Monday, 23 March 2026

इलाहाबाद में रवि की सुगंध खोजती फिरती ममता

 दयानंद पांडेय

ममता कालिया को पढ़ना मन को वृंदावन करना है। इस लिए नहीं कि वह वृंदावन में पैदा हुई हैं। इस लिए कि उन की कहानियों में सुकून का सुरूर भी है। भाषा में अजब सा ठहराव और गहनता है। साधारण चरित्र और उस के साधारण विवरण से असाधारण कथा संसार रचने वाली ममता कालिया का कथा संसार जितना भरपूर है , संस्मरण संसार भी अपूर्व है। ममता कालिया जब ममता अग्रवाल थीं तब कविता लिखती थीं। क ख ग पत्रिका के मुख पृष्ठ पर छपी इस कविता से वह जैसे चर्चा में आ गई थीं :

प्यार शब्द घिसते - घिसते चपटा हो गया है 

अब हमारी समझ में 

सहवास आता है। 

70 के दशक में इस तरह की भाषा और वह भी एक स्त्री की। लोगों का चौंकना सहज था। लेकिन रवींद्र कालिया ने एक जगह लिखा है कि चंडीगढ़ की एक गोष्ठी में उस से भेंट हुई तो मैं ने पाया कि वह कविताओं में ही बोल्ड है , जीवन में तो सूर्यास्त से पूर्व पापा के डर से घर पहुंच जाने वाली एक औसत लड़की है। तब के समय वह ममता अग्रवाल थीं। पहले अध्यापक फिर आकशवाणी के अफसर विद्याभूषण अग्रवाल की बेटी। लेकिन बाद के समय में ममता अग्रवाल ने अपनी रचनाओं में ही नहीं , जीवन में भी जो छलांग लगाई वह अप्रतिम थी। अपनी रचनाओं और जीवन में ममता कभी औसत नहीं रहीं।  दिल्ली और मुंबई में रवींद्र कालिया से लंबी मित्रता के बाद वह ममता कालिया बन गईं। पिता के नक्शे क़दम पर चलते हुए ममता अग्रवाल भी दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कालेज में अंग्रेजी पढ़ाने लगी थीं। फिर मुंबई में भी अंग्रेजी पढ़ाती रहीं। बाद के समय में प्रयाग के महिला सेवा सदन डिग्री कालेज में प्राचार्य हुईं। अंग्रेजी की अध्येता रहीं ममता कालिया पर अमरकांत की सादगी और उन के लेखन का गहरा प्रभाव दिखता है। रवींद्र कालिया पर भी अमरकांत का गहरा प्रभाव था। अमरकांत पर रवींद्र कालिया ने एक विशेषांक भी संपादित किया था जो बाद में पुस्तक रूप में प्रकाशित हुआ। 

लोग एक साथ दो उपन्यास नहीं पढ़ सकते। लेकिन ममता कालिया एक साथ दो उपन्यास लिखने की अभ्यस्त रही हैं। कालेज के समय में एक उपन्यास और घर के समय में दूसरा उपन्यास। कोई औसत लेखक तो ऐसा करने से रहा। औसत लेखक ? बड़े से बड़ा लेखक भी ऐसा शायद नहीं कर सकता। अपने ही उपन्यास का अंग्रेजी में रिक्रिएशन करना किसी को सीखना हो तो ममता कालिया से सीखे। अपने ही उपन्यास दौड़ का अंग्रेजी में रिक्रिएशन ममता कालिया ने खुद किया है। तीन लेखक दंपतियों की एक समय बड़ी चर्चा रही है। मोहन राकेश - अनीता राकेश , राजेंद्र यादव - मन्नू भंडारी , रवींद्र कालिया -ममता कालिया। इन में जो पहली जोड़ी मोहन राकेश और अनीता राकेश की है उस में निश्चय ही मोहन राकेश बड़े कथाकार हैं। अनीता राकेश खो जाती हैं। लेकिन कृपया मुझे यह कहने की अनुमति दीजिए कि मन्नू भंडारी , राजेंद्र यादव से बड़ी कथाकार हैं। राजेंद्र यादव को हम कथाकार नहीं , हंस के संपादक के तौर पर याद करते हैं। अन्य अनेक निजी कारणों से भी। इसी तरह ममता कालिया , रवींद्र कालिया से बड़ी कथाकार हैं। रवींद्र कालिया को हम कथाकार से ज़्यादा संस्मरणकार और संपादक के लिए जानते हैं। संपादक तो ममता कालिया भी रही हैं। यह बहुत कम लोग जानते हैं। वर्धा हिंदी विश्विद्यालय की अंग्रेजी में निकलने वाली पत्रिका हिंदी की। पर परिचित हम ममता कालिया के विराट कथा संसार से ही हैं। अलग बात है कि अब की साहित्य अकादमी ममता कालिया को संस्मरण के लिए ही घोषित हुआ है। जीते जी इलाहाबाद के लिए। जीते जी इलाहाबाद के कवर पृष्ठ पर छपा है : 

शहर -

पुड़िया में बांध कर 

हम नहीं ला सकते 

तो क्या ! 

सच तो यही है। पर एक दूसरा निर्मम सच यह है कि ममता कालिया इलाहाबाद शहर को दिल में टांक  कर अपने आंचल में बांध कर , घूमती हैं। जीते जी इलाहाबाद की इबारत ही नहीं उन के उपन्यासों और कहानियों की इबारत भी यही कहती है। हम सभी जानते हैं कि रवींद्र कालिया संस्मरणों के बादशाह थे। इस लिए भी कि वह यारबास थे। फिर ममता कालिया से उन की यारी इतनी प्रगाढ़ थी कि मोहन राकेश या राजेंद्र यादव की तरह उन का दांपत्य कभी खटाई में नहीं पड़ा। प्रगाढ़ होता गया। इतना सफल दांपत्य कम ही लोगों का होता है। तमाम खटपट के बावजूद। उपेंद्रनाथ अश्क के बावजूद। इस की अलग कथा है जिस की हलकी सी आंच रवींद्र कालिया ने ग़ालिब छुटी शराब में परोसी है। अश्क अपना ही नहीं , लोगों का भी दांपत्य तुड़वाने के आचार्य थे। बहरहाल जिन ममता कालिया को हम उन की कहानियों , उपन्यासों के लिए , संबंधों में उन के ममत्व के लिए जानते थे , अचानक उन के संस्मरणों से रूबरू होने लगे। शायद यह रवींद्र कालिया की संगत का प्रताप है। जीते जी इलाहाबाद से भी बेहतर संस्मरण अंदाज़-ए-बयां उर्फ रवि कथा को पाता हूं जो 2020 में प्रकाशित हुआ था। कथा रवि में रवींद्र कालिया की ऐसी भीगी यादें हैं कि पूछिए मत। साधारण से साधारण विवरण में बड़ी-बड़ी बात लिख जाती हैं ममता । ग़ालिब छुटी शराब अगर रवींद्र कालिया के जीवन का दरवाज़ा है तो रवि कथा उस घर की खिड़की है। जिस से झिर-झिर पुरवैया बहती रहती है। रवींद्र कालिया इलाहाबाद को उस के अमरुद की महक से याद करते थे। ममता कालिया इलाहाबाद में रवींद्र कालिया की सुगंध खोजती फिरती हैं। 

इलाहाबाद को बहुतेरे लेखकों ने जिया और लिखा है। इलाहाबाद ने इतने लेखक , कवि और शायर दिए हैं , शायद कम शहर हैं , जो दे पाए हों। एक समय इंदिरा गांधी फ़िराक़ गोरखपुरी को राज्य सभा भेजना चाहती थीं। इलाहाबाद से फ़िराक़ को दिल्ली बुलवाया। और यह प्रस्ताव रखा। फ़िराक़ ने कहा फिर तो बिटिया तुम को राज्य सभा को इलाहाबाद भेजना पड़ेगा। इंदिरा गांधी ने कहा कि जब मन करे तब आइएगा। न मन करे तो मत आइएगा। लेकिन फ़िराक़ ने इलाहाबाद छोड़ कर राज्य सभा जाने से इंकार कर दिया। बहुत कम लोग जानते हैं कि महादेवी वर्मा 6 वर्ष लखनऊ रही हैं। पहली विधान परिषद की सदस्य नामित हो कर। पंडित कमलापति त्रिपाठी ने एक जगह लिखा है कि विधान परिषद में जब महादेवी बोलती थीं तब लोग उन्हें मंत्रमुग्ध हो कर सुनते थे। कई बार समय सीमा समाप्त हो जाती थी। पर कोई उन्हें टोकता नहीं था। सभापति भी नहीं। उन को सुनते रहते थे। बहरहाल महादेवी ही नहीं ,  इलाहाबाद जा कर लेखक लोग बसते रहे। पढ़ते रहे। नौकरियां करते रहे। इलाहाबाद छोड़ते रहे पर इलाहाबाद कभी नहीं भूले। पंत , निराला , अज्ञेय , शमशेर , बच्चन ,अमरकांत , भैरव प्रसाद गुप्त , धर्मवीर भारती , मार्कण्डेय , कमलेश्वर , दुष्यंत , कन्हैयालाल नंदन , सर्वेश्वर दयाल सक्सेना , ज्ञानरंजन , दूधनाथ सिंह आदि अनेक लोग। रवींद्र कालिया और ममता कालिया भर ने नहीं , उपेंद्रनाथ अश्क और उन के बेटे नीलाभ ने भी इलाहाबाद को ख़ूब लिखा है। लौट आओ धार में दूधनाथ सिंह ने भी इलाहाबाद को ग़ज़ब ढंग से लिखा है। ज्ञानरंजन भी इलाहाबाद को जब तब रटते और लिखते रहे हैं। लोकनाथ की मिठाई खाते-खिलाते रहते हैं। हिंदी में बहुत से संस्मरण लेखक हैं। मेरी भी पांच किताबें संस्मरण पर हैं। पर सब से बढ़िया संस्मरण लेखक कांति कुमार जैन को मानता हूं। कांति कुमार जैन ने अनेक संस्मरण लिखे हैं। जिन में एक संस्मरण अपने सहपाठी आचार्य रजनीश पर भी लिखा है। अद्भुत है रजनीश पर लिखा उन का संस्मरण। रजनीश यानी ओशो को समझने का एक नया और अलौकिक मार्ग।  

बहरहाल जीते जी इलाहाबाद को लिखने वाली ममता कालिया अब साहित्य अकादमी से संस्मरण के लिए सुशोभित और प्रतिष्ठित हैं। कोई भी पुरस्कार किसी को सुख और दुश्मन दोनों एक साथ देता है। नालायकों , तिकड़मबाज़ों  और बनावटी लेखकों की सेहत पर इस सब से कोई फर्क नहीं पड़ता। पर लिखने वाले को बहुत फ़र्क पड़ता है। ऐसे गोया स्वाभिमान का अपमान से समझौता हो गया हो। सारी रचनात्मकता और सारी मेहनत अपमानित हो जाती है इन जलनखोर जीवों की कुढ़न से। लेकिन सर्वदा से ही यह सब कुछ होता आया है। कोई नई बात नहीं है। ममता कालिया को भी इस साहित्य अकादमी ने कई दुश्मन परोस दिए हैं। ममता कालिया को साहित्य अकादमी मिलना बहुतों को खल गया है l बहुत से लोग सिरे से ख़ामोश हैं l कुछ सदमे में ख़ामोश हैं l तो कुछ लोग विरोध में भी खड़े हो गए हैं l यह सब लगभग सभी पुरस्कार में होता रहता है l पर ममता कालिया की कांग्रेस के साथ पक्षधरता की चर्चा भी इस बार चर्चा में है l फ़ेसबुक पर राहुल गांधी के पक्ष में उन की एक पोस्ट की बड़ी चर्चा है l जानना दिलचस्प है कि रवींद्र कालिया और ममता कालिया की कांग्रेस से प्रतिबद्धता और सरोकार, कोई छुपा विषय नहीं है l अशोक वाजपेयी से उन की रिश्तेदारी भी लोग जानते ही हैं l 

फ़ोटोग्राफ़ : भरत तिवारी 

उन की इस किताब जीते जी इलाहाबाद पर भी विवाद शुरू है l पर इस सब में सब से दिलचस्प यह है कि ममता कालिया कई सारे अपनों को काटती हुई इस बार यह पुरस्कार पा गई हैं l पिछले तीन-चार वर्ष से हर बार वह मुक़ाबले में उपस्थित रहती थीं l और कट जाती थीं l इस बार एक दर्जन लोगों को पछाड़ कर विजेता हैं l ममता कालिया जी को बधाई दीजिए l किन-किन को काट कर ममता कालिया विजेता बनी हैं , उन को इस सूची में देखिए l और जानिए कि निर्णायक मंडल यानी ज्यूरी में थे : अनामिका , अरुण कमल और अरविंदाक्षन l मतलब सभी का नाम अ से शुरू l ऐसे जैसे दुक्खम-सुक्खम का कोई अनिवार्य पाठ हो। 

ममता कालिया का एक बहुत महत्वपूर्ण उपन्यास है दौड़। बाज़ार और कैरियर के लिए तबाह होती नई पीढ़ी की अंधी दौड़ का विवरण पढ़ कर देह और मन में जैसे तमाम शीशों की किरिचें टूट कर चुभने लगती हैं। ठीक वही चुभन ले कर लोग उपस्थित हैं तो कोई क्या कर लेगा ? ममता कालिया के लेखन , उन की भाषा और संवेदना को तो नहीं न छीन लेगा। ममता कालिया शब्दों को जिस तरह ठहर कर लिखती हैं भीमसेन जोशी के आलाप का कोई ठाट याद आ जाता है। मन मुरकियां मारने लगता है। जाने यह ममता के वृंदावन में जन्म लेने की तासीर है या उन की भाषा और कथ्य का टटकापन कि राग खमाज अपने सातो सुर में बजने लगता है। ममता की कहानियों का ठाट यही है। उन की कहानियों की स्त्री अपने आप से बतियाती हुई , लड़ती हुई , अपने संघर्ष को तार-तार कर खल चरित्र के लोगों को उलार कर अपने पाठकों को दुलराने लगती है। ममता की कहानियों के ममत्व की छांव में विश्राम का एक यह पाठ भी है। 

[ 23 मार्च , 2026 नवभारत टाइम्स , लखनऊ में प्रकाशित ]





Monday, 9 March 2026

हत्यारा

दयानंद पांडेय 


तुम मुझे ऐसे मिली थी जैसे किसी मछुआरे को बिना जाल की मछली। मछुआरे के हाथ में आ कर भी तुम मरी नहीं थी। क्यों कि जैसे एक जल से निकल कर दूसरे जल में आ गई थी। तो मरती भी कैसे भला। तुम्हें शायद उस जल से निकल कर दूसरे जल की ज़रूरत थी। ऐसे जैसे किसी बहती नदी को दूसरी नदी से मिलने की। जल बदलना , मछली के जीवन को कैसे बदलता है यह तुम्हारे साथ जल बन कर जाना। तुम किसी पोखर के जल से निकल कर नदी के जल में आ मिली थी। उस पोखर का जल सड़ने लगा था और कि उस जल में तुम्हारा सांस लेना कठिन हो गया था। ऐसा तुम बताती थी। छटपटाती हुई इसी लिए मिली थी। जल बदलने की तुम्हारी यह छटपटाहट , यह अकुलाहट इतनी तीव्र थी कि मैं इसे प्यार समझने लगा। पुरुष अकसर ऐसे धोखे में आ जाते हैं। मैं भी तुम्हारे प्यार में आ गया। लेकिन स्त्रियां मछली बन कर मछुआरे को मझधार में छोड़ कर फिर किसी और जल में अपना जीवन खोज लेती हैं। मछली खुल कर मिलती है। हंस कर मिलती है। लोग धोखा खा जाते हैं। वह आहिस्ता से जल बदल लेती है। 

लेकिन जल ? 

जिस जल ने किसी मछली को अपना जीवन बना लिया हो , अपना संसार और और सर्वस्व बदल लिया हो उस के लिए बहना कठिन हो जाता है। जल की तलहटी भी उस की लहरों को बांध-बांध लेती है। आगे नहीं बढ़ने देती। 

तुम मेरे जाल में भी इसी लिए नहीं थी। बहुत बाद में समझ आया था कि मछुआरा ही मछली के जाल में था। लेकिन यह जाल बहुत मज़बूत था। तो क्या तुम बहेलिया थी। प्रेम का दाना बिछा कर ऊपर जाल बिछा दिया था ? प्यार का जाल। कितने तो जाल थे तुम्हारे पास। मोह के , देह के , नेह के , आशा , उमंग और अभिलाषा के। जन्म - दिन तुम्हारा हो , हमारा हो हम साथ मनाते ही मनाते थे। सारी अड़चन , सारी जकड़न तोड़ कर मिलते थे। मिलना ही जन्म - दिन मनाना था। अवसर कोई भी हो प्रेम के पान हम खा ही लेते थे। यह जल और मछली का रिश्ता था कि मिलते ही हम बहने लगते थे। बहाने सारे जल में विगलित हो जाते। हमारा प्यार सयाना हो जाता। दुनिया जान भी नहीं पाती। मछली पालने वाले जानते हैं कि तालाब अगर किसी रेल पटरी के किनारे हो तो मछली जल्दी बड़ी हो जाती है। रेल गुज़रती रहती है , रेल की आवाज़ सुन कर मछली दिन-रात नहीं देखती , तैरती रहती है ,निरंतर तैरती रहती है। और बड़ी होती रहती है। हमारा प्यार भी जैसे किसी रेल पटरी के किनारे का तालाब था। बढ़ता रहा। इतना बढ़ा कि मछली बहुत बड़ी हो गई। अपने जल से निकल गई। 

हम जब मिले तो लगा हमारी भाषा अलग - अलग है। इच्छाएं और कामनाएं अलग हैं। न तुम हमारी भाषा जानती थी , न हम तुम्हारी भाषा। बिलकुल अनजानी और अजनबी भाषा। फिर भी मिलते रहे। शौक़ और समझ भी अलहदा। हाथ में हाथ लिए एक दिन अचानक तुम बोली , ' आज नाव पर घूमते हैं। ' फिर भाड़े की नाव ली। दिन भर की पिकनिक मनी हमारी नाव पर। नाव वाले ने पैसा भरपूर लिया पर हमारा दिन बना दिया। कितने तो गाने गए थे तुम ने। 

याद है ?

हम चाहते थे कि नाव वाला शहर की सरहद छोड़ कर कहीं दूर देहात की तरफ चले। पहले तो तुम चुप रही। अचानक बोली , ' आज नहीं। कभी और। ' तुम्हारी ख़ासियत थी , संक्षिप्त बोलना। कम बोलने वाली स्त्रियां बहुत अच्छी लगती हैं मुझे। तुम्हारी यह एक बात मुझे बहुत प्रिय थी कि तुम कभी किसी बात पर लड़ती नहीं थी। सिर्फ़ फ़ैसला देती थी। गोया कोई न्यायाधीश। 

तुम इतनी रूपवती थी , इतनी गोरी , इतनी अबोध थी कि तुम्हें देखने में तो नहीं , पर छूने में तनिक डर लगता था। तुम्हारे रूप का इतना ज़ोर था कि तुम्हें देख कर आइना टूट जाए। चांद की अजोरिया में नदी की धार में तुम्हारी धवलता जैसे मुझे पुकार लेती कि आओ मुझ से लिपट जाओ। लिपट कर लगता कि कोई गुनाह तो नहीं कर दिया। हमारे प्यार की धार पर नदी की धार न्यौछावर हो जाती। हवा की तरह यह गुनाह भी लेकिन छुप जाता था। लेकिन प्यार का चिराग नहीं बुझता। जलता रहता। मद्धिम - मद्धिम। 

इस सेल्फी युग में तुम ने हमारे साथ कभी कोई फ़ोटो अपने मोबाइल में नहीं रखी। फ़ोटो खींचती। देखती , मुझे दिखाती और चट मिटा देती। यह मुझे बहुत बुरा लगता। तुम इस बुरा लगने की परवाह नहीं करती। यह डर था कि एहतियात ? वाट्सअप चैट भी मिटा और मिटवा देती। कोई रिकार्ड नहीं रहने देना चाहती थी। अजब प्यार था यह। टूट कर मिलना और अचानक चल देना। कई बार शक़ होता कि स्रीजनोफेनिया की मरीज तो नहीं हो। नहीं थी। पर थी ऐसी ही। 

मेरे जन्म - दिन पर एक बार तुम ने मंहगी सी कलाई घड़ी दी मुझे। कहा कि यह तोहफ़ा नहीं प्यार है। तुम्हें मेरे सिगरेट पर बहुत ऐतराज था पर जब तुम्हें पता चला कि पाइप पीने का हमारा मन करता है तो तुम ने एक नहीं , दो - दो पाइप मुझे प्यार के तौर भेंट किए। कहा कि जब-जब तुम इन्हें अपने होठ से लगाओगे , समझूंगी कि मेरे होठ , तुम्हारे होठों से मिल रहे हैं। और मैं तुम्हारे लिए सुलगने लगूंगी। तुम मेरे पास दौड़े चले आओगे। ग़ज़ब थी तुम्हारी यह तलब भी। अजब था तुम्हारा यह इसरार भी। पर मुझे क़ुबूल था तो था। तुम को अचानक लगा कि हमारी नौकरी छोटी है। तुम ने एक बड़ी कंपनी के चेयरमैन से कह कर मुझे बढ़िया नौकरी दिलवा दिया। बढ़िया सेलरी के साथ ही कंपनी की तरफ से मुझे कार वगैरह की सुविधा भी मिल गई। मुझ से ज़्यादा तुम ख़ुश हो गई। ऐसी ही अनेक छोटी - मोटी सुविधाओं से मुझे तुम लादती गई। कहने को मैं बहेलिया था , तुम चिड़िया। ऐसा तुम ही कहती फिरती। पर अब चिड़िया के जाल में बहेलिया था। किसी बहेलिये के जाल से चिड़िया फिर भी निकल सकती है। कोई निकाल सकता है। पर चिड़िया के जाल से निकलना ? 

नामुमकिन। 

कोई मान ही नहीं सकता कि चिड़िया भी जाल बिछा सकती है तो निकालेगा भी कैसे भला। निकालने की सोचेगा भी कैसे ? लेकिन तुम जाल थी। जल के नीचे भी , जल के ऊपर भी। 

तुम्हारे अफ़सर पति के पास तुम्हारे लिए समय ही नहीं होता। बेटा कहीं बाहर पढ़ता था। तो तुम्हें किसी भद्र पुरुष के साथ समय बिताने की तलब लगी। मुझ मछुआरे से बढ़िया कौन मिलता तुम्हें। बेक़रारी में पहले इसरार करती थी। क़रार आने लगा तब आहिस्ता - आहिस्ता तुम आदेश देने लगी। यहां मिलो। वहां मिलो। तो कभी घर आ जाओ। मुझे भी अच्छा लगता यह तुम्हारा बुलाना। लगता था गोया तुम्हारे लिए ही पैदा हुआ हूं। तुम्हीं मेरा जीवन हो। तुम्हीं मेरा लक्ष्य। तुम्हीं मेरा सब कुछ। सर्वस्व तुम ही। नितांत निजी क्षणों में भी तुम मुझे ऐसे दुलारती जैसे मैं तुम्हारा शिशु। तुम हमारी मां। तुम्हारी गोद में लेटना , खेलना और तुम्हें पाना मेरा सौभाग्य बन गया था जैसे। मन ही मन भगवान से कृतज्ञता ज्ञापित करता। लाख - लाख शुक्रिया अदा करता रहता। तुम इतना खिलाती - पिलाती और प्यार करती कि मुझे ख़ुद अपने आप से रश्क़ होने लगा। 

तुम शायद शहर में गिनती की सर्वाधिक सुंदर स्त्रियों में से एक थी। धनवान भी थी। सलीक़ेदार भी।  इस से भी बड़ी बात कि मेरा सौभाग्य बन कर मेरे जीवन में उपस्थित थी। तुम्हारे जितना सुख मुझे किसी और स्त्री ने नहीं दिया था। कभी वह दिन था कि तुम्हें देख कर ही ख़ुश रहता था। तुम्हें छूने से डर लगता था। लेकिन वह कहते हैं न सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता। मेरा डर भी आहिस्ता - आहिस्ता सरकता गया। तुम को सहसा छू लिया एक दिन। ऐसे जैसे चांदनी को छू लिया हो। किसी बहती हुई वेगवती धारा को थाम लिया हो। समय को शिला बना लिया हो। समय जैसे रुक गया हो। मन में एक नई मिठास सी घुल गई। ऐसा स्वाद मिल गया जो कभी पहले नहीं मिला हो। सोने - चांदी जैसे दिन हो गए। लेकिन वह कहते हैं न कि इश्क़ और मुश्क छिपाए नहीं छिपते। फिर तुम्हारी सुंदरता की सुगंध वैसे भी किसी से नहीं छुपी थी। इश्क़ की सुगंध भी नहीं छुपी। इश्क़ था कि कुछ और था यह तब न तुम्हें पता था , न मुझे। पर लोगों को बहुत कुछ पता हो गया था। 

हमारे तुम्हारे संबंध को ले कर बात तुम्हारे पति तक भी पहुंची। ऐसा तुम ने ही बताया एक बार। मुझे लगा कि अब शायद तुम मुझ से दूर हो जाओगी। दूर हो जाओगी , यह डर सताने लगा। लेकिन देखा कि अब तुम मुझे ले कर बहुत पजेसिव रहने लगी। इतना कि मैं परेशान रहने लगा। कई बार किसी ड्रोन कैमरे की तरह काम करती तुम। हमारी सारी गतिविधियां तुम्हारी जानकारी में रहतीं। जाने कितने जासूस थे तुम्हारे पास। ख़ास कर अगर शहर में किसी स्त्री से हमारी बात मुलाक़ात हो जाए तो तुम्हारी जासूसी देखते बनती थी। लगता जैसे कोई तुम्हारी द्वारिका लूट ले गई हो वह स्त्री । समझ नहीं आता कि इतनी पजेसिव क्यों थी तुम ? 

क्या था मैं तुम्हारा ? 

तुम्हारे प्यार के साम्राज्य का एक मामूली सा नागरिक ? 

तुम्हारा प्यार मुझ में पुलक भरता था। पर यह तुम्हारा साम्रज्यवादी रवैया काट खाता था। तुम्हारा ज़रूरत से ज़्यादा पजेसिव रहना मुझे बुरा लगने लगा। किसी अपहरणकर्ता जैसा व्यवहार हो गया तुम्हारा। खुल कर तो नहीं पर चुपचाप तुम्हारे हुक़्म की तामील करने से बचने लगा। नतीज़ा यह था कि आफिस में मुझे अकारण नोटिस मिलने लगी। अचानक इंक्वायरी शुरू हो गई। एक दोस्त से तुम ने कहलवाया कि कह दो मुझ से आ कर मिले। सब ठीक हो जाएगा। दोस्त ने यह सब मुझ से कहा और बताया कि , ' भाभी जी से जा कर मिल क्यों नहीं लेते ? शायद ठीक करवा दें। ' मैं ने उसे बताया कि , 'भाभी जी ही यह सब करवा रही हैं ? ' तो उस का माथा ठनका। बोला , ' क्या कह रहे हो ? ' हम ने कहा , ' ठीक कह रहा हूं। ' कह कर फ़ोन रख दिया। तुम्हें शहर में ज़्यादातर लोग तुम्हारे पति की प्रतिष्ठा और तुम्हारी सुंदरता को देखते हुए भाभी जी ही कहते थे। मैं भी तो निजी क्षणों के अलावा तुम्हें लोगों के सामने भाभी जी ही कहता था। पर कहते हैं न कि हुस्नो इश्क़ का संगम कब तक ? समझ आने लगा था कि अब हमारा सफ़र ख़त्म होने को है। इस लिए भी कि तुम भूल गई कि प्यार में ज़ुल्म और जब्र से काम नहीं चलता। तुम्हारा नहीं जानता पर मैं नया मुसाफ़िर था इस पथ का। चाहत की चोट से अब बचने की तरक़ीब तलाशने लगा। कुछ दूर साथ चल कर हम बिछड़ने के मोड़ पर खड़े हो गए थे। तुम्हारे एक वाट्सअप संदेश का जवाब भेज दिया : ' सारे भाव , सारी भावना , भंगिमा और सारी संभावना गोमती में विसर्जित कर तुम्हें मुक्त कर ख़ुद को भी मुक्त कर लिया है। बहुत जी लिया तुम्हें। ' तुम्हारा रिप्लाई आया , ' सब भूल जाओ। लव यू ! प्लीज मीट मी !'

लेकिन नहीं आया तुम से मिलने। तुम ने और भी कई लोगों से कहलाया। ख़ामोश रहा। तुम मुझे फ़ोन पर फ़ोन , वाट्सअप पर वाट्सअप संदेश भेजती रही। एक बार तो मिल लो। मेरे घर भी गई। मैं नहीं था तब घर पर। घर पहुंचने पर तुम्हारे आने कि ख़बर मिली और मिल लेने का संदेश भी। नहीं आया तुम से मिलने। कठोर हो गया था मैं। कह सकती हो निर्मोही। आख़िर मैं क्या था तुम्हारा ?  

प्रेमी ? सेक्सटीशियन ? जिगोलो ? 

तुम से , तुम्हारे प्यार से बग़ावत इतनी भारी पड़ जाएगी , नहीं जानता था। दूसरे दिन पता चला कि तुम ने अपने हाथ की नस काट ली है। अस्पताल ले जाया गया। डाक्टरों ने तुम्हें मृत घोषित कर दिया। तुम्हारे अफ़सर पति का रुआब भी कुछ काम नहीं आया। तुम ने अपनी हत्या के पहले एक नोट लिख कर बता दिया था कि मैं तुम से मिलने नहीं आया , नहीं आ रहा था इस लिए तुम दुनिया से जा रही हो।  तुम्हारे पति ने फ़ोन कर मुझे यह बताया और डपटते हुए कहा , ' इतना बिजी थे कि आए नहीं ? ' उस ने जोड़ा , ' तुम मेरी पत्नी के हत्यारे हो ! ' 

मैं घर छोड़ कर नहीं गया कहीं। पुलिस के आने की प्रतीक्षा में रहा। पुलिस नहीं आई। वाट्सअप पर तुम्हारी अंत्येष्टि के समय का संदेश आया। गया। लोग मुझे घूरते रहे। पर मैं ने इस की परवाह नहीं की। तुम्हारे पति को बाहों में भर कर तसल्ली दी। फूट-फूट कर रोया। वह भी रोया। एक दूसरे को ढाढस बंधाया। तुम्हारे पार्थिव शरीर पर फूल चढ़ा कर तुम्हें अंतिम प्रणाम किया। रखना चाहता था पुष्प से घिरे तुम्हारे कपोल पर अपना कपोल और रोना चाहता था तुम्हारे पार्थिव शरीर से लिपट कर। पर लोगों की आंखें धधक रही थीं। श्मशान घाट पर प्यार से बड़ा होता है लोकलाज। सो रुक गया। तुम्हारे चरणों पर माथा रख कर अपने आंसुओं का जल अर्पण किया। गोया सूर्य को अर्घ्य दिया हो। हां , तुम मेरे प्रेम का सूर्य ही तो थी। मुझे प्यार की चांदनी में नहलाती मेरा चंद्रमा भी थी। सहसा तुम्हारी धधकती चिता में ख़ुद को जलते पाया। तुम तो अग्नि और जल में विलीन हो गई। जल के साथ तुम्हारी अस्थियां बह गईं। किसी और जल में मिलने के लिए। क्या पता बहती - बहती सागर के जल में मिल जाओ। गंगा सागर में। जल बदलने का अभ्यास है तुम्हें। लेकिन तुम्हारे मन का यह मछुआरा अब कहां जाए। तुम्हारे प्रेम जाल से कैसे निकलूं ? कितना अभागा हूं , अपराधी हूं कि तुम्हारे प्यार , तुम्हारी चाहत की क़द्र नहीं कर पाया। ख़ुद को तुम्हें समर्पित नहीं कर पाया। तुम्हारे पति ने ठीक ही कहा कि मैं तुम्हारा हत्यारा हूं।

  [ साहित्य अकादेमी , नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित समकालीन भारतीय साहित्य के जनवरी-फ़रवरी , 2026 अंक में प्रकाशित। ]