Thursday, 25 April 2013

कथारस में डूबी हकीकत बयां करती कहानियां

कृष्ण बिहारी

 


`एक जीनियस की विवादास्पदमौत` दयानंद पांडेय की एक दर्जन कहानियों का संग्रह है जिसे पढ़ते हुए कई धरातलों को जीते हुए कहानीकार की व्यापक दृष्टि और भुगते हुए जीवनानुभवों के छीलते एहसास से चाक-चाक होना पड़ता है। इस संग्रह की कहानियों की सब से बड़ी विशेषता है कहानीकार का विषय वस्तु में धंस कर लिखना। अपनी किसी भी कहानी में वह तमाशाई नहीं है। यह भी कि लेखन उस के जीने की शर्त है। शौक नहीं। और यह केवल सादगी से बड़ी बात कहने के दिखावे के लिए कहा गया स्टेटमेंट भर नहीं है बल्कि शिद्दत से महसूस किए हुए को कागज पर फिर से दुबारा जीने की उस जहमत को जीना है जिस से एक सच्चे रचनाकार को गुरना ही गुरना है चाहे वह लहुलूहान ही क्यों न होता चले। जब पाठक कहानियों को पढ़ते हुए कभी तपने और कभी   र्फ़ की तरह जमने लगे तो कहानीकार कैसे इस एहसास से अछूता रह सकता है। निश्चय ही इन कहानियों की रचना प्रक्रिया तकलीफदेह रही होगी।
विवाहेत्तर संबंध चाहे जिन अवस्थाओं में और जिन आवश्यकताओं को प्राथमिकता देते हुए बनें, अंततः वे ज़िंदगी उजाड़ देते हैं। बसने की कोशिश में अपना ही अस्तित्व मिट जाता है या यूं भी कह सकते हैं कि बसते-बसते दिल की बस्ती उजड़ जाती है। ‘एक जीनियस की विवादास्पद मौत’ संग्रह की शीर्ष कहानी में विवाहेतर संबंध से उत्पन्न हत्या और आत्महत्या के बीच का लिखा-अनलिखा या कोरे कैनवास पर अपनी कल्पना से बनाई आकृति पाठक को झिंझोड़ कर रख देती है।
’चनाजोर गरम वाले चतुर्वेदीजी’ कहानी में एक कतर्व्यपरायण अधिकारी का यह बयान, ‘देश का भाग्य तो ठीक से संवार न पाया, मौका ही नहीं मिला जातिवादी सरकारों की फज़ीहत में तो क्या करता भला? सिनिकल मान लिया लोगों ने उलटे’ यह स्थिति क्या उस से अलग है? जिस में कहा जाता है कि सीधे का मुंह कुत्ता चाटता है या यह कि हर सीधे और सरल व्यक्ति को लोग चूतिया कहते हैं।
’राम अवतार बाबू’ जैसे लोग दुनिया में होते हैं। क्या गांधी जी को उन के बेटे ने नहीं कहा कि आप दुनिया के बापू हो गए पर हमारे आप बाप नहीं हो सके। ‘भूचाल’ कहानी एक ऐसी औरत की कहानी है जिस का हर स्तर पर शोषण हुआ है। आए दिन ऐसे हादसों की रपट क्राइम फाइल में देखने को मिलती है मगर कहानी में शब्दांकन से जो चित्र उभरता है वह ‘मर्द’ कौम को निचोड़ता है।
दयानंद के पास केवल सुगठित भाषा ही नहीं बरदस्त कथ्य भी है। अपनी बात कहने के लिए जिन उपयुक्त शब्दों की आवश्यकता होती है उस के लिए दयानंद को कहीं दूर तक भटकना नहीं पड़ता। वह लेखक कुछ ज़्यादा धनी होता है जिस के पास आंचलिक बोलियों का शब्दकोश भी होता है। इस दृष्टि से दयानंद पांडेय के पास अवधी और पूर्वी उत्तर प्रदेश में बोली जाने वाली भोजपुरी के अलावा बोल- चाल के शब्दों का एक ऐसा खजाना है जिस का उन्हों ने जगह-जगह पर उचित प्रयोग किया है।
एक कर्मचारी निरंकुश मैनेजमें और नपुंसक यूनियन के बीच किस तरह असहाय हुआ अपने वर्तमान को स्वीकारता है उस टूटन को ‘प्लाज़ा कहानी से बखूबी जाना जा सकता है। इसी तरह ‘सुंर लड़कियों वाला शहर’ कहानी में बरदस्त मोहभंग है। लेखक की दृष्टि का सूक्ष्म पर्यवेक्षण और कहानी के सधे संवाद न केवल वातावरण की रचना करते चलते हैं बल्कि बदलाव को रेखांकित भी करते हैं। कहानियों में कुछ भी ठूंसा हुआ नहीं लगता। पिछले तीस वर्षों में दुनिया जिस गति से बदली है वह किसी से छिपा नहीं है और इस ते गति से अगर कुछ मुर्दा हुआ है तो वह है अपने देश का हर गांव। ‘मेड़ की दूब’ कहानी गांव की उस मुर्दा ज़िंदगी का जीवित दस्तावेज है जिसमें व्यवस्था के संक्रमित शोषण ने हरियाली निगल ली है। गांव में कोई रहना नहीं चाहता और शहर में सब के लिए जगह नहीं है। ‘घोड़े वाले बाऊ साहब’ आज के दौर में कहानी से लुप्त होती पठनीयता को बचाए रख कर एक सीधा संदेश देती है कि शिल्प के नए प्रयोग कहानीपन के लिए घातक हैं। बाऊ साहब का घोड़ा रखने का शौक उन की दिन-ब-दिन खस्ता होती जाती माली हालत यह बता देती है कि इश्क वह खेल नहीं जिसे लौण्डे खेला करें।
संग्रह की कहानी ‘मन्नाजल्दी आना’ अपने ही देश में एक मुसलमान के अचानक और अनायास संदिग्ध और घुसपैठिया करार दिए जाने की दर्दनाक दास्तान है। कहानी पाठक को दहशत के उस माहौल में ले जाती है जहां उस के मुंह से बरबस निकल पड़ता है कि अब बहुत हो गया। अब्दुल मन्नान की जो फजीहत होती है उस का अंत होता नहीं दिखता। एक लुटे-पिटे व्यक्ति की पीड़ा को कहानीकार ने जिस तरह से जुबान दी है वह उस की गहरी मनोवैज्ञानिक दृष्टि का परिचय देती है।
‘मुजरिम चांद’ इस संग्रह की सब से अच्छी कहानी है। कहानी की विशेषता कहानी की सहजता को आगे लिए जाने में इतनी सधी हुई है कि कहीं भी उबाऊपन नहीं उपजता। इसी तरह ‘बड़की दी का यक्ष प्रश्न’ और ‘संवाद’ कहानियां भी अपने परिवेश के प्रति न्याय करती हैं। आशा है कि आलोचकों की पूर्वाग्रहमुक्त निगाह इन कहानियों पर रूर पड़ेगी।
दयानंद पांडेय के लेखन में अनुभवजन्य प्रामाणिकता है। पात्र और स्थिति के अनुकूल समर्थ भाषा है। संवादों में वही बेबाकी है जो आज कल परिवेश में सुनने को मिल रही है। कहानीकार ने अपने इस संग्रह द्वारा जो संभावनाएं जगाई हैं उस से यह उम्मीद तो की ही जा सकती है कि भविष्य में अपने लेखन से मौजूदा कहानीकारों में एक सशक्त हस्ताक्षर बन कर उभरने की पर्याप्त क्षमता उन में है।


समीक्ष्य पुस्तक :
एक जीनियस की विवादास्पद मौत
पृष्ठ-200
मूल्य-200 रुप॔ए

प्रकाशक
जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि.
30/35-36, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2004

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