मूड बिलकुल आफ हो गया था। वह वापस घर जा कर सो गया। शाम को लोक लेखा समिति की रिपोर्ट पर एक ख़बर ‘‘ठीक-ठाक’’ कर के वह दफ्तर पहुंचा तो जो ख़बर उसे मिली, सुन कर वह सन्न रह गया।

उस के पसंदीदा संपादक नरेंद्र जी का इस्तीफा हो गया था और सरोज जी कार्यवाहक संपादक बना दिए गए थे। आज सुबह सरोज जी का बार-बार यह कहना कि, ‘‘अब ई सब नहीं चलेगा हमारे अख़बार में’’ का मर्म संजय की समझ में अब आ रहा था। संजय का मन हुआ कि वह भी इस्तीफा दे दे। छोड़ दे लखनऊ चला जाए वापस दिल्ली।

वह दिल्ली, जिस का दंश उसे रह-रह डाहता है।

संजय ने अपनी सीट पर जा कर चपरासी से एक गिलास पानी मांगा। पानी पिया और एक लाइन का ‘‘निजी कारणों से इस्तीफा दे रहा हूं’’ लिखा और ले कर उठ खड़ा हुआ।

‘‘ई का कर रहे हो ?’’ चपरासी ने संजय की बांह पकड़ते हुए पूछा। संजय को चपरासी द्वारा अचानक इस तरह बांह पकड़ना बुरा लगा। वह उस की ओर कुछ कहने के लिए पलटा, तो देखा चपरासी इमोशनल हो रहा था। अपनी मूंछें ठीक करता हुआ फिर बोला, ‘‘ई का कर रहे हो ?’’ संजय को उस चपरासी पर दया आ गई और उस ने देखा कि वह चपरासी भी उसे उसी दया भाव से देख रहा था बल्कि कहीं ज्यादा कातर ढंग से। दया भाव से देखते-देखते क्षण ही भर में उस ने संजय को जैसे काबू कर लिया और उस के हाथ से इस्तीफे वाला कागज खींच कर फाड़ते हुए बोला, ‘‘ई बेवकूफी कब्बो करिहो ना। हम बहुत पत्रकारों को देखे हैं हियां। अंगरेजों को भी। बड़ों बड़ों की शेखी निकरते देखी है।’’ अपनी मूंछ ठीक करते हुए वह बोला, ‘‘मन जियादा ख़राब हो तो चुपचाप घर जाओ। दूइ चार रोज की छुट्टी ले लो। फिर आओ। पर ई बेवकूफी कब्बो नाई करिहो। नाहीं बड़ा पछितइहो।’’

‘‘ठीक है फूल सिंह।’’ कह कर संजय ने चपरासी के कंधे पर हाथ रख कर जैसे उसे दिलासा दिया कि वह इस्तीफा नहीं देगा। और जेब में सिगरेट तलाशने लगा जो जेब में नहीं थी।

‘‘सिगरेट लावें का ?’’ उसे सिगरेट ढूंढ़ते देख फूल सिंह ने पूछा। संजय चुप रहा तो फूल सिंह ने फिर दुहरा कर पूछा, ‘‘सिगरेट लावें का ?’’

‘‘नाहीं फूल सिंह रहने दो।’’ संजय अपने बालों को दोनों हाथों भींचता हुआ बोला, ‘‘आज तो तुम अपनी बीड़ी ही पिला दो।’’

‘‘लेव पियो।’’ फूल सिंह खुश होते हुए ऐसे बोला जैसे उस ने पानीपत की लड़ाई जीत ली हो। संजय की बीड़ी सुलगाता हुआ वह बोला, ‘‘तुम्हारे बीवी बच्चे हैं। एह तर गुस्सा में फइसला करिहो त का होई।’’ और जैसे वह ख़ुद से ही पूछता हुआ बोला, ‘‘हयं?’’ उस ने जोड़ा, ‘‘का करते भला ?’’

‘‘दिल्ली चले जाएंगे।’’ संजय कुर्सी पर पीठ टिकाते हुए बोला।

‘‘का हुआं तुरंत नौकरी धरी है, पलेट में सजा के ?’’

‘‘क्यों ?’’ संजय ने उस से कहा, ‘‘आखि़र मैं दिल्ली से ही आया हूं।’’

‘‘एतनै जो भली होती दिल्ली तो तुम आते काहें हुआं से ?’’

‘‘हां, सो तो है।’’ कह कर संजय बीड़ी का कश लेने चला तो देखा कि बीड़ी बुझ गई है। बीड़ी फेंक कर जेब से पैसा निकाल कर फूल सिंह से संजय ने कहा, ‘‘जाओ सिगरेट ले ही आओ।’’

‘‘हम पहिलवैं कहत रहे।’’

कहता हुआ फूल सिंह चला गया। तो संजय ने सोचा कि एक चपरासी भी पत्रकारिता की विसंगतियों को किस तल्ख़ी से समझता है। वह सोचने लगा कि अगर फूल सिंह ने अभी न रोका होता तो वह आज इस्तीफा तो दे ही देता। और जैसी कि सुबह सरोज जी से चिकचिक हुई तो इस्तीफा मंजूर भी हो जाता। तब भला वह क्या करता?’’

दिल्ली वापस जाता ?

दिल्ली में ही कौन तुरंत नौकरी मिल जाती। बाद में भी मिलती कि नहीं, क्या पता? उस ने सोचा। क्या दिल्ली में बेकार पत्रकारों की लंबी फौज नहीं है ? और वह भी हिंदी में ! वह ख़ुद ही कहता फिरता रहता कि दिल्ली में हिंदी पत्रकारिता की स्थिति बिलकुल अछूतों जैसी है, हरिजनों जैसी है। जैसे हरिजनों को संवैधानिक आरक्षण तो है पर उन का फिर भी कल्याण नहीं है, ठीक वैसे ही हिंदी देश की राजभाषा तो है पर देश की राजधानी दिल्ली में हिंदी का कोई नामलेवा नहीं है। लोग या तो पंजाबी बोलते हैं या फिर अंगरेजी। रही बात हिंदी पत्रकारिता की तो बस उस के भगवान ही मालिक हैं। वह जब यूनिवर्सिटी में पढ़ता था तो अपने छोटे से शहर में पत्रकारों को अंगरेजी डिक्शनिरयों में सिर खपाते देखता तो उसे उन से घिन आती। पर दिल्ली में तो और बुरी हालत थी। काम हिंदी अख़बार में करना, और अंगरेजी जानना, अंगरेजी से हिंदी में टीपने की कला जानना पहली शर्त होती। चलिए झेला। पर अंगरेजी की जूठन चाटने से फुर्सत यही नहीं मिलती थी। दिक्कत तब होती जब दिल्ली में हिंदी पत्रकारों की जब तब क्या हरदम ही हेठी होती रहती। हालत यह कि दिल्ली में पोलिटिकल सर्किल हो या ब्यूरोक्रेटिक वह सब से पहले फारेन प्रेस को तरजीह देते हैं और उन के ही सामने दुम हिलाते रहते हैं। टाइम, न्यूजवीक, आब्जर्वर, बी॰ बी॰ सी॰ हो या खलीज टाइम्स, उन की दुम सिर्फ अपने जिक्र भर के लिए ही सही हिलती रहती है। फिर दूसरे नंबर पर टेलीविजन वाले यानी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। भले चौखटा न दिखे पर कैमरे के सामने बैठ कर ‘‘रिकार्डिंग’’ कराने का सुख ही कुछ और है। चैनलों की बाढ़ ने इस काम में ऐसा इजाफा किया है कि मत पूछिए। ख़ैर इस तरह तीसरे नंबर पर आता है इंडियन प्रेस। और इंडियन प्रेस में भी जाहिर है कि अव्वल नंबर पर अंगरेजी अख़बार और उन के पत्रकार ही होते हैं। हिंदी अख़बार और उन के पत्रकार अपना नंबर आते-आते इतनी दयनीय और कारुणिक स्थिति को प्राप्त हो जाते हैं कि कभी-कभी सोच कर भी रुलाई आ जाती है।

संजय को याद है कि एक बार इंदिरा गांधी की प्रेस कांफ्रेंस में बड़े जुगाड़, मान मनौव्वल और लगभग अपमानित होने की सारी प्रक्रियाओं से गुजरता हुआ वह पहुंचा और अपमानित होने की सारी कड़ियां लगभग भुलाता हुआ सीना तान कर जब वह अपनी निश्चित कुर्सी पर बैठा था तो एक अजीब से गुरूर से वह भर उठा था। पर जब प्रेस कांफ्रेंस शुरू हुई तो उसे अजीब सी हताशा महसूस हुई। उस के सीने में जलन होने लगी। हलक सूखने लगा। वह सारी प्रक्रिया ही इतनी अपमानजनक थी कि उसे एक बार लगा कि उस का दम घुट जाएगा। पर उस ने जब अगल-बगल बैठे पत्रकारों पर नजर दौड़ाई तो देखा सब के सब सीना तान कर बैठे हैं। तो उस ने भी पानी पी कर सूखते हलक को तर किया और सीना फुला कर बैठ गया। सब का नंबर आता रहा था। पर उस का नंबर नहीं आ रहा था। सभी सवाल पर सवाल किए जा रहे थे। दो सवाल संजय की सूची से पूछे जा चुके थे। हर सवाल के बाद वह सोचता अब की अगर उस का नंबर आया तो फला-फला सवाल पूछेगा। ठीक वैसे ही जैसे कि शुरू-शुरू में कवि सम्मेलनों में वह हरदम सोचता रहता कि अब अगर उस का नंबर आया तो फला कविता पढ़ेगा। पर कवि सम्मेलनों में भी उस का नंबर जल्दी नहीं आता था। यहां भी नहीं आ रहा था। वैसे तो उस ने ढेरों प्रेस कांफ्रेंस अटेंड की थी। और नेताओं को बात-बात में घेर लेता। पर यह पी॰ एम॰ की प्रेस कांफ्रेंस पहली बार थी। वह बैठा-बैठा इधर-उधर की बातें नोट करता रहा। और जब कोई पौन घंटे बाद उस के सवाल पूछने का नंबर आया तो वह जो बड़ी तैयारी से अंगरेजी में सवाल लिख कर लाया था, उस सूची को दरकिनार कर गया। जैसे उस का स्वाभिमान भीतर से उस पर हमला कर बैठा, जैसे उस का हिंदीजीवी होना, उसे चाबुक सा मारता हुआ उस के भीतर हिलोरें मारने लगा, हिंदी उस की जबान पर सारी रटी अंगरेजी को जैसे लात मार कर चढ़ गई और उस ने हिंदी में ही लगातार एक की जगह दो सवाल पूछ डाले। सवाल पूछते समय उस की नजरें सीधे इंदिरा गांधी पर टिकी थीं। उस ने देखा कि इंदिरा गांधी को उस का हिंदी में सवाल पूछना नहीं सुहाया था और उन्हों ने उसे हिकारत भरी नजरों से घूरते हुए सर्रे से अंगरेजी में जवाब दे दिया था।

दूसरे सवाल का जवाब भी जब वह अंगरेजी में देने लगीं तो संजय की हिंदी, हिंदी स्वाभिमान उस के भीतर जैसे तूफान मचा गया, वह फिर से उठा और बड़ी विनम्रता से बोला, ‘‘प्रधानमंत्री जी, मैं ने सवाल हिंदी में किया था, जवाब भी हिंदी में दीजिए।’’ पर इंदिरा गांधी उस की विनती पर गौर किए बिना अंगेरेजी में जवाब देती रहीं। संजय ने उन्हें फिर टोका कि, ‘‘हिंदी में।’’ और दो तीन बार टोका, ‘‘हिंदी में।’’ पर इंदिरा गांधी को जैसे यह सब कुछ सुनाई देते हुए भी सुनाई नहीं दे रहा था। वह उसे अनसुना करते हुए बोलती रहीं। पर इस बीच दो तीन और हिंदी पत्रकारों का जमीर जाग गया। वह भी खड़े हो गए और ‘प्रधानमंत्री जी, हिंदी में’ की विनती कर बैठे। तब कहीं जा कर इंदिरा गांधी ने बड़े-बड़े शीशों वाला चश्मा उतारा, उस की कमानी होंठों से लगाई और हिंदी में बोलीं, ‘‘हिंदी में जवाब इस लिए नहीं दे रही हूं कि यहां फारेन प्रेस के लोग भी बैठे हैं।’’ बस वह चश्मा आंखों पर लगा फिर अंगरेजी में चालू हो गईं। संजय ने देखा कि प्रधानमंत्री का सूचना सलाहकार उसे खा जाने वाली नजरों से घूर रहा था। संजय बुरी तरह फ्यूज हो गया। वह भीतर ही भीतर सुलग कर रह गया। उस की यह सुलगन शेयर करने के लिए सिगरेट भी उस के पास नहीं थी। बाहर सिक्योरिटी वालों ने रखवा ली थी। माचिस सहित। वह पूरी प्रेस कांफ्रेंस में भस्म होता रहा, अफनाता रहा और पछताता रहा कि क्या करने वह यहां आ गया। हिंदी पत्रकारिता के बेमानी होने का पहला अहसास उसे तभी हुआ था।

प्रेस कांफ्रेंस ख़त्म होने के बाद भारी-भारी कदमों से वह उस एयरकंडीशंड हाल से भीतर ही भीतर खौलता हुआ निकल रहा था तो उस ने गौर किया कि सो काल्ड इंडियन प्रेस के लोग उसे ऐसे घूरते चले जा रहे थे जैसे उस ने कोई बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो। तो कुछ उसे देख कर ऐसे मंद-मंद मुसकुरा कर मजे ले रहे थे जैसे वह आदमी नहीं मदारी का बंदर हो। एक हिंदी पत्रकार ने उस का हाथ पकड़ते हुए चुटकी ली, ‘‘जब अंगरेजी नहीं आती तो यहां आने की क्या जरूरत थी ?’’ और कंधे उचकाता हुआ आगे बढ़ गया। एक अंगरेजी अख़बार का पत्रकार जो यू॰ पी॰ का था और संजय को जानता था सो उस ने उस की हालत पर सहानुभूति जताई, ‘‘बात तो तुम ने ठीक कही थी पर कुछ वैसे ही जैसे किसी मुजरे की महफिल में कोई भजन की फारमाइश कर बैठे।’’ संजय के उदास मन को यह उपमा अच्छी लगी थी पर वह उदास इतना ज्यादा था कि तुरंत कोई प्रतिक्रिया नहीं दे पाया। तभी उस ने देखा, उस के ही संस्थान की वह अंगरेजी पत्रकार जो उस के साथ ही आई थी, उसे देख नथुने फुला कर, गाल पिचका कर ऐसे आगे बढ़ गई जैसे किसी ने उस की नाक काट ली हो। जैसे किसी ने उस का शील भंग कर दिया हो। संजय ने सोचा क्या हिंदी बोलना सचमुच इतना बड़ा अपराध है ? वह यह सोच ही रहा था कि पीछे से कस कर किसी ने उस का कंधा दबाया। वह एक पल को डर गया कि शायद प्रधानमंत्री की सिक्योरिटी वाले पकड़ने आए हों। उस ने पलट कर दहशत भरी नजरों से देखा। अपना ताम-झाम लिए मुसकुराते हुए बी॰ बी॰ सी॰ के मार्क टुली खड़े थे। अपनी ब्रिटिश लहजे वाली हिंदी में ही कंधे उचकाते हुए वह बोले, ‘‘नौजवान !’’ वह मुसकुराए, ‘‘हम को तो हिंदी आटी है।’’ कहते हुए संजय से हाथ मिलाने लगे।

‘‘क्या बात है !’’ कहते हुए संजय मार्क टुली से लिपट गया। लिपटते हुए उसे लगा जैसे वह रो पड़ेगा। पर उस ने जैसे-तैसे अपने को काबू किया। मार्क टुली ने भी उसे उसी प्यार से बांहों में भरा और सीढ़ियां उतरती, साड़ी संभालती एक महिला पत्रकार को लगभग टोकते हुए वह फिर से बोले, ‘‘हम को तो हिंदी आटी है।’’ मार्क टुली के ‘‘हम को तो हिंदी आटी है’’ कहने की लय ऐसी थी कि जैसे वह अपना हिंदी ज्ञान बताने के बहाने इंदिरा गांधी और उन की अंगरेजी को तमाचा मार रहे हों। और जैसे साड़ी वाली महिला से पूछ रहे हों कि, ‘‘बोलो, तमाचा भरपूर है कि नहीं ?’’ मार्क टुली ने अपनी आवाज में और मिठास घोली पर कहने की लय को तल्ख़ किया और अचानक ठिठक कर खड़ी हो गई उस महिला से फिर बोले, ‘‘हम को तो हिंदी आटी है।’’

‘‘हम को भी हिंदी आती है।’’ वह महिला एकदम खिलखिला कर ऐसे बोली जैसे एकदम, अचानक किसी घुटन से उबर गई हो। पर मार्क टुली फिर बुदबुदाए ‘‘हम को तो हिंदी आटी है।’’ संजय को लगा जैसे उसे घर जाने की राह मिल गई हो। और उस ने बढ़ कर मार्क टुली का हाथ पकड़ा और झुक कर चूम लिया। बिलकुल राजकपूर स्टाइल में।

संजय दफ्तर बाद में पहुंचा पर उस का हिंदी बोलने वाला किस्सा इस पुछल्ले के साथ कि अख़बार की कैसे हेठी हुई, बहुत पहले पहुंच चुका था, सीन दर सीन। ऐसे, जैसे पूरी पटकथा हो। पांच मिनट की बात पचास मिनट के किस्से में ऐसे तब्दील हो गई थी जैसे आधी से अधिक प्रेस कांफ्रेंस में सिर्फ संजय और इंदिरा गांधी संवाद ही हुआ हो। सारा किस्सा सुन-सुन कर, जवाब दे-दे कर संजय का दिमाग पक गया था। बिलकुल किसी फोड़े की तरह। सिगरेट सुलगा कर वह अपनी सीट पर बैठा ही था कि संपादक का बुलावा आ गया। संपादक की केबिन में घुसना ही था कि वह शुरू हो गए, ‘‘यही सब करने गए थे ? नहीं अंगरेजी बोल पाए तो चुप ही रहे होते। इतनी छिंछालेदार तो नहीं होती। प्राइम मिनिस्टर को नाराज करने का मतलब समझते हैं आप ? आप की जाहिलयत का बयान करने वाले कितने टेलीफोन आ चुके हैं। मालूम हैं ? आप जानते हैं स्टाफ में कितने लोगों को नाराज कर के आप को भेजा था, आप की बीट नहीं थी, फिर भी ?’’ कहते हुए संपादक ने एजेंसी से आए हुए तारों का पुलिंदा थमाते हुए कहा, ‘‘ले जाइए। कम से कम प्रेस कांफ्रेंस संजीदगी से लिखिएगा।’’ उन्हों ने जोड़ा, ‘‘इस में हिंदी के तार भी हैं।’’ और ऐसे कि जैसे वह तमाचा मार रहे हों। संजय तारों का पुलिंदा लिए संपादक की केबिन से निकला तो उसे लगा जैसे उस का दिमाग फट जाएगा।

बाहर आ कर उस ने एजेंसी के तारों से एक रूटीन सी प्रेस कांफ्रेंस की ख़बर बनाई। और साथ ही अपनी नोट बुक निकाल कर प्रेस कांफ्रेंस की इनसाइड स्टोरी लिखी। जिस में इंदिरा गांधी के जवाबों का रंग और प्रेस कांफ्रेंस के कई-कई शेड्स और मूवमेंट्स के ब्यौरे बटोर कर उस ने पूरी स्टोरी को एक इमोशनल टच दिया। साथ ही हिंदी वाले मसले पर मार्क टुली का जिक्र करते हुए एक बाक्स आइटम भी बनाया।

संपादक ने जब एक साथ तीन-तीन ‘‘स्टोरी’’ देखी तो फिर पसर गए। बोले, ‘‘क्या पूरे अख़बार में प्रेस कांफ्रेंस छपेगा ?’’

‘‘अब जो है आप देख लीजिएगा। जो न समझ में आए फेंक दीजिएगा।’’ कह कर संजय केबिन से बाहर आ गया। दूसरे दिन उस ने देखा कि प्रेस कांफ्रेंस की मेन स्टोरी के साथ इनसाइड स्टोरी भी काट छांट के साथ छपी थी पर हिंदी वाला आइटम गायब था। जिक्र तक नहीं था। उसे तब और ज्यादा दुख हुआ जब उस ने देखा कि उस यू॰ पी॰ वाले अंगरेजी पत्रकार ने ‘‘क्योश्चन इन हिंदी’’ कर के एक बढ़िया बाक्स आइटम लिखा था।

वह यह सब सोच ही रहा था कि लखनऊ में तो दिल्ली जैसा नहीं है। यहां जो लिखो वह छपता है। क्या हुआ जो यहां प्रधानमंत्री नहीं हैं। मुख्यमंत्री तो है और एक नहीं, पचास सवाल पूछो, जवाब तो देता है। वह भी हिंदी में। यहां तो अंगरेजी वाले भी जब हिंदी में सवाल पूछते हैं तो संजय को मन ही मन मजा आ जाता है। दिल्ली में जो कदम कदम पर हिंदी पत्रकारिता का नरक है वह नरक लखनऊ में सिर्फ डेस्क तक ही सीमित है। और उस को डेस्क से क्या लेना देना ? उस ने सोचा। फिर क्या रखा है दिल्ली में ? फूल सिंह ने ठीक ही किया जो उसे इस्तीफा देने से रोक लिया। नहीं, दिल्ली में भी कहां है अब नौकरी ? जिस ने दिल्ली न देखी हो वह जाए दिल्ली। वह तो अपने हिस्से की दिल्ली भुगत आया है। और पत्रकारिता की ऐसी कौन सी चिरकुटई है जो लखनऊ में है और दिल्ली में नहीं ? सारी उलटबासियां, विसंगतियां, चमचई, चाकरी और धूर्तई हर ओर समाई हुई हैं। वह यह सब अभी सोच ही रहा था कि सरोज जी का बुलावा आ गया। सरोज जी अब उसके नए संपादक थे।

‘‘किस चूतिए से पाला पड़ गया है।’’ बुदबुदाता हुआ वह संपादक की केबिन की ओर बढ़ गया । संपादक की केबिन में अभी भी नरेंद्र जी को बैठा देख कर वह चकित रह गया। नमस्कार करते हुए वह बोला, ‘‘तो क्या जो ख़बर उड़ी वह गलत है ?’’

‘‘मेरे इस्तीफे की ?’’ नरेन्द्र जी बोले, ‘‘सही है।’’

‘‘तो फिर अभी तक आप बैठे हैं ?’’

‘‘हां।’’ नरेंद्र जी बोले, ‘‘मैं तो जा रहा था पर सरोज जी ने कहा कि प्यारे, जरा काम धाम समझा दो तब जाना। एम॰ डी॰ ने भी रुकने को कहा।’’

‘‘तो आप रुक रहे हैं ?’’ संजय चहका।

‘‘नहीं, कल से नहीं आऊंगा। इस्तीफा तो दे दिया है।’’

‘‘पूंजीपतियों की नौकरी में तो यह सब होता ही रहता है।’’ संजय बोला, ‘‘फिर भी मेरे लिए कुछ हो तो बताइएगा।’’

‘‘बिलकुल।’’ नरेंद्र जी गर्मजोशी से बोले।

संपादक की केबिन से वह निकल ही रहा था कि सरोज जी भीतर जाते दिख गए। उस ने उन्हें ख़बर थमाई तो वह उसे घूरने लगे। पर वह उन की ओर देखे बिना ही निकल गया। घर जाते समय तक बड़ा उदास हो गया। रास्ते भर वह रमानाथ अवस्थी का गीत, ‘‘गंगा जी धीरे बहो, यमुना जी धीरे बहो, नाव फिर भंवर में है’’ गुनगुनाता रहा। उस अंधियारी रात में विधान सभा मार्ग से गुजरते हुए उसे वह सड़क ही नदी में तब्दील होती लगी और गुनगुनाता रहा, ‘‘गंगा जी धीरे बहो, नाव फिर भंवर में हैं’’
वह जैसे बेबस हो गया था।

इतना बेबस उस ने पहले कभी महसूस नहीं किया था और इस तरह ‘‘गंगा जी धीरे बहो’’ नहीं गुनगुनाता था। गुनगुनाते-गुनगुनाते उसे अपने शहर की यूनिवर्सिटी रोड की याद आ गई। उन दिनों वह अपने क्लास की एक लड़की के प्यार में पगलाया घूमता रहता था। और जब वह लड़की सड़क से गुजर जाती तो अपनी साइकिल के पैडिल मारता वह सोम ठाकुर का गीत, ‘‘जाओ पर संध्या के संग लौट आना तुम, सेज की शिकन संवारते न बीत जाए रात।’’ गुनगुनाता घूमता फिरता। उस ने आज एक बार ‘‘जाओ पर संध्या के संग लौट आना तुम’’ भी गुनगुनाया पर इस समय उसे यह गीत गुनगुनाना बड़ा अटपटा लगा और तुरंत ही ‘‘गंगा जी धीरे बहो’’ पर वापस लौट आया। विधान भवन के सामने से गुजश्रते हुए जैसे बेवजह तर्क पर उतर आया कि कैसी गंगा, और काहे की गंगा ? यहां तो गोमती है, जो बहती ही नहीं। और जब बहती ही नहीं तो भंवर कहां से आएगा ? गोमती, जहां सड़ा हुआ पानी हिलोरें मारने के बजाय ठहरा हुआ पानी बन कर बदबू मारता है। जैसे दिल्ली में यमुना का पानी। उस ने सोचा सरोज जी और गोमती के बदबूदार पानी में आखि़र फर्क क्या है ? फिर जैसे उस ने ख़ुद को ही जवाब दिया कि भंवर से तो बचा जा सकता है पर बदबूदार पानी से ? हरगिज नहीं। और फिर सरोज जी ही क्यों ? समूची पत्रकारिता ही जब बदबूदार पानी हो गई हो तो क्या करें ?’’

‘‘तह के ऊपर हाल वही जो तह के नीचे हाल/मछली बच कर जाए कहां जब जल ही सारा जाल।’’ पाकिस्तानी शायर आली का यह मशहूर दोहा उसे आज की पत्रकारिता का हाल बयान करने के लिए बड़ा मौजू लगा।

पत्रकारिता का चाहे जो हाल हो पर फिलहाल तो उसे सरोज जी से निपटना था, श्याम सिंह सरोज से। उस ने सोचा कि अगर वह उन से नहीं निपटा तो सरोज जी तो उसे निपटा ही देंगे।
सरोज जी मतलब श्याम सिंह सरोज अजीब व्यक्तित्व के मालिक थे। देखने में सीधे सादे, निरीह पर भीतर से उतने ही धूर्त, कुटिल और काइयां। आप समझें कि आप ने उन्हें ‘‘बना’’ दिया पर बाद में पता चलता उन्हों ने आप को जड़ से ही काट कर रख दिया। पत्रकारों में कवि, कवियों में पत्रकार। अपने अख़बार में वह आदि पुरुष माने जाते थे। क्यों कि अख़बार शुरू होने के दिन से ही वह थे। जाने कितने लोग आए और चले गए। रिटायर हो गए, मर गए पर सरोज जी के साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। अख़बार के मालिकों की तीसरी पीढ़ी काम संभालने लग गई थी पर सरोज जी जस के तस थे। चूंकि वह हाई स्कूल भी पास नहीं थे सो उन की उम्र का कोई हिसाब नहीं था। उन के अख़बार में पत्रकारों के रिटायरमेंट की उम्र पहले साठ वर्ष थी, फिर घटा कर अट्ठावन वर्ष कर दी गई। पर सरोज जी की उम्र की कोई थाह नहीं थी। सो वह रिटायर नहीं हुए थे। लोग कहते दादा की उम्र सालों से चालीस साल पर ठहरी हुई है। उस अख़बार में सरोज जी के मुकाबले फूल सिंह चपरासी भर था। अख़बार के पहले दिन से ही काम वह भी करता था पर चूंकि वह चपरासी था, इस लिए वह आदि पुरुष नहीं कहलाता। पर उस का दावा था कि वह सरोज जी से भी सीनियर है। वह कहता कि, ‘‘मैं चार साल सीनियर हू। जब दस बरस का लौंडा था तब से हियां पानी पिलाय रहा हूं। और यह हिंदी अख़बार नहीं छपता था, सिर्फ अंगरेजी वाला ही छपता रहा, तब से ही हूं।’’ पढ़ाई लिखाई का कोई सर्टिफिकेट फूल सिंह के पास भी नहीं था सो उसकी उम्र भी ठहरी हुई थी। सरोज जी, और फूल सिंह के रिटायरमेंट की जब भी बात आती फूल सिंह कहता, ‘‘जब सरोज जी आए तब अधेड़ थे और मैं लौंडा, पहिले सरोज जी को रिटायर करो।’’

सरोज जी को रिटायर करने के लिए कंपनी ने बाकायदा डायरेक्टर बोर्ड की मीटिंग कर एक नियम बनाया कि चालीस वर्ष तक काम करने के बाद कर्मचारी रिटायर कर दिया जाएगा। माना गया कि बालिग होने की उम्र अठारह वर्ष है और बालिग होने से पहले कोई नौकरी नहीं कर सकता। तो चालीस साल बाद कर्मचारी अट्ठावन वर्ष का हो जाएगा और उसे रिटायर कर दिया जाएगा। फिर सरोज जी तो दो अख़बारों में नौकरी करने के बाद इस अख़बार में आए थे। उन्हें नौकरी करते हुए भी चालीस वर्ष से ज्यादा हो गए थे। बोर्ड से नियम पास करा लेने के बाद भी सरोज जी को रिटायरमेंट का कागज देने के लिए प्रबंधकों को बाकायदा रणनीति बनानी पड़ी। एम॰ डी॰ और जी॰ एम॰ शहर छोड़ कर ‘‘टूर’’ पर निकल गए और टाइम आफिस के एक घाघ किस्म के बाबू को उन्हें कागज देने की जिम्मेदारी सौंप गए। सरोज जी रात जब दफ्तर से निकलने ही वाले थे तो वह बाबू उन के रिटायरमेंट के कागज ले कर उन की केबिन में पहुंचा। सरोज जी में कुछ ‘‘ऐसा वैसा’’ सूंघ लेने की क्षमता कुत्तों से भी ज्यादा थी। उन्हें अंगरेजी ठीक से नहीं आती थी पर अंगरेजी अख़बार के रिपोर्टरों के सामने बैठ कर टाइप करती उन की उंगलियां देख कर ही वह ख़बर सूंघ लेते थे। तो उस बाबू को रात आठ बजे अपनी केबिन में घुसते देख कर ही वह भड़क उठे, ‘‘क्या बात है ?’’ वह ‘‘जी-जी’’ ही बोला था कि सरोज जी पूरी ताकत से भड़के, ‘‘बाहर चलो, अभी ख़बर लिख रहा हूं।’’ वह बाबू ‘‘जी-जी’’ करता केबिन के बाहर आ गया। पर वह भी एक घाघ था। केबिन के ठीक बाहर ही कुर्सी लगा कर बैठ गया। सरोज जी परेशान। चपरासी को बुलाया। पानी मंगवाया। पानी पिया। चपरासी के आने-जाने के बहाने केबिन के खुलते, बंद होते दरवाजे से वह उस बाबू को बैठे देख चुके थे। उन की परेशानी और बढ़ गई। वह बाबू को डांट कर भले कह दिए थे, ‘‘बाहर चलो, अभी ख़बर लिख रहा हूं।’’ पर ख़बर तो वह कब की लिख चुके थे और अब उस बाबू को ‘‘बाहर चलो’’ कह कर ख़ुद बाहर जाने को तड़फड़ा रहे थे। बिलकुल किसी तोते की तरह जो नया-नया पिंजरे में बंद हुआ हो। रात के आठ बजे से नौ बज गए। पर न तो सरोज जी केबिन से बाहर आए, न वह टाइम आफिस का बाबू वहां से हिला। संजय यह सब लगातार देख रहा था। अंततः जब सवा नौ बज गए तो सरोज जी ने चपरासी से फिर पानी मंगवाया और उस से कहा कि ‘‘टाइम बाबू से पूछो, वह यहां क्यों बैठा है ?’’ चपरासी ने वापस आ कर सरोज जी को बताया कि, ‘‘वह कोई कागज देना चाहता है।’’

‘‘कागज तुम ले लो। और कह दो वह यहां से जाए।’’

‘‘हम ने यही कहा साहब, पर ऊ कहता है, कागज जरूरी है, आप को ही देगा।’’ चपरासी ने बताया।

‘‘अच्छा ठीक है तुम जाओ।’’ कह कर सरोज जी केबिन में बंद हो गए। सरोज जी केबिन में थे और बाबू बाहर। दोनों ही नहीं हिल रहे थे।

रात के दस बज गए।

सरोज जी केबिन से निकले ही थे कि बाबू उन के पीछे पड़ गया, ‘‘यह रिसीव कर लीजिए।’’

‘‘हुईं !’’ सरोज जी चौंके और गरजे, ‘‘तुम्हारी ये हिम्मत। अब तुम हम को कागज रिसीव करवाओगे ?’’

‘‘यह ऐसा वैसा कागज नहीं है दादा !’’

‘‘तो ?’’

‘‘आप का पर्सनल है।’’ बाबू रिरियाया।

‘‘हुईं।’’ वह चकित होते हुए बोले, ‘‘का कहि रहे हो।’’ और उसे वापस केबिन में बुलाते हुए बोले, ‘‘भीतर आओ, भीतर आओ। बाहर काहें खड़े हो।’’ सरोज जी अब नरम पड़ गए थे। भीतर गए, कागज देखा। कागज देखते ही सरोज जी फिर भड़के, ‘‘ई का है ?’’

‘‘आप ही देख लें सर !’’ बाबू उन के रिटायरमेंट के कागज की दूसरी प्रति दिखाते हुए बोला, ‘‘और इस पर रिसिविंग दे दें।’’

‘‘न हम कुछ लेंगे, न रिसीव करेंगे।’’ सरोज जी उस पर बिगड़े, ‘‘अभी हम जी॰ एम॰ से बात करते हैं।’’

‘‘जी॰ एम॰ साहब तो हैं नहीं, बाहर गए हैं।’’ बाबू ने बताया।

‘‘तो एम॰ डी॰ को फोन करता हूं।’’

‘‘वो भी नहीं हैं। बाहर गए हैं सर !’’ बाबू ने सूचित किया।

‘‘सब बाहर गए हैं तो तुमहू बाहर जाओ। हम नाहीं लेंगे।’’

‘‘पर देना तो सर आप को आज ही है।’’ बाबू फिर बोला, ‘‘हमें आदेश है कि आप को हर हाल में आज ही रिसीव करवा दिया जाए।’’

‘‘हम नहीं करेंगे रिसीव।’’ सरोज जी फिर बिगड़े।

‘‘पर सर !’’

‘‘अब तुम्हीं बताओ, हम अब कइसे रिटायर होइ जाएं।’’ सरोज जी फिर नरम पड़ गए, ‘‘अबहिन परसों तो बात भई है एम॰ डी॰ से कि हम रिटायर नाहीं होब।’’ सरोज जी अब हताश हो रहे थे, ‘‘ऊ ख़ुदै हम से कहिन दादा आप हमेशा आते रहिए। आप की नौकरी जिंदगी भर की है।’’

‘‘तो आने को आप कल भी आइएगा।’’ बाबू ने जोड़ा, ‘‘आप सचमुच रिटायर थोड़े ही किए जा रहे हैं। यह तो सिर्फ कागजी कार्रवाई है। बस ! आप कागज भर ले लीजिए।’’

‘‘रिटायर नाहीं हो रहे हैं हम न ?’’ सरोज जी ने बाबू से कहा, ‘‘फिर कागज क्यों देइ रहे हौ।’’

‘‘कागज तो हम देंगे सर !’’ बाबू बोला, ‘‘कागज अपनी जगह है और आप की सेवा अपनी जगह।’’

‘‘अच्छा जाओ कल लइ लेब।’’ सरोज जी बाबू को टालते हुए बोले।

‘‘सर, कागज ले लीजिए।’’ वह रुका और हिचकते हुए बोला, ‘‘नहीं तो....!’’

‘‘नहीं तो ?’’ सरोज जी घबराए।

‘‘आज अख़बार में छपने चला जाएगा, बतौर नोटिस।’’

‘‘हुईं !’’ कह कर सरोज जी हांफने लगे, ‘‘जिंदगी भर की सेवा का इ फल दिया है लाला ने ?’’ वह हांफते हुए बोले, ‘‘लइ आओ।’’ और उन्हों ने रिटायरमेंट का कागज रिसीव कर लिया। बोले, ‘‘अब तो नहीं छपेगा ?’’

‘‘नहीं सर !’’ कहता हुआ बाबू चला गया।

संजय ने समझा अब सरोज जी कल से दफ्तर नहीं आएंगे। पर वह दूसरे दिन सुबह मीटिंग में हमेशा की तरह मौजूद मिले। ऐसे जैसे कल रात कुछ हुआ ही न हो। हालां कि उन के ‘‘रिटायर हो जाने’ की ख़बर सारे शहर में हो गई थी। उन से मीटिंग में इशारों-इशारों में पूछा भी गया पर वह टाल गए। त्रिपाठी ने मीटिंग से उठ कर, एकाउंट्स में जा कर एक बूढ़े की आवाज बना कर सरोज जी को फोन किया और रिटायरमेंट के बाबत पूछा तब भी सरोज जी सहज रहे। बोले, ‘‘कुछ नहीं, अफवाह है। हम तो हरदम की तरह दफ्तर आए हैं। और हरदम आएंगे ।’’ वह हंसते हुए बोले, ‘‘हमारे बिना ई अख़बार चल पाएगा भला ?’’ और फोन रख दिया।

इस तरह सरोज जी के तमाम किस्सों में उन के रिटायरमेंट का भी एक किस्सा जुड़ गया। हालां कि बाद में पता चला कि तब के जमाने में छ हजार रुपए महीना पाने वाले सरोज जी अब एक हजार रुपए के बाउचर पेमेंट पर आ गए थे। पर लिखते विशेष प्रतिनिधि ही थे। त्रिपाठी ने उन्हें कई बार टोका भी कि, ‘‘दादा यह तो अपमान है आप का।’’ तो सरोज जी एक दिन नाराज हो गए, ‘‘का अपमान है ?’’ वह हांफते हुए बोले, ‘‘आप लोग का चाहते हैं, घर जा कर बैठ जाऊं ?’’

‘‘नहीं दादा। त्रिपाठी ने चमचई की, ‘‘आप के बिना अख़बार चल पाएगा भला ?’’

‘‘तो ?’’

‘‘हम तो पैसे की बात कर रहे थे दादा।’’ त्रिपाठी मक्खन लगाते हुए बोला, ‘‘इतने कम पैसे में ?’’ बोलते-बोलते वह रुका, ‘‘एक हजार से ज्यादा तो अप्रेंटिस भी पाता है।’’

‘‘हुईं !’’ सरोज जी चौंके।

‘‘अच्छा दादा, आप की ग्रेच्युटी वगैरह मिल गई ?’’ संजय ने पूछा।

‘‘नहीं तो।’’ सरोज जी बोले, ‘‘जी॰ एम॰ ने कहा है जिस दिन घर बैठने का मन करे ले लीजिएगा।’’

‘‘कोई एक लाख रुपए तो बनेंगे ही दादा !’’ त्रिपाठी कूद पड़ा।

‘‘का पता प्यारे, हम ने तो जोड़ा नहीं।’’ सरोज जी बिलकुल नरम पड़ गए, ‘‘तुम लोग जोड़ो।’’

‘‘ठीक-ठीक तो एकांउट्स वाले बताएंगे।’’ त्रिपाठी बोला, ‘‘पर मोटा-मोटी तो एक लाख से ऊपर ही जाएगा।’’

‘‘अच्छा !’’ सरोज जी की आंखें फैल गईं।

‘‘फिर तो दादा आप बहुत बड़े बेवकूफ हो।’’ त्रिपाठी सरोज जी को मात देते हुए बोला।

‘‘का अंट शंट बकि रहे हो।’’ सरोज जी नाराज होते हुए बोले।

‘‘अंट शंट नहीं दादा।’ त्रिपाठी सरोज जी की नब्ज पकड़ते हुए बोला, ‘‘सच-सच बोल रहा हूं कि लाला आप को लंबा बेवकूफ बना रहा है।’’

‘‘कैसे ?’’ सरोज जी की आंखें फिर फैल गईं।

‘‘आप के एक लाख रुपए जो अभी नहीं मिले हैं बाजार दर से उस का सूद दो हजार रुपए मोटा मोटी तो हो ही जाएगा। और लाला आप के ही पैसे के सूद से एक हजार आप को दे रहा है और एक हजार अपनी जेब में डाल रहा है। आप ही के पैसे से आप को तनख़्वाह भी दे रहा है, आप से काम भी ले रहा है, और आप पर एहसान भी लाद रहा है।’’ त्रिपाठी ने पूरा गणित सरोज जी को समझाया तो उन की आंखें और चौड़ी हो गईं और बोले, ‘‘तो ई बात है प्यारे ! हम आज ही अपना हिसाब मांग लेते हैं।’’ और वह उठ कर खड़े हो गए।
मीटिंग बर्खास्त हो गई थी।

सरोज जी सचमुच अपना हिसाब लेने जनरल मैनेजर के पास चले गए। जहां उन की बड़ी किरकिरी हुई। उन्हें साफ बता दिया गया कि हिसाब लेने के बाद कंपनी को उन की सेवाओं की एक दिन की भी जरूरत नहीं रहेगी। सो सरोज जी ने एकाउंट्स से हिसाब नहीं लिया। पर त्रिपाठी का हिसाब लगाने में वह जरूर लग गए। वह रिपोर्टर्स मीटिंग में जब तब त्रिपाठी पर बेवजह बिगड़ जाते। और खोज-खोज कर उस की ख़ामियां निकालते, उसे ख़राब से ख़राब एसाइनमेंट पर भेजते। असल में सरोज जी को किसी ने समझा दिया था कि त्रिपाठी हिसाब के लिए उन्हें उकसा कर उन की छुट्टी कराना चाहता था। और सरोज जी के मूढ़ दिमाग में यह बात गहरे घुस गई। और चमचई, मक्खनबाजी में सिद्धहस्त त्रिपाठी की सारी कलाओं पर पानी फेरते हुए सरोज जी उस का हिसाब लेने पर नहा धो कर जुट गए। दफ्तर में एक कहावत थी कि सांप का काटा आदमी एक बार जी सकता है पर सरोज जी का काटा आदमी मर के भी छुट्टी नहीं पाता। वह उसे फिर भी मारते रहते हैं। पर सरोज जी एक शै थे तो त्रिपाठी दूसरी शै। खेल सरोज जी जरूर रहे थे पर बिसात त्रिपाठी ने ही बिछाई थी। त्रिपाठी के पास चमचई की इतनी कलाएं, इतनी उक्तियां थीं कि अच्छे-अच्छे अकड़घओं को वह वश में कर लेता था। सरोज जी सांप नाथ थे तो त्रिपाठी नागनाथ। बल्कि कई बार तो उसे इच्छाधारी नाग कहने को जी हो जाता। वह जिस को जैसे चाहता, वैसे नचाता, वैसे टहलाता, बैठाता और बोलवाता। सरोज जी किसी के भी वश में नहीं आते, त्रिपाठी के वश में फौरन आ जाते। त्रिपाठी ऐसा झुक कर, हाथ जोड़ कर बोलता कि अच्छे-अच्छे उस के वश में क्या, सम्मोहन में बंध जाते। लोग जानते थे कि त्रिपाठी कैसा है, क्या है, पर उस के सामने सभी विवश हो जाते और वह ऐसी लंगड़ी मारता, इतनी शराफत और नफासत से मारता कि आदमी का पैर टूट जाए फिर भी उसे शुक्रिया कहता जाए। दरअसल सरोज जी और त्रिपाठी दोनों एक ही नाव के दो सवार थे। दोनों की सोच, सनक और एप्रोच लगभग एक थी। बस स्टाइल जुदा-जुदा थी। सरोज जी एक शराब फैक्ट्री के मालिक की दलाली करते-करते पत्रकारिता में आ पहुंचे थे तो त्रिपाठी ट्रक पर क्लिनरगिरी और फिर टेलीफोन आपरेटरी करते-करते रिपोर्टरी तक आ पहुंचा था। ट्रक पर ड्राइवर की जी हुजूरी कर-कर उस की आंख में धूल झोंकने का जो रियाज त्रिपाठी ने किया था उसे अब वह जिंदगी का दस्तूर बना चुका था। टेलीफोन आपरेटरी में उस ने नफासत की चाशनी घोलनी भी सीख ली। जिस से उस की शराफत का रंग पक्का हो जाता और लोग उस की बातों में आ जाते।

पर सरोज जी अब की उस के किसी भी दांव में फंसने को तैयार नहीं थे। एक दिन मीटिंग में सरोज जी त्रिपाठी पर बुरी तरह बिगड़े और हांफने लगे। सरोज जी जब भी किसी पर नाराज होते तो हांफने लगते और आप कह कर संबोधित करते तो वह डर जाता। क्यों कि इस आप का मतलब सरोज जी के नाराज होने की भूमिका होती थी। और सरोज जी जिस भी किसी पर नाराज होते, वह कोई हो उस का कुछ न कुछ नुकसान सरोज जी जरूर कर या करवा देते। यह उन की ख़ास ख़ासियत थी। तो उस दिन सरोज जी त्रिपाठी पर बिगड़ते हुए हांफने लगे। बोले, ‘‘आप चाहते क्या हैं ?’’

‘‘क्या बात है दादा !’’ त्रिपाठी ने बड़ी विनम्रता से मक्खन चुपड़ कर यह संवाद फेंका।

‘‘बात पूछते हैं ?’’ सरोज जी गरजे, ‘‘आप ने आज कल कहीं उठना बैठना मुश्किल कर दिया है।’’

‘‘क्यों क्या हो गया दादा ?’’ त्रिपाठी हाथ जोड़ कर बोला।

‘‘ई अमीनाबाद में जो पटरी दुकान लगा रखी है आप ने,’’ वह हांफे, ‘‘आप ने तो अख़बार की नाक ही कटवा दी है।’’

‘‘नहीं दादा ! पटरी दुकानदारों की मांग जेनुइन है।’’ त्रिपाठी उसी विनम्रता से बोला, ‘‘उन को दुकान के लिए जगह तो चाहिए।’’

‘‘ख़ाक जेनुइन है।’’ सरोज जी फिर बिगड़े, ‘‘किसी दुकान पर बैठना मुश्किल हो गया है।’’

‘‘तो आप बैठते ही क्यों हैं किसी दुकान पर ?’’ त्रिपाठी की विनम्रता मेनटेन थी, ‘‘आप को यह शोभा नहीं देता।’’

‘‘हम को यह शोभा नहीं देता।’’ सरोज जी ने त्रिपाठी का कहा उसी की तरह नकल कर के दोहराया और उस को खा जाने वाली नजरों से घूरा, ‘‘और आप को पटरी दुकानदारों से पैसा लेना शोभा देता है ?’’

‘‘क्या कह रहे हैं दादा आप ?’’

‘‘मैं ठीक कह रहा हूं।’’ सरोज जी ने जोड़ा, ‘‘मेरे पास सुबूत है।’’

‘‘मेरे पास भी सुबूत है कि आप अमीनाबाद के बड़े दुकानदारों से पैसा लेते हैं।’’ त्रिपाठी की विनम्रता अब उस की जीभ से उतर रही थी, ‘‘और नियमित लेते हैं।’’

‘‘अब आप हम पर आरोप लगाएंगे ?’’ सरोज जी अब बुरी तरह हांफ रहे थे। ऐसे जैसे कोई कुत्ता बहुत दूर दौड़ कर आया हो और हांफ रहा हो। वह बोले, ‘‘यह झूठ है।’’

‘‘तो वह भी झूठ है।’’ त्रिपाठी की विनम्रता वापस उस की जीभ पर आ गई थी। त्रिपाठी-सरोज संवाद के दौरान दिलचस्प यह रहा कि मीटिंग में बैठे बाकी रिपोर्टरों में से कोई भी कुछ नहीं बोला।

संजय के लिए तो जैसे यह एक अनुभव था। हिला देने वाला अनुभव। कि एक ठीक ठाक अख़बार के दो पत्रकार इस स्तर पर भी आ सकते हैं भला ? पर जैसे यही काफी नहीं था। आदत से मजबूर त्रिपाठी मीटिंग से निकलते ही सरोज के बारे में जो भी कुछ कह सकता था, एक अभियान के तहत कहना शुरू कर दिया। कि सरोज जी एक भी सामान नहीं ख़रीदते। राशन, दूध, घी, कपड़ा, साबुन पेस्ट तक कहां-कहां से उन के घर मुफ्त आता है की पूरी फेहरिस्त वह परोसने लगा और बताने लगा कि बुढ़वा एक नर्स से भी फंसा पड़ा है। त्रिपाठी यह सारे ब्यौरे अपने मोहक और रहस्यमय अंदाज में परोसता और कहता कि, ‘‘यह बुड्ढा खुद ही घूम-घूम शहर भर में अख़बार की नाक कटवाता फिरता है और दूसरों को हड़काता रहता है कि तुम ने अख़बार की नाक कटवा दी।’’ इस सब का असर यह हुआ कि सरोज जी ने दूसरे रोज त्रिपाठी को एक ऐतिहासिक एसाइनमेंट सौंपा। वह बड़े प्यार से बोले, ‘‘त्रिपाठी जी आप मेहनती आदमी हैं। और यह काम आप ही कर सकते हैं।’’

‘‘आज्ञा दीजिए दादा !’’ त्रिपाठी भी मक्खन लपेट कर बोला।

‘‘क्या है कि शहर की एक बहुत बड़ी समस्या है मेनहोल का खुला रहना।’’ सरोज जी त्रिपाठी को समझाते हुए बोले, ‘‘इस पर आप कुछ करिए !’’

‘‘बिलकुल दादा !’’ त्रिपाठी हाथ जोड़ कर विनम्रता पूर्वक बोला, ‘‘यह बहुत बड़ी समस्या है। और वह भी राजधानी में। यह तो हद है दादा।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘आज ही देखता हूं।’’ कह कर त्रिपाठी ने हाथ जोड़ लिए।

‘‘तो इस में क्या करेंगे आप ?’’ सरोज जी ने बिलकुल बाल सुलभ जिज्ञासा जताई।

‘‘बस अभी निकलता हूं। और महापालिका वालों को दुरुस्त करता हूं।’’ त्रिपाठी उठता हुआ हाथ जोड़े बोला।

‘‘बैठ जाइए।’’ सरोज जी ने त्रिपाठी को तरेरा, ‘‘मैं जानता था आप यही करेंगे।’’

‘‘तो फिर दादा ?’’ त्रिपाठी बैठ गया।

‘‘मैं चाहता हूं कि आप इस पर एक इनवेस्टिगेटिव रिपोर्ट लिखें।’’ सरोज जी बड़ी गंभीरता से बोले।

‘‘दादा, इनवेस्टिगेटिव तो संजय जी ही करते हैं।’’ त्रिपाठी पूरी तन्मयता और विनम्रता से बोला।

‘‘मैं चाहता हूं कि यह आप ही करें।’’ सरोज जी बोले, ‘‘यह संजय के मान का नहीं है। ई अभी पूरा लखनऊ नहीं जानते तो का देखेंगे, का लिखेंगे।’’

‘‘हम बता देंगे दादा ! और लखनऊ भी इस बहाने ये देख लेंगे।’’ त्रिपाठी पूरे आदर से बोला।

‘‘नहीं, हम चाहते हैं कि यह रिपोर्ट आप ही लिखें।’’ सरोज जी आदेशात्मक लहजे में बोले, ‘‘और इस के लिए महापालिका आप न जाएं, बल्कि मुहल्ला-मुहल्ला घूम कर सर्वे करें कि कितने मेनहोल खुले हैं, उन की गिनती करें जितने दिन लगें, लगा लें। और फिर रिपोर्ट लिखें। आप चाहें तो इस बीच दफ्तर भी न आएं। और पूरे मनोयोग से लग जाएं।’’

‘‘अच्छी बात है दादा !’’ हाथ जोड़ता हुआ त्रिपाठी बोला और उठने लगा।

‘‘आप समझ गए न सब ?’’ सरोज जी ने पूछा।

‘‘बिलकुल दादा !’’

‘‘श्यौर !’’ सरोज जी जैसे आश्वस्त हो लेना चाहते थे कि पासा ठीक पड़ा है कि नहीं।’’

‘‘श्योर दादा !’’ त्रिपाठी की बिसात फिर बिछ गई थी। संजय समझ गया। इस खेल में भी सरोज जी की मात पक्की है।

‘‘तो कब से ?’’ सरोज जी ने पूछा।

‘‘आज ही से।’’ त्रिपाठी बोला, ‘‘बल्कि अभी से।’’

‘‘गुड !’’ सरोज जी विजयी भाव से बोले, ‘‘बस लग जाओ प्यारे !’’ उन्हों ने जोड़ा, ‘‘बहुत अच्छी स्टोरी बनेगी !’’

‘‘सब्जेक्ट ही बहुत अच्छा है !’’ त्रिपाठी फिर बड़ी विनम्रता से बोला।

‘‘सरोज-त्रिपाठी का यह संवाद सुन कर संजय का दिमाग घूम गया। उस ने सोचा कि किन कंजड़ों के बीच आ कर फंस गया वह।

थोड़ी देर बाद उस ने देखा त्रिपाठी जनरल डेस्क पर बैठा एक हाथ से सर टेके दूसरे हाथ से दाढ़ी नोच रहा है। मनोहर उस की यह दशा देख पूछ बैठा, ‘‘क्या हो गया पंडित जी ?’’

‘‘पूछिए मत।’’ त्रिपाठी सरोज जी को गाली देते हुए बोला, ‘‘साले बुड्ढे ने आज फंसा ही दिया।’’

‘‘क्यों क्या कर दिया ?’’

‘‘कितने मेनहोल लखनऊ शहर में खुले हैं, आप बता सकते हैं ?’’ त्रिपाठी बिफरा।

‘‘अपने मुहल्ले का बता सकता हूं। अपने आने-जाने के रास्ते का बता सकता हूं।’’ मनोहर ने मजाक किया, ‘‘क्यों मेनहोल में कूदने की तैयारी है ?’’

‘‘फिलहाल तो लगता है, यही करना पड़ेगा।’’

‘‘बात भी बताएंगे पंडित जी कि पहेलियां ही बुझाते रहेंगे।’’ मनोहर अब गंभीर हो गया था।

‘‘बात यह थी कि शहर में कितने मेनहोल खुले हैं सर्वे कर के, इस की गिनती करके, ‘‘इनवेस्टिगेटिव’’ रिपोर्ट लिखनी है।’’

‘‘बस !’’ मनोहर कुर्सी खींच कर बैठता हुआ बोला, ‘‘तो फिर पंडित जी आज से आप की मौज है।’’

‘‘यहां नौकरी की पड़ी है और आप को मौज की पड़ी है।’’ त्रिपाठी बोला, ‘‘दिमाग कुछ काम नहीं कर रहा है। बॉस कुछ आप ही बताइए।’’

‘‘बता तो रहा हूं।’’ मनोहर चहका।

‘‘मजाक छोड़िए।’’

‘‘मजाक नहीं, वेरी सिरियसली।’’ मनोहर बोला, ‘‘हरामीपने की एसाइनमेंट के साथ हरामीपने वाला ट्रीटमेंट करिए।’’ उस ने चुटकी बजाई, ‘‘वेरी सिंपल। महापालिका से आंकड़ा लीजिए कि कितने मेनहोल हैं। जितने मेनहोल हों उन में से सिक्सटी, या सेवेंटी परसेंट खोल डालिए, और इतने खुले ही रहते हैं, ख़ास-ख़ास मुहल्लों, रास्तों के नाम खोंसिए। इनवेस्टिगेटिव रिपोर्ट तैयार ! और हफ्ते भर सर्वे करिए सिनेमाहालों में। आप की तो बस मौज ही मौज !’’

‘‘मान गए भई।’’ कह कर त्रिपाठी उठ गया।

‘‘चाय भी नहीं पिलाएंगे। मनोहर बोला, ‘‘आखि़र इतनी बढ़िया सलाह दी है।’’

‘‘अगले हफ्ते।’’ कह कर त्रिपाठी निकला तो सचमुच अगले हफ्ते ही आया।

वह रोज सिनेमा देखता, या इधर-उधर घूमता, शराब पीता और शाम को ही सरोज जी को फोन कर देता और किसी दूर के मुहल्ले का नाम बताता और कहता आज इसी इलाके में हूं। साथ ही आंकड़ा भी बता देता कि इतने मेनहोलों में से इतने मेनहोल खुले हैं, इतने चोक हैं, पब्लिक परेशान है, इतनी दुर्घटनाएं हुई हैं वगैरह-वगैरह। इधर से सरोज जी कहते, ‘‘बस लगे रहो प्यारे !’’

यही सिलसिला जब रोज का हो गया तो एक दिन सरोज की समझ में आ गया कि त्रिपाठी उन्हें बना रहा है। वह बोले, ‘‘आप ऐसा करिए कि दफ्तर आ जाइए। अभी।’’

‘‘पर अभी कई महत्वपूर्ण इलाके बाकी हैं दादा !’’ त्रिपाठी ने मक्खन लपेट कर कहा, ‘‘वहां की गिनती अभी बाकी है।’’

‘‘आप गिनती छोड़िए और आफिस आइए। तुरंत !’’

‘‘पर मैं बहुत दूर से बोल रहा हूं, चौक इलाके में ठाकुरगंज से।’’

‘‘आप जिस भी इलाके से बोल रहे हों, अभी आइए और तुरंत हमें रिपोर्ट कीजिए।’’ कह कर सरोज जी ने फोन रख दिया, और चपरासी बुला कर समझा दिया कि, ‘‘त्रिपाठी ज्यों आएं, उन्हें अंदर भेजो।’’

सरोज जी बड़ी देर तक त्रिपाठी को पूछवाते रहे, पर त्रिपाठी नहीं आया। काफी देर बाद त्रिपाठी बिलकुल लुटा-पिटा सा दफ्तर में दाखिल हुआ। चपरासी ने उसे बता दिया कि सरोज जी कई बार पूछ चुके हैं और कहा है कि तुरंत अंदर भेज दो।

‘‘अच्छा ठीक है पहले पानी पिलाओ।’’ कहता हुआ त्रिपाठी कुर्सी में ऐसे धंसा जैसे कितने दिन का थका हुआ हो।

‘‘आ गए प्यारे !’’ बात चीत सुन कर सरोज जी केबिन से ख़ुद बाहर निकल आए, ‘‘कितने मेनहोल खुले हैं ?’’ सुन कर त्रिपाठी ने अपनी जेब से नोट बुक निकाली और बता दिया कि इतने हजार कुल मेनहोल हैं, इस में से इतने हजार का सर्वे किया जिन में से इतने हजार खुले हैं, इतने सौ चोक हैं, इतनी दुर्घटनाएं हुई हैं। वह पूरी फेहरिस्त खोल कर बैठ गया।

‘‘गुड !’’ सरोज जी त्रिपाठी की पीठ ठोंकते हुए बोले, ‘‘बस अब लिखी डालो प्यारे।’’ उन्हों ने जोड़ा, ‘‘आज की बाटम लीड यही रहेगी।’’

‘‘कुछ फोटो-वोटो भी तो करवा लो दादा।’’ त्रिपाठी टालता हुआ बोला।

‘‘फोटो हो गई है, बस तुम लिख डालो।’’

‘‘तो दादा, लिख तो अब आप लो।’’ त्रिपाठी अपने पांव खुद दबाता हुआ बोला, ‘‘मैं तो बहुत थक गया हूं। हां, आंकड़े और मुहल्ले आप नोट कर लीजिए।’’

‘‘हूं ?’’ एक लंबी सांस खींची सरोज जी ने, ‘‘तो कल लिख लाना।’’

‘‘कल की तो दादा, दे दीजिए छुट्टी। कल आराम करूंगा। बहुत थक गया हूं। अब की साप्ताहिक अवकाश भी तो नहीं लिया इस मेनहोल के चक्कर में।’’ कह कर उस ने सरोज जी से भी लंबी सांस छोड़ी। और कहा, ‘‘दादा इस को अब आप ही लिख लो।’’

‘‘अब आप की लंतरानी हम लिखें !’’ सरोज जी हांफने लगे, ‘‘जाइए आराम करिए।’’ और वह अपनी केबिन में घुए गए। त्रिपाठी उठ कर मंद-मंद मुसकुराता अभी चल ही रहा था कि अंगरेजी वाला एक रिपोर्टर आ कर त्रिपाठी को धर बैठा, ‘‘बॉस वो मेनहोल वाले आंकड़े हमें भी दे दीजिए और डिटेल्स भी।’’

‘‘तो आप को भी यही एसाइन हुआ है ?’’ त्रिपाठी उस की जेब से सिगरेट निकालता हुआ मुसकुराया।

‘‘नहीं, हमें यूं ही पता चला तो।’’

‘‘अच्छा-अच्छा।’’ त्रिपाठी खेलने के मूड में आ गया। बड़ी विनम्रता से बोला, ‘‘हम ने आंकड़े और डिटेल्स सरोज जी को दे दिए हैं, ख़बर वही लिख रहे हैं, उन्हीं के पास चले जाइए।’’

‘‘मेनी-मेनी थैंक्स !’’ कह कर वह अंगरेजी अख़बार का रिपोर्टर सरोज जी की केबिन में घुस गया। उस ने सरोज जी से खुले मेनहोल के आंकड़े मांगे। सरोज जी और चिढ़ गए। वह गरजे, ‘‘चले जाइए यहां से !’’ और वह बेचारा उलटे पांव उन की केबिन से बाहर आ गया। इस तरह सरोज जी के किस्सों में एक मेनहोल का यह किस्सा भी जुड़ गया।

संजय जब नया-नया लखनऊ आया था तो सब से पहले सरोज जी से ही पाला पड़ा। जिस दिन उस ने ज्वाइन किया, संपादक की केबिन में बैठे पहली ही नजर में वह उसे भड़ुआ सरीखे लगे थे। खद्दर के सलीकेदार गरम कपड़ों में बैठे बड़ी देर तक वह संजय की जी हुजूरी में लगे रहे। तब संजय को पता नहीं था कि यह सरोज जी हैं, इस अख़बार में विशेष प्रतिनिधि और रिपोर्टरों के इंचार्ज। इत्तफाक ही था कि संपादक को उसी रोज इलाहाबाद कि बनारस यूनिवर्सिटी के किसी सेमिनार में जाना था। शाम को आई॰ ए॰ एस॰ वर्सेज पी॰ सी॰ एस॰ पर संजय ने उस पहले दिन पहली ख़बर लिखी और मजबूरन सरोज जी को दी। सरोज जी ने ख़बर देखी। बोले, ‘‘गुड ! पहिले ही दिन बड़ी बढ़िया ख़बर मारि लाए।’’ पर दूसरे दिन उस ने देखा अख़बार में वह ख़बर छपी ही नहीं थी। दूसरी शाम संपादक के वापस आने पर उस ने यह बात बताई। तो संपादक ने सरोज जी से कहा, ‘‘इन की ख़बर रुकनी नहीं चाहिए।’’

‘‘आज ही दे देते हैं !’’ कह कर सरोज जी खिसक लिए ! पर ख़बर उन्हों ने नहीं दी तो नहीं दी। संपादक ने भी कहा कि, ‘‘जाने दीजिए।’’ पर सरोज जी तब से संजय की चमचई में लग गए। उन दिनों संजय प्रेस क्लब में ठहरा हुआ था। यह जानकर सरोज जी ने बड़ी चिंता जताई। बोले, ‘‘हम आप को मकान दिलवाते हैं। फर्स्ट क्लास, वो भी सरकारी।’’ वह संजय को ले कर यहां वहां लोगों से मिलवाने लगे। मुख्यमंत्री के यहां भी सरोज जी उसे ले गए। मुख्यमंत्री के यहां सरोज जी जब लगातार संजय की तारीफ करते रहे और रह-रह याद दिलाते रहे कि दिल्ली से आए हैं। ‘‘बहुत काबिल, बहुत तेज।’’ जैसे अलंकरण भी लगाते रहे। और जब बहुत हो गया तो मुख्यमंत्री ने कहा, ‘‘मैं जानता हूं सरोज जी।’’ इस के बाद संजय को सरोज जी के बारे में अपनी राय बदलनी पड़ी। उसे लगा उस ने सरोज जी को पहचानने में भूल की है। यह तो उसे बहुत बाद में पता चला कि सरोज जी त्रिपाठी से आपरेट हो रहे थे और भीतर ही भीतर उसे काटने में लगे थे। त्रिपाठी ने सरोज जी को समझा दिया था, ‘‘संजय कंपनी के चेयरमैन यानी मालिक का आदमी है और इसे जो गिराया नहीं दादा तो यह आप की कांग्रेस बीट, आप का रुतबा और कुर्सी खा जाएगा।’’ त्रिपाठी ने सरोज जी को बता दिया था कि, ‘‘आखि़र इसे दिल्ली से लाया ही इसी लिए गया है कि आप को काटा जा सके।’’

सरोज जी के साथ एक बड़ी कमजोरी यह थी कि उन से चाहे जो बीट ले ली जाए पर कांग्रेस नहीं। कांग्रेस को कवर कर के वह ख़ुद को सत्ता में बैठा हुआ पाते थे। और उन को लगता था कि एक न एक दिन वह एम॰ एल॰ सी॰ जरूर बन जाएंगे। उन की जिंदगी के दो ही सपने बाकी रह गए थे, एक संपादक बनने का सपना, दूसरा एम॰ एल॰ सी॰ बनने का सपना। और इस की ख़ातिर कोई इन के मुंह पर थूक भी दे तो भी वह उसे पोंछ कर फिर से तरो ताजा खड़े मिलते। तो कांग्रेस बीट उन की विवशता, उन की जरूरत, उन का सपना थी। वह उन से कोई छीन ले, उन्हें किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं था, मंजूर नहीं था। जाने यह उन की विवशता थी, आदत थी, नियति थी, वह संजय के खि़लाफ पहले ही दिन से साजिश में शामिल हो गए थे। पर साथ ही वह यह भ्रम भी जीते रहते कि संजय चेयरमैन का आदमी है सो सलीके से पेश आते। जिस दिन सरोज जी संजय को मुख्यमंत्री से मिलवा कर लाए, पूरे दफ्तर में इस की चरचा फैल गई। क्यों कि सरोज जी के चरित्र से यह परे था। कहा जाता था कि वह किसी के कटे पर पेशाब भी नहीं करने वाले आदमी थे। जैसे कि एक बार एक प्रेस कर्मचारी उन के घर के पास किसी विवाद में पड़ गया तो उस ने अपने को प्रेस का बताया और तसदीक के लिए सरोज जी का नाम ले लिया कि चाहें तो उन से पूछ लें। उसे सरोज जी के घर ले जाया गया। पर सरोज जी ने उसे पहचानने से साफ इंकार कर दिया। नतीजतन उस कर्मचारी पर शामत आ गई। उस की बड़ी पिटाई हुई। जब कि सरोज जी उसे बहुत अच्छी तरह जानते थे।

ऐसे ही एक बार एक दादा किस्म के रिपोर्टर मिश्रा ने सरोज जी से कुछ कहा सुनी के बाद उन्हें सीढ़ियों पर से ढकेल दिया तो विनय ने मिश्रा से टोका टाकी की। मिश्रा ने विनय को पीट दिया। विनय ने शिकायत की। जांच शुरू हुई जांच के दौरान विनय ने बताया कि मिश्रा ने चूंकि सरोज जी को सीढ़ियों पर से ढकेल दिया था, सरोज जी की धोती खुल गई, मुंह फूट गया। सरोज जी चूंकि बुजुर्ग हैं, उन की मदद करना उस का फर्ज था सो उस ने मिश्रा को टोका। टोकने पर मिश्रा ने उस की भी पिटाई कर दी। साक्ष्य के लिए सरोज जी बुलाए गए। सरोज जी ने बयान दिया कि उन को किसी ने कभी सीढ़ियों पर से ढकेला ही नहीं। रही बात मुंह फूटने की तो वह घर में बाथरूम में फिसल कर गिर गए थे। विनय खिसिया कर रह गया। सरोज जी दरअसल थे ही बड़े विचित्र जीव। एक बार मनोहर, प्रकाश और संजय शाम को दफ्तर के बाहर गेट पर बैठे सड़क पर आती जाती औरतों को घूर रहे थे। मनोहर बोला, ‘‘अगर इन औरतों की देह पर कोई केमिकल लगा कर जांच की जाय तो सब से ज्यादा संजय की आंख के निशान मिलेंगे।’’ प्रकाश ने पूछा, ‘‘कैसे ?’’

‘‘देख नहीं रहे हो कि कोई औरत आ रही है तो जहां तक इस की आंख का कैमरा पहुंचता है, वहीं से यह उस औरत को रिसीव करता है और जहां तक इस की आंख का कैमरा पहुँचता है, पलट कर पूरा लांग शाट लेते हुए उसे सी आफ कर के ही छोड़ता है।’’ मनोहर अभी बतिया ही रहा था कि सरोज जी आते दिख गए। प्रकाश बोला, ‘‘लो संजय, एक नई चीज रिसीव करो।’’ संजय ने सरोज जी को देखा और कहा, ‘‘क्या बेवकूफी की बात करते हो।’’ फिर भी तीनों सरोज जी की ही ओर देखने लगे। सरोज जी हरदम पैदल ही सारा लखनऊ धांग मारते थे। उस दिन भी पैदल ही खड़बड़-खड़बड़ चले आ रहे थे। बिलकुल किसी खच्चर की तरह। जब वह करीब आ गए तो तीनों ने एक साथ सरोज जी को नमस्कार किया। पर सरोज जी उन तीनों के नमस्कार की परवाह किए बगैर आगे बढ़ गए। ऐसे जैसे उन्हों ने उन तीनों को देखा ही न हो। वह कुछ दूर आगे बढ़े ही थे कि अचानक एक आदमी दूसरी तरफ से बड़ी तेजी से हाथ उठाए आया और पलट कर सरोज जी की पीठ पर कस कर हाथ मारा। सरोज जी पर उस का प्रहार इतना जबरदस्त था कि सरोज जी लड़खड़ा गए, लगा कि वह गिर जाएंगे। मनोहर, प्रकाश और संजय तीनों सरोज जी की तरफ दौड़े। पर दृश्य फिर दंग करने वाला था, सरोज जी ने पलट कर पीछे देखा ही नहीं, वह ऐसे आगे बढ़ गए, जैसे उन के साथ कुछ घटा ही नहीं, जब कि उन के पीछे तब तक ठीक-ठाक भीड़ इकट्ठी हो गई थी। सड़क पर जो जहां था, दौड़ कर आया। मनोहर चिल्लाया भी, ‘‘सरोज जी !’’ पर सरोज जी उसे भी अनसुना कर दफ्तर के गेट में घुस गए। बाद में पता चला कि सरोज जी की पीठ पर मारने वाला एक पागल किस्म का आदमी था, जो जब तब किसी न किसी को मार देता था। एक पान वाले ने यह बताया तो मनोहर उबल पड़ा, ‘‘पर सरोज जी को तो यह बात नहीं मालूम कि वह पागल है, और कि पागल ने ही मारा है। हम लोग तो उन के लिए दौड़ कर गए। पर उन्हों ने तो पलट कर देखा तक नहीं।’’ मनोहर बड़ी देर तक नाराज रहा। उस की नाराजगी इस पर भी थी कि सरोज जी के चक्कर में अभी-अभी सुलगाई सिगरेट भी उसे फेंकनी पड़ी थी।

खै़र, उस दिन जब सरोज जी संजय को मुख्यमंत्री से मिलवा कर आए तो पूरे दफ्तर में यह चरचा पूरे शबाब पर थी। हर कोई संजय से यही पूछता रहा, ‘‘सुना है सरोज जी मुख्यमंत्री से मिलवा लाए ?’’ सुन-सुन कर संजय के कान पक गए। सिर्फ मनोहर ने सवाल बदला। बोला, ‘‘मुख्यमंत्री ने तुम को केला खिलाया कि नहीं ?’’

‘‘क्या मतलब ?’’ संजय बिदका।

‘‘इस में नाराज होने की क्या बात है ?’’ मनोहर ने जोड़ा, ‘‘सरोज जी को तो मुख्यमंत्री केला खिलाते हैं।’’

‘‘आप लोग भी !’’ संजय बिफरा, ‘‘मैं प्रधानमंत्री से मिल चुका हूं।’’ वह बोला, ‘‘तो फिर मुख्यमंत्री से मिलना कौन सी बड़ी बात है, मैं अकेले भी मिल सकता था, गलती हुई जो सरोज जी के साथ चला गया।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘बाई द वे मुख्यमंत्री मुझे दिल्ली से ही जानते हैं। मैं पहले भी उन से कई बार मिल चुका हूं। वह कोई टैबू नहीं हैं।’’

‘‘मैं ने कब कहा टैबू हैं और कि तुम मिल नहीं सकते।’’ मनोहर खेलने के मूड में था, ‘‘मैं ने तो सिर्फ यह पूछा कि मुख्यमंत्री ने तुम्हें भी केला खिलाया कि नहीं ?’’

‘‘यह केले की क्या कहानी है ?’’ संजय बोला, ‘‘जरा बताइए तो सही।’’ वह अब सहज हो रहा था।

‘‘बताइए पंडित जी। इन को सरोज जी को मुख्यमंत्री द्वारा केले खिलाने की कहानी सुनाइए।’’ मनोहर ने वहीं बैठे त्रिपाठी से कहा। और अपने आगे रखी ख़बरें जांचने लगा।

‘‘यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं है।’’ त्रिपाठी बोला, ‘‘छपी हुई है, बकलम सरोज जी। चाहो तो पुरानी फाइल निकाल कर देख सकते हो।’’ त्रिपाठी नमक मिर्च लगा कर चालू हो गया, ‘‘हुआ यह कि पिछले चुनाव में सरोज जी मुख्यमंत्री के साथ हेलीकाप्टर में उन के चुनाव क्षेत्रा की रिपोर्ट करने गए। अब चूंकि उन्हें रिपोर्ट में चुनावी गणित बताने से ज्यादा जरूरी लगा कि वह मुख्यमंत्री के साथ हेलीकाप्टर में गए, यह बताएं। सो उन्हों ने आधी रिपोर्ट में हेलीकाप्टर वर्णन किया। उस में यह भी जिक्र किया कि वह मुख्यमंत्री के बगलगीर थे। मुख्यमंत्री जब केला खाने लगे तो सरोज जी से अनुरोध किया कि ‘‘ले लीजिए।’’

‘‘नहीं। आप खाइए।’’ सरोज जी ने कहा।

‘‘ले लीजिए।’’ मुख्यमंत्री उवाच।

‘‘नहीं, आप।’’ कह कर सरोज जी सकुचाए।

‘‘ले लीजिए सरोज जी।’’ मुख्यमंत्री का फिर अनुरोध।

‘‘नहीं।’’ सरोज जी फिर सकुचाए।

‘‘अब ले भी लीजिए सरोज जी।’’ इस तरह मुख्यमंत्री ने जब बहुत जोर दिया तो सरोज जी पिघल गए और जैसा कि उन्हों ने रिपोर्ट में लिखा, ‘‘और मैं ने केला ले लिया।’’ त्रिपाठी सारा वाकया बताते हुए बोला, ‘‘अक्षरशः सत्य है।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘सरोज जी ने जो अपनी रिपोर्ट में लिखा है।’’

‘‘अब तुम बताओ कि मुख्यमंत्री ने तुम्हें भी केला खिलाया कि नहीं ?’’ मनोहर ख़बरें जांचता हुआ बोला।

‘‘मैं कोई हेलीकाप्टर में तो मुख्यमंत्री से मिला नहीं ?’’ संजय भी खेल में शामिल होता हुआ बोला। और उठ कर वहां से चलने लगा। बोला, ‘‘जब हेलीकाप्टर में मिलूंगा तो खा लूंगा।’’

‘‘मुख्यमंत्री का केला !’’ त्रिपाठी डबल मीनिंग डायलाग पर आ गया। पर संजय ने उसे टोका नहीं। अलबत्ता उसे रीना की याद आ गई जो अक्सर उसे टोकती रहती, ‘‘डबल मीनिंग नहीं !’’ संजय अभी सोच ही रहा था कि त्रिपाठी फिर बोला, ‘‘केला खा लेना तो बताना जरूर। चुपचाप गोल मत कर जाना।’’

‘‘क्या ?’’ मनोहर ने टोका।

‘‘वही मुख्यमंत्री का केला !’’ त्रिपाठी मनोहर से आंख मारता हुआ बोला।

संजय को बार-बार त्रिपाठी का ‘‘मुख्यमंत्री का केला’’ कहना बुरा लगा पर वह उलझने के बजाय वहां से चुपचाप चल दिया। चलते-चलते उस ने सोचा कि त्रिपाठी या तो बहुत बढ़ा चढ़ा कर सरोज जी की रिपोर्ट और ‘‘मुख्यमंत्री का केला’’ बखान रहा है या फिर सरोज जी ने रिपोर्ट ही बहुत बढ़ा चढ़ा कर लिखी होगी। अब त्रिपाठी और सरोज जी दोनों ही चूंकि एक ही डाल के पत्ते थे, एक ही मानसिकता, एक ही सोच और एक ही सिक्के के दो पहलू थे, इस लिए दोनों में से कौन अति पर है यह तय कर पाना संजय को मुश्किल लगा। साथ ही उस ने सोचा कि सरोज जी तो कुछ भी कर सकते हैं। कभी भी, कुछ भी। सारी कल्पनाओं, परिकल्पनाओं और परंपराओं को धूल चटा सकते हैं।

संजय को लखनऊ आए अभी गिनती के कुछ ही दिन हुए थे। सरोज जी ने जब से उस की पहले ही दिन, पहली ख़बर रोकी थी, बेवजह ही, तब ही से वह उन के प्रति पूर्वाग्रही हो गया था। वह उन को एक बेवकूफ से ज्यादा कुछ नहीं समझता था। इस बात का वह सरोज जी को पूरी कोशिश कर के एहसास भी दिला देता था और बार-बार। उस के व्यवहार में क्षण-क्षण सरोज जी के प्रति उपेक्षा उपजती रहती। वह ऐंठा-ऐंठा सा पेश आता उन से। जाहिर है सरोज जी को यह सब हरगिज नहीं सुहाता था। संजय के सामने यदा-कदा वह भी अकड़ जाते। संजय फिर भी उन की परवाह नहीं करता। सरोज जी ने संपादक से उस की शिकायत भी की तो संपादक ने उन से कह दिया कि, ‘‘कोई काम करने वाला आदमी आता है तो उस के भी पीछे मत पड़ा करिए सरोज जी।’’ सरोज जी को यह बात लग गई। पहले तो वह ऐंठे। पर फिर उन के मन में संजय के प्रति जाने कहां से स्नेह उमड़ आया। दरअसल सरोज की ख़़ूबी कहिए या ख़ामी वह यही थी कि वह कब आप पर कृपालु हो जाएं और कब कुपित कुछ ठिकाना नहीं होता था। पता चलता कि सुबह वह आप पर ढेर सारा स्नेह उडेल दें और उसी शाम वह आप पर बरस पड़ें, सरे आम आप को बेइज्जत कर दें। यह अंतराल सुबह से शाम के बजाय पांच मिनट का भी हो सकता था। फोटोग्राफर सुनील कहता भी था कि, ‘‘दादा को तो चढ़ने के लिए हर हफ्ते एक आदमी चाहिए। बिना इस के उन की भांग हजम नहीं होती।’’ सुनील चूंकि स्ट्रिंगर फोटोग्राफर था इस लिए सरोज जी को सब से गरीब वही मिलता और अक्सर वह अपनी भांग उसी पर बरस कर हजम करते। वह सुनील से कभी चांदनी रात में गोमती नदी की फोटो तो कभी सावन में नाचते मोर की फोटो मांगते ही रहते जो वह कभी दे नहीं पाया। सुनील जो एक पूर्व विधायक का बेटा था और सरोज जी के ही जिले का रहने वाला था। सो सरोज जी अपने जिले का होने के नाते उस पर कभी तो स्नेह बरसाते तो कभी कुपित हो कर उस की ऐसी तैसी कर डालते। कह देते, ‘‘अब आप ऐसे नहीं चल पाएंगे हियां।’’ लगभग ऐसे ही उस रोज संजय से वह बोले, ‘‘आइए आज आप को हम दिखाएं कि लखनऊ में हमारी कितनी प्रतिष्ठा है !’’ उन के इस कहने में स्नेह भी था और कोप भी। स्नेह इस बात के लिए था कि ‘‘आइए आप लखनऊ में हमारी प्रतिष्ठा देखिए’’ और कोप इस बात के लिए था कि ‘‘तुम हमें कुछ समझते क्यों नहीं हो ?’’

संजय को लखनऊ आए चूंकि गिनती के ही कुछ दिन हुए थे। और सरोज जी का व्यवहार घटते बढ़ते चंद्रमा की तरह लगातार उन्हें पहेली बनाता जा रहा था इस लिए सहसा उन का यह आमंत्रण पा कर वह उलझन में पड़ गया कि वह क्या करे ? पूछा, ‘‘बात क्या है सरोज जी ?’’ सरोज जी को संजय की यह बात भी बहुत बुरी लगती थी कि वह उन्हें ‘‘सरोज जी’’ क्यों कहता है ? और सब की तरह, ‘‘दादा’’ क्यों नहीं कहता? पर सरोज जी आज यह सारी शिकायत जैसे भूल जाना चाहते थे। कुर्सी में धंसे बैठे, गर्दन धंसाए बोले, ‘‘एक सम्मान समारोह है, वहीं आप को ले चलना चाहता हूं।’’

‘‘आप का है ?’’ पूछते हुए संजय ने अपने शब्दों में थोड़ी सी मिठास घोली और बोला, ‘‘बधाई हो।’’

‘‘नहीं।’’ सरोज जी थोड़ा मायूस हुए, मुसकुराए, खिसियाते हुए बोले, ‘‘मुझे अध्यक्षता करनी है।’’ कह कर उन्हों ने जेब से एक कार्ड निकाला और संजय की ओर बढ़ा दिया। संजय ने कार्ड देखा और मेज पर रखते हुए कहा, ‘‘सरोज जी आप को इस समारोह में नहीं जाना चाहिए।’’

‘‘क्यों ?’’ सरोज जी अचकचा गए।

‘‘आप वहां जा कर अपनी बेइज्जती करवाएंगे।’’ संजय ने साफ तौर पर कह दिया।

‘‘अइसा का हो गया ?’’ सरोज जी जिज्ञासा में मुंह बा कर बोले। लगा जैसे उन के प्राण निकल जाएंगे।

‘‘आप इस व्यक्ति को जानते हैं जिस का सम्मान हो रहा है ?’’ संजय ने पूछा।

‘‘हां।’’ सरोज जी हड़बड़ाए, ‘‘कवि है।’’

‘‘कवि नहीं है वह, यही तो बात है।’’ संजय बोला, ‘‘कविता के नाम पर कलंक है यह।’’

‘‘हुईं !’’ सरोज जी चौंक पड़े। बोले, ‘‘आप कइसे जानते हैं ?’’

‘‘यह जो महेंद्र मधुकर है, हमारे जिले का ही है।’’ संजय बोला, ‘‘इस लिए जानता हूं और अच्छी तरह जानता हूं।’’

‘‘तो इ कवि नहीं है ?’’

‘‘बिलकुल नहीं है।’’

‘‘पर हम को तो कविता की अपनी किताब दई गया है।’’ सरोज जी ने आंखें चौड़ी कर यह बात ऐसे कहीं जैसे कोई पानी की थाह लेने के लिए उस में कंकड़ फेंके।

‘‘हां, दे गया होगा।’’ संजय बोला, ‘‘चार कविताओं में गोता मार कर कविता निकाल लेने में महारथ है उसे।’’

‘‘मतलब कविता लिखता है ?’’ सरोज जी खुश होते हुए बोले, ‘‘अऊर ई गोतामारी तो बहुत कवि करते हैं। बड़े-बड़े कवि, महाकवि करते हैं।’’

‘‘हां, पर वह महाकवि लोग अंगरेजी में गोतामारी कहते हैं। पर यह तो हिंदी में ही गोतामारी करता है। कभी-कभी तो पूरी की पूरी कविता ही कुछ शब्दों के हेर फेर के साथ पार कर लेता है।’’ संजय बोला, ‘‘बात यहीं तक हो तो गनामत है। पर यह मधुकर तो कवि सम्मेलनों में आप मंच पर बैठे रहिए, आप के सामने ही आप की कविता पढ़ डालेगा, ख़़ूब वाहवाही लूटेगा और वापस आ कर आप के पांव छू लेगा कह देगा कि भाई साहब क्षमा कीजिएगा जरूरत पड़ गई थी। और कभी-कभी तो आप की कविता आप ही को समर्पित कर पढ़ डालेगा।’’

‘‘हुईं।’’ सरोज जी बिदके, ‘‘बड़ा रागिया है।’’

‘‘और आप उस के सम्मान समारोह में अध्यक्षता करने जा रहे हैं।’’ संजय ने जोड़ा, ‘‘वह कविताओं की चोरी तो करता ही है, निजी जिंदगी भी उस की छल, कपट, धूर्तई और नीचता से सनी पड़ी है।’’

‘‘संजय जी आप को चलना तो पड़ेगा एह समारोह में।’’ सरोज जी बड़े आग्रह के साथ बोले, ‘‘ई समारोह में ख़ाली महेंद्र मधुकर का सम्मान भर नाहीं है। एह मां शहर के अऊर भी बहुत लोगों का सम्मान होना है।’’ उन्हों ने जोड़ा, ‘‘सिर्फ एक आदमी के गड़बड़ होने भर से ही पूरा समारोह तो गड़बड़ नहीं हो जाएगा।’’

‘‘तो आप जाएंगे इस समारोह में ?’’

‘‘जाना तो पड़ेगा।’’ सरोज जी बोले, ‘‘सब अपने शिष्य हैं। बड़े आग्रह से बुलाइ गए हैं। नहीं जाएंगे तो उन का दिल टूट जाएगा।’’ कह कर वह कार्ड उठा कर दिखाने लगे, ‘‘अब नाम भी हमारा छाप दिया है। हम नहीं जाएंगे तो बेचारे उदास हो जाएंगे। फिर ऐन वक्त पर कहां ढूंढेंगे अध्यक्ष ?’’ कह कर सरोज जी ने आंखें गज भर फैला दीं, ‘‘अब जाना तो पड़ेगा।’’

‘‘आप जाइए, पर मैं नहीं चलूंगा।’’ संजय खिन्न हो कर बोला।

‘‘नहीं संजय जी, आप को भी चलना पड़ेगा।’’ कह कर सरोज ने उस का हाथ थाम लिया। संजय विवश हो गया। आदत और रवायत के खि़लाफ सरोज ने रिक्शा रोका, संजय से ‘‘पहले आप, पहले आप’’ कह कर रिक्शे पर बिठाया, ख़ुद बैठे और लाल बारादरी जो समारोह स्थल था, बता कर रिक्शे वाले से बोले, ‘‘चलो।’’
रिक्शा चल पड़ा।

रास्ते भर दोनों चुप रहे। सरोज जी मारे खुशी के और संजय मारे खिन्नता के।

खिन्न था वह महेंद्र मधुकर के सम्मान समारोह में जाते हुए। मधुकर जो सिरे से फ्राड था। संजय ने महेंद्र मधुकर को पहली बार अपने शहर के एक रेस्टोरेंट में देखा था। तब वह पढ़ता था, तभी एक लड़की के प्यार में मुब्तिला उसे कविता से भी मुहब्बत हो गई थी। वह कविताएं तो लिखने ही लगा था, बातचीत भी वह कविताओं, शेर और मुक्तकों में करता था। कविताओं का जुनून सा सवार था उस पर उन दिनों। वह इमर्जेंसी के दिन थे। इमर्जेंसी के दिनों में आलम यह था कि कवि अपनी घुटन और हताशा साफ-साफ बयान करने के बजाय प्रेम कविताओं की शरण लेते थे। इमर्जेंसी की ज्यादतियों को बिंबों में बांध कर वह प्रेमिका की ज्यादतियों में ढालते और प्रतीकात्मक विरोध दर्ज करते। यह जैसे उन दिनों की कविताओं की परंपरा हो गई थी। कवि, प्रेमिका की आंखों में प्यार, उपेक्षा, उदासी, खुशी देखने के बजाय उस की आंखों के अंगार, अहंकार और फट पड़ने वाला आसमान देखते और आह भरते हुए उसे ऐसे दुत्कारते जैसे व्यवस्था को, इमर्जेंसी को ललकार रहे हों। पर सब कुछ बिंबों, प्रतीकों में। साफ-साफ कुछ भी नहीं। उन दिनों विशुद्ध प्रेम कविताएं लिखने वालों की भी इस चक्कर में दुर्गति हो जाती। जैसे एक बार संजय की ख़ुद की दुर्गति हो गई। आकाशवाणी द्वारा आयोजित एक स्टूडियो गोष्ठी में जब उस ने एक लंबी प्रेम कविता की पांच-सात पंक्तियां ही पढीं ‘‘आंखें/तुम्हारी आंखें/उदास, सूनी बेचैन और बीमार आंखें/जिनमें मैं/एक छोटी सी, उजली सी/खुशी की एक किरन तलाशना चाहता हूं/सिर्फ अपने लिए।’’ यह पंक्तियां सुनते ही रिकार्डिंग करने वाले अधिकारी ने तुरंत रिकार्डिंग रोक दी। बोला, ‘‘यह उदास सूनी, बेचैन बीमार आंखें नहीं चलेंगी।’’

‘‘क्यों ?’’ संजय ने पूछा।

‘‘क्यों कि इस में इमर्जेंसी की आलोचना है।’’ अधिकारी बोला, ‘‘कोई खुशी की कविता हो वह पढ़िए। इस को रहने दीजिए। यह नहीं चलेगी। बिलकुल नहीं।’’

‘‘पर इस कविता का इमर्जेंसी से क्या लेना देना ? यह तो विशुद्ध प्रेम कविता है!’’ संजय हैरान होता हुआ बोला। कुछ और साथी कवियों ने संजय की पैरवी की। पर वह अधिकारी नहीं माना। कहने लगा, ‘‘दूसरी कविता पढ़िए।’’

‘‘पर मेरे पास दूसरी कविता नहीं है।’’ संजय खीझ कर बोला।

‘‘तो इसी कविता से वह उदास, सूनी, बेचैन जैसे शब्द हटा दीजिए।’’ वह अधिकारी बोला।

‘‘यह तो नहीं हो सकता।’’ संजय ने साफ-साफ अधिकारी से कहा।

‘‘क्यों ?’’

‘‘क्यों कि कविता की ध्वनि उस का मकसद, उस की बुनावट, शिल्प और उस की आत्मा मर जाएगी। क्यों कि इस कविता में आगे और भी ऐसे शब्द आएंगे।’’ संजय बिफरता हुआ बोला, ‘‘कहां-कहां और क्या-क्या बदलूंगा ?’’

‘‘कुछ भी हो।’’ वह अधिकारी बोला, ‘‘यह कविता नहीं चलेगी। मैं अपनी नौकरी ख़तरे में नहीं डाल सकता।’’ बात जब नौकरी की आ गई तो संजय चुप हो गया। वह घर जा कर अपनी कविताओं की कापी उठा लाया और उस में से दो तीन छोटी-छोटी कविताएं उस अधिकारी को दिखाता हुआ बोला, ‘‘इन से तो नौकरी नहीं जाएगी आप की ?’’

‘‘नहीं।’’ कविताएं देखता हुआ वह अधिकारी बोला, ‘‘अच्छी है। इन्हें कहीं छपने के लिए भेज दीजिए।’’

‘‘छप चुकी हैं धर्मयुग में।’’ बताते हुए संजय चहका।

‘‘तब तो यह भी नहीं चलेंगी।’’

‘‘क्यों ?’’ संजय उबल पड़ा, ‘‘अब क्या हो गया ?’’

‘‘छपी हुई भी नहीं चलेंगी।’’

‘‘ओफ !’’ कह कर संजय ने सिर पकड़ लिया। बोला, ‘‘तो फिर मुझे आज्ञा दीजिए। क्यों कि इस कापी में लिखी लगभग सारी कविताएं कहीं न कहीं छपी हुई हैं।’’ वह अधिकारी अंततः मान गया कि, ‘‘कोई भी कविता पढ़ दीजिए। बस इमर्जेंसी का विरोध नहीं।’’ उस दिन उस ने देखा कि बाकी तीन कवियों में से दो ने परिवार नियोजन, पेड़ लगाने जैसे नारों पर ‘‘कविताएं’’ गा-गा कर पढ़ीं और तीसरे ने कइन, गौरैया, फूल, पत्ते जैसी बिंब विधान वाली कविताएं पढ़ीं।

सचमुच उन दिनों कविताओं की तो छोड़िए सार्वजनिक जगहों, चाय या पान की दुकानों पर इमर्जेंसी या सरकार के खि़लाफ कुछ कहना, या कोई भी उत्तेजित करने वाली बात करना गुनाह क्या अपराध माना जाता था। उन तनाव और घुटन भरे दिनों में यह महेंद्र मधुकर उस रोज रेस्टोरेंट में सिगरेट फूंकता एक से एक खौलते हुए शेर सरेआम सब को सुना रहा था। उस के शेर सुनने वालों की संख्या दो से चार, चार से दस, दस से बीस होती जा रही थी। वह शेर भी गजब के पढ़ रहा था और बिलकुल झूम के, ‘‘कैसे-कैसे मंजर सामने आने लगे हैं/गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं/अब तो इस तालाब का पानी बदल दो/ये कंवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।’’ शेर बिलकुल ताजा हवा के झोंके की मानिंद थे। संजय और उस के साथी महेंद्र मधुकर की बेंच के पास जा कर खड़े हो गए। वह शेर पढ़े जा रहा था, ‘‘सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए/मेरे सीने में हो या तेरे सीने में सही हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।’’

संजय और उस का साथी राय, मधुकर से बड़ा प्रभावित हुए। और उस से बड़ी गर्मजोशी से मिले। राय ने कहा, ‘‘बड़ी हिम्मत का काम है इस तरह खुले आम ऐसे शेर पढ़ना। हम लोग आप को बधाई देना चाहते हैं।’’ कहते हुए राय ने पूछा,‘‘यह शेर बाई द वे हैं किस के ?’’

‘‘ये ख़ुद ही मशहूर कवि हैं।’’ मधुकर के पास बैठा एक मरियल सा व्यक्ति उस की तारीफ करता हुआ बोला।

‘‘ख़ाकसार को महेंद्र मधुकर कहते हैं।’’ वह राय की ओर हाथ बढ़ाते हुए बोला, ‘‘आप साहबान की तारीफ ?’’

‘‘हम लोग छात्र हैं। यूनिवर्सिटी में हैं।’’ कहते हुए राय ने फिर पूछा, ‘‘यह शेर किस के हैं ?’’

‘‘मैं अपने ही पढ़ता हूं। सिगरेट का धुआं उड़ाते हुए मधुकर बोला, ‘‘दूसरों के शेर पढ़ना मेरी आदत नहीं। अपनी तौहीन समझता हूं।’’

‘‘तो आप को डबल बधाई।’’ राय मधुकर से दुबारा हाथ मिलाते हुए बोला, ‘‘एक इतना जिंदा, धड़कता हुआ शेर लिखने के लिए, दूसरे इस तरह इसे सरेआम सुनाने के लिए।’’ राय ने जोड़ा, ‘‘इस के लिए बड़ा भारी कलेजा होना चाहिए। बधाई, बहुत-बहुत बधाई।’’

‘‘शुक्रिया।’’ दोनों हाथ जोड़ कर माथे से लगाते हुए मधुकर बोला, ‘‘यहां तो ख़ून से लिखते हैं, और आवाम की धड़कन बन कर जीते हैं।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘आवाम जो चाहती है उस से दो कदम आगे की हम सोचते हैं, ख़ून पसीना जलाते हैं तब जा कर कहीं एक रचना कागज पर शक्ल अख़्तियार करती है। हम उसे ख़ून पसीने से सींचते हैं, अपने आप को निचोड़ डालते हैं तब कहीं जा कर आप सब की ‘‘वाह’’ मिलती है।’’ कह कर उस ने माथे पर आया पसीना रूमाल से पोंछा और लगे हाथ उस ने तीन शेर और सुना दिए, ‘‘आहों में जो पाया है गीतों में दिया है/इस पर भी सुना है कि जमाने को गिला है/हम फूल हैं औरों के लिए लाए हैं खुशबू/अपने लिए ले दे के बस इक दाग मिला है।’’ सुनाते हुए वह बोला, ‘‘शेर सुनिएगा कि, जो साज से निकली है वह धुन सब ने सुनी है/जो तार पे गुजरी है, वो किस दिल को पता है।’’ सुना कर वह अभी कुछ बोलता कि एक मजनूनुमा बूढ़ा झूमा। बोला, ‘‘यह तो फिल्मी गाना है। तलत महमूद ने गाया है।’’

‘‘हां, पर लिखा साहिर लुधियानवी ने है।’’ मधुकर ने तुरंत पैंतरा बदल लिया, ‘‘और क्या लिखा है साहब कि, ‘‘जो तार पे गुजरी है वो किस दिल को पता है ?’’ वह बोला, ‘‘तो साहब, यह हम कवियों का दिल ही जानता है कि कहां-कहां से गुजर कर, क्या क्या जी कर लिखना पड़ता है।’’ रूमाल से पसीना पोंछता हुआ वह बोला, ‘‘फिर भी हमें दाग मिलता है, क्यों कि हम फूल हैं। और फूल कि नियति है सब को खुशबू देना। और अपने हिस्से दाग लेना।’’

‘‘अच्छा परिभाषित किया है आप ने।’’ संजय बोला, ‘‘और आप के कहने का अंदाज भी ख़ूब है।’’

‘‘आप नौजवानों से मिल कर खुशी हुई।’’ कहते हुए उस ने सिगरेट का लंबा कश खींचा और उतना ही लंबा धुआं भी फेंका। बोला, ‘‘कभी घर पर मिलिए।’’ उस ने अपना पता भी लिख कर दिया। और कहा कि, ‘‘कभी आएं जरूर। खुशी होगी।’’

‘‘हम लोग भी कविताएं लिखते हैं।’’ राय शर्माते हुए बोला।

‘‘तो इस में शर्माने की क्या बात है ?’’ मधुकर बोला, ‘‘कभी किसी कवि गोष्ठी या सम्मेलन में नहीं दिखे आप लोग ?’’ मधुकर उन दोनों को ख़ारिज करता हुआ बोला।

‘‘पर हमारी कविताएं छपी हैं।’’ कह कर संजय ने कुछ पत्रिकाओं के नाम गिना दिए।

‘‘गुड !’’ मधुकर बोला, ‘‘पर सिर्फ छपने भर से तो काम नहीं चलेगा।’’ सिगरेट का धुआं फेंकता हुआ वह बोला, ‘‘जनता के बीच आना पड़ेगा। नहीं बंद कमरे में कविता लिखने और छप जाने का क्या मतलब है ?’’ वह बोला ‘‘परसों डाक्टर साहब के यहां कवि गोष्ठी है। अरे वही होम्योपैथी वाले, उन्हीं के यहां, आप लोग आइए।’’

उस गोष्ठी में राय और संजय बड़ी तैयारी से गए। मधुकर ने उन दोनों का वहां उपस्थित कवियों से परिचय कराया। पर संजय ने गौर किया कि किसी ने भी उन दोनों की नोटिस नहीं ली। गोष्ठी क्या थी चू-चू का मुरब्बा थी। दो तीन को छोड़ कर किसी ने कभी कायदे की कोई कविता नहीं पढ़ी। दो तीन कवि तो सरस्वती वंदना में ही लगे रहे। कोई अमराइयों तो कोई गोइयां, सइयां के गीत गाता रहा। संजय ऊब सा गया। संजय और राय ने भी दो-दो कविताएं पढ़ीं। यूनिवर्सिटी के एक अध्यापक ने, ‘‘बहुत सुंदर, बहुत सुंदर’’ कहा। पर बाकी ‘‘अच्छा प्रयास है।’’ कह कर चुप हो गए। मधुकर के कविता पढ़ने की जब बारी आई तो राय ने उस से रेस्टोरेंट वाले शेर पढ़ने का अनुरोध किया। कहा कि, ‘‘मधुकर जी वही सुनाइए।’’ पर मधुकर टाल गया। बोला, ‘‘जनता के बीच जनता की बात, कवियों के बीच कवियों की बात।’’ कहते हुए खानाबदोशी पर कविता पढ़ने लगा। गोष्ठी में संजय और राय को बिलकुल मजा नहीं आया। कम से कम जिस तैयारी से वह दोनों गए थे, उस हिसाब से तो बिलकुल नहीं। हां, खाने पीने की व्यवस्था उन्हें अच्छी लगी।

बाद में मधुकर उन दोनों को कवि सम्मेलनों में भी बुलवाने लगा। कवि सम्मेलनों से पैसा भी मिलता। जो उन दोनों की जेब खर्च के काम आता। कुछ दिनों बाद संजय ने सारिका में वही शेर दुष्यंत कुमार के नाम से छपे देखे जो मधुकर ने उस दिन रेस्टोरेंट में सुनाए थे और ख़ूब दाद बटोरी थी। संजय ने राय को वह पत्रिका दिखाई तो वह बोला, ‘‘यह तो साला पक्का चोर निकला।’’ राय बोला, ‘‘चलो आज उस के यहां चलते हैं, उस दिन साले को दाद ही थी, आज खाज दे देते हैं।’’

वह दोनों उस शाम मधुकर के यहां वह पत्रिका ले कर पहुंचे तो उस ने बड़ी आवभगत की। कुछ देर के लिए दोनों उस से असली बात करने से टालते रहे। पर राय ज्यादा देर नहीं टाल पाया। पत्रिका दिखाते हुए वह बोला, ‘‘मधुकर जी आपकी गजलें इस में छपी हैं। पर ?’’

‘‘पर दुष्यंत कुमार के नाम से छपी हैं।’’ मधुकर बोला, ‘‘वह गजलें हैं ही दुष्यंत की।’’ उस ने सिगरेट का धुआं छोड़ा, ‘‘क्या लिखता है, कलेजा निकाल लेता है।’’

‘‘पर उस दिन तो आप अपने शेर बता रहे थे।’’

‘‘कब कहा कि वो शेर मेरे लिखे हैं ?’’ वह बोला, ‘‘हां !’’ माथे पर हाथ फिराते हुए वह कहने लगा, ‘‘वह शेर अब हम सब के हैं, हम सब की धड़कन हैं। कोई भी उन्हें पढ़ सकता है, सुना सकता है, क्यों कि हम सब उसी दौर से गुजर रहे हैं, उसी तकलीफ, उसी घुटन, संत्रास और सांघातिक तनाव से गुजर रहे हैं, जिस से वह शेर गुजर रहे हैं। दुष्यंत की आवाज हम सब की आवाज है।’’

‘‘पर मधुकर जी यह तो चोरी है।’’ राय ने जोर दे कर कहा।

‘‘क्या हम ने अपने नाम से छपवा लिया ?’’ मधुकर बोला, ‘‘शेर पढ़ना चोरी नहीं है। और ये खौलते हुए शेर पढ़ना, सार्वजनिक तौर पर पढ़ना वो भी आज के दौर में आसान है क्या ? है किसी का जिगरा, है किसी में हिम्मत ? शेर दुष्यंत का सही पर उसे पढ़ कर मैं ने लोगों को झिंझोड़ा, यह क्या कम है ?’’ कहते हुए वह बोला, ‘‘लो सिगरेट पियो।’’ और उस ने सिगरेट की डिबिया दोनों की ओर बढ़ा दिया।

‘‘नहीं, मैं सिगरेट नहीं पीता।’’ संजय हाथ जोड़ते हुए बोला।

‘‘सिगरेट नहीं पिएंगे, शराब नहीं पिएंगे और कविता लिखेंगे ?’’ वह आंख मटकाता हुआ बोला, ‘‘यह तो नहीं हो पाएगा।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘मीर, गालिब, फिराक, फैज सब ने पी। बिना पिए किसी का गुजारा नहीं हुआ।’’

‘‘हम लोग पीने नहीं, आप की चोरी की चरचा करने आए हैं।’’ राय बोला, ‘‘आप को कवि कहलाने का हक नहीं है।’’

‘‘तो अब आप हमें कवि होने का सर्टिफिकेट देंगे ?’’ मधुकर उबला, ‘‘मैं चोर हूं ! अरे कौन साला चोर नहीं है ?’’ वह पसीना पोंछता हुआ बोला, ‘‘ये पंत, निराला, अज्ञेय किस-किस को चोर कहेंगे आप ? इन लोगों ने सीधे सीधे बायरन, इलियट, मिल्टन और जापानी हाइकूज पार कर दी हैं और मशहूर हो गए। जाने कहां-कहां डुबकी मार-मार कर, पानी-पी-पी कर हिंदी साहित्याकाश में एक से एक कवि, महाकवि दुकान लगाए बैठे हैं। और आप लोग, जिन को हम ने ही पैदा किया, हम ने ही शहर में लोगों से मिलाया, वही लोग आज हमें कठघरे में खड़ा कर चोर बताना चाहते हैं ?’’

‘‘नहीं, बात यह नहीं है।’’ संजय बोला।

‘‘तो क्या बात है ?’’ मधुकर बोला, ‘‘टेक इट इजी।’’

बाद में पता चला कि मधुकर की कारस्तानी शहर के अमूमन सभी कवि जानते थे। इस लिए हर कोई उस से कटता रहता था। पर चूंकि शहर के तकरीबन सारे सरकारी कवि सम्मेलनों का संयोजक, संचालक वह ही होता था सो उस से बिलकुल कट कर भी कोई नहीं रह पाता। डी॰ एम॰, कमिश्नर सब को पटाने में वह माहिर था। उन दिनों वह एक अनियतकालिक पत्रिका भी निकालता था सो छपने की लालसा भी कई नए पुराने कवियों को उस के पास घसीट ले जाती। फिर भी ढेर सारे लोग उसे नापसंद करते, उस की आदतों, हरकतों और चार सौ बीसी के कारण। पत्रिका के विज्ञापन के लिए फोन कर वह कमिश्नर, डी॰ एम॰, विधायक, मंत्री कुछ भी बन जाता। खुद ही अला फला बन कर वह खुद ही की सिफारिश कर लेता। राय ने उसे एक बार टोका तो मधुकर कहने लगा, ‘‘किसे लूटता हूं ? पूंजीपतियों को ही न ?’’ वह बोला, ‘‘वह साले जनता को लूटते हैं, मैं उन्हें लूट लेता हूं, अपना हिस्सा ले लेता हूं। साहित्य के लिए खर्च करता हूं। कोई महल, अटारी तो खड़ा नहीं कर रहा ?’’ कह कर वह सिगरेट के धुएं में खो जाता।

महेंद्र मधुकर रेलवे में क्लर्क था। पर बाहर वह अपने को अधिकारी ही बताता। और दफ्तर महीने में ज्यादा से ज्यादा दस दिन जाता। संजय ने पूछा, ‘‘काम कैसे चलता है ?’’

‘‘चल जाता है।’’ मधुकर लापरवाही से बोला।

‘‘फिर भी ?’’

‘‘अरे पचास रुपए आजू, पचास रुपए बाजू की सीट वालों को दे देता हूं। साले, अपना काम बाद में करते हैं, मेरा काम पहले निपटा देते हैं। बस ! और जाता हूं तो सालों को नाश्ता करा देता हूं, बॉस को कवि सम्मेलनों की व्यस्तता बता कर, दो चार कविताएं सुना देता हूं।’’

सचमुच संजय देखता, मधुकर हफ्तों कमरे में सोया रहता, अचानक शहर में निकलता और बताता कि, ‘‘अटैची उठी हुई थी।’’ और चार छह दूर दराज के शहरों के नाम गिनाते हुए कहता, ‘‘कवि सम्मेलनों से आ रहा हूं।’’ जब कि वह कहीं नहीं गया होता। हकीकत में कवि सम्मेलनों में जाने के लिए हरदम बेताब रहता और बेशर्मी पर उतर आता। जिन-जिन कवियों को अपने संयोजकत्व वाले कवि सम्मेलनों में बुलाता उन्हें पलट कर चिट्ठी लिखता कि ‘‘अब आप हमें बुलवाइए।’’ किसी-किसी को वह लिखता, ‘‘अगर आप को दस बार मैं बुलाता हूं तो कम से कम तीन या चार बार आप भी हम को बुलवाइए।’’ इस पर भी बात नहीं जमती तो वह लिख देता, ‘‘तो अब आप को बुलाने के लिए हमें सोचना पड़ेगा।’’ और दिलचस्प यह कि ज्यादातर जगह उस की दाल गल जाती। बाद में तो वह कवियों के तय पारिश्रमिक में से अपना कमीशन भी काटने लगा। कभी-कभी आधा से ज्यादा काट लेता। कई संकोची कवि सब कुछ जानते हुए भी चुप रहते। तो एकाध कवि अगर मुंह खोल भी देते तो वह कहता, ‘‘मालूम है आप का रेट क्या है और बाकी कवि सम्मेलनों में आप कितना पाते हैं ? और उस से तो यह ज्यादा ही है।’’

लोकल कवियों को वह मार्ग व्यय भी नहीं देता। कहता, ‘‘अभी टूटे नहीं हैं, बाद में ले लीजिएगा। कहीं भाग थोड़े ही जा रहा हूं।’’ और फिर उस का वह ‘‘बाद में’’ कभी नहीं आता। एकाध बेहया कवि फिर भी पीछा नहीं छोड़ते तो वह कहता, ‘‘ठीक है अगली बार से आप मत आइएगा।’’ वह कहता, ‘‘एक तो इन को मंच दो दूसरे ये सूदखोर की तरह पीछे पड़ जाएंगे। माफ करो भाई।’’

कवि सम्मेलनों के मंच पर भी वह कवियों को अलग-अलग ढंग से पेश करता। वह जिस को चाहता उस की तारीफ के पुल बांध देता, उसे राई से पहाड़ बता देता, नहीं हूट करवा देता। श्रोताओं में पांच सात हूटर वह हमेशा ‘‘तैयार’’ रखता। उस के पैसा मार लेने की आदत से कुछ कवि बहुत परेशान रहते। जैसे कि शेखर ! शेखर भी रेलवे में क्लर्क था और कई बार मधुकर की काट वही बनता। पर उसे सलीका नहीं आता। और बड़ी जल्दी एक्सपोज हो जाता। पर मधुकर के स्तर पर आ कर काटना वही जानता। जैसे कि एक बार कवि सम्मेलन में वह एक निरीह टाइप के कवि को ले कर पीछे श्रोताओं में पहुंच गया। बोला, ‘‘कवियों को चाय पिलाने भर का भी पैसा नहीं है। आप लोग कुछ चंदा दीजिए तो कवियों को चाय नसीब हो।’’ और पैसा वसूल लाया। उस सरकारी कवि सम्मेलन का संयोजक मधुकर था। उस की बदनामी भी हुई और खिंचाई भी। बाद में शेखर अक्सर ऐसा करने लगा। तो मधुकर माइक पर ही एनाउंस कर देता कि कोई चंदा मांगने जाए तो उसे पकड़ कर मंच पर लाइए। इस से कवि सम्मेलन की शालीनता ख़त्म हो जाती। राय ने एक बार मधुकर से कहा कि, ‘‘शेखर को बुलाते ही क्यों हैं ?’’ तो मधुकर धुआं उड़ाते हुए बोला, ‘‘वह साला भी तो दस कवि सम्मेलनों में हमें बुलाता है।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘और शेखर साला इतना काइयां है कि न बुलाऊं तो भी आ जाएगा और मंच पर सीना फुला कर बैठ जाएगा। अब भगा तो सकता नहीं। आखि़र सार्वजनिक मंच होता है।’’

शेखर ही क्या मधुकर भी कई बार बिन बुलाए कवि सम्मेलनों ही क्या मुशायरों तक में पहुंच जाता। बस उन्हें सूचना होनी चाहिए कि कहां कवि सम्मेलन या मुशायरा है। दोनों ही के पास रेलवे का पास होता था। दोनों ही घर बार और नौकरी की चिंता से मुक्त रहते। कभी भी, कहीं भी जा सकते थे। दोनों रेलवे स्टेशन भी तड़े रहते। और जो कवि कहीं जा रहा होता तो उस से चिपक जाते। भले वह कवि सम्मेलन की बजाय कहीं और जा रहा हो। ज्यादातर कवि, कवि सम्मेलनों में जाना वैसे भी नहीं छुपाते थे। कहीं से बुलावा आ जाता तो दस जगह बताए बिना, निमंत्रण पत्र दिखाए बिना उन्हें नींद नहीं आती थी। एक जगह बुलाए जाते, दस जगह बुलाया जाना बताते।’’

ऐसे ही एक बार शेखर रेलवे स्टेशन पर टहल रहा था। लखनऊ जाने वाली गाड़ी में पयाम दिख गया। शेखर समझ गया पयाम कहीं जा रहा है। धड़ उस के पास जा बैठा। बोला, ‘‘तो तुम भी लखनऊ चल रहे हो ?’’

‘‘हां, उमर साहब की मेहरबानी है।’’ और फिर लखनऊ का मुशायरा कौन छोड़ता है ?’’ पयाम बोला।

‘‘चलो सफर अब तनहा नहीं कटेगा।’’ शेखर बोला, ‘‘मैं भी वहीं चल रहा हूं।’’

‘‘जेहे नसीब !’’ कह कर पयाम ने आदाब बजाया।

‘‘यार तुम को सुने बहुत दिन हो गए ?’’ शेखर बोला, ‘‘कुछ नया कहा हो तो सुनाओ।’’

‘‘हां, हां। शौक से।’’ पयाम चहका। और ताबड़तोड़ दो गजलें सुना दीं।

‘‘वाह ख़ूब। बड़ी प्यारी गजलें हैं।’’ शेखर बोला, ‘‘जरा नोट करवा दो। मेरी एक शागिर्द रेडियो पर गाती है उसे गाने के लिए दे दूंगा।’’ पयाम ने दोनों गजलें खुशी-खुशी लिखवा दीं। अब अलग बात है कि पयाम को शायरी से वास्ता था पर गजल वह खुद कह नहीं पाता था। एक मुस्लिम मियां हलकी फुलकी गजलें दे दिया करते। पयाम का काम उसी से चल जाता। बाकायदा तरन्नुम में जब वह गजल पढ़ते तो यह कभी नहीं लगता कि उन्हों ने नहीं लिखी होगी। और पयाम ही क्यों ऐसे कई लोग थे संजय के उस शहर में, जिन्हें गजलें लिखने के बजाय तरन्नुम से पढ़ने में कहीं ज्यादा महारत हासिल थी। एक बार तो संजय दंग रह गया। एक ही रात एक जगह कवि सम्मेलन भी था और दूसरी जगह एक नशिस्त भी थी। दोनों ही जगह जाना था। कवि सम्मेलन के बाद वह जब ‘‘क्यों इशारों से बात करते हो, साफ कह दो कि हम तुम्हारे हैं’’ गुनगुनाता हुआ पहुंचा तो देखा कि यही गजल वहां एक दूसरे शायर साहबान पढ़ रहे थे। जब कि कवि सम्मेलन में एक दूसरे शायर यही गजल झूम कर पढ़ कर उसी के साथ नशिस्त में पहुंच रहे थे। नशिस्त जब ख़त्म हुई तो संजय ने हमदम से पूछा, ‘‘यह क्या माजरा है ?’’ हमदम बोला, ‘‘जाने दो। क्या फायदा ?’’ और जब संजय, ‘‘यह क्या माजरा है ?’’ के एक ही मिसरे पर बड़ी देर तक लगा रहा तो अज्ञात बोला, ‘‘इन बेचारों की क्या गलती ?’’

‘‘तो ?’’

‘‘गलती तो उस्ताद की है जिस ने एक ही गजल दोनों को दे दी।’’ लारी बोला।

‘‘तुम्हें भी तो नहीं दे दी यही गजल उस्ताद ने ?’’ अज्ञात ने चुटकी ली।

‘‘क्या बकते हो ?’’ कहता हुआ लारी वहां से खिसक गया।

बाद में अज्ञात कहने लगा, ‘‘आप को क्या लगता है दिन भर दर्जीगिरी, काज-बटन या जुलाहागिरी करने के बाद शाम को यह सब गजल भी लिख डालेंगे ।’’

‘‘क्यों कबीर दोहा लिख सकते थे, जुलाहागिरी कर के तो कोई गजल क्यों नहीं लिख सकता ? रैदास जूते सी कर भजन गा सकते हैं तो ये गजल क्यों नहीं गा सकते?’’ संजय बोला, ‘‘पर यह तो हद है। हम समझते थे हमारे यहां मधुकर, शेखर ही हैं। पर यहां तो पूरा का पूरा कुनबा ही। हद है।’’

‘‘बात यहीं तक हो तो गनीमत । अभी तो सवाल यह है कि उस्ताद ने भी कहां से मार के दी होगी ?’’ हमदम बोला, ‘‘और यह मारा-मारी उर्दू में इतनी ज्यादा है कि मत पूछो। कोफ्त हो जाती है कभी-कभी।’’

तो ख़ैर उस बार शेखर ने पयाम की दोनों गजलें नोट कीं और लखनऊ के रेलवे स्टेशन से पयाम से विदा ली और कहा कि, ‘‘इंशा अल्ला मुशायरे में फिर मिलेंगे।’’

‘‘ठीक जनाब।’’ कह कर पयाम चल दिया।

रात को मुशायरे में पयाम समय से पहुंच गया और शेखर को ढूंढने लगा। पर शेखर नदारद। मुशायरा शुरू हो गया पर शेखर फिर भी नदारद। बीच मुशायरे में शेखर दिखा। मंच पर पहुंचा। दो चार लोगों से जबरदस्ती हाथ मिलाया, आदाब किया और ठीक-ठाक जगह देख कर बैठ गया। बैठे-बैठे एक परची पर मुशायरे के कनवीनर को चिट्ठी लिखी, ‘‘उमर भाई आदाब, लखनऊ एक काम के सिलसिले में आना हुआ था। वापस जा रहा था कि पता चला कि मुशायरा है और आप आए हुए हैं सो आप को सलाम करने आ गया। ठीक समझिए तो मुझे भी पढ़वा दीजिए। कुछ खर्चा बर्चा दिलवा दीजिएगा। और जरा जल्दी पढ़वा दीजिए। अभी रात की गाड़ी से ही वापस जाना है। रिजर्श्वेशन हो गया है।’’ उमर भाई संकोच में पड़ गए। न चाहते हुए भी उन्होंने तुरंत शेखर का नाम एनाउंस कर दिया। शेखर ने माइक संभाला और ताबड़तोड़ दो गजलें पढ़ दीं। वह गजलें जो पयाम ने ट्रेन में सुनाई थीं। पयाम की तो हवा ख़राब हो गई। शेखर मुशायरे से बाद में गया। पर पयाम ने तुरंत चप्पल उठाई और खिसक लिया। क्यों कि तीसरी गजल उस के पास थी नहीं। और जो दो थीं, वह शेखर पढ़ गया था। वापस जा कर पयाम मुस्लिम मियां से उलझ गया कि, ‘‘शेखर की गजलें क्यों दी हमें पढ़ने को ?’’ मुस्लिम मियां के होश उड़ गए। बोले, ‘‘तो क्या वह दीवान उस के पास भी है क्या ?’’

‘‘कौन सा दीवान ?’’

‘‘जिस में से गजल निकाल कर तुम्हें दी थी।’’

‘‘तो आप ने गजल दी ही चोरी की थी।’’ कहता हुआ पयाम निकल गया, ‘‘मां चुदाएं आप और आप की शायरी। मुझे नहीं बनना शायर !’’ बाद में पयाम छुटभैया नेता बन गया। और शेखर एक दिन ए॰ सी॰ में सफर करता हुआ टिकट चेकिंग में पकड़ गया तो चेकिंग कर्मचारियों पर वह अंगरेजी में डपट पड़ा। कहा कि, ‘‘मैं रेलमंत्री का पी॰ ए॰ हूं। तुम लोगों की हिम्मत कैसे हुई मुझे चेक करने की।’’ कर्मचारी सकते में आ गए। ऊपर के अधिकारियों को ख़बर दी कि रेलमंत्री के पी॰ ए॰ ट्रेन में हैं। अधिकारी उस की आवभगत में पहुंचे। और शेखर की कलई खुल गई। वह जेल गया और उस की नौकरी भी गई।

शहर के लोगों में तब यही चरचा थी कि देर सबेर मधुकर भी जेल जाएगा। पर मधुकर को ठीक से जानने वाले लोग जानते थे कि वह जेल जाने वाली नहीं जेल भिजवाने वाली चीज है। मौका बेमौका वह थाने के दारोगा तक के सम्मान में कवि गोष्ठी करवा डालता। दारोगा का सम्मान करवाता, छोटे-छोटे लोगों पर रौब डालता। विज्ञापन बटोरता, लेखक सम्मेलन करवाता, चंदा बटोरता, सरकार और प्रशासन से अनुदान लेता। मधुकर कवि सम्मेलनी कवियों और पत्रिकाओं में छपने वाले कवियों के बीच अजीब तालमेल बनाए रखता। कवि सम्मेलनों में जाता तो बाकी कवियों को हड़काता ‘‘साहित्य का आदमी हूं, ख़ाली मंचीय नहीं।’’ और सिर्फ लिखने छपने वाले कवियों से कहता, ‘‘जनता से सीधा रिश्ता रखता हूं, छोटी-मोटी पत्रिकाओं के चंद छपे पन्नों का मोहताज नहीं हूं।’’ वह ख़ुद पत्रिका निकालता ही था और जैसे कवियों से कहता कि ‘‘तुम हमें बुलाओ, हम तुम्हें बुलाएं,’’ वैसे ही लघु पत्रिकाओं के संपादकों को उसी बेशर्मी से लिखता, ‘‘हम तुम्हें छापते हैं, तुम हमें छापो।’’ और मजा यह कि यहां भी वह ज्यादातर जगहों पर कामयाब रहता।

मधुकर कई बार जैसे कवि सम्मेलनों में वहीं बैठे कवियों की कविताएं पढ़ जाता था और पलट कर उस कवि से कह देता, ‘‘क्षमा कीजिए जरूरत पड़ गई थी।’’ उसी तरह वह छपने के लिए भी यहां, वहां की कविताएं मार लेता। कई बार वह उर्दू की हिंदी, हिंदी की उर्दू भी कर डालता और किसी को पता भी नहीं पड़ता। कई बार वह नए कवियों की कविताएं भी ठीक करने के बहाने पार कर देता। उस नए कवि से कहता, ‘‘किसी काम की नहीं है तुम्हारी कविता।’’ और वही कविता कुछ दिन बाद थोड़े से रद्दो बदल के बाद महेंद्र मधुकर नाम से छपी मिलती। कोई कवि अगर टोक देता, ‘‘कि यह तो मेरी ही कविता है।’’

‘‘तुम्हारी कविता कहां है ?’’ वह खीझता।

‘‘पर बात तो वही है।’’

‘‘हो सकता है तुम्हारी वह बात कहीं जेहन में रह गई हो। और इस कविता में आ गई हो।’’ कह कर वह उसे टाल देता। अपनी पत्रिका में नए कवियों द्वारा भेजी गई ठीक-ठाक कविताएं भी वह जब तब पार कर दूसरी पत्रिकाओं में अपने नाम से छपवा डालता। कविताओं की पैरोडी भी वह बख़ूबी लिख डालता। बीच-बीच में उस को यह भी इलहाम होता रहता कि महाकवि होने के लिए ‘‘होमोसेक्सुअल’’ होना भी जरूरी है। फिराक, निराला की वह गिनती कराता। और अपने होमो होने के किस्से भी जब-तब फैलाता रहता। वह कब किस के लिए क्या कह दे, कुछ पता नहीं होता। पिनक में जब वह आता तो शहर का ऐसा कोई कवि नहीं होता जिस को वह अपने ‘‘मार लेने’’ वाली सूची में दर्ज करने से छोड़ देता। कभी न कभी, किसी न किसी मौके पर वह हर किसी की मार चुका होता। चाहे वह बूढ़ा हो, जवान हो इस से उस को कोई फर्क नहीं पड़ता। कई बार इस फेर में वह बेइज्जत होता, पिट जाता पर आदत से लाचार वह फिर सब की गिनती गिना जाता। कभी-कभी उस की सूची शहर की हदें पार कर बंबई तक पहुंच जातीं और वह सुजीत कुमार से लगायत ऋषि कपूर तक के नाम गिना जाता। क्या तो तब वह उन्हें हिंदी सिखाता था। एक बार उस ने हमदम, राय और संजय को भी ‘‘मार लेने’’ की फेहरिस्त में किसी से गिना दिया। हमदम बेचारा तो उदास हो गया। पर राय और संजय मधुकर पर सवार हो गए। बोले, ‘‘लो आज मेरी मारो। नहीं तो साले तुम्हारी गांड़ तोड़ दूंगा।’’

‘‘क्या कह रहे हैं ! क्या कह रहे हैं आप लोग ?’’ मधुकर हांफने लगा, ‘‘किसी ने बहका दिया है आप लोगों को।’’ कह कर वह माफी मांगने लगा। कहने लगा, ‘‘कवियों के साथ इस तरह का आचरण राम-राम !’’ हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘पाप है पाप।’’

‘‘आइंदा हम लोगों के बारे में अगर कोई लूज टाक की तो हाथ पैर तोड़ के सड़क पर फेंक देंगे।’’ राय बोला, ‘‘बात यूनिवर्सिटी के लड़कों से कहने भर की देर है।’’

‘‘नहीं, नहीं।’’ वह बोला, ‘‘ऐसी कोई बात ही नहीं होगी।’’

मधुकर ऐसी हरकतें फिर भी करता रहता, बेइज्जत होता रहता, पर वह अपनी आदत से बाज नहीं आता। वह रह-रह चोंगा भी बदलता रहता। कभी वह हिंदूवादी हो जाता, कभी कम्युनिस्ट बन जाता। जब जैसे मौका देखता चोंगा बदल लेता।

शहर के ‘‘प्रगतिशीलों’’ से वह हरदम सावधान रहता। और कहता रहता, ‘‘आप हमें यूं ही नहीं ख़ारिज कर सकते।’’ इसी ख़ारिज न होने की धुन में वह यकायक जनवादी बन गया। और शहर में जनवादी लेखक सम्मेलन आयोजित कर बैठा। कहानी से उस का कोई सरोकार नहीं था पर शहर के जनवादी हो चले कवियों को काटने की गरज से इस जनवादी लेखक सम्मेलन में उस ने कहानी को ही केंद्रित किया। और बाहर के कई कहानी लेखकों और संपादकों को चिट्ठी लिख डाली। इत्तफाक से कई लोग आ गए। जिन में दो-तीन नामी कहानीकार भी थे।

उस ने बाहर से बुलाए लेखकों को आने जाने का किराया, ठहरने आदि का आश्वासन दिया था। ज्यादा लोगों के आने से उस का बजट बिगड़ गया। उस को बिलकुल ही उम्मीद नहीं थी कि इतने सारे लोग आ जाएंगे। उस ने तो सोचा था कि इस आयोजन के चंदे से कुछ बचा भी लेंगे। पर अब उस की योजना पर पानी फिर गया था। वह बकबकाने लगा, ‘‘ये साले जनवादी बिलकुल भूखे ही होते हैं। जिस को देखो वही मुंह उठाए चला आ रहा है। जैसे और कोई काम ही नहीं सालों को।’’ एक लेखक ने सुन लिया तो मधुकर पर बिगड़ गया। और सीधा अटैची उठा कर वापस हो गया। सम्मेलन ख़त्म होते न होते मधुकर सिर पर हाथ रख कर बैठ गया। क्या तो उस का रुपया चोरी हो गया है। कितना रुपया चोरी हुआ है, कब हुआ, ऐसी किसी बात का हिसाब मधुकर के पास नहीं था। उस के पास जैसे एक ही संवाद बाकी रह गया था, ‘‘रुपया चोरी हो गया।’’ जनवादी लेखकों की समझ में आ गया कि अपने ही किराए से वापस जाना है। ज्यादातर चले भी गए। पर कुछ तंबू गाड़ कर सो गए कि जब किराया मिलेगा, तभी जाएंगे। विवश हो कर मधुकर को उन लेखकों को किराया देना पड़ा। किराया नहीं देता तो उन के रहने खाने का बिल देना पड़ता।

‘‘आखि़र किस ने रुपया चुरा लिया ?’’ संजय ने मधुकर से पूछा

‘‘आप ने ही चुराया होगा।’’ मधुकर बउराया।

‘‘क्या कहना चाहते हैं आप ?’’

‘‘आप ही और राय इस कमरे में बहुत आ जा रहे थे।’’

‘‘इस का क्या मतलब हुआ, हम लोगों ने रुपया चुरा लिया ?’’ राय गरजा।

‘‘नहीं मेरे बाप रुपया मैं ने ही चुरा लिया।’’ वह हाथ जोड़ता हुआ बोला, ‘‘अब आप लोग जाइए।’’

‘‘हद है।’’ कहता हुआ संजय मधुकर के कमरे से बड़बड़ाता हुआ निकला, ‘‘बड़ा गंदा आदमी है। लेखकों को किराया न देना पड़े इस लिए साला किसी को भी चोर कह देगा।’’

‘‘ऐसे गंदे आदमी की बात का क्या बुरा मानना।’’ हमदम बोला, ‘‘कौन इस की बात का विश्वास करता है। सब जानते हैं कि मामला क्या है।’’

‘फिर भी।’’ कह कर राय उदास हो गया।

पर मधुकर था ही ऐसा। वह किसी को कभी भी कुछ भी कह सकता था। अपनी लड़की की शादी में भी वह ऐसे ही बोल गया था। हुआ यह कि वहां भी बाराती ज्यादा हो गए और कैंपा कोला की बोतलें कम पड़ गईं। उस ने फौरन एक आदमी को और बोतलें लाने के लिए दौड़ाया और ख़ुद बारातियों को संभालने में लग गया। पर बाराती कोई लेखक कवि तो थे नहीं, वह कहां मानने वाले, नहीं माने। मधुकर आजिज आ कर बोला, ‘‘एक छोटे से सुख की इतनी बड़ी सजा मिलेगी, नहीं जानता था।’’ समझने वाले समझ गए पर एक करुण रस के कवि की समझ में नहीं आया। बोले, ‘‘आप की बात समझ में नहीं आई। सुख, सजा। क्या मतलब ?’’

‘‘महाकवि जी, इतना भी नहीं समझे ?’’ मधुकर बोला, ‘‘न बीवी के साथ सोता, न संभोग करता, न यह बेटी जनमती, न उस की यह शादी होती, न मैं यह सजा भुगतता!’’ और मधुकर यह सब जोर-जोर से कहता रहा। कई लोग यह बात सुन कर सकते में आ गए, कई लोग शर्मा गए तो कई लोग बात टाल कर वहां से खिसक लिए। पर मधुकर चालू था, ‘‘एक छोटे से सुख की इतनी बड़ी सजा ?’’ वह बोलता ही जा रहा था, ‘‘इतनी बड़ी कीमत ?’’

उस जनवादी लेखक सम्मेलन समाप्ति के दो दिन बाद मधुकर संजय के घर गया। बोला, ‘‘आप तो बुरा मान गए। अरे, वह तो नाटक था। ऐसा न करता तो वह जनवादी साले पिंड नहीं छोड़ते, चूस जाते साले पूरा का पूरा हम को।’’

संजय काफी देर चुपचाप मधुकर की बातें सुनता रहा। और जब बहुत हो गया तो मधुकर से बोला, ‘‘अब बंद करिए अपनी नौटंकी। और चुपचाप यहां से दफा हो जाइए।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘आइंदा मेरे मुंह मत लगिएगा।’’

‘‘आप समझिए तो, आप समझिए तो।’’ कहता हुआ वह चला गया।

संजय फिर उस से कभी नहीं बोला। मधुकर ने दो तीन बार कवि सम्मेलनों के निमंत्रण भी भेजे पर वह फिर कभी उस के कवि सम्मेलनों में नहीं गया। बल्कि जिस कवि सम्मेलन में वह जाता, संजय वहां नहीं जाता। ऐसे ही एक बार एक कवि सम्मेलन में एक कवि को श्रोता अचानक ‘‘चोर-चोर’’ कहने लगे तो भी वह कवि महोदय कुछ समझ नहीं पाए और चुपचाप कविता पढ़ते रहे। पर जब ‘‘चोर-चोर’’ ज्यादा हो गया तब उन्हों ने कविता पढ़ना बंद किया और श्रोताओं से पूछा कि, ‘‘आप चोर-चोर क्यों कह रहे हैं ?’’

‘‘क्यों कि आप चोरी की कविता पढ़ रहे हैं।’’ श्रोताओं की ओर से किसी ने जवाब दिया।

‘‘पर आप कैसे कह सकते हैं कि मैं चोरी की कविता पढ़ रहा हूं ?’’ कवि ने जोड़ा, ‘‘आप को विश्वास दिलाना चाहता हूं कि यह कविता मेरी है और मेरे नाम से छपी हुई कविता है।’’ पर कवि महोदय की इस सफाई का श्रोताओं पर कोई असर नहीं हुआ। तो उक्त कवि ने कहा कि, ‘‘आप साबित कर दीजिए कि यह मेरी कविता नहीं है तो मैं मंच से नीचे आ जाऊंगा। और फिर कभी कवि सम्मेलन के मंच पर जिंदगी में नहीं चढ़ूंगा।’’

‘‘पिछले साल एक कवि आए थे, उन्हों ने यह कविता सुनाई थी और आप की अपेक्षा बहुत अच्छी तरह सुनाई थी।’’ श्रोताओं में से एक व्यक्ति बोला।

‘‘ओ हो !’’ कह कर संजय ने माइक संभाल लिया और श्रोताओं से पूछा, ‘‘कहीं उन कवि का नाम महेंद्र मधुकर तो नहीं ?’’

‘हां-हां महेंद्र मधुकर ही नाम था उन का।’’ श्रोता बोले।

‘‘आप लोगों की याददाश्त बहुत अच्छी है।’’ संजय बोला, ‘‘और इस से यह भी साबित होता है कि कविता के प्रति आप लोग काफी गंभीर हैं तभी आप को यह कविता साल भर बाद भी याद है। पर विश्वास मानिए यह कविता मंच पर खड़े इसी कवि की है। रही बात पिछले साल यही कविता पढ़ जाने वाले कवि की तो किसी पर व्यक्तिगत लांछन लगाना इस मंच से अच्छा नहीं लगता, मर्यादा टूटती है। बाकी आप सुधी श्रोता खुद ही समझदार हैं।’’ संजय कह कर बैठ गया। श्रोता समझ गए थे और ‘‘वही चोर था, वही चोर था’’ उच्चारने लगे।

मधुकर उन दिनों बड़ा परेशान रहता। पहली बार उस को अपने कवि होने के अस्तित्व को बचाए रखने की चिंता सताने लगी थी। कवि सम्मेलनों, पत्रिकाओं हर जगह से वह ख़ारिज होता जा रहा था। ऐसे में उसे एक नई चाल सूझी। शहर में हैंड कंपोजिंग पर टेबलायड साइज में छपने वाले साप्ताहिक अख़बारों में काम करने वाले पत्रकारों को उस ने साधना शुरू किया। गाल पर हाथ रखे अपने फोटो का डबल कालम ब्लाक उस ने अपने पैसे से बनवाया। और उन साप्ताहिक अख़बारों में ब्लाक लगवा कर अपने फोटो सहित कविताएं छपवा कर सौ पचास कापी उन अख़बारों की ले कर यहां वहां बांटता फिरता। इन पत्रकारों को वह शराब की दावत पर बुलाता। वह एक बोतल देशी शराब की चार बोतल बना कर अंगरेजी की बोतलों में भरता और इन नौसिखिया पत्रकारों को उसी से नशा आ जाता।

कुछ दिन बाद अलीगढ़ के जनवादी लेखक सम्मेलन में संजय ने मधुकर को देखा पर वह बोला नहीं। मौका देख कर मधुकर उस के पास आया और बुदबुदाया, ‘‘शहर का झगड़ा शहर में। यहां कुछ नहीं होना चाहिए।’’ हाथ जोड़ता हुआ वह बोला, ‘‘अपने शहर की बेइज्जती नहीं होनी चाहिए।’’ पर संजय कुछ नहीं बोला। पर मधुकर यहां भी अपनी आदत से बाज नहीं आया। तारादत्त निर्विरोध की एक गजल तोड़ मरोड़ कर कवि गोष्ठी में पढ़ गया। और उस की बड़ी थू-थू हुई घबरा कर वह नीरज के यहां पहुंच गया और उन से, ‘‘शराब पिलाइए’’ कहने लगा। नीरज ने भी उसे उलटे पांव वापस किया। अंततः सम्मेलन ख़त्म होने से पहले ही उस ने ट्रेन पकड़ ली।

वापस आकर उसे अपनी कविता की किताब छपवाने की धुन लग गई। वह कहता था, ‘‘जब तक हाथ में किताब न आ जाए, तब तक कोई हमें नहीं मानेगा। बस एक किताब आ जाए तो एक-एक से निपट लूंगा।’’ और सचमुच उस ने चंदा बटोर कर ‘‘अपनी’’ एक ‘‘कविता की किताब’’ छपवा ली। किताब का छपना था कि उस पर चोरी के आरोप लगने चौतरफा शुरू हो गए। पर उस को इस की फिक्र नहीं थी। यह सब तो उस के लिए पुरानी बात हो गई थी। नई बात यह थी कि अब उस के हाथ में अपनी किताब थी, उस की फोटो भी उस में छपी थी। जिस-तिस को वह बुला कर अपनी किताब भेंट करता और कहता, ‘‘सहयोग राशि पांच रुपए दे दीजिए।’’ वह हर किसी से कहता, ‘‘आप से किताब के दाम तो ले नहीं सकता, आप मित्र आदमी हैं पर प्रोडक्शन कास्ट तो निकालनी ही पड़ेगी।’’ ज्यादातर लोग यह पांच रुपए की सहयोग राशि संकोचवश दे देते। पर कुछ घाघ किस्म के लोग किताब उलट-पलट कर देखते और उन्हें लगता कि पांच रुपए का सौदा महंगा है, वह पांच रुपए देने से इंकार कर देते। कहते, ‘‘अगर फ्री में दे दीजिए तो ठीक है।’’ पर तब तक मधुकर उस घाघ के हाथ से किताब छीन लेता और उस पर लिखा, ‘‘प्रिय फला को सप्रेम भेंट’’ भी उस के सामने किचकिचा कर काट देता। आफिसरों के सामने वह वेतन बंटने की पहली तारीख़ को किताब ले कर खड़ा हो जाता। और सौ पचास कापी बेच ही डालता।

मधुकर की किस्मत अब जैसे उस की राह देख रही थी। उन्हीं दिनों शहर में जो नया कमिश्नर आया वह ‘‘कवि’’ भी था। मधुकर को यह बात पता चल गई। अपनी कविता की किताब और अपनी पत्रिका ले कर उस से मिलने पहुंच गया। कमिश्नर भी भुखाया कवि था। मधुकर ने उस की भूखी कविता की भूखी नब्ज छू ली। जगह-जगह कमिश्नर के सम्मान में वह कवि गोष्ठी, कवि सम्मेलन करवाने लगा। मामला चूंकि कमिश्नर का था सो जिश्ला प्रशासन का पूरा अमला लग जाता। धीरे-धीरे मधुकर ने कमिश्नर की कविताओं की किताब छापने का जिम्मा ले लिया। कमिश्नर की एक किताब छपी, दूसरी छपी, तीसरी छपी और चौथी किताब के साथ-साथ मधुकर ने अपनी भी दो किताबें छाप लीं। और कोई भी किताब दस हजार से नीचे नहीं छपी। हालत यह थी कि तब समूची कमिश्नरी के लेखपाल तक कविता प्रेमी हो गए। और वह कविता की किताब ख़रीद रहे थे, किताब बेंच रहे थे। यह सारा माजरा दिल्ली की एक पत्रिका में जब छपा और सीधे सीधे कमिश्नर को रिपोर्ट में हिट करते हुए सवाल उठाया गया कि आज के दौर में जब बड़े से बड़े कवि का भी कविता संग्रह दो हजार से ज्यादा कोई प्रकाशक नहीं छापता और अव्वल तो कविता संग्रह ही कोई नहीं छापना चाहता तो कमिश्नर साहब की कविता पुस्तकों की दस-दस हजार प्रतियां कैसे बिक जा रही हैं ? रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि कमिश्नर अपने पद का दुरुपयोग कर रहे हैं और उन के एक हम पियाला हम निवाला दोस्त इस सब का बेजां फायदा उठा रहे हैं।

मधुकर यह रिपोर्ट पढ़ कर इस बात पर नहीं नाराज हुआ कि यह रिपोर्ट क्यों छपी? उस की नाराजगी इस बात को ले कर थी कि पूरी रिपोर्ट में उस का जिक्र तो था पर कहीं उस का नाम क्यों नहीं आया। उसे लगा कि उसे कमिश्नर से दूर करने की यह साजिश है। और उस ने तुरंत पत्रिका के संपादक को चिट्ठी लिखी कि कमिश्नर का वह हम पियाला हम निवाला दोस्त कोई और नहीं मैं ही हूं। और रही कविता संग्रहों के दस हजार की संख्या में छपने और बिकने की बात तो हम लोगों की कविताओं में इतनी ऊर्जा है कि लोग ख़रीद रहे हैं और पढ़ रहे हैं। चिट्ठी छपी तो वह उस पत्रिका को लोगों को दिखाता फिरता और बताता कि, ‘‘देखो कमिश्नर मेरे दोस्त हैं।’’ और इस को भी उस ने कैश किया।

पर इस सब के बावजूद महेंद्र मधुकर की चिंताओं का अंत नहीं था। उस की नई चिंता अब पुरस्कृत होने की थी, सम्मानित होने की थी। उस ने बड़ी दौड़ धूप की, बड़ा हाथ पांव मारा कि कम से कम उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का सब से छोटा दो तीन हजार रुपए वाला पुरस्कार ही मिल जाए। पर वह हर बार अफसल हो जाता। उलटे यूनिवर्सिटी के प्राध्यापक टाइप कवि, आलोचक यह पुरस्कार मार ले जाते। वह इस पर भी बड़बड़ाता और पछताता कि वह भी क्यों न यूनिवर्सिटी में प्राध्यापक हुआ ? वह बड़बड़ाता, ‘‘ये विश्वविद्यालयी कविता एक दिन मर जाएगी। जिंदा रहेगी तो सिर्फ मेरी कविता।’’

मधुकर की यह सारी बातें संजय के दिमाग में सिनेमा के किसी रील की तरह दौड़ गईं। रिक्शा धीरे-धीरे लाल बारादरी पहुंच गया था। सरोज जी रिक्शेवाले को डपट कर बोले, ‘‘रुको, हईं रुको।’’ तब जा कर कहीं संजय उस सिनेमा के रील से अलग हुआ। सरोज जी रिक्शे से उतरे, संजय भी उतरा। उतर कर रिक्शेवाले को पैसे देने लगा तो सरोज जी ने उसे रोक दिया। बोले, ‘‘आप क्यों दे रहे हैं, आयोजक देंगे।’’ कह कर उन्हों ने लगभग चिल्ला कर एक आयोजक टाइप के व्यक्ति को बुलाया और कहा कि, ‘‘रिक्शे के पइसे दइ दीजिए।’’ उस ने विनम्रता से सिर झुकाया और बोला, ‘‘एक मिनट में आया।’’ कह कर वह बारादरी के भीतर गया। और लौटा तो मधुकर उस के साथ था। मधुकर ने सरोज जी को देखा, रिक्शा देखा और जेब से पैसा निकाल कर दिया। अब तक उस ने संजय को भी देख लिया था। उस के चेहरे पर घबराहट की रेखाएं फैल गईं। उस ने उस गुलाबी मौसम में भी रूमाल से पसीना पोंछना शुरू कर दिया। पर संजय ने उस की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। सरोज जी के पीछे-पीछे चल दिया। मधुकर दौड़ कर सरोज जी की अगवानी में आया।

बारादरी के ऊपर हाल में सम्मान समारोह आयोजित था। हाल बहुत ही छोटा था। बमुश्किल पच्चीस तीस कुर्सियों की जगह थी, और इतनी कुर्सियां लग भी गईं थीं। पहुंचने वालों में आयोजकों में से तीन चार लोगों के अलावा सरोज जी पहले व्यक्ति थे। जिन के साथ संजय नत्थी था। आयोजकों में से मधुकर को छोड़ कर कोई भी उसे नहीं पहचानता था। हां, मधुकर भी यहां आयोजक ही था, अपने सम्मान समारोह के बावजूद। इंतजाम में लगा बझा मधुकर अचानक परेशान हो गया था। उस के चमचे उस की परेशानी देख परेशान हो गए थे पर परेशानी का सबब वह नहीं जान पा रहे थे। मधुकर को सरोज जी के इतनी जल्दी आ जाने की उम्मीद नहीं थी। और साथ में संजय के आने की तो कल्पना तक नहीं थी उसे। सरोज जी की अगवानी में लगा मधुकर सरोज जी को किसी सामान्य कुर्सी पर बिठाने लगा। पर सरोज जी ने जैसे उस का निवेदन सुना ही नहीं कि, ‘‘यहां बैठिए।’’ सरोज जी ने मन ही मन मंच पर रखी ख़ास अतिथियों की कुर्सी में से बीच की कुर्सी तजवीज की जो जाहिर तौर पर समारोह के अध्यक्ष की होनी चाहिए, और उसी पर जा कर धप्प से बैठ गए।

‘‘अच्छा-अच्छा’’ कह कर मधुकर मुड़ा तो उस ने देखा कि जिस कुर्सी पर वह सरोज जी को बिठाना चाह रहा था उस पर संजय बैठ गया था। वह तमतमाया संजय के पास आया और उसे घूरने लगा। शकल ऐसे बनाई जैसे वह पूछना चाहता हो कि, ‘‘तुम को यहां किस ने बुलाया ?’’ वह शायद यह पूछना भी चाहता था कि तब तक सरोज जी शायद माजरा समझ गए थे या कि औपचारिकतावश बोले, ‘‘यह संजय जी हैं, हमारे वरिष्ठ सहयोगी हैं, अऊर हम इन्हें लइ आए हैं हियां।’’

‘‘मैं इन्हें जानता हूं।’’ मधुकर बोला, ‘‘एक समय बड़ी उष्मा और ऊर्जा होती थी इन की कविता में।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘बड़े होनहार कवि थे पर जाने क्यों आज कल लिखना छोड़ दिया है।’’ मधुकर फीकी मुस्कान बिखेरता हुआ बोला, ‘‘कि फिर शुरू कर दिया?’’

संजय चुप रहा।

पर मधुकर चुप नहीं रहा। बोला, ‘‘कविताएं लिखना।’’

संजय फिर भी चुप रहा।

मधुकर उस की बगल की कुर्सी पर बैठ गया। पसीना पोंछता हुआ बुदबुदाया, ‘‘शहर का झगड़ा शहर में।’’ और जैसे उस ने हिदायत दी, ‘‘यहां अपने शहर की बेइज्जती नहीं होनी चाहिए।’’

संजय कुछ बोला नहीं। न ही मधुकर की ओर उस ने देखा।

पर मधुकर जैसे आश्वस्त हो लेना चाहता था। बोला, ‘‘आप तो दिल्ली में थे। लखनऊ कब से आ गए ?’’ उस के स्वर में अतिशय विनम्रता टपक रही थी। संजय की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं पा कर वह उठ खड़ा हुआ। बोला, ‘‘कुछ भी हो अपने शहर की बेइज्जती नहीं होनी चाहिए।’’

फिर वह माइक वगैरह के इंतजाम और चमचों को निर्देश देने में लग गया।

यहां मधुकर का जाल बट्टा काफी तीखा और चौकस था। उस का यह सम्मान समारोह पूरी तरह प्रायोजित तो था ही, प्रायोजक भी वह खुद ही था। छोटी और घटिया बुद्धि ही सही पर इस का इस्तेमाल उस ने बख़ूबी किया था। पूरी योजना इतनी नियोजित थी कि यह समारोह प्रायोजित है इस की गंध भी किसी को लगती नजर नहीं आ रही थी। संजय तो खै़र सब समझ गया था। क्यों कि मधुकर एक बार ऐसा पहले अपने शहर में भी कर चुका था। तब उस ने सम्मान समारोह के बजाय अपनी किताब पर बहसनुमा गोष्ठी आयोजित करवाई थी। इस के लिए उस ने एक संस्था गठित की। तीन चार नए कवि टाइप लड़कों को पकड़ कर उन को पदाधिकारी बना दिया। सो वह सब पूरे उत्साह से जुट गए। शहर भर के जाने-अनजाने साहित्यकारों को बटोरा। संस्था चूंकि नई थी मधुकर का लेबिल नहीं था, सो ज्यादातर लोग आ गए। पर आकर पछताए। अब चूंकि आ गए थे सो विवशता थी बैठने की। बैठ गए। और बोलने की बात हुई तो बोले भी। जैसी कि मधुकर की आदत थी कि जिस भी किसी समारोह में वह होता जैसे-तैसे संचालक बन कर माइक वह थाम ही लेता। ऐसा उस ने अपनी किताब वाली गोष्ठी में नहीं किया। बिलकुल निरपेक्ष बना बैठा रहा। पर जब उस ने देखा कि कई लोग उसे धोने में लग गए। उसे कवि मानने और उस की कविताओं को कविता मानने से ही इंकार करने लगे। कुछ ऐसे भी ‘‘होशियार’’ लोग थे जो यह कह कर निकलने लगे कि किताब यहीं देखने को मिली, पढ़ी नहीं है सो कुछ बोलना उचित नहीं हैं पर जब दो तीन लोग बार बार ‘‘कहीं से प्रेरित कविताएं’’ की स्थापना देने लग गए और एक आलोचक ने साफ कह दिया कि यह किताब कविताओं की हेरा फेरी की किताब है तब मधुकर से नहीं रहा गया। उछल कर माइक थाम लिया। और जिस से जो बुलवाना चाहा वही बुलवाया और बाकी लोगों को यह कह कर चुप करा दिया कि ‘‘कुछ लोग पूर्वाग्रहवश व्यक्तिगत रूप से मुझे बदनाम करने की सायास कोशिश कर रहे हैं। वह लोग इस गोष्ठी को उखाड़ने की नियत बना कर आए हैं। पर हम उन की इस मंशा को कामयाब नहीं होने देंगे।’’ बात फिर भी नहीं बनी तो उस ने चाय समोसे का जलपान शुरू करवा दिया। और दुकानदारों को वहीं सब के सामने पेमेंट कर गोष्ठी के समापन की घोषणा खुद ही कर दी थी। सब लोग संस्था वालों को गाली देते हुए चले गए। तो एक आलोचक ने कहा, ‘‘उन बेचारे लड़कों का क्या कसूर, इस ने उन का इस्तेमाल कर लिया।’’

मधुकर ने यहां लखनऊ में भी वही सब किया था पर बड़े जतन और यत्न से। विद्रोही नाम के एक लड़के से एक संस्था गठित करवाई। अपने सम्मान की योजना बनाई। सम्मान समारोह में भीड़ कैसे जुटे ? इस के लिए उस ने लखनऊ के छोटे और मझोले कवियों, कलाकारों, रंगकर्मियों, पत्रकारों और नेताओं की भी एक सूची बनाई और इस में से करीब पैंतीस, चालीस लोगों को सम्मानित करने के लिए नाम तय कर लिए। और सूची में शामिल पुरस्कृत लोगों से ही एक सौ इक्यावन, एक सौ एक, इक्यावन या इक्कीस रुपए सहयोग के नाम पर मांग लिया। जिस ने यह सहयोग नहीं दिया उस का नाम काट दिया। और जिस ने जैसा सहयोग दिया उस के लिए वैसा ही पुरस्कार, शील्ड, कप या फीता तय कर दिया। सम्मान और पुरस्कार के भुखाए यह लोग इसी से खुश थे। इस तरह धीरे-धीरे लाल बारादरी का यह छोटा सा हाल भर गया।

हाल तो भर गया पर समारोह के अध्यक्ष सरोज जी को छोड़ कर बाकी विशिष्ट अतिथि, उद्घाटनकर्ता वगैरह अभी तक नहीं आए थे। मधुकर ने अतिथियों का इंतजाम भी अपनी ओर से बहुत ही पुख़्ता किया था। हिंदी के नाम पर हर जगह पहुंच जाने वाले एक कैबिनेट स्तर के खाद्य मंत्री वासुदेव सिंह समारोह के मुख्य अतिथि और उद्घाटनकर्ता के रूप में आमंत्रित थे। हिंदी संस्थान के उपाध्यक्ष सुमन जी और एक सांध्य अख़बार के संपादक विशिष्ट अतिथि थे। लखनऊ के तब सब से ज्यादा प्रसार संख्या वाले अख़बार के सरोज जी समारोह के अध्यक्ष पहले ही से नामित थे। न सिर्फ नामित थे, समारोह में सब से पहले पहुंच कर अध्यक्ष की कुर्सी पर आसीन भी थे। संजय ने देखा सरोज जी जब से कुर्सी पर बैठे तब से वह सिर झुका कर ही बैठे थे। और करीब एक घंटे से वह ऐसे सिर झुकाए बैठे थे जैसे किसी तपस्या में लीन हों। संजय बैठे-बैठे ऊब गया था। कि तभी हाल में जैसे हलचल सी हुई।

पता चला सांध्य अख़बार के संपादक जी विशिष्ट अतिथि की हैसियत से पधार गए थे। सुनहरे बटनों वाला कुर्ता जाकेट पहने वह संपादक कम व्यापारी ज्यादा लग रहे थे। उन की देह से सेंट ऐसे गमक रहा था, उन के हाव-भाव और मुसकुराने का अंदाज ऐसा था जैसे वह किसी सम्मान समारोह में नहीं, वहां मुजरा सुनने आए हों। इन संपादक महोदय को संजय पहले से जानता था। पहले ये संपादक महोदय दिल्ली में एक हिंदी समाचार एजेंसी में जनरल मैनेजर और संपादक थे। हिंदी समाचार एजेंसी बंद करवा कर अब वह लखनऊ में सांध्य अख़बार के संपादक का दायित्व निभाने आ गए थे। महिलाओं पर हमेशा लार गिराने तथा संस्थानों को बंद कराने के लिए मशहूर यह संपादक महोदय भी पत्रकारिता जगत के मधुकर थे। इस लिए उन्हें यहां इस मुद्रा में देख कर संजय को जरा भी आश्चर्य नहीं हुआ। मधुकर की अगुवानी में अभी यह संपादक महोदय कुर्सी पर बैठे ही थे कि हिंदी संस्थान के उपाध्यक्ष सुमन जी भी आ गए। मधुकर लपक कर उन की अगुवानी में लग गया। उस के चेहरे की चमक अचानक बढ़ गई थी। अब जब सुमन जी आए तो सरोज जी फिर भी सिर झुकाए तपस्वी मुद्रा में लीन थे, हर किसी से बेख़बर। पर जब सुमन जी मंच के पास पहुंचे तो मधुकर ने सरोज जी को लगभग झिंझोड़ा। ऐसे जैसे वह नींद में हों। सरोज जी ने सिर उठाया, ‘मंद-मंद मुसकुराए और चुप ही चुप जैसे पूछा कि ‘‘बात क्या है ?’’

‘‘सरोज जी जरा सा इस कुर्सी पर आ जाइए।’’ हाथ जोड़ते हुए मधुकर धीरे से बोला। जवाब में सरोज जी ने खा जाने वाली नजरों से देखा पर बोले कुछ नहीं, न ही अपनी कुर्सी पर से उठे। संजय ने देखा, मधुकर का जैसे धैर्य चुक रहा था। उस ने रूमाल से माथा पोंछा और फिर पूरी विनम्रता से हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘सरोज जी प्लीज।’’ अब की उस की आवाज का वाल्यूम बढ़ गया। सरोज जी ने उसे फिर खा जाने वाली नजरों से देखा। संजय को लगा जैसे वह उसे कच्चा चबा जाएंगे। पर उन्होंने कुर्सी छोड़ी नहीं, उसी को उठा कर एक कुर्सी के बराबर खिसक गए। दरअसल सरोज जी इस बात से डर गए थे कि सुमन जी के आ जाने से कहीं उन की अध्यक्षता तो ख़तरे में नहीं पड़ गई ? ऐसा उन्हों ने बाद में बताया। बहरहाल, मधुकर ने भी सरोज जी को अजीब नजरों से घूरा और पलट कर विद्रोही जो उस समारोह का घोषित ‘‘संयोजक’’ था, को ऐसा डपटा कि उसे वह बस झापड़ मार देगा। पर मारा नहीं, बोला, ‘‘कैसे-कैसे बेहूदे लोगों को बुला लिया है !’’ कह कर उस ने विद्रोही को आदेश दिया कि, ‘‘सरोज जी के बगल में कुर्सी पड़ी है उसे उठा लाओ।’’ विद्रोही थोड़ा झिझका तो मधुकर फिर डपटा, ‘‘कह रहा हूं कुर्सी उठा लाओ।’’ सींकिया काठी का विद्रोही जिस के अंग-अंग से विद्रोह फूट रहा था उस को यह सब अपमानित करने वाला लगा। वह मधुकर से तो कुछ नहीं बोला। पर लपक कर उस ने अपने दूसरे चेले से कह कर सरोज जी के बगल वाली कुर्सी उठवा ली। सरोज जी की बगल वाली कुर्सी जब उठी तो सरोज जी ने मधुकर और विद्रोही को ऐसे देखा जैसे वह दोनों मिल कर उन की दुनिया उजाड़ देना चाहते हों। वह जैसे अनाथ हो गए हों। सरोज जी की यह दशा और ‘‘प्रतिष्ठा’’ संजय को भी अच्छी नहीं लग रही थी। उस ने देखा सरोज जी सचमुच बहुत लाचार लग रहे थे पर संजय की ओर देखने से भी कतरा रहे थे।

संजय मधुकर की विवशता भी देख रहा था। लाल बारादरी का वह हाल वास्तव में इतना छोटा था कि आने जाने की जगह छोड़ने के बाद चार कुर्सियां ही मंच पर लग पाई थीं। मधुकर को अंदाजा कतई नहीं था कि आमंत्रित चारों विशिष्ट अतिथियों में से चारों के चारों आ जाएंगे। उस को दो-एक के ही आने की उम्मीद थी। पर चार में से तीन आ चुके थे। और चौथे अतिथि मंत्री जी थे। मंत्री जी के भी आने की सूचना आ गई थी। पुलिस वाले अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद थे। एक इंस्पेक्टर ने आ कर बता दिया था कि वायरलेस पर संदेश आ गया है कि मंत्री जी घर से निकल चुके हैं। रास्ते में हैं। और कि बस यहां पहुंचने ही वाले हैं। विद्रोही माइक पर इस बात की घोषणा भी बार-बार कर रहा था। तो तीन विशिष्ट आ चुके थे। चौथे मंत्री जी आ रहे थे। और मंच पर कुर्सी थी सिर्फ चार। मधुकर की सारी परेशानी यही थी। क्यों कि अतिथियों के साथ मंच पर वह ख़ुद भी बैठना चाहता था। उस का वश चलता तो सरोज जी को मंच से उतार देता। क्यों कि चारों विशिष्ट अतिथियों में न सिर्फ सब से गरीब, निरीह और कमजोर बल्कि बेकार भी उसे सरोज जी ही लग रहे थे। पर कहीं वह नाराज हो कर समारोह की गरिमा नष्ट न कर दें इसी चिंतावश उन्हें मंच से उतारने के बजाय मंच पर एक पांचवी कुर्सी लगवाने की जुगत में मधुकर लगा हुआ था। इसी जुगत में, रणनीति में उस ने एक दूसरे चमचे को बुलाया और निर्देश दिया कि सरोज जी को थोड़ा किनारे खिसकाओ। उस ने जाकर बिना किसी मुरौव्वत के सरोज जी की कुर्सी किनारे खिसकवा दी। और मधुकर ने अपनी पांचवीं कुर्सी मंच पर न सिर्फ रखवा ली, बगल की कुर्सी भी मंत्री जी के लिए ख़ाली रखवा ली। ताकि वह फोटो में मंत्री जी के बगल में नजर आए। पर मंत्री जी के आने में लगातार विलंब होता जा रहा था। इस विलंब से एक व्यक्ति को छोड़ कर समारोह में उपस्थित सभी उकता रहे थे। पर विद्रोही माइक पकड़ कर लगातार अपने ही को स्थापित करने में डटा पड़ा था। वह माइक पर जैसे जूझ गया था। संजय ने देखा, मधुकर को विद्रोही की यह अदा बिलकुल ही अच्छी नहीं लग रही थी। और वह रह-रह कर बैठे-बैठे पीछे से विद्रोही का कुरता पकड़ कर खींच लेता। कुरता खींच कर मधुकर जैसे उसे संकेत दे रहा था कि, ‘‘अपना यह प्रलाप बंद करो।’’ मधुकर और विद्रोही का यह प्रसंग मंच और मंच से नीचे सभी देख रहे थे। पर विद्रोही न यह सब देख रहा था, न समझ रहा था, उलटे जब बहुत हो गया तो वह माइक उठा कर दो कदम आगे बढ़ गया। इस तरह मधुकर की पहुंच से बाहर हो कर वह अपने को स्थापित करने में जी जान से जुट गया।

मधुकर कुढ़ कर रह गया।

संजय यह सब देख-देख कर उकता सा गया था। वह वहां से खिसक लेने की सोच ही रहा था कि मंत्री जी आ गए। सभी उठ खड़े हुए। पर संजय बैठा रहा। सब लोग बैठ गए। सरोज जी की छटपटाहट अब देखने लायक थी। मंत्री जी की बगल में बैठने को हालां कि हर कोई लालायित था। सुमन जी, संपादक जी, सरोज जी और मधुकर ख़ुद। पर सब से ज्यादा छटपटाहट सरोज जी के चेहरे पर थी। सरोज जी अपनी कुर्सी से उठे भी। उधर लपके भी। पर तब तक मंत्री जी को मधुकर अपनी बगल में आसीन करा चुका था। इस अफरा-तफरी में सुमन जी भी पिछड़ गए और मंत्री जी की दूसरी बगल वाली कुर्सी में संपादक जी फिट हो गए। तब जब कि अभी तक सुमन जी उसी कुर्सी पर बैठे हुए थे। वह मन मार कर संपादक जी की पुरानी कुर्सी पर बैठे। सरोज जी के बगलगीर बन कर। पर इस पूरे उठा पटक में सब से ज्यादा नुकसान में सरोज जी ही रहे। उन की कुर्सी अब बिलकुल हाशिए पर खिसक क्या खिसका दी गई थी। और जरा संभल कर नहीं बैठते सरोज जी तो नीचे भी लुढ़क सकते थे। पर सरोज जी जरा नहीं पूरा संभल कर बैठ गए थे। क्यों कि अब समारोह के अध्यक्ष का नाम घोषित होने का समय आ गया था। और जैसा कि तय था सरोज जी सचमुच अध्यक्ष घोषित कर दिए गए। सरोज जी अपना छोटा सा सीना फुला कर जो जीता वही सिकंदर का भाव चेहरे पर चिपका कर ऐसे बैठे जैसे उन के आगे वहां सभी बौने हों। माल्यार्पण शुरू हो गया था। मंत्री जी से माल्यार्पण शुरू हो कर मधुकर से होते हुए सब से आखि़र में माला सरोज जी तक पहुंची तो शायद उन्हें अपनी हीनता का एक बार फिर एहसास हुआ। माला भी उन्हें अपेक्षतया छोटी ही मिली। पर मिली, इस भर से उन्हों ने संतोष कर लिया। माला पहनते ही सब ने माला उतार दी थी। पर सरोज जी ने माला आखि़र तक नहीं उतारी। वह पहने रहे। अब हालत यह थी एक तरफ समारोह के अध्यक्ष सरोज जी थे, माला पहने हुए। दूसरी तरफ समारोह का संचालक विद्रोही था, माइक लिए हुए। दोनों में जैसे मुकाबला हो रहा था कि कौन ज्यादा ‘‘ठेंठ’’ है। कौन ज्यादा ‘‘ढींठ’’ और ‘‘हया प्रूफ’’ है। जाहिर है कि सरोज जी ही अंततः सफल साबित हुए। क्यों कि विद्रोही विद्रोह पर उतर आया कि कुछ भी हो जाए माइक नहीं छोड़ेंगे। तभी मधुकर अपनी सीट पर से उठा और पीछे से उस के कान में बोला, ‘‘अब मुझे आमंत्रित करो’’ तो जैसे विद्रोही तुरंत कुछ समझ नहीं पाया और मंत्री जी के स्वागत में अपना कवितामय भाषण बीच में ही छोड़ कर बोल पड़ा, ‘‘आदरणीय मधुकर जी का आदेश है कि अब मुझे आमंत्रित करो तो मैं अब उन्हें सादर आमंत्रित करता हूं।’’ सुन कर सब के सब हंसने लगे। और विद्रोही बिना कुछ समझे कि लोग क्यों हंस रहे हैं टिप से खुद भी हंस पड़ा। पर माइक उस ने नहीं छोड़ा और बोला, ‘‘हां तो मैं कह रहा था’’ वह अभी यह बोल ही रहा था कि मधुकर, ‘‘सब कुछ तुम्हीं बोल डालोगे तो मैं क्या बोलूंगा’’ कहते हुए घसीट कर उस से माइक छीनता हुआ शुरू हो गया, ‘‘प्रातः स्मरणीय....’ और फिर जितने विशेषण, अलंकरण उसे याद आए वह बड़ी देर तक बोलता रहा, ‘‘हिंदी के धूमकेतु, हिंदी के वो, हिंदी के ये’’ और जब सारे विशेषण, अलंकरण वह दो-दो, तीन-तीन बार मंत्री जी के सम्मान में बोल चुका पर उन का नाम उस की जबान पर फिर भी नहीं आ पाया तो माइक पर हाथ लगा कर, सिर झुका कर वह मंत्री जी से ही पूछ बैठा, ‘‘क्षमा कीजिएगा, आप का नाम क्या है ?’’ पूछा मधुकर ने धीरे से था पर माइक जरा ज्यादा सेंसिटिव था उस ने यह सवाल सब को सुना दिया। मंत्री जी का काला-काला चेहरा तमतमा कर सुर्ख़ हो गया। मारे गुस्से के वह लाल हुए जा रहे थे कि इसी बीच संपादक ने इलायची चबाते हुए उन का नाम उच्चार दिया, ‘‘वासुदेव सिंह जी !’’ तो मधुकर ऐसा उछला जैसे गावसकर ने सिक्सर मारा हो, ‘‘हां, तो वासुदेव सिंह जी !’’ कह कर वह फिर उन के यशोगान में लग गया। पर मंत्री जी को अब कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। वह दो तीन बार उठने को उद्धत हुए पर बैठ-बैठ गए। पर उन के बैठने का रंग उड़ गया था। ढंग बदल गया था। लेकिन मधुकर उन की वंदना में मुक्तक पर मुक्तक पढ़े जा रहा था। अंततः जब बहुत हो गया तो मंत्री जी मधुकर की बीच ‘‘वंदना’’ में बोल पड़े, ‘‘मेरे पास ज्यादा समय नहीं है, मुझे जाना है।’’ कहते हुए वह उठ खड़े हुए, ‘‘अब मुझे आज्ञा दीजिए !’’ मधुकर की जैसे हवा सरक गई। वह हकबका गया। पर धैर्य उस का कायम था। हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘पर कृपा कर के पुरस्कार वितरण करते जाइए।’’

‘‘बहुत विद्वान लोग बैठे हैं।’’ मंत्री जी ने संपादक और सुमन जी को इंगित किया, ‘‘पुरस्कार वितरण आप लोगों से करा लीजिए।’’

‘‘बस ज्यादा नहीं दस मिनट का समय और दे दें।’’ मधुकर हाथ जोड़ता हुआ बोला।

‘‘अब इन लोगों का मन रख लीजिए।’’ संपादक ने भी विनती की। मंत्री जी मान गए। पर मधुकर की जाहिलियत से समारोह का रंग उतर चुका था।

पुरस्कार वितरण शुरू हुआ। सब से पहले उस समारोह का सब से बड़ा पुरस्कार महेंद्र मधुकर को मिला - मुक्तिबोध पुरस्कार। उस ने अपने लिए एक शील्ड बनवा रखी थी और दो हजार एक रुपए का एक बैंक ड्राफ्ट । बैंक ड्राफ्ट वह जेब से निकाल कर विद्रोही को दे रहा था कि वह मंत्री जी को दे दे उसे देने के लिए। इस तरह जो भद हुई वह तो हुई ही पर जो नहीं जानता था वह भी जान गया कि पुरस्कार समारोह पूरा का पूरा न सिर्फ प्रायोजित है बल्कि ख़ुद के लिए ख़ुद के द्वारा आयोजित है। ख़ैर, धड़-धड़ पैंतीस-चालीस लोगों के नाम विद्रोही ने कुछ इस तरह पुकारे जैसे वह लोग किसी बच्चे की तरह मेले में खो गए हों और माइक पर एनाउंसमेंट किया जा रहा हो कि उन के अभिभावक आ कर उन्हें ले जायं। ख़ैर, पुरस्कारों के अभिभावक आ-आ कर अपने-अपने पैसे की शील्ड, कप और फीता मय प्रमाण-पत्र के ले गए। पुरस्कार वितरण के बाद यह हुआ कि सभी विशिष्ट अतिथि दो-दो शब्द बोल दें। संपादक जी का नंबर पहले आया और वह मौके की नजाकत देखते हुए पारंपरिक शब्दावली को दुहरा कर सभी पुरस्कृत लोगों को बधाई दे कर दो मिनट में ही बैठ गए। सुमन जी जैसा वक्ता भी जो घंटे दो घंटे से कम बोलना नहीं जानता था बस बधाई दे कर एक दो बार बाल झटक कर ऐसे बैठ गया जैसे इस समारोह में आ कर उस ने बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो। ऐसी शर्मिंदगी सुमन जी के चेहरे पर संजय ने कभी नहीं देखी थी। मंत्री जी ने भी अपना नंबर आने पर सब को बहुत-बहुत बधाई दी, आयोजकों को धन्यवाद कहा और समारोह से अचानक चल पड़े। मंत्री जी क्या चले, सभी उन के पीछे चल पड़े। आखि़र में मंच पर सिर्फ सरोज जी बैठे रह गए। शायद अपने अध्यक्षीय भाषण की बारी जोहते हुए। और दर्शकों में संजय बैठा रह गया था सरोज जी को जोहते हुए। इतना होने पर भी सरोज जी सिर धंसाए बैठे हुए थे। उन के इस धैर्य को देख कर दंग ही हुआ जा सकता था। और वह बड़ी देर तक इस तरह बैठे-बैठे जोहते रहे कि अध्यक्षीय भाषण तो उन का होगा ही। लोग लौट कर आएंगे ही। पर लौट कर कौन आने वाला था, यह संजय जानता था। वही मधुकर, विद्रोही और उस के दो तीन चेले, चमचे। यही आए भी। सरोज जी से विद्रोही ने कहा, ‘‘अच्छा दादा, आशीर्वाद देने के लिए आप आए, बहुत-बहुत शुक्रिया।’’
सरोज जी चुप।

‘‘अच्छा दादा चला जाए।’’ थोड़ी देर रुक कर जब विद्रोही बोला तो सरोज जी उठ खड़े हुए। वह उठे ऐसे जैसे कोई उन का सारा कुछ लूट ले गया हो। वह खड़बड़-खड़बड़ चल कर नीचे आए। विद्रोही उन्हें नीचे तक छोड़ने आया। नीचे आने के बाद वह नमस्कार कर जाने लगा तो सरोज जी का धैर्य जैसे चुक गया, उन की अपमान कथा जैसे पूरी हो गई। वह चिल्लाए, ‘‘रिक्शा पर तो बइठाइ देव !’’

‘‘हां दादा, बुलाते हैं रिक्शा।’’ विद्रोही ने जोड़ा, ‘‘चिल्लाते क्यों हैं ?’’ कह कर उस ने अपने दूसरे चेले से रिक्शा लाने को कहा। बड़ी देर बाद वह एक खटारा सा रिक्शा ले कर आया। सरोज जी रिक्शे पर बैठ गए। और संजय से खीझते हुए बोले, ‘‘आप भी बैठ जाइए।’’ संजय भी जब रिक्शे पर बैठ गया और रिक्शे वाला चलने लगा तो सरोज जी फिर चीख़े, ‘‘रुको।’’

‘‘का बात है ?’’ रिक्शा वाला भी उसी टोन में चीख़ा।

‘‘जवन तुम का बुलाइ लाए हैं, उन से आपन पइसा भी मांग लेव।’’

‘‘तब उतरौ तुम, हम जाते हैं।’’ रिक्शे वाले ने घुड़पा।

‘‘अच्छा, अच्छा तुम चलो। पैसा हम देंगे।’’ संजय बोला।

‘‘बड़ा बेशर्म हैं सब।’’ सरोज जी बोले, ‘‘आप ठीक ही कहि रहे थे कि आदमी ठीक नहीं है।’’ उन्हों ने जोड़ा, ‘‘बताइए भला कहीं अध्यक्षीय भाषण के बिना भी समारोह होता है ?’’ लगा जैसे वह अभी रो पड़ेंगे। पर उस ने देखा, माला उन के गले में अभी भी पड़ी हुई थी।

‘‘मैं तो पहले ही आप से कह रहा था कि मत चलिए।’’ संजय बोला।

‘‘हां, आप का कहना मान लेना चाहिए था।’’ सरोज जी कहने लगे, ‘‘कोई साहित्यिक संस्कार था ही नहीं उस में।’’ कह कर उन्हों ने माला गले से निकाल कर कुरते की जेब में रखी। और वह रिक्शे पर बैठे-बैठे जैसे सो गए।

संजय भी चुप रहा। रिक्शा खटर-पटर चलता रहा।

पर दूसरे दिन सरोज जी जैसे सारा अपमान पी गए थे। उन्हों ने संजय को अपनी केबिन में बुलाया और कहा कि, ‘‘कल के समारोह की रिपोर्ट बना दीजिए।’’

‘‘कौन सा समारोह ?’’ संजय अचकचा गया।

‘‘वही कल का पुरस्कार समारोह, सम्मान समारोह।’’ सरोज जी सहज हो कर बोले। पर संजय असहज हो गया। और बिना बोले वह सरोज जी को घूरने लगा।

‘‘साहित्यिक समारोह था। भूल जाइए बाकी सब कुछ।’’ सरोज जी बोले, ‘‘दो पैरा ही बना दीजिए।’’ वह रुके, बोले, ‘‘आखि़र मंत्री आए थे। ख़बर तो है ही।’’

‘‘पर मैं ने तो कुछ नोट भी नहीं किया।’’ संजय टालते हुए बोला।

‘‘यह कार्ड ले लीजिए। और याददाश्त के आधार पर बना दीजिए।’’ सरोज जी अनुरोध के लहजे में बोले।

‘‘बना तो दूंगा।’’ वह बोला, ‘‘पर जो-जो घटा था सब कुछ जस का तस !’’ संजय उत्तेजित हो गया।

‘‘अरे नहीं। वह सब नहीं।’’ सरोज जी बोले, ‘‘बस एक औपचारिक सी ख़बर बना दीजिए।’’

‘‘मैं नहीं बनाऊंगा।’’ संजय सख़्त हो कर बोला, ‘‘चाहे आप बुरा मानिए चाहे भला।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘फिर आप का इतना अपमान हुआ। तब भी आप ख़बर बनाने को कह रहे हैं। पर मैं एक लाइन नहीं लिखूंगा।’’ कह कर संजय उन की केबिन से बाहर निकल आया।

रात को वह जब दफ्तर से चलने लगा तो सरोज जी ने फिर उसे बुलाया। वह उन की केबिन में पहुंचा तो सरोज जी बोले, ‘‘वह बेचारे सब फिर आए थे। गलती के लिए माफी मांग रहे थे। मेरे पैर गिर पड़े।’’ वह जैसे संजय को टटोलते हुए बोले, ‘‘मैं ने माफ कर दिया।’’

‘‘पर मैं ख़बर नहीं लिखूंगा।’’ संजय बोला।

‘‘ठीक है, मैं ही आप की ओर से लिख देता हूं।’’ कह कर सरोज जी लिखने में लग गए।

संजय घर चला गया।

दूसरे दिन संजय अख़बार में उस पुरस्कार समारोह की लंबी चौड़ी रिपोर्ट देख कर चकित रह गया। रिपोर्ट सरोज जी के अध्यक्षीय भाषण से शुरू हुई थी, और उन का अध्यक्षीय भाषण भी काफी लंबा था, बाकी रिपोर्ट भी बिलकुल ‘‘हरी-हरी’’ थी। हेडिंग भी सरोज जी के अध्यक्षीय भाषण पर ही थी।

दफ्तर आ कर वह सरोज जी से भिड़ गया, ‘‘यह सब क्या है सरोज जी। ?’’

सरोज जी कुछ नहीं बोले।

‘‘पर आप का तो वहां अध्यक्षीय भाषण भी नहीं हुआ था। इतना अपमानित किया गया आप को वहां और आप फिर भी ?’’

‘‘जो बात वहां नहीं कह पाए, वह यहां अख़बार में कह दी।’’ सरोज जी सहज भाव से बोले, ‘‘वहां सिर्फ पैंतीस चालीस लोग सुनते, यहां हजारों लोग पढ़ेंगे। मतलब तो अपनी बात लोगों तक पहुंचाने से है।’’ कह कर सरोज जी बोले, ‘‘मुझे एक इस्टोरी लिखनी है। अब आप जाइए।’’

शाम को उस सांध्य अख़बार के संपादक जी सरोज जी से भी दो कदम आगे निकल गए। सांध्य अख़बार में चार कालम की उस पुरस्कार समारोह की बड़ी सी फोटो छपी थी। जिस में मंत्री जी मधुकर को शील्ड दे रहे थे और संपादक जी मंत्री जी को निहार रहे थे। पूरे फोटो में मंत्री जी और मधुकर गौड़ थे, संपादक जी, फ्लैश हो रहे थे। फोटो के साथ छपी ख़बर में यहां संपादक जी का भारी भरकम वक्तव्य था और ख़बर की हेडिंग भी संपादक जी के वक्तव्य से ही लगाई गई थी। बाद में हमदम ने बताया कि मधुकर ने इस पुरस्कार समारोह की बड़ी-बड़ी रिपोर्टें मय फोटो के अपने शहर के अख़बारों में भी छपवाईं।

मधुकर और उस सांध्य अख़बार के संपादक का मामला तो फिर भी समझ में आता था। पर सरोज जी तो बाकायदा अपमानित हुए थे। सम्मान सहित अपमानित।

पर बाद में उस ने देखा सरोज जी के लिए जलील या अपमानित होना जैसे कोई क्रिया ही नहीं थी। हर हाल में उन को अपना मकसद साधने भर से मतलब रहता। और वह साध लेते। येन-केन-प्रकारेण।

ऐसे ही एक बार लखनऊ के राशन दुकानदारों ने प्रेस कांफ्रेंस की। इस प्रेस कांफ्रेस की प्रेरणा भी एक नामी पत्रिका के ब्यूरो प्रमुख ने दी जो ख़ुद भी मूलतः राशन दुकानदार थे। राशन की दुकान करते-करते वह सब इंस्पेक्टर नियुक्त हुए। दारोगा कहलाने लगे। दारोगागिरी से बर्खास्त हुए तो वह फिर से राशन दुकानदार हो गए। राशन दुकानदारों की यूनियन बनाई। पदाधिकारी बन गए। और जब-तब अख़बारों में विज्ञप्तियां छपवाने जाने लगे। विज्ञप्तियां छपवाते-छपवाते उन्हें भी पत्रकार बनने की धुन समाई। और फिर वह पत्रकार हो गए। बाहर के एक दैनिक के संवाददाता बन गए। साथ ही सत्यकथाएं लिखते रहे। और फिर धीरे-धीरे वह एक पत्रिका के ब्यूरो चीफ हो गए। पर पुराना यानी मूल धंधा राशन दुकानदारी, उन्हों ने नहीं छोड़ी। तो उन्हीं ब्यूरो चीफ महोदय ने राशन दुकानदारों को सलाह दी कि प्रेस कांफ्रेंस करिए। और बड़े पत्रकारों को बुलवाइए। वह पत्रकार जो मुख्यमंत्री को कवर करते हैं। बात मुख्यमंत्री तक भी जाएगी और ख़बर भी उम्दा छपेगी, काम बन जाएगा। बस पत्रकारों को प्रेस कांफ्रेंस में बढ़िया लंच और शानदार गिफ्ट देने का इंतजाम कर डालिए। राशन दुकानदार मान गए। मुख्यमंत्री कवर करने वाले पत्रकारों को जो ज्यादातर ब्यूरो चीफ या स्पेशल क्रासपांडेंट ही थे, गुपचुप सूचित कर दिया गया कि प्रेस कांफ्रेंस है और डग्गे का इंतजाम है। डग्गा मतलब गिफ्ट! बात चूंकि डग्गे की थी सो पत्रकारों में इस प्रेस कांफ्रेंस की ख़बर आग की तरह फैली। पर गुपचुप-गुपचुप। ख़बर संजय तक भी आई। खाद्य और रसद संजय की बीट में भी था। पर महत्वपूर्ण उसे भी तब डग्गा ही लगा। उस ने दफ्तर में पूरी छानबीन और दरियाफ्श्त की। इस कांफ्रेंस की औपचारिक चिट्ठी जो संपादक के नाम से आनी चाहिए था, नहीं आई थी। संपादक तो क्या मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति से औपचारिक अनुमति भी नहीं थी इस प्रेस कांफ्रेंस की। फिर भी उस ने सरोज जी से भी दो तीन बार दरियाफ्त किया और बताया कि राशन दुकानदारों की कोई प्रेस कांफ्रेंस है। सरोज जी हर बार टाल गए। और जब बहुत हो गया तो बिगड़ गए। बोले, ‘‘कहीं कोई प्रेस कांफ्रेंस नहीं है। आप अपना काम कीजिए।’’ पर संजय भी हार मानने वाला नहीं था। प्रेस कांफ्रेंस की ख़बर पक्की थी। सो उस ने संपादक को इस की सूचना दी और पहुंच गया प्रेस कांफ्रेंस में। वहां पहुंचा जरा देर से। प्रेस कांफ्रेंस शुरू हो चुकी थी। वहां उपस्थित कई पत्रकारों को देख कर संजय मुसकुराया। इन पत्रकारों में मद्रास से प्रकाशित हिंदू तक के विशेष संवाददाता मौजूद थे जिन्हें इस ख़बर से कोई वास्ता नहीं था। हिंदू ही क्यों कई और बाहरी अख़बारों और पत्रिकाओं के संवाददाताओं की उपस्थिति संजय को मजा दे गई। वह चारों ओर नजर दौड़ा कर बैठ गया। सरोज जी भी उपस्थित थे। संजय को देखते ही सरोज जी हकबका कर असहज हो गए। अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे वह तीन-चार बार ऐंठे। उन का ऐंठना देख कर संजय को और मजा आ गया। सरोज जी को अब सब कुछ बेकार और अर्थहीन लग रहा था। ऐंठते-ऐंठते वह अचानक उठ कर खड़े हो गए। लोगों ने टोका तो वह हड़बड़ाते हुए बोले, ‘‘अब मैं जा रहा हूं।’’

‘‘रुकिए दादा, रुकिए दादा।’’ कहते हुए एक पदाधिकारी उठ कर उन्हें रोकने लगा, ‘‘बस दस मिनट और।’’

सरोज जी बैठ गए। बोले, ‘‘पर जल्दी कीजिए।’’

संजय माजरा समझ गया कि सरोज जी उसे देख कर ही बिदक रहे हैं। बाकी पत्रकार भी मुसकुराए। संजय ने सरोज जी की ख़ातिर वहां से खिसक लेने में ही भलाई समझी। और अब वह उठ खड़ा हुआ। तो वह पदाधिकारी उस के पास भी ‘‘भाई साहब रुक जाइए’’ कहता हुआ पहुंच आया। हाथ जोड़ते हुए बोला, ‘‘बस दस मिनट और।’’

‘‘मैं जा कहां रहा हूं।’’ संजय झूठ बोला, ‘‘मैं तो बस पेशाब करने जा रहा हूं।’’

‘‘अच्छा-अच्छा।’’ कह कर वह पदाधिकारी निश्चिंत हो गया।

सभी दिग्गज पत्रकारों को छोड़ कर संजय होटल से बाहर निकल कर हजरतगंज में एक जगह स्कूटर खड़ी कर उस पर बैठ गया और आती जाती लड़कियों को निहारने लगा। गुनगुनी धूप में बैठ कर सुंदर लड़कियों को देखने का मजा ही कुछ और है। कोई पौन घंटे तक आंखें सेंकने के बाद वह वापस होटल पहुंचा। प्रेस कांफ्रेंस ख़त्म हो चुकी थी। दिग्गज पत्रकार जा चुके थे। उसे देखते ही एक राशन दुकानदार चहका, ‘‘बड़ी देर तक पेशाब किया भाई साहब।’’

‘‘पेशाब क्या सरोज जी की परेशानी दूर करने चले गए थे।’’ एक दूसरा राशन दुकानदार बोला, ‘‘क्यों संजय जी ?’’

संजय कुछ बोला नहीं। मुसकुरा कर रह गया। खाना खा कर जब वह चलने लगा तो उसे भी डग्गा यानी गिफ्ट दिया गया। एक पोलिथिन थैले में लिपटा हुआ। रास्ते में आ कर उस ने देखा चीनी थी। एक दुकान पर ले जा कर तौलवाया तो उस चीनी का वेट ढाई किलो निकला। वह हंसा कि ढाई किलो चीनी की गिफ्ट के लिए ये दिग्गज पत्रकार दो कौड़ी के राशन दुकानदारों की प्रेस कांफ्रेंस में परेड कर गए। वह ढाई किलो चीनी लिए एनेक्सी सचिवालय पहुंचा। उस ने सोचा प्रेस रूम में इसी बात की चर्चा हो रही होगी। पर प्रेस रूम में सन्नाटा था। तीन पत्रकार थे, जो उस प्रेस कांफ्रेंस से लौटे थे, उन्हें संजय ने छेड़ा भी कि, ‘‘ढाई किलो चीनी ख़ातिर आप लोगों ने आज पत्रकारिता की ऐसी तैसी करवा दी।’’ पर तीनों कुछ नहीं बोले और बासी अख़बारों में सिर घुसाए रहे। पर संजय भी हार मानने वाला नहीं था। उस ने प्रेस रूम से ही फोन कर-कर के अपने दोस्त पत्रकारों को यह ढाई किलो चीनी के डग्गे की ख़बर परोस दी। अब पूरे शहर के पत्रकारों में ढाई किलो चीनी की चर्चा थी।

शाम को जब संजय दफ्तर पहुंचा तो सरोज जी पहले ही से भन्नाए बैठे थे। उसे देखते ही बिगड़ पड़े। और राशन दुकानदारों का प्रेस नोट देते हुए बोले, ‘‘ई ख़बर बना डालिए।’’

‘‘मैं क्यों बनाऊं ?’’ संजय ने मुंह पिचका कर कहा, ‘‘ढाई किलो चीनी का डग्गा लेने मैं तो गया नहीं था, आप गए थे, आप ही बनाइए।’’ सुन कर सरोज जी भकुआ गए। बड़ी सी ठंडी सांस भरी। बोले, ‘‘हां, बड़ी बेइज्जती कर दी ससुरों ने।’’ और वह उदास हो गए।

‘‘कायदे से यह ख़बर जानी ही नहीं चाहिए।’’ संजय बोला।

‘‘हां, देखते हैं।’’ कह कर सरोज जी अपनी केबिन में घुस गए। उस ने देखा दूसरे दिन सुबह अख़बार में सरोज जी ने विशेष प्रतिनिधि लाइन से ही वह ख़बर लिखी थी। चार कालम का डिस्प्ले मिला था। पर दूसरे किसी भी अख़बार में यह ख़बर नहीं छपी थी।

सो एनेक्सी के प्रेस रूम में बैठ कर सभी पत्रकारों ने सरोज जी की जम कर थू-थू की। कि इस बेइज्जती के बाद भी सरोज जी ने ख़बर क्यों लिखी ?

पर सरोज जी पर कोई असर नहीं था।

इस वाकये से संजय को दिल्ली की एक घटना याद आ गई। कुछ पत्रकार नहा धो कर एक मंत्री जी के पीछे पड़ गए थे। जब तब उन के खि़लाफ ख़बर छपती रहती। मंत्री जी आजिज आ गए। एक बार जब वह विदेश गए तो वापस आ कर पत्रकारों को अलग-अलग सूट का कपड़ा गिफ्ट दिया। और हर किसी से कहा कि ख़ास आप के ही लिए यह लाए हैं। मंत्री जी पत्रकारों की पॉकेट की भी थाह जानते थे सो साथ ही एक टेलरिंग शाप का पता भी एक पर्ची के साथ देते गए कि, ‘‘आप चाहें तो यह दर्जी मुफ्त सिल देगा। अपना आदमी है।’’

इस के कुछ दिन बाद मंत्री जी ने इन सभी पत्रकारों को एक रात डिनर पर बुला लिया। सभी पत्रकार वही नया सूट पहन कर पहुंचे। मंत्री जी के घर पहुंच कर पता चला कि सभी पत्रकार एक ही रंग के सूट में उपस्थित थे। गोया वह भोज में नहीं, किसी स्कूल में पढ़ने आए हों। एक ही ड्रेस में। हुआ यह था कि मंत्री ने एक ही थान से सभी पत्रकारों को सूट का कपड़ा जानबूझ कर गिफ्ट किया था। पत्रकार बिदके तो बहुत पर उन की कलई एक दूसरे पर खुल चुकी थी। और पत्रकार की कलई कहीं भी खुले, पर वह यह हरगिज नहीं चाहता कि उस की कलई किसी दूसरे पत्रकार के सामने खुले।

बहरहाल, मंत्री जी के खि़लाफ ख़बरें छपनी बंद हो गईं।

जाने उस प्रेस कांफ्रेंस का फ्रस्ट्रेशन था या कुछ और उसी हफ्ते एक काकटेली प्रेस कांफ्रेंस में सरोज जी जरूरत से ज्यादा पी गए। हरदम भांग में टुन्न रहने वाले सरोज जी उस दिन शराब में इतने धुत्त हो गए कि उन्हें कुछ भी ख़याल नहीं रहा। खाते समय वह डोंगे में ही दोनों हाथों से शुरू हो गए। एकाध बार लड़खड़ाए भी वह पर फिर भी नहीं संभले। अंततः स्थिति यह हो गई कि जहां खड़े वह डोंगे को ही प्लेट बनाए दोनों हाथों से किसी बच्चे की तरह खाने में लगे थे, वहां से सभी लोग हट कर एक तरफ हो गए। जब कि अमूमन सभी पिए हुए थे। और पी रहे थे।

प्रेस कांफ्रेंस के आयोजकों ने आखि़रकार उन्हें संभालने की कोशिश की। पर वह उन्हीं जूठे हाथों से एक व्यक्ति की टाई पकड़ कर झूल गए। होटल से बाहर निकलते समय वह शीशे के फाटक में घुसने के बजाय शीशे की दीवार से भिंड़ गए। गनीमत कि शीशा नहीं टूटा और वह हाथ ऐसे हिलाते हुए पीछे हटे गए गोया कोहरा साफ कर रहे हों। खै़र दरबान ने पकड़ कर उन्हें बाहर किया। बाहर आयोजकों ने उन्हें संभाला। उन्हें घर पहुंचाने ख़ातिर कार का फाटक खोल कर एक व्यक्ति खड़ा हो गया। कार का फाटक खुलते ही सरोज जी कार में घुसने की बजाय कार का फाटक पकड़ कर सड़क पर धम्म से बैठ गए और बोले, ‘‘चलौ !’’

जिमखाना क्लब में एक दवा कंपनी की प्रेस कांफ्रेंस में सरोज जी की यह नौटंकी आकाशवाणी का संवाददाता एम॰ लाल संजय से बतिया ही रहा था कि हेरल्ड के न्यूज एडीटर चौहान ने ठीक वही हरकत यहां शुरू कर दी थी। वह भी दोनों हाथों को डोंगे में डाल कर मुर्गे की लेग पीस ढूंढ़ रहा था और चिल्ला रहा था, ‘‘सारी टांगें साले बीन ले गए।’’ चौहान की इस हरकत से सब का नशा टूट रहा था। वार्ता का द्विवेदी बोला, ‘‘ऐसे लोगों को बुला कौन लेता है ?’’

‘‘कौन साला कमेंट कर रहा है ?’’ चिल्लाते हुए चौहान ने डोंगा पलट कर नीचे गिरा दिया। और बोला, ‘‘ख़ुद को एसाइन करता हूं और चला आता हूं। है कोई रोकने वाला ?’’

कहते हुए वह लड़खड़ाया। और पलट कर खटाखट दो पेग पी गया। ऐसे, जैसे पानी पी रहा हो। जिमखाना क्लब में उस समय एक्स्ट्रा कंस्ट्रक्शन के लिए नींव खुदी हुई थी और पानी भी रिमझिम-रिमझिम बरस रहा था। मौसम खुशनुमा हो गया था। पर चौहान ने उस मौसम का रंग ख़राब कर रखा था। एम॰ लाल बड़बड़ाया भी, ‘‘उस दिन सरोज ने मजा ख़राब किया आज यह चौहान साला मजा ख़राब करने पर लगा हुआ है।’’ अभी एम॰ लाल खीझ ही रहा था कि पता चला चौहान खुदी हुई नींव के गड्ढे में गिर गया। पता चला वह पेशाब करने गया और पेशाब करते-करते फिसल कर नींव के गड्ढे में लुढ़क गया। खै़र किसी तरह क्लब के बेयरों ने खींच-खांच कर उसे बाहर किया। पीली मिट्टी से सना पुता चौहान फिर हाल में घुस आया। गिरने पड़ने से उसे कोई फर्क नहीं पड़ा था। उलटे वह अब पूरे फार्म में था। चर्म रोग से एक तो वैसे ही उस की पूरी देह सफेद नजर आती दूसरे वह सफेद पैंट पहनता था। पर इस समय उस की सफेद पैंट और सफेद देह पीली मिट्टी में सन कर अजीब सा कोलाज गढ़ रही थी। चौहान का यह रंग रूप देख कर बाकी पत्रकार भी जाने लगे। पर वह झूमता रहा। अचानक द्विवेदी से अयोजकों में से एक ने कह दिया कि, ‘‘इन को भी लेते जाइए।’’ तो द्विवेदी उस पर बिगड़ गया, ‘‘मैं क्यों ले जाऊं ?’’ फिर लाल ने चौहान के घर का पता आयोजकों को दिया और कहा कि, ‘‘इसे ख़ुद पहुंचाने मत जाइएगा, नहीं इस की बीवी आप लोगों को दौड़ा लेगी।’’

‘‘फिर कैसे जाएंगे यह ?’’ आयोजक घबराया।

‘‘कुछ नहीं रिक्शे पर बैठा दीजिएगा। रिक्शे वाले को पैसे दे दीजिएगा। ये घर पहुंच जाएंगे।’’ कह कर लाल संजय के साथ बाहर आ गया।

उन्हीं दिनों लखनऊ से बंबई की उड़ान शुरू होने जा रही थी। पहली उड़ान में पत्रकारों को ले जाने की बात हुई। संपादक ने संजय को इस के लिए एसाइन किया। अब सरोज जी परेशान। संजय को इस एसाइनमेंट से काटने की उन्हों ने चौतरफा कोशिश की। और संयोग से प्रेस क्लब में उन्हीं दिनों संजय का एक पत्रकार से झगड़ा हो गया। सरोज जी को यह बात पता चली। उन्हों ने फौरन इस ख़बर को हवा दी और संपादक से कहा कि, संजय को भेजना ठीक नहीं है। यह वहां जाकर कोई लौंडपना कर देगा तो अख़बार की नाक कट जाएगी।’’ उन्हों ने जोड़ा, ‘‘कोई सीजंड आदमी जाना चाहिए।’’
संपादक ने एक दूसरे रिपोर्टर दिनेश को एसाइन कर दिया जिस के पिता बांगलादेश एंबेसी में रह चुके थे। और वह पीता भी नहीं था। पर सरोज जी उस को भी काटने में लग गए। कहने लगे, ‘‘और अख़बारों से सीनियर-सीनियर जा रहे हैं।’’ और अंततः सरोज जी ख़ुद ही गए। पर बंबई में भी उन्हों ने काफी शराब पी और ख़ूब उत्पात मचाया। गिर पड़ गए।
लखनऊ आ कर उन की बड़ी छींछालेदर हुई।

सरोज जी ने इस तरह लगातार छींछालेदर को धोने के लिए योग पर एक लेख लिखा जिस में उन्हों ने पंडित जवाहर लाल नेहरू से अपनी मुलाकात का जिक्र किया। पूरे लेख में उन्हों ने यही एहसास कराया कि वह कितने सीनियर पत्रकार हैं और कि नेहरू के जमाने से हैं। पर पहले पहल नेहरू से भेंट का ऐसा वर्णन उन्हों ने लिखा कि सीनियर का मान पाने के बजाय उलटे वह मजाक बन गए। उन्हों ने लिखा कि तब पंत जी मुख्यमंत्री थे और नेहरू जी लखनऊ आए हुए थे। वह पंत जी के घर ठहरे हुए थे। कुछ पत्रकार नेहरू जी से मिलने पंत जी के घर सुबह-सुबह पहुंच गए। पत्रकार बहुत देर तक बैठे रहे पर नेहरू जी बाहर नहीं आए। पता चला कि वह बाथरूम में हैं। पर जब बहुत देर हो गई तो पत्रकारों को जिज्ञासा हुई कि आखि़र नेहरू जी बाथरूम में इतनी देर तक कर क्या रहे हैं ? सो पत्रकारों ने यह पता लगाने का काम सरोज जी के जिम्मे छोड़ा। सरोज जी ने कुर्सी लगा कर बाथरूम की खिड़की से अंदर झांका तो देखा कि नेहरू जी तौलिया पहने शीर्षासन कर रहे हैं। यह जिक्र करते हुए सरोज जी ने नेहरू की सेहत का राज शीर्षासन बताया और यह भी जोड़ा कि मेरी सेहत का राज भी शीर्षासन ही है। और जब कभी मैं भी बाहर जाता हूं तो समय निकाल कर बाथरूम में शीर्षासन जरूर कर लेता हूं।

इस लेख से तीन चार मौलिक प्रश्न उठ गए और सरोज जी फिर मजाक के विषय बन गए। पहला सवाल यह उठा कि क्या सरोज जी शुरू से उठल्लू और बेवकूफ श्रेणी के पत्रकार थे ? आखि़र बाथरूम में झांकने का काम उन्हीं को क्यों सौंपा गया ? दूसरे यह कि नेहरू तब प्रधानमंत्री थे। उन्हें बाथरूम में चुपके से शीर्षासन करने की क्या जरूरत थी ? उन के लिए जगह की कमी तो थी नहीं। तीसरे, उन्हें प्रोटोकाल के हिसाब से मुख्यमंत्री निवास के बजाय राजभवन में ठहरना चाहिए। चौथे, यह कि अगर मित्रवत वह पंत जी के यहां ठहर भी गए तो क्या सुरक्षा व्यवस्था इतनी लचर थी कि कोई भी ऐरा गैरा उन के बाथरूम में झांक सकता था। तथा पांचवां और सब से महत्वपूर्ण सवाल यह था कि अगर नेहरू जी सिर्फ तौलिया लपेट कर शीर्षासन कर रहे थे तो सरोज जी ने उन का क्या देखा होगा ? जाहिर है शीर्षासन में तौलिया पलट कर पेट पीठ पर आ गई होगी। तो ऐसे में सरोज जी ने नेहरू जी का क्या देखा होगा ? सरोज जी के पास इन और ऐसे अन्य सवालों का कोई जवाब नहीं था।

वह निरुत्तर थे।

बाद में जो एक सवाल उठा वह और ज्यादा मौलिक था कि, सरोज जी की यह उलटबासियां आखि़र छप कैसे जाती हैं ? आखि़र उन्हें पास कौन करता है। जो पास करता है, वह क्या उन का लिखा काटने की हिम्मत नहीं रखता या कि पढ़ता नहीं है?

‘‘एक्जेक्टली, नहीं पढ़ा जाता सरोज जी का लिखा।’’ जवाब मनोहर ने दिया, ‘‘क्यों कि कनखजूरे जैसी बड़ी-बड़ी अस्पष्ट लिखावट कुछेक पुराने कंपोजिटरों को छोड़ कर कोई नहीं पढ़ पाता। मैटर पास करने वाला वह चाहे एडीटर हो या सब एडीटर सरोज जी से कंटेंट पूछ कर सिर्फ हेडिंग लगा देता है। अंदर कंटेंट में डिटेल्स क्या है वह या तो सरोज जी जानते हैं या फिर बाद में वह कंपोजिटर जानता है। अब वह कंपोजिटर ख़बर रोके तो रुके नहीं छप जाने के बाद कोई क्या कर सकता है ?’’

‘‘पर प्रूफ के बाद तो देखा जा सकता है। प्रूफ से भी एडिट किया जा सकता है।’’

‘‘इतनी फुर्सत किसे है ?’’ मनोहर बोला, ‘‘और अब तो सरोज जी लिखते भी बहुत कम हैं। वह ज्यादातर एजेंसी की ख़बरों पर ही विशेष प्रतिनिधि लिख कर दे देते हैं। और कभी-कभी तो डेस्क पर ही आ कर कह देते हैं कि फला-फला ख़बर आएगी उस पर विशेष प्रतिनिधि लगा देना।’’ मनोहर प्रेस क्लब में बैठा सरोज जी की बखिया उधेड़ता जा रहा था। मनोहर इस समय चौथे पेग पर था और बता रहा था कि, ‘‘एक समय हिंदुस्तान समाचार न्यूज एजेंसी का एक रिपोर्टर रामनाथ, सरोज जी से हरदम परेशान रहता। वह कोई भी इक्सक्लूसिव स्टोरी फाइल करता, सरोज जी फट उस पर अपनी बाइलाइन गांठ देते।’’ मनोहर अब पांचवें पेग पर था और बता रहा था कि, ‘‘वह इमर्जेंसी के दिन थे। एजेंसी के उस रिपोर्टर रामनाथ ने लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन पर तब के डायनामाइट कांड के हीरो जार्ज फर्नाडीज की गिरफ्तारी की एक लंबी चौड़ी स्टोरी जारी कर दी। सरोज जी ने टप से उसे टेलीप्रिंटर पर से फाड़ा, उतारा, ‘‘बड़ी फर्स्ट क्लास इस्टोरी है’’ कह कर डेस्क पर दिया और सीढ़ियां उतर गए। बाद में रात में एजेंसी ने फर्नांडीज की गिरफ्तारी वाली स्टोरी को रिग्रेट कर लिया । और फ्लैश भेज दिया कि उस स्टोरी को न लें क्यों कि बाद में जांचने पर पाया गया कि ऐसी कोई घटना घटी ही नहीं। डेस्क वाले भी एक जाहिल। उन्हों ने ख़बर भेजने वाले रजिस्टर से जांचा और देखा कि उस न्यूज एजेंसी की कोई ख़बर गई ही नहीं थी। सो नाइट शिफ्ट का इंचार्ज बोला, ‘‘जब ख़बर गई ही नहीं तो रोकना किस को है ?’’ और इस तरह दूसरे दिन जार्ज फर्नांडीज की गिरफ्तारी की ख़बर सरोज जी की बाइलाइन के साथ बैनर बन कर छप गई। जब कि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था।’’ मनोहर बोला, ‘‘दूसरे दिन सरोज जी और अख़बार की वो थू-थू हुई कि पूछो मत।’’

पर सरोज जी की यह एजेंसी वाली ख़बरें ज्यों की त्यों टपाने वाली आदत फिर भी नहीं गई।

सरोज जी कवि सम्मेलनों, कवि गोष्ठियों की अध्यक्षता अक्सर ही करते रहते थे। आयोजकों को दोहरा लाभ होता था। एक तो स्थाई अध्यक्षता करने वाला सरोज जी का ‘‘व्यक्तित्व’’ मिल जाता था, दूसरे बिना किसी कोशिश के अख़बार में ख़बर छप जाती थी। वह भी ठीक-ठाक डिस्प्ले के साथ। पर अब वह उम्र के इस पड़ाव पर जब सपने टूटते हुए देखते तो उसे जगह-जगह अपने सम्मान समारोह आयोजित करवा कर पूरा करने की कोशिश करने लगे थे। अब तक उन के सपने दो से तीन की संख्या धारण कर चुके थे। एक एम॰ एल॰ सी॰, दूसरा संपादक, तीसरा हिंदी संस्थान का लखटकिया पुरस्कार। पर तीनों ही उन के हाथ से फिसलते जा रहे थे। नौकरी से रिटायर हो कर एक हजार रुपए के विशेष प्रतिनिधि का पद उन्हें अब बहुत नहीं भाता था। पर वह जैसे अभिशप्त थे इसे ढोने के लिए। ऐसे में छोटे-मोटे उन के सम्मान समारोह उन के सपनों को जैसे सांस दे देते। कई बार उन का सम्मान अकेले होता तो उन्हें फीका-फीका सा लगता । समारोह भी सिर्फ अख़बार में ही सफल होता। वास्तव में तो वह मातम समारोह हो जाता। इस से बचने के लिए सरोज जी अकसर आयोजकों को साथ ही दो तीन और व्यक्तित्वों का सम्मान करने के लिए प्रेरित करते। पर तब वह खुद उपेक्षित हो जाते। और अकसर उन्हें छोटी या बची हुई माला ही नसीब होती। इस से भी वह बहुत दुखी रहते। दफ्तर आते और माला मेज पर निकाल कर रख देते। और जिस-तिस को पकड़ कर सम्मान समारोह का बखान बताते रहते।

एक बार सरोज जी बड़ी सी माला पहने रात के नौ बजे दफ्तर आ गए। और जो भी कोई दफ्तर में मौजूद था उस के सामने से वह गुजरे जरूर। कोई पंद्रह किलोमीटर दूर से वह माला पहन कर आए थे। माला पहने ही प्रेस में भी बेवजह ही वह चक्कर मार आए। ऐसे जैसे पानीपत की लड़ाई जीत कर आए हों। उन की चाल में बच्चों की सी ललक और चेहरे पर विजेता की सी मुसकान थी। वह माला पहने बड़ी देर तक इधर से उधर मंडराते रहे। और अंततः नुमाइश बन बैठे। अब हर कोई सरोज जी की माला देखने लगा था। फिर उस रात माला पहने ही वह घर गए। अंगरेजी वाले अख़बार के संपादक से रहा नहीं गया। बोले, ‘‘लगता है आज यह सोते समय भी माला नहीं उतारेंगे।’’

‘‘उतारेंगे ?’’ त्रिपाठी बोला, ‘‘मुझे तो डर है कहीं कल भी न यह माला पहन कर वह दफ्तर आ जायें। आखि़र नाप से बड़ी जो मिली है।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘माला।’’

‘‘हो सकता है।’’ संपादक कंधे उचका कर बोले, ‘‘सरोज जी ऐसा भी कर सकते हैं!’’

पर दूसरे दिन सरोज जी माला पहन कर दफ्तर नहीं आए। शायद इस लिए कि माला वाली उन की फोटो अख़बार में छप गई थी। फिर भी मीटिंग में वह फोटोग्राफर पर बरस पड़े कि, ‘‘माला की पूरी लेंथ में फोटो क्यों नहीं खींची ?’’ और वह सफाई दे रहा था, ‘‘खींची तो थी दादा, पर डेस्क वालों ने काट दी।’’

‘‘डेस्क वालों ने काट दी।’’ चिढ़ाते हुए सरोज जी ने उस की बात दुहराई। दूसरी ओर त्रिपाठी ‘‘वो नहीं आई आज सरोज जी के साथ’’ कहता घूमता रहा। लोग पूछते, ‘‘कौन नहीं आई ?’’ त्रिपाठी बोलता, ‘‘माला !’’ लोग हंसने लगते।

कुछ दिन बाद लखनऊ महोत्सव में सरोज जी ने अपने सम्मान की योजना बनवाई। महोत्सव के कवि सम्मेलन का संयोजक विनय था। विनय कवि कम कवि सम्मेलनों का संयोजक ज्यादा था। कविता वह ऐसे पढ़ता जैसे जिंदगी का सब से निकृष्टतम कार्य कर रहा हो। कविताएं भी उस की मधुकर की तरह स्मगलिंग वाली ही होतीं। पर मधुकर का कविता पाठ उसे ‘‘असली कवि’’ बना देता। पर विनय का कविता पाठ भी उसे स्मगलर ही साबित करता। और अमूमन वह अपने ही द्वारा आयोजित कवि सम्मेलनों में हूट हो जाता। पर इस का उसे कभी मलाल नहीं होता। उसे तो बस कवि सम्मेलन से होने वाली आमदनी से सरोकार रहता। दरअसल विनय, मधुकर से बड़ा कमीशनखोर था। तो महोत्सव में विनय से कह कर सरोज जी ने अपने सम्मान की व्यवस्था कर ली। और सबको फोन कर-कर बताते रहे कि ‘‘मेरा सम्मान है, आइएगा जरूर।’’ सम्मान उन का गरिमापूर्ण हो इस के लिए उन्हों ने फिर साथ में कुछ और महत्वपूर्ण लोगों का सम्मान साथ में निश्चित करवा लिया। जैसा कि डर था कि सरोज जी के इस सम्मान समारोह में भी वही हुआ। सम्मानित होने वाले और व्यक्तित्वों के आगे सरोज जी बौने हो गए। और चूंकि उन का खुद का सम्मान समारोह था इस लिए अध्यक्षता से भी वह हाथ धो बैठे थे। मंच पर उन्हें ठीक से बैठने की जगह भी नहीं मिली। और गजब यह हुआ कि सब का सम्मान हो गया, माला हो गई, शाल और मानपत्र हो गया पर सरोज जी का नाम ही भूल गए आयोजक। बाद में विनय को बुला कर सरोज जी ने जब याद दिलाया तब कहीं उन के सम्मान का नंबर आया। संचालक ने सरोज जी का नाम भूल जाने के लिए माफी मांगी और उन का नाम पुकारा। बात यहीं तक होती तो गनीमत होती। कवि सम्मेलन का संचालक जैसे उन से खार खाए बैठा था। उस ने सरोज जी को शुरू के दो तीन लोकल कवियों के क्रम में ही कविता पाठ के लिए बुला लिया। सरोज जी कुपित हो गए। पर नाम कविता पाठ के लिए पुकार लिया गया था, वह करते भी तो क्या करते। आदतवश माला उन के गले में ही थी। कंधे पर उन्हों ने सम्मान वाली शाल भी डाल रखी थी। माइक पकड़ कर वह खड़े हो गए। बताया कि, ‘‘क्रम में यह मेरा स्थान नहीं।’’ संचालक की और आग्नेय नेत्रों से फुफकारा और वीर रस की एक लंबी कविता बेलीगारद का पाठ शुरू कर दिया। पर ‘‘बेलीगारद ! बेलीगारद।’’ चार बार सुना कर ज्यों ही वह दूसरी लाइन पर आए हूटिंग शुरू हो गई। जबरदस्त हूटिंग ! पर सरोज जी जैसे बहरे हो गए। हूटिंग उन्हों ने नहीं सुनी। जब श्रोता खड़े हो कर हूट करने लगे तो उन्हों ने कान के साथ-साथ आंखें भी बंद कर लीं। पर कविता पाठ नहीं बंद किया। हूटिंग का शोर इतना जबरदस्त था कि सिवाय बेलीगारद के सरोज जी का उच्चारा कुछ भी सुनाई नहीं पड़ रहा था। बिलकुल विधान सभा या संसद जैसा दृश्य उपस्थित था। पर सरोज जी बेलीगारद कविता का पाठ ऐसे कर रहे थे जैसे कोई मंत्री सदन में शोर गुल की परवाह किए बिना अपना वक्तव्य पढ़ता जा रहा हो। वीर रस की उन की कविता का वाचन अब तक करुण रस में बदल गया था। सरोज जी कांपने लगे। इस कंपकंपाहट में उन की सम्मान वाली शाल कंधे से नीचे गिर गई। श्रोताओं के बीच से बिलकुल विधान सभा की तर्ज पर ‘‘पढ़ा हुआ मान लिया गया’’ कि आवाज भी कई बार आई। वह रूआंसे हो गए। लगा कि सरोज जी अब रो देंगे। पर वह रोए नहीं। उन का कविता पाठ भी नहीं रुका। मंच पर बैठे कवि हंसते रहे। और इस तरह कोई आध घंटे सरोज जी कविता पढ़ते रहे। और तब तक कविता पढ़ते रहे जब तक वह ख़त्म नहीं हुई। कविता ख़त्म हुई। सरोज जी बिलकुल एबाउट टर्न स्टाइल में पीछे मुड़े। नीचे गिरी सम्मान वाली शाल उठाई, कंधे पर पहले की तरह रखा और अपनी जगह वापस आ, सीना फुला कर मुसकुराते हुए वह ऐसे बैठे गोया उन के साथ कुछ हुआ ही न हो।

दूसरे दिन रिपोर्टर्स मीटिंग में वह बताने लगे कि, ‘‘लोगों ने फोन करि-करि के बताया कि सरोज जी कविता तो बस आप ही ने पढ़ी बाकी तो सब भड़ैती हुई।’’ उन्हों ने जोड़ा, ‘‘ख़ास कर आफिसरों ने। सीनियर-सीनियर आफिसरों ने। जो प्रबुद्ध लोग थे। सब यही कहि रहे थे कि कविता तो बस सरोज जी की।’’ सरोज जी की आत्म प्रशंसा अभी चालू ही थी कि फोटोग्राफर शुक्ला आ गया। उसे देखते ही सरोज जी मुसकुराए और बोले, ‘‘आवो आवो।’’ वह बैठ गया तो उन्हों ने पूछा ‘‘फोटो तो अच्छी आई है ?’’

‘‘कौन सी ?’’ शुक्ला अचकचाया।

‘‘हईं ?’’ सरोज जी ने आंखें चौड़ी कीं, ‘‘अरे हमारे सम्मान की और किस की ?’’

‘‘आप का सम्मान हुआ था ?’’ शुक्ला चकित होता हुआ बोला।

‘‘का बकि रहे हौ !’’ सरोज जी रौद्र रूप में आ गए, ‘‘सब के सामने हुआ और तुम ने देखा ही नहीं !’’

‘‘नहीं दादा !’’ शुक्ला मासूमियत भरी मायूसी ओढ़ कर बोला, ‘‘जब सब का सम्मान हो गया तो मैं पेशाब करने चला गया।’’ उस ने बताया, ‘‘हां, आप की बेलीगारद वाली कविता सुनी थी। ऊ फोटो भी खींची है। बेलीगारद वाली कविता पढ़ते समय आप की।’’

‘‘बेलीगारद !’’ पूरे सुर में भड़कते हुए सरोज जी बोले, ‘‘असली फोटो लिए नहीं। बेलीगारद लई लिए।’’ वह बिफरे, ‘‘मुख्यमंत्री सम्मानित करि रहा था, सब के सामने ई देखे नहीं।’’ सरोज जी चीखे़, ‘‘बेलीगारद देख रहे थे। जाइए देखिए बेलीगारद !’’ वह हांफने लगे, अब हम नाहीं बचाइ पाएंगे आप की नौकरी। कउनो अउर अख़बार में जाई के बेलीगारद देखिए। हियां अब ई सब नहीं चलेगा।’’ कह कर सरोज जी हांफते हुए उठ गए।

रिपोर्टर्स मीटिंग बर्खास्त हो गई थी।

शुक्ला की नौकरी थी ही नहीं, तो जाती भला कहां से। हां, उस की रिटेनरशीप बची रह गई। उस ने संपादक को सब कुछ साफ-साफ बता दिया था। अलबत्ता उस दिन से शुक्ला का दफ्तर में बेलीगारद नाम पड़ गया। शुरू में वह इस नाम से चिढ़ उठता पर बाद में सामान्य हो गया। पर सरोज जी शुक्ला के प्रति फिर कभी सामान्य नहीं हुए।

सरोज जी झूठ गढ़ने और झूठ बोलने में भी महारत रखते थे। वजह बेवजह झूठ गढ़ना और झूठ बोलना जैसे उन की आदत में शुमार था। वो वि॰ प्र॰ सिंह की जनमोर्चा के दिन थे। बोफोर्स का घड़ा बस फूटा ही था। संजय ने एक ख़बर लिखी कि कांग्रेस के बाइस हरिजन विधायकों ने जनमोर्चा ज्वाइन करने का फैसला लिया। संजय ने यह ख़बर दिन ही में लिख कर संपादक को दे दी। शाम को वह चुपचाप बैठा था। सरोज जी ‘‘कुछ गड़बड़ है’’ यह भांप गए थे। कई बार, ‘‘आज का दे रहे हैं ?’’ पूछ-पूछ कर उन्हों ने सूंघने की कोशिश की। पर संजय हर बार मायूस हो कर ‘‘कुछ नहीं, सरोज जी’’ कह कर उन्हें टालता रहा। पर दूसरे दिन जब ख़बर छपी तो हमेशा की तरह सरोज जी हांफते हुए संजय से बोले, ‘‘ई का लंतरानी हांक मारे हैं ?’’ वह बिफरे, ‘‘और शाम को कहि रहे थे कुछ नहीं।’’

संजय चुप रहा।

‘‘घबराइए नहीं, शाम तक आप को प्रेम पत्र मिलि जाएगा।’’ सरोज जी गरदन तिरछी करते हुए बोले।

‘‘क्या मतलब ?’’ संजय हकबकाया।

‘‘टाइप होइ रहा है।’’ सरोज जी बोले, ‘‘इज्जत प्यारी होय तो इस्तीफा देइ डालिए।’’

‘‘क्यों ?’’

‘‘बाइसों विधायकों ने लिख के दइ दिया है कि जनमोर्चा से उन को कवनो वास्ता नाहीं। ख़बर मनगढ़ंत है।’’

‘‘पर बैठक में तो वह बाइसो थे। सब ने दस्तख़्त की है।’’ संजय सफाई में बोला।

‘‘आप के पास है दस्तख़त ? आप थे बैठक में ?’’ सरोज जी ठंडे स्वर में बोले।

‘‘नहीं।’’ संजय बोला, ‘‘पर ख़बर तो सौ फीसदी सही है।’’

‘‘ख़ाक सही है !’’ सरोज जी बोले, ‘‘ई दिल्ली नहीं, लखनऊ है।’’ संजय घबरा कर संपादक के पास गया। पूछा कि माजरा क्या है। सरोज जी तो ऐसा-ऐसा कह रहे हैं। संपादक ने बताया कि, ‘‘खंडन लिखित तो नहीं पर दो तीन फोन जरूर ऐसे आए हैं। पर निश्चिंत रहिए। ऐसी कोई बात मेरी समझ से नहीं है।’’ उन्हों ने जोड़ा, ‘‘सरोज जी का परेशान होना लाजमी है। एक तो उन की कांग्रेस बीट पर हमला दूसरे, मुख्यमंत्री के यहां जी हुजूरी में बाधा।’’

संजय दफ्तर से बाहर आ गया। सिगरेट सुलगाए यहां वहां दिन भर घूमता रहा। कांग्रेस के प्याले में तो जैसे तूफान आ गया था। शाम को वह खुश-खुश दफ्तर आया तो सचमुच बाइस में से बीस विधायकों का लिखित खंडन आ चुका था। सरोज जी की बात सच निकली। संजय के पैर तले से जैसे जमीन खिसक गई। संपादक ने कहा, ‘‘खंडन आया है तो छपेगा भी।’’

‘‘पर साथ में मेरा पक्ष भी तो छप सकता है ?’’ संजय ने संपादक से कहा।

‘‘जरूर छप सकता है।’’ विधायकों की सारी खंडन वाली चिट्ठियां देते हुए संपादक ने कहा, ‘‘इन का खंडन बना कर अपना पक्ष भी लिख दीजिए। पर आज ही।’’

‘‘दो दिन का मौका नहीं मिल सकता ?’’

‘‘मुश्किल है।’’ संपादक ने कहा, ‘‘हमारे ऊपर भी मालिकों का दबाव है। कल खंडन नहीं छपा तो मेरी पेशी हो जाएगी। आखि़र कांग्रेस रूलिंग पार्टी है और बनिये के उस से पचास काम हैं।’’

‘‘फिर भी बस एक दिन !’’ संजय ने विनती की। संपादक मान गए और बोले, ‘‘एक दिन का मतलब एक दिन।’’

‘‘बिलकुल !’’

‘‘संजय दफ्तर से बाहर आ गया। और यह ख़बर देने वाले उस हरिजन आई॰ ए॰ एस॰ अधिकारी के घर जा पहुंचा जिस की बीवी भी विधायिका थी। सचिव स्तर के उस आई॰ ए॰ एस॰ अधिकारी ने विधायकों के खंडन वाले सारे पत्र देखे और मुसकुराया।

‘‘आप हंस रहे हैं और मेरी जान पर बन आई है।’’ संजय बिफरा।

‘‘कुछ नहीं संजय जी ! कुछ नहीं। आप बिलकुल फिक्र मत कीजिए।’’ वह बोला, ‘‘ख़बर आप की हंडरेड परसेंट सही है। घबराने की कोई बात नहीं।’’

‘‘पर सुबूत क्या है ?’’ संजय बोला, ‘‘ख़बर सही है यह तो मैं भी जानता हूं। पर अब तो सुबूत चाहिए। सुबूत !’’

‘‘सुबूत मिल जाएगा।’’ कहते हुए उस ने शराब की बोतल खोली और गिलास में ढालने लगा। दूसरी गिलास संजय को देते हुए बोला, ‘‘आज तक मेरी दी कोई ख़बर गलत साबित हुई है ?’’ वह जोर दे कर बोला, ‘‘बोलिए !’’

‘‘नहीं, हुई तो नहीं है।’’ संजय बोला, ‘‘पर अब की बात दूसरी है। क्यों कि अब की ख़बर एडमिनिस्ट्रेटिव नहीं पोलिटिकल है।’’

‘‘फिलहाल तो चिंता छोडिए और इंज्वाय कीजिए।’’ वह गिलास में बर्फ डालते हुए बोला, ‘‘कल सब ठीक हो जाएगा। चीयर्स।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘बीवी को विधायिका यूं ही नहीं बनवाया है।’’

‘‘चीयर्स !’’ बुझे मन से कह तो दिया संजय ने पर गिलास मुंह से नहीं लगाई।

‘‘आप शुरू कीजिए संजय जी !’’ वह अधिकारी बोला, ‘‘कल सब ठीक हो जाएगा। डोंट वरी !’’

‘‘कैसे वरी न होऊं ?’’ संजय शराब की चुस्की लेता हुआ ठंडे स्वर में बोला।

‘‘अब हुई न बात !’’ कह कर वह अधिकारी झूम गया। बोला, ‘‘संजय जी आज मजा आ गया। आप के इस स्कूप ने आज बोफोर्स की बहस को किनारे कर दिया। आज दिन भर लखनऊ से दिल्ली तक इसी की चर्चा होती रही। फोन में, प्लेन में, ट्रेन में हर कहीं यही चरचा कांग्रेस के बाइस विधायक जनमोर्चा में। और कांग्रेसियों का ख़ून सूखता रहा।’’

‘‘पर अभी तो मेरा ख़ून सूख रहा है।’’ संजय बोला।

‘‘क्यों सूख रहा है ?’’ उस अधिकारी का यह तीसरा पेग था। और वह तीसरे पेग में ही बहकने लगा। जाने उस ख़बर का नशा था कि शराब का नशा वह झूमता हुआ संजय का हाथ पकड़ कर बोला, ‘‘मजा आ गया।’’ वह बोला, ‘‘आप क्या समझते हैं मैं कच्ची गोलियां खेलता हूं।’’ और जैसे राजभरी आंखें फैलाता हुआ वह बोला, ‘‘मेरे पास सारा सुबूत है। क्या समझे ?’’ वह बहका, ‘‘एक-एक विधायक की सिगनेचर है।’’

‘‘सच !’’ संजय खुशी से छलक उठा, ‘‘तो दीजिए न !’’

‘‘यहां हो तब न दूं।’’ वह बहकते हुए बोला, ‘‘एक-एक दस्तख़्त हैं। पर यहां नहीं दफ्तर में हैं। कल दोपहर बाद आइएगा दे दूंगा। पर यह खंडन मत छपने दीजिएगा।’’

फिर वह अपनी बीवी से, ‘‘खाना लगवाओ’’ कह कर नया पेग बनाने लगा। उस की बीवी जो विधायिका थी, कांपती हुई आई और खाना लगवा कर बैठ गई। रात के साढ़े बारह बज रहे थे। वह बैठी-बैठी नींद में ऊंघ भी रही थी। दुबली पतली सी उस की पत्नी इस उम्र में भी सुंदर दिख रही थी।

‘‘एक पेग और हो जाए !’’ कह कर संजय ने अभी खाना नहीं खाने की इच्छा जता दी।

‘‘बिलकुल हो जाए !’’ उस अधिकारी ने जोड़ा, ‘‘आज के नायक आप हैं। आप का कहा कौन भला तोड़ सकता है ?’’

‘‘नहीं बात यह नहीं है।’’ संजय लजाता हुआ बोला, ‘‘असल में अब पीने का मन हो रहा है।’’

‘‘तो अब तक क्या कर रहे थे ?’’ वह हंसता हुआ बोला।

‘‘अभी तो बस बेस बना रहा था।’’ संजय बोला, ‘‘पीना तो अब चाहता हूं।’’

‘‘पांच पेग हो गए और आप कह रहे हैं कि पीना तो अब चाहता हूं।’’

‘‘कहा न अभी बेस बना रहा था।’’

‘‘ठीक है पर मैं तो अब नहीं लूंगा।’’

‘‘साथ तो दे सकते हैं ?’’

‘‘ओह श्योर !’’ कहते हुए वह अपनी बीवी से बोला, ‘‘तुम लोग खा लो भई। हम लोगों को अभी देर लगेगी।’’

उस की बेटियां भी खाने की मेज पर आ गईं। संजय ने गौर किया कि एक बार वह अपनी कार में एक लड़की बिठाए जा रहा था संजय ने उसे घूरा तो उस ने प्रदर्शित किया जैसे वह उस की बेटी हो। पर वह ‘‘बेटी’’ नहीं थी खाने की मेज पर। पहले उस ने सोचा कि वह नशे में है शायद इस लिए पहचान नहीं पा रहा है। पर जब उस ने पक्का कर लिया कि वह इन में से नहीं है तो पूछ ही बैठा, ‘‘आप की वो वाली बेटी नहीं है क्या ?’’

‘‘है तो। यह बैठी तो है।’’ आंख मारता हुआ वह बोला, ‘‘वही न जो पढ़ने में बड़ी तेज है। जिस की चरचा मैं ने की थी। उसी को तो पूछ रहे हैं आप ?’’ कहते हुए उस ने फिर आंख मारी।

‘‘हां, हां।’’ संजय बात बदलता हुआ बोला। और समझ गया कि वह लड़की कोई और थी जिस की चरचा यह यहां नहीं करना चाहता।

संजय को अपने पड़ोसी आई॰ ए॰ एस॰ अधिकारी भाटिया की याद आ गई। जो उस के फ्लैट के नीचे वाले फ्लैट में रहता था। और उन दिनों समाज कल्याण विभाग का निदेशक था। संजय जब अपने बच्चे को स्कूल छोड़ने जाता तो भाटिया हाफ पैंट पहने कार से उतरता। वह बताता, ‘‘टहलकर आ रहा हूं।’’ उस की सेवा में चार पांच गाड़ियां और तमाम नौकर चाकर लगे रहते। सो जब वह कार से उतरता हुआ बोलता, ‘‘टहल कर आ रहा हूं।’’ तो संजय को हैरानी नहीं होती। पर एक रोज गजब हो गया।

वह इतवार का दिन था।

संजय सोया हुआ ही था कि किसी ने तेज-तेज काल बेल बजाई। दरवाजा खोला तो देखा गैराज के ऊपर बने क्वार्टरों में रहने वाले दो तीन कर्मचारी थे। वह सब हांफ रहे थे और कह रहे थे, ‘‘संजय जी जल्दी चलिए।’’

‘‘क्यों क्या बात है ?’’ आंखें मीचते हुए संजय बोला।

‘‘बहुत बड़ी ख़बर है।’’ वह एक साथ बोले, ‘‘कैमरा भी ले लीजिए।’’

‘‘कैमरा मेरे पास कहां है।’’ संजय बोला, ‘‘मैं फोटोग्राफर तो हूं नहीं।’’

‘‘तो कैमरा वाला बुला लीजिए।’’

‘‘पर पहले बात तो बताओ।’’

‘‘एक आई॰ ए॰ एस॰ अधिकारी है भाटिया। वह रोज अपने गैराज में सुबह-सुबह कार ले कर आ जाता है। मुंह अंधेरे। फिर आधे-एक घंटे तक गैराज बंद कर अंदर ही रहता है। तो हम लोगों को शक हुआ। आते-जाते कार के अंदर देखते तो वह अकेला ही रहता। एक दिन हम दो तीन लोगों ने पीछा किया। तो देखा गोमती बैराज के पास भाटिया ने कार रोकी। पीछे का फाटक खुला और एक लड़की कार से उतर कर आगे की सीट पर जा कर बैठ गई। हम लोगों को विश्वास नहीं हुआ। एक बार लगा कि आंखों को धोखा हुआ होगा। फिर दुबारा पीछा किया, तिबारा पीछा किया। हर बार यही ड्रामा। उस लड़की के बारे में पता किया तो मालूम पड़ा कि वह उस की पी॰ ए॰ है। और गोमती नगर में रहती है। वह भी सुबह-सुबह टहलने के बहाने निकलती है और यह कार ले कर समय पर पहुंच जाता। फिर वह कार में बैठ जाती। गोमती बैराज पर कार रुकती और वह आगे से पिछली सीट पर आ कर सो जाती। कार गैराज में आ जाती किसी को पता नहीं पड़ता। और गैराज क्या है पूरा बेडरूम है। हार्ड बेड, परदा सब कुछ है।’’

‘‘तो अब गैराज की फोटो खिंचवानी है ?’’ संजय खीझता हुआ बोला।

‘‘नहीं साहब।’’ उस में से दूसरा व्यक्ति बोला, ‘‘उन दोनों की फोटो खींचनी है।’’ वह बोला, ‘‘हम लोग बहुत दिनों से तड़े हुए थे। कि यह मुंह अंधेरे रोज क्यों आता है। और घंटे-घंटे भर अंदर क्या करता है। पर जब लड़की वाली बात पता पड़ी तो पूरी योजना बना कर आज बंद कर दिया साले को।’’ वह अभी यह बात बता ही रहा था कि नीचे से सीढ़ियां चढ़ता एक और व्यक्ति दौड़ा-दौड़ा आया। बोला, ‘‘वह भाटिया तो यहीं नीचे ही रहता है।’’

‘‘चलो उस के बीवी बच्चों को भी उस की कारस्तानी बताएं।’’ दूसरा व्यक्ति बोला। और सब के सब फट फट सीढ़ियां उतर गए। भाटिया की बीवी को बुलाया उन सब ने और सारा वाकया बताया। भाटिया की बीवी कुछ बोली नहीं और घर का दरवाजा नौकर से बंद करवा दिया। वह सब ऊपर आ कर फिर संजय के घर की कालबेल बजाने लगे। संजय अब तक वहां जाने का इरादा बदल चुका था। उस ने सोचा पड़ोसी के फच्चर में पांव फंसाना ठीक नहीं रहेगा। पर कालबेल बजती रही। दरवाजा खोल कर वह बेरूखी से बोला, ‘‘अब क्या बात है ?’’

‘‘बात तो वही है। आप चलिए न साहब।’’ वह बोला, ‘‘पेपर में निकलेगा तो मजा आ जाएगा। आप के पेपर की सेल बढ़ जाएगी।’’

‘‘सेल वेल की चिंता तुम लोग छोड़ो।’’ कहते हुए उस ने अपनी विवशता फिर ओढ़ी, ‘‘मेरे पास कैमरा नहीं है। और बिना फोटो के यह ख़बर बनेगी नहीं।’’

‘‘कैमरे वाले को फोन कर दो साहब।’’

‘‘पर फोटोग्राफर के पास फोन नहीं है।’’

‘‘तो हमें पता बता दीजिए। हम घर से बुला लाएंगे।’’

‘‘अच्छा।’’ कह कर संजय बड़े असमंजस में पड़ गया। उस ने फोटोग्राफर का पता देते हुए कहा, ‘‘काफी दूर रहता है ये।’’

‘‘कोई बात नहीं साहब।’’वह व्यक्ति बोला, ‘‘हम चले जाएंगे। पर आप अभी चलिए।’’

‘‘हम को अभी ले चल कर क्या करोगे ?’’ संजय टालते हुए बोला।

‘‘नहीं साहब आप का अभी चलना जरूरी है।’’ उस में से एक बोला।

‘‘नहाने धोने दोगे कि ऐसे ही चलूं ?’’ संजय ने फिर टाला।

‘‘वापस आ कर नहा धो लीजिएगा।’’ वह व्यक्ति बोला, ‘‘पर अभी वहां पहुंचना जरूरी है।’’

‘‘तुम लोगों ने गैराज में ताला तो बाहर से बंद कर दिया है न ?’’ संजय बोला, ‘‘फिर जल्दी किस बात की, वह भाग तो पाएगा नहीं।’’

‘‘वो तो ठीक है साहब। पर आप चले चलते तो ठीक था।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘हम लोग छोटे कर्मचारी हैं।’’

‘‘और वह आई॰ ए॰ एस॰ अधिकारी है। कभी कहीं हमारे ही विभाग में अफसर बन कर आ जाए तो हम लोगों की तो नौकरी खा जाएगा।’’ दूसरा व्यक्ति बोला, ‘‘इसी लिए हम लोग सामने नहीं आना चाहते।’’

‘‘पर उस की बीवी के सामने तो आ गए हो।’’ संजय बोला, ‘‘इस तरह डरना था तो ताला ही नहीं लगाना था।’’

‘‘अब तो साहब सांप के बिल में हाथ डाल दिया है।’’ पहला व्यक्ति बोला।

‘‘तुम लोग ऐसा करो कि पुलिस को ख़बर कर दो।’’ संजय सलाह देते हुए बोला, ‘‘वह लड़की समेत पकड़ा जाएगा। बेइज्जत होगा। और सारे अख़बारों में अपने आप ख़बर छप जाएगी।’’

‘‘पुलिस में भी आप ही ख़बर कर दीजिएगा साहब।’’ दूसरा व्यक्ति बोला।

‘‘जब सब हम ही कर दें तो तुम लोग क्या करोगे ?’’ संजय उकता कर बोला।

‘‘पुलिस हम लोगों की कहां सुनेगी ?’’ दूसरा व्यक्ति फिर बोला।

‘‘क्यों नहीं सुनेगी पुलिस ? बिलकुल सुनेगी।’’ संजय बोला, ‘‘बस तुम लोग यह मत बताना कि पुलिस से कि किसी आई॰ ए॰ एस॰ अफसर को बंद किया है। वरना थाने की पुलिस भी डर जाएगी। तुम लोग ऐसे ही कोई ड्राइवर वगैरह बताना।’’

‘‘ठीक साहब !’’ पहला व्यक्ति बोला।

‘‘ठीक-ठीक नहीं अब चले जाओ।’’ संजय ने कहा, ‘‘अब हमें भी नहा धो लेने दो।’’

नहा धो कर संजय गैराज पर पहुंचा तो पुलिस, फोटोग्राफर सभी आ चुके थे। पर वह आई॰ ए॰ एस॰ अफा्सर भाटिया भाग चुका था। हुआ यह कि जब इन आदमियों ने भाटिया की बीवी को किस्सा बताया तो उस ने तुरंत हथौड़ी दे कर एक नौकर को भेज दिया। उस ने बाहर से गैराज का ताला तोड़ कर भाटिया को लड़की समेत भगा दिया। वैसे गैराज की हालत देख कर लगता था कि भीतर से भाटिया ने भी गैराज का फाटक तोड़ने की कोशिश कार से धक्का मार-मार कर की थी। भाटिया वहां से निकला तो बाहर की भीड़ उसे देखते ही तितर बितर हो गई। उलटे उस ने वहां लोगों को गालियां दी और धमकी भी कि, ‘‘एक-एक को देख लूंगा।’’ और वहां से निकल भागा।

संजय पछता कर रह गया। उस ने ख़ुद से ही सवाल किया कि, ‘‘क्या उस ने ख़ुद नहाने धोने के बहाने भाटिया को बचने का मौका नहीं दिया ? पड़ोसी धर्म निभाने में लग गया ?’’

‘‘सो तो है !’’ उस ने खुद को जैसे जवाब दिया।

उस ने सोचा कि भाटिया के घर आज महाभारत मचेगा। पर उस की बीवी ने ऐसा कुछ नहीं किया। किसी को पता भी नहीं चला कि ऐसा कुछ हुआ है। पर उस के बाद से हुआ यह कि भाटिया की शक्ल काफी दिनों तक नहीं दिखी। उस का टहलना जैसे बंद हो गया था। नौकरों को सुबह-सुबह डांटने की भाटिया की आवाज भी गायब हो गई थी। उस की बीवी ऐसे चेहरा गिराए दिखती गोया यह हरकत भाटिया ने नहीं उसी ने किया हो। संजय को देखते ही वह आंखें नीची कर लेती। उस की बेटियों का भी यही हाल था। संजय ने भी किसी से कुछ नहीं कहा, न ही ख़बर लिखी। एक बार उस ने सोचा कि एक सटायर पीस या टिट बिट्स का एक पीस बिना नाम लिए लिख दे। पर नहीं लिखा। टाल गया। पर बाद में उस ने गौर किया कि भाटिया की बीवी उसे घृणा की नजरों से देखने लगी। शायद उसे लगा कि वह सब कुछ संजय ने ही कराया हो।

भाटिया अब फिर टहलने जाने लगा था। वह ऐसे मिलता जैसे कुछ हुआ ही नहीं। संजय ने उसे एहसास भी नहीं कराया। न ही कोई चरचा की। बात ख़त्म हो गई थी।

संजय ने उसी तरह यहां भी बात ख़त्म कर दी। और एक पेग ख़त्म होते न होते वह भी खाने की मेज पर आ गया और बोला, ‘‘हम लोग भी खा ही लें।’

खाना खाते-खाते पता नहीं कैसे बात ब्राह्मणों पर आ गई। और वह हरिजन आई॰ ए॰ एस॰ अधिकारी जो खुद अपने को सिंह लिखता था ब्राह्मणों को गाली देने लगा। पहले तो संजय ने टाला। पर जब बहुत हो गया तो जैसे भीतर से उस का ब्राह्मण जागा और बोला, ‘‘इस तरह ब्राह्मणों को गालियां मत दीजिए !’’

‘‘क्यों ?’’

‘‘इस लिए कि मैं भी ब्राह्मण हूं।’’ संजय बोला।

‘‘आप ब्राह्मण हैं ?’ वह बोला, ‘मैं नहीं जानता था। वेरी-वेरी सॉरी !’’ वह रुका और बोला, ‘‘फिर भी आप यह मानेंगे कि ब्राह्मणों ने हमारी जाति पर बड़ा जुल्म किया है।’’ वह थोड़ा रुका फिर बोला, ‘‘पर आप ब्राह्मण हैं, यह मैं नहीं जानता था। जानता तो आप के सामने ऐसे नहीं बोलता।’’ वह हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘व्यक्तिगत रूप से आप को कष्ट पहुंचाने का मेरा इरादा नहीं था। क्षमा चाहता हूं।’’

‘‘कोई बात नहीं ! पर आप अपनी बात बिना गाली दिए भी कह सकते हैं।’’ कह कर संजय चुप हो गया।

‘‘पर आप कौन से ब्राह्मण हैं ? वह बोला, ‘‘आई मीन आप अपने नाम के आगे तो कुछ लिखते नहीं ?’’

‘‘आप बुरा न मानें तो आप से पूछूं ?’’

‘‘श्योर !’’

‘‘आप कौन से सिंह हैं ?’ संजय बोला, ‘‘आप तो अपने नाम के आगे सिंह लिखते हैं। तो क्या आप क्षत्रिय हैं ?’’

‘‘नहीं मैं क्षत्रिय नहीं हूं।’’ कहते हुए वह झेंपा।

‘‘तो फिर क्यों लिखते हैं आप सिंह ?’ संजय बोला, ‘अगर आप हरिजन हैं तो उस में शर्म किस बात की ? सिंह लिख कर अपने आप को छलने की क्या जरूरत है? हरिजन होना कोई शर्म की बात नहीं है। हरिजन होना अपराध नहीं है। जो आप छुपाते फिरें ! अगर आप का नाम भूसी राम है तो बी॰ आर॰ सिंह लिखने से क्या फर्क पड़ जाता है ?’’

‘‘पड़ता होगा तभी तो लिखते हैं।’’ वह बोला।

‘‘क्या फर्क पड़ता है ? यही तो मैं जानना चाहता हूं।’’ संजय बोला, ‘‘ख़ास कर तब जब आप आई॰ ए॰ एस॰ हैं और सभी जानते हैं कि आप रिजर्वेशन कोटे से आते हैं। फिर भी सिंह लिखते हैं। तो क्या आप का चमार होना छिप जाता है ?’’

‘‘मैं इस वक्त नशे में हूं। इस लिए ठीक-ठीक कुछ कह पाना मुश्किल है।’’ वह बोला।

‘‘नशे में हैं आप तभी सच कह पाएंगे। नहीं बिना नशे के तो आप आई॰ ए॰ एस॰ हो जाएंगे। आदमी नहीं रह जाएंगे। और कोई कुतर्क गढ़ ले जाएंगे। और विवश हो कर मुझे वह मानना पड़ेगा।’’ संजय बोला, ‘‘क्यों कि आज का ब्राह्मण मैं नहीं आप हैं।’’

‘‘क्या मतलब ?’

‘‘मतलब पानी की तरफ साफ है।’’ संजय बोला, ‘‘ब्राह्मण होने का मतलब अगर श्रेष्ठ होना है तो आज की तारीख़ में एकेडमिक तौर पर आई॰ ए॰ एस॰ होना ही श्रेष्ठ है। तो आज के ब्राह्मण आप हैं। क्यों कि आप आई॰ ए॰ एस॰ हैं।’’

‘‘ऐसा !’’ कह कर उस अधिकारी ने कंधे उचकाए।

‘‘एक्जेक्टली ऐसा ही है।’’ संजय ने कहा, ‘‘तो अगर मैं आई॰ ए॰ एस॰ न होते हुए भी अगर अपने नाम के आगे आई॰ ए॰ एस॰ लगाने लगूं तो क्या मैं आई॰ ए॰ एस॰ हो जाऊंगा ?’

‘‘आई॰ ए॰ एस॰ तो नहीं चार सौ बीस जरूर जो जाएंगे और जेल की हवा भी खानी पड़ जाएगी।’’ वह शराब के घूंट भरता हुआ बोला।

‘‘क्यों ?’’

‘‘फर्जी तौर पर आई॰ ए॰ एस॰ लिखने के जुर्म में।’’

‘‘क्यों आई॰ ए॰ एस॰ का मतलब कोई एक ही तो होता नहीं।’’ संजय ने कहा, ‘‘अपने देश में एक शार्ट फार्म के कई लांग फार्म बना कर लोग फ्राड करते हैं और चार सौ बीस होने से भी बच जाते हैं। मैं भी ऐसे ही कर लूंगा।’’

‘‘कैसे ?’

‘‘आई॰ ए॰ एस॰ का मतलब इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस के बजाय इंटरमीडिएट आर्ट साइड भी हो सकता है।’’ संजय बोला, ‘कुतर्क पर सिर्फ आप की बिरादरी का ही अधिकार तो नहीं है।’’

‘‘क्या मतलब ?’’

‘‘मेरा मतलब आप की आई॰ ए॰ एस॰ बिरादरी से है जो आज देश की भाग्य विधाता बनी बैठी है।’’ संजय बोला, ‘‘आप की हरिजन बिरादरी से मेरी मंशा नहीं थी।’’ वह रुका और बोला, ‘‘ पर जरा सा संकेत भी आप को बुरा लगा। यह अच्छी बात है। अपनी कौम, बिरादरी के प्रति कांशस रहना अच्छी बात है।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘पर व्यर्थ की ढाल कहिए, दिखावे की खाल कहिए ओढ़ना उतना ही गलत है।’’ संजय ने कहा, ‘‘अगर आज की तारीख़ में आई॰ ए॰ एस॰ होना श्रेष्ठ होना है और जो श्रेष्ठ होने का मतलब ब्राह्मण होना है तो मैं वह नहीं हूं। और अगर मैं आई॰ ए॰ एस॰ नहीं हूं तो इस का यह मतलब हरगिज नहीं है कि मैं हीनता से भर जाऊं, हीनता से मर जाऊं और नकलीपन का सहारा ले लूं। आई॰ ए॰ एस॰ न हो पाना कोई अपराध नहीं है। यह कोई शर्म की बात नहीं है।’’

‘‘तो आई॰ ए॰ एस॰ न हो पाने का कांपलेक्स आप के मन में है !’’ वह मुसकुराता हुआ बोला।

‘‘कतई नहीं।’’ संजय ने जोर से कहा, ‘‘मैं आई॰ ए॰ एस॰ हो ही नहीं सकता था।’’

‘‘क्यों ?’’ वह बोला, ‘‘बुद्धि तो है। मेहनत नहीं की होगी।’’

‘‘सच बताऊं ?’

‘‘आफकोर्स !’’

‘‘जब आई॰ ए॰ एस॰ बनने की उम्र थी तब यह जानता भी नहीं था कि आई॰ ए॰ एस॰ या पी॰ सी॰ एस॰ क्या बला होती है।’’ संजय रुका और बोला, ‘‘गांव से निकल कर शहर पढ़ने गया था यही बहुत बड़ा सुख था।’’ वह कहने लगा, ‘‘अगर ख़ुदा न खास्ता जान भी गया होता कि आई॰ ए॰ एस॰ किस चिड़िया का नाम है तब भी शायद उस ओर रुख़ नहीं करता।

‘‘क्यों ?’’

‘‘क्यों कि तब तो बस एक ही सपना था, एक ही तमन्ना और एक ही हसरत थी, कविता, क्रांति और समाज को बदलने की छटपटाहट।’’ संजय पुरानी यादों में खोता हुआ बोला, ‘अगर तब मेरी चली होती तो ग्रेजुएशन में ही पढ़ाई छोड़ दी होती। कम्युनिस्ट साहित्य, सोहबत और समाज की हालत बार-बार यही ललकारती थी कि इस एकेडमिक पढ़ाई लिखाई में कुछ नहीं रखा। व्यर्थ की चोंचलेबाजी है।’’ संजय बिना रुके बोला, ‘‘और मुझे आज भी यह एकेडमिक पढ़ाई वास्तव में बेमानी लगती है, फ्राड लगती है।’’ वह रुका और शराब देह में ढकेलता हुआ बोला, ‘‘मेरी सोच ही तब कुछ और थी, एप्रोच ही और थी तो आई॰ ए॰ एस॰बनना गाली होती मेरे लिए। मैं तब जानता भी नहीं था आई॰ ए॰ एस॰ के बारे में और जो जानता होता तब भी किक करता ऐसी आई॰ ए॰ एस॰ गिरी को। लानत है देश के आई॰ ए॰ एसों॰ को जो देश को दोनों हाथों से लूट और लुटा रहे हैं।’’

‘‘आप को चढ़ गई है।’’ वह अधिकारी बोला, ‘‘ऐसा तो नहीं है।’’

‘‘ऐसा ही है।’’ गिलास मेज पर पटकता हुआ संजय बोला।

‘‘खै़र छोड़िए, यह बहस फिर कभी।’’ वह बोला, ‘‘पुराने सवाल पर वापस आएं और बताएं कि आप कौन से ब्राह्मण हैं। आई मीन योर सरनेम क्या है ?’’

‘‘सच बताऊं भूसी राम जी कि झूठ ?’’ संजय नशे में झूमता हुआ बोला।

‘‘सच-झूठ दोनों ही बताइए।’’

‘‘श्योर ?’’

‘‘श्योर !’’

‘‘तो सुनिए मेरा पूरा नाम है संजय सिंह तिवारी।’’

‘‘क्या मतलब ?’’

‘‘क्यों मुलायम सिंह यादव हो सकता है, बलराम सिंह यादव हो सकता है, भूसी राम बी॰ आर॰ सिंह हो सकता है तो संजय सिंह तिवारी क्यों नहीं हो सकता ?’’ संजय बोला, ‘‘देखिए भूसी राम जी, सिंह, शर्मा, वर्मा और हो सकता हो कुछ और सरनेम भी हों, यह सब बड़े उदार सरनेम हैं। जो जब चाहे जहां चाहे लगा ले। सिंह, क्षत्रिय, यादव, चमार कोई भी लगा ले कोई रोक नहीं। शर्मा, बढ़ई, लोहार, ब्राह्मण कोई भी लिख ले, इसी तरह वर्मा, कायस्थ, कुर्मी, खटिक, सुनार कोई लिख सकता है, कोई किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकता। तो मैं अगर संजय सिंह तिवारी हो जा रहा हूं तो आप को क्यों ऐतराज हो रहा है ?’’

‘‘आप के इस व्यंग्य को मैं समझ रहा हूं संजय तिवारी जी।’’ वह ‘‘तिवारी’’ पर जोर दे कर बोला।

‘‘ख़ाक समझ रहे हैं।’’ संजय बोला, ‘‘मैं संजय सिंह तिवारी हूं और आप सिर्फ संजय तिवारी कह रहे हैं।’’

‘‘यही तो व्यंग्य है आप का मान्यवर !’’ वह बोला, ‘‘ऐसे ही ! ऐसे ही आप ब्राह्मणों ने हम दलितों पर जुल्म किए हैं।’’ वह जैसे तिलमिला कर बोला।

‘‘अब पता नहीं आप कब की बात कर रहे हैं। संजय बोला, ‘‘न तो मैं ने दलित उत्पीड़न का पूरा इतिहास पढ़ा है न ही ब्राह्मण उत्थान का धर्मशास्त्र, वेद, मनुस्मृति वगैरह पढ़ा है इस लिए आधिकारिक रूप से कुछ कह पाना कठिन है। पर मोटा-मोटी यह जरूर जानता हूं कि चाहे सदियों पूर्व की व्यवस्था हो चाहे आज की व्यवस्था ! सत्ता हमेशा ही से प्रजा को पीड़ित करती रही है। सत्ता हमेशा ही से प्रजा की देह छील कर इतिहास लिखती रही है, आज भी लिख रही है। ऐसे जैसे यह प्रकृति का नियम हो।’’ संजय बोला, ‘‘और मैं नहीं पाता कि ब्राह्मण जाति ने कभी इस तरह आधिकारिक रूप से सत्ता भोगी हो कि वह किसी पर अत्याचार कर सके। रही बात वर्ण व्यवस्था की तो क्या वह नियम आज भी नहीं लागू है कि जो जिस कार्य के लायक हो उसे वही कार्य दिया जाए। अब कि जैसे मैं आई॰ ए॰ एस॰ नहीं हूं तो क्या मैं डी॰ एम॰ या आप की तरह कहीं कमिश्नर नियुक्त हो सकता हूं ? मुझे छोड़िए पी॰ सी॰ एस॰ भी बेचारा बिना आई॰ ए॰ एस॰ में प्रमोट हुए डी॰ एम॰ नहीं बन सकता। तो क्या सिर्फ इस लिए कि आई॰ ए॰ एस॰ श्रेष्ठ है। जाहिर है कि नहीं। यह एक व्यवस्था है।’’ संजय बोला, ‘‘तो जिसे आप मनुवादी व्यवस्था बताते हैं वह भी कुछ ऐसी ही या वैसे ही रही होगीµव्यवस्था आधारित।’’ संजय बोला, ‘‘और जाहिर है कि लंबे समय तक उस में अपेक्षित सुधार या संशोधन नहीं हुए होंगे तो वह व्यवस्था बेमानी हो गई होगी, व्यर्थ हो गई होगी और अपना अर्थ खो कर धूल में मिल गई। और आज हम नई व्यवस्था में जी रहे हैं।’’ संजय बोला, ‘‘यह इस नई व्यवस्था की ही देन है कि जिसे समाज सब से नीचे की जाति मानता है वह भंगी जाति का व्यक्ति भी कलक्टर बन जाता है और जिसे समाज सब से श्रेष्ठ जाति का मानता है उस ब्राह्मण जाति का व्यक्ति उसी भंगी जाति के कलक्टर के यहां सफाई धुलाई करते दिखता है। तो क्या यह अन्याय है उस ब्राह्मण जाति के साथ ?’’ संजय बोला, ‘‘हरगिज नहीं। अगर आप पढ़ेंगे लिखेंगे नहीं तो यही नौकरी आप को मिलेगी चाहे आप जिस जाति के हों। तो ऐसा ही कुछ पहले की व्यवस्था में रहा होगा। अब चूंकि वह व्यवस्था पारदर्शी नहीं थी सो धूल में मिल गई। यह आज की व्यवस्था भी अगर पारदर्शी नहीं साबित होगी तो यह भी धूल में मिल जाएगी।’’

‘‘यह तो कुतर्क है।’’ वह अधिकारी बोला, ‘‘आप चाहे जो कहें। पर हकीकत यही है कि ब्राह्मणों ने हमारी जाति बिरादरी पर अत्याचार किया।’’

‘‘चलिए मान लिया !’’ संजय बोला, ‘‘किसी एक ब्राह्मण राजा का नाम बताइए जो बड़ा भारी राजा रहा हो और उस ने चमारों पर अत्याचार किया हो !’’

‘‘अब तुरंत तो किसी का नाम नहीं याद आ रहा।’’ वह अधिकारी माथे पर हाथ फेरता हुआ बोला, ‘‘पर मैं बाद में बताऊंगा। लेकिन आप यह तो मानेंगे कि ब्राह्मण हमेशा सत्ता के करीब रहे। ब्राह्मण ही हमेशा राजाओं के सलाहकार रहे।’’

‘‘हमेशा तो नहीं। पर रहे हैं।’’ संजय बोला, ‘‘अब चाणक्य की बात लीजिए। चाणक्य भी ब्राह्मण था। पर हिंदुस्तान के इतिहास को बदल दिया चाणक्य ने। आप चाहे उसे कुटिल कहिए पर सच यही है कि चंद्रगुप्त जैसे पिछड़ी जाति के व्यक्ति को सम्राट बनाना तब के समय में बहुत आसान नहीं था। यह चाणक्य के ही बूते की बात थी।’’

‘‘आप जो भी कहिए पर ब्राह्मणों ने हम पर अत्याचार किए हैं।’’ वह बोला, ‘‘आखि़र पूरे दो हजार साल तक देश में ब्राह्मणों ने राज किया है। ऐसा मैं ने कहीं पढ़ा है।’’

‘‘दो हजार साल क्यों आप फिर से इतिहास पढ़िए पूरे पांच हजार साल जिस को राज करना आप कह रहे हैं, वह ब्राह्मणों ने किया है।’’ संजय बोला, ‘‘पर आजादी के यानी 15 अगस्त, 1947 के पहले तक किसी एक ब्राह्मण का नाम बता दीजिए जो करोड़पति रहा हो। एक नहीं मिलेगा। क्यों कि ब्राह्मण ने लूट और अत्याचार को ठीक नहीं माना था। और बिना लूट, अत्याचार के कोई करोड़पति नहीं बन सकता। आजादी के बाद की बात मैं नहीं कर रहा। अब तो कई ब्राह्मण भी करोड़पति हैं और चमार भी कई करोड़पति, अरबपति हैं। क्यों कि लूट में, अत्याचार में अब हर जाति शामिल है।’’ संजय बोला, ‘‘आप ऐसा मत समझिए कि मैं ब्राह्मणों की कोई वकालत कर रहा हूं। क्यों कि मैं ब्राह्मण हूं। ऐसा नहीं है। मैं तो अब जनेऊ भी नहीं पहनता। नाम के आगे ब्राह्मण तिवारी भी नहीं लगता। क्यों कि मैं ब्राह्मण कहलाने योग्य नहीं। इस लिए नहीं कि ब्राह्मण होने को मैं पाप मानता हूं। बल्कि इस लिए कि ब्राह्मण होना बहुत बड़ी बात है। ब्राह्मण होना आसान नहीं है। ब्राह्मण होना एक तप है। जो तप मैं नहीं कर सकता। और अगर ब्राह्मण होने की मुझ में योग्यता नहीं है तो मुझे ब्राह्मण कहलाने का हक सिर्फ इस लिए नहीं मिल जाता कि मैं ब्राह्मण परिवार में पैदा हुआ हूं। दूसरे और महत्वपूर्ण यही है कि सही मायने में मैं इस तरह की जाति व्यवस्था में यकीन भी नहीं करता। इस लिए भी अपने नाम के आगे तिवारी नहीं लिखता।’’

‘‘पर संजय जी इस से फिर भी यह साबित नहीं होता कि ब्राह्मणों ने हमारी बिरादरी पर अत्याचार नहीं किया।’’ वह बोला, ‘‘हमारी बिरादरी को समाज में अछूत बनाने वाले ब्राह्मण ही हैं।’’

‘‘यह पूरी तरह सच नहीं है।’’ संजय बोला।

‘‘हम से ज्यादा अंतर्विरोध तो आप जी रहे हैं।’’ वह बोला, ‘‘हम सिर्फ सिंह लिखते हैं और आप हमें कटघरे में खड़ा कर देते हैं। और आप ब्राह्मण सूचक शब्द नहीं लिखते नाम के आगे, जनेऊ नहीं पहनते पर ब्राह्मणों की वकालत पूरी-पूरी करते हैं। यह आप का अंतिर्विरोध नहीं तो क्या है ?’’

‘‘यह अंतर्विरोध नहीं है। यह तथ्य है। और चीजें कोई अचानक नहीं बदल जातीं। फिर मैं कोई ब्राह्मणवाद की वकालत नहीं कर रहा। एक तथ्य रख रहा हूं। तर्क रख रहा हूं। जिसे आप तथ्य से, तर्क से काट भी सकते हैं। क्यों कि मैं कोई अकाट्य सत्य नहीं भाख रहा हूं।’’ संजय बोला, ‘‘सच को सच मान लेने में नुकसान नहीं होता। और मैं फिर यह बात दुहराना चाहता हूं कि सत्ता हमेशा प्रजा की देह छील कर इतिहास लिखती है चाहे वह सत्ता ब्राह्मण की हो, चाहे चमार की। सत्ता आखि़रकार सत्ता होती है। अंततः सत्ता होती है। और सत्ता का हमेशा यही चरित्र रहा है, यही चरित्र रहेगा। राज सत्ता में भी यही होता था और आज प्रजातांत्रिक सत्ता के दौर में भी यही हो रहा है।’’

‘‘यह सब ठीक है। पर अंतिम सच यही है कि ब्राह्मणों ने ही व्यवस्था बनाई और उस व्यवस्था में हमें अछूत बनाया।’’ वह नशे में टूट कर बोला।

‘‘क्या तभी से ब्राह्मण-ब्राह्मण लगा रखा है आप ने ?’’ संजय बोला, ‘‘तभी से ब्राह्मण और सत्ता का फर्क समझा रहा हूं आप की समझ में नहीं आ रहा है। लगता है किसी ने बचपन से ब्राह्मणों के खि़लाफ इतनी घुट्टी पिला रखी है कि आप खुले दिमाग से कुछ सोच ही नहीं सकते।’’

‘‘हो सकता है।’’ वह लड़खड़ाती आवाज में शराब की जगह पानी पीता हुआ बोला, ‘‘हमारी बिगड़ी हालत के लिए ब्राह्मण ही जिम्मेदार हैं।’’

‘‘सच !’’ संजय बोला, ‘‘अगर यही सच है तो कम से कम आप को व्यक्तिगत तौर पर ब्राह्मणों का शुक्रगुजार होना चाहिए।’’

‘‘क्यों ? वो क्यों ?’’ वह ऐसे बोला जैसे उस की समझ में कुछ आया ही न हो।

‘‘वह ऐसे कि अगर ब्राह्मण नहीं होते तो आप की चमार बिरादरी पर अत्याचार नहीं होते ! चमार अछूत नहीं हुए होते ! जैसा कि आप कह रहे हैं और यह सब जो नहीं हुआ होता तो आजादी के बाद आरक्षण नहीं लागू हुआ होता।’’ संजय बोला, ‘‘आरक्षण नहीं लागू हुआ होता तो आप आज आई॰ ए॰ एस॰ नहीं हुए होते।’’

‘‘नहीं, नहीं मैं आई॰ ए॰ एस॰ डिजर्व करता हूं।’’ वह घबरा कर बोला।

‘‘बिलकुल करते होंगे। पर आए तो आरक्षण कोटे से ही चुन कर !’’ संजय बोला, ‘‘आप की पत्नी भी बिना सुरक्षित सीट के जीत कर विधान सभा में आ पातीं भला ?’’

‘‘यह तो कोई तर्क नहीं हुआ ?’’

‘‘तो फिर ब्राह्मणों को लगातार गाली देते रहना तर्क हुआ ?’’

‘‘नहीं, यह भी तर्क नहीं हुआ।’’

‘‘बस यही मैं तब से आप को समझा रहा हूं।’’ संजय बोला, ‘‘ब्राह्मण हो या चमार सभी के समान विकास से ही देश और समाज का कल्याण है। न कि एक दूसरे को गाली दे कर।’’

‘‘चलिए यह बहस फिर कभी !’’ वह बोला, ‘‘अब खाना खा लिया जाए।’’

‘‘हां, देख रहा हूं बड़ी देर से आप शराब की जगह पानी पी रहे हैं।’’ कह कर संजय ख़ुद पानी पीने लगा।

‘‘ज्यादा शराब पी लेने के बाद पानी पीते रहने में ही भलाई है।’’

‘‘वो तो है।’’

खाना खाते-खाते रात के दो बज गए। वह घर पहुंचा ढाई बजे। सोते-सोते तीन बज गए। दूसरे दिन वह देर से सो कर उठा। नहा धो कर उस अधिकारी के दफ्तर गया। वह नदारद !

संजय का दिमाग ख़राब हो गया।

वह वापस घर आ कर उसे लगातार फोन करता रहा। न तो वह घर में मिलता, न दफ्तर में। संजय परेशान हो गया। उधर संपादक भी रह-रह कर संजय के घर फोन करते रहे। और संजय पत्नी से यही कहता रहा कि, ‘‘कह दो नहीं हैं।’’ कई बार कहते-कहते उस ने सोचा कि कहीं जनाब भूसी राम भी तो यही नहीं कर रहे, ‘‘कह दो नहीं हैं।’’ यह ख़याल आते ही वह भूसी राम के दफ्तर की ओर चल दिया। वह दफ्तर में नहीं मिला तो संजय उस के घर पहुंचा। वह वहां भी नहीं था। उस का कोई मेसेज भी नहीं।

संजय की परेशानी की कोई सीमा नहीं थी।

शाम हो गई। संजय बैठा-बैठा खीझ रहा था कि फोन की घंटी बजी। वह पत्नी से बोला, ‘‘कह दो नहीं है।’’ पर पत्नी बोली, ‘‘होल्ड कीजिए।’’

‘‘बी॰ आर॰ सिंह बोल रहा हूं।’’ उधर से आवाज आई।

‘‘आप कहां गायब हो गए प्रभू !’’

‘‘गायब नहीं हूं।’’ वह बोला, ‘‘बचता-बचाता घूम रहा हूं।’’ वह घबराया हुआ बोला, ‘‘आप नहीं जानते, मुझे सुबह से ही वाच किया जा रहा है।’’

‘‘क्या ?’’

‘‘हां।’’

‘‘पर कैसे ?’’ संजय बोला, ‘‘मैं ने तो कहीं लीक नहीं किया। आप को प्वाइंट आऊट नहीं किया।’’

‘‘मैं ने पता किया तो चला कि रात को आप को फालो किया इंटेलीजेंस वालों ने।’’ वह बोला, ‘‘कल रात आप को मेरे घर नहीं आना चाहिए था।’’

‘‘हां, गलती तो हो गई।’’ संजय बोला, ‘‘पर क्या फर्क पड़ता है। कोई कहीं भी आ जा सकता है।’’

‘‘वो तो है।’’ वह बोला, ‘‘पर मेरी पोजीशन थोड़ी आकवर्ड हो रही है।’’ वह रुका और बोला, ‘‘पर चिंता की बात नहीं। मैं सब ठीक कर लूंगा।’’

‘‘आप बोल कहां से रहे हैं ?’’

‘‘बोल तो मैं सचिवालय से ही रहा हूं। पर अपने आफिस से नहीं ।’’

‘‘क्या हुआ उस सुबूत का ?’’

‘‘थोड़ी देर में मैं भिजवाता हूं।’’ वह बोला, ‘‘आप के दफ्तर भेज दूं ?’’

‘‘नहीं भई, मैं घर पर हूं।’’ संजय बोला, ‘‘बिना उस के मैं दफ्तर कैसे जा सकता हूं।’’

‘‘राइट-राइट।’’ वह बोला, ‘‘मैं खुद तो आ नहीं पाऊंगा। आप भी मुझे कांटेक्ट मत करिएगा। पर एनी वे मैं एक आदमी से मौका देख कर भिजवाता हूं।’’

‘‘भिजवा दीजिए।’’ संजय बोला, ‘‘अगर आज सुबूत नहीं मिला तो कल खंडन छपा मिलेगा।’’

‘‘राइट-राइट।’’ वह बोला, ‘‘मैं जल्दी भिजवाता हूं। पर खंडन किसी सूरत में नहीं छपने पाए।’’

‘‘आप सुबूत भेजिए तो सही !’’

‘‘राइट-राइट।’’

‘‘ओ॰ के॰।’’ कह कर संजय ने फोन रख दिया।

थोड़ी देर बाद एक निरीह सा आदमी सीलबंद लिफाफा ले कर आया। और काफी दरियाफ्त के बाद वह लिफाफा उस ने संजय को दिया। लिफाफा खोलते हुए संजय की आंखों में चमक आ गई। कांग्रेस के जिन बाइस हरिजन विधायकों ने जनमोर्चा ज्वाइन करने की बात कही थी उन विधायकों की दस्तख़त समेत उस प्रस्ताव की फोटो कापी अब उस के हाथ में थी। उस ने खंडन वाली चिट्ठियों की दस्तख़त मिलाए। दस्तख़त हूबहू वही थे।

संजय ने दफ्तर जा कर संपादक को प्रस्ताव के दस्तख़त और खंडन के दस्तखत दिखाए। संपादक जी की जान में जैसे जान आ गई। बोले, ‘‘आप सुबह से गायब थे। मेरे तो हाथ पांव फूल गए थे।’’ वह बोले, ‘‘फटाफट ख़बर लिखिए।’’

दूसरे दिन जब बैनर बाक्स बन कर दोनों दस्तख़तों की फोटो स्टेट सहित ख़बर छपी तो तहलका मच गया। सरोज जी उस दिन सुबह रिपोर्टर्स मीटिंग में नहीं आए। शाम को संजय को देखते ही वह बिसूरते हुए बोले, ‘‘मार लिया मैदान !’’

संजय कुछ बोला नहीं। फीकी मुसकान फेंक कर रह गया। सरोज जी की तकलीफ का अंदाजा उसे था। क्यों कि जब एक दिन पहले वह सुबह रिपोर्टस मीटिंग में नहीं आया तो सरोज जी ऐलान कर चुके थे कि ‘‘संजय तो गए !’’ इस लिए वह चुप ही रहा। दूसरे मुख्यमंत्री और कांग्रेस पर ख़बर ! सरोज जी को यह कभी नहीं सुहाता था। आज इस ख़बर के साथ उन्हें अपने एम॰ एल॰ सी॰ बनने का सपना एक बार फिर टूटता नजर आया।

थोड़ी देर बाद चपरासी ने संजय को आ कर कहा, ‘‘सरोज जी बुलाय रहे हैं।’’

संजय उन की केबिन में गया और कुर्सी पकड़ कर खड़ा हो गया। सरोज जी ने उसे देखा पर कुछ बोले नहीं। लिखने में लगे रहे। जब पांच मिनट बीत गए तब संजय बोला, ‘‘जी, सरोज जी !’’

‘‘हां, बैठिए !’’ ठंडी सांस खींचते हुए वह बोले।

‘‘जी।’’ बैठते हुए संजय बोला।

‘‘अब हम का बताएं। !’’ वह बड़े ठंडेपन से बोले, ‘‘मुख्यमंत्री आप से बहुत नाराज हैं। कहि रहे थे बताइए इन को मकान दिया। हेन किया, तेन किया। पर यह हमारे जिले के हो कर भी हमारे खि़लाफ ख़बर लिख रहे हैं। पार्टी में बगावत करवा रहे हैं।’’ कहते हुए सरोज जी ठंडी सांस खींच कर फिर बोले, ‘‘बहुत नाराज हैं आप से मुख्यमंत्राी।’’

‘‘क्या कह रहे हैं आप ?’’ सवाल उछाल कर संजय ने भांपने की कोशिश की कि सरोज जी के इस कहने में कितना सच है और कितना झूठ !

‘‘अब मुख्यमंत्री नाराज तो हई हैं आप से !’’ कहते हुए सरोज जी की आवाज थोड़ी हलकी हुई। दूसरे हमेशा की तरह वह हांफे भी नहीं। संजय समझ गया सरोज जी पूरा-पूरा झूठ गढ़ रहे हैं। संजय को चुप देख कर सरोज जी ने फिर अपनी बात दुहराई, ‘‘मुख्यमंत्री बहुत नाराज हैं आप से !’’

‘‘पर हम से तो मुख्यमंत्री कह रहे थे कि ऐसे ही आंखें खोले रखिए। पता तो चले कि कौन किस के साथ है !’’ संजय ने भी सरोज के झूठ को दूसरा झूठ गढ़ कर खाने की कोशिश की।

‘‘हईं !’’ सरोज जी का गप सचमुच भहरा गया। उन की आवाज का ठंडापन गायब हो गया। वह सहज होते हुए बोले, ‘‘ऊ जो मुख्यमंत्री का सूचनाधिकारी मेहता है वही हम से कहि रहा था कि मुख्यमंत्री जी नाराज हैं।’’ सरोज जी अब दूसरा झूठ गढ़ गए थे।

‘‘पर मेहता तो आज हमारे घर आया था।’’ संजय ने फिर झूठ बोला, ‘‘बल्कि वही हमें मुख्यमंत्री के पास ले गया। बताया कि मुख्यमंत्री जी ने बुलाया है।’’ संजय ने देखा कि सरोज जी के झूठ पर उस के झूठ का निशाना सही-सही लग गया था। वह बोला, ‘‘अभी थोड़ी देर पहले वहीं से तो आया हूं।’’

‘‘कहां से ?’’ सरोज जी अचकचाए।

‘‘मुख्यमंत्री के यहां से।’’ संजय बोला।

‘‘हमारे बारे में कुछ नहीं पूछ रहे थे ?’’ सरोज जी पानी बन कर पूछ रहे थे।

‘‘कौन मेहता ?’’ संजय ने सरोज जी को छेड़ा।

‘‘अरे नहीं। किस बेवकूफ की बात कर रहे हैं।’’ सरोज जी लपक कर बोले, ‘‘मुख्यमंत्री जी ! हमारे बारे में तो पूछ नहीं रहे थे।’’

‘‘चरचा तो चली थी सरोज जी आप की !’’ संजय बोला, ‘‘मेहता ने ही बात चलाई थी।’’

‘‘हां, मेहता अच्छा आदमी है !’’ क्षण भर में ही मेहता के बारे में सरोज जी की राय बदल गई थी। अभी-अभी वह उसे बेवकूफ बता रहे थे। और अब अच्छा आदमी बता रहे थे। उन की उत्सुकता अभी बनी हुई थी, ‘‘तो का कह रहे थे मुख्यमंत्री हमारे बारे में ?’’

‘‘यही कि कैसे हैं ?’’

‘‘और ?’’

‘‘और हाल चाल पूछ रहे थे।’’

‘‘और ?’’

‘‘हां, उन्हों ने मेहता से कहा कि सरोज जी से मिले बहुत दिन हो गए। कभी खाने पर बुलाओ।’’

‘‘ऐसे कहि रहे थे मुख्यमंत्री !’’ सरोज जी खुश हो गए थे। शायद एम॰ एल॰ सी॰ बनने का सपना उन की आंखों में तैर गया था।

बाइस हरिजन विधायकों के कांग्रेस से जनमोर्चा जाने से कांग्रेसी सरकार को कोई ख़तरा नहीं था। सरकार गिरने वाली नहीं थी। मुख्यमंत्री की कुर्सी को भी कोई आंच मोटा मोटी नहीं लगती दिखती थी। पर प्रधानमंत्री दरबार में मुख्यमंत्री की क्लास तो हो ही सकती थी। क्यों कि इस तरह सारे हरिजन विधायकों के कांग्रेस से जनमोर्चा जाने की यात्रा सिर्फ पार्टी स्तर की बगावत भर नहीं थी। यह जनमोर्चा द्वारा कांग्रेस का हरिजन आधार काटने का संकेत था। हरिजन वोट बैंक के टूटने की घंटी थी। ख़तरे की घंटी। मुख्यमंत्राी, उन के सहयोगी और उन का स्टाफ इसी नाते इस ख़बर से भीतर-भीतर तबाह थे। पर बाहर-बाहर यही जताते रहे कि कुछ नहीं हुआ है। और सचमुच ख़बर छपने के चौथे दिन विधान परिषद में जो नजारा देखने को मिला संजय एक क्षण को तो सकते में आ गया। विधान परिषद में संजय के खि़लाफ विशेषाधिकार प्रस्ताव पेश हो गया था। क्यों कि जनमोर्चा प्रस्ताव पर दस्तख़त करने वाले विधायकों में से कुछ विधान परिषद सदस्य भी थे। संजय का कयास था कि वह सारे विधायक सिर्फ मंत्री पद पाने भर के लिए यह दबाव बनाए हुए थे। पर इस का भंडाफोड़ सार्वजनिक रूप से हो जाएगा इस का उन्हें तनिक भी आभास नहीं था।

विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पेश करने वाले विधायकों की जिद थी कि तुंरत प्रस्ताव मंजूर कर लिया जाए। और संबंधित संवाददाता को सदन में बुला कर दंडित कर जेल भेजा जाय। पर पीठासीन अधिकारी ने तुरंत मतदान करा प्रस्ताव मंजूर करने से इंकार कर दिया। पर लंच बाद यह सारे सदस्य वही मांग ले कर विधान परिषद सभापित के आसन के निकट पहुंच गए। सवाल व्यवस्था का उठ गया। परिषद की बैठक दूसरे दिन के लिए स्थगित हो गई।

दफ्तर में संजय परेशान इधर उधर घूमता रहा। मनोहर बोला, ‘‘जेल तो डियर तुम्हें हो ही जाएगी। भले तीन दिन की हो। पर होगी जरूर। और इस में कोई जमानत भी नहीं होगी। हाईकोर्ट क्या सुप्रीम कोर्ट भी जमानत नहीं देती।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘पर तुम हीरो हो गए आज। और खुदा न खास्ता जो जेल चले गए तो देश भर के अख़बारों में पब्लिसिटी अलग।’’ वह टांट करता हुआ बोला, ‘‘चांदी है अब तो।’’

‘‘पर मेरा कुसूर क्या है ?’’ संजय बोला, ‘‘सही ख़बर लिखना गुनाह है ? फिर मैं ने तो सुबूत सहित लिखा है !’’

‘‘सही गलत का फैसला तो बाद में होगा। पहले तो तुम्हें जेल होगी।’’ मनोहर बोला, ‘‘पर अगर आज का ‘‘प्रबंध’’ करवा दो तो मैं जेल जाने से तुम्हें बचवा सकता हूं।’’

‘‘प्रबंध मतलब ?’’ संजय बिफरा।

‘‘आज की दारू !’’ मनोहर बोला, ‘‘बड़ी सीधी सी बात है।’’

‘‘मैं ने कभी पिलाई है ?’’

‘‘तभी तो कह रहा हूं, आज पिला दो।’’

‘‘सवाल ही नहीं उठता।’’ संजय सिगरेट सुलगाता हुआ बोला, ‘‘मैं ने कभी खुद तो ख़रीद कर पी नहीं। पिलाने का तो सवाल ही नहीं उठता।’’

‘‘जेल जाने के सवाल पर भी नहीं ?’’

‘‘हरगिज नहीं।’’

‘‘सोच लो !’’ मनोहर बोला, ‘‘एक मैं ही हूं जो तुम्हें जेल जाने से बचा सकता हूं।’’

‘‘तो भी नहीं।’’ संजय बोला, ‘‘शराब तो मैं हरगिज-हरगिज नहीं ख़रीद सकता।’’

‘‘जेल जा सकते हो ?’’

‘‘चला जाऊंगा।’’

‘‘पर शराब ख़रीद कर नहीं पिलाओगे ?’’

‘‘सवाल ही नहीं।’’

‘‘और मुफ्त की मिले तो टैंकर की तरह पी जाओगे ?’’

‘‘हां, यह तो आप जानते ही हैं।’’

‘‘तो चलो आज तुम्हारा टैंकर भी फुल करवा देता हूं।’’ मनोहर बोला, ‘‘और तुम्हारा जेल जाना भी मुल्तवी करवा देता हूं।’’

‘‘कहां ?’’ संजय हैरत से बोला।

‘‘है मेरा दोस्त !’’ मनोहर बोला, ‘‘क्या समझते हो तुम रिपोर्टिंग वालों के ही पास काम के लोग होते हैं। चलो आज तुम्हें दिखाता हूं कि मेरा क्या जलवा है ?’’

‘‘कहीं सरोज जी की तरह तो नहीं ?’’

‘‘क्या मतलब ?’’

‘‘उस बार सरोज जी ने भी यही कहा था कि चलिए दिखाऊं कि लखनऊ में मेरी क्या प्रतिष्ठा है !’’

‘‘अरे नहीं।’’ मनोहर बोला, ‘‘सरोज जी और मुझ में तुम्हें कोई फर्क नजर नहीं आता ?’’ वह अपनी लंबी-लंबी टांगें फैलाता हुआ बोला, ‘‘कम से कम इस बार तो मान ही लो।’’

‘‘क्यों ?’’

‘‘क्यों कि इस बार सरोज जी तुम्हें जेल भिजवाने में लगे हैं और मैं तुम्हें बचाने में।’’ वह बोला, ‘‘और सरोज जी से मोर्चा लेना कितना ख़तरनाक होता है, तुम से बेहतर कौन जानता है।’’ वह पैंट खींचता, नाखून चबाता हुआ खड़ा हो गया। बोला, ‘‘पर सरोज जी तुम्हें जेल नहीं भिजवा पाएंगे।’’

‘‘पर सरोज जी हमें क्यों जेल भिजवाएंगे ?’’ संजय हैरान हुआ।

‘‘तुम क्या समझते यह सब कुछ अपने आप हो रहा है।’’ वह पैंट खींचता हुआ कमर पर हाथ रखता हुआ बोला, ‘‘इस आग में घी वही डाल रहे हैं।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘और मुझे तो लगता है आग भी उन्हीं की है, लगाई भी उन्हों ने है और घी भी वही डाल रहे हैं। तुम सरोज जी को जानते नहीं कि वह क्या चीज हैं !’’

‘‘मुझे तो किसी मुगलिया दरबार के मिरासी लगते हैं। और साफ कहूं तो एक कस्बाई भांड़ से ज्यादा कुछ नहीं लगते।’’

‘‘यह उन का बाहरी रूप है।’’ मनोहर बोला, ‘‘भीतर से वह औरंगजेब हैं। खूंखार भेड़िया हैं।’’

‘‘मुझे तो गीदड़ लगते हैं। हरदम रंग बदल लेने वाले।’’ संजय बिदकता हुआ बोला, ‘‘हरदम उगते हुए सूरज को प्रणाम करने वाले भांड़।’’

‘‘पर यही भांड़ अब की सांड़ बन कर तुम्हारी बत्ती बनवाने में लगा हुआ है।’’ मनोहर बोला, ‘‘विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पेश करने की सलाह इसी भांड़ की है।’’

‘‘क्या बकते हैं आप ?’’

‘‘बक रहा हूं ? चलो अभी पता चल जाएगा।’’ वह बेचैन होता हुआ बोला, ‘‘चल रहे हो कि मैं जाऊं ?’’

‘‘चलना कहां है ?’’

‘‘चलो तो सही !’’

‘‘क्या विधान परिषद सभापति के यहां ?’’

‘‘अरे नहीं।’’

‘‘पर कहां ?’’

‘‘चलो।’’ वह बोला, ‘‘गलत जगह नहीं ले जाऊंगा।’’

‘‘ठीक है चलिए !’’

‘‘वहां ज्यादा चूं चपड़ मत करना। न ही रिपोर्टरी झाड़ना।’’ दफ्तर के बाहर अपनी लंबी-लंबी टांगों से स्कूटर में किक मारता हुआ मनोहर बोला।

‘‘अब अगर ऐसी बंदिश है तो मुझे मत ले चलिए।’’

‘‘चलो भी।’’ मनोहर बोला, ‘‘अब लौंडियों की तरह नखरे मत चोदो।’’

‘‘मैं नहीं जाऊंगा।’’ संजय ठंडे स्वर में बोला, ‘‘जेल होती है तो हो जाए। पर मैं कहीं घुटने टेकने नहीं जाने वाला।’’

‘‘भाव मत बनाओ। चलो !’’

‘‘मैं नहीं जाऊंगा।’’

‘‘श्योर ?’’

‘‘श्योर !’’

मनोहर भनभनाता हुआ चला गया। पर रात कोई पौने एक बजे उस ने घर पर फोन किया। संजय सोया था। उठ कर फोन उठाया। मनोहर की आवाज नशे में लड़खड़ाई हुई थी। पर वह भावुक हो रहा था। वह कह रहा था, ‘‘घबराओ नहीं। सब इंतजाम हो गया है! सरोज जी समेत सब की काट ली गई है !’’ लड़खड़ाती आवाज में वह बोला, ‘‘त्रिपाठी से बात करो।’’ त्रिपाठी की आवाज मनोहर से भी ज्यादा नशे में लड़खड़ा रही थी। वह बोला, ‘‘बुद्धू तुम जेल नहीं जाओगे। निश्चिंत हो कर सो जाओ। पूरी लॉबिइंग हो गई है। निश्चिंत हो कर सो जाओ।’’

‘‘सो तो रहा ही था। आप लोगों ने जगा दिया।’’ संजय बिफरा।

‘‘अरे पागल तुम सचमुच बुद्धू हो।’’ त्रिपाठी बोला, ‘‘तुम्हारे लिए हम लोग यहां जाग रहे हैं और तुम सो रहे हो।’’ त्रिपाठी नशे में भी मक्खन लपेटने से बाज नहीं आ रहा था।

‘‘आप लोग मेरे लिए जाग रहे हैं कि पीने के लिए।’’

‘‘पगलू तुम्हारे लिए !’’

‘‘ठीक है तो मैं सोऊं ?’’ कह कर संजय ने फोन का रिसीवर रख दिया।

दूसरे दिन विधान परिषद में संजय के खि़लाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव की नोटिस ले ली गई। प्रस्ताव का समर्थन करने वाले एक विधायक ने यहां तक कह दिया कि, ‘‘इस ख़बर को लिखने वाला संवाददाता ब्लैक मेलर है !’’ वह बोला, ‘‘यह ख़बर पढ़ कर मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ गया है।’’

‘‘तो माननीय सदस्य को मनोरोग विशेषज्ञ को दिखाए जाने की व्यवस्था करवा दें मान्यवर !’’ कहते हुए एक विपक्षी सदस्य ने चुटकी ली, ‘‘इन्हें इलाज की जरूरत है। और इन का सदन में रहना हम लोगों के स्वास्थ्य के लिए अहितकर है।’’ वह सदस्य बोला, ‘‘माननीय सदस्य के मानसिक इलाज की फौरन व्यवस्था की जाए मान्यवर !’’

इस वाकये से पूरा मामला हंसी में बदल गया। और मत विभाजन हो जाने से यह विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव अपने आप गिर गया। कई कांग्रेसी विधायक ही इस प्रस्ताव के ख़िलाफ बोलने लग गए। पर इस पूरी कार्रवाई के दौरान प्रेस गैलरी में बैठे-बैठे संजय की धुकधुकी बढ़ती रही।

पर ऐसा कैसे हो गया ?

संजय ने जब इस की पड़ताल की तो पता चला कि दिल्ली से कांग्रेस हाई कमान का स्पष्ट निर्देश आ गया था कि प्रस्ताव को पास न होने दिया जाय। क्यों कि प्रस्ताव पास हो जाने से