Tuesday, 27 March 2012

अंगूर नहीं खट्टे, छलांग लगी छोटी



‘क्षमा करें! मैं कुछ नहीं हूं।
न गाय, न जनता
मेरे सीने में अब दूध का समुद्र नहीं उफनता।’ सरीखी कविता लिखने वाले देवेंद्र कुमार बंगाली का २१ साल पहले जब निधन हुआ, तो वह अखबारों में छोटी से सुर्खी भी नहीं बन सके।

‘आते जाते राह बनाते। तुम से पेड़ भले।’ जैसे गीत लिखने वाले देवेंद्र कुमार का निधन खबर नहीं बन सका, तो शायद इस लिए भी कि वह बरगदी कवि नहीं थे। दंद-फंदी नहीं थे। मठाधीश, महफिली या विश्वविद्यालयी भी नहीं थे। लोग आजकल शिष्यों की बेल लगाते हैं। वह तो साथी भी उस अर्थ में नहीं बनते-बनाते थे। वह बस परिचित हो लेना जानते थे। वह जानते थे कि ‘कविता को अच्छी होने के लिए। उतना ही संघर्ष करना पड़ता है। जितना एक लड़की को। औरत होने के लिए।’

18 जुलाई, 1933 को देवरिया जिले के कसया (अब कुशीनगर) में जन्मे और 1958 में गोरखपुर विश्वविद्यालय से हिंदी में एम ए करने वाले देवेंद्र कुमार का दरअसल सारा संघर्ष ही कविता को अच्छी बनाने के लिए था। इसी फेर में वह चौबीस कैरेट के ‘महाकवि’ नहीं बन पाए। नहीं तो उसी कसया में सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायायन ‘अज्ञेय’ भी जन्मे थे, जहां देवेंद्र कुमार जन्मे। बुद्ध की इस तपोस्थली में जन्मे अज्ञेय मशहूर हो जाए, पर देवेंद्र कुमार एक अच्छे किंतु अ-मशहूर कवि हो कर रह गए। उन की कमजोरी यह थी कि अच्छी कविता तो वह कर लेते थे, कवि होने की रद्दी दुकानदारी भी नहीं कर पाते थे। शायद इस लिए वह एक तो कवि सम्मेलनों में मंच पर नहीं जाते थे। या कभी-कभार जो स्थानीय मंचों पर पकड़ ले जाए गए, तो मंच पर वह होते थे। कहीं किनारे बैठे हुए सिगरेट फूंकते हुए और कोई ‘चालू’ कवि उन की कविता उन के ही सामने पढ़ कर आ कर उन के पांव छू लेता था, ‘क्षमा करें, बंगाली जी। जरूरत पड़ गई थी।’ और बंगाली जी मंद मुस्कान फेंक चुप रह जाते थे। वह लिखते भी थे, ‘एक पेड़ चांदनी लगाई है आंगने। फूल जाए/ तुम भी/ आ जाना मांगने।’

छोटे, दुबले कद काठी वाले बंगाली जी की आवाज थोड़ी पतली थी। लोग कहते थे वह मिमियाते हैं। पर वह सचमुच मिमियाते नहीं थे। कविता में तो वहां मुहावरा ही तोड़ते थे। बहुत मशहूर मुहावरा है, अंगूर खट्टे हैं। पर बंगाली जी ने इस मशहूर मुहावरे को तोड़ा। संघर्ष को रेखांकित करते हुए:

‘तावे से जल भुन कर
कहती है रोटी
अंगूर नहीं खट्टे
छलांग लगी छोटी।’

बंगाली जी वस्तुत: गीतकार थे। भोजपुरी गीतों में जो रूप, बिंब और उपमा उन्हों ने परोसी, वह विरल है। बात बहुत छोटी-सी है, पर उपमा देखिए:

‘उगल दुइजिया क चांद
कि अंगना टूटे लागल
रूपवा कै एतना जोर
कि ऐना फूटे लागल।’

(दूज का चांद निकला तो आंगन टूटने लगा और रूप इतना जबरदस्त था कि आईना फूटने लगा।)

बंगाली जी वास्तव में भोजपुरी गीतों को लाचारगी और आवारगी की खोह से निकालने की भरसक कोशिश की। पर उन के समकालीनों ने उन का साथ देने के बजाय उन की उपेक्षा ही की। अब कि जैसे उन का एक मशहूर भोजपुरी गीत है, ‘ना चली तोर ना मोर पिया/होखे द भोर/मारल जइहैं चकोर/आज पिया होखे द भोर’ में जो मांसलता है, वह कई को चुभ गई। और जब यह गीत मशहूर हो गया, तो महारथियों ने बंगाली जी को मारने की ठान ली। आखिर आजिज आ कर बंगाली जी भोजपुरी गीत भुला गए। अब वह ‘कल्पना’ और ‘लहर’ सरीखी पत्रिकाओं में नवगीतकार थे। चर्चित गीतकार।

जब बंगाली जी भोजपुरी गीतों के रसिया थे, तब उन्हें मंचीय गवैयों, भड़ैतों ने विवश कर दिया था और भोजपुरी गीतों को लाचारगी, आवारगी से विलग करने की उन की कोशिशों को कूट दिया था। अब जब वह नवगीत लिख कर झंडे गाड़ने लगे, तो विश्वविद्यालयी कवियों ने उन्हें कतरना-कुतरना शुरू कर दिया। मंच वाले छाती फुलाए हुए बोलते थे, ‘बोलने का सहूर नहीं और गीत लिखते हैं। गाएं तो समझ में आए तो कि गीत किसे कहते हैं।’ पर उन का गवैयों की इस बात को तीन लोक कलाकारों ने ही धो कर रख दिया बंगाली जी के गीतों को गा-गाकर। लेकिन बंगाली जी भोजपुरी की हीनता महसूसने लगे, तो नवगीत पर ज्यादा ध्यान देने लगे। अब विश्वविद्यालयी कवि जन दांत निपोरने लगे, ‘कविता लिखें तो समझ में आए। गीत-नवगीत में क्या धरा है।’ और इन लोगों के ताने में बंगाली जी ही क्यों और भी कई लोग सुधर गए। यही नहीं, केदार नाथ सिंह, तब सुनते हैं बहुत मन से लिखते ही नहीं, गाते भी थे। ‘धान उगेंगे कि प्रान उगेंगे’ पर केदारनाथ सिंह भी गीतों से शर्म खाने लगे। बंगाली जी भी गीतों को विसार कविता लिखने लग गए। यह धूमिल, राजकमल चौधरी, दुष्यंत कुमार की प्रसिद्धि के दिन थे।

‘अब तो अपना सूरज भी आंगन देख कर धूप देने लगा है’ लिखने और महसूसने वाले बंगाली जी चूंकि जुगाड़ी जीव नहीं थे, सो ‘स्थापित’ होने की कला भी उन से दूर थी। खुद कोई संग्रह छापने, छपवाने की उन्हों ने कभी सोचा ही नहीं। पर तभी अशोक वाजपेयी ने पहचान सीरीज की कैफियत में उन की कविताएं छाप दीं, तो शहर के महारथियों का माथा ठनका। फिर तो देवेंद्र कुमार बंगाली शहर में बंगाली जी और कविताओं में देवेंद्र कुमार हो गए। लेकिन बंगाली जी अंत तक दंद-फंदी नहीं हो पाए। वह अपनी छोटी-सी गृहस्थी और कविताई में ही लगे रहे। घर से रेलवे दफ्तर और रेलवे दफ्तर से उन की साइकिल उन्हें ले जाती, ले आती। क्यों कि मैंने देखा, वह साइकिल पर सवार कम ही होते थे। पर साइकिल उन की उन के साथ होती थी कि वह साइकिल के साथ होते थे, कहना कठिन है। रास्ते में कोई मिलता, तो यह फट साइकिल से उतर कर पैदल हो लेते। यह उन की आदत नहीं, दिनचर्या थी। उन की कविताओं का ताना-बाना भी रास्ते में ही बुनता था। शायद इस लिए वह कविता लिखने से ज्यादा ध्यान कविता साफ करने, उसे माजने में ज्यादा देते थे। शायद तभी लिख भी पाते थे, ‘कविता को अच्छी होने के लिए। उतना ही संघर्ष करना पड़ता है, जितना एक लड़की को औरत होने के लिए।’

उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने जब उनकी भी कविता पांडुलिपि को पुरस्कृत किया, तो एक बार फिर वह शहर में ईर्ष्या के पात्र बने। पर गोरखपुर जैसे छोटे से शहर में पूरा जीवन गुजारने के बावजूद वह कभी कुढ कर नहीं रहे। पर दृष्टि भी धुंधली नहीं होने दी। बहस जरूरी है, कविता में उनकी अंतरदृष्टि साफ उभरती है। मुझे लगता है कि ‘बहस जरूरी है’ देवेंद्र कुमार की सबसे महत्वपूर्ण कविता है। और एक तरह से उनका आत्म-व्याख्यान भी लगती है यह कविता। विश्वविद्यालयी कवियों को तमाचा भी मारती है यह कविता।

‘बहस जरूरी है’ नाम से जब उन का दूसरा कविता संग्रह दिल्ली के एक प्रकाशक ने छापा, तो प्रयाग शुक्ल ने उसका आवरण बनाया। बंगाली जी इस बात पर बहुत प्रसन्न थे, पर गोरखपुर में बाद में कुछ ठाकुर-ब्राह्मण कवियों ने उन्हें हरिजन कह कर अपमानित करना शुरू किया, तो प्राध्यापक कवियों ने क्लर्क कवि कहकर खारिज करने की कोशिशें शुरू कीं। पर बंगाली जी इस सब से बहुत विचलित नहीं हुए। न ही किसी खेमे में शरण लेने गए। वह तो अपनी साइकिल लिए शहर में टहलते रहे और ‘छलांग लगी छोटी’ गुनगुनाते रहे। कभी रामसेवक श्रीवास्तव और माहेश्वर तिवारी, देवेंद्र कुमार बंगाली के पड़ोसी रहे थे। बंगाली जी का एक रुप सेवा और मदद का भी था। पर चुपचाप। बिना किसी को कुछ बताए।

बंगाली जी ने यह और ऐसे ढेरों कवियों, अकवियों की समय-असमय सेवा, मदद की, पर उन की मदद को कभी कोई नहीं आया। उन्हों ने कभी किसी से कोई उम्मीद भी नहीं की। वह तो स्वाभिमान से साइकिल चलाते, पान चबाते और कविता रचते, कविता माजते और उसे साफ करते रहे। वह जानते थे कि वह हरिजन हैं, कि वह क्लर्क हैं। पर वह यह भी जानते थे कि वह मनुष्य हैं। और यही उन की कविता का आधार भी था। शायद इस लिए उन में कवि होने की कातरता नहीं, कवि होने की कूबत गूंजती थी। उन में अपने समर्थ कवि होने का एहसास भी खूब था। पर वह इस को छलकाते नहीं घूमते थे, जैसे कि उन के समकालीन। मुक्तिबोध उन के आदर्श थे। यह मुझे तब पता चला, जब मुक्तिबोध पर एक बार उन से लिखने को कहा। वह गद्य लिखने में बड़े आलसी थे। पर जब मुक्तिबोध पर मैं ने उन से लिखने को कहा तो दो-एक बार ही ना-नुकुर के बाद उन्हों ने लेख लिख कर दे दिया। जब कि इस के पहले प्रेमचंद जन्म-शताब्दी के मौके पर कोई साल भर पीछे पड़ कर भी उन से प्रेमचंद पर नहीं लिखवा सका था। वह हर बार यही पूछते, ‘क्या लिखूं, प्रेमचंद पर? किसी और से लिखवाइए।’
एक बार आजिज आ कर मैंने उन से कहा कि प्रेमचंद पर कविता ही लिख दीजिए! वह बोले, कोशिश करता हूं। अंतत: काफी दिन बाद एक दिन वह मिले और सीधे-सीधे हथियार डाल दिए। हम से लिखते नहीं बनता। नहीं लिख पाऊंगा। और यह इतनी लाचारगी से उन्हों ने कहा कि मैं भी चुप रह गया। लगा ही नहीं कि यह ‘बहस जरूरी है’ का कवि देवेंद्र कुमार बोल रहा है। पर क्या कीजिएगा, बोल वही रहे थे। जीवन के अंतिम छोर पर उन को जवान बेटे का असमय निधन तोड़ ही नहीं, ध्वस्त कर गया था। जीवन के इस मोड़ पर उन्हों ने पाया कि वह हरिजन, क्लर्क और कवि होने के साथ-साथ एक बेटे के बाप भी थे। निधन तो खैर उन का अब हुआ है, पर वह तभी मर से गए थे। पर बेटे की पत्नी, बच्चों की जिम्मेदारी उन्हें ढकेल रही थी, तो वह जी रहे थे। ठीक अपनी उस कविता के अंश की तरह ‘न जनता/ न नेता/ आप पूछेंगे! फिर मुझे इस देश से
क्या वास्ता? सो तो है मगर...।’


अपनी कविताओं से मिथक रचने वाले, मुहावरे तोड़ कर संघर्ष को रेखांकित करने वाले देवेंद्र कुमार घास की जिजीविषा जीते-जीते हम से अब जब जुदा हो गए हैं, तो हम उन्हें उनकी कुछेक कविताओं के अंशों को याद करके ही श्रद्धा की अंजुरी परोसते हैं।
वह लिखते हैं:-

दिक्कत है कि तुम सोचते भी नहीं
सिर्फ दुम दबा कर भूंकते हो
और लीक पर चलते-चलते एक दिन खुद
लीक बन जाते हो
दोपहर को धूप में जब ऊपर का चमड़ा चलता है
तो सारा गुस्सा बैल की पीठ पर उतरता है
कुदाल,
मिट्टी के बजाय ईंट-पत्थर पर पड़ती है
और एकाएक छटकती है
तो अपना ही पैर लहुलुहान कर बैठते हो
मिलजुल कर उसे खेत से हटा नहीं सकते?
(बहस जरूरी है)

‘परिसंवाद’ कविता का एक अंश देखिए जो देवेंद्र कुमार की रचनाधर्मिता की चाह देता है:
चिड़ियों की चीख
झरनों की टापू
नदियों के बारह मासे सुनता है
तो पृथ्वी से कह दो कि वह अपने हाथ
कुछ देर के लिए ऊपर से
खींच ले,
ममता दिखाने के और भी रास्ते हो सकते हैं।

वह रूपवादी मतलब रूप कुमार नहीं थे। देवेंद्र कुमार की कविताओं के रेशे और रंग के ब्यौरों या शास्त्रीय व्याख्या में जाने के बजाय सीधे-सीधे उन की कुछ कविताओं के अंश पर मुलाहिजा करें:

रात को उस के समग्र रूप को आंकना
खानों में पैठ कर
कोयले के अंदर झांकना है।
इंजन की भट्टी पर जाने से पहले
मैं उस मजबूरी को जान लेना चाहता हूं
जिसके तहत चंद्रमा को
कछुए की चाल से,
आकाश की दूरी तय करनी पड़ती है
और दिन का सारा कारोबार
छछूंदर की एक चीख में बदल जाता है।
यह कैसी जड़ता है?
कि मेरा ही घर, दिशा ज्ञान
मेरे खिलाफ पड़ता है।
(काला जादूगर)

समन्वय, समझौता, कुल मिला कर
अक्षमता का दुष्परिणाम है
जौहर का किस्सा सुना होगा
काश! महारानी पद्मिनी, चिता में जलने के बजाए
सोलह हजार रानियों के साथ लैस हो कर
चित्तौड़ के किले की रक्षा करते हुए
मरी नहीं, मारी गई होती
तब शायद तुम्हारा और तुम्हारे देश का भविष्य
कुछ और होता!
यही आज का तकाजा है
वरना कौन प्रजा, कौन राजा है?
(बहस जरूरी है)

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