हिंदी कथा-साहित्य का इतिहास यह प्रमाणित करता है कि प्रत्येक युग अपनी संवेदना के अनुरूप कथाकारों का चयन करता है। प्रेमचंद का समय सामाजिक अन्याय और वर्ग-संघर्ष का था, अज्ञेय और नई कहानी का दौर व्यक्ति की आंतरिक जटिलताओं और आत्मसंघर्ष का, जबकि समकालीन हिंदी कहानी का वर्तमान समय नैतिक विघटन, संबंधों की अस्थिरता और मौन में डूबे मनुष्य का समय है। वरिष्ठ कथाकार श्री दयानंद पांडेय की ये 36 कहानियां इसी समकालीन मनुष्य की कथा कहती हैं-एक ऐसे मनुष्य की, जो बोल सकता है, पर बोलना नहीं चाहता; जो जानता है, पर जताना नहीं चाहता; और जो जीता है, पर जीवन को प्रदर्शन नहीं बनने देता।
यह कहानी-संग्रह किसी वैचारिक आंदोलन का घोषणापत्र नहीं है। यह उस सूक्ष्म जीवन-दर्शन का दस्तावेज़ है, जो साधारण घटनाओं के भीतर चुपचाप आकार लेता है। इन कहानियों में न कथा-कौशल का प्रदर्शन है, न भाषा का अलंकरण-यहां संयम ही सौंदर्य है और मौन ही सब से मुखर वक्तव्य।
कहानी “लेकिन” इस संग्रह की मूल संवेदना को पहली ही बार में उद्घाटित कर देती है। पंडित जी का जीवन, उन का मौन, उन की सादगी और अंततः उन का लगभग गुमनाम अंत-यह किसी एक व्यक्ति की कथा नहीं रह जाती, बल्कि उस समाज का रूपक बन जाती है जहाँ जीवित मनुष्य उपेक्षित है और मृत व्यक्ति अचानक श्रद्धेय। पंडित जी का कथन-
समकालीन शिक्षित मध्यवर्ग की उस त्रासदी को उद्घाटित करता है, जहां जीवन छोड़ा नहीं जाता, पर जीने की आकांक्षा भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है।
वरिष्ठ पत्रकार श्री दयानंद पांडेय की कहानियों का केंद्रीय कथ्य अस्तित्वगत नैतिक संघर्ष है। यह संघर्ष किसी बाहरी सत्ता से नहीं, बल्कि स्वयं से है। उन के पात्र न तो क्रांतिकारी घोषणाएं करते हैं, न किसी बड़े निष्कर्ष तक पहुंचने की हड़बड़ी दिखाते हैं। वे जीवन को चुपचाप ढोते हैं-और यही ढोना इन कहानियों की सब से बड़ी करुणा बन जाता है।
इस संग्रह में मौन केवल एक शैलीगत उपकरण नहीं, बल्कि एक नैतिक अवधारणा के रूप में उपस्थित है। “सौ दुखों की एक दवा है-चुप रहना” जैसे वाक्य मौन को पलायन नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक हिंसा के विरुद्ध एक आत्मचयनित नैतिक प्रतिरोध के रूप में स्थापित करते हैं। यह मौन न तो मजबूरी का है, न ही दमन का-यह वह मौन है, जो बोल सकने की क्षमता के बावजूद चुना गया।
यहां मौन किसी पलायन का संकेत नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक हिंसा के विरुद्ध एक सूक्ष्म प्रतिरोध है। यह मौन महात्मा बुद्ध के करुणामूलक मौन और कबीर के आंतरिक विवेक से संवाद करता हुआ प्रतीत होता है।
अकादमिक दृष्टि से देखें तो यह मौन Subaltern Silence नहीं है, बल्कि Self-chosen Ethical Silence है-जहाँ व्यक्ति बोल सकता है, पर बोलने से इंकार करता है।
श्री पांडेय कहानियों के शीर्षकों के चयन में न सिर्फ सावधानी बरतते हैं बल्कि कथा के केंद्रीय भाव से भी न्याय करते हैं। विषय की विविधता के साथ-साथ कहन का इंद्रधनुष पाठकों के मन को आद्योपांत रंजित और विस्मित करता रहता है ।
कहानी आग आधुनिक शहरी मध्यवर्ग की सफलता–केंद्रित जीवन-दृष्टि और उस के नैतिक खोखलेपन की तीखी आलोचना प्रस्तुत करती है। नायक का पतन किसी आकस्मिक दुर्घटना का नहीं, बल्कि संबंधों की उपेक्षा और संवेदनशीलता के क्षरण का परिणाम है। लेखक ने अस्पताल, व्हाट्सऐप श्रद्धांजलि और पैकेज्ड सेवा-प्रणाली के माध्यम से मृत्यु के भी बाज़ारीकरण को रेखांकित किया है। अंत में श्मशान की आकांक्षा केवल आत्महत्या की इच्छा नहीं, बल्कि अर्थहीन, एकाकी और जली हुई चेतना का प्रतीक बन जाती है। यह कथा सफलता और मानवीय रिश्तों के बीच के भयावह अंतर्विरोध को प्रभावी ढंग से उजागर करती है।
भीड़, भक्ति और आधुनिक जीवन के अंतर्विरोधों का सूक्ष्म मानवशास्त्रीय दस्तावेज़ बन जाती है कहानी भींगना । लेखक ने सावन, वर्षा और कालभैरव के बहाने आस्था की अव्यवस्था, राजनीति की अनायास घुसपैठ और निजी संबंधों की नाज़ुकता को एक साथ पिरोया है। नन्हे बच्चे का “बम-बम भूले” पूरे कथानक में निर्मल श्रद्धा और भाषिक भोलेपन का प्रतीक बन कर उभरता है, जो शोरगुल भरी धार्मिकता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। कथा की शक्ति इस के विवरणों में नहीं, बल्कि उस अनुभूति में है जहां मनुष्य भीगता है—कभी प्रेम में, कभी भक्ति में और कभी भीड़ के भय में। यह रचना आस्था को प्रदर्शन नहीं, अनुभव के रूप में देखने का आग्रह करती है।
स्क्रिप्ट से बाहर रंगमंच, नशे और रचनात्मक स्वच्छंदता के द्वंद्व को प्रभावी ढंग से उभारती है। नायक का “स्क्रिप्ट से बाहर” जाना केवल मंचीय प्रयोग नहीं, बल्कि कलाकार के अहं, आकस्मिक प्रतिभा और नैतिक अस्पष्टता का संकेत है। कथा यह प्रश्न उठाती है कि क्या तात्कालिक स्फूर्ति और दर्शकीय तालियां कला को वैध ठहराने के लिए पर्याप्त हैं। शिमला का परिवेश और थिएटर का अनुशासन इस अराजक सृजनशीलता के विरुद्ध एक मूक प्रतिरोध बनता है। कुल मिला कर, यह रचना कला और आत्मसंयम के बीच की खतरनाक लेकिन आकर्षक रेखा को उजागर करती है।
मातृत्व, अधिकार और भावनात्मक उपेक्षा के सूक्ष्म मनोविज्ञान को अत्यंत मार्मिक ढंग से उद्घाटित करती है उपेक्षा । दादी का स्नेह और संस्कार प्रेमपूर्ण होते हुए भी, बच्चे को मां से अलग करना एक गहरी भावनात्मक हिंसा में बदल जाता है। दो वर्षीय बच्ची की चुप्पी और दूरी किसी विद्रोह से अधिक असहाय प्रतिरोध का रूप ले लेती है। कथा यह रेखांकित करती है कि रिश्तों में प्रेम के साथ संवेदनशील सीमाओं की पहचान अनिवार्य है। अंततः यह रचना मातृत्व को जैविक नहीं, बल्कि निरंतर उपस्थिति और सुरक्षा का अनुभव सिद्ध करती है।
रिश्तों के बीच संवाद की मात्रा और उस की शैली एक संक्रमण कला से गुजर रही है । संवाद रचना पिता–पुत्र संबंधों की जटिल मानसिक संरचना और संवादहीनता की त्रासदी को गहन आत्मस्वीकृति के साथ उघाड़ती है। पत्र के रूप में व्यक्त कथन सैद्धांतिक कठोरता और व्यक्तिगत सत्य के टकराव को नैतिक व भावनात्मक स्तर पर विश्लेषित करता है। लेखक की भाषा आरोप से अधिक आत्मालोचना की ओर झुकी है, जिस से पीड़ा करुणा में बदल जाती है। यह कहानी संवाद की अनुपस्थिति को ही कथा का केंद्रीय संवाद बना देती है। अंततः यह रचना संबंधों में “सही” होने से अधिक “मानवीय” होने की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
प्रेम के आत्मीय अनुभव को सत्ता, स्वामित्व और असंतुलित आसक्ति त्रासदी में रूपांतरित कर सकती है। मछली–जल–जाल का रूपक प्रेम में भ्रम, निर्भरता और नियंत्रण की जटिल मनोविज्ञान को गहराई से उद्घाटित करती है कथा हत्यारा । स्त्री यहां केवल प्रेमिका नहीं, बल्कि शक्ति-संपन्न, नियंत्रक और अंततः आत्म-विनाश की ओर बढ़ती चेतना बन जाती है, जब कि पुरुष अपराध-बोध और असहायता में घिरा हुआ है। भाषा काव्यात्मक, आत्मालापी और प्रतीक-प्रधान है, जो पाठक को नैतिक निर्णय के बजाय करुण विवेक की अवस्था में छोड़ देती है। यह कहानी प्रेम की सुंदरता से अधिक, प्रेम के अतिरेक और स्वामित्व-बोध के विनाशकारी परिणामों की मार्मिक आलोचना है।
भावनाओं के प्रदीर्घ विस्तार ने कुछ कथाओं को लंबी कथा बना दिया है लेकिन ये बोझिल नहीं हैं । तुम्हारे बिना विरह को स्मृति, देह और प्रकृति के रूपकों में घोल कर प्रस्तुत करती है, जहां प्रेम एक सतत अनुभूति बन जाता है, घटना नहीं। भाषा की अतिशय इंद्रियात्मकता पाठक को भावनात्मक रूप से बांधती है, किंतु कहीं-कहीं यही विस्तार आत्मसंयम की कमी भी उजागर करता है। कथा का बल प्रेम की अविनाशी अवधारणा पर है, पर विवाहेतर प्रेम की नैतिक जटिलताओं से वह टकराने के बजाय उन्हें भावुकता में ढक देती है। स्मृति यहां आश्रय भी है और दंड भी जो पात्र को जीवित भी रखती है और लगातार जलाती भी है। कुल मिला कर, यह रचना प्रेम को अमर सिद्ध करती है, पर पीड़ा की जिम्मेदारी अकेले स्मृति पर छोड़ देती है।
कहानी प्रतिनायक मैं एकतरफा संवाद और दबी हुई स्मृतियों के माध्यम से अपूर्ण प्रेम की त्रासदी को उघाड़ती है। नायक की वाचालता के बरक्स नायिका की चुप्पी एक नैतिक और सामाजिक सीमा का प्रतीक बन जाती है, जिसे वह लांघ नहीं पाती। भाषा में आत्मसंघर्ष, आरोप और आत्मकरुणा का घनत्व है, जो भावनात्मक तीव्रता तो रचता है पर संतुलन को चुनौती भी देता है। कथा का केंद्रीय द्वंद्व प्रेम नहीं, बल्कि कह न पाने और सुन न सकने की विफलता है। अंततः यह रचना स्मृति को संबंध का विकल्प बना कर छोड़ देती है, जहाँ प्रेम जीवित है, पर संवाद मृत।
कथावाचक की स्मृतियाँ करुण हैं, पर वे धीरे-धीरे आसक्ति और आत्मपीड़न का रूप भी ले लेती हैं। प्रेम यहाँ संवाद न बन कर निगरानी, कल्पना और अनुमान में बदल जाता है, जिस से नैतिक असहजता पैदा होती है। भाषा भावप्रवण और संस्मरणात्मक है, किंतु विस्तार कई बार संयम तोड़ देता है। अंततः यह रचना प्रेम से अधिक अपूर्णता और मनोवैज्ञानिक जकड़न की कथा बन जाती है। एकतरफा प्रेम, प्रतीक्षा और न कहे जा सके भावों की लंबी मनोयात्रा का दस्तावेज़ है सुंदर भ्रम ।
ख़ामोशी कहानी वामपंथी आदर्शों के क्रमिक नैतिक पतन और अवसरवादी रूपांतरण की तीखी, निर्मम पड़ताल है। कामरेड मनमोहन का चरित्र विचारधारा, सत्ता, भ्रष्टाचार और देह-राजनीति के गठजोड़ का प्रतीक बन जाता है, जहां ‘जनपक्षधरता’ केवल उपयोगी मुखौटा रह जाती है। लेखक ने व्यंग्य, विवरण और यथार्थ की अतिरेकपूर्ण परतों के माध्यम से यह दिखाया है कि संस्था-विरोधी राजनीति कैसे स्वयं एक सत्ता-संरचना में बदल जाती है। भाषा जानबूझ कर असंयत और विस्तारप्रिय है, जिससे कथा का नैतिक क्षरण पाठक को असहज करता है। अंततः यह रचना किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि आधुनिक राजनीतिक-सांस्कृतिक पाखंड की सामूहिक जीवनी बन जाती है।
शिकस्त की बारी ख़ामोशी के बाद आती है जो सत्ता, पूंजी और देह के गठजोड़ में फंसे आधुनिक राजनीति-पुरुष की नैतिक रिक्तता और आत्म-विसर्जन की तीखी पड़ताल करती है। मंत्री का पतन किसी आदर्श से नहीं, बल्कि सत्ता से बाहर होते ही उपयोगी औज़ार में बदल जाने की त्रासदी से घटित होता है। स्त्री-देह, कारपोरेट सौदे और राजनीतिक पद यहां मानवीय संबंध नहीं, बल्कि विनिमय की वस्तुएं बन जाते हैं। भाषा जानबूझ कर असंयत, क्रूर और नग्न है, जो पाठक को झकझोरती है और किसी नैतिक दिलासे की गुंजाइश नहीं छोड़ती। अंततः यह कथा व्यक्ति की नहीं, बल्कि लोकतंत्र के भीतर पनप चुके दलाली-तंत्र और ‘व्हाइट हाउस’ के ब्लैक हो जाने की गहरी आलोचना है।
सुंदर लड़कियों वाला शहर स्मृति, शहर और पुरुष दृष्टि के टकराव की जटिल पड़ताल करती है। शरद का नॉस्टैल्जिया और प्रमोद की भोगवादी दृष्टि एक-दूसरे के बरक्स रख कर लेखक ने संवेदनशील स्मृति बनाम उपभोगात्मक नजर का तीखा द्वंद्व रचा है। शहर यहां केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि स्मृतियों, मूल्यों और नैतिक बोध का विस्तार है, जिसे प्रमोद की दृष्टि बार-बार वस्तु में बदलना चाहती है। संवादों में यथार्थ की कड़वाहट और व्यंग्य है, पर कहीं-कहीं स्त्री को देखने का पुरुष-केंद्रित आग्रह असहज भी करता है। अंततः यह रचना बताती है कि शहर बदलते हैं, पर स्मृति का शहर और दृष्टि का शहर कभी एक नहीं होते।
लेखक प्रेम को अनुभवात्मक सत्य के रूप में देखता है, पर कथा धीरे-धीरे कामना, अकेलेपन और आत्ममोह की गुत्थी में बदल जाती है। इंटरनेट यहां संबंधों को जोड़ने का नहीं, बल्कि भ्रम और शोषण का माध्यम बन कर उभरता है। रशियन स्त्री का प्रसंग प्रेम की आशा जगाता है, पर अंत उसे गहरी विडंबना में बदल देता है। बर्फ़ में फंसी मछली प्रेम की बहुलता, आधुनिक तकनीक और भावनात्मक छलावे के बीच फंसे व्यक्ति की त्रासदी को उघाड़ती है। कुल मिला कर यह रचना प्रेम नहीं, बल्कि अधूरी तृप्ति और आधुनिक मनुष्य की भावनात्मक असहायता की कहानी है।
ग्रामीण सामंती मानसिकता, पुरुष-अहं और वंश-केंद्रित सोच की गहरी आलोचना कुछ कहानियों के केंद्र में है। घोड़े वाले बाऊ साहब में बाऊ साहब का चरित्र शान, आन और नियंत्रण की लालसा का प्रतीक बन जाता है, जो बदलते समय के साथ हास्यास्पद और करुण दोनों हो उठता है। स्त्रियां यहां त्याग, शोषण और चुप्पी की वाहक हैं, जिन की एजेंसी अंततः छल और विवशता में बदल जाती है। कथा में यौन नैतिकता, धर्म, संतान और पितृसत्ता का घालमेल तीखे व्यंग्य के रूप में उभरता है। अंततः बैलगाड़ी की ‘लगाम’ केवल सवारी की नहीं, बल्कि खोते हुए वर्चस्व को बचाने की अंतिम भ्रमात्मक कोशिश का प्रतीक बन जाती है।
सोशल मीडिया जैसे फ़ेसबुक आदि केवल तकनीकी मंच नहीं, बल्कि आधुनिक मनुष्य के अकेलेपन, आत्म-प्रदर्शन और मानसिक द्वंद्व के प्रतीक हैं । राम सिंगार भाई का चरित्र नैतिक विवेक और डिजिटल आकर्षण के बीच झूलते मध्यवर्गीय मन की सटीक तस्वीर है। लेखक ने सोशल मीडिया की सतही लोकप्रियता, कामुकता और आत्ममुग्धता के बरक्स जन-सरोकार और मानवीय संबंधों की उपेक्षा को तीखे व्यंग्य में उघाड़ा है। अंततः फ़ेसबुक में फंसे चेहरे प्रश्न छोड़ती है कि समस्या फ़ेसबुक की नहीं, बल्कि उसे देखने और जीने वाले समाज की मानसिक संरचना की है।
मेड़ की दूब सूखे के बहाने ग्रामीण जीवन के सामाजिक, आर्थिक और नैतिक संकट का गहन यथार्थपरक चित्र प्रस्तुत करती है। प्रकृति की क्रूरता, प्रशासनिक उदासीनता और सरकारी भाषणों की खोखलाहट एक साथ मिल कर गांव को “जीता-जागता नरक” बना देती है। भाषा लोकजीवन से उठी हुई, संवेदनशील और दृश्यात्मक है, जो पीड़ा को अनुभूति में बदल देती है। बैरागी का कथन—“हम तो मेड़ की दूब हैं”—कथा को निराशा से ऊपर उठा कर संघर्षशील मानवीय जिजीविषा में रूपांतरित करता है। अंततः यह रचना पलायन और जड़ों से जुड़े रहने के द्वंद्व को अत्यंत मार्मिक ढंग से छोड़ देती है।
स्त्री मनोविज्ञान ,देह रचनाशास्त्र और सौंदर्य प्रेम विज्ञान के वर्णन में श्री दयानंद का कोई सानी नहीं है । विपश्यना में प्रेम जिन लोगों ने पढ़ी है ,वो इस से भली भांति परिचित होंगे ।
सत्ता, देह और कला के त्रिकोण में फंसी स्त्री-अस्मिता की एक अत्यंत तीव्र, असहज और विघटनकारी कथा है देह-दंश । देह-संगीत और राजनीति के टकराव के रूपक के माध्यम से लेखक ने दिखाया है कि कैसे सत्ता स्त्री की देह को साधन, प्रतीक और उपभोग की वस्तु में बदल देती है। भाषा बिंबात्मक, उन्मादी और कभी-कभी जानबूझ कर अतिवादी है, जो पाठक को नैतिक आराम से बाहर खींच लाती है। कथा में पुरुष-सत्ता का नग्न, हिंसक और अवसरवादी चेहरा बिना किसी शालीन आवरण के प्रकट होता है। अंततः यह कहानी प्रेम या वासना की नहीं, बल्कि कला की पराजय, देह के अपमान और सत्ता की अमानवीय संरचना की करुण गवाही बन जाती है।
इन कहानियों की सब से बड़ी विशेषता उन की उभयनिष्ठता है। यहां नायक पूर्ण निर्दोष नहीं, न खलनायक पूर्ण दानव। निर्णय पाठक पर छोड़े गए हैं। कई कहानियां अधूरी-सी समाप्त होती हैं-जैसे जीवन स्वयं अधूरा रहता है। यह अधूरापन कोई शिल्पगत कमी नहीं, बल्कि लेखक की जीवन-दृष्टि का अनिवार्य हिस्सा है। भाषा अत्यंत संयत, लगभग न्यूनतम है -
दयानंद पांडेय की भाषा Minimalist Aesthetics का उदाहरण है। यहां भाषा न तो दृश्य रचने में व्यस्त है, न भावनात्मक उछाल में। वह लगभग निर्लिप्त हो कर भाव को वहन करती है।
इस संग्रह की कहानियां किसी पारंपरिक कथा-वक्र (Plot Curve) का पालन नहीं करतीं। इन में आरंभ, उत्कर्ष और समाधान की अपेक्षा अनुभव का क्रम अधिक महत्वपूर्ण है। उदहरणार्थ कहानी लेकिन में पंडित जी की मृत्यु कोई सनसनी नहीं रचती, कोई नाटकीय क्लाइमैक्स नहीं लाती। वह ठीक वैसे आती है जैसे जीवन में मृत्यु आती है-अचानक नहीं, बल्कि लंबे समय से तैयार होती हुई।
इन 36 कहानियों का संयुक्त प्रभाव यह है कि पाठक स्वयं को किसी एक कथा में नहीं, बल्कि अनेक कथाओं के छोटे-छोटे टुकड़ों में पहचानता है-कहीं वह पिता है, कहीं पुत्र; कहीं स्त्री है, कहीं समाज; कहीं दोषी है, कहीं पीड़ित।
अंततः, दयानंद पांडेय की ये कहानियां आधुनिक भारतीय समाज की एक ऐसी नैतिक आत्मकथा बन जाती हैं, जिस में नायक कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि हम सब हैं-अपने मौन, अपनी विफलताओं, अपनी छोटी-छोटी नैतिक जीतों और बड़ी-बड़ी चुप्पियों के साथ।दयानंद पांडेय की ये कहानियाँ तेज़ समय में लिखी गई धीमी, गंभीर और आत्मालोचनात्मक कहानियां हैं। ये पाठक से धैर्य, संवेदनशीलता और आत्मनिरीक्षण की अपेक्षा करती हैं। अकादमिक दृष्टि से यह संग्रह-नैतिक दर्शन ,अस्तित्ववाद ,सामाजिक मनोविज्ञान और समकालीन मध्यवर्गीय अध्ययन के लिए एक महत्वपूर्ण पाठ बन सकता है। यह पुस्तक पढ़ने के बाद पाठक को उत्तर नहीं मिलते—प्रश्न मिलते हैं। और गंभीर साहित्य का यही सब से बड़ा गुण है।
[ डायमंड बुक्स द्वारा प्रकाशित 36 कहानियां की भूमिका ]
![]() |
36 कहानियां दिल्ली लेखक : दयानंद पांडेय पृष्ठ : 448 मूल्य : 450 रुपए प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रा लि X - 30 ओखला इंडस्ट्रियल एरिया , फेस - 2 नई दिल्ली - 110020 |
1
लेकिन
सोसाइटी भी नई थी। मंदिर भी नया-नया था। सो पंडित जी भी नए-नए ही थे। वृद्ध थे। पर पूजा-पाठ में कुशल थे। आचार्य की परंपरा से समृद्ध ब्रह्म मुहूर्त में उठ जाते थे। वह कब नहाते , कब खाते थे , कोई नहीं जानता था। कोई देख भी नहीं पाता था। देख पाता था तो सिर्फ़ उन्हें पूजा-पाठ करते हुए। स्त्रियों और बच्चों में बहुत ही लोकप्रिय थे। पूजा-पाठ बहुत करते थे पर पाखंडी नहीं थे। बिलकुल नहीं थे। कोई छुआछूत , कोई भेदभाव उन्हें छू भी नहीं पाता था। अमूमन एक ही धोती पहने और वही धोती ओढ़े हुए वह , पूरे माथे पर चंदन लगाए हुए सारी गर्मी-बरसात गुज़ार देते थे। अमूमन दशहरा बाद वह सिली हुई बंडी पहनने लगते। दीपावली आते-आते कुरता पहन लेते। दीपावली बीतते-बीतते वह कुरते पर कुरता पहन लेते। यानी दो-दो कुरता पहन लेते। कई बार चार कुरता पहन लेते। कुरते के ऊपर कुरता दिखता रहता। नरम सर्दी आते ही वह सदरी भी पहन लेते। कहना न होगा कि उन के यह सारे वस्त्र ख़रीदे हुए नहीं , दान-दक्षिणा वाले ही होते थे।
अनमोल अभाव में भी चंदन के लेप से लिपटा हुआ मस्तक गर्व से उठा
रहता था। गर्वीली ग़रीबी की चमक में स्वाभिमान जैसे सूर्य की तरह सर्वदा उदय रहता।
मंदिर में जो भी नक़द चढ़ावा आता , अगर मूर्तियों या
शिवलिंग पर चढ़ा होता तो वह उन को बिलकुल नहीं छूते थे। सब कुछ बटोर कर मंदिर कमेटी
को सौंप देते थे। ताकि मंदिर खर्च चलता रहे। हां , कुछ
लोग उन के चरण स्पर्श कर , कुछ मुद्रा उन के चरण
में रख देते , हाथ में रख देते , उस धनराशि को वह अपने निजी खर्च में उपयोग कर लेते। और कि इस
का भी एक-एक पैसे का हिसाब लिखित में मंदिर कमेटी को दे देते। ताकि कभी कोई उन पर
किसी किस्म का आरोप या विवाद न खड़ा कर सके। थोड़ा बहुत कपड़ा-लत्ता उपहार में ही मिल
ही जाता था। उस में से भी वह ज़्यादातर ग़रीबों में बांट देते थे। मसलन सिक्योरिटी
गार्ड , सफाईकर्मी के बीच। भोजन भी कभी कोई दे
जाता , कभी कोई। चढ़ावे का फल भी कई बार काम आ
जाता। कभी-कभार भोजन न मिलने पर उपवास भी हो जाता। लेकिन कभी किसी से कुछ नहीं
कहते थे। मौन उन का सब से बड़ा हथियार था। निजी खर्च भी उन का कुछ और नहीं , दवा का ही था। शूगर की दवा का। इंसुलिन का खर्च ज़्यादा हो जाता
था। सोसाइटी के बाज़ार में एक दवा दुकानदार के यहां उन का खाता चलता था। जो भी पैसा
उन्हें निजी तौर पर मिलता , दवा दुकानदार के पास
जमा कर देते। कुछ पैसे पास में रख लेते। चना ,
गुड़
और नमक भी ख़रीदते। सुबह भीगा चना वह नाश्ते के तौर पर अनिवार्य रूप से लेते। नमक
मिला लेते। नींबू भी। कभी-कभार चढ़ावे का फल भी मिला लेते। छुरी से काट कर। दवा
दुकानदार का कभी बकाया होता भी तो वह टोकता नहीं। चुप-चुप ही पंडित जी उसे भान करा
देते कि घबराओ नहीं , पैसा मिलते ही दे
दूंगा। दुकानदार भी हंसने लगता। कहता , ' देखो पंडित जी , मैं भी जैन हूं। जानता हूं , यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि आदि। तुम्हारे गोस्वामी का लिखा भी थोड़ा - बहुत पढ़ा है।
जप तप नियम योग निज धर्मा। जानता हूं , हमारा पैसा ले कर
कहीं भागोगे नहीं। ' पंडित जी , मुस्कुरा कर चल देते। दवा दुकानदार जैन जब कभी फुरसत में होता
तो पंडित जी को बहुत घेरता। कहता , ' पंडित जी सब का भूत -
भविष्य बताते फिरते हो। कभी अपना भी भूत - वर्तमान बता दो। '
लेकिन फिर वही मौन।
पंडित जी के पास मंदिर में फ्रिज तो था नहीं। सो वह अपना
इंसुलिन भी दवा दुकानदार के फ्रिज में ही रखते। समयानुसार जा कर इंसुलिन ले लेते।
सुबह चना बिना इंसुलिन के लेते। लाचारी थी। कई बार पूजा - अनुष्ठान में फंसे रहते
शाम को तो दुकान बंद करने के पहले दवा दुकानदार इंसुलिन लिए कभी खुद आ जाता , कभी दुकान पर काम करने वाले सहयोगी को भेज देता। कभी - कभार
भूल भी जाता। कभी खांसी , जुकाम , बुख़ार , पेचिश आदि भी होता तो
दवा दुकानदार इस की भी दवा तजवीज कर देता। एकाध बार पंडित जी दवा उलट-पुलट कर
देखते और लेने से मना कर देते। दवा दुकानदार टोकता कि बात क्या है ? हर बार पंडित जी मौन रह जाते। चुपचाप चले जाते। पर एक बार
अचानक उन के मुंह से निकल गया , ' जो फार्मूला चाहिए , इस दवा में नहीं है। ' यह सुन कर दुकानदार
अवाक रह गया। वह आगे कुछ और पूछे - पूछे पंडित जी वहां से जा चुके थे।
दुकानदार हतप्रभ था। अभी तक वह समझता था कि पंडित जी बस
संस्कृत वाले हैं। पोथी - पुराण , पंचांग बांचने वाले।
पर वह देख रहा था कि पंडित जी न सिर्फ़ अंगरेजी , दवा
का फार्मूला भी समझ रहे हैं।
वह मन ही मन बुदबुदाया ,
यह
कैसा हुस्न है यह कैसा इश्क है भला !
अभी तक यह दवा दुकानदार पंडित जी को एक मामूली दरिद्र पंडित
मानता था। बुझी हुई राख मानता था। जो पूजा - पाठ कर पेट पाल रहा है। अब उसे लगने
लगा कि इस बुझी राख में आग भी है। दहकती हुई आग। पर पंडित जी के मौन अस्त्र के आगे
वह लाचार था और लचर भी। बहुत दिनों तक अपनी जिज्ञासा अपने मन की राख में छुपाए
रखा। यह सोच कर कभी अवसर आने पर , कभी लोहा गर्म होने
पर उसे पिघला कर पूछेगा कि पंडित जी , किस खान का इस्पात हो
तुम !
पर अरसा गुज़र गया , ऐसा अवसर कभी पंडित
जी ने दिया ही नहीं। पंडित जी उसे बस दवा दुकानदार तक ही बरतते रहे। दोस्त नहीं
समझा कभी। हमदर्द नहीं समझा कभी। शायद पूरी सोसाइटी में , इस पचास एकड़ की सोसाइटी में एक भी हमदर्द नहीं था उन का। न ही
कोई दोस्त।
स्त्रियों में पंडित जी बहुत लोकप्रिय थे। लेकिन भर आंख कभी
किसी स्त्री की तरफ नहीं देखते कभी। नज़र नीची ही रहती। संबोधन भी बस बेटी , बिटिया , बच्ची , बहन जी तक ही का था। कई बार कीर्तन गाने कुछ स्त्रियां आतीं
मंदिर में तो वह कोशिश करते कि मंदिर के बाहर जा कर बैठ जाएं। कई बार पूजन , आरती की बात होती तो स्त्रियों के अनुरोध पर आंख नीची किए बैठ
जाते। स्त्रियां ढोल आदि बजा कर कीर्तन या भजन गातीं तो पंडित जी झाल बजा कर उन का
साथ दे देते। भक्ति भाव में नत। कुछ स्त्रियां कभी कभार उन के लिए सुस्वाद भोजन भी
ले आतीं। कभी घर पर भी भोजन पर बुला लेतीं। घर जाने के लिए वह सकुचा जाते। पर
स्त्रियां उन्हें आ कर लिवा ले जातीं। भोजन भी उन का कम ही था। दो रोटी , दाल और सादी सब्जी वाला। पूड़ी , पकौड़ी
से वह भरसक बचते। पर शुभ के नाम पर पूड़ी , खीर ही का चलन था।
सोसाइटी के कुछ पुरुष पंडित जी को बहुत उपेक्षित ढंग से देखते।
कुछ तो पाखंडी कहते। खुलेआम कहते। लेकिन वह किसी की किसी बात का कभी बुरा नहीं
मानते। न प्रतिवाद करते। ऐसे जैसे पत्थर हों। ख़ूब पानी बरसा हो और बह गया हो। ख़ूब
धूप चढ़ी हो और उतर गई हो। ख़ूब आग लगी हो और बुझ गई हो। ऐसा पत्थर आदमी कम ही दीखता
है। पर पंडित जी पत्थर थे लेकिन हंसते हुए पत्थर। शीत , घाम , बारिश हर स्थिति में
मंद - मंद मुस्कुराते। अधरों - अधरों में मुस्कुराते। गोया गीत गाया पत्थरों ने।
पंडित जी कोई कथा , कोई प्रसंग भी कभी
सुनाते तो बहुत ही निरापद ढंग से। कोई लिप्सा नहीं। कोई मोह नहीं। माया नहीं। बस
रस भर कर मुदित हो कर सुनाते। जब वह शंख बजाते तब लोग उन की उम्र देखते और उन की
क्षमता को निहारते। एक चड्ढा साहब तो पेट पर हाथ फेरते हुए बोलते , ' बुड्ढे में दम बहुत है। सांस बहुत है। '
अकसर स्त्रियां , व्रत , त्यौहार आदि के बारे में पूछती रहतीं। वह हर किसी को बार - बार
पंचांग देख कर बताते-बताते थक जाते। इस का उपाय उन्हों ने एक बड़ा सा गत्ता ले कर , उस पर सफ़ेद कागज चिपका कर ,
स्केच
पेन से हर महीने का व्रत , त्यौहार लिख कर एक
दीवार पर टांग देने में ढूंढा । कुछ स्त्रियां अपने बच्चों के भविष्य , उन की पढ़ाई - लिखाई के बारे में जिज्ञासु रहतीं। कुछ अपने पति
की शराब छुड़ाने के उपाय पूछतीं। कुछ स्त्रियां पति के दूसरी औरतों से छुटकारे के
उपाय , पूजा - पाठ पूछतीं। पंडित जी साफ़ बता
देते पूजा -पाठ से शक्ति मिलती है , संबल मिलता है। सहारा
मिलता है। पर यह कोई दवा नहीं है कि चार दिन दवा खा कर बीमारी ठीक हो जाएगी। वह
बताते बच्चों को उन की दिलचस्पी का विषय दीजिए। उन के साथ मेहनत कीजिए। जैसे कोई
कुम्हार मिट्टी से सुराही , घड़ा , दिया , कुल्हड़ आदि बनाता है।
देखता है किस मिट्टी से क्या बन सकता है। कितना बन सकता है। वैसे ही मां भी अपने
बच्चों का कुम्हार होती है। जैसा चाहती है मां , बच्चा
वैसा ही बनता है। वह बताते कि मिट्टी तैयार करने में भी बहुत समय लगता है कुम्हार
को। चाक भी बहुत सावधानी से चलाना होता है। ध्यान भी बनाए रखना होता है। नहीं
सुराही , घड़ा और घड़ा को सुराही बनते देर नहीं
लगती। कई बार मिट्टी ख़राब हो जाती है कुछ नहीं बन पाता। इस लिए बच्चों के साथ
पर्याप्त समय बिताना ज़रूरी है। उन के दोस्तों और व्यवहार पर नियंत्रण ज़रूरी है।
डिसिप्लिन ज़रूरी है। सख़्ती और प्यार दोनों ज़रूरी है। दोनों का संतुलन और सम्मिश्रण
ज़रूरी है।
शराबी पतियों का शराब छुड़ाने के लिए या दूसरी स्त्रियों का साथ
छुड़ाने के लिए भी वह कहते कि अपने व्यवहार को चेक कीजिए। व्यवहार ठीक रहेगा , घर का माहौल ठीक रहेगा तो सब ठीक रहेगा। पति को पर्याप्त समय
और सम्मान दीजिए। सब ठीक होगा। स्थिति फिर भी नहीं सुधरती तो किसी साइकेट्रिक से
संपर्क कीजिए। भगवद भजन भी कीजिए। पंडित जी हर बात को वैज्ञानिकता की कसौटी पर कसे
जाने की बात करते। कहते धर्म , पूजा , पाठ , आस्था का विषय है।
श्रद्धा का विषय है। मन की शांति का विषय है। मुद्रा विनिमय का नहीं। व्यापार नहीं
है धर्म और पूजा - पाठ। कि इतना रुपया दिया तो यह सामान लिया।
यह सारी बात वह प्रवचन रूप में नहीं , टुकड़े - टुकड़े में बताते। ऐसे जैसे कोई मां एक-एक निवाला कर के
बच्चे को खाना खिलाए। यह निवाला मामा का , यह निवाला नानी का।
कुछ स्त्रियां पंडित जी की बात समझ लेतीं। कुछ बिदक जातीं। वह कई बार बातों को
किसी कथा में गूंथ कर बताते। उदाहरण दे कर बताते। तुलसीदास की चौपाइयां इस में उन
का बहुत साथ देतीं। कभी - कभी कबीर को भी आजमा लेते। रामकथा , महाभारत कथा या अन्य पौराणिक कथाएं लोगों को बहुत सुनाते।
विपदा में घिरे लोगों को। साहस बंधाते। सुंदर कांड का पाठ , हनुमान चालीसा का पाठ ,
हवन
, व्रत आदि पारंपरिक बातों की सलाह भी
देते।
सोसाइटी में लोगों के आपसी झगड़े भी बहुत थे। पार्किंग का।
कुत्तों का। कूड़े का। एक झगड़ा मेनटेनेंस का भी। किसी के घर से देर रात बजते तेज़
संगीत का। और सब से ज़्यादा झगड़ा ईगो का। पड़ोसी का झगड़ा। घर में सास , बहु , ननद। ऐसे किसी झगड़े
का कोई प्रतिकार पंडित जी के पास नहीं था। ऐसे मसलों पर उन का अचूक अस्त्र मौन ही
होता। कोई बच्चा तो पूछने आ जाता कि स्विमिंग पुल कब से शुरू होगा ? वह हंस कर रह जाते। थोड़ा रुकते और कहते , ' कल आना। मेनटेनेंस वालों से पूछ कर बता दूंगा। '
वैसे भी उन का नित्यकर्म ,
नहाना-धोना
सब मेनटेनेंस आफिस में ही होता।
कई बार वह कुछ दुःखी स्त्रियों का दुःख नहीं देख पाते। कुछ
स्त्रियों की पीर होती ही पर्वत सी थी। वह उन की बातें सुन कर ख़ुद ही रोने लगते।
भरभर रोने लगते। झूठ ही पंचांग इधर - उधर पलटने लगते। कोई उपाय नहीं दीखता। वह चुप
हो जाते। सुंदर कांड और हनुमान चालीसा का पाठ बताते हुए कहते देखता हूं और क्या
उपाय मिलता है। सूर्य को जल , तुलसी को जल , दीप जैसे उपाय भी अब वह बताने लग गए थे। अंगूठी और पत्थर की
तजवीज भी उन के पास आ गई थी। साथ ही गीता का कर्म वाला ज्ञान भी दे देते। बता देते
बिना कर्म के कुछ नहीं। कर्म है तो भाग्य है। मुफ्त में कोई भाग्य नहीं।
एक दिन एक स्त्री बहुत रोने लगी। कहने लगी , ' मेरी पेंशन से ही घर चलता है। पति तो निकम्मा , शराबी था ही , बेटा भी शराबी और
निकम्मा हो गया। बहू के चाल चलन ठीक नहीं। कभी पति मुझे पीट देता है , कभी बेटा , कभी बहू। मेरे तो
भाग्य ही फूट गए हैं। क्या करुं ! '
' भाग्य तो मेरे भी फूट
गए हैं बहन ! ' पंडित जी भर्राई आवाज़ में बोल पड़े , ' मैं कहां जाऊं , क्या करूं ? ' कहते हुए अचानक वह संभल गए और चुप हो गए।
स्त्री कुछ समझ नहीं पाई। न पंडित जी की बात। न उन का दुःख। न
उन की संवेदना। अपने ही दुःख से दबी हुई बोली ,
' क्या
करूं ? ' वह जैसे गिड़गिड़ाई , ' कोई उपाय बता दीजिए। '
' एक ही उपाय है। '
' क्या ? '
' कुछ नहीं। बस चुप
रहना सीख लीजिए बहन। सौ दुखों की एक दवा है ,
चुप
रहना। चुप रहने से बहुत से दुःख , बहुत से कष्ट पानी की
तरह बह जाते हैं। बात बनती नहीं तो बिगड़ती भी नहीं। कई बार बात बन भी जाती है। '
वह स्त्री चली गई।
हफ़्ते भर बाद वह स्त्री आई। थोड़ी - थोड़ी ख़ुश -ख़ुश। बोली , ' पंडित जी , आप की चुप रहने वाली
बात जम गई है। इस हफ्ते किसी ने मुझ पर हाथ नहीं उठाया। ' पंडित जी मंद - मंद मुस्कुरा कर रह गए। चढ़ावे में आए दो सेव उस
स्त्री के हाथ में देते हुए बोले , ' कल्याण हो ! ' वह ज़रा रुके और बोले ,
' मौन
रहना साधना है। कठिन काम है। पर परिवार और समाज में इज्ज़त से रहना है तो यह साधना
जारी रखिए बहन। '
स्त्री पंडित जी के चरण-स्पर्श कर के चली गई।
पंडित जी ख़ुद पहले बहुत बोलते थे। पर ज़िंदगी के इम्तहान में कई
बार मुंह की खाने के बाद जान पाए कि चुप रहना भी एक कला है। मौन रहना भी एक साधना
है। मौन से बहुत शांति मिलती है। बहुत बोलने का मन करता है तो रामायण का पाठ करने
लगते हैं। और शांति मिलती है। सुंदर कांड के पाठ से निर्मल शांति।
एक दिन दोपहर अचानक दवा दुकानदार जैन मंदिर आ गए। पंडित जी
अकेले ही थे। कोई भक्त , कोई जजमान नहीं था।
यह देख कर जैन और ख़ुश हो गए। चहकते हुए बोले ,
' पंडित
यही सही समय है बतियाने का। दुकान पर भी कोई कस्टमर नहीं है और यहां मंदिर में भी
नहीं। '
' मंदिर पर लेकिन
कस्टमर नहीं श्रद्धालु आते हैं। भक्त और जजमान आते हैं। ' पंडित जी कुछ बिदक कर , कुछ हंस कर बोले।
' हां - हां यही बात। ' जैन ने कहा कि दवा लेकिन दोनों ही जगह मिलती है। '
' लेकिन यहां दवा नहीं
मिलती। '
' शांति मिलती है। ' जैन अपनी जुबान को लगाम लगाते हुए धीरे से बोले।
' कोई बात नहीं जैन
साहब। पहले बैठिए। और बताइए कैसे आना हुआ। '
' कोई काम नहीं। बस
टाइमपास के लिए आ गया। '
' अच्छी बात है। ' पंडित जी बोले , ' जल लेंगे ? '
' नहीं - नहीं। '
' तो बैठिए ! ' चटाई पर जगह बनाते हुए पंडित जी बोले।
' और बताइए ! '
' मेरा ख़याल है अभी कुछ
पैसा आप के पास अतिरिक्त बचा हुआ है। कुछ उधारी नहीं है , हमारी तरफ से। '
' क्यों शर्मिंदा करते
हो पंडित जी ! ' जैन
साहब थोड़ा झिझकते हुए बोले , ' कभी आज तक इस बारे
में कोई बात की ? कोई तकादा किया ?'
' कभी नहीं। ' पंडित जी बोले , ' पर इस तरह कभी आए नहीं तो थोड़ा डर लगा। '
' कुछ नहीं पंडित जी।
बस दिल की कुछ बात थी। परिवार में कुछ मुश्किलें थीं। उन्हें सुलझाने में कुछ सलाह
लेने के लिए चला आया। '
' अच्छा - अच्छा !' पंडित जी बोले , ' बेफिक्र हो कर बताइए।
कोशिश करुंगा कि बात बन जाए। '
' मिसेज और मां में
मामला बहुत बिगड़ गया है। दोनों में बातचीत बंद है। फ़ुटबाल बन कर रह गया हूं। बीवी
समझती है , मां के पल्लू में बंधा हूं। मां समझती
है , बीवी के पल्लू में बंधा हूं। दिन भर
दुकान पर रहता हूं। खटता हूं। रात घर पहुंचता हूं तो यह नरक। '
' तो मैं इस में क्या
कर सकता हूं ?'
' कुछ पोथी - पत्रा देख
कर कोई उपाय बता दो पंडित जी ! ' जैन बोले , ' छुट्टी मिले इस नरक से। '
' जैन साहब आप मेरे
दोस्त हैं। हमदर्द भी। दुःख-सुख के साथी हैं। आप से झूठ नहीं बोलूंगा। ' पंडित जी ज़रा रुके और बोले , ' मेरे पास इस बात का कोई समाधान नहीं है। '
' कुछ करो पंडित जी ! ' जैन बेकरार हुए।
' जैन साहब ! मैं न
ज्योतिषी हूं , न तांत्रिक। बहुत मामूली सा पंडित हूं।
साधारण सा आदमी हूं। क्या बताऊं आप को ? '
' कुछ भी ! '
' गृहस्ती भी नहीं आती।
' पंडित जी
बोले , ' बस दोस्ती के नाम पर एक सलाह दिए देता
हूं। वह यह कि एक काम कीजिए कि इस मामले को भूल जाइए। भूल जाइए कि मिसेज और मां
में कुछ चल भी रहा है। न्यूट्रल हो जाइए। कोई कुछ कहे कान मत दीजिए। दोनों आपस में
ख़ुद सुलट लेंगी। स्त्रियां बहुत समझदार होती हैं। आप का इस में कोई रोल नहीं है।
समझिए कि इस ड्रामे में शेक्सपियर ने आप के लिए कोई सीन , कोई डायलॉग लिखा ही नहीं है। बस बात ख़त्म। ' पंडित जी ने अपना आजमाया नुस्खा बताया , ' मौन धारण कीजिए। सौ सवालों का एक जवाब है मौन ! '
' मौन रहने से बात बन
जाएगी ?' जैन ने आशंका जताई।
' आप हैं तो जैन ही न !
'
' समझ गया प्रभु ! '
फिर इधर - उधर की बात करते हुए जैन ने पंडित जी के बारे में
जानकारी की टोह लेने की एक्सरसाइज़ शुरू की। लेकिन पंडित जी बात का कोई सिरा पकड़ने
ही दें। किसी जादूगर की तरह बात सरका कर वर्तमान में आ जाते। बताते कि , ' पास्ट में ऐसा क्या रखा है जो आप बार - बार मेरा पास्ट खोजने
लग जाते हैं। अरे मेरा वर्तमान देखिए। और जानिए कि जिस आदमी का वर्तमान इतना
साधारण और सरल है उस का पास्ट भी इसी तरह का होगा। न अब कुछ महत्वपूर्ण है , न तब कुछ महत्वपूर्ण था। '
वह
बोले , ' सच मानिए जैन साहब , मेरे जीवन में ऐसी कोई उपलब्धि नहीं है , जिस का गुणगान करुं। संघर्ष ही संघर्ष है जीवन में। अमृत नहीं , विष ही विष है जीवन में। '
' और परिवार ?'
' परिवार होता तो यहां
इस तरह निर्वासित जीवन क्यों जीता ? ' पंडित जी ने बिना समय
लगाए फटाक से अपनी बात कह दी। और जोड़ा , ' संन्यास का सोचा था
पर संन्यासी भी नहीं बन पाया। पंडित बन गया हूं। पंडित भी
क्या मामूली सा पुजारी बन कर रह गया हूं। '
' माता-पिता ? '
' माता - पिता तो सब के
ही होते हैं। मेरे भी थे। '
' पढ़ाई - लिखाई ?'
' की है थोड़ी बहुत। ' पंडित जी बोले , ' पूजा - पाठ भर के लिए काफी है। कह कर पंडित जी ने बात खत्म करनी चाही। पर जैन जैसे ठान कर आए थे कि लोगों
की कुंडली बांचने वाले पंडित की कुंडली वह जान कर ही आज उठेंगे। और जब बहुत
कुरेदने लगे जैन साहब तो पंडित जी की आंख डबडबा गई। बोले , ' जैन साहब , जापान में आत्महत्या
की एक पद्धति है हाराकिरी। हाराकिरी में आदमी धीरे - धीरे ख़ुद को काटता रहता है।
अपने को तकलीफ देता रहता है। तब तक काटता रहता है , जब
तक जान न चली जाए। उस कटे पर नमक डालता रहता है। तकलीफ बढ़ती जाती है। ऐसे वह
पंद्रह दिन में भी अपने को खत्म कर सकता है ,
महीने
- दो महीने में भी। ' पंडित जी बोले , ' मैं हिंदू हूं।
ब्राह्मण हूं। आत्महत्या को पाप मानता हूं। इस लिए आत्महत्या नहीं की। न करुंगा।
पर वह जो कहते हैं न , हाराकिरी ! वह मैं
अनायास कर रहा हूं। आहिस्ता - आहिस्ता ! ज़िंदा हूं पर ख़ुद को तकलीफ तो दे ही रहा
हूं। ' कह कर पंडित जी चुप हो गए। जैन भी चुप
ही रहे।
थोड़ी देर बाद चुप्पी तोड़ते हुए पंडित जी बोले , ' सब के जीवन में कुछ ब्लैक एंड ह्वाइट होते हैं। ब्लैक स्पॉट भी
होते हैं। मेरे जीवन में भी हैं। कुछ लोग ,
कुछ
कह देते हैं। कुछ लोग नहीं कह पाते। ' वह बोले , ' जैन साहब बताऊं आप को कि पुरोहित का काम , पंडित का काम ब्राह्मणों के
बीच बहुत सम्मान का काम नहीं माना जाता। अपमानित करने वाला काम माना जाता है। बहुत
मज़बूरी में कोई ब्राह्मण यह काम हाथ में लेता है। मेरी भी कुछ वैसी ही मज़बूरी हो
चली है। यह मेरा काम नहीं है। मेरा काम पहले कुछ और था। पर गुमनामी की मज़बूरी में
यह काम कब करने लग गया पता ही नहीं चला। '
' गुमनामी की क्या
मज़बूरी आ गई। ' जैन ने संकोचवश पूछा।
' बस आ गई जैन साहब। ' वह बोले इस के आगे कोई प्रश्न नहीं पूछें तो अच्छा लगेगा। ' वह बोले , बस एक संघर्ष समझ
लीजिए। और संघर्ष का भी अपना सौंदर्य होता है। '
जैन ने हाथ जोड़ कर हामी भरी। थोड़ी देर दोनों फिर चुप हो गए।
अचानक पंडित जी मुस्कुराए और बोले , ' जैन साहब अभी जो भी
बात हुई हम दोनों के बीच , भूल जाइए कि कोई बात
हुई। हम ने सिर्फ़ आप से अपना दुःख साझा किया। इस दुःख की चर्चा किसी और से कर के
आप मेरा कभी मज़ाक नहीं उड़ाएंगे , ऐसी उम्मीद तो आप से
कर ही सकता हूं। आख़िर , आप हमारे दोस्त हैं।
सच्चे दोस्त !'
' निश्चिंत रहो पंडित जी ! ' जैन ने हाथ जोड़ कर
कहा।
' तो एक काम और ! '
' बताइए ! '
' वैसे तो आप हैं ही , हमारे अजीज दोस्त पर यह एक मोबाईल नंबर नोट कर लीजिए। और जो
कभी हमारे साथ कोई अनहोनी हो जाए। हम मर - मरा जाएं , तभी इस नंबर पर फ़ोन कर सूचना या जानकारी एक बार ज़रूर दे
दीजिएगा। उस के पहले कभी भूल कर भी कोई फ़ोन इस नंबर पर मत कीजिएगा। अगर कर दीजिएगा
तो हमारी आप की दोस्ती हमेशा के लिए ख़त्म। '
' ऐसा कभी सपने में मत
सोचो पंडित जी ! '
' विश्वास किया है तो
कुछ सोच - समझ कर ही। ' वह बोले , ' और हां , यह नंबर भी किसी और
से कभी शेयर मत कीजिएगा। आप को मेरी क़सम है। '
' निश्चिंत रहो पंडित
जी ! '
' आप मुझ से उम्र में
कुछ क्या बहुत कम हैं , जैन साहब ! पर भरोसा
हम आप पर ख़ुद से ज़्यादा करते हैं। हमारे शुगर की ही नहीं , हमारी ज़िंदगी की भी इंसुलिन हैं आप। ' उन्हों ने जैसे जोड़ा ,
' उम्मीद
है आप इस बात को समझते होंगे। '
जैन ने आंख झुका कर , हाथ जोड़ कर हामी भरी।
और आहिस्ता से पूछा कि , ' यह है कौन ? '
पंडित जी ने अपने होठ पर अंगुली रख कर चुप रहने को कह दिया।
जैन साहब ने कहा , ' ठीक है पंडित जी , अब चलता हूं ! '
'ठीक बात है ! ' वह बोले , ' हां , वह मौन वाली बात याद रखिएगा। भूलिएगा मत। '
' बिलकुल नहीं ! ' कह कर जैन ने पंडित जी के अचानक चरण-स्पर्श किए।
' सर्वदा स्वस्थ और
प्रसन्न रहिए ! '
जैन के जाने के बाद पंडित जी चटाई पर पेट के बल लेट गए। लेट कर
रोने लगे। हिचक - हिचक कर रोने लगे। सिसकियां थीं कि बंद ही नहीं हो रही थीं।
दिनचर्या किसी के रोने या किसी के कुछ कहने सुनने से किसी की
नहीं रुकती। पंडित जी की भी नहीं रुकी।
सोसाइटी वाले वैसे भी मंदिर का उपयोग पूजा - पाठ के लिए कम , इवेंट आदि के लिए ज़्यादा करते थे। उन के लिए मंदिर , त्यौहार जश्न मनाने का एक औज़ार भर था। इस सोसाइटी में ज़्यादातर
अमीर लोग ही थे। बड़े - बड़े फ़्लैट , बड़ी - बड़ी गाड़ियां।
ख़ूब पैसा। यही ज़िंदगी थी उन की। पंडित जी को पैसे आदि से चिढ़ नहीं थी। इवेंट से भी
नहीं। बस वह चाहते थे कि मंदिर का उपयोग इवेंट के लिए न किया जाए। पूजा - पाठ ही
हो मंदिर में। लेकिन क्या यह नवरात्र , क्या वह नवरात्र
मंदिर में पंडित और पूजा की जगह डी जे
, डांस , पार्टी
ही पर फोकस रहता। पानी की तरह पैसा बहता। लाखो रुपए चंदे में आते और चार दिन में
कपूर की तरह उड़ जाते। पंडित जी अपनी सीमा जानते थे सो चुप रह जाते। शुरू में कमेटी
की मीटिंग में उन्हों ने कहा ज़रूर कि नाच गाना क्लब हाऊस का सब्जेक्ट है। मंदिर का
नहीं। लेकिन उन की इस बात की किसी ने नोटिस नहीं ली। उन्हों ने भी फिर जोर नहीं
दिया। ग़नीमत यही थी कि जो भी ढोल-तमाशा होता रात दस बजे तक ही। फिर शांति। भंडारा
भी ख़ूब होता।
शुरू में एक डाक्टर आए। तीन-तीन करोड़ रुपए के दो फ़्लैट ख़रीदे।
आमने-सामने। दोनों को मिला कर आठ करोड़ रुपए उस के रिनोवेशन पर खर्च कर दिए। फ़्लैट
का इंटीरियर ही नहीं , भीतर - भीतर ले आऊट
भी बदल दिए। इटैलियन मार्वल की बड़ी चर्चा थी। एक बार मॉर्निंग वाक में किसी ने
डाक्टर साहब से कहा , ' इस से तो बेहतर था कि
आप ज़मीन ख़रीद कर अपनी कोठी बना लिए होते। '
और
जब यह बात और भी कई लोगों ने उन से कही तो वह बोले , ' आप
लोग मुझे बेवकूफ समझ रहे हैं। पर बात यह है कि मेरे पास बड़ा सा बंगला भी है। पर
तमाम सिक्योरिटी रखने के बावजूद मैं उस बंगले में सुरक्षित नहीं था। कभी भी मेरा
अपहरण हो सकता था। कभी भी कोई लूट सकता था। अपहरण और लूट से बचने के लिए इस
सोसाइटी में आया। यहां सिक्योरिटी टाइट है। कई गेट हैं। कोई किसी का अचानक अपहरण
नहीं कर सकता। गोली नहीं मार सकता। इस लिए यहां आया हूं। पैसा है , अपने शौक़ पर खर्च कर रहा हूं। '
तरह - तरह के लोग थे , तरह - तरह के ख़याल थे
लोगों के।
एक मंदिर भी है इस सोसाइटी में , एक
पंडित भी है इस मंदिर में लोग शायद कम ही
जानते थे। बहुत से लोग आते भी नहीं थे मंदिर।
एक संडे को पंडित जी टाइम्स आफ इंडिया पढ़ते हुए अचानक पकड़ लिए
गए। एक श्रद्धालु ने चकित हो कर पूछा भी कि ,
' पंडित जी , आप इंग्लिश अख़बार पढ़
रहे हैं ? '
' अरे नहीं , फ़ोटो देख रहा था। ' बात टालते हुए पंडित
जी ने अख़बार किनारे रख दिया। सवाल पूछने वाला युवा था। फ़ोटो देखने वाली बात उसे
हजम नहीं हुई। पर वह जल्दी में था। सो निकल गया। लेकिन रात में अपनी पत्नी को उस
ने यह बात बताई कि आज पंडित जी को टाइम्स आफ इंडिया पढ़ते देखा। तो पत्नी ने भी बात
आगे बढ़ाई और कहा कि पंडित जी वैसे भी आम पुजारियों की तरह चालू बात नहीं करते।
छुआछूत और पाखंड वाली बात नहीं करते। लालच नहीं करते। काम से काम रखते हैं और कि पढ़े - लिखे लगते हैं।
पंडित जी वैसे तो कोई अख़बार अपनी तरफ से नहीं मंगवाते। पर अकसर
लोग अख़बार लिए हुए मंदिर आते। बैठ कर अख़बार पढ़ते। कभी-कभार भूलवश अख़बार छोड़ जाते।
अख़बार हिंदी का हो , अंग्रेजी का। पंडित जी को फ़र्क नहीं
पड़ता। उठा कर पढ़ डालते। टी वी था नहीं मंदिर में। कभी-कभार किसी के घर पर भोजन के
समय देख लेते। मोबाईल भी उन का स्मार्ट वाला नहीं था। मामूली सा था। बस फ़ोन करने , रिसीव करने से ही उन का काम चल जाता। पैसे ही नहीं थे कि
स्मार्ट फोन की सोच भी सकें। ज़रूरत भी नहीं थी। तब जब कि काम वाली बाइयों , सफाई कर्मियों , सिक्योरिटी गार्डों
तक के पास अब स्मार्ट फोन अब आम बात थी। स्मार्ट फ़ोन पर फ़ेसबुक , वाट्सअप और अन्य सोशल मीडिया का उपयोग भी अब सामान्य बात थी।
किसी बात पर पंडित जी किसी से तर्क - वितर्क भी नहीं करते।
मंदिर आ कर भी लोग राजनीतिक बात करते। पंडित जी किसी से राजनीतिक बहस में भी नहीं
पड़ते थे। कुछ लोग कुरेदते थे कि आख़िर आप की भी कोई राय होगी। पंडित जी अकसर चुप
रहते। कोई बहुत पीछे पड़ता तो कहते , ' हम तो बस भगवद भजन
में ही रमे रहते हैं। हमारे भगवान जी
हमें कुछ और सोचने ही नहीं देते। '
अगला चुप हो जाता।
राजनीति वैसे भी उन्हें नहीं सुहाती थी। इस लिए वह इस सब से
भरसक दूर रहते थे। कभी - कभार सोसाइटी के पदाधिकारी अपने टैंपो हाई करने के लिए
किसी विधायक , किसी सांसद , किसी मंत्री आदि को किसी कार्यक्रम में चीफ़ गेस्ट बना कर ले
आते तो उसे कई बार मंदिर भी ले आते। मंदिर आ कर तमाम फ़ोटो आदि भी खिंचवाते। पंडित
जी उस फ़ोटो सेशन आदि से भी बाक़ायदा दूरी बना कर रहते। टीका लगा देते। कलावा बांध
देते। कोई चरण-स्पर्श करता तो उसे आशीष भी ख़ूब देते। प्रसाद भी देते। पर फ़ोटो में
नहीं आते। कोई अगर प्रसाद देते , टीका लगाते , कलावा बांधते समय फ़ोटो खींचता तो वह अपना सिर इतना झुका लेते
कि चेहरा फ़ोटो में न आ सके। लोग अकसर इस बात पर पंडित जी को टोकते। तो वह या तो
हमेशा की तरह चुप लगा जाते। या फिर बड़ी विनम्रता से कहते , ' जिस ने भगवान के साथ अपनी फ़ोटो खिंचवा ली हो , वह किसी नेता , मंत्री के साथ फ़ोटो
खिंचवा कर क्या करेगा ? '
लोग चुप हो जाते।
पंडित जी के साथ वक़्त ने भले वफ़ा नहीं किया था पर उन्हें वक़्त
से क्या किसी भी से कोई शिकायत नहीं थी। सालों से सोसाइटी के मंदिर और लोगों की
सेवा करते हुए कभी किसी भी एक विवाद में पंडित जी का नाम नहीं आया। ऐसे जैसे पंडित
जी का अपना कोई अस्तित्व ही न हो। न उन की कोई अच्छाई बतियाता न कोई बुराई
बतियाता। पंडित जी यही चाहते थे। चाहते थे कि कभी किसी बिंदु पर कोई उन की चर्चा न
करे। बतौर पंडित लोकप्रिय भी नहीं होना चाहते थे। तब जब कि उन के काम और व्यवहार
से हर कोई ख़ुश था। पंडित जी के पास अध्ययन और अनुभव का खजाना था पर वह सब के सामने
अनभिज्ञ बने रहते। साधारण और सामान्य बने रहते। चुप - चुप रहते। बहुत कहने पर भी
वह कहीं किसी के घर कथा बांचने नहीं जाते। जब कि सत्यनारायण कथा की मांग बहुत
होती। किसी शादी आदि , श्राद्ध - व्राद्ध
में भी कभी नहीं जाते। कोई बहुत पीछे पड़ता तो हाथ जोड़ कर , संकोच में डूब कर कहते ,
' बहुत
मामूली पुजारी हूं। पूजा ही जानता हूं। वह भी सिर्फ़ मंदिर में। ' वह जैसे जोड़ते , ' मंदिर में पूजा के
अलावा कुछ और आता ही नहीं। क्या करूं ? ' यह सब भी वह ऐसे कहते
जैसे किसी कसाई के आगे कोई गाय खड़ी हो। अगला आदमी उन पर तरस खा कर सरक जाता।
पंडित जी का ज़्यादातर समय पूजा और अध्ययन में ही बीतता। गीता
प्रेस से प्रकाशित पुस्तकों में वह जैसे अपनी राह खोजते मिलते। रामायण , गीता ही नहीं और भी पुस्तकें। वह लोगों को बताते कि रामायण या
गीता धार्मिक पुस्तकें नहीं हैं। कर्म और जीवन प्रधान रचनाएं हैं। श्रद्धावश लोगों
ने इन्हें धार्मिक ग्रंथ बना लिया है। पूजा - पाठ के निमित्त अकसर एक सुना -
सुनाया क़िस्सा सुनाते।
एक दिन नारद मुनि ने नारायण से पूछा , ' प्रभु , आप का सब से बड़ा भक्त
कौन है ? '
' पृथ्वी लोक में फला
जगह , फला गांव में फला नाम का एक किसान है। ' नारायण ने कहा।
' मुझ से भी बड़ा ? ' नारद ने पूछा।
' एक बार देखो तो सही। '
नारद पृथ्वी लोक गए। उस किसान को लगातार देखते रहे। दिन -
प्रतिदिन। कुछ दिन बाद नारद लौटे तो नारायण को बताया कि वह किसान तो सुबह उठता है।
नित्य क्रिया करता है। अपने गाय , बैल को खिलाता है।
ख़ुद भी कुछ खा कर खेत चला जाता है। दिन भर खेत पर काम करता है। शाम को लौट कर गाय , बैल को खिला कर , खुद खा कर सोने चला
जाता है। सोने के पहले नारायण , नारायण ! कहता है और
सो जाता है। बस।
' फिर ? ' नारायण ने पूछा।
' लेकिन मैं तो दिन -
रात नारायण , नारायण का जाप करता रहता हूं। जब कि वह
किसान रात में सोते समय सिर्फ़ एक बार। '
' ऐसा करो नारद , एक कटोरा लो। उस में तेल भर लो। और उस तेल भरे कटोरे को ले कर
पृथ्वी की परिक्रमा कर के आओ। ' भगवान ने कहा , ' बस ध्यान यह रखना कि कटोरे से तेल एक बूंद भी कहीं नहीं छलके। '
नारद ने कटोरा लिया। तेल भरा। पृथ्वी की परिक्रमा की। नारायण
के पास आए और बोले , ' देखिए प्रभु , पृथ्वी की पूरी परिक्रमा कर ली। कटोरे से एक बूंद तेल भी नहीं
छलका। '
' बहुत सुंदर ! ' नारायण ने कहा , 'यह तो बहुत बढ़िया
किया। पर यह बताओ कि , इस बीच मेरा नाम
कितनी बार लिया ?'
नारद यह सुन कर हकबका गए। बोले , ' प्रभु
एक बार भी नहीं। सारा ध्यान तो कटोरे से तेल न छलके , इसी पर लगा रहा। इस चक्कर में आप का नाम लेना ही भूल गया। ' नारद बोले , ' क्षमा कीजिए प्रभु !
यह ग़लती हो गई। '
' ग़लती नहीं है यह
नारद। बात अभ्यास की है। भक्ति की है। ' भगवान बोले , ' इसी लिए वह किसान मेरा सब से बड़ा भक्त है। दिन भर की मेहनत , तमाम दुःख - सुख भोगते हुए , सारा
काम निपटाते हुए रात में सोते समय वह मुझे कभी नहीं भूलता। प्रतिदिन मेरा नाम ले
कर मुझे एक बार याद ज़रूर करता है। नाम लेने के बाद ही सोता है। ' भगवान बोले , ' इसी लिए वह मेरा सब
से बड़ा भक्त है। '
नारद चुप रह गए।
पंडित जी बताते , ' भक्ति ऐसे ही होती
है। भगवान मन में होने चाहिए। भगवान के प्रति दिखावा नहीं श्रद्धा होनी चाहिए। '
लोग श्रद्धावनत हो कर चले जाते।
ऐसी ही कुछ श्रद्धालु स्त्रियां थीं जो पंडित जी का बहुत मान
रखती थीं। पंडित जी भी उन स्त्रियों की श्रद्धा भरी भावुकता में लिपट कर पाखंड में
चाहे - अनचाहे फंस जाते। जैसे कुछ निराजल व्रत होते। स्त्रियां कभी किसी अस्वस्थता
, किसी लाचारी में निराजल व्रत रखने में
मुश्किल बता कर , पंडित जी से अनुरोध करतीं कि हमारे
हिस्से का निराजल व्रत पंडित जी रख लें। ऐसा कोई प्राविधान तो धर्म में नहीं है
लेकिन जैसे किसी गर्भवती स्त्री या बहुत बीमार स्त्री के लिए पंडित जी लोगों ने
उपाय बना दिया था कि ऐसी स्त्रियों का व्रत उन के पति रख लें या कोई अन्य परिजन या
फिर कोई ब्राह्मण। धीरे-धीरे यह निराजल व्रत का बोझ ब्राह्मणों के ऊपर आ पड़ा। पर
गुपचुप। कोई स्त्री यह नहीं बताती कि हमारे हिस्से का व्रत फला पंडित ने कर रखा
है। स्त्रियां इस निराजल व्रत के लिए पंडित जी को बड़ी दक्षिणा भी नक़द देतीं। पर सब
कुछ गोपनीय रहता। ज़्यादातर यह सब धनाढ्य स्त्रियां करतीं। लेकिन यहां तो इस
सोसाइटी के मंदिर के पंडित जी स्त्रियों के हिस्से का निराजल व्रत भी रख लेते और
इस के बदले कोई नक़द दक्षिणा भी नहीं लेते थे। एक पैसा नहीं। बस सहयोग भाव में
रहते। जैसे करवाचौथ , तीज आदि के व्रत।
तो हर बार की तरह इस बार भी पंडित जी तीज का निराजल व्रत रखे
हुए थे। क़ायदे से पंडित जी को इस से बचना चाहिए था। दवा का फार्मूला जानते थे तो
यह भी ज़रूर जानते रहे होंगे कि शूगर के मरीज को कभी निराजल व्रत भूल कर भी नहीं
रखना चाहिए। बिना पानी , बिना भोजन की देह जान
की दुश्मन हो जाती है। वह भी बूढ़ी देह। लेकिन स्त्रियों की भावुकता भरी लहर में
लिपट कर हर बार की तरह इस बार भी निराजल व्रत रख लिया। एक दिन पहले जैन की दवा
दुकान बंद थी। इस लिए एक दिन पहले भी दोनों टाइम इंसुलिन नहीं ले पाए थे। तीज के
दिन तो निराजल था ही। इंसुलिन तो छोड़िए , कोई दवा भी नहीं ली।
तिस पर बारिश भी बहुत तेज़ थी। मूसलाधार। मंदिर में अकेले थे पंडित जी। चटाई पर
लेटे हुए। दोपहर हो गई थी पर बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी। बारिश जब दिन के
कोई तीन बजे रुकी तो दवा दुकानदार जैन को ध्यान आया कि दुकान बंद होने के कारण पंडित
जी कल भी इंसुलिन लेने से वंचित रह गए थे ,
आज
भी दिन के तीन बज गए थे। सो जैन ख़ुद इंसुलिन की सूई ले कर मंदिर पहुंचे। पंडित जी
लेटे पड़े थे।
' ओ पंडित जी , उठो ! ' जैन ने आवाज़ लगाई , ' बारिश बंद हो गई है। उठो ! '
लेकिन पंडित जी न कुछ बोले , न
उठे।
' कितना सोते हो पंडित
! ' जैन ज़रा ऊंची आवाज़ में बोले , ' वह भी दिन में। '
पंडित फिर भी चुप रहे।
' अरे , तुम्हारी इंसुलिन ले आया हूं। कल भी नहीं लगाई थी , आज तो लगा लो। ' जैन बोले , ' सवा तीन बज रहे हैं। वैसे ही बहुत लेट हो गया है। '
लेकिन पंडित जी कुछ बोले नहीं। तो जैन ने उठ कर उन्हें हिलाया।
झिंझोड़ा। पंडित जी तो निस्तेज हो गए थे। इधर - उधर हिलाया जैन ने। कहा , ' पंडित कुछ तो बोलो ! '
पंडित जी ख़ामोश थे। अब क्या बोलते। जैन दहाड़ मार कर रो पड़े , ' पंडत , पंडत कुछ तो बोलो ! '
जैन की दहाड़ भरी रुदन सुन कर एक सिक्योरिटी गार्ड दौड़ कर आया।
जैन को संभालते हुए बोला , ' क्या हुआ सर !'
' लगता है पंडित हम को
छोड़ कर चला गया ! ' कह कर जैन की हिचकियां बढ़ गई। स्त्रियों
की तरह वह पंडित - पंडित कह कर हिचक - हिचक कर रोने लगा। सिसकने लगा।
गार्ड ने फ़ोन कर एक और गार्ड को बुला लिया।
पंडित जी को हिला - डुला कर दोनों गार्डों ने देखा। फिर
सिक्योरिटी इंचार्ज को फोन किया। अब पूरी सोसाइटी में पंडित जी के निधन की ख़बर फैल
गई। तमाम वाट्सअप ग्रुप पर पंडित जी के निधन की ख़बर और तेज़ी से फैली। लोग पंडित जी
को श्रद्धांजलि देने लगे। मंदिर आने लगे। स्त्रियों का जैसे हुजूम उमड़ आया। तीज के
निराजल व्रत के बावजूद रोती-बिलखती स्त्रियों से मंदिर परिसर भर गया।
ऐसी भीड़ तो मंदिर में जब कभी कोई भंडारा होता था , त्यौहार होता था , तब भी नहीं होती थी।
आसमान में बादल भरे थे , लोगों की आंखों में
आंसू। इस भीड़ में वह स्त्रियां भी थीं जिन के हिस्से का तीज का निराजल व्रत पंडित
जी रखे हुए थे। धीरे - धीरे पता चला एक दो नहीं , दर्जनों
स्त्रियों के हिस्से का निराजल व्रत थे पंडित जी। यह स्त्रियां पंडित जी के शोक
में कुछ ज़्यादा रो रही थीं। खुद व्रत नहीं थीं , निराजल।
सो रोने की शक्ति भी थी। भरपूर थी। वैसे भी किसी के निधन पर स्त्रियां जितना रोती
हैं , कोई नहीं रोता। फिर यहां तो इन स्त्रियों
के अपने पंडित जी का निधन हुआ था। जिन पंडित जी में यह स्त्रियां , पुजारी से ज़्यादा पिता या भाई का रूप देखती थीं।
अमूमन लोग समझते थे कि पंडित जी अनाथ हैं। उन का कोई नहीं है।
उन का कोई परिवार नहीं है। लेकिन पचास एकड़ की सोसाइटी वाला यह मंदिर परिसर बता रहा
था कि पूरी सोसाइटी उन का परिवार थी। जो लोग पंडित जी को बड़ी उपेक्षा और अपमान भरी
दृष्टि से देखते थे , वह भी मंदिर परिसर
में शोकाकुल दिख रहे थे। वह कुछ टीनएज बच्चे भी जिन्हें पढ़ने में पंडित जी ने दिशा
और रौशनी दिखाई थी , उन की आंखें भी बरस रही थीं।
दवा दुकानदार जैन जो पंडित जी को निपट अकेला समझता था , समझता था कि अगर इस अकेले पंडित जी का कोई है तो बस मैं ही हूं
, कोई और नहीं। लेकिन जैन देख रहा था कि
पंडित तो सब का था। पंडित तो हर किसी का था। अकेला नहीं था। पंडित पुजारी का काम
भले करता था मंदिर में पर पूरी सोसाइटी उस की पुजारी थी। तो शायद इस लिए कि पाखंड
से रहित व्यवहार था उस का। हर परिवार को सही सलाह और सही दृष्टि दी थी। बिना किसी
लालच और लोभ के। यह सब सोचते हुए जैन को अचानक याद आया कि पंडित ने एक मोबाईल नंबर
दिया था , यह कहते हुए कि अगर मैं मर - मरा जाऊं
तो इस पर सूचना दे देना। जैन अपनी दुकान की तरफ भागा। जहां एक डायरी में उस ने वह
नंबर नोट कर के रखा था। मोबाईल में इस लिए नहीं सेव किया था कि कहीं ग़लती से भी वह
नंबर लग गया , दब गया तो पंडित को दिया वादा टूट
जाएगा। पंडित ने वादा लिया था कि , ' मरने के पहले कभी भूल
कर भी कोई फ़ोन इस नंबर पर मत कीजिएगा। अगर कर दीजिएगा तो हमारी आप की दोस्ती हमेशा
के लिए ख़त्म। ' जैन ने दुकान पहुंच कर डायरी से वह
मोबाईल नंबर निकाल कर मिलाया। नंबर उठ नहीं रहा था। बार - बार मिलाने पर भी। थक गए
जैन नंबर मिलाते - मिलाते। थोड़ी देर बाद अचानक उस नंबर से जैन के नंबर पर फोन आया।
उस ने लगभग डपटते हुए बताया कि , ' मैं एक ज़रूरी मीटिंग
में हूं। आप बार-बार फोन क्यों कर रहे हैं। फिर यह मेरा पर्सनल नंबर है। आप को
कहां से मिला ? आप हैं कौन ? '
अचानक ऐसी डांट और इतने सवालों से जैन घबरा गए। फिर भी दबी
जुबान बोले , ' आप मृत्युंजय मिश्रा को जानते हैं ? '
' अरे हां ! ' मृत्युंजय मिश्रा नाम सुनते ही वह आदमी अचानक द्रवित हो गया।
रुआंसा हो गया। बोला , ' हमारे बाबू जी हैं
वह। कैसे हैं वह , कहां हैं ? ' वह अपनी सिसकियां रोकते हुए बोला , ' आप कहां से बोल रहे हैं ?
पता
लिखवाइए अपना। और उन्हें संभाल कर रखिए। मैं आता हूं। कहीं जाने मत दीजिएगा उन को।
'
' पर वह तो चले गए ! ' जैन की रुलाई फूट गई।
' कहां ? '
' भगवान के पास !'
' ओह ! कैसे ? ' वह आदमी बेहिसाब रोने लगा। ज़रा संभला तो बोला , ' आप उन की बॉडी संभाल कर रखिए। पता लिखवा दीजिए। जैसे भी हो मैं
पहुंचता हूं। '
जैन ने नोएडा का पता लिखवा दिया तो वह बोला , ' अभी मैं मुंबई में हूं। पहुंचने में कुछ घंटा लग सकता है। पर
बाबू जी की बॉडी संभाल कर रखिएगा। अंतिम संस्कार वगैरह मत कीजिएगा। वह लावारिस
नहीं हैं। भरापुरा परिवार है उन का। '
' निश्चिंत रहिए। आप
आराम से आइए। ' जैन बोला , ' कोई कुछ नहीं करेगा। '
जैन मंदिर आए तो देखा कि मंदिर कमेटी वालों ने पंडित जी का शव
मंदिर से निकाल कर बाहर रख दिया था। चादर उढ़ा दिया था , शव पर और अंतिम क्रियाकर्म के लिए तैयारी शुरू कर दी थी। जैन
ने मंदिर कमेटी के एक सदस्य को एक तरफ ले जा कर बताया कि , ' पंडित जी के परिवार से संपर्क हो गया है। उन का बेटा मुंबई से
आ रहा है। इस लिए क्रियाकर्म की तैयारी का काम अभी रोक दिया जाए ! '
' अरे पंडित जी की
फेमिली मिल गई है , इस से अच्छी बात क्या होगी ! ' फिर उस ने शक़ जताया कि अगर बेटा ट्रेन से आएगा तो बहुत टाइम लग
जाएगा। बॉडी ख़राब हो सकती है। '
' बर्फ की सिल्लियां
मंगवा लेते हैं। ' जैन ने कहा , ' उसी पर लिटा देते हैं। नहीं ख़राब होगी बॉडी। '
' यह भी ठीक है। '
सोसाइटी में बड़ी तेज़ चर्चा फ़ैल गई कि पंडित जी की फेमिली भी
है। वाट्सअप ग्रुपों पर तरह - तरह के डिस्कशन और खुलासे शुरू हो गए। शोक संदेश की
जगह गॉशिप शुरू हो गई। गॉशिप पर गॉशिप ! पंडित जी और उन की फेमिली को ले कर। मुख्य
प्रश्न यह था कि पंडित जी अपनी फेमिली से दूर क्यों थे। आना - जाना क्यों नहीं था।
क्या पंडित का बेटा मुंबई में लेबर है ? आदि - इत्यादि। कुछ
लोगों ने हस्तक्षेप करते हुए कहा भी कि पंडित जी सम्मानित व्यक्ति हैं , उन के बारे में कोई ऐसी - वैसी बात नहीं होनी चाहिए। शोक का
समय है , शोक ही रहना चाहिए।
थोड़ी देर बाद सोसाइटी में अचानक कुछ गाड़ियां आईं। पता चला कि
इनकम टैक्स विभाग के लोग हैं। इनकम टैक्स के बड़े - बड़े अफसर। कर्मचारी। इनकम टैक्स
कमिश्नर। कुछ व्यापारी भी। लोगों का माथा ठनका। पता चला कि पंडित जी का बेटा मुंबई
में मज़दूर नहीं , इनकम टैक्स का बड़ा अफ़सर है। प्रिंसिपल
चीफ़ कमिश्नर यानी प्रधान मुख्य आयकर आयुक्त है। उस के अंडर कई इनकम टैक्स कमिश्नर
आते हैं। इनकम टैक्स के इन लोगों ने पंडित जी के शव को रेफ्रिजरेटेड कैस्केट मंगवा
कर उस में रखवा दिया। सब ने उन के शव को पारंपरिक रूप से श्रद्धा के फूल चढ़ाए।
जितना औपचारिक और सरकारी सम्मान और प्रोटोकाल मुमकिन था , सब हुआ।
सोसाइटी के वाट्सअप ग्रुपों पर अब डिस्कशन की हवा फिर बदल गई।
श्रद्धा के फूल बरसने लगे। सादा जीवन , उच्च विचार के स्लोगन
पंडित जी के लिए शुरू हो गए। इसी बीच एक और नई ख़बर आई कि पंडित जी तो दिल्ली
यूनिवर्सिटी में केमिस्ट्री के रीडर रहे थे। यह ख़बर भी बात - बात में इनकम टैक्स
के लोगों से मिली। अब तो जैसे पंडित जी के लिए सारे वाट्सअप ग्रुप पर श्रद्धा के
साथ - साथ आदर और पूजा के फूल भी बिछने लगे। लोगों ने पुरानी अप्रिय टिप्पणियां
डिलीट करनी शुरू कर दी। माहौल ऐसा बना जैसे सोसाइटी से एक महापुरुष चला गया है।
कोई ग्यारह बजे रात में पंडित जी यानी मृत्युंजय मिश्रा का
बेटा भी मुंबई से आ गया। सपरिवार। शव से लिपट कर फफक - फफक कर रोया। बाबू जी , बाबू जी कह कर रोया। पूरा परिवार रोया। सोसाइटी के लोग भी रोने
लगे। दिल्ली के मॉडल टाऊन कालोनी में बंगलानुमा उन का घर था। जिसे मृत्युंजय
मिश्रा यानी पंडित जी ने ही बनवाया था। सो वह रात में ही पंडित जी के शव को अपने
मॉडल टाऊन वाले घर ले गए। सोसाइटी के कुछ लोग भी उन के शव के साथ मॉडल टाऊन गए।
ख़ास कर मंदिर कमेटी के लोग। दूसरे दिन निगमबोध घाट पर पंडित जी की चिता को उन के
बेटे ने मुखाग्नि दी। मॉडल टाऊन कॉलोनी के कुछ लोग , दिल्ली
यूनिवर्सिटी के लोग , पंडित जी के
विद्यार्थी , इनकम टैक्स के तमाम लोगों के साथ ही दवा
दुकानदार जैन , सोसाइटी के भी तमाम लोग भी निगमबोध घाट
पर पंडित जी को अंतिम विदा देने के लिए उपस्थित थे। वह जो कहते हैं , नम आंख से सब ने विदा दी। पंडित जी की श्रद्धा में सब के सिर
नत थे। क्या सोसाइटी , क्या यूनिवर्सिटी हर
कहीं के लोग पंडित जी के व्यक्तित्व के बखान में खर्च होते रहे। सोसाइटी के लोग तो
नहीं पर यूनिवर्सिटी के लोग , मॉडल टाऊन के लोग
पंडित जी के सारे बखान के बाद एक लेकिन लगा देते थे। वह लेकिन क्या था , सोसाइटी के लोग जानने के लिए बहुत उत्सुक थे। लेकिन जान नहीं
पा रहे थे। खुल कर न कोई कह पा रहा था , न कोई पूछ पा रहा था।
पंडित जी का व्यक्तित्व ऐसा था कि उन का नाम लेते ही एक गरिमाबोध लोगों के मन में
आ जाता था और लोग चुप लगा जाते थे।
मृत्युंजय मिश्रा को मुखाग्नि देने के बाद परंपरा के मुताबिक़
बेटे ने यमुना के जल में मां का सिन्होरा प्रवाहित किया। सिन्होरा में रखे सिंदूर
से यमुना का जल तब लाल-लाल हो गया था। तब लगा था , जैसे
जल में अग्नि प्रवाहित कर दी है। इस आग में वह जल-जल गया। इस आग की आंच में
पिघल-पिघल गया। लेकिन किसी से कुछ कह नहीं पाया। अपने आंसू , ख़ुद ही पीता रहा। चुपचाप।
अंत्येष्टि के बाद पंडित जी का बेटा , सपरिवार प्रतापगढ़ के अपने गांव चला गया। श्राद्ध के लिए।
श्राद्ध के दिन सोसाइटी के कुछ लोग भी प्रतापगढ़ में पंडित जी के गांव पहुंचे।
चर्चा वहां भी बहुत थी। परंतु एक लेकिन के साथ। लेकिन था कि खत्म नहीं हो रहा था।
लेकिन गांव ऐसा बेदिल होता है कि सारी श्रद्धा और सारी महानता को एक सांस में सोख
लेता है। हर गांव में कुछ मुंहफट और अभद्र लोग होते हैं जो फटी चादर को और फाड़
देने के जुगाड़ में लगे रहते हैं। लगे क्या रहते हैं , शायद इसी काम के लिए वह लोग पैदा हुए रहते हैं।
किसी बात पर सोसाइटी के लोगों ने पंडित जी की सादगी , विद्वता और विनम्रता की गाथा शरू ही की थी कि गांव के कुछ लोग
कहने लगे कि , ' क्या फ़ायदा ऐसी विद्वता , विनम्रता का। बेटी तो मुंह पर कालिख लगा गई ? '
' क्या ? ' सोसाइटी के लोग चौंक पड़े। यह तो उन के लिए एक नया चैप्टर था।
' और क्या ? ' गांव का वह व्यक्ति बोला ,
' तभी
तो रीडर साहब रीडरी वीडरी सब फेंक - फांक कर घर - दुआर , पर - परिवार छोड़ कर गुमनाम हो गए। सुना है कि कउनो मंदिर में
भूखों मरे पाए गए। '
' ऐसा मत कहिए। ' सोसाइटी के लोगों के साथ गए दवा दुकानदार जैन बोले , ' यह समय ऐसी बातों का नहीं है। आप लोग चुप हो जाओ ! '
लेकिन एक दो लोगों के चुप रहने से ऐसी बातें कहां चुप रह पाती
हैं भला !
पता चला कि प्रतापगढ़ जनपद के निवासी मृत्युंजय मिश्रा होनहार
किस्म के छात्र थे। उन के पिता साधारण किसान थे। लेकिन बेटे की पढ़ाई में सुविधा
देने के मामले में कोई कसर नहीं छोड़ी। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ने गए मृत्युंजय
मिश्रा केमेस्ट्री में एम एस सी किए। गोल्ड मेडलिस्ट हुए। और पी एच डी करने जे एन
यू , दिल्ली गए। पी एच डी पूरी होते ही
दिल्ली यूनिवर्सिटी में लेक्चरर नियुक्त हुए। इस बीच शादी हो गई थी। पत्नी भी
प्रतापगढ़ से थीं और कॉमर्स पढ़ा रही थीं , दिल्ली यूनिवर्सिटी
से संबद्ध एक कालेज में। समय आने पर रीडर बन गए मिश्रा जी। मॉडल टाऊन में एक
पुराना घर ख़रीद कर , उसे तोड़ कर लोन ले कर बढ़िया दो मंज़िला
घर बनवाया। ज़िंदगी ठाट से चल रही थी। बेटा भी आई ए एस अलायड हो गया। इनकम टैक्स
में। बेटी भी एक बैंक में पी ओ बन गई। बस यही घड़ी जैसे काल बन गई मृत्युंजय मिश्रा
के जीवन में। बेटी एक शादीशुदा और अधेड़ आदमी के प्यार के झांसे में आ गई। बहुत
समझाया। कहा कि लव मैरिज या अपनी पसंद की शादी करने में कोई दिक़्क़त नहीं। चाहे जिस
जाति में करो। कोई दिक़्क़त नहीं। पर अपनी उम्र के आदमी से शादी करो। बाप की उम्र के
आदमी से नहीं। लेकिन वह कुछ सुनने को तैयार नहीं थी। अड़ गई कि इसी से विवाह करेगी।
मृत्युंजय मिश्रा ने साफ़ बता दिया कि यह शादी तो किसी सूरत उन्हें मंज़ूर नहीं।
मेरी लाश से गुज़र कर ही यह शादी हो सकती है। यह सुन कर बेटी चुप रह गई। बेटा उन
दिनों चेन्नई में पोस्टेड था। बहू के साथ वह भी दिल्ली आया। बहन को बहुत प्यार से
समझाया। एक साइकेट्रिक के पास ले जा कर तीन - चार बार काउंसिलिंग करवाई। बहू ने भी
ननद को सारे व्यावहारिक पक्ष , ऊंच-नीच समझायी।
कोई प्रतिक्रिया देने के बजाय वह चुपचुप रहने लगी। लगा कि बात
शायद बन गई है। फिर एक दिन अचानक बेटी ने बताया कि उस ने किसी मंदिर में शादी कर
के रजिस्ट्रार आफिस में उस का रजिस्ट्रेशन भी करवा लिया है। यह सुन कर माता - पिता
दोनों ही को जैसे लकवा मार गया। अवाक रह गए। निःशब्द हो गए। फिर भी दोनों लगातार
समझाते रहे कि यह ग़लत फैसला है। एक साथ दो परिवार मत तोड़ो। यह भी कहा कि बिना तलाक़
लिए यह रजिस्ट्रेशन क़ानूनी रूप से अवैध है और कि रद्द भी हो सकता है। इस बारे में
वकीलों की भी राय ली। पर सब बेकार। अब दो ही रास्ते थे। एक यह कि मिश्रा जी मिसेज
सहित आत्महत्या कर लें। जहर खा लें। किसी रेल से कट मरें। दूसरा , बेटी की ऑनर किलिंग। लेकिन मिश्रा जी ने इन दोनों रास्तों को
कायरता कहते हुए बेटी को समझाने का रास्ता अपनाया। वह बेटी जिसे वह अपनी जान से
ज़्यादा चाहते थे। ख़ूब प्यार करते थे। बेटे से भी ज़्यादा उसे चाहते थे। विश्वास
करते थे। कभी कोई शक़ , कोई सवाल , कोई अविश्वास नहीं किया। पर यही बेटी एक दिन विश्वासघात कर , आंख में धूल झोंक कर , घर छोड़ कर चली गई।
मोबाईल स्विच आफ कर लिया। मिश्रा जी सकते में आ गए। बेटी ने उलटे थाने में रिपोर्ट
लिखवा दिया माता - पिता के ख़िलाफ़। कि माता - पिता उसे किसी के हाथ बेच रहे थे और
कि उसे जला कर मारने की कोशिश की। वग़ैरह बहुत से अनर्गल आरोप। यह सब लिख कर पुलिस
से सुरक्षा मांगी। बताया कि उस की जान को ख़तरा है। इस बाबत हाईकोर्ट में रिट दायर
कर हाईकोर्ट से भी सुरक्षा मांगी। मृत्युंजय मिश्रा हकबक रह गए। वह सोच ही नहीं पा
रहे थे कि बेटी को ऐसे अनर्गल आरोप की ज़रूरत क्यों आन पड़ी। हालां कि उन के पास न
हाईकोर्ट का कोई आर्डर आया , न कोई पुलिस आई। पर
जीते जी जैसे मर गए वह इन आरोपों को सुन कर। बेटी का छल और विश्वासघात उन्हें बुरी
तरह तोड़ गया। उन का सारा व्यावहारिक और केमेस्ट्री का ज्ञान बेटी के विश्वासघात
में डूब गया। वह कहते हैं न कि केमिकल लोचा हो गया।
मिसेज मिश्रा तो सुधबुध खो बैठीं। बेटी घर से भाग गई है , यह ख़बर परिवार और रिश्तेदारों में आग की तरह फैल गई। गांव के
पट्टीदारों ने फ़ोन पर ताने दे - दे कर जीना हराम कर दिया। मृत्युंजय मिश्रा से कम , मिसेज मिश्रा से लोग ज़्यादा पूछने लगे। दूध वाला , किराने की दुकान वाला ,
सब्जी
वाला , हर किसी के पास सवाल ही सवाल था। कुछ
बोल कर पूछते , कुछ बिन बोले। लगता जैसे मॉडल टाऊन की
हर गली , हर सड़क , हर
कूचा , हर दुकान , हर आदमी , औरत के पास बस यही एक
सवाल है। सवाल न हो , जैसे आक्सीजन हो। कि
इस सवाल के बिना सब का जीना मुश्किल हो गया हो। हर
गली कूचा इसी सवाल में सना हुआ था। आकंठ। सहानुभूति कम , मजा लेने का भाव सर्वोपरि था। सर्वदा सीना तान कर , सिर उठा कर चलने वाले मृत्युंजय मिश्रा अब सिर झुका कर चलने
लगे। लगता जैसे गोहत्या का पाप चढ़ गया हो। ब्राह्मण हो कर भी समाज में अछूत हो गए
थे। भागी हुई लड़की का बाप बन कर लगता था जैसे समूची दिल्ली का मल - मूत्र अपने सिर
पर ले कर घूम रहे हों। सांस लेना और जीना कठिन हो गया था। कालोनी के लोग , परिवार के लोग , रिश्तेदार सभी
बर्रैया के छत्ते की तरह सवालों की झड़ी ले कर उपस्थित थे। तरह - तरह की बातें। कुछ
सच्ची , कुछ झूठी। मिर्च , मसाले के साथ। वह जो एक कहावत है न कि सूप तो सूप , चलनी भी बोले , जिस के बहत्तर छेद !
वाली स्थिति हो गई। तिस पर कोढ़ में खाज यह कि बेटी ने अपने विवाह की फ़ोटो फ़ेसबुक
पर डालने शुरू किए। लोगों ने वही फ़ोटो मिसेज मिश्रा को फारवर्ड करने शुरू कर दिए।
जाने कहां-कहां फारवर्ड करने लगे। परिणाम यह हुआ कि मिसेज मिश्रा को हार्ट अटैक पड़
गया। अस्पताल जाते - जाते रास्ते में ही सांस टूट गई। मृत्युंजय मिश्रा अब और
अकेले पड़ गए। पत्नी थीं तो एक सहारा था। दोनों एक दूसरे के कंधे पर सिर रख कर , गले लग कर रो लेते थे। दुःख विगलित कर लेते थे। डायल्यूट कर
लेते थे। अब वह कंधा भी नहीं रहा। किस के कंधे पर सिर रख कर रोएं ? पत्नी चली गईं लेकिन सवालों की बौछार बंद नहीं हुई। पत्नी का
श्राद्ध आदि कर के वह एक दिन यूनिवर्सिटी पहुंचे। इस्तीफ़ा दिया। और मोबाईल बंद कर
गुम हो गए। बुदबुदाते रहते कि किस जन्म के पाप की
सज़ा दे दी बेटी तुम ने। और अकेले ही रोने
लगते। लोगों को बीमारी आदि में महामृत्युंजय जाप की सलाह देने वाले मृत्युंजय
मिश्रा अब दिन-रात अपनी मृत्यु की कामना और प्रार्थना करने लगे। लेकिन मृत्यु
मांगने से तो कभी किसी को मिलती नहीं। भीख नहीं है , मृत्यु।
मृत्यु की प्रार्थना और कामना लिए मृत्युंजय मिश्रा हरिद्वार , ऋषिकेश , प्रयाग , काशी और जाने कहां-कहां भटकते - भटकते थक गए। इस मंदिर , उस मंदिर और धर्मशाला में शरण लेते हुए इस सोसाइटी के मंदिर
में आ गए। चाहते तो फंड वगैरह ले कर , पेंशन बनवा कर भी
कहीं गुमनाम ज़िंदगी बसर कर सकते थे। पर इस से लोग उन को किसी न किसी तरह खोज लेते।
नहीं कोई और सही , बेटा तो खोज ही लेता। पर वह अब इस
निर्मम समाज को फेस करने को तैयार नहीं थे। सारा सम्मान , सारी प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल चुकी थी। आदमी आर्थिक स्थिति
बदहाल होने पर लड़ सकता है। स्वास्थ्य ख़राब होने पर बीमारी से भी लड़ सकता है। पर
समाज में जो एक बार प्रतिष्ठा और सम्मान मिट्टी में मिल जाए , उस से ताज़िंदगी नहीं उबर सकता। वह भी जिस की जवान बेटी घर छोड़
कर भाग जाए , उस का जीवन नरक से भी बदतर हो जाता है।
मृत्युंजय मिश्रा अकसर यह सोचते और लोगों से कहते कि बच्चे जब छोटे होते हैं तो
मां - बाप को बहुत मज़ा देते हैं। नैसर्गिक सुख देते हैं। स्वर्ग जैसा जीवन होता
है। पर बड़े हो कर यही बच्चे जब सज़ा देने लगते हैं तो ज़िंदगी बोझ बन जाती है। नरक
बन जाती है। इस बोझ से ही छुटकारा पाने के लिए वह गुमनाम हो गए। बेटे ने बहुत
खोजा। पर मृत्युंजय मिश्रा केमेस्ट्री वाले आदमी थे। कहीं कोई पहचान और निशान नहीं
छोड़ते। हर बार जिस नाव से नदी पार करते , वह नाव जला देते।
निशान और पहचान दिए भी तो मृत्यु के बाद।
जिस बेटी के कुकर्मों और पाप का प्रायश्चित करते हुए मृत्युंजय
मिश्रा गुमनाम हो कर ज़िंदगी का बोझ ढोते रहे वह पापिनी भी ख़बर सुन कर अपनी टीनएज
बेटी के साथ नोएडा की इस सोसाइटी में एक दिन आई। लेकिन जब सोसाइटी के लोगों से वह
मिली तो उस पर जैसे आग की बरसात हो गई। मिसाइलों जैसे अप्रिय सवाल सुन कर ध्वस्त
हो गई। तेजाबी सवालों के आगे वह पस्त हो गई। लोगों के सवाल उसे किसी आरी की तरह
काटने लगे। लोगों के अप्रिय सवालों और अपशब्दों का सामना वह नहीं कर सकी। कुछ
लोगों ने उसे मारने के लिए दौड़ा लिया। भाग कर वह अपनी कार में बैठ गई। ड्राइवर से
बोली , ' भागो यहां से जल्दी। नहीं लोग मार
डालेंगे ! ' ड्राइवर ने कार तेज़ी से आगे बढ़ा दी।
थोड़ी देर बाद उस की बेटी ने पूछा , ' ममा ऐसा क्यों किया आप ने नाना के साथ ? '
वह कुछ बोली नहीं। बस आंसू बहने लगे आंख से। बहते ही रहे।
होता है ऐसा कई बार कि बच्चों के कुछ फैसलों से मां-बाप की
ज़िंदगी की केमेस्ट्री बदल जाती है। ज़िंदगी जीने का फार्मूला बदल जाता है। जैसे कभी
केमेस्ट्री के बाकमाल स्कालर रहे पंडित जी ऊर्फ मृत्युंजय मिश्रा की केमेस्ट्री
बदल गई।
- 2 -
आग
एक समय ज़िंदगी उस की बहुत ख़ूबसूरत थी। बचपन और
जवानी थोड़े संघर्ष में बीती। पर उम्र के मध्य में उस की ज़िंदगी पटरी पर आ गई।
ख़ूबसूरत हो गई। दिन सोने के , रात
चांदी की हो गई। सफलता उस के क़दम चूमती। नौकरियां वह ऐसे बदलता जैसे कपड़े बदल रहा
हो। शुरू में आदर्श , विचारधारा
, नैतिकता , शुचिता की भी बात करता था।
पर धीरे - धीरे सब तिरोहित होती गई। सफलता की नदी में सब मछली की तरह कूदती-फांदती
, बहती किसी मछुआरे के जाल
में फंसती गईं। लेकिन यह सब तब न उसे दिखा न किसी ने दिखाया। तब तो पैसा था। महल
जैसा घर था। सुख-सुविधाओं की झड़ी थी। पैसा था , शराब था , औरतें
थीं। दूसरों के दुःख या सुख की चिंता से वह बहुत दूर था।
सफलता की सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते वह एक दिन रिटायर हो
गया। वृद्ध हो गया।
उम्र के मध्य में जैसे वह सुख की नदी में नहाता था
, उम्र के आख़िरी पड़ाव में वह
दुःख की नदी में नहाने लगा। दुःख की नदी में डूबने-उतराने लगा। परिवार संभाले नहीं
संभल रहा था। पत्नी बीमार रहने लगी। ऐसे जैसे बीमारियों का भंडार बन गई थी। ऐसी
कौन सी बीमारी थी जो उसे न हो। बच्चों को अच्छे स्कूल और कालेज में पढ़ाया था। पर
बेटा घनघोर शराबी निकल गया। सिगरेट फूंकता , मसाला खाता , शराब
पीता। यही उस की ज़िंदगी थी। रही-सही कसर बेटी ने निकाल दी। जाने किस के साथ घर छोड़
कर भाग गई। उस का सारा सामाजिक और आर्थिक साम्राज्य एक क्षण में किसी मिट्टी की
दीवार की तरह भहरा कर गया। वह लोगों से अकसर कहता रहता था कि असल कमाई तो बच्चे ही
होते हैं। बच्चे अच्छे निकल जाएं तो वही सब से बड़ी कमाई हैं। नालायक़ निकल जाएं तो
सारी कमाई व्यर्थ। कोई मतलब नहीं।
उस का कहा , अब उस के ही गले में किसी सांप की तरह डस रहा था। पर वह करता भी तो
क्या करता।
सब से बड़ा सवाल उठा कि बीमार पत्नी की सेवा कैसे
हो। बीमारियों से उसे घबराहट होती है। सेवा भाव उस में नहीं है। वह ख़ुद तो चाहता
है कि कोई उस की सेवा करे। पर दूसरों की सेवा करना उस के स्वभाव में नहीं। शुरू
में पत्नी की सेवा के लिए उस ने नर्स रखी। पर काम वाली और नर्स के झगड़े बढ़ते जाते।
वह कभी काम वाली बदलता। कभी नर्स बदलता। परेशान हो गया। फिर उसे पता चला कि शहर
में एक ऐसा अस्पताल है जहां वृद्ध लोगों को ही रखा जाता है। उन की बीमारी , भोजन , देखरेख , सफाई , नहलाना , धुलाना सब होता है। इस के
लिए सत्तर हज़ार महीने का पैकेज था। दवा और विशेषज्ञ डाक्टर का खर्च अलग। उस ने
पत्नी को उसी अस्पताल में भर्ती करवा दिया। पैसे खर्च होते थे पर सेवा से छुट्टी
थी। पत्नी से मिलने जाता रहता था। पत्नी ख़ुश नहीं थी इस अस्पताल में आ कर। लेकिन
दुःखी भी नहीं थी। क्यों कि उस का रूटीन जीवन आसान हो गया था।
एक रात को अस्पताल से फ़ोन आया कि पत्नी की तबीयत
ज़्यादा बिगड़ गई है। आ जाइए। ड्राइविंग कब का छोड़ चुका था। ड्राइवर नहीं था। वह
परेशान हो गया। रात के दो बजे थे। वह एक पड़ोसी के घर गया। काल बेल बजाता रहा। उस
का कुत्ता भौंकता रहा पर दरवाज़ा नहीं खुला। घर लौट कर दो-तीन दोस्तों को फ़ोन किया।
किसी का फ़ोन नहीं उठा। ओला , ऊबर बुक
करना कभी सीखा ही नहीं। ज़रूरत ही नहीं पड़ी कभी। पलट कर उस ने अस्पताल को फ़ोन किया।
अपनी दिक़्क़त बताई और कहा कि कोई एम्बुलेंस ही सही भेज दें ताकि वह आ सके।
एम्बुलेंस का चार्ज दे देगा। थोड़ी देर में एम्बुलेंस आ गई। वह सुबह के चार बजे
अस्पताल पहुंचा। पता चला कि पत्नी का देहांत दस मिनट पहले ही हो गया। आख़िरी समय न
पत्नी उसे देख सकी , न वह उसे
देख सका। न कोई बात हो पाई। कोई दुःख-सुख साझा नहीं कर सके दोनों। वह पत्नी का हाथ
थामे बड़ी देर तक बैठा रहा। रो भी नहीं सका। आंखें जैसे पथरा गई थीं। सुबह होने का
इंतज़ार करता रहा। फिर अस्पताल वालों से ही कहा कि वह अकेला है सो अंतिम क्रिया
कर्म की व्यवस्था भी वही लोग करवा दें। अस्पताल वालों को इस का अभ्यास था। वह अकसर
ऐसे अकेले लोगों की व्यवस्था करने के अभ्यस्त थे। अकेले पड़ गए , पैसों वालों का ही अस्पताल
था भी यह।
सुबह होने पर उस ने कुछ दोस्तों , परिजनों और रिश्तेदारों को
वाट्सअप कर के सूचना दे दी। अंत्येष्टि का समय और जगह भी बता दिया। तीन-चार दोस्त
और एक रिश्तेदार अस्पताल आ गए। कुछ ने फ़ोन किया। कुछ ने वाट्सअप पर ही श्रद्धांजलि
दे कर छुट्टी ले ली। सोसाइटी के लोगों को भी वाट्सअप ग्रुप पर सूचना दे दी।
वाट्सअप ग्रुप पर श्रद्धांजलियों का तांता लग गया। पर श्मशान घाट पर आए सिर्फ़ दो
लोग। कुछ परिवारीजन ज़रूर आ गए। विद्युत् शवदाह में पत्नी का दाह संस्कार कर घर आ
गया। परिजनों के आ जाने से शोक आदि की ट्रेडिशनल चीज़ें भी हो गईं। लोगों ने सलाह
दी कि बारह दिन वाला श्राद्ध वग़ैरह करने की जगह आर्य समाजी तरीक़ा ठीक रहेगा। किसी
के पास रुकने के लिए समय नहीं था। उस ने सलाह मान ली। तीन दिन में सब कुछ हो गया।
परिजन चले गए।
पत्नी भले अस्पताल में रहती थी। पर एक भरोसा था कि
कोई साथ है। अब यह भरोसा भी टूट गया था। लोग कहते हैं बुढ़ापे में तीन ही चीज़ काम
आती है। स्वास्थ्य , पैसा और
पत्नी। पत्नी चली गई। पैसा भी अब बहुत नहीं रह गया था। प्राइवेट नौकरी के कारण
पेंशन नहीं थी। बचत और इनवेस्टमेंट से काम चल रहा था। स्वास्थ्य भी लड़खड़ा चुका था।
परिवार का कोई साथ नहीं था। वह अपनी
ज़िंदगी से ऊब गया था। पूरी तरह ऊब गया था। अकेलापन उसे काटता था। उस ने अपनी डायरी
में लिखा :
मन करता है , श्मशान घाट पर जा कर लेट जाऊं l कोई आग लगा दे l
भीगना
सावन की शिवरात्रि है और कवि कालिदास के नगर में
वह भीग रहा है। लाइन में लग कर भीग रहा है। अनायास और औचक। यह मनोहारी है। बारिश
में भीगना उसे पसंद है। बेहद पसंद। बस भीगने के बाद होने वाले खांसी , जुकाम और बुख़ार से वह डरता
है। बचपन में तो वह बारिश में भीगने पर मां से पिटता था। पर तब भी जब कभी बारिश
होती तो किसी न किसी बहाने घर से निकल जाता बारिश में भीगने के लिए। तब मां पीटती
थी , अब खांसी , जुकाम और बुखार मिल कर
पीटते हैं। इन के पीटने में मां की मिठास नहीं होती। इस लिए भी बचता है अब बारिश
में भीगने से। लेकिन अभी और बिलकुल अभी जयकारे और बारिश के बीच वह लाइन में है।
भारी भीड़ में है। बचना , बारिश से
बचना लगभग नामुमकिन है।
अमूमन वह लाइन में लगने से बचता है। भीड़ में जाने
से बचता है। भारी भीड़ में जाने से तो डरता है। पर आदमी की जैसे प्रवृत्ति है कि
भीड़ की तरफ दौड़ता है और चाहता है कि उसे रास्ता मिले। पर रास्ता मिलता नहीं है भीड़
में। कैसी भी लाइन हो , कैसी भी
भीड़। इस लिए बेतरह बचता है। अकसर एकांत और निर्जन ढूंढता है। भक्ति में श्रद्धा
तभी उमड़ती है। लंबी लाइन और भारी भीड़ सारी श्रद्धा छीन लेती है। आदमी थक कर चूर हो
जाता है। टूट जाता है। सुविधाजीवी आदमी के लिए यह लाइन और भीड़ यातना बन जाती है।
लेकिन जयकारे और बारिश के बीच वह लंबी लाइन में है। बहुत भारी भीड़ में है। लाइन भी
अजगर की तरह है और भीड़ भी भक्तों की है। न आगे बढ़ा जा सकता है , न पीछे लौट कर वापस हुआ जा
सकता है। लोहे की ख़ूब पतली ढाई - तीन फ़ीट चौड़ी बैरिकेटिंग ही कुछ ऐसी है लोगों को
पंक्तिबद्ध करने ख़ातिर। बैरिकेटिंग भी मुड़ - मुड़ कर है। ऐसे जैसे कोई सर्प अपने को
बटोर कर बैठा हो। यह बैरिकेटिंग चींटी की तरह आगे बढ़ने तो देती है , वापस लौटने नहीं देती। ऐसे
जैसे किसी नदी की धार हो। आदमी उलटी तैराकी तो कर सकता है , नदी की धारा उलटी नहीं बह
सकती। बरसते बादल से भरे आसमान के नीचे यह असहाय होना कितना तो रोमांचकारी भी है।
इतना कि कुछ भी अपने हाथ में नहीं है। जैसे बारिश , बादल के हाथ नहीं। बादल का रिमोट जाने किस हाथ
में। बारिश धीमी हो जाती है। तेज़ हो जाती है। थम जाती है। फिर अचानक बरस जाती है।
बरसती ही जाती है। मुसलसल।
क्षणे रुष्टा: क्षणे तुष्टा: रुष्टा तुष्टा क्षणे-क्षणे।
अव्यवस्थित चित्तानाम् प्रसादोऽपि भयंकर:।।
वाली स्थिति है। गरज यह कि क्षण-क्षण में रुष्ट और
तुष्ट होने वालों की प्रसन्नता भी अति भयंकर होती है.! बारिश और बादल के बीच यही
चल रहा है। क्षणे रुष्टा:
क्षणे तुष्टा:
रुष्टा तुष्टा
क्षणे-क्षणे। जाने यह ठीक बगल में मंद - मंद बह रही , क्षिप्रा नदी का अवसाद है
या कालिदास का रुदन। कि कालिदास की प्रतीक्षा में बैठी उन की प्रेयसी मल्लिका के
आंसू। वह नहीं जानता। पर वह भीग रहा है। आस्था में कम , अव्यवस्था में ज़्यादा। उस
का मन बारंबार कह रहा है कि वह लाइन तोड़ कर भाग निकले। पर भागने का कोई रास्ता
नहीं मिल रहा। भीड़ का अजगर चारो तरफ है। उज्जैन का काल भैरव मंदिर जैसे उस की
परीक्षा का कुरुक्षेत्र बन गया है।
जगह-जगह से आए तरह-तरह के लोग हैं। वृद्ध भी , नन्हे बच्चे भी। एक नन्हा
बच्चा रह-रह कर बम-बम भूले का जयकारा लगाता रहता है। उस की मम्मी बार-बार सुधारती
रहती है बम-बम भोले ! वह बच्चा एक बार बम-बम भोले बोलता है फिर दुबारा बम-बम भूले
! यह भूले और भोले में उस का भोलापन उसे भा जाता है। बच्चा भी भीग रहा है और वह भी
, बारिश में सभी भीग रहे हैं।
लेकिन वह तो उस अबोध बच्चे के भूले की अबोधता में भीग रहा है। भीगता ही जा रहा है।
बारिश में तो वह बहुत भीगा है ,
भीगता ही रहता है पर बम-बम भूले की अबोधता में ऐसे , इस तरह भीगने का कभी अवसर
ही नहीं मिला था , जो आज
मिल रहा है। यह अवसर भी अवर्णनीय है। वह शिशु इस भारी भीड़ में छटकते हुए , कूदते हुए चल रहा है। बम-बम
भूले बोलता हुआ। बच्चा
दरअसल शब्द नहीं , अर्थ समझ
रहा है। भीग रहा है बारिश में भी , भोले की जय-जय में भी , भूले बोलता हुआ।
बनारस से भी कुछ युवा लड़कों का जत्था है। बिलकुल
बनारसी अंदाज़ में हर-हर महादेव का जयकारा लगते हुए। ॐ नमः पार्वती पतये हर हर महादेव ! बोलते हुए। बिलकुल बम-बम अंदाज़ है।
ग़रीब भी हैं , अमीर भी।
महाराष्ट्रियन , राजस्थानी
, गुजराती , मलयाली , तमिलियन , कन्नड़ , बिहारी हर कहीं से लोग हैं।
कुछ अकेले हैं , दो लोग
हैं , सपरिवार हैं तो कुछ जत्थे
बनाए हुए हैं। स्त्री-पुरुष सभी के लिए एक ही लाइन है। सो कुछ लाइनबाज़ भी हैं।
युवा स्त्रियों से अनायास का अभिनय करते हुए , सायास सटते हुए। कुछ स्त्रियां भीड़ के कारण बर्दाश्त कर ले रही हैं , कुछ बिदक कर भी चुप हैं तो
कुछ भड़क भी रही हैं। अचानक एक लड़की किसी पर भड़कती हुई बोलती है , हिंदू हो कि जेहादी !
' हिंदू
हूं बहन ! ' वह हाथ
जोड़ते हुए हकलाता है , ' माफ़ करना
! ' कह कर वह ठिठक जाता है।
लड़की अपने परिवारीजन के साथ आगे बढ़ जाती है। वह धीरे-धीरे चलते हुए पीछे होता जाता
है। अचानक एक पेड़ मिलता है , बीच
बैरिकेटिंग में। पेड़ के कारण वहां थोड़ी अतिरिक्त जगह भी है। दो-तीन लोग वहां भी
प्रसाद बेचते मिलते हैं। पत्नी कहती हैं , ' हम लोगों ने प्रसाद तो ख़रीदा ही नहीं। '
' यहां का
मुख्य प्रसाद क्या है जानती हो ?
'
' नहीं। '
' शराब है।
' वह जोड़ता है , ' ले आऊं ?
' नहीं-नहीं
! ' पत्नी बिदकती हुई बोलती है।
फिर भी वह इन युवाओं से प्रसाद का एक लड्डू वाला
डब्बा और फूल ले लेता है। डलिया सहित। बिना मोलभाव के। यह युवा छाता भी बेच रहे
हैं। पूछता है वह पत्नी से कि ,
' छाता ले लें ?
'
' बुरी तरह
भीग तो गए हैं। अब क्या फ़ायदा ?
'
फिर भी वह मोलभाव में लग जाता है। दो सौ वाला छाता
, छ सौ का दे रहा है। कुछ भी
कम करने को तैयार नहीं है। वह हाथ जोड़ लेता है। वापस मुड़ता है तो पाता है कि पत्नी
आगे निकल गई है। दिखती नहीं। फूल और लड्डू के पैसे दे कर बिना छाता लिए वह आगे
बढ़ता है। मद्धिम बारिश फिर तेज़ हो गई है। वह तेज़ी से आगे बढ़ना चाहता है। बारिश से
भी ज़्यादा तेज़। लेकिन भीड़ है कि रोक-रोक लेती है। बढ़ने नहीं देती। भीड़ जैसे यकायक
ठहर सी गई है। एक सूत नहीं बढ़ रही। बम-बम भोले , हर-हर महादेव का जयकारा तेज़-तेज़ शुरू हो जाता है।
बारिश से भी ज़्यादा तेज़। लेकिन उसे न तेज़ बारिश की चिंता है , न जयकारे का जोश है। चिंता
है पत्नी की। चिंता है कि भीड़ की भगदड़ में पत्नी कहीं चोटिल न हो जाए। कहीं फिसल
कर गिर न जाए। भीड़ में कुचल न जाए। गुम न हो जाए। उस से उस के बुढ़ापे का सहारा न
छिन जाए। बुढ़ापे की सब से बड़ी छड़ी , सब से बड़ा सहारा पत्नी ही तो होती है। वह इस लिए बहुत परेशान है।
जयकारा लगा रही भीड़ से हाथ जोड़ता है कि उसे आगे जाने दिया जाए। जयकारा लगा रहे
युवकों से हाथ जोड़ कर कहता है ,
' मुझे आगे जाने दीजिए। मेरी पत्नी आगे निकल गई हैं। उन के पास तक जाना
है ! '
' हां-हां
अंकल आइए। ' एक युवक
तिरछे खड़े हो कर रास्ता बनाते हुए कहता है , ' घबराइए नहीं आंटी मिल जाएंगी। ' वह ही नहीं , और भी
युवा रास्ता बनाते हुए उसे आगे बढ़ने देते हैं। वह तेज़ी से आगे बढ़ता जाता है। थोड़ा
और आगे जाते ही पत्नी दिख जाती हैं। वह चैन की सांस लेता है। मिलते ही कहता है , ' हम तो घबरा ही गए थे। चलो
तुम मिल गई। अच्छा हुआ। '
' हम तो आप
के साथ खड़े ही थे। अचानक भीड़ का रेला आया। मुझे भी आगे धकेल दिया। नहीं बढ़ती आगे
तो लोग धकेल कर गिरा देते। भीड़ के पांव तले कुचल जाती। '
' अच्छा
किया। ' वह बोला , ' पर बता कर आगे बढ़ी होती। '
' समय कहां
मिला बताने के लिए ! ' वह बोली , ' भीड़ ने कुछ कहने-सुनने का
समय कहां दिया ? '
' चलो कोई
बात नहीं। '
भीड़ फिर ठिठक गई है। ऐसे कि जैसे बिजली चली गई हो।
लाइट , पंखे , ए सी सब बंद। लेकिन बारिश
बंद नहीं हुई है। बारिश और जयकारा दोनों ही ललकार रहे हैं। बम-बम भूले करते हुए वह
अबोध बच्चा फिर दिख गया है। लोगों का जयकारा अलग है , उस का अलग। नितांत अलग। जब
लोगों का जयकारा स्थगित होता है ज़रा देर के लिए , उस का बम-बम भूले सुनाई देने लगता है।
बीच बारिश भीड़ रुकी हुई है। कुछ लोगों के बीच बात
शुरू हुई है। किसी ने पूछा है ,
' कहां से ? '
' उत्तर
प्रदेश। ' वह पूछता
है , ' आप ? '
' हम भी
उत्तर प्रदेश , बनारस
से। और आप ?'
' अयोध्या
से। ' कहते हुए वह तनिक सकुचाता
है।
' लाज नहीं
आती ?'
' आती तो
है ! ' वह शर्म से धंस जाता है।
कहता है , ' पर क्या
करें ! जाने कैसे गड़बड़ा गया। '
' गड़बड़ा
नहीं गया। ' बनारसी
बिलकुल चढ़ाई करते हुए बोला , '
बेइज्जत करवा दिया देश को। नाक कटवा दिया सनातन का। '
' अब क्या
कहें ? ' वह
बुदबुदाया।
' तुम
लोगों की हिम्मत कैसे होती है ,
कहीं जाने की और अयोध्या बताने की। '
वह दांत चियार कर चुप ही रहता है। लेकिन कोई एक
तीसरा आदमी है जो अपने को मुंबई का बताता है। बनारस वालों को धौंसिया लेता है , ' तुम बनारस वालों ने भी कम
पाप नहीं किया है। हराते - हराते रह गए पी एम को। ' बातचीत अब ज़्यादा बढ़ गई है। सभी पक्ष उत्तेजित हो
चले हैं। लगता है अब हाथापाई हो जाएगी। कि तभी एक नया आदमी बहस में कूद पड़ा , ' कोई राजनीतिक बात नहीं।
यहां बस बाबा की बात होगी। ' किसी
न्यायाधीश की तरह निर्णय देते हुए वह हर-हर महादेव का जयकारा लगाने लगता है। चारो
तरफ हर-हर महादेव का जयकारा होने लगता है। अचानक एक बनारसी जयकारा बदलते हुए बोलता
है : ॐ नमः
पार्वती पतये हर हर महादेव ! पार्वती पति महादेव को प्रणाम करने का यह जयकारा जैसे
बारिश को समझ आ गया है।
बारिश अब मद्धिम हो कर रिमझिम-रिमझिम है। ऐसे जैसे
कोई गीत गा रही हो। बूंदें ऐसे गिर
रही हैं गोया गा
रही हों : तनी धीरे
खोलो केंवड़िया, रस की
बूंदें पड़ें !
अयोध्या वाले युवा जानबूझ कर धीरे-धीरे पीछे होते
गए हैं। ताकि बात और आगे न बढ़े। बनारसी युवा झुंड में थे। कई थे। अयोध्या वाले
युवा दो ही थे। अगर मार पीट हो जाती तो इन्हें संभालने के लिए पुलिस भी पास नहीं
थी। लोहे की बैरिकेटिंग पुलिस को जल्दी आने भी नहीं देती।
घूंघट काढ़े औरतों का एक झुंड गीत गाते हुए चल रहा
है। लोकगीत गा रही औरतें भीगती हुई ऐसे गा रही हैं जैसे अपने गांव-घर से कोई
संदेशा लाई हों और बाबा काल भैरव के मार्फ़त शिव जी को समर्पित कर देना चाहती हों।
उन की सादगी , सरलता और
समर्पण भाव अविरल है। मोहित करता है। वह सोचता है कि शहर चाहे जितना भी धावा गांव
पर बोल ले , गांव
इतनी जल्दी मरने वाला नहीं है।
कुछ नव विवाहित जोड़े हैं। अलग-अलग मिलते रहते हैं।
दुल्हन चाहे कहीं की हो , उस का
पहनावा , हाव-भाव
बता ही देता है : ख़मोश लब हैं झुकी हैं पलकें दिलों में उल्फ़त नई नई है / अभी
तकल्लुफ़ है गुफ़्तुगू में अभी मोहब्बत नई नई है। यह युवा जोड़े इस बात को छुपाना
भी नहीं चाहते। कुछ माता-पिता के साथ दिखते हैं , कुछ बिना माता-पिता के। उन की चाहत , उन का इक़रार और इसरार इस
बारिश से ज़्यादा है। उन्हें बारिश की नहीं , अपनी चाहत की चिंता है। उन के चाल में फुटबाल सी उछाल है। वालीबाल
जैसी उछाह है। कोई - कोई तो गोल्फ़ की बॉल की तरह आसमानी उछाल लिए है। भीड़ , बारिश सब बेमानी है। आंखों
में उमंग , हाथों
में शराब की बोतल लिए यह विवाहित जोड़े जैसे कूद कर काल भैरव से मिल लेना चाहते
हैं। भीड़ चलते-चलते जब-तब अचानक थम-थम जाती है। ऐसे जैसे कोई सेना की परेड हो और
कमांडर बोल दे , ' परेड थम
! ' और लोग थम से जाते हैं। यह
सिलसिला रह-रह चलता रहता है। तो भीड़ एक बार थम जाती है। एक अधेड़ आदमी सपत्नीक
दर्शन के लिए आया है। फ़ोन पर किसी को बता रहा है , ' महाकाल में बहुत आसानी से दर्शन हो गया। एक दोस्त
की मदद से प्रोटोकाल मिल गया था। पुलिस वाला बिना किसी लाइन के ले जा कर सीधे
महाकाल के दर्शन करवा दिया। शिवलिंग के पास जा कर शिव जी को स्पर्श तो नहीं करने
दिया गया। बेलपत्र आदि भी नहीं चढ़ाने दिया। शिवलिंग तक जाने की किसी को अनुमति अब
नहीं है। पर शिवलिंग के सामने शिव जी के नंदी के पास बिठा दिया हम दोनों को। लगभग दस
मिनट तक बैठ कर महाकाल के दर्शन कर विभोर हो गए। वह बता रहा था कि पर भैरव बाबा के
यहां प्रोटोकाल की व्यवस्था ही नहीं है क्या करें। लाइन में फंसे पड़े हैं। लंबी
लाइन। जब यहां आए तो लंबी लाइन देख कर दोस्त को बताया कि यहां भी प्रोटोकाल दिला
दे। तो वह बोला कि ज़्यादा दिक़्क़त हो तो हाथ जोड़ कर वापस आ जाइए। लेकिन वाइफ बोलीं
कि जब यहां तक आ गए हैं तो भैरव बाबा से मिल कर ही हाथ जोड़ते हैं। अब लगे हैं लाइन
में। जैसे सारा देश ही आ गया है दर्शन को ! एक दूसरा आदमी बता रहा है , यहां तो कुछ भी नहीं है।
तिरुपति गया था। आठ घंटे लाइन में लगे रहे , तब दर्शन हुआ। थक कर चूर हो गए। अनेक लोग हैं , अनेक क़िस्से। वैष्णो देवी
से लगायत महाकुंभ तक के।
एक आदमी है लंबा सा। रेन कोट पहन कर आया है। सिर
से ले कर पांव तक। उस के आगे-आगे चल रहा है। आगे एक कंधा पकड़ कर चल रहा है। कुछ भी
हो जाए , उस का
कंधा नहीं छोड़ता। उस की परछाईं की तरह चल रहा है। हिलोरें मारता हुआ। कई सारे जोड़े
हैं जो चिपक कर चल रहे हैं। कुछ नवविवाहित हैं। लासा की तरह एक दूसरे से लिपटे
हुए। चिपटे हुए। युवा स्त्रियों का पहनावा , हाथ में भरी चूड़ियां , लचक-लचक कर चलना ,
सिहरना और इस बारिश में भी बेख़बर चल रही हैं। मादकता ओढ़े हुई। पर लाज
भी ओढ़े हुई हैं। उच्छृंखल नहीं हो रहीं। पर यह आदमी तो लासा नहीं , फेविकोल की तरह चिपका हुआ
चल रहा है। वह पत्नी से बुदबुदा कर कहता भी है कि यह तो अति किए हुए है। लेकिन
पत्नी ऐसी बातें नहीं सुनतीं। टाल जाती हैं। सर्वदा की तरह यहां भी टाल गई हैं।
पत्नी को लगता है कि ऐसी बातें करने और सुनने से पाप पड़ता है। और जब अति की भी अति
हो जाती है तो वह किसी तरह उस व्यक्ति से आगे निकल लेता है। थोड़ी देर बाद वह पीछे
मुड़ कर उसे देखता है तो पाता है कि जिस के कंधे से चिपका वह लंबा व्यक्ति चल रहा
है , वह भी स्त्री नहीं , पुरुष ही है। फिर थोड़ी देर
बाद वह पाता है कि वह लंबा व्यक्ति मज़बूरी में उस के कंधे से चिपका चल रहा है। उस
के एक पांव में कुछ समस्या है। यह देख कर वह ख़ुद को धिक्कारता भी है। और जगह मिलते
ही पत्नी का हाथ पकड़ कर धीरे से आगे , और आगे बढ़ जाता है। भीड़ अच्छे अच्छों को अंधा बना देती है।
बारिश अचानक तेज़ हो गई है। मोटी - मोटी बूंदें
आवाज़ भी बहुत तेज़ कर रही हैं। सावन भले है पर क्षिप्रा नदी के तट पर यह घनघोर
बारिश आषाढ़ के दिन की याद दिलाती है। कालिदास की प्रेयसी मल्लिका की याद दिलाती है।
आषाढ़ के पहले दिन की बारिश में भीगते हुए ही सहसा दोनों प्रेम में पड़ जाते हैं। वह
सोचता है कि कालिदास और मल्लिका दोनों बारिश में न भीगते तो क्या प्रेम में नहीं
पड़ते ? क्या तो प्रेम था। कि
मल्लिका कालिदास के लिए अपने हाथ
से सिल कर कोरे भोजपत्र का एक ग्रंथ तैयार करती है कि जब कालिदास से मिलेगी तो
उन्हें देगी कि इस पर वह अपना कोई महाकाव्य लिखें। पर मिलन की प्रतीक्षा लंबी है।
मिलते भी हैं कालिदास मल्लिका से तो तब तक वह भोजपत्र जगह-जगह से कटने और फटने लगा
है। मल्लिका अफ़सोस से यह बात बताती है। लेकिन कालिदास देखते हैं कि भोजपत्र जगह -
जगह स्वेद कण से मैले हो गए हैं। पानी की बूंदें पड़ी हैं। फूलों की सूखी पत्तियों
ने अपने रंग छोड़ दिए हैं। कई जगह मल्लिका के दांत गड़ने के निशान हैं। कालिदास कहते
हैं मल्लिका से कि यह पृष्ठ कोरे नहीं हैं। यह जो जगह - जगह पानी की बूंदें हैं , पानी की बूंदें नहीं , तुम्हारे आंसुओं की बूंदे
हैं। तुम्हारे आंसुओं की बूंदों ने , आंखों की कोरों ने कई-कई सर्ग लिख दिए हैं। अनंत सर्गों के साथ तुम
इन पर महाकाव्य की रचना कर चुकी हो। यह पृष्ठ कोरे नहीं हैं। महाकाव्य की रचना हो
चुकी है।
तो अपने ग्राम प्रांतर में बैठी क्या मल्लिका अभी भी
महाकाव्य रच रही है , उन
भोजपत्रों पर अपने आंसुओं से। यह बारिश नहीं , मल्लिका के आंसू हैं ? जो उज्जैन तक आ रहे हैं। जहां कालिदास उपस्थित हैं। क्या कश्मीर भी
जा रहे होंगे यह बादल बरसने के लिए जहां कालिदास ने शासन किया।
क्या पता ?
लेकिन मल्लिका के आंसू हैं कि ख़त्म ही नहीं होते।
अब तक तमाम पड़ाव पार करते हुए वह मंदिर की सीढ़ियों
पर उपस्थित है। हर - हर महादेव का जयकारा ज़ोर पकड़ चुका है। मल्लिका के आंसू और
महादेव के जयकारे में जैसे होड़ सी लगी हुई है। सीढ़ियों के ऊपर छत है। लेकिन
सीढ़ियां पानी से भीगे हुए लोगों के निरंतर आते जाने से गीली हो गई हैं। फिसलन हो
गई है। बहुत संभल-संभल कर वह चल रहा है। पत्नी का हाथ पकड़ लिया है। अपने से ज़्यादा
पत्नी को संभालने की फ़िक्र है। पत्नी की हड्डियां बहुत कमज़ोर हैं। गिर गई तो
कठिनाई बढ़ जाएगी। अलग बात है पत्नी को इस की फ़िक्र नहीं है। भक्ति की भावना , महादेव का जयकारा और मंदिर
में पहुंच जाने का उत्साह है। गिरने - पड़ने की कोई चिंता नहीं। दर्शन करने का नंबर
लगभग आ चुका है। स्त्री और पुरुष की लाइन मंदिर के कार्यकर्ताओं ने अलग - अलग करवा
दी है। लोगों के हाथ में शराब की बोतलें हैं। हमारे हाथ में पुष्प और मिष्ठान। चढ़ाने के लिए सर्वदा की तरह पुष्प और
लड्डू की डलिया पत्नी को थमा देता है। हाथ में शराब की बोतल न देख कर पुजारी
मुस्कुराता है। शीश झुकाने पर पीठ पर आशीष जमा कर माथे पर टीका लगा देता है। हाथ
में प्रसाद दे देता है। एक कार्यकर्त्ता धीरे से सब को आगे की तरफ बढ़ा देता है।
भीड़ का दबाव बहुत है। ज़रा नीचे और मंदिर हैं। वहां दर्शन आसान है। भीड़ कम है।
मंदिर से निकल कर लोग पीछे की सीढ़ियों से नीचे उतर रहे हैं। सीढ़ियों के बाद नीचे
सड़क नई बनी हुई है। उखड़ी हुई सड़क की छोटी-छोटी गिट्टियां पांव में चुभ रही हैं।
नंगे पांव चलते नहीं बन रहा है। अभ्यास नहीं है इस तरह , नंगे पांव चलने का। तब तक
ड्राइवर दिख गया है। कहता है सर ,
यहीं रुकें। कार यहीं ले आता हूं। वह कार ले कर आता है। पर चप्पल एक
दुकान पर हैं। जा कर लाता है। मल्लिका के आंसू सहसा थम गए हैं। पूरा बाज़ार भीग कर
जैसे सहमा हुआ सा दिखता है। लेकिन लोगों में उल्लास है। मंदिर जाने वालों का तांता
अभी भी लगा हुआ है। महादेव के जयकारों का सिलसिला बढ़ता ही जा रहा है। बुरी तरह
भीगा हुआ एक आदमी कह रहा है , शिव जी
ने सारी गंगा यहीं उतार दी है। यह भीगना भी अलग - अलग है। आंसू है , बारिश है और गंगा भी। वह भी
पौराणिक नदी क्षिप्रा के तट पर। कुंभ ऐसे ही लगता है। दुनिया ऐसे ही जगमग होती है। इस जगमग में
भीगना ही महत्वपूर्ण है। कोई प्रेम में भीग रहा है , कोई भक्ति में। कोई दोनों में। बरसे कंबल भीजे
पानी वाली बात भी है। सुख बहुत
है इस भीगने में।
जय हो बाबा कालभैरव !
सहसा वह नन्हा बच्चा भी दिख गया है जो भरी भीड़ में
अकसर बम-बम भोले की जगह बम-बम भूले का जयकारा लगा रहा था। उसे देखते ही वह प्यार
से बोलता है : बम-बम भूले ! उस की मां मुस्कुराने लगती है। हंसने लगती है अपने
बच्चे के भोलेपन पर। मां की यह नैसर्गिक हंसी अनमोल है।
-4-
स्क्रिप्ट से बाहर
देवदार के वृक्ष और पर्वतमाला से घिरे शिमला में भीड़ बहुत है।
जगह - जगह ट्रैफिक जाम। रिज मैदान पर वह टहल रहा है। यहां कोई ट्रैफिक जाम नहीं
है। क्यों कि कोई भी वाहन प्रतिबंधित है। पर मैदान भरा हुआ है। शहर की ऊंचाई पर
बने इस मैदान में दूर - दूर तक कोई दुकान नहीं। सिर्फ़ घोड़े हैं। एक तरफ , चर्च की तरफ। चर्च पर म्यूजिकल प्रोग्राम जारी है। मैदान बड़ा
है। इस मैदान में मिट्टी नहीं है। मैदान क्या है सड़क है। सेब बागान छोड़ दीजिए तो
शिमला में इस से ज़्यादा खुली जगह कोई और नहीं। मैदान बड़ा है लेकिन यहां बना गेटी
थिएटर बहुत छोटा है। ब्रिटिश पीरियड का। लेकिन है ख़ूबसूरत। किसी लड़की की तरह।वह
थिएटर में घुस जाता है। कोई म्यूजिकल कार्यक्रम चल
रहा है। थोड़ी देर में बोर हो कर थिएटर से बाहर
निकल
कर सड़क पर आ जाता है। यह माल रोड है। लाल टीन की छत वाले ऊबड़ - खाबड़ मकानों को
देखते हुए वह सामने सड़क पार की दुकान से सिगरेट ख़रीदता है। सिगरेट सुलगाना चाहता
है। दुकानदार टोकते हुए रोकता है , '
यहां
मत सुलगाइए। '
' क्यों ? '
' चालान हो जाएगा। '
' कौन करेगा ? ' वह कहता है , ' पुलिस तो यहां नहीं
है। '
' सी सी कैमरे पर देख
रही है। सिगरेट सुलगाते ही आ जाएगी। पांच सौ रुपए का चालान। '
' तो ? '
' नीचे गली में उतर
जाइए , सीढ़ियों से। '
' ओ के। '
ऊपर सड़क जितनी साफ़ है ,
गली
की सीढ़ी उतनी ही गंदी। ज़्यादा गहरी। सीधी चढ़ाई वाली। चढ़ने - उतरने में सिगरेट से
ज़्यादा ख़ुद के सुलग जाने की आहट है। सो सीढ़ी नहीं उतरता। सिगरेट सुलगा नहीं पाता।
लौट कर दुकानदार को वापस दे देता है। बगल के बार में घुस जाता है। बोदका मंगा लेता
है। उसे मालूम है कि थोड़ी देर बाद उस का नाटक है। नाटक में उस की भूमिका है।
रोमेंटिक रोल। फिर भी वह बोदका पी रहा है। जानता है कि बोदका ज़्यादा बदबू नहीं
करती। ज़्यादा चढ़ती नहीं। लेडीज ड्रिंक इसी लिए कहा जाता है। धीरे - धीरे तीन पेग
हो जाता है। वाट्सअप पर डायरेक्टर का मेसेज आ गया है , ' कहां हो ? ' वह रिप्लाई नहीं
करता। थोड़ी देर बाद फिर मेसेज आता है , ' सभी आ गए हैं।
तुम्हीं मिसिंग हो। ' वह बार से बाहर आ
जाता है। लेडीज ड्रिंक झटका मार रही है। शायद जल्दी - जल्दी के चक्कर में पिकअप ले
रही है। वह नीबू पानी खोज रहा है। नहीं है ,
कहीं।
वह धड़धड़ा कर गेटी हाल में घुस जाता है। पहले वाला ही म्यूजिकल कार्यक्रम जारी है।
वह घड़ी देखता है। आधा घंटा बाद उस का नाटक है। डायरेक्टर को वाट्सअप करता है , ' मैं यहीं हाल में बैठा हूं। डोंट वरी। '
' ग्रीन रूम में आ जाओ।
'
वह मेसेज इग्नोर कर जाता है। बैठे - बैठे सो जाता है। भीड़
भड़भड़ा कर बाहर जा रही है। वह उठ कर खड़ा हो जाता है। मोबाईल देखता है। ग्रीन रूम
में पहुंचने के कई सारे मेसेज हैं। डायरेक्टर सहित कई और के। जनता बाहर जा रही है , वह स्टेज की सीढ़ी चढ़ रहा है। बोदका का असर उतर रहा है। वह ख़ुश
हो रहा है कि नशे में नहीं है। वह ग्रीन रूम में घुसता है। सब एक सुर में शुरू हो
जाते हैं , ' आ गया , आ
गया ! '
वह लड़की जिस के साथ उस का रोमेंटिक रोल है अचानक धीरे से बोलती
है , ' एक छोटा सा रिहर्सल एक बार फिर कर लें
अभी ? '
' कोई ज़रूरत नहीं। ' वह जोड़ता है , ' बहुत रिहर्सल कंफ्यूज
करता है। बस तुम अपने डायलॉग थोड़ा सा दोहरा लो अकेले में। ' वह भी उस से धीरे से बोला। वह मुंह फुला कर किनारे हो गई।
' अब नींद नहीं आती तो
तुम भी नहीं आते। ' वह बुदबुदा रही है , ' नींद आती तो सपने आते। सपने में फिर तुम आते। ' वह उसे लगभग घूरती हुई अपने डायलॉग दुहराने में लग गई है , ' कभी बिना सपने के भी आया करो ! '
मेकअप शुरू हो गया है उस का। मेकअप करने वाला पूछ रहा है , ' कुछ पी कर आए हो क्या ?
' वह
उसे अनसुना कर देता है। मेकअप ख़त्म होते ही एक साथी से कहता है , ' यार कहीं से नीबू पानी जुगाड़ सकता है ? '
' ईनो है लोगे ? ' वह धीरे से बोलता है ,
' डाइजीन
भी है और पुदीन हरा , हाजमोला भी। '
' चूतिए हो ! ' वह बुदबुदाता है।
' क्या ? ' वह भड़कते हुए पूछता है।
' कुछ नहीं। ' कह कर वह कास्ट्यूम पहनने लगता है। एक साथी की ज़ेब से सिगरेट
निकाल कर सुलगा लेता है। ख़ुद भी सुलगने लगता है। सिगरेट ने मूड ठीक कर दिया है और
बोदका का रंग भी खिल गया है। अब वह उत्साह में है। तनाव उतर कर कहीं शिमला की किसी
लाल टीन की छत पर आड़े - तिरछे पसर गया है।
' यार यह थिएटर है भले
नन्हा सा पर इस का आर्किटेक्ट और डिजाइन बहुत ही खूबसूरत है। '
' ठुमक चलत राम चंद्र
बाजत पैजनिया जैसा ! ' एक दूसरा साथी बात
पूरी करता है।
' बिलकुल ! ' यह तीसरा साथी है।
नाटक शुरू हो गया है। अब वह अपने सीन की प्रतीक्षा में है।
स्क्रिप्ट में अपने डायलॉग पढ़ता हुआ। सिगरेट फूंकता हुआ। सोचता है कि काश वह यह
सिगरेट माल रोड या रिज मैदान पर टहलते हुए बेधड़क पी सकता। जैसे अपने शहर की सड़कों
और पार्कों में पी लेता है। पर यहां तो कर्फ्यू है सिगरेट पर। नैनीताल की माल रोड
पर , मसूरी की माल रोड पर , दिल्ली की माल रोड पर तो सिगरेट के लिए कर्फ्यू नहीं है। फिर
शिमला में ही क्यों ?
उस का सीन आ गया है। सिगरेट बुझा कर वह खड़ा हो जाता है। स्टेज
पर पहुंचते ही उसे माशूक़ा के साथ गलबहियां करनी है। रोमांस की बरसात करनी है।
रूठना , मनाना है। मासूम प्रेमी की भूमिका है।
जिसे उस की माशूक़ा ही चुनती है , प्रेम के लिए। वह
नहीं। उसे बस प्रेम नदी में बहते रहना है। ऐसे जैसे कोई भरी नाव चलती है नदी के
किनारे - किनारे। चलना है और बहना है प्रेम में। वह स्टेज पर है। माशूक़ा का डायलॉग
चल रहा है। वह भावातिरेक में है उसे देखता हुआ और सोच रहा है कि काश एक पेग बोदका
अभी मिल जाती। वह प्यार करते हुए सिप लेता रहता धीरे - धीरे। उस के नयनों में
झांकता हुआ। उस के कपोल पर किंचित अपना कपोल रखते हुए। अधरों से अधर भी मिला लेता।
भले यह स्क्रिप्ट में नहीं है।
' तुम सपनों की बात
क्यों करती हो , मैं हूं न तुम्हारे साथ , तुम्हारी हर सांस में ! '
उसे
हौले से बाहों में भरते हुए , प्रेम की उम्मीद की
रौशनी भरते हुए कहता है , ' कितना तो बेचैन हूं
किसी नदी की तरह तुम्हारे प्यार के सागर में समा जाने के लिए। ' उसे आहिस्ता से चूम लेता है। लड़की ठिठक जाती है। बांहों में
उलझी हुई , अफनाई हुई , फुसफुसाती है , ' तुम होश में नहीं हो।
यह स्क्रिप्ट में नहीं है। '
' होश कहां रहता है , जब तुम्हें देखता हूं। '
परदे के पीछे बैठे लोग यह डायलॉग सुन कर हैरत में हैं।
प्रांप्टर बुदबुदाता है , ' स्क्रिप्ट से बाहर
निकल गया यह तो। ' डायरेक्टर कहता है , ' लेकिन ठीक जा रहा है। '
वह
कहता है , ' डायरेक्टर को ही नहीं , एक्टर को भी कभी - कभी अधिकार होता है स्क्रिप्ट से बाहर
निकलने का। कुछ और जोड़ने का। '
लड़की ने भी डायलॉग नया गढ़ लिया है , ' इसी लिए तो मैं ख़ुद को तुम्हारे भीतर खोजती रहती हूं। '
' लगता है इन दोनों का
लफड़ा आफ स्टेज भी चल रहा है। ' प्रांप्टर बुदबुदाता
है। पर अगले ही सीन में दोनों स्क्रिप्ट में लौट आते हैं। सीन चटक हो गया है। ऐसे
जैसे कोई हिरणी कुलांचे मार रही हो , लड़की उछलती हुई चल
रही है। जैसे कोई तनवंगी नदी। पहाड़ी नदी। जिस पर जल का कोई भार न हो। सिर्फ़ धारा
हो। पूरे वेग में बहती धारा। उस के देहाभिनय में लोच आ गया है। मुखाभिनय में प्रेम
की ललक। नयनों में कोई नदी उतर आई है। नयनों की नदी में जैसे कोई बाढ़ आ गई है। बाढ़
की छटपटाहट में डूबे नयन से जैसे काजल बह जाना चाहता है। परदे के पीछे बैठा
डायरेक्टर बुदबुदाता है , ' एक्सीलेंट ! ' प्रांप्टर और अन्य साथी ख़ामोश। वह सोच रहा है कि क्या यह भी
बोदका पी कर आई है ?
सीन बढ़ता जा रहा है। स्क्रिप्ट से बाहर। सीन ख़त्म होने पर वह
सीधे ग्रीन रूम में घुस जाता है। प्रांप्टर टोकता है , ' बाहर भी यह कृष्णलीला चल रही है क्या ? ' वह अनसुना कर देता है। डायरेक्टर देखता है प्रशंसा भाव में पर
कुछ कहता , टोकता नहीं। थोड़ी देर बाद फिर सीन है।
चिक - चिक में वह मूड ख़राब नहीं करना चाहता। सिगरेट सुलगा कर स्क्रिप्ट पर आंख गड़ा
देता है। लड़की आती है। वह कुछ कहे-कहे उसे इशारे से स्क्रिप्ट पढ़ने को कह देता है।
उस के गाल और बाल सहलाती हुई लड़की भी स्क्रिप्ट में घुस जाती है। ग्रीनरूम में
उपस्थित लोग इस दृश्यबंध को भी नोट कर रहे हैं , ललचाई
हुई आंखों से। कनखियों से। थोड़ी देर में उस का सीन फिर आ गया है।
अब की वह दोनों स्क्रिप्ट में हैं। और लय में भी। सीन ख़त्म
होने को है। अचानक वह फिर स्क्रिप्ट से बाहर हो गया है। पूछता है नायिका से , ' कभी किसी घर में दो पल्ले वाला दरवाज़ा देखा है ? '
' देखा तो है। '
' जानती हो , इस में से कोई एक पल्ला भी ख़राब हो जाए तो दरवाज़ा बंद नहीं
होता। '
' अच्छा ! ' नायिका पुलक कर बोली।
' हमारा प्यार भी दो
पल्लों वाले दरवाज़े की तरह है। एक साथ बंद होने के लिए दोनों बेक़रार रहते हैं।
खुलते भी साथ हैं। ' वह बाहें फैलाते हुए बोला , ' आओ हम ऐसे ही बंद हो जाएं और उड़ जाएं नीले आकाश में किसी पक्षी
की तरह। ' नायिका भी किसी समुद्री लहर की उछलती
हुई आ कर उस की बाहों में झूल गई। धरती पर जैसे कोई
आकाश झुके , वह नायिका को बाहों में लिए आहिस्ता से
उस पर झुक गया है l दृश्य ऐसा बना जैसे
किसी धनुष की प्रत्यंचा खिंच गई हो l किसी बरसात में जैसे
हल्की धूप में इंद्रधनुष बन गया हो। ऐसे जैसे राजकपूर और नरगिस वाला आर के फ़िल्म
का लोगो। नाटकों में ऐसे दृश्यबंध से डायरेक्टर , एक्टर
परहेज करते हैं। ख़ास कर ऐक्ट्रेस। पर यह दृश्य हुआ। अनायास हुआ। स्क्रिप्ट से बाहर
हुआ।
पूरा गेटी हाल तालियों से गूंज गया। परदे के पीछे भी तालियां
बज रही थीं।
नाटक ख़त्म होने पर दर्शकों के सामने साथी कलाकारों के साथ
दर्शकों का आभार जताने के लिए खड़े हो कर हाथ जोड़े , सिर
झुकाए सोच रहा था कि स्क्रिप्ट से बाहर के
अनायास बोले गए संवाद क्या इतना कमाल कर सकते हैं। तीन
पेग बोदका का उतरता हुआ नशा क्या एक नया नशा दे सकता है कि संवाद अचानक नए सूझ
जाएं। ऐसा भी हो सकता है। कि एक अभिनेता स्क्रिप्ट छोड़ कर भी डायलॉग बोल दे।
अभिनेत्री साथ दे दे और दर्शक झूम जाएं। डायरेक्टर को ऐतराज भी न हो ! यह सब कुछ
तो हो गया है। छात्र था वह जब तब भी कोर्स से ज़्यादा कोर्स से बाहर की किताबें
पढ़ता था। पर यह लड़की ?
क्या पता !
प्रायोजक ने कलाकारों के रहने का प्रबंध शिमला शहर के किसी
होटल में करने के बजाय शिमला से कोई 25-30 किलोमीटर दूर किसी
गांव स्थित होटल में किया है। कहने भर को गांव है पर होटल चकाचक है। शहर के होटल
से बीस ही है , उन्नीस नहीं। दो दिन अभी शिमला में ही
रहना है। शिमला ही घूमना है। दो दिन बाद मुंबई जाना है , यही नाटक करने। चंडीगढ़ से फ़्लाइट है। रात हो रही है। कलाकारों
को होटल ले जाने के लिए बस रिज मैदान से एक किलोमीटर दूर खड़ी है। वहां तक पैदल ही
जाना है। रिज मैदान पार करते ही रास्ते में छुटपुट दुकानें हैं। सड़क के दोनों तरफ।
कहीं कुछ , कहीं कुछ। ऐसे जैसे कोई कस्बा हो। गंवई
दुकानें। छोटी - छोटी। ठेले - खोमचे भी। वह सोचता है , यह शिमला है ? सड़क किनारे भुट्टा
भूजती एक औरत दिखती है। वह भुट्टा ले लेता है। एक साथी दुकान - दुकान कुछ खोज रहा
है। मजा लेते हुए पूछता है वह , ' क्या खोज रहे हो ? '
' टी बैग ! '
' अरे चाय तो होटल में
भी मिल जाएगी। '
' हां , लेकिन मैं अपनी ही ब्रैंड पीता हूं। ' साथी की ख़ासियत है कि गले में अंगोछा लटकाए वह अपने बैग में
बड़ी सी गिलास , पानी की बोतल , शराब की बोतल , सिगरेट , लाइटर और टी बैग हमेशा अपने साथ रखता है। वह कहता भी रहता है , ' अपने बूते रहता हूं। किसी और के भरोसे नहीं। '
होटल में कॉकटेल डिनर की तैयारी है। प्रायोजक ने बढ़िया
व्यवस्था कर रखी है। हर कोई अपने - अपने जाम में व्यस्त है। कोई - कोई मोबाईल में
भी। डायरेक्टर अचानक उस के पास आता है। कहता है , ' तुम्हारे
एक्स्ट्रा डायलॉग अच्छे रहे। इसे स्क्रिप्ट में भी डाल देता हूं। '
' ऐज यू विश , सर ! ' कह कर वह डायरेक्टर
को जैसे सैल्यूट करता है। दोनों जाम से जाम लड़ाते हैं। यह देख कर कुछ कुढ़ जाते
हैं। लड़की आती है , बरबस उस से लिपट जाती है। ऐसे गोया उसे
क्या मिल गया हो। वह उस के कपोल आहिस्ता से चूम लेता है। अधरों पर अधर रख देता है।
लोग अपलक देखते रह जाते हैं।
दूसरे दिन शिमला घूमने का प्लान है। वह शिमला का राष्ट्रपति
भवन भी देखना चाहता था। पर पास बन नहीं पाया है। सेब के बागान भी देखने हैं।
-5-
उपेक्षा
अम्मा जी जब भी गांव से कभी
आतीं तो कोई न कोई अग्नि परीक्षा ले कर ही गांव लौटतीं। पर इस बार तो जैसे अग्नि
परीक्षा से भी बड़ी परीक्षा वह ले बैठीं। नन्ही सी बेटी को ही मांग बैठीं। दो साल
की बेटी जो मेरा दूध पी रही थी। कि जैसे भी हो इस को अब की वह अपने साथ गांव ले
जाएंगी। यह सुन कर मेरी तो जैसे जान ही निकल गई।
बेटा जब बहुत छोटा था तब
अम्मा जी उसे भी अपने साथ गांव में रखना चाहती थीं। जब उन्हों ने बेटे को अपने साथ
ले जाने की बात कीं तो तब भी मैं घबरा गई थी। उन से बोली , ' मैं कैसे रहूंगी ? '
' जैसे मैं बिना अपने बेटे के रहती हूं। ' वह जैसे घायल हो कर बोलीं , ' मैं कैसे अकेले रहती हूं बिना अपने बेटे के , कभी सोचा है ? '
मैं चुप रह गई। लेकिन अम्मा
जी का यह दुःख मुझे मथ गया। बुरी तरह मथ गया।
दो दिन बाद थोड़ा मजे लेती हुई
अम्मा जी बोलीं , ' ऐसा करो तुम
मेरे बेटे के साथ रहो , मैं तुम्हारे बेटे के साथ
रहूंगी। हिसाब बराबर। ' यह सुन कर मैं रोने लगी।
अम्मा जी ने मुझे अपनी गोद में ले लिया और मुझे संभालती हुई बोलीं , ' घबराओ नहीं। कुछ नहीं होगा। मेरा बेटा भी अपने
पास रखो , अपना बेटा भी अपने पास रखो।
मैं रह लूंगी अकेले भी। जैसे भी। '
बात ख़त्म हो गई थी। पर सचमुच
नहीं।
एक बार गांव गई तो वापसी में
फिर वही तान कि , 'कुछ दिन के लिए सही , बाबू को मेरे पास छोड़ दो। '
मैं फिर रोने लगी। बेटे के
बिना रहने की कल्पना ही नहीं कर पा रही थी। बोली , ' अम्मा जी , अभी बहुत छोटा है। मेरा दूध
पीता है। दूध छूट जाए तब रख लीजिएगा। '
' पक्का ? ' अम्मा जी ने
मुदित हो कर मुझे अंकवार में भर कर पूछा।
' पक्का ! ' हंसती हुई मैं बोली।
बेटे को ले कर मैं शहर आ गई।
दिन बीतने लगे। सब कुछ ढर्रे पर आ गया। अचानक अम्मा जी फिर शहर आईं। फिर वही
परंपराएं , वही संस्कार की नर्सरी। वही
अनुशासन , वही कर्फ्यू। बेटा जो कभी
ग़लती से किचेन में ठुमक - ठुमक कर चला जाता तो दिन भर दादी को सफाई देता फिरता कि , ' देखिए दादी हम किचेन में नहा कर गए थे। चप्पल
नहीं पहने थे। आदि - इत्यादि। एक दिन तो वह चप्पल पहने किचेन में आ गया। अचानक बड़ी
सी जीभ निकाली। चप्पल कमर में खोंसी। बोला , ' दादी , हम चप्पल पहन कर नहीं आए। ' संयोग था कि दादी तब अपने बेटे से बतियाने में
लगी थीं। ध्यान ही नहीं दिया। पर वापसी पर फिर बाबू को गांव ले जाने की ज़िद। पर अब
की मुझे कुछ कहना ही नहीं पड़ा। पतिदेव ने कमान संभाली। बोले , ' अगले हफ़्ते इस का एडमिशन करवाना है स्कूल में। '
' इतना छोटा सा बच्चा , अभी से
स्कूल ? ' अम्मा जी ने
माथा पीटा।
' हां अम्मा ! ' वह बोले , ' स्कूल अब जल्दी भेजना पड़ता है बच्चों को। '
' पर स्कूल में एडमिशन तो जुलाई में होता है। मार्च में नहीं। ' अम्मा जी ने एक और पासा फेंका।
' अब अप्रैल में ही एडमिशन होता है अम्मा , जुलाई में नहीं। '
अम्मा जी इस तीर से हार गईं।
बोलीं , ' अब पढ़ाई की
बात है तो क्या कहूं ? '
अम्मा जी जब भी गांव से आतीं
तो ढेर सारे गंवई सामान के साथ ढेर सारा प्यार और स्नेह भी आ कर मुझ पर लुटातीं।
बरसातीं। पर जाने क्या था कि उन के आते ही घर में जैसे अघोषित भूकंप आ जाता।
कर्फ्यू लग जाता। सब से ज़्यादा किचेन में। बहू थी उन की पर मानती वह मुझे बिटिया
की तरह थीं। इस लिए कि उन की कोई बेटी नहीं थी। सो बेटी की साध भी वह मुझी से पूरा
करतीं। फिर भी इस मां के पीछे उन के भीतर एक सास भी जैसे चुपके से बैठी रहती थी।
दोपहर के सूर्य की तरह। लाख छुपाने पर भी यह दोपहर का सूर्य छुपता नहीं था। अपनी
पूरी आंच के साथ उपस्थित। मैं चांद बन कर इस सूर्य के पीछे दुबकी-दुबकी रहती। ऐसे
जैसे बिटिया उछलती रहती , बहू दुबकी-दुबकी। गांव से
मेरा बहुत नाता नहीं था पर अम्मा जी से बहुत था। अम्मा जी का शहर से बहुत नाता
नहीं था पर मुझ से बहुत था। अजब अंतर्विरोध था। अजब सहमतियां थीं। असहमतियां भी
बहुत थीं। पर न अम्मा जी उसे सामने लातीं , न मैं। अम्मा जी गांव की सारी परंपराएं , संस्कार , रवायतें सब कुछ एक साथ मुझ
में किसी धान के पौधे की तरह रोप देना चाहती थीं। मैं थी कि अम्मा जी को , उन की की बहुत सी बातों को अपने ढंग से आधुनिक
बना देना चाहती थी। पर होता यह था कि अम्मा जी काली कमरिया थीं। उन पर कोई और रंग
चढ़ता ही नहीं था। चढ़ो न दूजो रंग वाली स्थिति थी। वह अपनी आस्थाओं और जड़ों से गहरे
जुड़ी हुई थीं। टस से मस नहीं होती थीं। बदलना मुझे ही रहता था। वह जब भी आतीं , सिर से पल्लू ले कर , मुझे आफ़िस से छुट्टी लेनी पड़ती। शुरू में वर्क
फ्राम होम करती। पर अम्मा जी को यह वर्क फ्राम होम भी नहीं सुहाता था। कहतीं , ' इस से अच्छा तो तुम दफ़्तर ही चली जाया करो !' तो जैसे - तैसे पूरी छुट्टी ले लेती। आफिस वाले
भी अम्मा जी के नाम पर माने जाते। छुट्टी नहीं लेती तो वह जैसे बहुत मासूम सा ताना
देतीं , ' घर में पूरे
दिन अकेले रह कर क्या ईंटें गिना करूं ? ' फिर छत देखती हुई कहतीं , ' यहां तो
ईंटें भी नहीं दिखतीं। ' मैं छुट्टी ले कर घर बैठ जाती
थी ताकि अम्मा जी को कठिनाई न हो। उन का मन लगा रहे। तब भी वह हफ़्ते दस दिन में ही
बोर हो जातीं। टी वी उन्हें सुहाता नहीं था। बेटा भी छोटा था पर स्कूल चला जाता
था। घर में रहते हुए भी या तो सोता , पढ़ता या खेलता। दादी की बातों में उसे बहुत दिलचस्पी नहीं रहती। अम्मा जी
के पास गांव , दुआर , घर की बातें होतीं। गांव की बोली में। खांटी
गंवई। बेटे के कुछ पल्ले ही नहीं पड़ता था। बेटा पोएट्री सुनाता। अम्मा जी लोकगीत।
दोनों के ही सब कुछ पास बाई। आफ्टरआल बच्चा था , बहू नहीं। और अम्मा जी तो , अम्मा जी ही थीं। सुप्रीमो ! घर की सुप्रीमो। छोटी बेटी बतियाने भर की हुई
नहीं थी। सोती और खेलती ज़्यादा थी। पतिदेव भी अम्मा से उतना ही बतियाते जितने में
उन का झगड़ा न हो। पतिदेव और अम्मा जी अक्सर किसी बात पर लड़ ही जाते थे। बेटा थे , बहू नहीं। कि बात बेबात सरेंडर करते रहें। कि
सही होने पर भी अपने को ग़लत मान लें। अम्मा जी डिमांडिंग बहुत थीं। पतिदेव डिमांड
सभी पूरी करते रहते थे पर कभी किसी बिंदु पर आ कर लड़खड़ा जाते। बस झगड़ा शुरू। पर वह
अम्मा को मनाना भी बहुत जानते थे। दो मिनट में मना भी लेते।
अम्मा जी जब तक रहतीं तब तक
किचेन में सिर्फ़ तीन ही लोगों की एंट्री थी। एक अम्मा जी की , दूसरी हमारी। तीसरी काम वाली की। काम वाली को वह
घूरती बहुत थीं। चुपचाप। बिन बोले घूरतीं। इतना कि वह अकसर घबरा जाती। अम्मा जी
किचेन में ही बैठ कर खाती - पीतीं। किचेन उन के लिए रसोई होता। चाहती थीं कि सभी
लोग रसोई बोलें। भोजन बोलें। अगर कोई बच्चा गलती से भी खेलते - खेलते किचेन में
घुस जाए तो किचेन अपवित्र। किचेन से खाने की कोई चीज़ बाहर आ गई तो अगर ग़लती से
किचेन में वापस चली गई तो किचेन अपवित्र। किसी के लिए रोटी आ गई और उस ने नहीं ली
और वह रोटी किचेन में वापस चली गई तो किचेन अपवित्र। किचेन अपवित्र मतलब अम्मा जी
का कुछ भी खाना - पीना तब तक के लिए बंद जब तक किचेन साफ़ कर नया भोजन न पक जाए।
चप्पल आदि पहने तो जा ही नहीं सकता था कोई। मैं भी बिना नहाए किचेन में प्रवेश
नहीं कर सकती थी। दोनों टाइम नहाना। कितना भी जाड़ा पड़ रहा हो , कितनी भी अर्जेंसी हो। बाक़ी बातों में अम्मा
बहुत व्यावहारिक थीं। आंख मूंद लेती थीं। बात टाल जाती थीं। लेकिन किचेन की
पवित्रता के मामले में कोई कंप्रोमाइज नहीं। सारी व्यावहारिकता डस्टविन में। बल्कि
कहें भाड़ में।
गांव में भी उन की किचेन की
पवित्रता शिखर पर रहती। शहर में भी। ख़ैर हमेशा की तरह इस बार भी अम्मा जी को
स्टेशन छोड़ने गए हम सभी। बाबू जी उन्हें लेने आ गए थे। घर से चलते समय अम्मा जी ने
बेटी को ले जाने के बाबत कुछ कहा ही नहीं। मैं ख़ुश-ख़ुश और निश्चिंत। कि अच्छा हुआ
कि अम्मा जी भूल गईं। स्टेशन पर ट्रेन में बर्थ पर बैठते ही अम्मा जी बेटी को गोद में ले कर चूमने लगीं। सहसा पतिदेव से बोलीं , ' मैं इस को ले जा रही हूं ! ' पतिदेव ने हंसते हुए हामी भर दी। लेकिन मेरे तो
जैसे प्राण ही सूख ही गए। मुझे चुप देख कर अम्मा जी बोलीं , ' तुम को कोई ऐतराज तो नहीं है ? '
' ऐतराज तो नहीं है। ' दबी जुबान मैं बोली, ' पर अभी यह हमारा दूध पीती है। इस का कोई
कपड़ा-लत्ता भी तो लाए नहीं हैं। '
' दूध हम पिला देंगे गाय का। कपड़ा-लत्ता हम सब नया बनवा देंगे। गांव में सब
कुछ मिलता है। दर्जी है। नहीं बाज़ार से रेडीमेड मंगवा लेंगे। ' वह बोलीं , ' तुम इस की चिंता मत करो ! खिलाएंगे , पिलाएंगे भी तुम से बढ़िया। काम वाली के भरोसे नहीं छोड़ेंगे। '
मैं चुपचाप रोने लगी।
बात ही बात में ट्रेन चलने को
हो गई। अम्मा , बाबू जी के पांव छू कर हम
डब्बे से प्लेटफार्म पर उतर आए। बेटी को बाई - बाई करते हुए। घर वापस आते समय
रास्ते भर रोते रहे। घर आ कर पतिदेव से कहा कि , ' ट्रेन तो शहर के कई छोटे स्टेशन पर रुकते हुए जाएगी। तब तक आख़िरी वाले
स्टेशन पर चलते हैं , बेटी को वापस लेते आते हैं। '
' नौटंकी मत करो ! ' वह बोले , ' मैं तो इस तरह किसी स्टेशन चलने से रहा। ऐसा ही
था तो अम्मा से बेटी को स्टेशन पर ही ले लेना था। '
' ऐसा करें कि हम लोग भी क्यों न रात की ट्रेन से गांव चले चलें। ' पतिदेव से थोड़ी देर बाद कहा।
' मैं कहीं नहीं जा रहा। ' वह बोले , ' कुछ दिन अम्मा के साथ भी रह लेने दो बेटी को।
अम्मा का भी मन बहल जाने दो। '
दो - चार दिन बीते। पर मैं घर
में रह नहीं पा रही थी। चुप नहीं रह पा रही थी। बात - बेबात रो पड़ती। बेटी जैसे जब
- तब सामने आ कर खड़ी हो जाती। आफिस भी जाना छोड़ दिया। छुट्टी बढ़ा दी थी। वाट्सअप
पर बात होती अम्मा जी से रोज। बेटी भी दिख जाती। पर इस दूर से देखने से मन नहीं
भरता था। दिल नहीं मानता था। मन करता था कि उस वीडियो काल में ही कूद कर बेटी को
गोद में ले लूं। बाहों में भर लूं। छाती में दूध जैसे उफना जाता। ऐसे जैसे पतीली
में दूध उफना गया हो। रोने लगती। मेरा रोज - रोज का रोना - धोना देख कर पतिदेव
पसीज गए। रिजर्वेशन करवा दिया। अगले हफ़्ते सुबह - सुबह हम लोग गांव पहुंच गए।
अम्मा जी ने देखते ही तंज किया , ' हफ़्ता भर भी
नहीं रह पाई बेटी के बिना ? ' जवाब में
सुबुक - सुबुक कर रोने लगी। हल्के घूंघट में थी। पर अम्मा जी से मेरा रोना नहीं
छुपा। मैं उन के पांव छू रही थी और वह मेरी ठुड्डी पकड़ कर उठाए हुई मेरी भरी - भरी
आंखें देख रही थीं। मेरा रुदन देख कर , अम्मा जी भी रोने लगीं। बोलीं , ' दुलहिन , इस में तुम्हारा दोष नहीं।
औलाद होती ही ऐसी चीज़ है। ' कह कर उन्हों ने मुझे अपनी
अंकवार में भर लिया।
सब कुछ था पर बेटी नहीं दिख
रही थी। मैं , मेरी आंखें उसी को खोज रही
थीं। पूछने पर पता चला बाबू जी उसे ले कर खेत की तरफ गए हैं।
' किसी को भेज कर बुलवा लीजिए न ! ' मैं ने अम्मा जी से कहा।
' किस को ? ' अम्मा जी ने
पूछा।
' बाबू जी को। '
' बाबू जी को देखना है कि बेटी को ? '
' बेटी को। ' धीरे से मैं बोली।
बाबू जी थोड़ी देर में आ गए।
बेटी भी। बाबू जी के पांव छू ही रही थी कि बेटी दादी की तरफ भाग गई। मेरी तरफ आई
ही नहीं। मैं अवाक् रह गई। वह दौड़ कर दादी की गोद में समा गई। बाद के समय भी बहुत
कोशिश की उसे अपने पास बुलाने की। वह आती ही नहीं थी। जिस के लिए सब कुछ छोड़ कर
सैकड़ो किलोमीटर की दूरी तय कर आए थे , वही मेरे पास आने को तैयार नहीं थी। लग ही नहीं रहा था कि वह मेरी बेटी है , मैं उस की मां। अजब दृश्य था। दूध में जैसे दरार
पड़ गई थी। कलेजे में टीस सी उठी। जैसे कोई भाला गड़ गया हो दिल में। दिन बीता , रात हो गई। बेटी मेरे पास नहीं आई। दादी के पास
ही सोई। मैं और रोने लगी। कि ऐसा क्या हो गया। कि मेरे पास नहीं आ रही। दूसरे दिन
गौर किया कि बेटी मेरे ही पास नहीं , अपने पापा के पास भी नहीं जा रही। वह लाख बुलाएं। पकड़ें। वह उछल कर भाग
जाए। ऐसे जैसे मम्मी , पापा उस की ज़िंदगी में हैं ही
नहीं। वह जानती ही नहीं हमें। बाबा - दादी ही सब कुछ हैं , उस के लिए। पड़ोस के बच्चों को वह जानती थी। पड़ोस
की आती - जाती औरतों को वह पहचानती। अपने भाई को पहचानती। मम्मी - पापा से जैसे उस
की दुश्मनी हो गई थी।
कहीं अम्मा जी ने अपने पास
रखने के लिए इस पर कोई जादू-टोना तो नहीं कर दिया ? मैं ने सोचा। पर अम्मा जी के बारे में ऐसा सोच कर भी दुःख हुआ। अम्मा जी
ऐसी नहीं हैं , मन ही मन कह कर इस बात को झटक
दिया। पतिदेव को बहुत फ़र्क़ नहीं पड़ा कि बेटी उन के पास क्यों नहीं आ रही। इस बारे
में उन्हों ने ध्यान भी नहीं दिया। वह गांव की रूटीन , खेत , पट्टीदार आदि में व्यस्त हो गए थे।
पर मैं क्या करूं ? क्या करूं कि बेटी मेरे पास आ जाए। उसे जी भर
प्यार करूं। इसी उधेड़बुन में दूसरा दिन भी बीत गया। तीसरे दिन आंगन में खेलती हुई बेटी को ज़बरदस्ती पकड़ कर गोद में बिठा लिया। चूमने लगी। वह फिर उछल कर भाग खड़ी हुई।
भाग क्या खड़ी हुई , किसी गौरैया की तरह फुदक कर
उड़ गई। मैं दुःख में डूब गई। पीछे से अम्मा जी यह सब चुपचाप देख रही थीं। अचानक वह
आईं और मेरा कंधा पकड़ कर वहीं बैठ गईं। बोलीं , ' यह तो हम से बड़ा अपराध हो गया , बड़ा पाप हो गया दुलहिन ! '
' क्या ? ' मैं अचकचा
पड़ी।
' दो साल की बिटिया को तुम से अलग कर के। '
' क्या ? '
' हां। ' अम्मा जी बोलीं , ' बिटिया तुम दोनों से बहुत नाराज है। कह नहीं पा
रही। शब्द नहीं है उस के पास नाराजगी जताने के लिए। पर यह अबोध बच्ची , दो साल की दुधमुंही बच्ची तुम लोगों से बहुत
नाराज हो गई है। इसी लिए दो दिन से देख रही हूं , तुम लोगों की इतनी उपेक्षा कर रही है। निर्मोही हो गई है। उस को माफ़ कर दो
और मुझे भी ! ' कह कर अम्मा जी ने हाथ जोड़
लिए। अम्मा जी की उदास आंखों में जैसे समंदर सा पानी था। भरभरा कर सारा बाहर आ
गया।
मैं अम्मा जी के गले लग कर रो
पड़ी। फफक - फफक कर। अम्मा जी भी फफक रही थीं और मैं भी।
उधर बेटी , अपने भाई के साथ खेल रही थी। कूद - कूद कर।
-6-
संवाद
पिता जी,
अरसे बाद आप को लिख रहा हूं। ऐसा
नहीं कि इस बीच आप को लिखने को मन न हुआ हो। लेकिन एक मनःस्थिति थी, जो बार-बार
बांध लेती थी मन को। नहीं लिख पाया था।जाने ऐसा क्या है समझ नहीं पाता। अपनी ओर से
जाने-अनजाने आप को तकलीफ ही दी है। कभी कोई कतरा सुख भी दे पाया होऊं, याद नहीं
आता। हालां कि ऐसी मंशा कभी नहीं रही। फिर भी कुछ ऐसा जरूर है जो हम दोनों के बीच
दीवार बन आता है हम जुड़ने के बजाय बिलगते दीखते हैं, निश्चय ही
यह ठीक नहीं है। बीच की यह दीवार हटाई नहीं जा सकती क्या जहां तक मैं समझ पाया हूं, अकसर हम
दोनों के बीच कुछ स्थितियों के अलावा आप का ‘सैद्धांतिक हठी आग्रह’ जो कहीं मुझे
जड़ भी जान पड़ता है, और
मेरा ‘व्यक्तिगत सच’ बार-बार टकराते रहे हैं। टकरा कर ओछे साबित होते रहे हैं, लोगों की भी
नजर में, अपनी
नजर में भी।वह चाहे आठ-दस बरस पहले घर छोड़ना रहा हो, बीच-बीच में
पढ़ाई छोड़ी हो और कि कभी-कभी अपने आप को ही छोड़ बैठा होऊं, सब इस का ही
नतीजा रहा है। आप दिखाने की इज्जत और नाक देखते रहे हैं और मैं व्यावहारिक तौर पर
जुड़ने की कोशिश कर अपने-आप को निरंतर तोड़ता रहा हूं। इस बीच आप के साथ रहने के
बावजूद आप से कुछ कहने के बजाय चिट्ठी ही लिखता रहा। कुछ कहने की स्थिति में आप ने
आने ही नहीं दिया। किशोर वय में आप से डरा-डरा सहमा रहता। जवानी देखी नहीं। फिर भी
उस वय में कुढ़ा-कुढ़ा रहता आप से। इस किशोर वय से जवानी के उतार के दिनों तक पुल
बनाने की गरज से बहुतेरी चिट्ठियां आप को लिखीं,
पर आप को दे एक भी न सका। कल
बक्सा साफ कर रहा था आप को लिखी एक पुरानी चिट्ठी मिल गई। जानता हूं, आप इसे पसंद
नहीं करेंगे। फिर भी चिट्ठी पुरानी जरूर है,
अप्रासंगिक नहीं सो पढ़ाता हूं, आप को:
आदरणीय पिता जी,
बड़े दुखी मन से यह पत्र आप को
लिख रहा हूं। इस में लिखी बातों पर आप प्रतिशत-भर भी ध्यान देंगे तो समझूंगा कि
मेरी इच्छाओं, भावनाओं
को आप समझते हैं, महसूसते
हैं। यह मैं जानता हूं कि आप भी मजबूर हैं,
कुछ करने की इच्छा रखते हुए भी आप
हद तक असहाय हैं। फिर भी मैं ने कहा न कि मेरी इन कुछ बातों पर, जिन्हें
नीचे लिख रहा हूं, आप
प्रतिशत-भर भी ध्यान देंगे तो मुझे बड़ी खुशी होगी। समझूंगा कि आप कहीं से तो अपने
हैं। लगभग बत्तीस कि पैंतीस बरस तो हो ही गए होंगे मुझे, पर आज तक
कभी भी किसी बात पर मैं ने अपना मुंह नहीं खोला। मुंह खोल भी भला कैसे सकता हूं।
आप ने इस परिवार के इर्द-गिर्द ऐसे कांटे रोप रखे हैं कि कोई बाहर का भला-चंगा
आदमी भी आए तो इन कांटों के आतंक से गूंगा हो जाए। हम सब तो पहले ही से बीमार थे, तो तुरंत से
गूंगा होना लाजिमी ही था....ख़ास कर मैं।
....बचपन की बात छोड़िए, तब तो आप के
साथ रहना दूर आप का साया भी बमुश्किल पड़ पाया होगा,
कभी हम पर। वो तो अम्मा थी जिस ने
हमें अपने भरपूर प्यार-दुलार से संवारे-सजाए रखा। यह अम्मा का ही प्यार है, जिस की
बदौलत इस कंटीली परिधि में भी जिंदा हूं।सोचता हूं,
काश कि अम्मा कुछ दिन तक ही सही
जो और जिंदा रही होती तो शायद आज यह जो आप हैं,
आप यह न होते और यह जो मैं हूं, मैं यह न
होता। और यह निक्की तो बिलकुल ही यह निक्की न होता।....न जाने क्या-क्या
होता....और क्या-क्या न होता, कि शायद इस परिवार का नक्शा ही कुछ और होता। लेकिन
ऐसा नहीं होना था, नहीं
हुआ। अम्मा के मरने के बाद जब से होश संभाला है,
बल्कि होश संभलते न संभलते आप ने
मेरी शादी भी करवा दी। तब से ही हर बात को मैं चुपचाप सुनता, सहता और आपे
से बाहर होने के बावजूद बराबर बर्दाश्त करता आया हूं। लेकिन पिता जी! अब यहां मेरा
दम घुटने लगा है। अब ऐसे में यह घर,
घर नहीं जेलखाना जान पड़ता है।
जहां थोथे आदर्शों और दिखावटी शानो शौकत के नाम पर किसी को कुछ बोलने, करने या
अपने ढंग से किसी मुद्दे पर निर्णय लेने का अधिकार नहीं। हम अपने बीवी-बच्चों के
भविष्य के बारे में भी कोई फैसला नहीं ले सकते। यहां तक कि आप को यह बताने में भी
संकोच हो रहा है, फिर
भी बताता हूं कि बीवी के पास कब जाना है,
कैसी बात करनी है, कब साथ सोना
है, जैसी
बातें हम ख़ुद नहीं तय करते। मतलब कि हम अपने व्यक्तिगत संबंध भी ख़ुद नहीं तय कर
सकते। यह भी ‘नई मां’ तय करती हैं।
ख़ैर, एक मर्यादा, भले ही
तथाकथित सही के तहत यह भी हमें मंजूर है। लेकिन ‘उन्हें’ इस पर भी सब्र नहीं है।
हर वक्त जबान की कमान पर कोई न कोई जुमला तना ही रहता है....। सच बताता हूं पिता
जी, ये
जुमले सुन-सुन कर ख़ून खौल उठता था कभी। लेकिन अब तो स्थिति यह है कि ये जुमले
ख़ून खौलाते नहीं, ख़ून
ठंडा करते हैं। यों आप से बहुत बचा कर भी उगले जाने वाले ये जुमले कभी-कभार तो आप
के भी कानों से जरूर टकराते होंगे। कभी रत्ती-भर भी सोचा है आप ने....या कि कभी
कुछ समझने की कोशिश की है कि यह क्या हो रहा है ?
लेकिन कहां, बल्कि क्यों
? आप
से तो यह सवाल भी पूछना एकदम बेमानी है। आप तो बहुत कुछ सुनते हैं। हां, कभी हमारी
मूक वेदना भी सुनी है ? क्षमा
कीजिएगा फिर गलती कर बैठा, यह
सवाल पूछ कर, क्यों
कि मैं यह ख़ूब जानता हूं। आप बातों को सुन कर भी नहीं सुन पाते। चीजों को कहीं
बहुत गहरे
जानने के बाद
भी जान नहीं पाते। वैसे लोग तो आप के तेज दिमाग और पारखी नजर की बड़ी तारीफ करते
हैं। मैं पूछता हूं, हमारे
लिए आप का यह तेज दिमाग क्यों सड़ जाता है ?
यह पारखी नजर कहां धंस जाती है ? क्यों....? ख़ैर, छोड़िए भी।
अब तो पानी सिर से इतना गुजर चुका है कि....! ईमानदारी से कहता हूं कि मुझे तो इस
बात में भी संदेह है कि, आप
का ख़ून भी हूं। सिर्फ मैं ही क्यों ?
दीदी और निक्की भी आप का ख़ून हैं, ऐसा भी
बिलकुल नहीं लगता। और दिन-ब-दिन इस संदेह के किले को मजबूत किया है, आप की इस
नाटकीय तटस्थता ने, अति
उपेक्षित व्यवहार और अपमानजनक रवैए ने। चाहें तो आप इसे कमीनेपन के विशेषण से भी
जोड़ कर देख सकते हैं। यह भी देखिए,
बल्कि जरा गौर से देखिए कि यह
विशेषण किस के साथ ठीक-ठीक जुड़ पाता है....।
मुआफ कीजिए यह चिट्ठी अधूरी
है....कुछ पन्ने गुम हो गए हैं ख़ैर....
पिछले दिनों का घटनाक्रम हालां कि
इस से कुछ इतर जरूर था, लेकिन
मूल में कहीं यह ही था।
मैं ने सोचा था, बहुत होगा
लोग मेरा बॉयकाट करेंगे। कुछ जली कटी सुनाएंगे। या कि कुछ और कर लेंगे। मैं यह भी
जानता था कि हमारा दोमुंहा समाज, लूला-लंगड़ा और दोगला कानून भी बहुत कुछ नहीं कर
सकता। यहां तक कि ओंकार की शादी में भी सचमुच शरीक होने की गरज से मैं नहीं गया
था। शादी न होती तो भी उन दिनों उस अपने बेगाने शहर आना ही था। धंधे के बाबत।
इत्तफाक ही था कि उन्हीं दिनों ओंकार की शादी की तारीख़ पक्की हुई थी। मुझे जब
वकील (?) के
तार के मार्फत 17 तारीख़
के बजाय 27 तारीख़
की सूचना दी गई, माजरा
क्या है, तभी
तेरी समझ में आ गया था। फिर भी पहुंचा था धंधे के चक्कर में, शादी में
शरीक होने नहीं। हालां कि ओंकार मुझे कई बार आ कर शादी में शरीक होने को कह गए थे।
बाबू जी ने भी व्यक्तिगत तौर पर कहा था। वहां पहुंच कर हैरान था कि ओंकार की शादी
की रस्में थीं, और
वह रस्में पूरी करने-करवाने की जगह स्टेशन से ले कर मेरे
ठहरने की जगह तक दौड़ते रहे थे। रास्ते में इंजन बिगड़ जाने से गाड़ी 5-6 घंटे लेट हो
गई थी। गाड़ी शाम के बजाय रात में पहुंची। अभी सूटकेस रख कर हाथ-मुंह भी नहीं धोया
था, बदहवास
ओंकार दरवाजे पर दस्तक दे गए। यह देख कर बड़ी हैरत में था कि गुनाह जैसा कुछ किया
मैं ने था, और
हिल ओंकार रहे थे। हालां कि कायदे से वह गुनाह ही न था। क्या हवा के खि़लाफ हो
जाना ही गुनाह है ? फिर
भी ओंकार की अतिरिक्त बेचैनी मुझे भी बेचैन कर गई। मैं ने उन्हें आंख मूंद कर
आश्वस्त किया कि, ‘अगर
विरोध करना जानता हूं तो विरोध बर्दाश्त करने का भी माद्दा रखता हूं।’ फिर भी वह
अपनी कम आप सब की झंझटों से आक्रांत ही रहे। सुबह फिर हाजिर थे। तरह-तरह की
सफाइयां देते, स्थितियों
का ब्योरा देते, माफी
मांगते। आप ने मेरे विरोध ख़ातिर जो शर्त रखी थी न रखी होती तो भी आने वाला नहीं
था। इस लिए कि मुझे स्वाभिमान जितना प्यारा है उतना कुछ और नहीं, यह आप ख़ूब
जानते हैं। अलबत्ता आप का वह विरोध मुझे कारगर नहीं लगा था। ईमानदारी से कहूं तो
उस वक्त उसे ‘नपुंसक विरोध’ की संज्ञा दी थी। बावजूद इस के आप के इस विरोध में दम
तलाश सकता था। पर जानता हूं, मैं उस शादी में न हो कर भी था। चाहे जैसे था, सब की जबान
पर था। यह आप कैसे रोक सकते थे भला ?
आप अभिशप्त थे सुनने के लिए। इस
बहाने मेरी और आप की नाप-जोख ऐसे लोग करते रहे थे,
जिन की ख़ुद कोई नाप-जोख नहीं है।
नितांत बचकाना और छिछली मानसिकता से सराबोर ऐसे लोग जिन के पास अपनी कोई सोच नहीं, कोई दृष्टि
नहीं। और यह सब नपुंसक विरोध के ही नतीजे में था।
जो भी हो, इन बातों का
मेरी नजर में कोई अस्तित्व नहीं। इस बार मेरा कड़ियल-सा ‘व्यक्तिगत सच’ (आप के
सैद्धांतिक हठी आग्रह के आगे नहीं),
‘परिवारगत सच’ के आगे बौना ही नहीं
टुच्चा और ओछा भी साबित हुआ है। इसी बीच दो बार उस अपने बेगाने शहर जाना हुआ। पहली
बार बाबा की बीमारी में जा कर स्थितियां बदली ही नहीं भयानक दिखीं तो मन हिल गया।
लेकिन फिर सोचा कि यह बाबा से बिछोह की संभावना वाला परिवर्तित रूप है। पर दूसरी
बार धंधे के फेर में गया तो, स्थितियां और भी विद्रूप हो चली थीं। आप को देखता तो
बाहर से तो दृढ़ दीखने की कोशिश करता होता पर भीतर-भीतर छीजता-पसीजता कहीं गहरे
हिल रहा होता था। आप के चेहरे पर उभरी टूटन और तकलीफ की रेखाएं मुझे बराबर छीलती
रही थीं। नई मां की बेचैनी अम्मा की ही बेचैनी जान पड़ी, लगा कि
उन्हें ‘नई मां’ कह कर अपने को ही अपमानित करता रहा हूं।
उन की आंखों में अम्मा की ही-सी
आकुलता झलकती देख मन झनक-सा गया। भाइयों के चेहरे पर बिखरी इबारतें मुझे बराबर
मथती रहीं। अपने आप से ही पूछने लग गया था कि,
‘यह क्या किया मैं ने?’ सच मानिए
मैं ने और सब कुछ का होना सोचा था और कि उन स्थितियों से निपटने का माद्दा भी था, मुझ में, पर इन
‘बिखरी बेतरतीब इबारतों’, ‘टूटन
और तकलीफ की रेखाओं’ के बारे में बिलकुल नहीं सोच पाया था। इन से मैं हार
गया।....और भी बहुत सारे दृश्य हैं,
स्थितियां और बातें हैं। इन सब के
पीछे एक गहरी सोच है, जिन्हें
कि यहां विस्तार दे पाना संभव नहीं है।
यों भी चिट्ठी काफी बड़ी हो गई
है। लिखने को तो काफी लिख गया हूं,
जाने आप इन बातों को किन अर्थों
में लेंगे, नकारात्मक
कि सकारात्मक, नहीं
जानता। यह जानिए कि मैं ने जो भी किया था,
सोच-समझ कर किया था। अलग बात है, परिणाम कुछ
बहुत बेहतर नहीं मिला है। फिर भी उस ‘कर्म’ के लिए मेरे मन में न तो कोई
पश्चात्ताप है, न
ही किसी किस्म की शर्मिंदगी। इस बात का मलाल जरूर है कि अपने छोटे-से स्वार्थ की
ख़ातिर, परिवार
की अस्मिता आख़िर मैं क्यों भूल गया ?
कैसे भूल गया, यह दूसरी
बात है। महत्वपूर्ण यही है कि क्यों भूल गया?
इस बात का मुझे गहरा पश्चात्ताप
है। इतना कि आप से क्षमा मांग सकूं,
नैतिक साहस भी नहीं रहा है। आप की
चिट्ठी मिली। जरूर कहीं मेरे लिखने में ही कोई खोट रह गई कि मेरी पिछली चिट्ठी में
लिखी बातें, आप
के पल्ले नहीं पड़ पाईं। आप को यह ‘पल्ले न पड़ पाना’ भी पल्ले पड़ता है। मानता
हूं कि इस पिछले कुछ समय में आप विडंबनाओं और चुनौतियों से दो-चार हो, चकित कर
देने वाला दुख ढोते रहे हैं। और इन सब के मूल में मेरे कृत्य ही रहे हैं। लेकिन आप
यह क्यों भूल जाते हैं कि विडंबनाओं और दुखों का जाल मुझ पर भी बिछा रहा है। और कि
है। अलग बात है, यह
जाल मैं ने खुद बुना है, स्थितियों
को साक्षी मान कर। और इन स्थितियों के मूल में कमोबेश आप ही रहे हैं। लेकिन यह भी
तय है कि अगर कोई जाल बुन सकता हूं,
तो छिन्न-भिन्न भी कर सकता हूं।
इस लिए भी कि चाहता हूं, आप
का चरमराता व्यक्तित्व सहेजना। चाहता हूं,
आप की विवेक शून्यता धो कर विवेक
स्थापित करना। हौसलापस्ती तोड़ कर मस्ती में तब्दील करना। आप की वह पुरानी सूझ-बूझ
और दम-ख़म वापस लाना। इन बातों को कोरा शब्दजाल न समझें, आप। बस इतना
ध्यान रखें कि अगर चीजों के बिगड़ने में कहीं कोई कारण बन सकता हूं तो चीजों के
बनने-बनाने में भी एक कारण बन सकता हूं।
आप
ने लिखा है, ‘तुम
महान हो। बने रहो। ईश्वर से मेरी यही विनती है।’ इतना करारा तमाचा मत मारिए। आदमी
बनना चाहता हूं। साधारण आदमी। ‘महान’ नहीं। विनती करनी ही है तो ईश्वर से यह कीजिए
कि आदमी बनूं। मां और लता की चिट्ठियों से लगा था कि आप सहज हो गए हैं। और किसी
कोने से खुश भी। लेकिन आप की चिट्ठी बताती है कि वह सहजता क्षणिक थी या कि
‘दिखावा’ या कि कहूं ‘बाहरी’ थी। भीतर से न तो आप सहज हो पाए हैं, न ही खुश।
इस मर्म को भी खूब समझता हूं। आज तक आप ने मुझ से यह उम्मीद न की होगी, फिर भी सच
मानिए, पहली
बार आप के व्यक्तित्व के आगे मैं झुका,
मैं बिछा। हर कोण से, पूरे मन से।
इसे अचानक हृदय-परिवर्तन न मान कर सहज क्रिया मानें। ‘महान’ से आदमी में तब्दील
होने की शुरुआत समझें। बस अपना मनोबल आप वापस लाइए। और कि बातों को नकारात्मक अर्थ
में लेने के बजाय सकारात्मक अर्थ में समझने की कोशिश।
आप यह मान कर चलिए कि आप से कम
दुखी और परेशान नहीं हूं। सुख की तलाश में भटकता दुख के बीज बोए बैठा हूं। फर्क
इतना ही है कि आप के पास उन का अर्थ है,
मेरे पास हो कर भी नहीं है। मूल
विसंगति मेरे-आप के बीच यही है। इधर समझने लग गया था कि दुख छांट लिया है कि छंट
गया है। लेकिन आप की चिट्ठी ने यह एहसास धुंधला दिया है। यह धुंधलका छंटने की
उम्मीद कर सकता हूं क्या ?
आप की संतोष-भरी चिट्ठी से मन
जरूरत से ज्यादा आश्वस्त हुआ। लगा कि बिखरी और सहज स्थितियां सहज संवर सकती हैं।
मेरी कोशिश यही है। लिहाज-शर्म की दीवार मैं ने कभी नहीं लांघी। यह बुनियादी
संस्कार है। हां, मन
में आई बातों को ले कर कुंठित होने के बजाय एक मर्यादा के तहत साफ शफ्फाक तरह मैं
कह जरूर लेता रहा हूं। और यह बात मुझे बेजा नहीं जान पड़ती। फिर भी आप को अगर कहीं
ऐसा दिखा है तो ठीक ही दिखा होगा, शर्मिंदा हूं। समझता हूं कि आप पर तनाव और दबाव का
असर उजड़ गया होगा और कि घर में स्थितियां बेहतर हुई होंगी।
-7-
हत्यारा
तुम
मुझे ऐसे मिली थी जैसे किसी मछुआरे को बिना जाल की मछली। मछुआरे के हाथ में आ कर
भी तुम मरी नहीं थी। क्यों कि जैसे एक जल से निकल कर दूसरे जल में आ गई थी। तो
मरती भी कैसे भला। तुम्हें शायद उस जल से निकल कर दूसरे जल की ज़रूरत थी। ऐसे जैसे
किसी बहती नदी को दूसरी नदी से मिलने की। जल बदलना , मछली के जीवन को कैसे बदलता है यह
तुम्हारे साथ जल बन कर जाना। तुम किसी पोखर के जल से निकल कर नदी के जल में आ मिली
थी। उस पोखर का जल सड़ने लगा था और कि उस जल में तुम्हारा सांस लेना कठिन हो गया
था। ऐसा तुम बताती थी। छटपटाती हुई इसी लिए मिली थी। जल बदलने की तुम्हारी यह
छटपटाहट , यह अकुलाहट इतनी
तीव्र थी कि मैं इसे प्यार समझने लगा। पुरुष अकसर ऐसे धोखे में आ जाते हैं। मैं भी
तुम्हारे प्यार में आ गया। लेकिन स्त्रियां मछली बन कर मछुआरे को मझधार में छोड़ कर
फिर किसी और जल में अपना जीवन खोज लेती हैं। मछली खुल कर मिलती है। हंस कर मिलती है।
लोग धोखा खा जाते हैं। वह आहिस्ता से जल बदल लेती है।
लेकिन
जल ?
जिस
जल ने किसी मछली को अपना जीवन बना लिया हो , अपना संसार और और सर्वस्व बदल लिया हो
उस के लिए बहना कठिन हो जाता है। जल की तलहटी भी उस की लहरों को बांध-बांध लेती
है। आगे नहीं बढ़ने देती।
तुम
मेरे जाल में भी इसी लिए नहीं थी। बहुत बाद में समझ आया था कि मछुआरा ही मछली के
जाल में था। लेकिन यह जाल बहुत मज़बूत था। तो क्या तुम बहेलिया थी। प्रेम का दाना
बिछा कर ऊपर जाल बिछा दिया था ? प्यार
का जाल। कितने तो जाल थे तुम्हारे पास। मोह के , देह के , नेह के , आशा , उमंग और अभिलाषा के। जन्म - दिन
तुम्हारा हो , हमारा
हो हम साथ मनाते ही मनाते थे। सारी अड़चन , सारी जकड़न तोड़ कर मिलते थे। मिलना ही जन्म - दिन मनाना था।
अवसर कोई भी हो प्रेम के पान हम खा ही लेते थे। यह जल और मछली का रिश्ता था कि
मिलते ही हम बहने लगते थे। बहाने सारे जल में विगलित हो जाते। हमारा प्यार सयाना
हो जाता। दुनिया जान भी नहीं पाती। मछली पालने वाले जानते हैं कि तालाब अगर किसी
रेल पटरी के किनारे हो तो मछली जल्दी बड़ी हो जाती है। रेल गुज़रती रहती है ,
रेल की आवाज़ सुन कर मछली दिन-रात नहीं
देखती , तैरती रहती है ,निरंतर तैरती रहती है। और बड़ी होती रहती
है। हमारा प्यार भी जैसे किसी रेल पटरी के किनारे का तालाब था। बढ़ता रहा। इतना बढ़ा
कि मछली बहुत बड़ी हो गई। अपने जल से निकल गई।
हम
जब मिले तो लगा हमारी भाषा अलग - अलग है। इच्छाएं और कामनाएं अलग हैं। न तुम हमारी
भाषा जानती थी , न
हम तुम्हारी भाषा। बिलकुल अनजानी और अजनबी भाषा। फिर भी मिलते रहे। शौक़ और समझ भी
अलहदा। हाथ में हाथ लिए एक दिन अचानक तुम बोली , ' आज नाव पर घूमते हैं। ' फिर भाड़े की नाव ली। दिन भर की पिकनिक
मनी हमारी नाव पर। नाव वाले ने पैसा भरपूर लिया पर हमारा दिन बना दिया। कितने तो
गाने गए थे तुम ने।
याद
है ?
हम
चाहते थे कि नाव वाला शहर की सरहद छोड़ कर कहीं दूर देहात की तरफ चले। पहले तो तुम
चुप रही। अचानक बोली , ' आज
नहीं। कभी और। ' तुम्हारी
ख़ासियत थी , संक्षिप्त बोलना। कम
बोलने वाली स्त्रियां बहुत अच्छी लगती हैं मुझे। तुम्हारी यह एक बात मुझे बहुत
प्रिय थी कि तुम कभी किसी बात पर लड़ती नहीं थी। सिर्फ़ फ़ैसला देती थी। गोया कोई
न्यायाधीश।
तुम
इतनी रूपवती थी , इतनी
गोरी , इतनी अबोध थी कि
तुम्हें देखने में तो नहीं , पर
छूने में तनिक डर लगता था। तुम्हारे रूप का इतना ज़ोर था कि तुम्हें देख कर आइना
टूट जाए। चांद की अजोरिया में नदी की धार में तुम्हारी धवलता जैसे मुझे पुकार लेती
कि आओ मुझ से लिपट जाओ। लिपट कर लगता कि कोई गुनाह तो नहीं कर दिया। हमारे प्यार
की धार पर नदी की धार न्यौछावर हो जाती। हवा की तरह यह गुनाह भी लेकिन छुप जाता
था। लेकिन प्यार का चिराग नहीं बुझता। जलता रहता। मद्धिम - मद्धिम।
इस
सेल्फी युग में तुम ने हमारे साथ कभी कोई फ़ोटो अपने मोबाइल में नहीं रखी। फ़ोटो
खींचती। देखती , मुझे
दिखाती और चट मिटा देती। यह मुझे बहुत बुरा लगता। तुम इस बुरा लगने की परवाह नहीं
करती। यह डर था कि एहतियात ? वाट्सअप
चैट भी मिटा और मिटवा देती। कोई रिकार्ड नहीं रहने देना चाहती थी। अजब प्यार था
यह। टूट कर मिलना और अचानक चल देना। कई बार शक़ होता कि स्रीजनोफेनिया की मरीज तो
नहीं हो। नहीं थी। पर थी ऐसी ही।
मेरे
जन्म - दिन पर एक बार तुम ने मंहगी सी कलाई घड़ी दी मुझे। कहा कि यह तोहफ़ा नहीं
प्यार है। तुम्हें मेरे सिगरेट पर बहुत ऐतराज था पर जब तुम्हें पता चला कि पाइप
पीने का हमारा मन करता है तो तुम ने एक नहीं , दो - दो पाइप मुझे प्यार के तौर भेंट
किए। कहा कि जब-जब तुम इन्हें अपने होठ से लगाओगे , समझूंगी कि मेरे होठ , तुम्हारे होठों से मिल रहे हैं। और मैं
तुम्हारे लिए सुलगने लगूंगी। तुम मेरे पास दौड़े चले आओगे। ग़ज़ब थी तुम्हारी यह तलब
भी। अजब था तुम्हारा यह इसरार भी। पर मुझे क़ुबूल था तो था। तुम को अचानक लगा कि
हमारी नौकरी छोटी है। तुम ने एक बड़ी कंपनी के चेयरमैन से कह कर मुझे बढ़िया नौकरी
दिलवा दिया। बढ़िया सेलरी के साथ ही कंपनी की तरफ से मुझे कार वगैरह की सुविधा भी
मिल गई। मुझ से ज़्यादा तुम ख़ुश हो गई। ऐसी ही अनेक छोटी - मोटी सुविधाओं से मुझे
तुम लादती गई। कहने को मैं बहेलिया था , तुम चिड़िया। ऐसा तुम ही कहती फिरती। पर अब चिड़िया के जाल में
बहेलिया था। किसी बहेलिये के जाल से चिड़िया फिर भी निकल सकती है। कोई निकाल सकता
है। पर चिड़िया के जाल से निकलना ?
नामुमकिन।
कोई
मान ही नहीं सकता कि चिड़िया भी जाल बिछा सकती है तो निकालेगा भी कैसे भला। निकालने
की सोचेगा भी कैसे ? लेकिन
तुम जाल थी। जल के नीचे भी , जल
के ऊपर भी।
तुम्हारे
अफ़सर पति के पास तुम्हारे लिए समय ही नहीं होता। बेटा कहीं बाहर पढ़ता था। तो
तुम्हें किसी भद्र पुरुष के साथ समय बिताने की तलब लगी। मुझ मछुआरे से बढ़िया कौन
मिलता तुम्हें। बेक़रारी में पहले इसरार करती थी। क़रार आने लगा तब आहिस्ता -
आहिस्ता तुम आदेश देने लगी। यहां मिलो। वहां मिलो। तो कभी घर आ जाओ। मुझे भी अच्छा
लगता यह तुम्हारा बुलाना। लगता था गोया तुम्हारे लिए ही पैदा हुआ हूं। तुम्हीं
मेरा जीवन हो। तुम्हीं मेरा लक्ष्य। तुम्हीं मेरा सब कुछ। सर्वस्व तुम ही। नितांत
निजी क्षणों में भी तुम मुझे ऐसे दुलारती जैसे मैं तुम्हारा शिशु। तुम हमारी मां।
तुम्हारी गोद में लेटना , खेलना
और तुम्हें पाना मेरा सौभाग्य बन गया था जैसे। मन ही मन भगवान से कृतज्ञता ज्ञापित
करता। लाख - लाख शुक्रिया अदा करता रहता। तुम इतना खिलाती - पिलाती और प्यार करती
कि मुझे ख़ुद अपने आप से रश्क़ होने लगा।
तुम
शायद शहर में गिनती की सर्वाधिक सुंदर स्त्रियों में से एक थी। धनवान भी थी।
सलीक़ेदार भी। इस
से भी बड़ी बात कि मेरा सौभाग्य बन कर मेरे जीवन में उपस्थित थी। तुम्हारे जितना
सुख मुझे किसी और स्त्री ने नहीं दिया था। कभी वह दिन था कि तुम्हें देख कर ही ख़ुश
रहता था। तुम्हें छूने से डर लगता था। लेकिन वह कहते हैं न सरकती जाए है रुख़ से
नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता। मेरा डर भी आहिस्ता - आहिस्ता सरकता गया। तुम को सहसा छू
लिया एक दिन। ऐसे जैसे चांदनी को छू लिया हो। किसी बहती हुई वेगवती धारा को थाम
लिया हो। समय को शिला बना लिया हो। समय जैसे रुक गया हो। मन में एक नई मिठास सी
घुल गई। ऐसा स्वाद मिल गया जो कभी पहले नहीं मिला हो। सोने - चांदी जैसे दिन हो
गए। लेकिन वह कहते हैं न कि इश्क़
और मुश्क छिपाए नहीं छिपते। फिर तुम्हारी सुंदरता की सुगंध वैसे भी किसी से नहीं
छुपी थी। इश्क़ की सुगंध भी नहीं छुपी। इश्क़ था कि कुछ और था यह तब न तुम्हें पता
था , न मुझे। पर लोगों को
बहुत कुछ पता हो गया था।
हमारे
तुम्हारे संबंध को ले कर बात तुम्हारे पति तक भी पहुंची। ऐसा तुम ने ही बताया एक
बार। मुझे लगा कि अब शायद तुम मुझ से दूर हो जाओगी। दूर हो जाओगी , यह डर सताने लगा। लेकिन देखा कि अब तुम
मुझे ले कर बहुत पजेसिव रहने लगी। इतना कि मैं परेशान रहने लगा। कई बार किसी ड्रोन कैमरे की तरह काम
करती तुम। हमारी सारी गतिविधियां तुम्हारी जानकारी में रहतीं। जाने कितने जासूस थे
तुम्हारे पास। ख़ास कर अगर शहर में किसी स्त्री से हमारी बात मुलाक़ात हो जाए तो
तुम्हारी जासूसी देखते बनती थी। लगता जैसे कोई तुम्हारी द्वारिका लूट ले गई हो वह
स्त्री । समझ नहीं आता कि इतनी पजेसिव क्यों थी तुम ?
क्या
था मैं तुम्हारा ?
तुम्हारे
प्यार के साम्राज्य का एक मामूली सा नागरिक ?
तुम्हारा
प्यार मुझ में पुलक भरता था। पर यह तुम्हारा साम्रज्यवादी रवैया काट खाता था। तुम्हारा ज़रूरत से ज़्यादा पजेसिव रहना
मुझे बुरा लगने लगा। किसी अपहरणकर्ता जैसा व्यवहार हो गया तुम्हारा। खुल कर तो नहीं पर चुपचाप तुम्हारे
हुक़्म की तामील करने से बचने लगा। नतीज़ा यह था कि आफिस में मुझे अकारण नोटिस मिलने लगी। अचानक
इंक्वायरी शुरू हो गई। एक दोस्त से तुम ने कहलवाया कि कह दो मुझ से आ कर मिले। सब
ठीक हो जाएगा। दोस्त ने यह सब मुझ से कहा और बताया कि , ' भाभी जी से जा कर मिल क्यों नहीं लेते ?
शायद ठीक करवा दें। ' मैं ने उसे बताया कि , 'भाभी जी ही यह सब करवा रही हैं ?
' तो उस का माथा ठनका। बोला , ' क्या कह रहे हो ? ' हम ने कहा , ' ठीक कह रहा हूं। ' कह कर फ़ोन रख दिया। तुम्हें शहर में
ज़्यादातर लोग तुम्हारे पति की प्रतिष्ठा और तुम्हारी सुंदरता को देखते हुए भाभी जी
ही कहते थे। मैं भी तो निजी क्षणों के अलावा तुम्हें लोगों के सामने भाभी जी ही
कहता था। पर
कहते हैं न कि हुस्नो इश्क़ का संगम कब तक ? समझ आने लगा था कि अब हमारा सफ़र ख़त्म
होने को है। इस लिए भी कि तुम
भूल गई कि प्यार में ज़ुल्म और जब्र से काम नहीं चलता। तुम्हारा नहीं जानता पर मैं नया मुसाफ़िर
था इस पथ का। चाहत की चोट से अब बचने की तरक़ीब तलाशने लगा। कुछ दूर साथ चल कर हम
बिछड़ने के मोड़ पर खड़े हो गए थे। तुम्हारे एक वाट्सअप संदेश का जवाब भेज दिया : ' सारे भाव , सारी भावना , भंगिमा और सारी संभावना गोमती में
विसर्जित कर तुम्हें मुक्त कर ख़ुद को भी मुक्त कर लिया है। बहुत जी लिया तुम्हें। '
तुम्हारा रिप्लाई आया , ' सब भूल जाओ। लव यू ! प्लीज मीट मी !'
लेकिन
नहीं आया तुम से मिलने। तुम ने और भी कई लोगों से कहलाया। ख़ामोश रहा। तुम मुझे फ़ोन
पर फ़ोन , वाट्सअप पर वाट्सअप
संदेश भेजती रही। एक बार तो मिल लो। मेरे घर भी गई। मैं नहीं था तब घर पर। घर
पहुंचने पर तुम्हारे आने कि ख़बर मिली और मिल लेने का संदेश भी। नहीं आया तुम से
मिलने। कठोर हो गया था मैं। कह सकती हो निर्मोही। आख़िर मैं क्या था तुम्हारा ?
प्रेमी
? सेक्सटीशियन ? जिगोलो ?
तुम
से , तुम्हारे प्यार से
बग़ावत इतनी भारी पड़ जाएगी , नहीं
जानता था। दूसरे दिन पता चला कि तुम ने अपने हाथ की नस काट ली है। अस्पताल ले जाया
गया। डाक्टरों ने तुम्हें मृत घोषित कर दिया। तुम्हारे अफ़सर पति का रुआब भी कुछ
काम नहीं आया। तुम ने अपनी हत्या के पहले एक नोट लिख कर बता दिया था कि मैं तुम से
मिलने नहीं आया , नहीं
आ रहा था इस लिए तुम दुनिया से जा रही हो। तुम्हारे पति ने फ़ोन कर मुझे यह बताया
और डपटते हुए कहा , ' इतना
बिजी थे कि आए नहीं ? ' उस
ने जोड़ा , ' तुम मेरी पत्नी के
हत्यारे हो ! '
मैं
घर छोड़ कर नहीं गया कहीं। पुलिस के आने की प्रतीक्षा में रहा। पुलिस नहीं आई।
वाट्सअप पर तुम्हारी अंत्येष्टि के समय का संदेश आया। गया। लोग मुझे घूरते रहे। पर
मैं ने इस की परवाह नहीं की। तुम्हारे पति को बाहों में भर कर तसल्ली दी। फूट-फूट
कर रोया। वह भी रोया। एक दूसरे को ढाढस बंधाया। तुम्हारे पार्थिव शरीर पर फूल चढ़ा
कर तुम्हें अंतिम प्रणाम किया। रखना चाहता था पुष्प से घिरे तुम्हारे कपोल पर अपना
कपोल और रोना चाहता था तुम्हारे पार्थिव शरीर से लिपट कर। पर लोगों की आंखें धधक
रही थीं। श्मशान घाट पर प्यार से बड़ा होता है लोकलाज। सो रुक गया। तुम्हारे चरणों
पर माथा रख कर अपने आंसुओं का जल अर्पण किया। गोया सूर्य को अर्घ्य दिया हो। हां ,
तुम मेरे प्रेम का सूर्य ही तो थी। मुझे
प्यार की चांदनी में नहलाती मेरा चंद्रमा भी थी। सहसा तुम्हारी धधकती चिता में ख़ुद
को जलते पाया। तुम तो अग्नि और जल में विलीन हो गई। जल के साथ तुम्हारी अस्थियां
बह गईं। किसी और जल में मिलने के लिए। क्या पता बहती - बहती सागर के जल में मिल
जाओ। गंगा सागर में। जल बदलने का अभ्यास है तुम्हें। लेकिन तुम्हारे मन का यह
मछुआरा अब कहां जाए। तुम्हारे प्रेम जाल से कैसे निकलूं ? कितना अभागा हूं , अपराधी हूं कि तुम्हारे प्यार , तुम्हारी चाहत की क़द्र नहीं कर पाया।
ख़ुद को तुम्हें समर्पित नहीं कर पाया। तुम्हारे पति ने ठीक ही कहा कि मैं तुम्हारा
हत्यारा हूं।
-8-
तुम्हारे बिना
जो ज़िंदगी बन के जीवन में उपस्थित रहा हो , आहिस्ता-आहिस्ता रास्ता बना कर ज़िंदगी से पूरी
तरह बाहर हो जाए तो ? लगता है जैसे कोई दर्पण हो , जिस में आप ख़ुद को देखते रहे हों , वह दर्पण ही झन्न से टूट कर चकनाचूर हो गया हो।
अब देखूं तो कैसे देखूं भला ख़ुद को। समझ नहीं आता। तुम थी ज़िंदगी में तो जैसे लगता
था कि ऐसी ख़ूबसूरत ज़िंदगी कैसे मिल गई मुझे। उस समय के दर्पण में तुम थी , मैं था। किसी हवा की तरह ज़िंदगी में दाख़िल हो
कर किसी बेची गई ज़मीन की मानिंद इस तरह दाख़िल खारिज हो जाओगी , कहां जानता था भला। अब जब तुम ज़िंदगी से दाख़िल
खारिज हो कर निकल गई हो तो बारंबार ख़ुद से पूछता रहता हूं कि तुम ज़िंदगी थी कि कोई
सपना। टूट जाने वाला सपना।
किरिच-किरिच टूट कर बिखरती रहती हो। रिस-रिस कर कर चूती रहती हो
यादों में। गोया कोई खपरैल की छत जगह-जगह से चू रही हो। किसी भारी बारिश में। इतना
कि घर में कहीं खड़े होने की जगह भी नहीं मिले। भीगना लाजमी हो जाता है इस चूते हुए
पानी में। याद है , तुम्हें बारिश कितनी पसंद थी। बारिश
में मेरे साथ चिपके रहना कितना पसंद था। बारिश होती थी और बारिश में भीगता हुआ
आंगन में वह दशहरी आम का पेड़ हम देखते रहते और भीगते रहते प्रेम की बारिश में। तुम
जानती हो कि मुझे दशहरी आम बहुत पसंद है। दशहरी आम का चूसना और उस की मिठास में
डूब कर ही स्त्री के प्रेम की मिठास में डूबा जा सकता है। इस स्वाद के क्या कहने।
इतना कि तुम्हारे वक्ष को भी मैं दशहरी कहने लगा था। दशहरी कहते ही तुम पुलक जाती
थी और मुझे भरपूर प्रेम करने लगती थी।
तुम्हारी दशहरी को चूसना , उस
की मिठास का भास, एहसास और दशहरी की नशीली खुशबू में तर
वह मादक साथ तुम्हारा आज भी सोचता हूं तो भर जाता हूं , तुम्हारे प्यार से। ऐसे जैसे कोई स्त्री पनघट
से गगरी भर कर चल रही हो ,
वैसे ही हुमक-हुमक कर , ठुमक-ठुमक कर चलने लगता हूं। लगता है जैसे
मदमस्त हो कर नदी के पुल पर , पूर्णमासी
की रात पूरा चांद देखती हुई मेरा हाथ पकड़े तुम अभी भी खड़ी हो। और मैं तुम्हें देख
रहा हूं। कभी नदी , कभी चांद , कभी नदी में चांद को , कभी तुम को। आते-जाते लोग , आस-पास खड़े लोग हमें देख रहे हों। जब यह मंज़र याद
आता है तो यही सोचता हुआ नदी के पुल पर जा कर खड़ा हो जाता हूं। अकेले। पूर्णमासी
हो , न हो। तुम्हारी याद हर रात पूर्णमासी
की रात हो जाती है। तुम्हारा दर्पण , तुम्हारे
प्यार का दर्पण टूट गया है पर नदी के जल का दर्पण ? नदी से पूछता हूं। नदी कोई उत्तर नहीं देती।
तुम भी अब उत्तर कहां देती हो। यू डोंट का ताला लगा दिया है , सो अलग। और मैं तुम्हें दिए वायदे के ताले में
बंद हूं। कि यस मी डोंट। सो नो फ़ोन , नो
मेसेज। नो मुलाक़ात। मैं बहुत डिफरेंट क़िस्म का प्रेमी हूं। दिया हुआ वादा कभी
तोड़ता नहीं। घर की शांति को तोड़ता नहीं। सन्नाटा बुन लेता हूं। कोई आवाज़ नहीं
देता। लेकिन पल-प्रतिपल आती तुम्हारी याद का क्या करुं भला। शुक्र है कि इस पर तो
यू डोंट का ताला नहीं लगाया है तुम ने। तुम्हारी याद क्या आती है , विरह की चिता पर किसी सती की तरह बैठ जाता हूं।
धू-धू कर जलने लगता हूं। विरह की इस चिता से सिर्फ़ तुम ही मुझे निकाल सकती हो।
लेकिन नहीं निकालोगी , यह बात भी अच्छी तरह जान गया हूं। पर
तुम्हारी याद ?
आह , यह तुम्हारी याद और विरह की यह चिता।
याद है तुम्हें जब भी कभी तुम मिलती थी तो बरखा बन कर। और मैं भी
बारिश बन कर बरसने लगता था तुम्हारे भीतर। तुम्हारे भीतर जैसे कोई संगीत बजने लगता
था। मद्धम-मद्धम। और मैं किसी जलतरंग की तरह तुम्हारी देह में उतरता था।
धीरे-धीरे। तुम्हारे देह सरोवर में। तुम्हारे देह सरोवर में मन की देहरी पुलक-पुलक
जाती थी। प्रेम की इस बरखा में भीज कर तुम जैसे वसुंधरा हो जाती थी। भरी-पुरी
वसुंधरा। प्रकृति हमें दुलराने लगती थी। सावन की बरखा की तरह। प्रेम की इस बरखा
में नहाई हुई धुत्त तुम्हारी निर्वस्त्र देह जैसे कोई अलसाई हुई निढाल सांझ बन
जाती थी। ऐसे जैसे पूर्ण चंद्रमा , नदी
में उतर आता था। डुबकियां मारता हुआ। कभी डूबता , कभी उतराता। लहरों के बीच खो-खो जाता है जैसे चांद। तुम कहती थी
कभी-कभी कि लहरों पर कभी भरोसा मत करना। मैं पूछता था क्यों ? तो तुम कहती थी कि लहरें यहां-वहां छोड़ देती
हैं। लहरों का स्वभाव ही है छोड़ देना। लहरों को बस यही आता है। तो क्या तुम भी कोई
लहर ही थी। जो मुझे छोड़ कर चली गई। अनायास। नदियां अपने किनारों से मिलती रहती
हैं। कभी तो नदी बन जाओ और अपने इस किनारे से मिल जाओ। भले लहर की तरह फिर छोड़ कर
चली जाना।
तुम्हारी यादों का एक पूरा लश्कर है।
याद है तुम जब भी मिलती थी बाहों में मिलती थी। कभी अवकाश ही नहीं
देती थी तुम कि कभी तो अपने आप से भी मिलूं। महकती मीठी यादों में अब भी मिलती हो।
बाहों में। काश कि महकती मीठी यादों में समा जाओ हरसिंगार सा अनगिन रंग और उमंग
लिए। आ जाओ। तुम कहां हो। हरी घास पर बिछ गए गुलमोहर के नरम फूलों पर बैठ कर
बतियाना याद आता है। तुम्हारे गुलमोहर से दहकते होठ याद आते हैं। गुलमोहर के शहद
में फिर से डूब जाने को मन करता है। तुम्हारे विशाल और सुडौल उरोज , मृदंग जैसे तुम्हारे नितंब , गरदन के पीछे से झांकती तुम्हारी पीठ याद आती है।
यू डोंट के तुम्हें दिए गए वादे में बंध तो गया हूं लेकिन लेकिन लगता है कुछ छूट
गया है वहां तुम्हारे पास। ऐसे कि जैसे ख़ुद ही छूट गया हूं। वहीं तुम्हारे पास ही।
जाने क्या-क्या छोड़ आया हूं।वह धूप, वह
बादल , वह बारिश। वह आंखें, वह सपने , वह
साज़िश भी। तुम्हें पाने के लिए जिन्हें हज़ार बार तोड़ता रहा। जोड़ता रहा अपने नेह से
तुम्हारे भीतर बसे मेह से। यह नेह , वह
मेह और उस की शीतल फुहार। तुम्हारे वक्ष पर कपोल रख कर वह मदमाती मनुहार। यह सब भी
तो तुम्हारे पास ही छोड़ आया हूं। तुम देखना मेरी अंगुलियां।वहीं कहीं तो नहीं रह
गईं। तुम्हें हेरती , तुम्हें सहेजती। तुम्हें थपकी देती।
मेरी हथेलियां भी शायद वहीं रह गई हैं। दशहरी को टटोलती। वह मेरे अधर जिन पर तुम
ख़ुद बांसुरी बनती नहीं अघा रही थी। और कहती थी तुम कि ऐसे ही मद्धम-मद्धम बजना
चाहती हूं तुम्हारे भीतर। कि जैसे मालकोश। क्यों कि इस में ऋषभ और पंचम स्वर नहीं
लगते। इसमें गंधार धैवत और निषाद कोमल लगते हैं। रात्रि के तीसरे प्रहर राग भैरवी
थाट से निकले। इस मालकोश में तुम हरदम निबद्ध होना चाहती थी। मद्धम-मद्धम। हो सके
तो इन सब को सहेज , संभाल कर रखना।किसी सुई-धागे की तरह।
क्यों कि बहुत कुछ छूट गया है तुम्हारे पास। बेहिसाब इस मालकोश को भी उस के भैरवी
थाट में ही शेष रखना। क्यों कि मैं फिर-फिर आऊंगा। किसी रात्रि के तीसरे प्रहर।
तुम्हारे भीतर मद्धम-मद्धम उतरने। उतर कर तुम्हें निबद्ध करने।
देखो फिर से। कुछ छूट गया है। कि कुछ टूट गया है। वहीं तुम्हारे पास
ही। कि टूट गया हूं मैं ही। तुम्हारे पास छूट कर। देखो , मुझे बचा कर रखना। ज़रा देखना तो। कि और
क्या-क्या छूटा है वहां। क्यों कि तुम्हें देखने और तुम से बिछड़ने के द्वंद्व में।
कुछ ला नहीं पाया अपने साथ। लाता भी भला कैसे कुछ। ख़ुद को तोड़ कर छोड़ आया हूं
तुम्हारे पास। तुम्हें याद है जब सर्दियों की धूप में मिलती थी तुम तो तुम्हारे
नर्म और गर्म हाथ मेरे हाथ में आ कर कैसे तो पिघलने लगते थे। हमारी सारी सीमाएं
टूट जाती थीं। शुरुआती दिनों में हम जब किसी रेस्टोरेंट में चोरी-चोरी मिलते थे तो
मैं बहुत परेशान हो जाता था। अच्छा जब एक बार मेट्रो में एकांत पा कर तुम्हें
अचानक चूम लिया था , तुम्हें याद है कि तुम सिहर उठी थी।
भीड़ के सागर में चलते-चलते जब कभी तुम्हें छूता था तो तुम चिहुंक जाती थी। चिहुंक
कर नितांत अपरिचित बन जाती थी। बहुत बाद में तुम ने बताया था कि कई बार तुम्हारा
भी मन हुआ मुझे चूम लेने का। लेकिन मारे लाज के स्त्री सुलभ संकोच के कारण सारी
इच्छाओं को दबा लेती थी। और हां उस कोहरे भरी दोपहर में हम जब नदी किनारे हाथ में
हाथ लिए बैठे थे तभी जल में एक मछली निकल कर छपाक से नदी में फिर कूद गई थी और तुम
ज़ोर से चिल्लाई थी , अरे ! और मेरी गोद में गिर गई थी। ऐसे
जैसे कोई दीवार गिर जाए।
बड़ी देर तक मैं तुम्हारी पीठ को थपकी देता रहा। हाथ जब अनायास पीठ से
होते हुए , पहले नितंब पर थपकी देने लगे और सहसा , अनायास
वक्ष की तरफ बढ़ गए तो तुम चिहुंक कर उठ बैठी थी। और बहुत सख्ती से बोली थी , नो ! थोड़ी देर बाद अपनी शॉल मुझ से शेयर करती
हुई तुम ने धीरे से पूछा था , कोहरे
में ठंड नहीं होती क्या। मैं ने धीरे से
ही बताया भी था कि नहीं होती। तो तुम बुदबुदाई थी कि हां , जानती हूं कि जब मैं साथ होती हूं तो तुम्हें
ठंड नहीं लगती। फिर पलट कर पूछा था , लेकिन भूख ?
क्या
भूख भी नहीं लगती ? जवाब में मैं ने कहा था कि इस मस्त
कोहरे में तुम्हें ठंड और भूख की याद भी कैसे आ गई भला। इस के बाद तुम्हारे मादक
स्पर्श ने मुझे रोमांचित कर दिया था। हम वापस कार में आ गए थे। और बेतहाशा चुंबन
की बौछार कर दी थी मैं ने। तुम ने भी संयम तोड़ दिया था। और हम कार में ही प्यार की
पराकाष्ठा तक पहुंच गए। बाद में अकसर हम लोग कार का इस्तेमाल करने लगे। जिसे बाद
में तुम अकसर कार सेवा कहने लगी। खुल कर कहने लगी , आज कार सेवा के लिए समय निकालते हैं। याद है तुम को मुझ पर घुड़सवारी
भी बहुत पसंद थी तुम को। अकसर तुम फ़ोन करती और कहती कि आज घुड़सवारी का बहुत मन हो
रहा है। आज समय निकाल कर आइए। पहला तो नहीं पर समापन सत्र तुम्हारी घुड़सवारी से ही
होता। संभोग का जैसे स्वाद ही बदल दिया था तुम ने। एक देर शाम जब कोहरा घना हो गया
था और चांदनी नर्म। कोहरा ऐसे घेर रहा था मुझे जैसे मेरी बांहें तुम्हें घेर लेती
हैं और तुम रीझ गई थी। हमारे भीतर प्रेम की एक नदी बहने लगी और एक दूसरे से जोड़
गई। लगा जैसे तुम को ही नहीं , मैं
ख़ुद को भी पा गया हूं। तुम्हें याद है वह ओस में भीगी हुई सुबह। जब मैं तुम्हारे
प्यार की नर्म ओस में भीग गया था। वह ओस आज भी टटकी है। मेरे मन में। याद है
तुम्हें तुम्हारी आंखों और होठों का कोलाज
जब तुम्हारे कपोलों पर रच रहा था तभी ओस की एक बूंद गिरी और मैं नहा गया तुम्हारे
प्यार में। यह ओस की बूंद थी कि तुम्हारा नेह था जो ओस बन कर टपकी थी।
मालूम है तुम्हें जब तुम मिलती थी तो मन जैसे अमृत से भर जाता था
लबालब। अमृत-अमृत हो जाता था मेरा मन और तुम्हारी देह नदी बन जाती थी। नदी में
प्रेम की मछली कुलांचे मारती रहती। तुम मिलती थी तो मन पृथ्वी बन जाता था। इच्छाओं
के पल-छिन में अनगिन फूल खिल उठते थे। एक आग सी सुलग जाती थी हमारी प्रेम की झोपड़ी
में। तुम मिलती थी तो मन नील गगन बन जाता था। प्यार पक्षी। सांझ जल्दी हो जाती थी।
उड़ती हुई चिड़िया ठहर जाती थी। झुंड की झुंड चिड़िया किसी तार पर बैठी दिखतीं तो तुम
चल देती थी अचानक। प्रेम की इस बेला में घड़ी की सुई जैसे ठहर जाती थी। नदी जैसे
विकल हो जाती थी। तापमान शून्य हो जाता था। तापमान का यह शून्य तोड़ देता था मेरे
मन को। प्रेम की बहती नदी बर्फ़ बन जाती थी। बिछोह बन जाता था ग्लेशियर का टुकड़ा।
ठिठुर कर सुन्न हो जाता था हमारे प्रेम का गीत। तुम फिर कब मिलोगी। पूछता था
आहिस्ता से। तुम कुछ बोलती नहीं थी। बर्फ़ के पिघलने की प्रतीक्षा में प्रेम जैसे
अवकाश ले लेता। फूल की तरह फिर खिलने की प्रतीक्षा में। प्रतीक्षारत हो जाता हमारा
प्रेम। प्रेम जो अमृत हो जाना चाहता था।
यही वह दिन थे जब है अपना दिल तो आवारा , न जाने किस पे आएगा। हर ग़म फिसल जाए , जब तुम साथ हो। मौसम ये रूठने मनाने का है।
अपने दामन की ख़ुशबू बना ले मुझे। अलग-अलग समय के यह तीनों फ़िल्मी गाने एक साथ गाने
लगा था। सुनने लगा था। यह कौन सा मनोविज्ञान था भला। न जाने क्यों , न जाने क्यों। गाने बहुत हैं हमारे जीवन में।
लेकिन तुम से बड़ा गाना कभी नहीं मिला जीवन में। गाता रहता हूं अब भी तुम्हें।
देखता रहता हूं। तुम्हारी यादों में जीता
रहता हूं। ऐसे जैसे कोई एबस्ट्रेक्ट पेंटिंग देख रहा होऊं। अभी हवा में ढूंढ रहा
था तुन्हें। तो बादल मिल गया तो उसी से तुम्हारा पता पूछ लिया। बादल बोला , पता तो मुझे मालूम है। पर बहुत जल्दी में हूं
सो पता बता पाना मुश्किल है। बरस सकते हो तो बरसो मेरे साथ। पता ख़ुद-ब-ख़ुद मिल
जाएगा। पहुंच जाओगे उस के पास अनायास। जिस का पता पूछ रहे हो। सो अब बादल नहीं , मैं बरस रहा हूं। तुम तक पहुंचने के लिए।
बारिश का मौसम है इन दिनों शहर में। जब बारिश में शहर झील बन जाता है
तो इस विपदा में भी तुम्हारी आंखें याद आती हैं। आते जाते देखता हूं तो तुम्हारी
आंखें झील सी नज़र आती हैं। सॉरी , शहर
की सारी झील तुम्हारी आंखें बन जाती हैं। तो क्या मैं बारिश बन जाता हूं। तो क्या
मेरी यादों की बारिश से तुम्हारी आंखें झील बन जाती हैं।बारिश जब ज़्यादा हो जाती
है तो शहर में बाढ़ आ जाती है। आबादी बाढ़ में डूब जाती है तो क्या मैं ज़्यादा बरसने
लगा हूं। तुम डूब गई हो। प्यार की बाढ़ में। शहरों का तो बिगड़ गया है। प्यार में भी
पर्यावरण संतुलन बिगड़ता है क्या। बिगड़ता है तो और बिगड़ जाने दो। जैसे गिरती है
धरती पर ओस। तुम मेरी गोद में गिरो। जैसे अंधेरे में दिखती है कोई रोशनी। तुम मेरी
आंख में दिखो। किसी कौतुहल की तरह। जैसे चांदनी में बहती है कोई नदी। चलती है उस
में नांव। जलता है कोई दीप। नदी के किसी द्वीप पर किसी नाविक के उम्मीद की तरह।
ऐसे ही मेरे मन में बहो। चलो नाव की तरह मंथर-मंथर। और जलो दीप बन कर। किसी उम्मीद
की तरह। मैं नदी का वही नाविक हूं। मुझे राह दो प्यार की। दुलार की वह सांझ दो।
मनुहार का वह मान भी। जो देती है धरती , सूर्य
की पहली किरन को। मैं मिट्टी हूं , मुझे
गढ़ो। किसी मूर्तिकार की तरह। अपने प्यार के पानी में सान कर। किसी कुम्हार की तरह
मुझे रुंधो। तरसो नहीं , बरसो। मुझे प्यार के पानी से भरो। किसी
तालाब की तरह। सिंघाड़े की लतर की तरह फैल जाओ मेरे सर्वस्व पर। मैं ऐसा ही चाहता
हूं। याद है तुम्हें कि कभी यही तुम्हारी आंखें मेरा नगर हुआ करती थीं। इस नगर की
नदी में नहा कर गंगा नहा लेता था। तुम्हारी सी बी आई जैसी आंखों में कभी कुछ छुप
नहीं पाता था। मुझ को सब कुछ बता देती थीं। तुम्हारी समुद्र सी गहरी आंखों की
सिलवट देख कर पूर्णिमा की चांदनी मन में उतर जाती थी। कहीं बहुत गहरे।
पर अब कहां ?
तुम तो अब मिलती ही नहीं। बतियाती तक
नहीं। भूल गई हो कि तुम्हारी आंख के नगर का एक निवासी मैं भी हूं। निवासी हूं कि
प्रवासी। कि तुम्हारी आंखों की नदी ने संन्यास ले लिया है ?
और तुम्हारे अधर और तुम्हारी वह खिलखिलाती हंसी। एक बार तम्हारे होठ
चूसते हुआ कहा था तुम से कि यह अधर हैं या बनारसी पान की गिलौरी। मन करता है गप्प
से इन्हें खा जाऊं। किसी गोलगप्पे की तरह। और कूंच -कूंच कर खाऊं पान की तरह। फिर
तुम्हें बांसुरी की तरह बजाऊं। तुम्हारे अधर की बांसुरी बजे। मैं तुम्हारे अधर के
आकाश में खो जाऊं। यह सुन कर किसी षोडशी की तरह तुम पुलक गई थी। पर करता भी क्या।
तुम्हारे होठ किसी बांसुरी की धुन से भी ज़्यादा मीठे हैं। किसी फूल से भी ज़्यादा
मादक यह तुम्हारे रसीले होठ , ज़्यादा
मोहक, ज़्यादा दिलकश और शहद से भी ज़्यादा
मिठास घोले तुम्हारे यह होठ मेरी सर्वदा कमज़ोरी रहे। इन होठों में जादू जगा कर जब
तुम हंसती थी तो इन होठों में कितने तो गुलाब , एक
साथ खिल पड़ते थे। लगता था कि चंडीगढ़ का रोज गार्डेन हमारे भीतर उतर आया है। इन की
सुगंध में मैं डूब जाता था तब। इन होठों के दरमियां कितने कनेर , कितने कचनार खड़े हो जाते थे तब। याद है कुछ ? तब तो मन में बेला उमग जाती थी। रातरानी खिल
जाती थी। हरसिंगार का फूल झरने लगता था। मन फागुन , वसंत हो जाता था। ऐसे गोया तुम्हारे नयन फागुन हों , अधर वसंत। इन अधरों के इंद्रधनुष में इतना
मोहित रहता था कि सारा दुःख भूल जाता था। हमारा संसार सुनहरा बन जाता था।
तुम्हें याद करता हूं तो तुम्हारे साथ बिताई सर्दियां याद आ जाती
हैं। थोड़ी लकड़ी , थोड़ी आग। बैठ कर तुम्हारे साथ ली गई
कुछ सांस। तुम्हारी बांह में ली गई उच्छवास याद आ जाती है। इस चांदनी रात में और
क्या चाहिए। मन करता है कि तुम से कहूं कि
यह मन नहीं , एक धरती है। तुम मेरे मन में पसर जाओ।
जैसे पसरती है धरती पर चांदनी। जैसे पसरता है कोहरा किसी झील पर। फैलती है ख़ुशबू
किसी मधुबन में आधी रात। यह रात नहीं है , रात
का रंग है। तुम्हारे कंधे और गरदन के बीच रगड़ खाती मेरी नासिका में फैल रही सुगंध
है। यह तुम्हारा खिल-खिल मन और मौन है। तुम्हारी चूड़ियों की तरह खिलखिलाता हुआ।
समय का कैमरा दर्ज कर ले। इस चांदनी की ख़ुशबू को। इस चांदनी रात में तुम्हें देखने
को। इस चांदनी रात में तुम्हें चीन्ह कर। याद की गठरी में बांध ले। चांदनी मचल ले
ज़रा तुम्हारे रूप जाल में। तुम्हारे घने बाल में , रुको मेरी बांह में। इस सर्द रात में तुम्हारी आग बहुत ज़रूरी है।
जीने के लिए। तब तक रुको। पर कहां भला।
तुम्हें याद है कि कितना तो मन था कि कभी किसी चांदनी रात को किसी छत
पर तुम्हारे साथ रात गुजारुं। ठंडी सफ़ेद चादरों पे जागें देर तक / तारों को देखते
रहें छत पर पड़े हुए , वाला गाना गुनगुनाते हुए। छत पर पड़े हुए , गाते हुए। तुम से अकसर कहता रहता। पर पूर्णमासी
का चांद तो तुम देखती-दिखाती रहती। कभी नदी किनारे से। कभी किसी फ़्लैट की बालकनी
से। लेकिन कभी कोई चांदनी रात मयस्सर नहीं हुई किसी छत पर कि तुम्हारी गुदाज देह
के साथ निरापद हो कर उस चांदनी में नहाता और तुम्हें अपने प्यार में नहलाता। पर यह
सपना अधूरा रह गया तो अधूरा ही रह गया।
सपनों में तो तुम आज भी मिलती हो। तुम मिलती हो ऐसे जैसे नदी का जल
और छू कर निकल जाती हो। मुझे भी क्यों नहीं साथ बहा ले चलती। सपने में ही सही
तुम्हारे मिलने के रूप भी अजब-गज़ब हैं। कभी किसी नदी में आई बाढ़ सी भरी-भरी हुई।
कभी जमुना के पाट की तरह फैली और पसरी हुई। कभी सरयू की तरह घाघरा को समेटे सीना
ताने गीत गाती हुई। कभी तीस्ता की तरह चंचला तो कभी व्यास की तरह बहकी हुई। कभी
झेलम और पद्मा की तरह सरहदों में बंटती और जुड़ती हुई। नर्मदा और साबरमती की तरह
रूठती-मनाती हुई। कभी कुआनो की तरह कुम्हलाई हुई। कभी गोमती की तरह बेबस। कभी
वरुणा की तरह खोई और सोई हुई। कभी गंगा की तरह त्रिवेणी में समाई हुई। हुगली की
तरह मटियाई और घुटती हुई। रोज-रोज ज्वार-भाटा सहती हुई। कभी यह , कभी वह बन कर। छोटी-बड़ी सारी नदियों को अपना
बना कर। सारा दुःख और दर्द अपने में समोए हुई। सागर से मिलने जाती हुई। निरंतर
बहती रहती हो मेरे मन की धरती पर। इतनी हरहराती हो , इतना वेग में बहती हो कि मैं संभाल नहीं पाता , न तुम को , न
खुद को। तुम्हारे भीतर उतरता हूं तो जल ही जल में घिरा पाता हूं। जल का ऐसा घना
जाल
तुम्हारे भीतर की नदी में ही मिलता है। कभी कूदा करता था नाव से बीच
धार नदी में झम्म से। नदी का जल जैसे स्वप्न लोक में बांध लेता था। भीतर जल में भी
तब सब कुछ साफ दीखता था। बीच धार नदी के जल में धरती तक पहुंचने का रोमांच ले कर
कूदता था। पर कभी पहुंच नहीं पाया जल को चीरते हुए धरती तक। आकुल जल ऊपर धकेल देता
था कि मन अफना जाता था। कि अकेला हो जाता था उस विपुल जल-राशि में। आज तक जान नहीं
पाया। लेकिन पल भर में ही जल के जाल को चीरता हुआ झटाक से बाहर सर आ जाता था। जल
के स्वप्निल जाल से जैसे छूट जाता था। फिर नदी में तैरता हुआ , धारा से लड़ता हुआ। इस या उस किनारे आ जाता था।
यह मेरा आए दिन का खेल था। कि हमारा और नदी का मेल था। लोग और नाव का मल्लाह रोकते
रह जाते, बरजते रह जाते।लेकिन स्वप्निल जल जैसे
बुला रहा होता मुझे। और मैं नाव से नदी में कूद जाता था झम्म से , बीच धार। नदी की थाह नहीं मिलती थी। कोई कहता
पचीस पोरसा पानी है , कोई बीस , कोई
पंद्रह। एक पोरसा मतलब एक हाथी बराबर
यानी सैकड़ो फीट गहरे पानी में उतरने का रोमांच था वह। तुम्हारी भी
थाह नहीं मिलती। तुम को पा कर भी कहां पा पाया। पर तुम से जुड़ने का रोमांच तो विरह
की इस चिता में जलते हुए भी महसूस करता रहता हूं।
बरसों पहले पहली बार जब हवाई जहाज में बैठा था तो रोमांचित होते हुए
एक सहयात्री ने बताया था कम से कम बीस-पचीस हज़ार फीट ऊंचाई पर हम लोग हैं। आकाश
इतना ऊंचा हो सकता है। और ज़्यादा ऊंचा हो सकता है
होता ही है अनंत। पर नदी इतनी गहरी नहीं होती , न इतनी चौड़ी। ब्रह्मपुत्र नद भी नहीं , समुद्र भी नहीं। हेलीकाप्टर ज़रूर ज़्यादा ऊंचा
नहीं उड़ता। धरती से जैसे क़दमताल करता उड़ता है। दोस्ताना निभाता चलता है। सब कुछ
साफ-साफ दीखता है। धरती भी , धरती
के लोग भी। हरियाली तो जैसे लगता है अभी-अभी गले लगा लेगी। जैसे तुम्हें देखते ही
मैं सोचता हूं कि गले लगा लूं। समुद्र की लहरों की तरह तुम्हें समेट लूं। लेकिन
तुम तो समुद्र की विशालता देख कर भी डर जाती हो। तुम्हें याद है समंदर के रास्ते
में जब हम स्टीमर पर थे। सुबह होना ही चाहती थी , पौ फट रही थी। तुम ने खिड़की से बाहर झांक कर देखा था। और लोक-लाज छोड़
मुझ से चिपकते हुए सिहर गई थी। पूछा था मैं ने मुसकुरा कर कि क्या हुआ। चारो तरफ
सिर्फ़ पानी ही पानी है , दूर-दूर तक कहीं कुछ नहीं।
सहमती हुई ,
अफनाती हुई , आंख बंद करती हुई तुम बोली थी। ऐसे जैसे तुम
नन्ही बच्ची बन गई थी। जाने क्यों प्रेम हो या डर आदमी को बच्चा बना ही देता है।
लेकिन तुम्हारे भीतर उतरने का रोमांच। बार-बार उतरने का रोमांच
सैकड़ो या हज़ारो फ़ीट गहरे उतरने का तो है नहीं। अनंत की तरफ जाने का
है जहां कोई माप नहीं। मन के भीतर उतरना होता है। और तुम हो कि नदी के जल की तरह
हौले से छू कर निकल जाती हो। कि इस एक स्पर्श से जैसे मुझे सुख से भर जाती हो।
लगता है कि जैसे मैं फिर से नदी में कूद गया हूं झम्म से। प्रेम की नदी में। तुम
मुझे छू रही हो और मैं डूब रहा हूं। जैसे उगते-डूबते सूरज की परछाईं नदी में डूब
रही है। तुम्हारे भीतर की धरती मुझे छू रही है।
लेकिन इतना सारा प्रेम का अमृत पीते हुए भी हम जानते थे कि विवाहेतर
प्रेमियों की कोई पहचान नहीं होती। इस तथ्य को हम दोनों ही जानते थे। सो अपने
प्रेम की सीमा भी जानते थे। सब के सामने अपरिचय की सुरंग में छुपना भी जानते थे।
परछाईं भी जैसे हम से हमारी आंख चुरा लेती थी। प्रेम का उफान जैसे रुक जाता था।
हमारा प्रेम जैसे डर जाता था। हमारा प्रेमी चोर बन जाता था। दुःख-सुख में हम साथ
होते हुए भी साथ नहीं दीखते थे। लोकलाज की चादर में लजाए रहते थे। हम मर-मर जाते
थे पर न हमारा मरना कोई देख पाता था , न
कोई धुआं। तुम तरसती रहती थी। हमारे एक क्षणिक स्पर्श के लिए सुलगती रहती थी। और
एक स्पर्श पाते ही , प्यार भरे क्षणिक स्पर्श में तुम्हारी
दुनिया संवर जाती थी। किसी फूल से भी ज़्यादा खुशबू से भर जाती थी। शहद से भी
ज़्यादा मिठास से भर जाती थी तुम। ख़ूब-खूब ख़ुश हो जाती थी। तुम्हारी इस ख़ुशी की
खुशबू में नहा कर न्यौछावर हो जाता था मैं।
इसी मिठास में जीवन गुज़ार दिया है। जां निसार हूं। पूस के धूप में
तुम्हारे रुप पर न्यौछावर मैं था ही कि अचानक क्या हुआ कि तुम बदलने लगी। प्रेम की
नदी का किनारा और बल खाती लहरों और कूदती उछलती मछलियों की तरह जाने कैसे मुझ से
खोने लगीं। लगता कि बंद मुट्ठी में रेत की तरह मुझ से फिसलती जा रही हो। चैत की
चांदनी सा सुख , रातरानी सी गमकती रातों जैसा प्रेम का
पाग अब बिसरता जा रहा है हमारे बीच से। जीवन के जंगल से सट कर बहती हमारे प्रेम की
निर्मल नदी , हमारे नसीब से छूट रही थी। कि शायद
जीवन की सड़क पर प्रेम के ट्रैफिक को हम संभाल नहीं पाए। आज तक नहीं जान पाए। नहीं
वह दिन भी थे कि मैं तुम्हें सुंदर कहता और तुम मगरूर हो जाती थी। तुम्हें ज़िंदगी
और ज़िंदगी का सब से बड़ा अरमान कहता और तुम अकड़ कर चूर हो जाती थी। तुम को चांद
कहता तो तुम चांदनी बन जाती। जान कहता तो तुम मदहोश हो जाती। ज़िंदगी कहता तो चमक
कर शमशीर हो जाती। तुम हमारा नशा बन गई। नदी की किसी धार की तरह , सागर में मिलती किसी नदी की तरह मेरी ज़िंदगी
में समाने लगी क्या समा गई। सुमन और सुगंध की तरह हम एक हो गए। लगा कि हमने प्यार
कर के जग जीत लिया है।
फिर क्या था जब तुम कभी आती झूमती-झामती हुई तो लगता कि बरखा की पहली
बूंद आ रही हो। मस्त हवा की तरह , फूल
की खुशबू की तरह आती और किसी अबोध बच्चे की तरह मेरे गले में दोनों हाथ डाल कर झूम
जाती। मन में प्यार का मौसम मचल जाता। तमाम दुःख मर जाते और मन में रातरानी खिल
जाती। गहरी झील में किसी हंसिनी की तरह अपनी ही छाया में उतरती जाती तुम। गौरैया
की तरह फुदकती हुई , औचक सौंदर्य का इंद्रधनुष रचती हुई मुझ
पर छा जाती। प्रेम को पर्वत की तरह जीती हुई , देवदार
की तरह सिर उठा कर जीती हुई , अपने
देह-सरोवर में मुझे डुबोती हुई , प्रेम
की चांदनी खिलाती हुई तुम क्या से क्या हो जाती थी , यह तुम क्या जानो भला। जैसे कोई औरत पकाती है धीमी आंच पर खाना , वैसे ही तुम चाहती थी कि मैं तुम से प्यार
करुं। यही अंदाज़ प्रेम का मुझे पसंद था तुम्हारे साथ। प्रेम को सिर उठा कर करना
सीखा था तुम ने मेरे साथ। दासी की तरह नहीं। प्रेम में बराबरी बहुत ज़रुरी है। दासी
बना कर स्त्री के साथ न प्रेम हो सकता है , न
सफल संभोग। प्रेम और सेक्स का सुख बराबरी में ही मुमकिन होता है। यह बात कम पुरुष
जानते हैं। एकतरफा सेक्स को ही प्रेम मानने की मूर्खता करना पुरुष की आम प्रवृत्ति
है। स्त्रियों को यह पसंद नहीं। लेकिन वह यह कह नहीं पातीं। तुम भी लोकलाज में फंस
कर कभी अपने पति से यह बात नहीं कह पाई। मुझ से लेकिन कहती रहती। मुझ से यह सब
कहने के लिए तुम किसी बंधन में नहीं थी। दासी नहीं , प्रेयसी हो तुम हमारी यह बात जब मुझ से तुम ने सुनी तो भाव-विह्वल हो
गई। लगा कि तुम क्या पाओ ,
क्या दे दो मुझे। तुम ने मुझे दिया भी।
अपना अगाध प्रेम। अविरल और अलौकिक प्रेम। तुम्हारे पास अगाध प्रेम था मेरे लिए , तुम ने मुझे दिया। तुम नहीं जानती , तुम आज भी भले न मिलो , न बात करो पर तुम्हारा वह अगाध और निश्छल प्रेम
तो है मेरे पास ही। प्रेम के बीज को वृक्ष में विरूपित इसी भाव और विशवास में ही
तो हम ने किया था।
मेरा बराबरी से मिलना तुम्हें भा जाता था।
स्त्री को मैं गुलाम नहीं समझता , यह
तुम्हें अच्छा लगता। तुम कहती कि भले मैं ने प्रेम विवाह किया है पर प्यार तो आप
से ही मुझे मिला है। विवाह से मुझे सेक्स सुख का तो पता चला पर प्रेम का सुख नहीं।
बाद में यह सेक्स सुख भी सिर्फ़ पति के ही हिस्से में रह गया। पति का आदेश , पति की इच्छा ही सेक्स हो गया। मेरी ज़रुरत क्या
है , मेरी भी कोई इच्छा है , पति को आज तक नहीं पता। मैं औरत नहीं सेक्स का
इंस्ट्रूमेंट हूं। सेक्स का खिलौना हूं , पति
के लिए। बस। तुम्हारी यह यातना ही शायद तुम्हें मुझ तक खींच कर ले आई। तुम ने
प्यार किया और चली गई। जैसे प्रेम से तुम्हारा पेट भर गया। लेकिन अपने प्रेम में
मुझे क़ैद कर गई। इस प्रेम की क़ैद में गिरफ़्तार तुम्हारे प्रेम की कचहरी में
तुम्हारी पैरवी करता हुआ मैं एक वकील की तरह नहीं एक मुलजिम की तरह पेश हूं।
बिजली जाती है , आ
जाती है। नेटवर्क जाता है ,
आ जाता है। तुम क्यों नहीं आती।
काश कि इंश्योरेंस एजेंसियां हेल्थ की तरह प्रेम का भी इंश्योरेंस
करती होतीं। और हम कैशलेश क्लेम ले कर अपने खोए प्रेम को पा जाते। कई बार सोचता
हूं कि कहीं ऐसा तो नहीं कि जिसे हम लोग मोहब्बत कहते हैं , वह महज़ एक ज़रुरत भर है। ज़रुरत ख़त्म , मोहब्बत ख़त्म। सो सच-सच बताना प्रिये कि मैं
ज़रुरत था कि मोहब्बत। सच बताओगी तो बुरा नहीं लगेगा। क्यों कि जो स्त्री प्रेम के
लिए पिता और पिता का घर सर्वदा के लिए छोड़ सकती है , वह अगर प्रेम में है , तो
पति का घर भी तो छोड़ ही सकती है। इतना साहस तो कर ही सकती है। कि सारा साहस पिता के
लिए ही था। तो क्या यह सचमुच मोहब्बत थी ? मोहब्बत
थी कि ज़रुरत ? ज़रुरत को लोग मोहब्बत का नाम देते ही
क्यों हैं , समझ नहीं आता। ज़रुरत ख़त्म , मोहब्बत ख़त्म। ज़िंदगी का यह अजीब सिलसिला है।
तुम को याद ही होगा कि प्रेम के लिए मुझे तुम ने ही चुना था। तलाश तुम्हीं ने किया
था। शायद संभोग का स्वाद बदलने के लिए। प्रेम की प्यास बुझाने के लिए। जो भी हो , तुम ही जानो। मैं तो बस तुम्हारे प्रेम की नदी
की धार में अनायास ही समा गया था। जैसे नदी कंकड़ , पत्थर , हीरा , मोती सभी कुछ साथ बहा ले जाती है। वैसे ही मैं भी तुम्हारी प्रेम नदी
की धारा में बहता रहा। अब तुम्हारी नदी की कोई लहर किसी किनारे पर मुझे छोड़ कर आगे
बढ़ गई है तो मेरा क्या दोष। प्रेम नदी के किनारे अभी भी बहने की प्रत्याशा में
प्रत्याशी की तरह उपस्थित हूं। मन ही मन बहता जा रहा हूं।
तुम नहीं जानती तो अब से जान लो प्रेम मां की तरह होता है। मां का
दुलार कभी खत्म नहीं होता। प्रेम किसी का भी हो , प्रेम खत्म नहीं होता। समय-समय पर तुम्हारे साथ मिले वह पक्षी , वह कोयल , वह
वृक्ष , वह वनस्पतियां वह किसिम-किसिम के फूल , वह तुलसी का चौरा , वह बारिश , वह
पुरवा , वह धूप , वह चांदनी ,
वह आम्र मंजरियां , वह पल्लव , बारिश
में भीगता , आंगन का वह दशहरी का पेड़ , हरी घास पर बिखरे वह गुलमोहर के फूल भी कभी
तुम्हें नहीं भूलेंगे। नहीं भूलेगी वह मछली भी जो हमें तुम्हें देखते हुए , नदी में छपाक से कूदी थी। वह कोहरा , वह ओस की बूंद सब की यादों में तुम ठहरी हुई
हो। इन सभी की याद में भी तुम रहोगी। वह नदी भी तुम्हें कहां भूलेगी भला जहां , जिस पर बने पुल पर खड़े हो कर हम पूर्णमासी का
चांद देखा करते थे। पूर्णमासी के चांद में हम तुम जैसे दर्ज हैं। सर्वदा के लिए।
हम ही नहीं , यह सभी तुम से प्रेम करते हैं। और
प्रेम किसी का भी हो , प्रेम खत्म नहीं होता। कभी नहीं होता।
मेरी मुश्किल देख कर लोगबाग़ पूछते रहते हैं , क्या हुआ ? लोगों
को बताता रहता हूं कि एक औरत थी जो मुझे जवान बनाए रखती थी। वह मुझे छोड़ कर चली
गई। लोग मुझ पर हंसते हुए निकल जाते हैं। याद है तुम्हें पाने की हड़बड़ाहट में कार
की लाइट आफ करना भी कई बार भूल जाता था। वापसी में बैटरी डाऊन हो जाने के कारण कार
स्टार्ट नहीं होती तो तुम्हें अकेले लौटना होता था। झल्लाती हुई लौटती थी तुम।
प्यार का सारा हरसिंगार झर कर बिखर जाता था। ऐसे ही बिखर गया हूं , तुम्हारे बिना। ज़िंदगी की बैट्री डाऊन हो गई
है। प्रेम की मछली तड़प रही है , तुम्हारे
प्यार के पानी बिना।
-9-
सपनों का सिनेमा
कभी कभी अब भी तुम सपनों में झांक जाती हो तो लगता है जैसे कोई
सिनेमा शुरू हो गया है। ऐसा सिनेमा जिस की कोई एक कहानी नहीं होती। टुकड़ों-टुकड़ों
में बंटी कई सारी कहानियां। उन दिनों की कहानियां जब मैं तुम से प्यार करता था।
इकरार और इसरार करता था। बेकरार तुम्हारी आंखों में झांक-झांक निसार होता था।
बिलकुल ठीक वैसे ही तुम आज भी सपनों में झांक गई हो।
और सपनों की एक रेल चल गई है। सॉरी रेल नहीं, मेट्रो रेल। कि चली नहीं कि तुम्हारा हाथ हाथों
में ले लूं कि दूसरा स्टेशन आ गया है। आता ही जा रहा स्टेशन-दर-स्टेशन पर तुम्हारा
हाथ मेरे हाथों में नहीं आ पाता। जैसे तुम मेरी ज़िंदगी में आ कर भी नहीं आ पाई।
जैसे कोई क्लास में तो रोज बैठे। सारे पीरियडस भी पढ़े। इम्तहान का फ़ार्म भी भरे।
पर ऐन वक्त पर इम्तहान देने से रह जाए। और जब इम्तहान ही नहीं दिया तो फिर रिजल्ट
भी कैसे आए भला ?
मैं पूछना चाहता हूं कि यह हमारे सपनों में तुम्हारी मेट्रो इतनी तेज़
चलती क्यों है? कि सारा सिनेमा गडमड हो जाता है।
टुकड़ों-टुकड़ों में बंटी कहानी वाला सिनेमा। कुछ-कुछ कहानियां ऐसी जिन के टुकड़े
कैमरा क़ैद नहीं कर पाता। कुछ दृश्यों को निर्देशक समझ नहीं पाता। तो कुछ को पटकथा
लेखक पहले ही निकाल बाहर फेंक देता है। कि इस से तो सिनेमा स्लो हो जाएगा। और सब
को फास्ट चाहिए। बिलकुल कसा हुआ। चाहे सिनेमा हो, चाहे औरत, चाहे प्रेम। क्या इसी लिए कहते हैं कि
कथा और पटकथा नदी के दो छोर हैं। कथा इस पार, पटकथा
उस पार। ज़्यादा कुछ तो इसी में साफ हो जाएगा। बाक़ी का निर्देशक और कैमरा मारेगा।
तो कुछ एडिटिंग में खो जाएगा। मतलब कहानी का सत्यानाश्! लेकिन सिनेमा चलेगा हमारे
सपनों का।
तुम्हें याद है?
मुगल गार्डेंन में अंत्याक्षरी खेलते-खेलते हम लोग जब-तब लिपट जाते
थे। अंत्याक्षरी तो एक बहाना था। तुम मुझ से गाना सुनना चाहती थी। और मैं गाता था।
तुम्हारे लिए। एक बार गांधी समाधि पर जब रधुपति राघव राजा राम गाने लगा था तो तुम
कैसे तो तमक कर उठ खड़ी हुई थी कि अभी मैं मरी नहीं हूं ! मेरे मरने पर यह गाना। और
मैं, ‘कोरा कागज था ये मन मेरा, लिख दिया नाम उस पे तेरा !’ गाने लगा था।
उन्हीं दिनों एशियाड हुआ था। इंदिरा गांधी ने दिल्ली में एक साथ कई
फ्लाई ओवर बनवा दिए थे। उन फ्लाई ओवरों पर जब कोई युवा जोड़ा चिपटा-चिपटा अपनी बाइक
से सन-सन करता गुज़रता तो तुम फिर मचल जाती। कहती कि, ‘तुम भी बाइक ख़रीदो न! मैं भी तुम्हारी कमर में हाथ डाल कर तुम्हारे
साथ चिपट कर बैठना चाहती हूं। पर पैसे ही इतने नहीं हुए तब कि कभी बाइक ख़रीद कर
तुम्हें चिपटा कर बैठाता। कुछ बैंकों के चक्कर भी मारे। कि लोन मिल जाए। बाइक के
लिए। पर नहीं मिला। तुम्हारी यह फ़र्माइश नहीं पूरी कर पाने का मलाल आज तक है। इतना
कि बाइक चलाना भी आज तक नहीं सीखा।
हम लोग एक शाम जब दिल्ली के लोहे वाले पुल पर पैदल चलने वाले हिस्से
पर खड़े थे। हाथों में हाथ लिए यमुना की धारा को निहारते हुए। पुल के नीचे से एक
नाव गुज़री थी। उस नाव पर भी एक जोड़ा था। लगभग लिपटा हुआ, गुत्थमगुत्था। यह देख कर तुम मचल गई थी कि, ‘हम भी नाव पर बैठेंगे! ’ कि तभी पुल के ऊपर से कोई रेल गुज़री थी धड़-धड़ ! समूचा पुल
हिलने लगा था। और तुम मारे डर के मेरे सीने से लिपट गई थी। किसी सिनेमाई हिरोइन की
तरह। बगल से गुज़रते हुए लोग ‘ओए-ओए!’ कहते हुए मज़ा लेने लगे थे। मैं असहज हो गया
था। पर तुम बेख़बर सीने से चिपटी रही। ट्रेन के गुज़र जाने के बाद हम लोग नाव के
लिए घाट पर भी गए थे। अंधेरा होने को था। कोई नाव वाला तैयार नहीं हुआ। हम दोनों
मायूस लौटे थे। दूसरे दिन मुद्रिका वाली बस में हम बैठे। हाथ में हाथ लिए। एक
दूसरे के स्पर्श में खोए। बस से कौन उतर रहा है, कौन चढ़ रहा है, इस
सब से बेख़बर। एक ही बस में अप-डाउन करते रहे। दिन भर। उतरे नहीं। बस एक दूसरे को
महसूसते हुए बैठे रहे। कंडक्टर अजीब़ नज़रों से घूरता रहा। मैं असहज हो गया। पर तुम
बेख़बर रही।
वह जाड़ों के दिन थे। जब तुम गांधी नगर की गलियों में एक रात मुझ से
सट कर चल रही थी। कि अचानक दो तीन कुत्तों ने भौंकना शुरू किया। मैं डर गया। डर कर
ýक गया। कुत्ते पास आए। तुम्हें मुझ से प्रेम
में पड़े देख कर यकायक भौंक कर चुप हो गए। मैं तो कुत्तों से डरता रहा, तुम मुस्कुराती खड़ी रही। कुत्ते हमारे प्रेम को
देख कर जैसे मुदित हो गए। चुप हो गए। और दुम हिलाते हुए चले गए। तुम से, तुम्हारे प्रेम के ऐसे अनगिन दृश्य हैं मेरी
आंखों में, मेरी यादों में, मेरी सांसों में। किसी न ख़त्म होने वाले
सिनेमा की तरह। जैसे सिनेमा तो वही हो पर उस के सारे शो में हम तुम ही बैठे हों।
फ़िल्म एक दूजे के लिए की याद है तुम्हें? दरियागंज
के गोलचा सिनेमा में तुम्हारे साथ देखी थी। कमल हासन और रति अग्निहोत्री जब लाईट
जला-बुझा कर, संकेत दे कर अपने-अपने घरों से मौन
संदेश भेजते हैं। और एक दृश्य में कपड़ा धोते-धोते, कपड़ा पटकते-पटकते, कपड़ा
फाड़ देने वाला वाकया देख कर कितना तो ठठा कर हंसा था मैं। और तुम ने अपना हाथ मेरे
मुंह पर रख दिया था। और खुसफुसाई थी कि, ‘इस
तरह मत हंसो, लोग देख रहे हैं।’
अब तो कुतुबमीनार की सीढ़ियां बंद हैं चढ़ने के लिए। पर तुम्हें याद है
कि एक बार कुतुबमीनार की अंधेरी सीढ़ियां उतरते हुए पीछे से बांहों में भर कर चूम
लिया था तुम्हें। और तुम खूब ज़ोर से चीख़ी थी। कि सब लोग ठिठक गए थे। यह हमारे
प्यार के पछुवा के दिन थे। पछुवा हवा बहती है तो पानी लाती है। बादर को बरसाती है।
कनाट प्लेस में पालिका बाज़ार उन दिनों नया-नया बना था। दिल्ली का
पहला अंडर ग्राउंड मार्केट। हम बाज़ार में बेवज़ह घूम ही रहे थे। कि कुछ लोग आए जो
बरसात में भीगे हुए थे। तुम मचल गई कि हम भी भीगेंगे। हम ऊपर आ गए थे। भीगने लगे।
तुम भीगती हुई घास पर लेट गई। मुझे भी बुला कर अपने पास लिटा लिया। हम
गुत्थमगुत्था पड़े रहे थोड़ी देर। बारिश बंद हो गई। सन्नाटा टूट गया। लोग आने-जाने
लगे। हम भी उठ गए। मद्रास होटल के बस स्टैंड पर आ कर बैठे तो तुम अचानक चीख़ पड़ी, ‘हाय मेरी चुन्नी!’ हम भाग कर फिर वहां गए। बहुत
खोजा पर तुम्हारी चुन्नी नहीं मिली।
बहुत दिन हो गया था तुम मिली नहीं थी। एक शाम तुम्हारे घर की सीढ़ियां
चढ़ रहा था। सीढ़ियां चढ़ते हुए तुम्हारे घर से तुम्हारी मां की चीख़ती-चिल्लाती आवाज़
सुनाई दे रही थी। मन हुआ कि लौट जाउळं। पर ठिठक कर रुक गया। ज़रा रुक कर सीढ़ियां चढ़ते हुए तुम्हारे घर
के दरवाज़े पर आया तो दरवाज़ा खुला था। मैं भीतर घुस आया। देखा कि तुम्हारी मां
तुम्हें पीट रही हैं कपड़े धोने वाली थापी से। मैं अवाक् था। घर में सब लोग थे।
लेकिन तुम्हें पिटने से रोकने में किसी की भी दिलचस्पी नहीं थी। सो मैं ने बढ़ कर
तुम्हारी मां का हाथ पकड़ लिया। उन्हों ने मुझे आग्नेय नेत्रों से देखा और कपड़े
धोने वाली थापी वहीं फर्श पर पटक कर भीतर के कमरे में चली गईं। मैं ने तुम से पूछा
कि, ‘आखि़र बात क्या है?’ तो तुम जैसे बिलखती हुई फूट पड़ी, ‘तुम!’
मैं अवाक्, हैरान, परेशान सा तुम्हें देखता रहा। मेरी घिघ्घी बंध गई। धीरे से बुदबुदाया, ‘अरे!’
मैं ने तुम्हारा हाथ पकड़ा ज़ोर से और तुम्हारे घर से तुम्हें बाहर
निकाल लाया। हमें सीढ़ियां उतरते हुए तुम्हारे पिता, भाई, बहन और मां देखते रहे। पड़ोसी भी लेकिन
हम दोनों साथ-साथ चुपचाप सीढ़ियां उतरते रहे। गोया सूरज की किरने उतर रही हों और
शाम हो गई हो।
लेकिन हमारे घर आ कर तुम खिल उठी थी। हमारी ज़िंदगी में सवेरा हो चुका
था। सवेरे की लाली हमारी ज़िंदगी पर तारी हो गई थी। हम बिना शादी के साथ-साथ रहने
लगे। लोगों ने इसे लिव-इन-रिलेशनशिप का नाम दे दिया था। इस लिव इन के पहले भी तुम
कई बार मेरे इस कमरे पर आई थी। और हमने बहुत बार देह को संभोग के आवेग में ढकेला
था। पर जाने क्यों अब की इस लिव-इन में दस दिन बीत जाने के बाद भी हम संभोगरत नहीं
हुए। न हमने कभी सोचा इस बारे में न तुम ने कोई पहल की। एक बिस्तर में सोने के
बावजूद। यह तुम्हारी मां की थापी से तुम्हारी पिटाई का असर था, कि तुम्हारी देह में दर्द का असर था कि किस का
डर और किस का असर था, जान पाना कठिन था। लेकिन ठीक ग्यारहवें
दिन हम संभोगरत हो गए। फिर नियमित। पर वह पहले वाला आवेग नहीं था हम दोनों के
संबंधों में। कहीं कुछ रिक्तता थी, कहीं
कुछ छूट रहा था। कहीं कुछ टूट रहा था।
क्या यह हम दोनों का एक दूसरे से मोहभंग का समय था?
पता नहीं। पर जल्दी ही हम दोनों में बात-बेबात झगड़े शुरू हो गए थे।
नौबत हाथा-पाई की आ गई। सारा प्यार, सारा
इकरार भस्म हो गया था। तब के दिनों। एक पड़ोसिन ने बीच बचाव किया। समझाया-बुझाया।
गाड़ी फिर चल निकली। हम छुट्टियां मनाने हफ़्ते भर के लिए चंडीगढ़ गए। वहां रॉक
गार्डेन, रोज गार्डेन घूमते-घामते, सुकना झील में बोटिंग करते हुए, भुट्टे और आइसक्रीम खाते, साथ-साथ रहते हुए लगा कि सचमुच हम एक दूजे के
लिए ही हैं। दो रात पिंजौर गार्डेन में गुज़ारने के बाद यह एहसास और घना हुआ। जैसे
कि कोई नदी बहती हुई अच्छी लगती है, वैसे
ही हम इस शहर से उस शहर घूमते हुए अच्छे लगते। फिर तो हमने तय कर लिया कि हम
छुट्टियां बाहर ही मनाया करेंगे। बाहर जा कर घूमने-फिरने से हमारा प्यार और गहरा
हो जाता। हमारा आपसी विश्वास और उस की संवेदनाएं और गाढ़ी हो जातीं। आगरा से चंडीगढ़
तक हम ने कई-कई बार घुमाई की। लोगों का पसंदीदा ताजमहल होता है पर फतेहपुर सीकरी
हमारी पसंदीदा जगह थी। जो छुटिट्यां मैं अम्मा के साथ गांव में बिताता था, तुम्हारे साथ घूमने में बिताने लगा। अम्मा
नाराज भी होती और कहती कि,
‘बाबू तुम बदल
रहे हो। अब तुम मेरे पास बहुत कम आते हो। यह क्या हो गया है तुम्हें ?’ मैं चुप रहता।
भला क्या जवाब देता अम्मा की बातों का? श्रीनगर
घूमने जाने की तैयारी में थे तब हम।
कि अचानक मेरी नौकरी छूट गई। घर खर्च में दिक्कतें आने लगीं।
घूमना-फिरना थम सा गया। प्यार की नदी दुबराने लगी। अचानक एक शाम घर पहुंचा तो
तुम्हारी मां आई हुई थीं। वह तुम्हें ले जाने के लिए आई थीं। ले गईं। मैं ने कुछ
कहा नहीं।
कुछ दिन बाद मैं ने नई नौकरी शुरू की। सोचा घर कुछ व्यवस्थित होने के
बाद तुम्हें लिवा लाऊंगा । और कि अब की कुछ दिन तुम्हारे साथ रहने के बाद तुम्हारे
साथ लिव-इन के बजाय शादी कर के रहूंगा। पर यह सब सोचना सिनेमा बन कर रह गया।
एक संडे की सुबह-सुबह मेरे घर पुलिस आ गई। पुलिस आई तो पड़ोसी भी आ
गए। मैं तमाशा बन गया। ख़ैर, पुलिस
ने थोड़ी बहुत बदतमीजी से पेश आने के बाद थोड़ी सहूलियत दी। एक दारोगा बोला,‘कपडे़-सपड़े पहऩ ले और थाने चल !’
थाने आया तो पाया कि तुम्हारा पूरा घर उपस्थित था वहां। भाई, पिता, मां, बहन समेत तुम खुद। मेरे ख़िलाफ़ दहेज उत्पीड़न की
तहरीर तुम्हारी ओर से लिखी जा चुकी थी। यह जान कर मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक
गई। मैं ने दबी जबान कहा कि, ‘जब
शादी ही नहीं हुई, न शादी की बात, तो यह दहेज कहां से आ गया?’
‘तो
बिना शादी के ही हनीमून मना रहा था चंडीगढ़ और आगरा में?’ दारोगा कुछ फ़ोटुओं को दिखाता हुआ बोला।
‘हनीमून
तो नहीं पर हां हम साथ-साथ थे। दिल्ली में भी साथ ही रहते थे। लिव-इन-रिलेशनशिप
में थे हम।’
‘ये
कौन सा रिलेशन होवे है जी!’ दारोगा बोला, ‘इंडिया
है यह, लंदन-अमरीका ना!’
‘ठीक
है पर यह दहेज वहेज की बात बकवास है। आप पूरी तफ़्तीश कर लीजिए। फिर, बेशक मुझे जेल भेज दीजिए।’
‘सात
साल तक जमानत ना होगी!’ दारोगा ने फिर कहा।
‘मालूम
है।’
थाने में तुम्हारी तरफ से सब लोग थे और मैं अकेला। मैं ने तुम से
अकेले में दो मिनट बात करने की मोहलत मांगी। जिस का पुरज़ोर विरोध तुम्हारी मां ने
किया। लेकिन पुलिस ने इज़ाज़त दे दी। मैं मौक़ा पाते ही थाना परिसर में नीम के पेड़ के
नीचे तुम से लिपट गया था। बरबस रो पड़ा। फूट-फूट कर। रोते हुए ही तुम से गिड़गिड़ाया, ‘क्यों मेरी और अपनी ज़िंदगी ख़राब कर रही हो।
क्यों प्रेम में गांठ डाल रही हो!’
‘मैं
नहीं, मम्मी!’ तुम ने भी सुबकते हुए कहा था
और अपनी पिटाई के निशान दिखने लगी थी कि तभी तुम्हारी मां आईं और तुम्हें घसीट ले
गईं, ‘लैला की अम्मा चल यहां से !’ और तुम
चली गई थी।
पुलिस ने बाद में मुझे भी शक के बिना पर छोड़ दिया था। बाद में पुलिस
मेरे नए दफ़्तर भी जब-तब तफ़्तीश के नाम पर आती रही। मुझे बदनाम करती रही। कुछ पैसे
दे कर कंप्रोमाइज़ करने का दबाव डालती रही। मैं ने आजिज आ कर सोच लिया कि अब यह
नौकरी ही नहीं, यह शहर दिल्ली भी छोड़ देना है। अभी इसी
उधेड़बुन में था कि एक दिन तुम्हारा भाई आया। बोला, ‘पापा की तबीयत बहुत ख़राब है। हिंदूराव अस्पताल में हैं। आप से मिलना
चाहते हैं। कह कर रोने लगा। हिंदूराव अस्पताल में तुम्हारे पापा की हालत देख कर
तकलीफ हुई। वह लाचार थे और मैं अभिशप्त। तुम्हारे पापा चाहते थे कि मेैं तुम्हारी
ज़िम्मेदारी ले लूं। तुम से शादी कर लूं। वहीं पता चला कि तुम्हारी मां से पूरा
परिवार परेशान है। और कि तुम्हारे पापा उन्हीं की बदतमीजियों से उपजी बीमारियां
झेल रहे हैं। लेकिन मैं बीमार नहीं पड़ना चाहता था। मैं ने वह नौकरी छोड़ दी, दिल्ली छोड़ दी। तुम को छोड़ दिया। अपने आप को
छोड़ दिया।
फिर दिल्ली तभी आया जब बेटे का नाम जे.एन.यू. में लिखवाने आना पड़ा।
नहीं पता था कि तुम मिल जाओगी ! जे.एन.यू. की उन रोमांटिक पहाड़ियों के बीच। तुम
मिली खूब चटक सिंदूर लगाए। बड़ी सी गाड़ी में। ऐसे मिली जैसे इतने सालों में हमारे
बीच कुछ हुआ ही न हो। तुम्हें अपने बेटे का नाम लिखवाना था, मुझे अपने। सारी औपचारिकताओं के बाद तुम ने
अपने हसबैंड से भी मिलवाया। वह भी ऐसे मिला गोया कब से मुझे जानता हो। तुम और
तुम्हारे पति मेरे बेटे के लोकल गार्जियन बन गए।
लगा जैसे तुम फिर मिल गई हो। जे एन यू की पहाड़ियों के बीच हमारा
प्यार जैसे फिर से खिल गया। तुम्हारे हसबैंड खुद आ कर होटल से मेरा सामान ले कर
तुम्हारे घर लाए।
अब हम दिल्ली फिर से आने-जाने लगे। लगा कि जैसे तुम और तुम्हारी यह
दिल्ली मेरे लिए ही बनी हो। एक दिन देखा कि मेरा बेटा तुम्हें मम्मी जी ! कह रहा
है। मैं ने टोका तो बोला,
‘आंटी ने ही कहा
है कि आंटी मत कहा करो, ख़राब लगता है। मम्मी ही कहा करो।’ मैं
ने तुम को भी टोका तो तुम बोली, ‘हां, वह मेरा मानस पुत्र है !’
मैं चुप रह गया। सोचने लगा कि यह कौन सा नया सिनेमा चल रहा है हमारी
जिंदगी में ? इस की परिणति क्या होगी ? कथा-पटकथा किस की है और निर्देशक कौन है इस नई
फ़िल्म का?
अब दिल्ली बहुत बदल गई थी। पर हमारा प्रेम नहीं बदला था। हमारी चाहत
बरकरार थी। मेट्रो लाइन के लिए जगह-जगह सड़कें खुद रही थीं पर हम दोनों ने कभी भूल
कर भी अपने अतीत को नहीं खोदा। न तुम ने, न
मैं ने। जब भी कभी मौक़ा मिलता हम आलिंगनबद्ध हो जाते। छिटपुट संभोग के आवेग भी घट
जाते। तुम्हारा पति बड़ा सरकारी अफसर था। उसे समय वैसे ही नहीं रहता था। पर मैं जब
भी दिल्ली में होता तो वह कोशिश करता कि शाम की शराब वह मेरे साथ ज़रूर पिये।
धीरे-धीरे हम लोग हम निवाला, हम
प्याला बन गए। लेकिन तमाम नशे के बावजूद उस ने कभी हमारा अतीत जानने की कोशिश नहीं
की। बावजूद इस के कि उसे यह पूरा एहसास था कि मैं तुम्हारा प्रेमी हूं। मैं इस से
बहुत प्रसन्न रहता। तुम दोनों के बीच जाने यह कौन सी संधि थी। जाने कौन सी
डिप्लोमेसी थी। जाने कौन सी केमेस्ट्री थी। ख़ैर, सब कुछ स्मूथली चल रहा था कि एक दिन तुम अचानक मुझ पर बरस पड़ी। बोली, ‘तुम अब मेरे घर मत आया करो !’
‘ओ.
के. !’ कहते हुए मैं सकते में आ गया। फिर संभलते ही धीरे से पूछा, ‘लेकिन क्यों?’
‘तुम
ने मेरे हसबैंड को शराबी बना दिया है।’ तुम तुनकती हुई बोली, ‘तुम चाहे जितना शराब पियो मुझे कोई मतलब नहीं।
पर मेरे हसबैंड को बख्श दो !’
मैं चुपचाप तुम्हारे घर से मय सामान के चला आया। हमारे सपनों के
सिनेमा का यह जाने कौन सा मोड़ आ गया था। जो मेट्रो के लिए खुद रही सड़कों में दफन
हो रहा था। मायूस मन से मैं लौटा था तब दिल्ली से। छोड़ दिया शराब भी। और एक बार
फिर भूल गया तुम को और तुम्हारी दिल्ली को भी।
पर भूल कहां पाया?
बेटा भी पढ़-लिख कर मुंबई चला गया नौकरी करने।
बहुत दिनों बाद तुम दिखी फ़ेसबुक पर। तुम्हें फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी
पर तुम्हारा कनफ़र्मेशन नहीं आया। अब तक नहीं आया। तुम्हारी वाल पर जा -जा कर
तुम्हारी फ़ोटुएं और पोस्ट देख-देख कर चला आता हूं।
अब देखो कि एक शादी में शरीक़ होने कुछ बरस बाद फिर दिल्ली आया हूं।
तुम्हारे सपनों का सिनेमा फिर जाग गया है। तुम नहीं हो, तुम्हारी याद है। चंडीगढ़ और आगरा में बिताए दिन
याद आते हैं। तुम्हारे साथ खेली अंत्याक्षरी और गाने याद आते हैं। तुम्हारे साथ
देखे गए सिनेमा याद आते हैं। एक-एक पल याद आते हैं। मुद्रिका वाली बस की याद आती
है। लोहे वाला पुल याद आता है। गांधी नगर की गलियां और वह कुत्ते याद आते हैं।
कुतुबमीनार याद आता है। पालिका बाज़ार की घास और बरसात याद आती है। जाने कितने आवेग
और संभोग याद आते हैं। अब तो दिल्ली में मेट्रो फर्राटे भरती है। सोचता हूं कि काश
तुम एक बार फिर कहीं भूले से ही सही मिल जाओ तो तुम्हारे साथ दिन भर मेट्रो में
घूमूं। तुम्हारा हाथ-हाथ में लिए। वैशाली से द्वारिका और फिर द्वारिका से वैशाली।
बेवज़ह घूमता रहूं। तुम्हारे साथ। तुम्हारे भीतर अपने को खोजता हुआ। जैसे सपनों का
सिनेमा मेरे भीतर रील दर रील चलता जा रहा है। पर तुम हो कि मिलती ही नहीं। मैं
अकेले ही घूम रहा हूं। मेट्रो में। वैशाली से द्वारिका, द्वारिका से वैशाली। यह कौन सा सिनेमा है हमारे
भीतर? जो ख़त्म ही नहीं होता। सारे स्टेशन एक
जैसे हैं। आते-जाते, चढ़ते-उतरते लोग भी एक जैसे। सब
अपने-अपने सपनों के सिनेमा में। लेकिन इस भीड़ में तुम मिलती क्यों नहीं। क्या
तुम्हारे सपनों का सिनेमा ख़त्म हो गया है? हमारे
पल-छिन प्रेम का सिनेमा। काश कि तुम कहीं मिल जाओ ! अभी बहुत सी कहानियां, कहानियों के टुकड़े जोड़ने हैं। यह सपने भी
टूट-टूट कर क्यों आते हैं?
अब सपना नहीं, मैं टूट रहा हूं। काश कि तुम मिल जाओ ! और जो
मिलती नहीं हो तो सपनों में झांकती क्यों हो? बंद
करो सपनों और यादों में यह पुरवा हवा की तरह बहना। और झांकना। बूढ़ा हो रहा हूं। सो
दर्द बहुत होता है।
-10-
प्रतिनायक मैं
एक रंग था जो डूब गया। हां, तुम्हारी
इन आंखों में अब वह रंग नहीं रहा। वह कंवारा रंग जो कभी देखा था। और रीझ गया था।
बहुत पहले की बात है यह। अब न वह बात है न वो रंग। बावजूद इस के तुम से एक रिश्ता
जोड़ना चाहा है कि शायद जुड़ते-जुड़ते शेष हो चला है ? जो भी हो, यह मेरा मुगालता है, या कि था। एक रोज तुम ने ही यह बताया था।
बहरहाल, बोलो, कहां से शुरू करूं इस अनकहे संबंध की कथा ? या कि इसे भी अनकहा ही रहने दूं ? बोलो ना ? नहीं
बोल सकतीं न ? मत बोलो।
वैसे भी तुम हो बड़ी बेईमान ! यह ख़ूब जानता हूं, मैं। तुम्हारी यह बेईमानियां, ख़ूबसूरत बेईमानियां, मेरे लिए अब एक मीठी-सी यादगार बन चली हैं, जिन का सिलसिला अगर बहुत बड़ा नहीं तो छोटा भी
नहीं है। लेकिन ठहरो ! अगर तुम बेईमान हो तो मैं क्या हूं ? पहले यह तय करना होगा, फिर कोई और बात। और, यह तुम तय करोगी।
देखो, तुम फिर चुप रह गईं। यह चुप्पी अच्छी
नहीं है। यह जानो कि कभी-कभी बहुत-बहुत सालती है यह। खलती है बुरी तरह। वैसे
तुम्हारी इस चुप्पी में भी एक अर्थ है। बहुत साफ झलकता है, वह अर्थ। आख़िर इस ‘चुप्पी’ की ही यातना तो झेल
रहा हूं। वैसे वह चुप्पी नहीं थी, यार
! एक किस्म का संकोच था वह। संस्कारों का संकोच। कह सकती हो तुम कुछ भी कह सकती हो
जैसे कि मैं कहता जा रहा हूं। देखो, तुम
ने फिर कुछ नहीं कहा। तुम्हारी यह चुप्पी काट रही है। बेतरह काट रही है।
हां, जानता हूं तुम कुछ नहीं कहोगी। अव्वल
तो तुम मुंह ही नहीं खोलोगी। खोलोगी भी तो सफाई देने के लिए, कुछ कहने के लिए नहीं। और मुझे सफाई नहीं
चाहिए। बड़ी घिन लगती है, तुम्हारी लचर और बचकानी सफाइयों से।
हुंह ! बड़ी अजीब हो तुम भी। ख़ुद तो कुछ बोलती नहीं। सिर्फ सुनना चाहती हो, झुनझुने की तरह। अगर सचमुच तुम झुनझुना ही
सुनना चाहती हो तो वो देखो,
तुम्हारा बेटा झुनझुना ही खेल रहा है।
है न ! तुम हां, या ना भी नहीं कह सकती। आख़िर तुम बोलती
क्यों नहीं ?’
जानती हो, तुम बेईमान जरूर हो, पर तुम्हारे कहे पर मुझे कहीं इत्मीनान भी है।
इस लिए कुछ तो कहो। याद है,
तुम ने एक बार कहा था, ‘मैं भी पत्थर की नहीं हूं सब कुछ समझती हूं।’
अब भी मानता हूं कि तुम पत्थर दिल नहीं हो लेकिन तुम्हारी जबान काठ क्यों हो गई है
? समझ नहीं पा रहा। हो सकता है क्या, दोष मेरा ही है।
अब सोचता हूं कि इतने बरस बाद अब तुम से नहीं मिलना चाहिए था। जाने
कैसे तो मिला था। तुम्हें शायद याद न हो। मुझे तो पूरा याद है। चलो तुम्हें भी याद
दिलाता हूं। कहीं कुछ गलत कहूं या फिर तुम्हें भी कुछ याद आए तो बोल देना। हां, सफाई नहीं देना। कहा न बड़ी घिन आती है तुम्हारी
बचकानी और लचर सफाइयों से। तुम दे कैसे लेती हो, समझ नहीं पाता।
हां, तो उस दिन, दिन नहीं शाम के धुंधलके में पहुंचा था
तुम्हारे वहां। तुम शायद पहचान नहीं पाई थीं....या कि न पहचान पाने का ढोंग कर रही
थीं, नहीं जानता। हां, तुम ने लपक कर बड़े जबरदस्त संबोधन से नवाजा था, ‘अरे धनंजय भाई साहब !’ फिर पलट कर बोली थीं, ‘ममी, धनंजय
भइया आए हैं।’ पहुँचते-पहुंचते ही तुम्हारे स्वागत के इस ढंग से मैं पूरा का पूरा
ध्वस्त हो गया था। फिर जल्दी ही वापस हो गया था। जितने भी देर रहा, बड़ा उखड़ा-उखड़ा-सा। हालां कि तुम बड़ी आत्मीयता
से बोलती-बतियाती रही। बावजूद इस के मैं और रुक न पाया। किसी काम का बहाना बनाया, ‘फिर आऊंगा’ कह कर फूट लिया। बाद में तुम्हारे
यहां मेरा आना-जाना काफी हो गया। बल्कि जरूरत से ज्यादा हो गया। क्या बताऊं, तुम्हें देखने की लालसा इतनी तीव्र हो जाती कि
बस क्या बताऊं ख़ैर, छोड़ो भी। हां, तो मैं बता रहा था कि बाद में तुम्हारे यहां
मेरा आना-जाना काफी हो गया। एक तरह से बड़ी बेहयाई के साथ हिलमिल गया था। बात ही
बात में एक रोज उस धुंधली शाम की समीक्षा तुम ने अपने ढंग से की थी, ‘सच ! उस दिन तो तुम बड़े अक्खड़ से लगे थे।’ अब
भला तुम्हें यह कैसे बताता कि उस दिन अक्खड़ क्यों लगा था। और तुम्हें बड़े अनमने
ढंग से एक संक्षिप्त जवाब ‘हूं’ कह कर टाल गया था। जवाब में तुम तो कुछ नहीं बोलीं
लेकिन तुम्हारी आंखों में एक अजीब-सा सवाल उभरा था। और मैं उस का सामना करने से
कन्नी काट गया था। ख़ैर, उस शाम जल्दी ही वापस लौट गया था।
रास्ते में निश्चय किया कि अब कभी तुम से नहीं मिलूंगा। हालां कि यह निश्चय तीन
दिन में ही टूट गया। चौथे दिन तुम्हारे यहां फिर हाजिर था। उस दिन भी रास्ते में
दुबारा निश्चय किया कि अब फिर कभी तुम से नहीं मिलूंगा। फिर तो यह निश्चय जाने
कितनी बार किया। मैं परेशान-सा हो उठता। जाना कहीं और होता, पहुंच तुम्हारे यहां जाता, कोई न कोई बहाना बना कर। बुरी तरह विवश हो जाता
था। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। अजीब चक्कर चला। इस आने-जाने का भी। एक शाम की बात
है। तुम्हारी नाक की लौंग देख कर मैं ने पूछा था कि, ‘इसे कब से पहन रही हो ?’ जवाब
में तुम ने आंखें तरेरी थीं। फिर मैं ने पूछा। तुम उठ कर रसोई में चली गईं। थोड़ी
देर बाद जब तुम वापस आईं,
मेरी जबान पर फिर वही सवाल था। तुम ने
चिढ़ते हुए कहा था, ‘याद नहीं।’ तुम्हारे इस जवाब में झूठ
साफ झलकता था। लेकिन मैं था कि जिद किए बैठा था। आख़िरकार तुम तंग आ गईं और बोलीं, ‘क्या करोगे इसे जान कर ?’ मैं ने कहा था, ‘अरे बताओ तो सही।’ फिर भी तुम ने वही सवाल दुहराया कि, ‘क्या करोगे जान कर।’ मैं ने बिना किसी
लप्पो-चप्पो के कह दिया था,
‘यही कि तुम्हें
कब से जानता हूं। मतलब कि....’ और तुम तुनक गई थीं। थोड़ी देर बाद फिर जब मैं ने
कुरेदा तो तुम ने बड़े ठंडेपन से कहा था, ‘देखो, ऐसे बेतुके सवाल-जवाब न किया करो।’ उस ठंडेपन
को तुम ने भले ही न महसूसा हो, लेकिन
मैं बुरी तरह कांप गया था। फिर लाख चाहने पर भी दुबारा ऐसे सवाल तो दूर इस संदर्भ
में भी कभी कुछ तुम से नहीं कह पाया।
हां उस दिन जाने कैसे....? जाने
कैसे क्या तुम ने ही मजबूर किया था। हुआ यह कि तुम्हारी विदाई होने वाली थी। हालां
कि साथ सिनेमा देखने की योजना पर तुम ने किसी तरह पानी फेर दिया था। बावजूद इस के
मैं ने तुम्हें अपने कमरे पर बुलाया था। यह कह कर कि तुम से बहुत सारी बातें करनी
हैं। आख़िर चली जाओगी। फिर जाने कब भेंट हो ? बड़े
नखरों के बाद किसी तरह तुम अपने बेटे और छोटी बहन शिखा के साथ आईं। बेटा तुम्हारा
ऊधम मचाता रहा। छोटी बहन रसोई में चली गई, शायद
कॉफी बनाने। और मैं था कि तुम से कन्नी काटता जा रहा था। लेकिन तुम्हारा घेरा इतना
जश्बरदस्त था....कि बस मत पूछो। बहरहाल, तुम
रह-रह कर कुरेदती रही, ‘क्या बात करनी थी, करते क्यों नहीं ?’ लेकिन मैं बस मैं ही था। तुम क्या जानो कि उस
समय मेरे ऊपर क्या गुजर रही थी ?
बहरहाल, मैं फिर भी कतराता रहा। यह कह-कह कर कि, ‘अरे नहीं, कुछ
नहीं। बस, वैसे ही तुम्हें यहां बुलाने का एक
बहाना भर था।’ लेकिन तुम शायद ताड़ गई थी कि मैं झूठ बोल रहा हूं, कहीं कुछ छिपा रहा हूं। और रट लगाए रही कि
‘नहीं, बात तो कुछ जरूर है। देखो, मैं भी समझती हूं।’ मैं ने पूछा था, ‘क्या समझती हो ?’ तुम ने कहा था, ‘बहुत
कुछ।’
‘तो
फिर समझती रहो।’
लेकिन फिर भी तुम नहीं मानी....बराबर बोलती रही, ‘बताओ न क्या बात है ? बताते क्यों नहीं ?’
सच बताऊं, उस दिन जितना मुखर तुम्हें न कभी पहले
देखा था, न आज तक देख पाया हूं। सच बताओ, तुम्हारी वह मुखरता अब कहां खो गई है? या कि तुम खो गई हो ? बोलो न। अरे कुछ तो बोलो। सुनते-सुनते उकता तो
नहीं र्गईं?
बहरहाल, मुझे कहना है, मैं कह रहा हूं। आज नहीं कह पाया तो कभी नहीं
कह पाऊंगा। और जो कह नहीं पाऊंगा तो सच जानो, वह
भीतर-भीतर घुमड़ता रहेगा, परेशान करता रहेगा। जैसा कि अब तक करता
रहा है। लगातार। ख़ास कर इन दिनों में। तुम यकीन नहीं करोगी कि यह सब सोच-सोच कर
दिमाग कितना ख़ब्त हो जाता है। लगता है सारी नसें यक-ब-यक फट कर बिखर जाएंगी। कभी
लगता है, पागल हो जाऊंगा। तो कभी सोचता हूं कि
किसी चीज से टकरा कर क्यों न जान ही दे बैठूं। लेकिन, यह सिर्फ सोचता हूं। तुम सोच रही होगी, कि यह शख़्स कहानी अच्छी गढ़ लेता है। लेकिन इतना
जानो शिप्रा, यह सब कुछ मैं कहीं से भी गढ़ नहीं रहा
हूं। जो महसूसा है, वही कह रहा हूं। यह अलग बात है कि सारा
कुछ कह भी नहीं पा रहा हूं। एक विवशता है, संकोच
है। न कह पाने का।
फिर भी मुझे सुनाना है और तुम सुन रही हो, इस से भली बात भला और क्या हो सकती है ?
हां, तो तुम बड़ी उतावली में थी। तुम्हारी
जिद पर मैं ने तुम से कहा था, ‘तो
आओ, बीते दिनों की ओर चलते हैं।’ और तुम
मुसकुराई भर थी।
और हम उन बोलते-बतियाते दिनों के बीच थे कि शिखा रसोई से कुछ लिए आई।
तुम ने झट अपने होंठों पर उंगली रख मुझे चुप रहने का इशारा किया था तुम्हारा इशारा
समझने के बाद भी मैं ने जान-बूझ कर बल्कि कहो, शरारतन
कुछ कहना चाहा था कि तुम्हारी आंखों ने ऐसे घूरा कि मैं एकदम अवाक् रह गया। तुरंत
ही कोई दूसरा प्रसंग छेड़ बैठा। लेकिन अब मैं उतावला हो रहा था। ख़ैर, किसी तरह शिखा को फिर वापस रसोई में भेजा। और
अभी मैं कुछ कहने की सोच रहा था कि तुम फिर फूट पड़ी, ‘कहो न, जो कहना है जल्दी कह डालो, नहीं शिखा फिर आ जाएगी और सारी बात धरी की धरी
रह जाएगी और फिर कभी न कहना कि मैं ने सुना नहीं....।’
‘तुम
से मैं जितना आहत हूं, उतना ही....हां, तुम ठीक कहती हो। सच बड़ा सुख मिला है तुम्हारे
इस कहने में कि ‘फिर कभी न कहना....’ सचमुच मैं बड़ा ख़ुशकिस्मत हूं कि कुछ और न सही, कम-से-कम इतनी सदाशयता तो तुम दिखा ही रही हो।
अब कैसे मैं तुम से कहूं कुछ, समझ
नहीं पा रहा। जाने कितनी बातें सोच जाता था कि तुम से मिलूंगा तो यह कहूंगा, वह कहूंगा।’
‘तो
फिर कहते क्यों नहीं ? इत्ती लंबी-चौड़ी भूमिका क्यों बना रहे
हो ? या कि जो कहना था वह सब कुछ याद नहीं आ
रहा ?’
‘देखो
शिप्रा, मेरी याददाश्त इत्ती कमजोर नहीं, कम-से-कम इस वक्त तो बिलकुल नहीं। बल्कि एक-एक
बात, एक-एक क्षण, सब कुछ एकदम स्पष्ट मेरी आंखों में तैर रहा है।
बस मुश्किल है तो बस यही कि तुम से कैसे कहूं, बल्कि
क्यों कहूं ?’
‘देखो, धनंजय, तुम
बिला वजह सारा वक्त जाया कर रहे हो, शिखा
आती होगी। तुम ने कॉफी फिर से गरम करने को भेजी है न, गरम हो गई होगी।’
‘छोड़ो
भी, कॉफी गरम भी हो गई होगी, तो अब की उसे फिर दूसरी कॉफी बनाने तुम भेज
देना।’
‘मुझे
कॉफी-वॉफी नहीं पीनी। मुझे बहुत अच्छी भी नहीं लगती। हां, तुम्हें जो कहना है, कहते क्यों नहीं ?’
‘सोच
रहा हूं।’
‘क्या
?’
‘कि
तुम कहीं कुछ अन्यथा न ले बैठो।’
‘मैं
क्यों अन्यथा ले बैठूंगी भला ?’
‘बात
ही कुछ ऐसी है।’
‘चलो, तो भी सही। मैं ने कहा न, तुम बगैर किसी चिंता के कह डालो। मैं बिलकुल
बुरा नहीं मानूंगी। हां, नहीं कहोगे तो जरूर बुरा मान जाऊंगी।’
तुम फिर मुस्कुराई थी।
‘मैं
ने कहा न तो भी तुम बुरा मानोगी।’
‘ओफ्फो
यह क्या रट लगा रखी है देखो मैं अभी चली जाऊंगी !’
अब की मैं मुसकुराया था....लेकिन भीतर-भीतर कहीं हिल भी गया था कि
तुम कहीं सचमुच ही न चली जाओ....लेकिन तुम्हें न तो जाना था न तुम गईं। बस रट लगाए
रही।
‘दरअसल
शिप्रा, जो बातें तुम से कहनी हैं, वे तुम्हारे ही बारे में हैं।’
तुम अचकचाई तो नहीं, लेकिन
अतिरिक्त नाटकीयता के साथ भौंचक हो गई थी और बोली थी, ‘मेरे बारे में ?’
‘हां, तुम्हारे बीते दिनों के बारे में। तुम्हारे
अपने बारे में।’
‘यह
क्या कह रहे हो तुम ?’
‘हां, ठीक कह रहा हूं।’
‘तुम
मुझे पहले भी जानते थे ?’
‘हां।’
‘लेकिन, मैं तो तुम्हें नहीं जानती थी।’
‘एकदम
नहीं ?’
‘ऊं
हूं !’
‘फिर
?’
‘जानती
तो थी, लेकिन बस जानती थी, ठीक से नहीं जान पाई।’
‘तुम
ने जानने की कभी कोशिश भी की ?’
‘कैसी
कोशिश ?’
‘यही
मुझे जानने की।’
मैं मुसकराया था।
तुम बोझिल-सी हो गई थीं और बोली थी, ‘ऐसी कोशिश, इस तरह की कोशिश ! इस में पहल तो
तुम्हारा पुरुष वर्ग ही करता है।’
‘देखो, अब बात मोड़ो नहीं।’
‘बात
नहीं मोड़ रही। सच कह रही हूं। तुम से तो झूठ नहीं ही बोल सकती। ख़ास कर इस समय।’
‘तो
तुम मुझे नहीं ही जानती थी ?’
‘हां, नहीं ही जानती थी, उस जानने को भी भला जानना कहते हैं ?’
‘लेकिन
शिप्रा, मैं तुम्हें जानता था, कहीं बहुत गहरे जानता था। तुम से कुछ ही
मुलाकषतों, जिन्हें तुम अपनी तरह में मुलाकषत नहीं
कह सकती उन्हीं चंद मुलाकषतों के बाद से ही तुम्हारे लिए बेचैन रहने लगा था....फिर
भी तुम से इस मसले पर कभी जरा भी होंठ खोले हों, याद नहीं आता। तुम अलबत्ता इधर-उधर की बातें बतिया लेती थीं। बोलो, कुछ याद आ रहा है ?’
‘ऊं
हूं।’
‘देखो, अभी तुम कह रही थी कि ‘झूठ नहीं बोल सकती।’ और, अभी झूठ बोल गई।’
‘कहां, क्या मैं ने कहा ?’
‘अभी
‘ऊं हूं’ किस बात पर की है ? यह
झूठ नहीं है ?’
‘ओफ्फ
धनंजय, इत्ती-सी बात....।’
‘अब
तुम्हारे लिए इत्ती-सी बात हो सकती है ख़ैर, यह
जानो कि मैं तुम्हें ....लेकिन छोड़ो भी, क्या
जरूरत है यह सब कहने की....।’
‘हां, जरूरत नहीं है।’
‘क्या
?’
‘कहा
न, जरूरत नहीं है यह सब कहने की।’
‘देखो, तुम बुरा मान गई न। मैं कह रहा था।’
‘नहीं, मैं बिलकुल बुरा नही मानी हूं।’
‘देखो, तुम लाख यह कहती रहो कि मैं बुरा नहीं मानी हूं
लेकिन तुम्हारा तेवर ही कह रहा है कि कहीं न कहीं मेरी कोई बात तुम्हें बुरी लग गई
है।’
‘नहीं, ऐसा नहीं है, धनंजय। तुम मुझे समझ नहीं पा रहे....तुम जो कह रहे थे कहो मैं अब
पूरा सुनूंगी। हालां कि बगैर पूरा सुने भी तुम्हारी बात मैं समझ गई हूं।’
‘क्या
?’
‘यही
कि तुम क्या कहना चाहते हो। और, अभी
क्या कहोगे।’
‘बताओ
तो सही, क्या कहूंगा ?’
‘इत्ती
तो बेवकूफ नहीं हूं। सब समझती हूं....तुम्हारी बार-बार की उखड़ी बातों से कुछ-कुछ
शक तो मुझे भी होने लगा था। लेकिन यह शक ही था। सिर्फ शक। हकीकत नहीं। लेकिन
तुम्हीं कहो। तुम्हारी जबान से ही सुनना चाहती हूं। लेकिन जल्दी कहो। शिखा आती
होगी।’
‘तुम
जान ही गई, तो मैं क्या कहूं अब छोड़ो भी।’
‘देखो, मैं सुनना चाहती हूं और तुम हो कि....फिर कभी न
कहना कि....और फिर मैं आने वाली भी नहीं।’
‘इस
तरह धमकी क्यों दे रही हो ?’
‘ओफ्फ
! तुम बात क्यों नहीं समझते, शिखा
आ रही होगी....और यह धमकी नहीं।’
‘अच्छा
तो सुनो, तुम मुझे न के बराबर जानती थी। मैं भी
तुम्हें कुछ इसी तरह से जानता था। लेकिन न जानते हुए भी कहीं गहरे जानता था
तुम्हें। तुम इसे कोई भी नाम दे सकती हो अंगरेजी में इसे ‘लव एट फर्स्ट साइट’ कहते
हैं और हिंदी में ‘प्रथम दृश्य का प्यार’। और ऐसा कमोवेश सब के ही साथ होता है
तुम्हारे भी साथ हुआ होगा। न सही मेरे साथ किसी और पर रीझी होगी। लेकिन रीझी जरूर
होगी। और यही जानो कि मैं भी तुम पर रीझ गया था। अलग बात है, इसे कभी जाहिर नहीं कर पाया। चाहता था कि जाहिर
कर दूं। लेकिन एक तो मैं जल्दबाजी नहीं करना चाहता था। दूसरे मैं बड़ा संकोची था
तब। फिर सोचा कि अपनी औकात नहीं यह सब कहने की। करने की। उमर भी तब क्या थी। यही
कोई 15-16 साल का रहा होऊंगा। सोचा कि वक्त आने
पर कह दूंगा। तुम से भी और सब से भी। तब, जब
किसी लायक हो जाऊंगा। और इस क्रम को जुड़ने में काफी समय तो नहीं लगा। लेकिन समय तो
लगना ही था। लगा। तब तक सुना तुम्हारी शादी हो गई। मैं कसमसा कर रह गया था। और
चारा भी क्या था ?
‘बोलो, ऐसे में मैं क्या कर सकती थी भला ? तुम ने कभी कुछ कहा भी नहीं। मैं क्या सपना
देखती थी कि....। लेकिन मैं कभी रीझी-वीझी नहीं तुम पर। हां, तुम से मेरी शादी की बात जरूर सोची जा रही थी, घर में। बल्कि कह सकते हो कि मेरी शादी के लिए
बनाई गई लड़कों की लिस्ट में एक नाम तुम्हारा भी था, बल्कि पापा गए भी थे, तुम्हारे
घर। लेकिन शायद उमर में तुम से मैं बड़ी पाई गई। जन्मकुंडली भी नहीं मेल खा पाई थी
शायद। और बात वहीं की वहीं रह गई। फिर मेरी शादी हो गई।’ यह कहते-कहते तुम बड़ी
भावुक-सी हो गई थी। और मुझ से पूछा था, ‘लेकिन
तुम ने अब तक शादी क्यों नहीं की ?’
‘क्यों
?’
‘हां, क्यों ?’
‘ख़ुद
से पूछो।’
‘क्या
पूछूं ?’
‘यही, जो मुझ से पूछ रही हो।’
‘यह
तो कोई बात नहीं हुई....।’
‘क्यों, कैसे नहीं हुई ?’
‘इस
का मतलब है कि तुम मेरी वजह से इस तरह....’
‘नहीं, अपनी वजह से।’
‘देखो, धनंजय ! तुम मुझ पर बड़ा भारी इल्जाम लगा रहे
हो। यह ठीक नहीं है।’
‘मैं
इल्जाम कहां लगा रहा हूं। तुम ख़ुद-ब-ख़ुद इल्जाम में कैद हो रही हो तो मैं भला क्या
कर सकता हूं। बोलो भला ?’
‘एक
बात कहूं, करोगे ?’
‘कहो।’
‘पहले
हां करो।’
‘करने
लायकष होगा तो जरूर करूंगा।’
‘नहीं, पहले हां करो।’
‘देखो, तुम्हारे इस तेवर से मुझे डर लग रहा है साफ-साफ
कहो कहना क्या चाहती हो।’
‘कहा
न, पहले हां करो !’
‘क्या
हां करूं ?’
‘यही
कि जो मैं कहूंगी, करोगे।’
‘चलो
करूंगा, अगर करने लायक हुआ तो।’
‘अगर-वगर
नहीं....सीधे-सीधे हां कहो।’
‘चलो
भई, हां किया।’
‘तो
शादी कर डालो।’
‘क्या
?’
‘हां, इस तरह से काम नहीं चलेगा।’
‘क्यों
?’
‘जिंदगी
तबाह करने से कोई फायदा है ?’
‘तो
मैं तुम्हें तबाह नजर आ रहा हूं ?’
‘नहीं
तो क्या ?’
‘यह
तुम कह रही हो ?’
‘देखो, इस तरह खफा न होओ। यह मैं बहुत सोच-समझ कर कह
रही हूं। बल्कि कहो कि यही कहने यहां आई भी हूं।’
‘यह
तो तुम जाने कितनी बार पहले भी कह चुकी हो।’
‘देखो, अपनी इस दीवानगी पर इतराओ नहीं।’
‘तो
तबाही में लोग इतराते भी हैं ?’
‘फिर
तुम मेरी बातों को दूसरे अर्थों में ले रहे हो। मैं ने कहा न।....’
‘कि
शादी कर डालो।’
‘हां
!’
‘देखो, शिप्रा, बहुत
हो चुका अब। जले पर अब और नमक न छिड़को प्लीज!’
‘क्या
कहूं धनंजय ! कुछ कहा भी नहीं जाता अब तुम से !’
‘जरूरत
भी क्या है ?’
‘जरूरत
है। तुम मुझे समझने की कोशिश क्यों नहीं करते, धनंजय
!’
और तुम रुआंसी हो आई थीं, हम
दोनों ख़ामोश हो गए थे। ख़ामोश ही थे कि शिखा आ गई। आते ही पूछा था, ‘चुप क्यों बेठे हैं आप लोग ?’
‘बतियाते-बतियाते
थक गई हैं तुम्हारी दीदी।’
तुम चौंकी थी। फिर होंठों पर उंगली फिराने लगी थीं। संकेत यह था कि
मैं कुछ कहूं नहीं, चुप रहूं। मैं भी चुप ही रहा। बल्कि
औंधा लेट गया, ख़ुद को धिक्कारता हुआ कि यह क्या किया
मैं ने। ऐसा नहीं करना चाहिए था।
तुम जा चुकी हो। मुझ से अपने यहां आने का आग्रह बड़ी बेकली से कर गई
हो।
एक मौसम बीत कर दूसरा मौसम आ गया है। तब से तुम्हारे यहां जा नहीं
सका हूं, लाख चाहने पर भी । एक जिद है कि नहीं
जाऊंगा। कभी नहीं जाऊंगा। यह अलग बात है, तुम
से वायदा भी किए बैठा हूं कि आऊंगा।
जानती हो, तुम्हारी दी हुई, वह रूमाल अभी तक कोरी है, जिसे तुम ने शिखा की आंख से बचा कर देते हुए
छलकती आंखों से उसे तुरंत कहीं छिपाने का इशारा किया था। धीरे से बोली भी थीं, ‘अगले जनम में।’ और, मैं ने उसे धीरे से बक्से में डाल दिया था। वह
रूमाल अभी तक उसी बक्से में है। न तब उसे ठीक से देख पाया था, न अब तक देख पाया हूं। देखना भी नहीं चाहता, तुम्हारी वह कोरी रूमाल !
-11-
सुंदर भ्रम
कमरे में चुपचाप अकेला उदास बैठा हूं। अंधेरा फैलने लगा है। मन में आया
है कि बत्ती जला दूं। सोचता हूं, क्या
होगा बत्ती जला कर ? लेकिन बत्ती जला दी है। अचानक हवा से
खिड़की पर लगा परदा लहरा उठा है, और
एक लड़की साइकिल से जाती हुई दिखी है....और बस तुम्हारी याद-सी आ गई है।
जानती हो कितनी ही बार तुम्हारे आने-जाने के रास्तों में टहलते हुए
मैं ने बहुत देर तक तुम्हारा इंतजार किया है। यह शायद तुम्हें पता नहीं, और शायद कभी पता चल भी न सकेगा, अगर तुम्हें यह चिट्ठी नहीं, मिलती है।
अकसर जब तुम दो-दो, तीन-तीन
दिन बाद दीखती तो मैं इस इंतजार की बेचैनियां तुम से बयान करने की सोचता। सोचता ही
रहता कि तुम एकाएक लुप्त हो जाती। और मेरी बेचैनी और भी बढ़ जाती। फिर वह बेचैनी तब
तक धधकती रहती, जब तक तुम फिर नहीं दीख जाती थी, और दीखती तो फिर वही सोचने समझने की प्रक्रिया
में ही तुम फिर गायब हो जाती।
लगता है मैं कहीं उलझ गया हूं। जो मैं कहना चाहता हूं, कह नहीं पा रहा हूं और कभी कह नहीं पाऊंगा....।
और जो बात कही नहीं जा सकती वह अंदर ही अंदर कितना कुरेद डालती है, कितना परेशान कर डालती है ? कभी-कभी सोचता हूं कि कहीं गिर कर, या किसी कार वगैरह के धक्के से मैं अपनी
याददाश्त क्यों नहीं खो बैठता ? पर
यह जानता हूं कि यह नहीं होना है और जो मैं न कह पाऊंगा, न भूल पाऊंगा, हमेशा इसी तरह परेशान होता रहूंगा।
हां, तो उस दिन तुम बहुत दिनों बाद दिखी थी।
तुम्हें मालूम नहीं इस लिए एक बार फिर दुहरा दूं कि रोज तुम्हारे आने-जाने के
रास्ते में घंटों तुम्हें भीड़ में हेरते-खोजते और इंतजार करने के बाद भी तुम नहीं
दीखती और मैं निराश लौट जाया करता था। तुम्हारी एक झलक पा लेने को बेचैन हो उठता
था, मैं। पर तुम थी कि दीखती ही न थी।
हालां कि मैं ने तुम्हारा घर भी देख रखा था। लेकिन तुम्हारे घर जाना जाने क्यों
मुनासिब नहीं जान पड़ता था। फिर भी न जाने कितनी बार मैं यह रोज सोचता था, बल्कि तय करता था कि अब तुम्हारे आने-जाने के
रास्ते तुम्हें देखने नहीं जाऊंगा और कमोवेश हर रोज मैं यह सोचता था। पर दूसरे दिन
फिर उन्हीं रास्तों पर मैं हाजिर रहता....। जब-जब जाने को होता तो शायद अब तुम आओ, अब तुम आओ, थोड़ी
देर के लिए मैं और रुक जाता और इसी तरह बहुत देर तक तुम्हारा इंतजार करता खड़ा
रहता....। कभी तुम दीखती,
कभी न दीखती।
एक दिन तुम दिखी और हमेशा की तरह आगे बढ़ गई। इत्तफाक से मैं भी
तुम्हारे साथ हो लिया। और दिनों तुम मुझे दीखती तो लगता जैसे अभी-अभी फूल खिला हो।
ताजा फूल। लेकिन उस दिन तुम बहुत ख़ामोश थी, ।
खोई-खोई-सी साइकिल चलाए जा रही थी। जैसे तुम्हारा मन कहीं और उलझा हुआ था। अपने
नारंगी रंग के पैंट और सफेद बुशर्ट पर गुलाबी स्वेटर में तुम बहुत प्यारी लग रही
थी। यों तो तुम मुझे हमेशा भी वैसी ही प्यारी लगा करती थी। पर उस दिन शायद कई
दिनों बाद तुम्हें देखा था,
इस लिए ज्यादा अच्छी लग रही थी। लेकिन
तुम्हारी ख़ामोशी मुझे बुरी लग रही थी। मैं पहले ही की तरह तुम से अपने इंतजार की
बेचैनियां कहने के लिए परेशान था। पर तुम ख़ामोश थी। मैं ने तुम्हारे इस अजीब
व्यवहार की कैफियत पूछनी चाही, पर
तुम्हारी ठंडी ख़ामोशी देख हिम्मत नहीं कर सका।
वो तो दो-तीन दिन बाद तुम्हारे मुहल्ले के ही किसी से पता चला था कि
तुम्हारे पिता जी की अकाल मृत्यु हो गई। क्या हुआ था वह यह तो नहीं बता पाया, हां, यह
जरूर बताया कि तुम्हारे पिता जी सिंचाई विभाग में कोई इंजीनियर, शायद जूनियर इंजीनियर थे।
तुम्हें याद है कि नहीं ? हमें
तो पूरा-पूरा याद है उस दिन अंगरेजी का पहला क्लास था। प्रोफेसर दास ने बारी-बारी
सभी स्टूडेंट्स से अंगरेजी पढ़ने का मकसद पूछा था। किसी ने कंपटीशन का हवाला दिया
था, किसी ने अनुवादक बनना चाहा था, तो किसी ने यूं ही शौकिया ही, किसी ने हवा में ही या कुछ और ऐसे ही चलतू जवाब
दिया था। तुम्हारा जवाब भी चलतू तो था ही, बचकाना
भी। लेकिन और सब से एकदम अलग-थलग। तुम ने कहा था, ‘मैं विदेश (शायद अमरीका) जाना चाहती हूं, इसी लिए....।’ और उसी दिन से तुम लड़कों के बीच
ख़ासी चर्चा का विषय बन गई थी। उस में भी तुम्हारे कंडक्टरनुमा बैग ने, जो तुम अकसर बाएं कंधे पर लटकाए रहती, और इजाफा लाता। और हम जैसे देहाती लड़के तुम्हें
तुम्हारे नाम से कम-कंडक्टर नाम से ज्यादा जानने लगे थे। वह तो बाद में पता चला कि
तुम्हारा बायां पैर कुछ गड़बड़ है, शायद
उस दोष ही को छुपाने के लिए तुम वह कंडक्टरनुमा बैग इस्तेमाल करती हो। इस रोज को
तुम्हारी एक सहेली ही एक बार बात ही बात में शायद गलती से या कि अनजाने में कुछेक
लड़कों के बीच खोल गई थी। फिर तो अब लड़कों का ध्यान तुम्हारे कंडक्टरनुमा बैग से हट
कर तुम्हारे पैरों पर टिकने लगा था। और तुम थी कि अपने दोनों पैरों के सामंजस्य
में इतनी होशियारी बरतती कि कौन-सा पैर गड़बड़ है, लड़के अटकलें ही लगाते रह जाते। कुछ लड़कों की राय थी कि तुम्हारे दाएं
पैर में खोट है, तो कुछ लड़कों की राय थी कि नहीं बायें
पैर में खोट है। बल्कि एक दिन तो लड़कों में बाजी लगी और नौबत हाथापाई तक आ गई थी।
हां, तुम बैडमिंटन भी अच्छा खेलती थी, और सब से बड़ी ख़ासियत यह थी कि, तुम शायद बड़ी कांपलेक्सिव थीं, सुपर कांपलेक्स की शिकार। हालां कि यह
कांपलेक्स तुम्हारे हावभाव या बात-चीत में जल्दी जाहिर नहीं हो पाता, अन्य लड़कियों की अपेक्षा तुम लड़कों से
बेलाग-बेलौस बतियाती थी। यों तो तब के दिनों के हर क्षण संस्मरण बन रहे हैं। लेकिन
अब तो वे दिन नहीं रहे न। वे बोलते- बतियाते दिन।
वह दिन भी क्या दिन था ! हां, तो
उस दिन मैं ने पक्का फैसला कर लिया था कि अब चुप नहीं रहूंगा, ख़ामोशी मैं तोड़ूँगा। और बात मैं ने ही शुरू की।
लेकिन वह बातचीत....
‘हलो
! कैसी हो ?’
‘ठीक
हूं, तुम कैसे हो ?’ तुम ने बुझी-सी आवाज में पूछा था।
और फिर सामान्य-सी संक्षिप्त बात चीत से बात आगे नहीं बढ़ सकी। हालां
कि मैं तुम से बहुत कुछ कहने को उतावला था, लेकिन
वो सारा उतावलापन तुम से बात-चीत के समय जाने कहां गुम हो गया था ? वह उतावलापन जिसे मैं महीनों से सहेजे-संवारे
था, मेरी बेसब्री में गुम हो गया था कि
तुम्हारी बुझी-बुझी-सी आवाज में कैद हो गया, ठीक-ठाक
आज भी नहीं कह सकता। तिस पर भी उस दिन सारा दिन मैं मारे खुशी के यहां-वहां बेसुध
हो कर घूमता रहा और रात तुम्हारे नाम एक चिट्ठी लिखी। बड़ी मुख्तसार-सी चिट्ठी:
प्रिय अनु,
मैं पिछले कई दिनों में तुम्हारे प्रति एक अजीब-सा खिंचाव महसूस कर
रहा हूं, और शायद तुम भी। अगर सचमुच ऐसा है तो
तुम मुझे ‘हां’ या फिर मेरा भ्रम है तो ‘ना’ लिख कर दे दो, मैं इंतजार करूंगा।
तुम्हारा ही,
देव
और दूसरे दिन यह चिट्ठी ले कर बहुत पहले ही तुम्हारे रास्ते पर मैं
हाजिर था। बहुत इंतजार किया तुम नहीं दिखीं। दूसरे दिन, तीसरे दिन भी तुम नहीं दिखी। जानती हो मैं रोज
रात को उसी चिट्ठी की इबारत को फिर से ताजे कागज पर लिखता, लिफाफे में बंद करता। दूसरे दिन तुम्हारे न
मिलने पर लिफाफा फाड़ देता....। जानती हो क्यों ? सिर्फ वह अपनी लिखी इबारत पढ़ने के लिए, जो तुम तक नहीं पहुंच पाती थी। ख़ैर, तुम ने ज्यादा इंतजार नहीं कराया। चौथे नहीं पांचवें दिन तुम दिखी।
उस दिन तुम साइकिल कुछ ज्यादा ही तेज चला रही थी, मैं ने भी अपनी साइकिल तुम्हारी साइकिल के पीछे कर ली। और धड़कते दिल
से साइकिल लिए तुम्हारे बगल में आ गया....। तुम शायद देख कर भी मुझे अनदेखा कर रही
थी। लेकिन जब मैं ने तुम्हें आवाज दी तो तुम पहले तो कुछ सहमी, लेकिन तुरंत सहज हो आई। बात-चीत में ही मैं ने
वह चिट्ठी जिसे ले कर पिछले चार दिनों से बेचैन था, तुम्हें देनी चाही। लेकिन तुम कन्नी काट गई। तुम एकाएक गंभीर हो गई, और साइकिल के पैडिल तेज-तेज मारती हुई दूसरी ओर
मुड़ गईं थी। मैं ने भी अपनी साइकिल तेज की, लेकिन
जाने क्यों एकाएक ब्रेक लगा कर रुक गया। और ठिठक कर तुम्हें जाते हुए वहीं से
देखने लगा था।
फिर जाने क्यों कुछ दिनों तक तुम्हारा सामना ही करते नहीं बन पाता।
और वह रास्ता ही मैं ने छोड़ दिया। लेकिन यह क्रम ज्यादा दिन तक नहीं चल सका।
कष्रीब 10-12 रोज बाद ही पहले ही की तरह उन रास्तों
पर फिर से मैं हाजिर था, तुम्हारी तलाश में, तुम्हें देखने की चाह में। हालां कि उस अपमान (?) के बाद अपने को बहुत रोकने की कोशिश की लेकिन
तमाम कोशिशों के बावजूद भी नहीं रोक पाया था, अपने
आप को।
और अब मैं तुम्हें फिर रोज-रोज देखने लगा था, । जब कि तुम मुझे देख कर भी नहीं देखती थी।
देखती भी थी तो एकदम ख़ामोश नजरों से। रहती भी खामोश थी, अति ख़ामोश। कि एकाएक तुम गायब हो गई। महीनों
गायब। मैं ने सोचा कि बीमार-वीमार हो गई होगी। लेकिन महीना गुजरा, दो महीना, तीन
महीना गुजरा, तब भी तुम नहीं दिखी। मैं अपने को रोक
नहीं पा रहा था, सोचा कि क्यों न तुम्हारे घर ही चला
चलूं। बहुत होगी तो तुम नाराजश् ही होगी न ! जेल तो नहीं न भिजवा दोगी ? और इस समय भी क्या मैं जेल से बाहर था ? लेकिन तुम्हारे घर नहीं जा पाया। बल्कि घर जाने
के बजाय पहुंच गया यूनिवर्सिटी, तुम्हारे
विभाग में। वहां तुम्हारी एक सहेली, जिसे
मैं पहले से जानता था, से पता चला कि तुम यहां रेगुलर नहीं
थीं। और अब तुम्हें तुम्हारे पापा की जगह नौकरी मिल गई है। सिंचाई विभाग में ही।
अब सिंचाई विभाग के दर्जनों आफिस, उन
की भी कइयों ब्रांच। कहां ढूंढता फिरूं मैं तुम्हें ! कुछ समझ में नहीं आता। हालां
कि कुछ मेरे परिचित थे, सिंचाई विभाग में। चाहता तो पता कर
सकता था, कि तुम किस आफिस में हो, । लेकिन जाने क्यों ऐसा करने में संकोच लगा और
भूल गया और कुछ दिनों के लिए तुम्हारा चक्कर। हालां कि भुला नहीं पाया।
अब सोचता हूं कि तभी मैं ने क्यों नहीं अपने को तुम से अलग कर लिया? क्यों तुम से कहना चाहा कि ‘‘मैं
तुम्हें....।’’ तुम ने तो कुछ कहना दूर शायद मेरी ओर ठीक से देखना भी नहीं चाहा
था।
इसी बीच यह भी पता चला कि तुम्हारी बड़ी बहन, जिस कालेज में हम-तुम पढ़ते थे, उसी कालेज में ‘साइकॉलाजी’ में डिमांस्ट्रेटर
हो गई। इस बीच जाने क्यों तुम्हारे प्रति मैं एकदम उदासीन हो चला था। लेकिन फिर भी
कभी-कभार तुम्हें देखने की लालसा जरूर हो उठती, जिसे
मैं चाहते हुए भी पूरी नहीं कर पाता था। कि एक दिन ख़बर मिली कि तुम्हारी उस
डिमांस्ट्रेटर बहन की शादी हो गई। यकीन मानो मैं सचमुच घबरा गया था....। जानती हो
क्यों ? ‘कि अब तुम्हारी भी शादी हो जाएगी।’ मन
अजीब-अजीब शंकाओं से घिरने लगा। इस बीच मैं ने भी एक में नौकरी कर ली थी। सोचा कि
तुम से एक बार फिर क्यों न मिलूं। लेकिन बहुत चाहने पर भी नहीं मिल सका था, तुम से।
जानती हो इन दिनों चांदनी रात हो या अंधेरी रात, मैं अकसर सुनसान सड़कों पर घूमने निकल जाता।
उन्हीं सड़कों पर जिन पर कि तुम्हें दिन के उजाले में कभी घंटों इंतजार के बाद देखा
करता था। उन सुनसान सड़कों पर, सब
कुछ खोया-खोया बेसुध-सा लगता, और
बस तुम्हारी याद आ जाती। ऐसे वक्त तुम्हारी याद कितने अकेलेपन का एहसास करा जाती।
यह तुम्हारे न होने का एहसास कितना बेचैन बना जाता, तुम क्या जानो भला ? एक
मीठी छटपटाहट से भर उठता मैं, जैसे
बांहें फैला कर ढेर सारा अंधेरा बटोर लाया होऊं।
एक दिन बड़ी मुख़्तसर-सी झलक मिली थी तुम्हारी। तुम शायद अपनी बड़ी बहन
के साथ कहीं रिक्शे पर जा रही थी। मैं ने तुम्हें बुलाना चाहा, लेकिन मेरी आवाज मेरे गले में ही फंसी रह गई और
ठगा-ठगा-सा मैं तुम्हें देखता खड़ा रहा, तब
तक खड़ा रहा जब तक कि तुम आंखों से ओझल नहीं हो गई।
तुम्हें यह सब कुछ भी पता नहीं होगा। इसी लिए कहे जा रहा हूं। तुम से
कभी यह सब मैं कह नहीं पाया था। तुम ने मौका ही कब दिया, यह सब कहने के लिए ?
इन दिनों फिर मैं तुम्हारे आफिस जाते-आते वक्त नियत समय से तुम्हारे
रास्ते पर जाने कब से फिर हाजिर होने लगा, पता
ही नहीं चला। अकसर तुम्हें देखता और देखता ही रह जाता। सोचता कि तुम्हें रोकूं।
कुछ कहूं। लेकिन ऐसा लाख चाहने पर भी कभी कुछ संभव नहीं बन पाया।
कि इसी बीच मैं बीमार पड़ा, गैस्टिक
ट्रबुल हो गया था। जब ‘पेन’ शुरू हुआ तो आफिस में ही था। कर्मचारियों ने ही
अस्पताल पहुंचाया। डाक्टरों की गलत दवा से मेरी हालत काफी बिगड़ गई। सिंपैथी में
डाक्टर्स कंपोज, मार्फिया के इंजेक्शन लगा-लगा कर मुझे
सुलाने लगे। मैं ने सुना लोग दबी जुबान कह रहे हैं कि मैं पागल हो गया....।
नर्स-वार्ड ब्वाय सब मुझे अजीब नजरों से देखते। डाक्टर्स भी परिचित होने के बावजूद
पीठ पीछे टांट करने लगे थे,
। सब के लिए मैं एक तमाशा बन गया था।
घर के लोग भी मेरी अजीब हरकतों से तंग आ चुके थे, ख़ास कर पिता जी। मां तो रो-रो कर ही बेहाल हुई जाती थी। तमाम
मनौतियां मानती जाती। लोगों का अनुमान था कि अब मैं जिंदा नहीं बचूंगा, बचूंगा भी तो सही-सलामत नहीं पागलपन में जिंदगी
गुजरेगी।
लोग बताते हैं कि मैं अकसर सोते-जागते तुम्हारा नाम ले-ले बड़बड़ाता
था। इतना ही नहीं, ठीक होने के बाद तो यह भी पता लगा कि
मैं ने कुछ लोगों को तुम्हारे घर का पता दे कर तुम्हें बुलाया भी था। लोग बताते
हैं कि मैं इन दिनों तुम्हारा नाम ले-ले कर हमेशा बड़बड़ाता तो था ही, जो ही मुझे देखने आता उस से मैं तुम्हारा जिक्र
कर तुम्हें बुला लाने को कहता। यहां तक कि एक महिला प्राध्यापिका जो हमें तुम्हें
पढ़ाती थीं, वे भी देखने आई थीं, तो मैं ने उन से भी तुम्हारा जिक्र किया, बल्कि जिद कर बैठा कि नहीं वे तुम्हें बुला ही
लावें। लोग बताते हैं कि वे उस समय काफी नाराज हो कर गई थीं, हमारे पास से। ऐसे ही रेडियो में एक एनाउंसर
है। ‘इंटरकास्ट मैरिज’ की है। मैं उन्हें भाभी-भाभी कहता हूं, उन से भी जिद कर गया था, तुम्हें बुलाने को ले कर....। वे नाराज नहीं
हुईं और बड़े प्यार से मुझे दिलासा दे गईं कि अच्छा बुला लाऊंगी, और मैं ने तुम्हारा पता दे दिया। हालां कि वह
तुम्हें बुलाने नहीं गईं। लेकिन जानती हो, वे
आज भी जब-तब उस प्रसंग को याद दिला-दिला चिढ़ाया क्या ‘टीज’ किया करती हैं। ख़ैर, तब भी मेरी जिद के जोर से कुछ लोग तुम्हारे
वहां पहुंच गए थे। उस समय मैं मेडिकल कालेज में भर्ती था। फिर भी तुम आई तो नहीं, अलबत्ता तुम और तुम्हारे परिवार के लोग काफी
बुरा मान गए थे। बुरा मानने की बात ही थी। लेकिन बुरा मुझे भी लगा, कि एक तो तुम आई नहीं, दूसरे गए लोगों को झिड़कते हुए कहा कि ‘मैं फला
नाम के किसी भी व्यक्ति को नहीं जानती....।’ सच बताओ, क्या सचमुच तुम मुझे नहीं जानती ?
ख़ैर, ठीक होने के बाद मैं ने बतौर
क्षमा-याचना तुम्हें एक चिट्टी लिखी थी, तुम्हारे
पड़ोस के प्रोफेसर सिनहा के ‘केयर आफ’। पता नहीं तुम्हें वह चिट्ठी मिली कि नहीं, नहीं जानता। वैसे यह जान लो कि वह चिट्ठी
मुख़्तसर सी नहीं वरन् जरा लंबी हो गई थी।
ठीक होने के बाद ही कुछ लोगों ने मुझे यह सूचना दी कि तुम्हारी शादी
हो गई। यह जान कर मुझ पर बाहर से तो कोई ख़ास प्रतिक्रिया नहीं हुई लेकिन, भीतर एक अनगूंज-सी हलचल जरूर हुई। वह तो
हफ्ते-भर बाद ही मालूम हो गया , कि
शादी तुम्हारी नहीं, तुम्हारी छोटी बहन की हुई थी। यह जान
कर अलबत्ता थोड़ा आश्चर्य हुआ कि तुम से पहले ही तुम्हारी छोटी बहन की शादी क्यों
हो गई? इस का भी स्पष्टीकरण जल्दी ही तुम्हारे
निकट के सूत्रों ने दिया कि ‘उसे किसी लड़के ने पसंद कर लिया था, इस लिए शादी कर दी गई।’ लोग बताते हैं कि वह
बड़ी ख़ूबसूरत थी। मैं पूछता हूं कि क्या वह सचमुच ही तुम से भी....?
अब भी तुम कभी-कभी रास्ते में दिख जाती। मैं तुम्हारी ओर कोई ख़ास
ध्यान दिए बगैर निकल जाता। इस बीच तुम्हें देख कर लगता कि तुम भी बीमार रही हो, पिछले दिनों। अब तुम ने साइकिल चलाना बंद कर
दिया था। आफिस रिक्शे से जाने लगी थी। वो भी देर-सबेर। कि एकाएक तुम फिर गायब हो
गई। रास्तों में लाख हेरने-खोजने पर भी तुम नहीं दीखती। शायद बार-बार कई-कई वक्त
और रास्ते बदल-बदल कर तुम आने-जाने लगी।
कि पिछले दिनों सिंचाई क्लब की ओर से एक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित
किया गया। मैं भी आमंत्रित था। इत्तफाक से जहां मुझे बैठाया गया, ठीक पीछे तुम अपने छोटे भाई-बहन और मां के साथ
बैठी थी। मैं क्षण-भर के लिए तो हकबक रह गया था। लेकिन जल्दी ही अपने को संभाल
लिया, और तुम्हें आभास भी नहीं होने दिया था
कि, मैं ने तुम्हें देखा है। अलबत्ता एक
बार कनखियों से यह जरूर देख लिया कि कहीं सचमुच तो तुम्हारी शादी नहीं हो गई ? तुम्हारे माथे पर पर सिंदूर न देख कर मैं
आश्वस्त-सा हो गया।
लेकिन पिछले दिनों तुम्हारे मुहल्ले के एक लड़के ने बताया कि तुम अपने
घर के सामने के ही एक लड़के से....। लड़का जूनियर इंजीनियर है, तुम्हारी जाति का नहीं हैं, आदि-आदि। और भी बहुत-सी पकी-अधपकी बातें बताईं
उस ने तुम्हारे बारे में। मैं यह जान कर हैरान था कि उसे इतनी सारी जानकारी कैसे ? उस ने ही बताया कि ‘अरे मैं भी कभी उस के चक्कर
लगाया करता था, लेकिन उस ने तो उस जूनियर इंजीनियर के
बच्चे से पहले ही से दोस्ती कर रखी है, यह
जान कर मैं ने ख़ुद ही अपनी छुट्टी कर ली।’
संदेह मुझे भी था, तब
भी उस लड़के की बात पर विश्वास नहीं हो पा रहा था। लेकिन तुम्हारे एक निकट के सूत्र
ने भी इस बात को प्रकारांतर से पुष्ट किया। सुना है, वह लड़का भी स्पोर्टसमैन था। हां, तुम
भी तो स्पोर्टर थी....। बातों-घटनाओं का विवरण इतना ही नहीं और भी बहुत है, जिसे मैं विस्तार नहीं दे पा रहा, कि शायद विस्तार देना नहीं चाहता। जैसे कि
तुम....? ख़ैर, छोड़ो भी....।
अरे हां, तुम्हारा वह विदेश जाने का ख़्वाब कहीं
धुंधला तो नहीं हो गया, कि तुम ने ही भुला दिया, या कि टूट गया ? हो सकता है। कुछ भी हो सकता है, इस
तेज रफ्तार जमाने में। फिर भी यकीन करो तुम्हारा वह विदेश जाने का ख़्वाब भले
बचकाना ही सही, था दमदार। उसे पूरा कर डालो। लोग तो
खुश होंगे ही, मुझे भी तसल्ली होगी, शायद तुम्हें भी हो। रही बात तुम्हें देखने की
मेरी बेचैनी की, तो सच मानो, तुम्हें देखने के लिए मुझ से कहीं अधिक बेचैन
मेरी मां की आंखें हैं, जिस ने कभी तुम्हें देखा नहीं, सिर्फ तुम्हारा नाम सुना है।
और हां, सुनो यह कहानी नहीं सच है, कोरा सच !!
फिर कभी।
तुम्हारा ही,
देव
पुनश्चः
यह चिट्ठी तुम तक कैसे पहुंचाऊं ? आज
तक नहीं तय कर पाया हूं। तुम्हारा शहर छोड़े भी अरसा हो गया है। तुम अपनी ख़बर ख़ुद
नहीं देती हो फिर भी मिल जाती हैं सूचनाएं तुम्हारे बारे में। भेजते रहते हैं लोग।
जो तुम्हारे भी दोस्त हैं और मेरे भी। जाता भी रहता हूं कभी-कभार तुम्हारे शहर।
हां, तुम्हारा शहर। मेरा शहर नहीं रहा वह।
तुम ने रहने ही नहीं दिया । हालां कि यह ख़बर मिले बहुत दिन हुए। बासी है। फिर भी
मुझे हिला देने के लिए काफी है। और ताजी भी। एक गहरे जख्म की तरह। मुझे विश्वास
नहीं हो रहा इस ख़बर पर कि उस पड़ोसी जूनियर इंजीनियर से भी तुम्हारी दोस्ती टूट गई
है।
मैं तो जैसे हूं, हूं।
महानगरीय तनाव बहुत होता है, आदमी
को ख़बर करने के लिए। सोचता हूं तुम उम्र के एक ख़ास पड़ाव पर हो। कैसे सहे जाती
होगी अपने आप को। सच तुम्हारी बड़ी फिक्र लगी रहती है। तुम नहीं समझ सकोगी। बहुत
करोगी तो मेरी इस जोकरई पर एक खिसियानी हंसी चेहरे पर ओढ़ लोगी। मैं भी मामूली
बेहया नहीं हूं अनु ! देखता हूं इस खिसियाने की कितनी दकियानूस परतें चढ़ाती हो। सब
का हिसाब रहेगा मेरे पास और एक न एक दिन उघाडूंगा जरूर। चाहे जैसे। यह वक्त पर
छोड़ता हूं। तब तक के लिए वक्त से तुम्हारी सलामती की दुआ के सिवा और क्या कर सकता
हूं भला ? इतने बरसों तक सहेज (?) कर रखी यह चिट्ठी तुम्हें आखि़रकार भेज रहा
हूं। अन्यथा नहीं लेना, इस देरी पर।
तुम्हारा,
देव
-12-
वक्रता
मजदूरों के साथ सड़क के किनारे वाला खेत सिंचवाने में व्यस्त था कि
एक बस रुकी। मां शहर से छुट्टी में गांव घूमने आई थीं। मैं कुछ पहले ही आ गया था।
लेकिन यह क्या ? मैं तो मां को लेने दौड़ा आया था। रुक
क्यों गया ? कारण, चटक चांदनी की-सी साड़ी में लिपटी-सिमटी खिड़की के पास बैठी तुम थी।
तुम अपलक मुझे निहार रही थी। मैं हिला जा रहा था। मेरा खेतिहर रूप जाने तुम्हें
कैसा लग रहा था। है ना ! तुम्हारे हाथ में कोई अंगरेजी पत्रिका थी, जो आंचल ढलकने के साथ ही सरक गई। मां का सामान
बस से उतर चुका था। बस स्टार्ट होने को हुई तो तुम्हारे पास की सीट से किसी महिला
स्वर का अभिवादन मां को मिला था। मैं पहचान गया था....तुम्हारी दीदी थीं। तब तो
तुम ने मेरी मां से परिचय भी कर लिया होगा, यह
सोचते ही बस स्टार्ट हो गई।
अभी आगे बढ़ कर कुछ कहना चाहता था कि, तब तक तुम कुछ कह चुकी थी। लेकिन बस के इंजिन की घड़घड़ाहट के शोर
में तुम्हारे शब्द डूब गए थे कि तुम्हारे जबान से चल कर होंठों से टकरा वापस हो गए
थे, नहीं जानता। मैं ने तो बस बुदबुदाते
होंठ और हिलते हाथों की लहराती बेचैन उंगलियां और डबडबा आई आंखों भर को देखा था।
उन्हीं आंखों को जिन में अंगड़ाई लेती पुतलियों के कोरों में झांक-झांक, गुनगुना पड़ता था, ‘तेरे तीन लोक से नयना / मुझ को प्यारे लगते हैं
/ कर देते हैं घायल / फिर भी प्यारे लगते हैं / निहारे लगते हैं....दुलारे लगते हैं
/ प्यारे लगते हैं.....तेरे तीन लोक से नयना।’ लेकिन शायद यह आज की आंखें वह आंखें
न थीं। इन आंखों में कशिश की जगह अब कोशिश समाई जान पड़ रही थी। बस गई, तुम भी गई। यादें बाढ़ की तरह उफन आईं।
अंगरेजी का क्लास। प्रोफेसर दास सब से कुछ न कुछ जानना चाहते हैं। एक
लड़की से पूछते हैं, ‘हवाई यू प्रेफर टू इंगलिश ?’
लंबी-चौड़ी हकलाती भूमिका में एक बोल्ड-सा जवाब मिलता है, ‘आई वांट विजिट टू फारेन टूर, स्पेशली इंगलैंड....।’ बहुतों ने बहुतेरे जवाब
दिए थे। कोई अंगरेजशी का यों ही ज्ञान पा लेना चाहता था, बेमकसद। कोई अनुवादक बनना चाहता था, कोई पत्रकार, कोई अंगरेजीदां....। बहुत से बहाने थे, अंगरेजी पढ़ने को। अलग बात है हिंदुस्तानियों की बचकानी अंगरेजी दंग
ही करती है। फिर भी नया-नया जोश था, अंगरेजीदां
बनने का, अंगरेजी सीखने-समझने का। अंगरेजी तो
मैं नहीं सीख पाया, पर कुछ और जरूर सीख गया।
जो भी हो, उस पहले ही रोज से वह लड़की छात्रों के
बीच ‘विषय वस्तु’ बनती रही। आए दिन किसी न किसी के साथ अलग-अलग प्रकरणों में उस का
नाम जुड़ता-गुंथता रहा। कुछ यार लोग जबरिया अपने-अपने को उस ‘विषय वस्तु’ में
रजिस्टर्ड होने की कोशिश में दिल तोड़ते घूमते रहते। उसके कंधे पर कंडक्टरनुमा
थैला; जिस का इस्तेमाल रफ कागज, हिंदी-अंगरेजी की फिल्मी पत्रिकाओं से ले कर
बाजारू, जासूसी उपन्यासों से होते हुए स्नो
क्रीम, पाऊडर, आईना, कंघा आदि न जाने क्या-क्या रखने तक वह
किया करती थी।
उस के बैडमिंटन खेलने की अदाओं पर, पैरों के घटबढ़ होने के बावजूद चलतू ढंग से ही सही क्लासिकल से
ट्विस्ट तक की खूबियों का ख़ूब खुलासा होता, छात्रों
के बीच। वह किसी भी छात्रा से बेबाकी से बतिया कर उल्लू बना देती। अदना-सा
चुहुलबाज उल्लू एक मैं भी था, कतार
में।
शायद कोई डिवेट्स कांपटीशन था। बहुतेरे छात्रों ने हिस्सा लिया था।
वह लड़की भी हिस्सेदारों में एक थी। उस ने फर्स्ट प्राइज मारा, मैं सेकेंड हो गया था। लाइब्रेरी से एक रोज
गुजर ही रहा था कि एक कन्या स्वर ‘सुनिए प्लीज !’ ने मन बांध पैरों को थाम लिया।
बिना किसी लल्लोचप्पो के वह बोली:
‘डिवेट्स
अच्छा दे लेते हैं।’
‘अरे
नहीं, अच्छा तो नहीं, हां, हाथ-पांव
मार लेता हूं।’
‘ओह
!’
‘मैं
कहूं, कैसे फर्स्ट हो गई। अरे जनाब हाथ-पांव
मारना छोड़, दिमाग पर जोर मारना सीखिए।’
‘आप
ने ‘लाइन’ दे दी है तो, कोशिश करूंगा मादाम ! वैसे कोई कन्या
लाइन इत्तफाक से अपने नसीब में नहीं।’
‘चलिए
यह इत्तफाक हम दिए देते हैं।’
‘इस
जर्रानवाजी के लिए शुक्रिया !’
कि लाइब्रेरियन साहेब टहलते नजर आए, हम भी टहल लिए।
हां, उस कन्या लाइन को हमने ख़ूब साधा। माया
में मार्निंग शो वाली अंगरेजी मूवी देखते हुए, जब-तब
ह्वी पार्क के झुरमुटों में बैठते, उठंगते, नरम मुलायम घास पर टहलते हुए। रेलवे लाइब्रेरी
में उमस भरी दोपहरें और सर्द शामें बिताते, दो-चार
किताबें उड़ाते हुए। राप्ती की रेत पर टहलते, दौड़ते, किनारा देख-देख बंबइया हिंदी फिल्मों में देखे
हुए बंबई का समुद्र सोचते हुए। थक कर लालडिग्गी पार्क की बेंचों पर सुस्ता-सुस्ता
एक-दूसरे को हूंसते, चिढ़ाते-चिकोटते हुए।
गणेश होटल के शीशे से लोगों को टटोलते और बॉबीज रेस्तोरां के अंधेरों
में अपने आप को हेरते टटोलते हुए। बाहर निकल गोलघर की खुली सड़क पर सहमे-सहमे, अलीनगर और बक्शीपुर की तंग सड़कों पर नजरें
झुकाए हम चलते होते। मन एक अजीब ख़ुशफहमी में भटकता भागता होता। बल्लियों उछाल
मारता दिल का दलदल दौड़-दौड़ जाता। ठीक वैसे ही जैसे सिविल लाइंस की सूनी-सूनी
सड़क पर तुम्हारी साइकिल हौले-हौले दौड़ती....। ऐसी जाने कितनी ही अदाओं में
उभ-चूभ डूबे हुए दुनिया की और चीजशें की खोज-ख़बर भुला बैठे हम, शहर में लोगों के लिए खोज-ख़बर बन बैठे थे।
सड़क के किनारे खड़ा, तुम्हारे
साथ गई बस को देर तक देखता रहा। बस चली गई, उस
के पीछे उड़ती धूल देखता रहा। धूल उड़ गई, दिशा
देखता रहा। कब तक देखता भला ? घुप्प
अंधेरा हो गया। घर आ गया। बरबस तुम्हारी याद सताने लगी। तरह वही थी कि, ‘याद तुम्हारी आई / जैसे / कंचन कलश भरे....।’
पत्नी चौके में थी। पत्नी को ही ले कर छत पर अंधेरा टटोलते टोहते बड़ी देर तक
टहलता रहा। खाना खा कर पलंग पर जाते ही, तुम्हारी
गंध आने लगी। सीने में तकिया समेटा, गोया
मेरी बाहों में तकिया नहीं तुम हो।
अलसाई नींद में गदराई देह की छुअन मिली। आंख खोली भी नहीं, उसे अपने आप में दबोचता, भरपूर चूमता, चाटता बुदबुदा पड़ा ‘नहीं पश्यंती तुम मुझ से इतर नहीं हो सकती....।’
पत्नी छिटक कर दूर हो गई,
‘आंय यह क्या ? किस को याद कर रहे हो ? शर्म नहीं आती....तुम्हें इतना भी ख्याल नहीं
कि सोए हो मेरे साथ और याद बिटिया को कर रहे हो....छि....!’ तब याद आया कि पत्नी
के साथ सोया हूं....। पम्मी बेटा तो मां के पास सोई होगी।....बरबस मां के बस से
उतरने की याद हो आई। पत्नी उचट कर एक ओर हो गई थी।
याद आने लगीं तुम्हारी बेवकूफियां....तुम्हारी इंगलैंड जाने की
बचकानी जिद जोर पर रही। जिद की जीत होती रही। तुम ने मुझ से मिलना तक छोड़
दिया....देख कर भी नहीं देखती। देखती तो निर्विकार। गोया मैं आदमी नहीं पेड़ कि
सड़क होऊं।....इस बीच तुम्हारे डैडी चल बसे। तुम पर जिम्मेदारियां भहरा पड़ीं।
चाहा था कि तुम्हारे दुख को अपना लूं। साथ हो लूं। लेकिन एक किस्म की ग्रंथि
तुम्हारे मन में घर कर गई थी। कुंठाएं तुम्हें चारों ओर से जकड़ती चली गईं। अपने
आप को तोड़ती दफ्तर-परिवार के बीच एक धुरी बनाती, जोड़ती तुम जाने वक्त के किस चमत्कार को जोहती रहती। और चमत्कार थे
कि वक्त के हाथों से खिसकते गए। तुम्हारी जिंदगी की सारी तरतीबें बेतरतीब होती चली
गईं। मैं तो क्या बहुतों ने तुम्हें संभलने को कहा। लेकिन तुम भला किसी का कहा
क्यों मानती ? बस एक झूठी अकड़ के सैलाब में सड़ती, वक्त की आग में तिल-तिल कर जलती बुझती, तुम को सिवाय अपने दोहरेपन के कुछ रास नहीं
आता। हालां कि यह दोहरापन भी तुम्हें कितना रास आया, मुझ से या किसी से भी अधिक तुम ही जानती हो। सोचता हूं, मुझे न सही, तुम
ने किसी को तो समझने की जरूरत समझी होती, तो
शायद बहारों का रुख़ तुम्हारी ओर भी मुड़ा होता और उस का कोई झोंका कतई तौर पर तो
नहीं, शायद बहक कर ही सही, इस अदने लल्लू की ओर भी बढ़ आता। लेकिन कहां ? तुम तो अपना आप ही कहीं खो बैठी थी, कि रूठ बैठी थी नहीं कह सकता।
बाप का बड़ा बेटा कब तक ख़ैर मना सकता था भला....? नौकरी मिली-मिलाई थी, लाख विरोध करने पर भी एक चुड़ईक दोस्त की इस
पैरोडी, ‘रहिमन वे नर मर चुके, जिन बियाह को जायं....उनते पहले वे मुएं
जिन....’ सुनते-सुनाते शादी की अनचाही खोटी खूंटी पर टांग दिया गया। खूंटी खाती
रही, मन सोता रहा। सोते-सोते सुस्त गृहस्थी
के फेर ने आ घेरा....। तुम्हारी याद आती तो उछाल दिया करता। बुरी तरह धंसता हुआ।
कभी-कभार पुराने यार लोग टांट कर ही बैठते, टालू
तौर पर टाल जाता। पर कहां टाल पाया ....अब भी तुम्हारी याद की सूली पर सवार हूं।
जब-तब इस सूली पर चढ़ता ही रहता हूं, शायद
नियति हो गई है।
घर में बिटिया पैदा हुई। जान-बूझ कर इस का नामकरण तुम्हारे नाम से
किया। यह सोच कर कि तुम नहीं, न
सही, बिटिया तो मेरी रहेगी।....पश्यंति बेटी
के रूप में। इस तरह मेरी बिटिया बन कर तुम मेरे मन-मानस, घर-देहरी और आंगन में अपने से कहीं अधिक
विस्तार पा चुकी थी। फिर भी तुम और तुम्हारी याद ! झकझोर-झकझोर जाती। मन का
पोर-पोर पिरा उठता। समय की सूली, तुम्हारी
याद की सूली से धारदार नहीं लगी मुझे। बीता समय भी तुम्हारी याद न धो सका। फिर भी
समय तो बीतता ही गया।
कभी सुना था कि तुम्हारी भी शादी-वादी हो गई....। पर आज तुम्हारी
सूनी मांग देख कर विकल हो गया। अलबत्ता उस अदा में नहीं कि, ‘कोई विकल हुआ है / किसी रूप की कृपा है / है
मेरे भी ऊपर....’ हां इस अदा की चुभन जरूर थी। पत्नी को भी तुम्हें ही समझ
बैठा....। ओफ्फ ! तुम्हें भुलाता बहुत रहा। बहुत तरहें अख़्तियार की इस भुलाने
ख़ातिर....। शुरू में तो तुम्हारे प्रतिशोध में कुछ कन्याओं से खेला। उन्हें जी भर
कर उलीचा। उलीच-उलीच तबाह करता रहा। कुछ समय बाद पाया कि वह तुम्हारी बिरादर
कन्याएं तबाह हुई हों, न हुई हों, मैं जरूर तबाह हो गया। अपनी अमानवीयता से आजिज, वापस घर की राह याद आई। नहीं गया घर। इस लिए कि
उस शहर में तुम्हारे होने का अंदेशा था। भुलाता रहा तुम्हें। शहर-दर-शहर भटकता, नौकरियां करता, छोड़ता-झुलसाता रहा, अपने
आप को। नहीं झुलसा मैं। झुलसता गया मेरा वक्त, झुलसा
मेरा कैरियर, झुलसा मेरा अहं।, झुलसे मेरे आस- पास और परिवार के लोग। पर मन
मेरा नहीं झुलसा। कभी नहीं।
तुम्हें भुलाने की ख़ातिर इस ‘झुलसने’ से ‘झांकने’ की एक लंबी
प्रक्रिया है। तुम नहीं समझ सकोगी। तुम्हारे पास वक्त नहीं होगा। न ही समझ सकने
लायक मन। यकीन मानो, अब भी मेरा व्यक्तित्व अपने नहीं
तुम्हारे परितोष के लिए उद्वेलित हो उठा है। हां, तुम्हीं ने तो मुझे परितोष बनाया था। याद है तुम्हें, कि तुम ने कहा था, ‘अनु, एक
बात कहूं।’
‘कहो।’
‘यह
तुम्हारा अनु नाम घर में चले तो चले, मेरे
साथ नहीं चलेगा।’
‘आज
नाम की बात कर रही हो कि घर में चले तो चले, मेरे
साथ नहीं। क्या ख़बर कि कल मेरे व्यक्तित्व को भी यूं ही किक कर दो और फिर मेरे मन
को। प्यार को भी !’
‘अरे
नहीं बाबा ! देखो तुम बेवजह सेंटीमेंट की गिरफ्त में आ जाते हो....मैं भला क्यों
सोचूंगी, सोचें मेरे दुश्मन ! मैं ने तो सोचा
कि....’
‘कि
आलू गोभी रख दें।’
‘धत्
! मैं तो तुम्हें परितोष कहूंगी। परितोष....हूं !’
ठीक भी था, पश्यंति और परितोष। दोनों देखने में
अलंकारिक। एक-दूसरे के समानांतर। अब सोचता हूं तो पाता हूं कि नियति भी इसी
समानांतर के साथ गुंथी रही,
कुछेक छिटपुट क्षणों को छोड़, हम दोनों हमेशा समानांतर ही रहे। हमेशा के लिए
होते गए। कोई वक्रता नहीं,
न ही कोई तिर्यक, जो एक-दूसरे को काटते हुए मिला सके और कि अनर्थ
का अर्थ काट कर अर्थवान अर्थ दे सके।
सुबह देर से उठा था। आदत है सुबह देर तक सोने की। रात-भर जागता जो
हूं। अख़बार पढ़ नहीं, पलट रहा था। फोन की घंटी बजी। मैं ने
ही उठाया, ‘यस प्लीज....’ और ‘पम्मी, तुम्हारा फोन’ कह कर अख़बार फिर से पलटने लग
गया। लेकिन अचानक फोन पर बतियाती पम्मी के मुंह से परितोष नाम सुन कर विचलित हो
गया। पम्मी की बात-चीत सुनता रहा ‘....हां, परितोष....!
हां-हां....पापा घर पे ही हैं। उन्हों ने ही तो फोन रिसीव किया था ! आ रहे हो ना।
ऊं हूं ? यहीं आ जाओ न प्लीज ! ममी नहीं आना
चाहतीं ? देखो उन्हें किसी तरह कनविंस तो करो।
तुम समझते क्यों नहीं ? अच्छा चलो भई, तुम्हारी ही सही, मैं ही आई। ओ॰ के॰।’
इस परितोष नाम से पम्मी की बात अकसर होती रहती। अकसर वह उस से मिलने
भी जाती रही। चाहता था, पूछूं उस से कि यह परितोष कौन-सी बला
है? लेकिन पूछने भर का साहस कभी बटोर न
पाया। पूछने की सोचता तो अतीत का बीहड़ भयावह लगने लगता। अतीत झुलसा-झुलसा जाता।
जब्त कर जाता अपने आप को। फिर जब से पम्मी की ममी नहीं रहीं थी, पम्मी की आजादियों में बचकानी गृहस्थी का लटका
लटक गया था। बची-खुची उस की आजादी में खलल नहीं डालना चाहता था, न ही उस की नीयत पर किसी किस्म का अंदेशा।
शक-सुबहे जैसी कोई दीवार हम बाप-बेटी के बीच कभी रही ही नहीं। एक अंडरस्टैंडिंग थी, जिसे हम दोनों बाख़ुशी पा लेते। लेकिन इस बार
इन सारी चीजों से परे हो कर सोचने लग गया था। जब कि न तो ऐसी मेरी आदत थी, न ही इस किस्म का संस्कार। फिर भी....। बहुत
दिन हुए उन का यह चक्कर चलते हुए। मैं कुछ न भुला कर भी नार्मल-सा हो गया था।
सर्दियों की ही कोई सुबह थी। फोन की घंटी गुनगुनाई....मैं उठूं-उठूं
कि पम्मी दौड़ कर फोन पर झूल गई। जाने क्या गुप-चुप खुसफुस स्टाइल में बतियाती
रही। कान लाख लगाए रहा, कुछ सुन नहीं पाया। सिवाय, ‘ओ॰ के॰ बाबा’ जो वह बहुत ही जोर से बोली थी।
रिसीवर रख कर,
उछलती-बहकती, किचेन में चली गई। थोड़ी देर बाद सहमती, सकुचाती आई। बोली, ‘पापा !’ मैं ने कहा, ‘हां, कहो
।’ बोली, ‘एक ब्वायफ्रेंड आ रहा है....।’
‘अच्छी
बात है। आने दो।’
‘वो
तो है। बट यू बिहैव नार्मली। प्लीज !’
‘कोई
ख़ास बात है क्या ?’
‘नहीं
बस यूं ही।’ कहती हुई वह अपने कमरे में चली गई। मैं कॉफी पीता रहा। थोड़ी देर बाद
किंचित शर्मीला-सा एक लड़का आया। सधे-सधाए ढंग से ‘मार्निंग’ कर के बैठ गया। बात
ही बात में उस ने बताया कि वह कोई डिप्लोमा कोर्स कर रहा है। पिता आर्मी में
कैप्टेन थे। वार में शहीद हो गए और अब वह अपनी ममी के साथ रहता है। दोस्तों में
पम्मी उस की अच्छी दोस्त है। बात ही बात में यह मालूम होते देर न लगी कि उस की
‘ममी’ कौन थी। मेरा दिल पहली बार तुम्हारी याद में धड़कने के बजाय बैठने सा लग
गया। बड़ा नर्वस सा हो गया। पम्मी को बुलाया और यह कह कर कि ‘अभी आता हूं’ पार्क
की ओर चला गया।
नरम मुलायम धूप की आंच में तुम्हारी यादों का मोम पिघलने लगा। पार्क
की बेंच पर बैठे हुए तुम्हारे सामानांतर नाम का उद्घोष मन में धौकनी की मानिंद
धौंक रहा था। क्या पम्मी उसे वक्र बना सकी होगी ? या कि....? इसी उधेड़बुन में था कि एक थुलथुल-सी
गोलमटोल महिला पैरों को तौलती हुई सी आती नजर आई। बतर्ज दुष्यंत, ‘तू किसी रेल-सी गुजरती है / मैं किसी पुल सा
थरथराता हूं’ का सा एहसास मन पर छा गया। सहसा वह रेल मेरी छाती पर आ कर रुक गई थी।
औरत फुसफुसाई,
‘परितोष !’
गजब ! कितने परितोष हो गए साले, समझ
नहीं आया। इधर-उधर देखा। मेरे और उस के सिवा आसपास कोई भी नहीं था।
‘क्षमा
करेंगी, मैडम, शायद आप को गतलफहमी हुई है। मैं अवनींद्र हूं, अवनींद्र नाथ।’ भावुक होता हुआ बोला था मैं।
‘हां, सच हमें गलतफहमी हो गई थी, अनु ! माफ नहीं करोगे....प्लीज ! सेंटीमेंटल मत
होवो। बी रिलैक्स।’
‘डोंट
बी सिली यार ! मैं तुम्हारा परितोष ही हूं। हां....। ‘कहते हुए उस घोर सर्दी में
भी मैं पसीना-पसीना हो गया था। मेरा वह पुल थरथरा कर खंड-खंड हो चुका था।
‘देखो, मानती हूं कि तुम ने अपनी बिटिया को मुझ जैसा
ही बनाना चाहा है, पर तुम उसे बना नहीं पाए, मुझ जैसा। मैं कांपलेक्सिव थी, वह नहीं है। सहज है वह तुम्हारी ही तरह। हालां
कि तुम ने उसे मेरे रूप में ही पाला-पोसा है, बड़ा
किया है, मुझ से कहीं अधिक प्यार दिया है। मैं
अभागी थी। जानते हो, तुम्हारे प्रति मेरा प्यार और बढ़ गया
है। किशोर वय का उछाल मारता प्यार, आज
पुख्ता हुआ जान पड़ता है। पर तुम शायद नहीं जानते हो, तुम्हारे लिए कितनी तो बेचैन रही हूं। तुम्हारी
एक झलक पा लेने भर को तरसती रही हूं। लेकिन अभिशप्त थी इस हसरत को दफनाने की
ख़ातिर। तुम पुरुष हो, कुछ ऐसा-वैसा सोच कर या उस को अंजाम दे
कर भी सहज रह सकते हो। औरतों के साथ स्थिति दोमुंही है। अगर वह कुछ ठीक भी सोचती
हैं, या कर गुजरने की तमन्ना रखती हैं तो वह
हवा के ख़िलाफ हो गई मानी जाती हैं। तुम पुरुष हो। हवा के ख़िलाफ हो कर टूटने के
बावजूद एक किस्म का रोमांच महसूस लेते हो। लेकिन औरतें लाख अपने को उन्मुक्त समझती
हों, इस स्थिति में असहाय साबित होती हैं।
ऐसे टूटती हैं, गोया बदन के भीतर कांच टूटे। और ये
कांच मन छील-छील इतना विदीर्ण कर जाता है कि मत पूछो। मेरा मन विदीर्ण तो नहीं हुआ
है, छलनी जरूर हो गया है। तुम्हें नहीं
मालूम, हवा के ख़िलाफ न चल कर भी मैं चली।
भीतर ही भीतर मैं तपती रही। डैडी के गुजरने के बाद घर की सारी छतों की दीवार
बाख़ुशी बन गई। बनी रही। लेकिन अपने लिए कितनी दीवारें, अभेद्य दीवारें खड़ी कर लीं, बहुत बाद में जान पाई। तब जब सारी छतें, मुझे नंगा कर गईं। मैं ठूंठ दीवार बन कर भहराती
गई। कोई नहीं आया मुझे संभालने। तुम भी जाने किस दुनिया में भटक रहे थे। वैसे तुम
से मैं ने कोई उम्मीद भी न की थी।
‘जाने
भी दो, बीते दिनों का लेखा-जोखा कुछ छीनेगा ही, देने वाला नहीं। बस इतना जानो कि जिंदगी जीने
का संबल मैं तुम से ही पाती रही। मेरे अनजाने में तुम ने, जो मेरे लिए किया, मैं नहीं जानती ठीक-ठाक। मैं तो बस तुम से जीने
का अर्थ पाती रही। न पा कर भी, अपने
आप में तुम्हें संजोती रही। एक बार तो इतना बेचैन हुई कि तुम्हें एक लंबी चिट्ठी
लिख मारी, जिस में तुम्हारे साथ रहने की बात भी
तय की थी। लेकिन तुम्हारा कोई अता-पता न था, मेरे
पास। एक बार तुम्हारे एक दोस्त से तुम्हारा पता मिला भी तो बेकार साबित हुआ। तुम
जरमनी गए हुए थे। सोचा, चिट्ठी उसी पते से पोस्ट करा दूं। पर
जाने किस मनोविज्ञान ने इरादा बदल दिया। जाने कितनी बार इरादे बनते-बदलते रहे। मैं
भी बदलती गई। लेकिन बदलाव के हर अंतिम मोड़ पर आ कर यही लगा कि कहीं कुछ बुनियादी
तौर पर गलत हो गया है। और तुम्हें याद है तुम ने एक बार कहा था, ‘सब कुछ गलत हो, हो ले। बुनियाद से दुरुस्त होने की संभावनाएं बनी रहती हैं। कम से कम
जिंदगी के मामले में तो यह होना ही चाहिए। हालां कि यह बहुत ही मुश्किल काम है।
कहां हो पाता है, यह बात मुझ पर इस तरह चस्पा हो जाएगी, तब सोच भी नहीं सकी थी।’
‘अब
तो सोच लिया न, समझ भी लिया होगा। अच्छी बात है। जिस
बुनियाद की तुम बात कर रही हो, इस
बुनियादी शुरुआत की इब्तिदा उम्र के किसी पड़ाव से हो सकती है। और इस हिसाब में
कोई भी हवा ख़िलाफ भले ही पड़ती हो, कुछ
बहुत असर नहीं डाल पाती। और फिर जो तुम्हारे भीतर की बात जशेरदार हो तो यह असर
बड़ी आसानी से चाटा जा सकता है, उड़ाया
जा सकता है। क्यों कि यह,
देखने में भारी-भरकम जरूर जान पड़ता है, और कि कहीं जानलेवा और बोझिल भी। पर बेसिकली यह
होता कमजशेर ही है। बस जरा दम और हौसले की जरूरत होती है।’
‘हमारी
उमर अब चढ़ाव-उतार के अजीब मझदार में हैं, तिस
पर भी हौसलों को अपने ऊपर न्यौछावर करना समझ नहीं आता। बल्कि सच यह है कि औरत होने
के नाते अपने को बहुत कमजोर पाती हूं। बाहर से भले ही बहुत पुष्ट और दृढ़ बातें कर
लूं; पर भीतर से, सुलूक के स्तर पर नितांत खोखली हुई पाती हूं, अपने आप को। यह कसूर हमारे कद्दई किस्म के
संस्कारों का है, जो औरतों के लिए एक कंटीली लक्ष्मण
रेखा खींच, बीहड़ों-बियाबानों में उतार कर
अभिशप्तता का लबादा उढ़ा गया है। तुम कहोगे कि लबादा उतार फेंको। मैं पूछती हूं, तुम कितनी औरतों से यह कह सकते हो, और कि तुम्हारे जैसे कितने लोग हैं यह कहने
वाले कि ‘यह लबादा उतार फेंको।’ बल्कि यह भी कि कितनी औरतें हैं जो यह लबादा
उतारने को तैयार होंगी। जहां तक मैं समझ पाई हूं, अपने बीच की औरतों को, वह
तो यह बात भी सुनने को राजी न हों। भले ही वह घुट-घुट कर जीती हों, वह कहीं से अभिशप्त बना दी गई हैं, यह मानने को भी तैयार न होंगी। उस के खिलाफ हो
पाने के बारे में कुछ सोच पाना भी बेमकसद जान पड़ता है उन्हें। क्यों कि वह उस में
ही खुश रहना सीख गई हैं। वह अभिशप्तता, उन
की धरोहर है, कहीं कम, कहीं ज्यादा। फर्क बस इतना ही है। वह सब कुछ समझते हुए भी नहीं समझना
चाहतीं। इस लिए कि वह कभी किसी किस्म का रिस्क लेना नहीं सीख पाई हैं। और जिस दिन
वह यह रिस्क लेना जान लेंगी, तुम्हारे
जैसे मर्दों को इस या उस तरह का कुछ कहने की जरूरत ही नहीं होगी। और जिस दिन यह
होगा, होगा जरूर, उस दिन एक नए किस्म की अराजकता भी पनप सकती है, जो सुखद भी हो सकती है और तकलीफदेह भी।’
‘पर
होगी मानवीय !’
‘हां, तुम कहते हो तो मान लेती हूं। वैसे तुम्हारा
कहना कहीं ठीक भी जान पड़ता है। लेकिन छोड़ो यह सब। ऐसा कुछ बतियाने नहीं आई
यहां....वैसे भी इस टकराव में जाने मंजिल मिले कि खो जाए, एक रिस्क ही होता है। बात असल यह है कि
तुम्हारी बिटिया और मेरे बेटे की दोस्ती एक लंबे अर्से से चली आ रही है। उन की
दोस्ती, अब दोस्ती से कुछ अलग की भी मांग करने
लगी है। तुम नहीं जानते मैं ने अपने बेटे को, तुम
जैसा ही लल्लू डीलडौल दिया है, तुम्हारे
अनुरूप ही संजोया है, तुम्हारा ही मन बोया है। अब हमारे साथ
जो हुआ सो हुआ, अब इन के साथ तो ऐसा वैसा कुछ न होने
दो प्लीज....!’
‘देखो, पश्यंति, इस
बात का बुरा नहीं मानना चाहिए तुम्हें। इस लिए बस भी करो पश्यंति ! अब आख़िर चाहती
क्या हो, मेरी बिटिया की जिंदगी भी मेरी जैसी हो
जाए। जहर घुल जाए !’
‘शायद
तुम भूल रहे हो कि मैं परितोष की मां हूं।’
‘नहीं, भला यह कैसे भूल सकता हूं। बिलकुल फिल्मी किस्म
का यह मोड़ मुझे कुछ सोचने नहीं दे रहा। कोई फैसला नहीं लेने दे रहा। एक अजीब-सी
आशंका मन को डुबाए ले जा रही है।’
‘तुम्हारा
विवेक और सुलझा हुआ दिमाग कहीं बिखर तो नहीं गया ? चीजों के प्रति सोचने-समझने का वह स्वस्थ नजरिया किस गोते में गंवा
आए हो। समझ नहीं पा रही। मुझे समझने की कोशिश करो प्लीज !’
‘एक
और बिखराव ख़ातिर ?’
‘नहीं, बिखरे हुए को सहेजने ख़ातिर मन अपना साफ करो।’
‘कहा
न, कोई फैसला नहीं ले पा रहा।’
‘देखो
बिफरो नहीं। बात हमारे या तुम्हारे फैसले की है भी नहीं। फैसला तो उन्हें ही लेना
है। हम सिर्फ कोशिश कर सकते हैं। अलग बात है इस में हमारा एक गहरा स्वार्थ
होगा....जो तुम्हें कहीं पवित्र लगेगा। अपने बीच के इस उमस-भरे समानांतर की घुटन
को, इस समानांतर रेखा की नियति को इन के
माध्यम से कोई तिर्यक देना,
कोई वक्र खींचना....शायद यह स्वार्थ
पूरा होना ही नियति हो।’
‘लेकिन
यह अचानक तुम्हारा हृदय-परिवर्तन ? समझ
नहीं आया।’
‘तुम
कहा करते थे न, आदमी को करीब से करीबतर होने के लिए
संबंधों में कहीं वक्र होना जरूरी होता है, चाहे
वह किसी भी बिंदु पर हो....पर हो।’ मुझे यही बिंदु मिल पाया है, उसे छोड़ना नहीं चाहती, अपनी भरसक नहीं छोड़ूंगी। आज पहली बार तुम्हारे
किसी टांट पर मैं नाराज नहीं हुई हूं। सो जानो कि यह हृदय- परिवर्तन है जरूर, पर अचानक नहीं, इस की एक लंबी और दुरूह प्रक्रिया है। वैसे इस परिवर्तन की इब्तिदा
में तुम्हारी मां हैं।’
‘अच्छा
! लेकिन मां को गुजरे जमाना हुआ....तुम्हारी भेंट कब हुई ?’
‘पहले
तो तुम तिनके जैसी बातों और घटनाओं का भी पूरा-पूरा ब्यौरा रखते थे, कहूं कि मन में बांध रखते थे, यह कैसे भूल गए भला ? याद नहीं ? बहुत
बरस पहले, बस से तुम्हारे गांव से हो कर गुजरी थी
तब यह परितोष छोटा ही था। तुम्हारी मां और तुम्हारी पम्मी उस बस से उतरी थीं, तुम दौड़े-दौड़े धोती खुंटियाते आए थे। उसी बस
से दीदी के साथ मैं इलाहाबाद जा रही थी। तुम ने हमें देखा भी था। मैं ने तुम्हें
देख हाथ उठाया था। कुछ कहा भी था। तुम सुने ही नहीं भला !’
‘पर
तब मां ने मुझ से कुछ नहीं बताया था !’
‘मां
ने मुझ से कहा था, ‘बेटी, इन दोनों की जोड़ी ख़ूब फबेगी। मेरी मानो तो अपनी कमी इन दोनों से
पूरी कर लेना। तुम लोगों का मलाल धुल जाएगा।’ मैं फफक पड़ी थी।’
‘फफक
तो तुम अब भी रही हो।’
‘तब
में, अब में बड़ा फर्क है....तुम नहीं
महसूसते ?’
‘महसूसने
से फायदा भी क्या है, सिवाय झुलसने के और क्या हासिल है ?’
‘देखो
यह अपनी देवदासाना अदा अब बटोरो, और
सोचो कि अब तुम कुछ और हो कि हर वक्त बच्चे ही बने रहोगे ? देखो बच्चे उधर से इधर ही आ रहे हैं।’
-13-
सुंदर लड़कियों वाला शहर
बरसों बाद वह इस अपने पुराने शहर आया था। पुरानी यादों में डूबता
उतराता। साथ में अपने एक ख़ास दोस्त को भी लाया था। लाया क्या था वह खुद नत्थी हो
कर आ गया था। नत्थी हो कर आया था और अब नकेल बन कर सारे शहर को धांग लेना चाहता
था। ऐसे जैसे वह कोई शहर न हो किसी औरत की देह हो और एक-एक पोर, एक-एक अंग, एक
ही सांस में भोग लेना चाहता था। उस ने कहा भी कि, यह औरत नहीं शहर है ! वह शहर जो कभी उस का सपना था। इस सपने की शिफत
में बड़ी शिद्दत और तफसील में वह उसे घुमाना चाहता था, उसी मन, उसी
तड़पन के साथ जो कभी बीते बरसों में उस ने शेयर किया था।
कैमरा कंधे पर लटकाए वह भी साथ घूम रहा था लेकिन एक हड़बड़ी की
तख़्ती टांगे हुए। उस की यह हड़बड़ी ही उस के सपनों के इस शहर में पैबंद बन रही
थी। एक जगह चाट का ठेला लगा देखा तो वह बोला, ‘शरद, चाट खिलाओगे अपने शहर की ?’
‘बिलकुल, क्यों नहीं !’ शरद ने जोड़ा, ‘मेरे शहर की चाट में जो असीर है वह तुम्हें
किसी और शहर में मिलेगी भी नहीं।’
चाट खा कर चलते हुए वह बोला, ‘हां
भई, तुम्हारी चाट सचमुच बड़ी उम्दा थी।’ उस
ने जोड़ा, ‘तुम्हारे शहर की चाट !’
‘और
खाओगे ?’
‘नहीं
अब कल फिर खा लेंगे ?’ वह रुका और छह-सात के झुंड में वहां से
गुजरती हुई लड़कियों को भर आंख देखने लगा। पूरी बेहयाई से। शरद का मन हुआ कि उसे
इस तरह देखने से टोके। पर जाने क्यों झिझक गया। टोका नहीं चुपचाप खुद भी खड़ा
लड़कियों को देखता रहा। पर संजीदगी से। उस की तरह बेहयाई से नहीं। उन लड़कियों का
ग्रुप अभी पूरी तरह से आंख से ओझल भी नहीं हुआ था कि लड़कियों के दो ग्रुप और
सामने आ गये। शरद समझ गया कि यह सिलसिला यूं ही थमने वाला नहीं। लड़कियों के हिप्स
की मूवमेंट, उस की दलदल में आंखों को धंसाते हुए
शरद ने एक रिक्शा रोक लिया और बोला, ‘चल
प्रमोद तू भी बैठ!’ प्रमोद रिक्शे पर बैठ गया तो शरद बोला, ‘चलो, तुम्हें
वह नर्सरी स्कूल दिखाऊं जहां मैं पढ़ता था।’ वह बोला, ‘यहीं पास में ही है।’ फिर रिक्शे वाले को स्कूल
का नाम बताया। रिक्शा चलने लगा तो दूसरे रिक्शों पर या पैदल चलती लड़कियों, औरतों को भी प्रमोद घूरता चला। अचानक बोला, ‘शरद एक बात है, तुम्हारे शहर की चाट ही नहीं, तुम्हारे
शहर की लड़कियां भी सुंदर हैं। बहुत सुंदर हैं।’ उस ने जोड़ा, ‘सुंदर और सीधी।’
‘अच्छा
!’
‘हां, शांत, गंभीर।
सीधी, सुंदर और भोली। किसी तालाब में सोए हुए
कमल के फूल की तरह।’ वह बोला, ‘छोटे
शहर की लड़कियों की तुलना महानगरीय लड़कियों से करना बेमानी है।’
‘ये
तो है !’
‘अब
समझ में आती है पुरानी फिल्मों के गानों की तासीर। तब के शायर छोटे-छोटे शहरों और
गांवों से गए थे मुंबई। तो उन के गानों में इन्हीं सुंदर और भोली लड़कियों के अक्स
आए और वह गाने अमर हो गए। अब तो फिष्ल्मों में गाने वैसे भी अमूमन शायर लोग नहीं
लिखते। कोई भी ‘लिरिक’ लिख देता है। लिख देता है महानगरीय लड़कियों के नाज-नखरे और
मशीनी चेहरा देख कर। और गाने पिट जाते हैं।’
‘लड़कियों
पर क्या रिसर्च कर रहे हो इन दिनों के गानों पर ?’
‘बात
को तोड़ो नहीं।’ प्रमोद बोला, ‘पुराने
गानों की तासीर यूं ही नहीं है।’ वह तफसील में आ गया, ‘अभी कुछ बरस ही हुए एक फिष्ल्म आई थी, ‘राजा हिंदुस्तानी।’
‘हां
आई तो थी ! चली भी थी ठीक-ठाक !’
‘उस
में एक गाना था, ‘परदेसी, परदेसी जाना नहीं।’ वह बोला, ‘यह
गाना भी ख़ूब बजा था लेकिन अब कहीं जल्दी सुनाई नहीं देता। चला गया जाने कहां। तब
जब कि गाने के बोल ही थे,
‘परदेसी जाना
नहीं, मुझे छोड़ के।’ प्रमोद कहने लगा, ‘लेकिन कोई तीन दशक पहले एक फिल्म आई थी ‘जब-जब
फूल खिले।’ उस में भी एक गाना था, ‘परदेसियों
से ना अंखियां मिलाना, परदेसियों को है एक दिन जाना। जिसे लता
और रफी ने अलग-अलग एक ही धुन पर गाया था। यह गाना तो आज भी बजता है अपनी पूरी
मिठास, अपनी पूरी मेलोडी के साथ। यह गाना नहीं
गया। जानते हो क्यों ?’ वह बोला, ‘क्यों कि यह गाना जरूर ऐसे ही किसी छोटे शहर की किसी भोली और सुंदर
लड़की को नजर कर के उसकी ही आंच में लिखा गया रहा होगा। जब कि ‘परेदसी जाना नहीं, जाना नहीं मुझे छोड़ के’ निश्चित ही किसी
महानगरीय लड़की के ताप में लिखा गया होगा। इस लिए यह गरमी जल्दी उतर गई। पर वह
‘परदेसियों से ना अंखियां मिलाना’ की आंच आज भी बाकी है।
‘किसी
लड़की की आंच लग गई हो इस शहर में तुम्हें भी, तो
बताओ ?’ शरद चुहुल करता हुआ बोला, ‘कि तुम भी कोई गाना ही लिख के बताओगे, बांचोगे इस आंच को ?’
‘नहीं
भई, तुम संजीदगी को तोड़ो नहीं।’ वह रिक्शे
पर बैठे-बैठे कैमरे के थैले को बाएं कंधे से उतार कर दाएं कंधे पर लटकाते हुए बोला, ‘मुझे तो कई बार अलीगढ़ जैसे शहर पर रश्क हो आता
है। जानते हो क्यों ?’
‘क्यों
?’
‘क्यों
कि वहां एक से बढ़ कर एक उम्दा गीतकार हुए। जां निसार अख़्तर ने कितने संजीदा, कितने भावुक और रोमांटिक गाने लिखे हैं और उन
का वह ख़ून ही दौड़ा जावेद अख़्तर की देह में तो जावेद ने भी एक से एक लाजवाब गीत
लिखे। मसलन ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा !’ और तो और नीरज के गीतों में ख़ास कर
उनके फिल्मी गीतों में जो मांसलता, जो
सौंदर्य इस सलीके से छलकता है तो क्या समझते हो इस में सिर्फ नीरज की काबिलियत है ?’ वह बोला, ‘हरगिज
नहीं! इस में अलीगढ़ की उन सुंदर लड़कियों का भी बहुत बड़ा शेयर है। आगरा और
कानपुर की लड़कियों का भी। तब उन्हों ने लिखा, ‘शोखि़यों
में घोला जाए थोड़ा-सा शबाब, उस
में फिर मिलाई जाए थोड़ी-सी शराब, होगा
नशा जो तैयार, वो प्यार है, प्यार है ! वो प्यार !’
‘क्या
बात है !’
‘और
वो शहरयार भी तो अलीगढ़ के हैं। अलीगढ़ की ही किसी लड़की की आंखों पर ही तो उन्हों
ने लिखा होगा, ‘इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों
हैं!’
‘ऐसे
तो फिर मजरुह सुलतानपुरी ने भी सुलतानपुर या लखनऊ की लड़कियों को अपने गानों में
गूंथा होगा। कैफी आजमी ने भी आजमगढ़ या लखनऊ की लड़कियों पर रीझ कर अपने गाने लिखे
होंगे। फिर ऐसे ही शैलेंद्र, साहिर, शकील, गुलजार, वगैरह हर किसी के साथ उन के छोटे-छोटे शहरों या
गांवों की लड़कियां भोली-भोली, सुंदर-सुंदर
लड़कियां, उन के गानों में सोती मिल जाएंगी। तुम
किस- किस को जगाते चलोगे ?’
शरद बोला, ‘और जो कोई लड़की बुरा मान जाए, जागने से इंकार कर दे तो ?’
‘तो
क्या एक फोटो खीचूंगा और भाग चलूंगा !’ कह कर वह खिलखिला कर हंसा और बोला, ‘सच में झूठ नहीं बोल रहा, तुम्हारे शहर की लड़कियां सचमुच बहुत सुंदर हैं
!’
‘पर
क्या करोगे, यह अलीगढ़ नहीं है !’ शरद ने तंज भरा
जवाब दे कर उसे टोका।
‘पर
इस शहर की सारी लड़कियां तुम्हारी बहन भी नहीं हैं !’ शरद के तंज का जवाब प्रमोद
ने भी ताने में डुबो कर दिया।
‘बेवकूफी
की बात मत करो !’ रिक्शे से उतरते हुए शरद बोला।
‘सॉरी
यार तुम तो बुरा मान गए !’ वह फिर से बोला, ‘सॉरी, वेरी सॉरी !’
स्कूल आ गया था। रिक्शे वाले को पैसे दे कर दोनों स्कूल के आहाते में
घुस आए। बच्चों की छुट्टी हो चुकी थी पर स्कूल अभी खुला था। स्कूल का बड़ा-सा
मैदान वैसा ही था जैसे शरद के बचपन के दिनों में था। वह यह देख कर खुश हुआ। लेकिन
हरी घास नहीं थी, पहले की तरह। यह देख कर थोड़ी आंखों को
तकलीफ हुई। मैदान के चारों ओर लगे पेड़ों का घनापन भी गायब था। पेड़ थे, लेकिन कुछ-कुछ। आम, लीची और यूकलिप्टस के पेड़। एक पेड़ के नीचे वह
दुकान भी नहीं थी जहां से कभी कभार टिफिन टाइम में वह चूरन, चर्खी, पपड़ी
और लेमनचूस ख़रीदता था। कभी पैसे दे कर तो कभी रफ कापियों की रद्दी बेंच कर। उस ने
यह सब डिटेल्स प्रमोद को दिए तो प्रमोद ने कैमरा निकालते हुए मुसकुरा कर कहा, ‘तुम्हारे बचपन की दो चार फोटो ले सकता हूं ?’
‘अब
मेरा बचपन कहां है ?’ शरद बोला, ‘अब तो बचपन की याद है बस।’
‘तो
उसी याद की !’ कैमरे की लेंस ठीक करते हुए प्रमोद बोला, ‘और क्या?’
इधर-उधर शरद को खड़ा कर प्रमोद फोटो खींचने लगा और शरद उसे बचपन की
बातों का बेबात विस्तार देते हुए। छिटपुट शैतानियों का, टीचर्स और बचपन के दोस्तों की यादों का कोलाज
परोसने लगा। छोटी-छोटी बातों का बेबात विस्तार देते हुए। कि, ‘बरसात में यहां पानी भर जाता था तो वह मेढक
पकड़ता था, उधर गुल्ली-डंडा खेलता था, इधर कबड्डी और उन पेड़ों के झुरमुटों के बीच
आइस-पाइस और यहां क्लास की लड़कियों के साथ एक्खट-दुक्खट !’
‘मतलब
लड़कियां तुम्हारी जिंदगी में बचपन से ही शुमार रही हैं ?’
‘क्या
बेवकूफी की बात करते हो ?’
शरद बोला, ‘बचपन था तब। नर्सरी स्कूल है यह, डिग्री कालेज या यूनिवर्सिटी नहीं।’
‘हां, पर इतना बड़ा कैंपस तो अब के डिग्री कालेजों को
भी मयस्सर नहीं !’ वह बात को रंग देता हुआ बोला, ‘जितना बड़ा कैंपस तुम नर्सरी स्कूल में ही देख गए हो !’
‘ये
बात तो है !’
‘पर
ये स्कूल है कि थिएटर !’ लाल रंग की उस बिल्डिंग का मुआयना करते हुए वह बोला, ‘आओ इधर खड़े हो जाओ, एक फोटो तुम्हारी यहां भी खींच दूं।’ फोटो
खींचने के बाद अपनी दाढ़ी खुजाते हुए उस ने सवाल फिर दुहराया, ‘ये स्कूल है कि थिएटर !’
‘है
तो असल में थिएटर ही !’
‘क्या
?’
‘हां
!’ शरद बोला, ‘कभी अंगरेज बहादुर यहां थिएटर और डांस
ही देखते थे। ब्रिटिश पीरिएड की बिल्डिंग है यह।’
‘वो
तो दिख ही रही है।’
‘हां, पर अब भी थिएटर होता है यहां कभी-कभार !’
‘अच्छा
?’ प्रमोद हैरत में पड़ता हुआ बोला, ‘तो पढ़ाई कब होती है ?’
‘पढ़ाई
दिन में, थिएटर रात में।’
‘क्यों
तुम्हारे शहर में कोई दूसरा थिएटर नहीं है ?’
‘नहीं, प्रोफेशनल थिएटर और इस तरह का तो नहीं।’ शरद
बोला, ‘हां, बनने की बात हो गई है। दो बरस पहले सुना था शिलान्यास भी हो चुका
है।’
‘अच्छा
?’ प्रमोद पास की रेलवे पटरी को उचक कर देखते हुए
वह बोला, ‘अच्छा तो जब ट्रेन यहां से गुजरती है
तो क्या नाटक में खलल नहीं पड़ता ?’’
‘बिलकुल
नहीं।’ शरद बोला, ‘दो एक मिनट में ट्रेन गुजर जाती है और
जब ट्रेन गुजरती है तो जो कलाकार जहां होता है, वहीं
फ्रिज हो जाता है। ट्रेन गुजर जाती है तो वह जस का तस शुरू हो जाता है।’
‘तुम
ने भी यहां नाटक देखे हैं ?’
‘बहुत
!’ शरद बोला, ‘नाट्य प्रतियोगिताएं भी।’ वह बोला, ‘कई स्टेट लेबिल ड्रामा फेस्टिवल हुए हैं यहां।’
‘गजब
!’
‘असित
सेन की याद है तुम्हें ?’
‘वही
कॉमेडियन असित सेन ?’
‘हां।’
‘पर
उस का तो निधन हो चुका है।’
‘हां, पर सुनता हूं कि एक समय असित सेन भी यहां थिएटर
कर चुके हैं।’
‘तो
क्या असित सेन इसी शहर के थे ?’
‘तो ?’
‘नहीं
मैं समझ रहा था, बंगाली आदमी कलकत्ते वगैरह का होगा !’
‘तुम
असित सेन को सिर्फ कॉमेडियन के तौर पर ही जानते हो ?’
‘हां, वह भी बोगस कॉमेडियन ! हमेशा एक ही स्टाइल। वही
बों बों कर के बोलना !’
‘तुम
ने राजेश खन्ना, वहीदा रहमान वाली ‘ख़ामोशी’ या अशोक
कुमार, सुचित्रा सेन वाली ‘ममता’ फिल्में देखी
हैं ?’
‘देखी
हैं।’ प्रमोद बोला, ‘क्यों क्या हुआ ?’
‘कैसी
लगी ?’
‘गजब
! फैंटास्टिक !’ वह बोला,
‘रेयर और सीरियस
फिल्में हैं यह और इन के गाने भी !’
‘जानते
हो इन का डायरेक्टर कौन था ?’
‘पता
नहीं, याद नहीं आ रहा !’
‘तो
सुनोगे तो चौंकोगे !’
‘कौन
था ?’
‘यही
असित सेन ! जिन्हें तुम अभी बोगस कॉमेडियन बोल रहे थे।’
‘वो
बों-बों करने वाला !’
‘हां, वही !’ शरद बोला, ‘दिक्कत यही है कि असित सेन कॉमेडियन को तो लोग जानते हैं पर उन के
डायरेक्टर रूप को बहुत कम लोग जानते हैं। जब कि वह गजब के डायरेक्टर थे ! राजेश
खन्ना की और भी कई हिट फिल्में असित सेन ने डायरेक्ट की हैं।’ वह बोला, ‘एक समय में विमल रॉय जिन्हों ने दिलीप कुमार
वाली देवदास बनाई थी, उन विमल रॉय के भी असिस्टेंट रहे थे
असित सेन !
‘रहे
होंगे यह तुम्हारे असित सेन विमल रॉय के असिस्टेंट और कॉमेडियन भी।’ प्रमोद बोला, ‘पर ख़ामोशी और ‘ममता’ फिल्मों के डायरेक्टर जो
असित सेन थे वह दूसरे असित सेन तो बंगला फिल्मों के भी मशहूर डायरेक्टर रहे हैं।
अभी कुछ समय पहले ही उनका भी निधन हुआ है। जबकि तुम्हारे इस असित सेन को गुजरे कुछ
साल हो गए।’
‘अच्छा
!’ शरद अचकचाते हुए बोला।
‘उदास
मत हो।’ प्रमोद बोला, ‘फिर भी इस तुम्हारे स्कूल और असित सेन
के थिएटर को अंदर से भी देखना चाहिए !’
‘चलो
देखते हैं !’ कह कर शरद प्रमोद को ले कर स्कूल बिल्डिंग कम थिएटर में दाखि़ल होने
लगा तो एक चपरासी ने टोकते हुए रोका। शरद ने बड़ी विनम्रता से हाथ जोड़ कर बताया
कि ‘वह यहां का पुराना स्टूडेंट है, पुरानी
याद ताजी करना चाहता है !’ तो वह चपरासी मुसकुराते हुए मान गया।
इस थिएटर का आर्किटेक्ट देख प्रमोद विस्मित हुआ। फिर शरद ने बताया कि
यहां स्टेज पर भी उस ने पढ़ाई की है। तब शायद वह थर्ड या फोर्थ में था। यहां स्टेज
पर तब दो क्लासें लगती थीं। एक घटना भी उसे याद आई। एक लड़की ने उस की स्याही की
दावात चुरा ली थी। नाम था उस का सविता। सुंदर-सी थी। भोली-सी। बहुत कम बोलती थी।
बहुत झगड़ा हुआ था उस से उसका। तीन-चार दिन तक चला था झगड़ा। उस ने उसके बाल पकड़
कर एक दिन खींचा तो उस ने शरद की पीठ पर जोर से काट लिया। इस का बदला शरद ने एक
दिन आइस पाइस खेलते हुए लिया। एक पेड़ के पीछे दोनों छुपे थे। दो और लड़के थे। पर
शरद ने मौका पाते ही सविता को काटने की कोशिश की। वह जोर से चिल्ला पड़ी। सो शरद
ठीक से काट नहीं पाया। वह डर गया। तो सविता हंसने लगी। बाकी लड़के भी। फिर सविता
से उस की दोस्ती हो गई।’ वह याद करते हुए बोला, ‘फिर
तो क्लास में किसी भी से झगड़ा होता तो सविता और शरद दोनों मिल कर लड़ते।’
‘मतलब
मामला जम गया !’
‘नहीं, तब ऐसा कुछ ध्यान में भी नहीं था। फिर भी जैसा
कि फ्रायड मानता है, बचपन के सेक्स पर उस की जो मान्यता है, वह कहीं सही भी है। मैं ने और सविता ने भी एक
पेड़ के पीछे इसी स्कूल में खेल-खेल में सही, सेक्स-सेक्स
भी खेला। ‘डॉक्टर-डॉक्टर’ वाले खेल में’ शरद भावुक होता हुआ बोला, ‘तब सच में वह सेक्स नहीं था, एक जिज्ञासा भर थी, देखने, छूने
और महसूस करने की। वह जिज्ञासा जो मुझ में थी, वह
जिज्ञासा सविता में भी थी शायद। वह भी यह ‘डॉक्टर-डॉक्टर’ खेली। पर बाद में बोली, ‘गंदी बात ! छि !’ फिर कई दिनों तक वह उस से
बोली नहीं। और फिर एक दिन अचानक वह स्याही वाली दावात देती हुई बोली, ‘अपनी दावात ले लो, लेकिन अब कुट्टी।’ फिर उस ने एक अंगुली से अपने
गाल, ठुड्डी और माथा छूती हुई बोली, ‘दाल, भात, रोटी, सब्जी
कुट्टी।’ उस ने जोड़ा, ‘पक्की कुट्टी !’ और ठुड्डी पर हाथ मार
कर दांत से दांत ‘कट्ट’ करा दिए। वह उठने लगी तो जल्दबाजी में दावात की स्याही उस
के स्कर्ट पर गिर गई। वह झटके से बोली, ‘कल
स्याही भी ला कर दे दूंगी।’
‘वह
दूसरे दिन स्याही लाई ?’
‘हां
भाई।’ शरद बोला, ‘पर पहले मैं ने ली नहीं। कहा कि कुट्टी
है तो स्याही क्यों लूं ?
दोस्ती करो तभी लूंगा स्याही। नहीं, नहीं लूंगा।’
‘फिर
?’
‘फिर
उस ने दाल, भात, रोटी, सब्जी कह कर चेहरे पर उंगलियां घुमाई
और कुट्टी कैंसिल कर मुच्ची कर ली। दोस्ती कर ली तो मैं ने स्याही ले ली। हम लोग
फिर से ‘आइस-पाइस’ और ‘एक्खट-दुक्खट’ खेलने लगे।’
‘अब
कहां है वह ?’
‘कौन
?’
‘वही
तुम्हारी सविता ?’
‘पता
नहीं।’ शरद एक गहरी सांस ले कर बोला, ‘है
तो पर स्मृतियों में !’
‘क्यों
? सिर्फ स्मृतियों में क्यों ?’
‘क्यों
कि उस का घर, उस का मुहल्ला, उसके पिता का नाम मैं न तब जानता था, न अब जानता हूं। तब भी सिर्फ नाम जानता था, अब भी सिर्फ नाम जानता हूं।’
‘कभी
पता करने की कोशिश नहीं की ?’
‘बिलकुल
मूर्ख हो क्या ?’ शरद बोला, ‘वह उम्र लड़कियों का पता मालूम करने की होती है
क्या ? तब इतनी समझ होती है क्या ?’
‘हां, तब तो सिर्फ ‘डॉक्टर-डॉक्टर’ खेलने की समझ होती
है !’ कह कर प्रमोद जोर से हंसा। बोला, ‘कोई
और ऐसी याद ! जो तुम्हारी स्मृतियों में हो !’
‘हां
एक लड़का सम मुखर्जी था। हम लोग जब मेढक पकड़ते तो वह उन छोटे-छोटे मेढकों को
मक्खी की तरह मार कर खा जाता। बल्कि निगल जाता ! ऐसी बहुतेरी यादें हैं। टीचरों की, प्रिंसिपल की, दोस्तों की,
बार-बार हुए झगड़ों की। अब तो उन
झगड़ों की भी बस मीठी-मीठी याद है। जाने कौन टीचर, कौन साथी कहां-कहां होंगे ? किसी
के बारे में कोई नहीं जानता !’ वह बोला, ‘पर
हो सकता है सब की स्मृतियों में वह सब कुछ ऐसे ही बसा हो। हमें तो लगता है जैसे कल
ही की बात हो। अभी घंटी बजेगी, प्रार्थना
होगी, राष्ट्रगान होगा, क्लास शुरू होगी, टिफिन होगी,
खेलेंगे, खाएंगे, झगड़ेंगे, फिर घंटी बजेगी, क्लास लगेगी,
छुट्टी होगी और लड़ते झगड़ते घर
जाएंगे। पीठ पर बैग लादे।’
‘चलो
मैं ने भी कैमरा अब कंधे पर लाद लिया है।’ प्रमोद बोला, ‘घंटी बजवाओ कि बाहर कहीं और चलें।’
स्कूल की स्मृतियां सहेजे शरद प्रमोद को लिए स्कूल से बाहर आने लगा
तो यूकलिप्टस के पेड़ के नीचे से वह फिरंगियां बीनने लगा जो कि तब के दिनों में
बीनता था और नचाता था। उस ने दो तीन फिरंगियां सड़क पर उंकड़ई बैठ के नचाईं भी और
प्रमोद को दिखाया। बताया कि, ‘यह
खेल भी था बचपन में।’
प्रमोद ने भी कोशिश की यूकलिप्टस वाली फिरंगियां नचाने की। पर नचा
नहीं पाया।
‘तुम
कैमरा ही नचाओ, वही बहुत है !’
‘ये
तो है।’
दोनों स्कूल से बाहर आ गये। सड़क पर कुछ लड़कियों को देख कर प्रमोद
फिर बोला, ‘‘सचमुच तुम्हारे शहर की लड़कियां बहुत
सुंदर हैं। बहुत भोली !’
‘पर
कहा न तुम से कि यह अलीगढ़ नहीं है। लेकिन लड़कियां सुंदर है, क्लिक करती हैं ये मैं मानता हूं।’ शरद बोला, ‘जानते हो जब मैं बी॰ ए॰ में पढ़ता था तो
मार्निंग क्लास में एडमिशन लिया था। दिन के ग्यारह बजे तक छुट्टी हो जाती थी और
मुहल्ले की ज्यादातर क्या हर जगह लड़कियों के स्कूलों की छुट्टी तकरीबन शाम को ही
होती। अब इन्हें कैसे देखूं ? तो
शाम को किसी न किसी बहाने लड़कियों के स्कूल के रास्ते साइकिल ले कर निकल पड़ता।
वह सब भागी-भागी, पैदल-पैदल घर आती होतीं और इधर से मैं
साइकिल से जाता होता। धीरे-धीरे।’ वह बोला, ‘लड़कियां
भी समझती थीं रोज-रोज मैं क्या करता हूं। और बिन बोले बात हो जाती।’ उस ने जोड़ा, ‘और आंखों को यूरिया मिल जाती। मन को स्फूर्ति
!’
‘गजब
!’ प्रमोद बोला, ‘अभी कहीं लड़कियों के किसी स्कूल की
तुरंत-तुरंत छुट्टी हुई हो तो चलें ?’
‘छुट्टी
हुए तो बहुत देर हो गई होगी।’ वह बोला, ‘अब
किसी भी रास्ते पर जाना बेकार है !’
‘ख़ैर
छोड़ो !’ प्रमोद ने कहा,
‘कुछ और भी
दिखाओगे ?’
‘बिलकुल।’
शरद बोला, ‘तो कम से कम चार छः रोज तो रुको ही। एक
दो रोज में क्या देख पाओगे। फिर चलो तुम्हें गांव की स्मृतियों से भी रूबरू कराऊं
!’
‘गांव
वगैरह तो रहने दो अभी।’ वह रुका फिर बोला, ‘यह
बताओ तुम्हारे गांव में बाग है ?’
‘है
! क्यों ?’
‘कुछ
नहीं।’ वह बोला, ‘जब तुम्हारे गांव चलेंगे तब बाग में
रुकेंगे। वहीं बाग में मटन,
चिकन कुछ बनाएंगे, दारू पिएंगे और मजा लेंगे !’
‘ठीक
! तो इसी बार चलो।’
‘नहीं
अगली बार कभी।’
‘चलो
तुम्हें कुछ और चीजें दिखाता हूं।’
‘मसलन
!’
‘एक
बड़ा मंदिर है यहां। ख़ूब मशहूर !’
‘मंदिर
वगैरह भी रहने दो !’
‘इस
मंदिर की ख़ासियत यह है कि मनौती तो सब की यहां पूरी होती ही है, मेला भी लगता है हर साल। बड़ा भारी कैंपस है।’
उस ने जोड़ा, ‘इस शहर के सारे जोड़े भी यहीं मिलते
हैं। कई लोगों की शादियां भी यहीं तय होती हैं। लड़कियां भी लोग यहीं देखते हैं।
और जाने क्या-क्या तो होता है यहां !’
‘इंटरेस्टिंग
!’ वह बोला, ‘यह बताओ कोई लड़की मेरी शादी के लिए
मुझे अभी दिखा सकते हो ?’
‘तुम्हें
शादी करनी भी है ?’
‘मैं
सीरियस हूं।’ वह बोला, ‘तुम्हारे शहर की लड़कियों को देख कर !’
‘कितनी
बार इस तरह तुम सीरियस हो चुके हो ?’
‘इस
बार सचमुच सिरीयसली सिरियस हूं !’
‘सच
!’
‘हां, भाई !’
‘तो
अगली बार कभी फिर आना तो देखा जाएगा !’
‘अगली
बार क्यों ? इसी बार क्यों नहीं ?’
‘कुछ
ढंग के कपड़े भी तो पहने होते तुम !’
‘क्यों
यह सिल्क का कुर्ता ढंग का नहीं है ? और
ये पैंट भी ठीक है।’ वह बोला, ‘हां
दाढ़ी थोड़ी करीने से नहीं है !’
‘तो ?’
‘तो
क्या वहां यह बताने की जरूरत भी क्या है कि मैं लड़की देखने आया हूं।’ वह बोला, ‘रुटीन में देख लूंगा। समझ आई तो ठीक। बाद में
बात हो जाएगी।’
‘तो
चलो !’ कह कर दोनों एक परिचित के घर पहुंचे। जहां एक लड़की थी शादी के इंतजार में।
प्रमोद को लड़की पसंद भी आ गई और प्रमोद ने आंखों-आंखों में शरद को संकेत किया कि
बात अभी शुरू कर दिया जाए। पर शरद टाल गया।
घर से बाहर निकल कर प्रमोद बड़बड़ाने लगा, ‘बात शुरू करने में हर्ज क्या था?’
‘हर्ज
था। तभी तो बात नहीं की।’
‘क्या
हर्ज था ?’
‘पहले
लड़की की, लड़की के घर वालों की राय भी तो जाननी
होगी।’ शरद बोला, ‘चलो तुम तैयार हो पर क्या गारंटी है कि
लड़की और लड़की के घर वालों को तुम भी पसंद हो ?’ वह बोला, ‘यह कोई हिंदी फिल्म का सीन तो है नहीं
कि देखा और ख़यालों-ख़यालों में शादी हो गई ।’
‘चलो
तुम बात कर के बताना !’ प्रमोद बोला, ‘नाराज
क्यों होते हो !’ कह कर वह एक जगह रुका और सिगरेट में चरस भरने लगा। चरस भर कर
सिगरेट सुलगाते हुए बोला,
‘चलेगी ?’
‘चलेगी।
लेकिन प्लेन।’ शरद बोला,
‘यह चरस वाली
नहीं।’
‘कोई
एकांत जगह है यहां ?’
‘क्यों
?’
‘कोई
पार्क ? या कोई और जगह ! जहां बैठ कर सिगरेट पी
जा सके। सुकून से बैठ कर गाने गुनगुनाए जा सकें।’
‘हां, है थोड़ी दूर पर।’ वह बोला, ‘आइडिया अच्छा है !’
रिक्शा रोक कर दोनों सिगरेट सुलगाए बैठ गए। एक प्लेन सिगरेट पर था, दूसरा चरस वाली सिगरेट पर। अचानक प्रमोद बोला, ‘यहां कहीं शराब की दुकान होगी ?’
‘क्यों
?’
‘क्वार्टर-अद्धा
कुछ ले लेते हैं। थोड़ी-थोड़ी खींच लेंगे।’
‘ठीक
है !’ कह कर रिक्शे वाले से उस ने कहा, ‘किसी
अंगरेजी शराब की दुकान पर चलो। जो पास में हो !’
एक अद्धा विह्स्की के साथ दो तीन पानी की ठंडी बोतलें, दो गिलास और नमकीन का पैकेट लेकर फिर दोनों चल
पड़े। रिक्शा उस पार्क के पास आ गया था पर शरद को पार्क दिखाई नहीं दे रहा था।
रिक्शा वाला बोला, ‘यही जगह है !’ तो बड़बड़ाते हुए वह उतर
पड़ा। प्रमोद भी उतरा।
‘यहीं
कहीं वह पार्क होता था। काफी बड़ा-सा।’
‘पार्क
है तो !’ प्रमोद बोला।
‘कहां
?’
‘वो
देखो उधर। पर बड़ा नहीं छोटा है।’
‘यह
तो बाजार है।’
‘बाजार
भी है और पार्क भी !’
‘पर
यहां पहले तो बाजार नहीं था। न ही यह पार्क इतना छोटा था। न ही ये बिल्डिंगें थीं, न सामने यह कॉलोनी, न इतनी चमचमाती ट्यूब-लाइटें।’
‘कितने
साल बाद तुम अपने इस शहर आए हो ?’
‘यही
कोई दस बारह साल हुए होंगे।’
‘तो
तुम चाहते हो इतने सालों में तुम्हारा शहर बिलकुल न बदले ?’ प्रमोद बोला, ‘तुम्हारे स्कूल के मैदान में घास गशयब थी तो तुम दुखी हो गए। पेड़ कम
देख कर दुखी हो गए।’ वह बोला, ‘अब
तुम यहां बाजार, आफिसों की बिल्डिंग और नई कॉलोनी देख
कर दुखी हो रहे हो। यह तो कोई बात नहीं हुई ! अरे, मैं कहता हूं कि इस नास्टेल्जिया से छुट्टी लो, छुट्टी ! दुखी होना बंद करो !’
‘मैं
दुखी नहीं हो रहा।’ शरद बोला, ‘मै
तो सिर्फ एक बात कह रहा हूं। कह रहा हूं कि यहां ऐसा नहीं था।’
‘हां, ये बात और है।’
‘जानते
हो इस को हम लोग पार्क के नाते नहीं स्कूल के नाते जानते थे। एक छोटा-सा हिस्सा
पार्क के तौर पर भी था। बस ! बड़ा-सा मैदान था इतना कि जिश्ला स्तर पर स्कूलों के
खेल यहीं होते थे। तुम्हें पता है यहीं मैं एक पेड़ के पीछे एक लड़की से जब-तब
मिलता था जो तब मेरे साथ पढ़ती थी।’
‘अब
तुम कहोगे कि वह पेड़ दिखाई नहीं दे रहा !’
‘हां, बिलकुल।’ शरद बोला, ‘वह बड़ा-सा इमली का पेड़ था। था तो इमली का
पेड़ पर काया उस की बरगद के पेड़-सी विशाल थी।’ वह पुरानी यादों में खोता हुआ बोला, ‘जानते हो इमली जब फली होती तो वह जब-तब बड़े
मनुहार से कहती, ‘मेरे लिए इमली नहीं तोड़ोगे ?’ ख़ास कर कच्ची इमली तोड़ने पर वह ज्यादा जशेर
देती और जब मैं कहता कि,
‘नहीं, नहीं तोड़ पाऊंगा।’ तो वह कहती, ‘लोग अपनी माशूकाओं के लिए चांद तारे तोड़ लाते
हैं और तुम थोड़ी सी कच्ची इमली नहीं तोड़ सकते ?’ वह धिक्कारती,
‘तुम मेरे लिए
कुछ करना ही नहीं चाहते !’
‘क्यों
नहीं तोड़ देते थे तुम इमली ?’ प्रमोद
सिगरेट पीता हुआ बोला, ‘क्यों उस का दिल तोड़ते थे ?’
‘इस
लिए कि मैं अपने हाथ पांव नहीं तोड़ना चाहता था।’ शरद बोला, ‘उस पेड़ पर चढ़ना आसान नहीं था, कोई बड़ा डंडा पास नहीं होता था। हां, फिर भी मैं उसे इमली खिलाता था।’ वह बोला,
‘खरीद
कर लाया होता था। कभी कच्ची, खट्टी
इमली, कभी मीठी-खट्टी और पकी इमली। और वह
ज्यों इसरार करती, इमली का पैकेट उसे थमा देता ! उस का
इसरार फिर भी इमली तोड़ने पर रहता तो उसे जगजीत सिंह की गाई एक गजल गुनगुना कर
सुना देता था, ‘तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है। तेरे
आगे चांद पुराना लगाता है।’ इस गजल में कहीं यह भी बात आती थी कि तुझ से मिल कर
खट्टी इमली भी मीठी लगती है और न मिलने पर शहद भी खारा लगता है। कुछ-कुछ ऐसा ही।
पर वह मिसरे अभी ठीक-ठीक याद नहीं आ रहे।’ वह बोला, ‘यह सुनते ही वह खुश हो जाती और फिर उस के खट्टेपन की सिसकारी भरने
लगती। बेपरवाह हो जाती। इसी बीच कभी-कभी मैं उसे कस के पकड़ कर चूम लेता। तो कभी
वह खिस्स से हंसती हुई शरमा जाती तो कभी नाराज होती हुई उठ कर खड़ी हो जाती। अपनी
साइकिल उठाती और लाख रोकने पर भी चली जाती। उस का मूड ही कुछ और था। अजीब मूडी थी।’
‘कहां
है इन दिनों यह तुम्हारी मूडी इमली वाली गर्ल फ्रेंड ?’ प्रमोद तंज करता हुआ बोला, ‘या कि नर्सरी स्कूल वाली सविता की तरह इस का भी
अता पता मालूम करने की उम्र तब नहीं थी ? कि
तब भी नादान थे ?’
‘नहीं
तब ऐसी उम्र थी।’ शरद बोला,
‘पता भी है कि
कहां है ?’
‘कहां
है ?’
‘जाने
भी दो, शादी-वादी हो गई है उस की।’
‘अच्छा
?’ प्रमोद बोला, ‘शादी के बाद भी कभी भेंट हुई इस इमली वाली से तुम्हारी ?’
‘हां, दो तीन बार। लेकिन यूं ही रुटीन !’
‘अब
तो बच्चे भी हो गए होंगे ?’
‘हां, दो बच्चे हैं।’
‘अच्छा
इस इमली वाली के साथ भी कभी, डॉक्टर-डॉक्टर
खेला तुम ने ?’
‘क्या
बेवकूफी की बात करते हो ?’
‘इस
में बेवकूफी क्या है ?’
‘इस
उम्र में डॉक्टर-डॉक्टर खेला जाता है भला ?’
‘तो ?’
‘तो
क्या ?’
‘मतलब
कुछ हुआ ही नहीं ?’ प्रमोद बोला, ‘ऐसा तो हो नहीं सकता तुम्हारे साथ कि ‘मैं ने
तुम को छुआ और कुछ नहीं हुआ।’ वह बोला, ‘कुछ
तो हुआ ही होगा इमली वाली के साथ !’
‘हां, सिनेमा देखा !’ शरद बोला, ‘उसी में जो उसे टटोल पाया टटोला, चूमा! बस। वह भी बड़ी मुश्किल से !’
‘मतलब
बात ‘आइस-पाइस’ तक रह गई। डॉक्टर-डॉक्टर नहीं खेल पाए। क्यों ?’ उस ने पूछा, ‘क्या
इमली वाली तैयार नहीं हुई ?’
‘वह
तो तैयार थी !’
‘तो ?’
‘जगह
ही नहीं मिली।’ शरद बोला,
‘तब हम संकोची
बहुत थे। यह छोटा शहर हमारे संकोच को और बड़ा कर देता। तब इतना खुलापन भी नहीं था।
हमारे घर भी दूर-दूर थे।’ वह बोला, ‘चाह
कर भी संभव नहीं हुआ !’
‘शादी
क्यों नहीं की तुम ने इमली वाली से ?’
‘संकोच
!’ शरद बोला, ‘यह कहने की सोचता ही रह गया और उस की
शादी तय हो गई।’
‘शादी
में गए थे तुम ?’
‘गया
था !’
‘बुरा
नहीं लगा ?’
‘‘बुरा-भला
सब संकोच के पत्थर में दब-दबा गया था !’
‘चलो
यह भी एक ट्रेजिडी है। मिडिल क्लास ट्रेजिडी !’ प्रमोद बोला, ‘ऐसा बहुतों के साथ होता है ! प्यार करते-करते
भइया बन जाते हैं।’ वह रुका और बोला, ‘तुम
तो भइया नहीं बन गए ?’ उस ने जोड़ा, ‘इमली वाली के भइया !’
‘नहीं।’
शरद बोला, ‘इतनी दुर्गति नहीं हुई।’
‘चलो
फिर लकी हो !’
‘क्यों
?’
‘अब
मेरा ही लो।’ शराब देह में ढकेलता हुआ प्रमोद बोला, ‘तीन चार बार भइया बन चुका हूं।’
‘अच्छा
?’
‘तो
और क्या ?’
‘छोड़ो
भी कुछ और बात करते हैं।’ शराब ख़त्म करते हुए प्रमोद ने बोतल नीचे फेंक दी। बोला, ‘तुम्हारे इस शहर में रेड-लाइट-एरिया है कहीं ?’
‘होता
तो था पहले।’ शरद बोला, ‘पता नहीं अब क्या हालत होगी ?’
‘हां, हो सकता है उस का भी नक्शा बदल गया हो !’
‘हो
सकता है !’
‘तुम
कभी गए हो इस शहर के रेड-लाइट-एरिया में ?’
‘हां, जब पढ़ता था यहां तो दो चार दफा गया हूं।’ शरद
बोला, ‘हस्त मैथुन से आजिज आ कर !’
‘अच्छा, यहां जाते संकोच नहीं लगा ?’
‘लगा
! पर छुपते-छुपाते चोरों की तरह गए।’ शरद बोला, ‘पर
यहां की औरतों के साथ संभोग करना, न
करना बराबर ही है।’
‘क्यों
?’
‘इन
बाजारू औरतों का ध्यान तो सिर्फ पैसे पर होता है। एक ग्राहक निपटा कर, दूसरा पटाने पर ध्यान रहता है। तो संभोग का सुख
ऐसे में तो मिलता नहीं। तिस पर ‘ऐसे करो, यह
मत छुओ, यहां मत करो’, ‘जो करना है जल्दी करो’ जैसे काशन मन ख़राब कर
देते।’ शरद बोला, ‘वो तो कहो कि तब लौंडे थे, कबड्डी-कबड्डी वाला जमाना था, जाते ही डिस्चार्ज हो जाना था, तो दो चार बार चल गया। लेकिन हस्त मैथुन से भी
ज्यादा आजिज हो गया। तो फिर नहीं गया।’ वह बोला, ‘तब तो दो चार बार चला भी गया, अब
तो बिलकुल संभव नहीं है। कम से कम मेरे लिए।’ शरद थोड़ा और तफसील में गया, ‘संभोग जैसी चीज सुकून और सलीके से होनी चाहिए
तब उस का सुख मिलता है। कहीं तन के साथ मन भी इनवाल्व हो तब सेक्स का सुख मिलता
है। जो इन बाजारू और गंदी औरतों के साथ संभव नहीं। कम से कम मैं तो उन के साथ
संभोग नहीं कर सकता। बिलकुल नहीं।’
‘तो
तुम वहां चल कर भी कुछ नहीं करोगे ?’
‘बिलकुल
नहीं।’ शरद बोला, ‘बल्कि मेरी राय है कि तुम्हें भी नहीं
जाना चाहिए।’ वह बोला, ‘वैसे भी पचासियों यौन बीमारियां सुनता
हूं लोग वहां से ले कर लौटते हैं !’
‘अब
भाषण झाड़ कर मेरा मूड मत ख़राब करो। चुपचाप चले चलो।’ वह बोला, ‘कंडोम का कवच किस लिए है ?’
‘पर
हजूर हम अंदर नहीं जाएंगे।’ रिक्शा वाला बोला, ‘बाहर
सड़क पर उतार देंगे। आप लोग चले जाइएगा।’ उस ने जोड़ा, ‘वैसे भी अब वहां कुछ रह नहीं गया है!’
‘कुछ
तो है ?’ प्रमोद बलबलाता हुआ बोला।
‘अब
जा कर के खुद देख लीजिए !’
अपने कहे के मुताबिक रिक्शा वाला सड़क पर ही उतार कर चलता बना।
आंख चुराते हुए शरद प्रमोद को लिए उस बदनाम गली में दाखिल हुआ। जा कर
वहां की उस चाय की गंदी दुकान पर आंख झुका कर बैठा। इधर-उधर ताक झांक की। लेकिन
कोई भी औरत इधर-उधर भटकती या इशारा करती नहीं दिखी। दो एक औरतें दिखीं भी तो बूढ़ी, लाचार और बेख़बर !
कोई भड़वा भी पास नहीं आया कुछ पूछने। प्रमोद बैठे-बैठे उकता रहा था।
शरद ने उस से पूछा, ‘चाय पियोगे ?’
‘नशा
उतारना है क्या ?’ वह उकताया हुआ बोला।
‘अच्छा
चलो, दो एक दूसरी जगह चलते हैं।’
‘चलो
!’ कह कर उस ने कैमरा कंधे पर टांग लिया। प्रमोद के साथ शरद इस गली, उस गली जल्दी-जल्दी भागता फिरा। फिर भी कोई औरत
बुलाती, संकेत करती या उस स्टाइल की नहीं दिखी।
मकान भी शरद ने गौर किया,
कई बदल गए थे। कई कच्चे खपरैल के
मकानों की जगह पक्के दुमंजिले मकान थे। फिर भी कुछ खपरैल वाले कच्चे मकान अभी
छिटपुट बाकी थे।
‘क्या
यहां भी सब कुछ बदल गया ?’
प्रमोद उतावली में बड़बड़ाया।
‘हां, काफी कुछ !’
‘यह
रेड-लाइट-एरिया है भी ?’
‘है
तो !’
‘मुझे
तो लगता नहीं।’
‘लेकिन
है यह वही जगह।’ कह कर शरद ने प्रमोद के साथ तीन चार घरों के दरवाजे भी बारी-बारी
खटखटाए। पर कोई रिस्पांस नहीं मिला। उलटे दो जगह तो लोग ‘समझ’ गए और भिंड़ गए।
बोले, ‘यह शरीफों का मुहल्ला है !’
शरद ने प्रमोद से हाथ जोड़ा। पर प्रमोद मानने वाला नहीं था। एक आदमी
को पकड़ लिया। उस से पूछ ताछ की तो उस आदमी ने बताया कि, ‘है तो साहब रेड लाइट एरिया ही यह। पर इधर पुलिस
की सख़्ती ज्यादा बढ़ गई है।’ वह बोला, ‘अभी
कल ही बारह लड़कियां पकड़ी गई हैं, सो
आज सन्नाटा है !’
‘मुझे
तो स्टेशन छोड़ दो !’ प्रमोद बिगड़ता हुआ बोला।
‘क्यों
?’ शरद ने पूछा, ‘क्या शादी में नहीं चलोगे ?’
‘मैं
अब फेड-अप हो गया हूं।’ वह बोला, ‘किसी
शादी वादी में नहीं जाना। बस तुम मुझे स्टेशन छोड़ दो।’
‘तुम
पर इस समय शराब सवार है कि चरस ?’ शरद
ने पूछा, ‘यह औरत की तलब तो है नहीं ?’
‘आई
डोंट नो।’ प्रमोद अंगरेजी पर उतर आया, ‘यू
डोंट आर्गू !’
‘लेकिन
?’ शरद ने कुछ कहना चाहा।
‘नो
फरदर डिसकसन !’ प्रमोद आजिज हो कर बोला।
शरद भी तब कुछ नहीं बोला। प्रमोद को रिक्शे से स्टेशन छोड़ कर शादी
अटेंड करने चला गया। उन्हीं लस्त पस्त कपड़ों में। क्यों कि यह उस का अपना ही शहर
था। सुंदर लड़कियों वाला शहर ! कोई अलीगढ़ नहीं था !
-14-
फोन पर फ्लर्ट
वह फोन पर ऐसे बतिया रही थी गोया वह उसे अच्छी तरह जानती है।
रेशा-रेशा विस्तार और अर्थ देती हुई। रह-रह वह भावुक हो जाती और अपनी व्यक्तिगत
समस्याओं के जाल में उलझी छोटे-छोटे सपने बुनने लग जाती। सपने भी उस के बड़े शाश्वत, सुनहरे और उम्मीद भरे थे। पीयूष उस की उम्मीदों
को तोड़ना नहीं चाहता था न ही उस के सपनों को बिखरने देना चाहता था। लेकिन अपरिचित, नितांत अपरिचित होने के बावजूद वह कब फ्लर्ट पर
उतर आया उसे पता भी नहीं चला। हालां कि यह फ्लर्ट भी उस की बातों में लिपट कर ही
उस ने शुरू किया। पर बीच बात चीत में वह अपराध बोध में फंसने लगा और पीयूष का मन
हुआ कि उस अपरिचिता को साफ-साफ बता दे कि जिस से वह बात कर रही है वह ‘वह’ नहीं है
जिसे वह समझ रही है। पर वह ऐसा कुछ कहने का मौका भी नहीं देती और बिलकुल किसी नई
बात पर आ जाती। फिर पीयूष को लगा कि वह उसे नहीं बल्कि वही उसे फ्लर्ट कर रही है।
अनजाने ही में सही।
पीयूष उस रोज दफ्तर में मीटिंग के बाद फोन मिला रहा था। तीन चार फोन
उसे मिलाने थे पर सभी इंगेज मिल रहे थे। वह लगातार ट्राई कर रहा था। कुछ नंबरों को
वह रीडायल भी करता जा रहा था तभी कोई नंबर मिल गया। कौन सा नंबर मिल गया उसे समझ
नहीं आया। जब तक वह सोचता-सोचता ‘हलो’ कहते ही उधर से एक औरत ने बोलना शुरू कर
दिया। बेधड़क। वह कहने लगी,
‘क्या बताएं
बिजली चली गई है। गरमी मारे दे रही है। हाथ से पंखा झल रही हूं। जाने कब बिजली
आएगी।’ बोलते-बोलते वह पूछने लगी, ‘आप
क्या कर रहे हैं ?’
‘फिलहाल
तो आप से बात कर रहा हूं।’ पीयूष भी उसी बेलागी से बोला।
‘अच्छा-अच्छा।’
वह बोली, ‘बड़े लाइट मूड में हैं आज !’ वह रुकी
फिर बोली, ‘नहीं कल तो आप बहुत परेशान थे। हां, क्या हुआ गाड़ी आप की ठीक हो गई ?’ वह चिंतित होती हुई बोली।
‘ठीक
हो जाएगी। हुई समझिए।’ पीयूष टालता हुआ लापरवाही से बोला।
‘पर
कल तो आप बहुत परेशान थे। और हां, क्या
हुआ आप का वह आदमी आया क्या ?’
‘अरे
छोड़िए भी। आदमियों का क्या है ? सब
साले बदमाश हैं ! आते-जाते रहते हैं !’ पीयूष किसी तरह इस प्रसंग को भी टालते हुए
बोला।
‘आप
कौन बोल रहे हैं ?’ वह बातचीत में तालमेल न पा कर सशंकित
होती हुई बोली।
‘एक
नागरिक हूं इस देश का।’ पीयूष मजा लेता हुआ बोला।
‘नागरिक
?’ वह अटकती हुई पूछने लगी, ‘तो आप ही बोल रहे हैं! ’
‘कहिए
तो न बोलूं ?’ पीयूष फिर उसी अंदाज में बोला।
‘नहीं-नहीं
बोलिए।’ वह अचकचाती हुई बोली, ‘क्या
करें गरमी बहुत है। आज बहुत दिनों बाद कपड़े सिलने बैठी थी पर बिजली चली गई क्या
करें। सब छोड़-छाड़ कर बैठी हूं।’
‘लेकिन
सिल क्या रही थीं ?’ पीयूष मजे लेते हुए बोला।
‘अरे, ढेर सारे पुराने कपड़ों की मरम्मत करनी थी।’ वह
थोड़ा बहकी और इठलाती हुई बोली, ‘अभी
भी ब्लाउज रफू कर रही हूं।’ उस के इठलाने का ग्राफ थोड़ा और बढ़ा, ‘वही ब्लाउज जो कल आपने फाड़ दिया था !’ उस की
आवाज में मादकता तिरने लगी,
‘समझे ! कि नहीं
!’
‘पर
मैं ने कल ब्लाउज तो नहीं फाड़ा था।’ पीयूष सफाई पर उतर आया।
‘असल
में मैं सेप्टीपिन लगाती हूं ना तो खींचाखांची में फट गई होगी ब्लाउज।’ वह किंचित
सकुचाती हुई बोली।
‘पर
मैं ने तो खींचाखांची भी नहीं की थी।’
‘आप
को याद भी है कुछ ?’ वह ऐंठती हुई बोली, ‘हड़बड़ी में आपने मेरे कंधे पर से ब्लाउज नोचा
नहीं था ? ब्रा की तो हुक भी टूट गई थी।’ फिर वह
संजीदा हो गई। कहने लगी,
‘कल आप परेशान भी
थे और हड़बड़ाए हुए भी।’
‘क्या
मतलब ?’
‘मतलब
क्या ! हड़बड़ी में तो आप हरदम ही रहते हो !’ वह जैसे लजाती हुई बोली।
‘और
आप ख़ुद ?’ पीयूष बहकता हुआ बोला।
‘मैं
क्यों हड़बड़ी में रहूंगी ?
वह प्रति प्रश्न पर उतरती हुई खुद ही
जवाब पर आ गई, ‘मैं कभी हड़बड़ी में नहीं रहती।’
‘ख़ैर, अब की मिलिए तो आप की हड़बड़ी से भी आप को
मिलाऊंगा।’ पीयूष बोला।
‘तो
आज रात को आऊं ?’ वह अकुलाती हुई बोली।
‘बिलकुल
आइए!’
‘समय
है आप के पास ?’
‘आप
के लिए समय ही समय है।’
‘अच्छा
!’ वह फुदकती हुई बोली, ‘तो फिर आप मेरा हाथ क्यों नहीं थाम
लेते? खुल्लमखुल्ला !’
‘क्यों
ऐसे क्या दिक्कत है ?’
‘क्या
बताएं ?’ वह उदास होती हुई बोली, ‘समाज की, घर
की बड़ी-बड़ी दीवारें हैं। तोड़ नहीं पाती।’
‘लेकिन
मैं तो हमेशा आप के साथ हूं।’
‘चलिए
माना !’
‘क्यों
यकीन नहीं हो रहा है ?’
‘नहीं
यह बात नहीं। यकीन तो है !’
‘तो
फिर ?’
‘नहीं
मैं सोच रही थी कि घर में आप के कहीं बवाल न हो जाए ?’
‘घर
में पता चलेगा तब न ?’
‘तो
आज रात भर मेरे साथ रह जाएंगे ?’ वह
विकल हो गई।
‘चलिए
आज घर नहीं जाएंगे। आप की ही सेवा में रहेंगे।’
‘तो
मैं रात को आऊं ?’
‘आप
की मर्जी।’ पीयूष बेफिक्र हो कर बोला।
‘तो
मैं रात को आऊंगी।’ वह फुसफुसाती हुई बोली, ‘तभी
बातें करेंगे। अभी फोन रखती हूं।’
‘क्यों
अभी बात करने में क्या दिक्कत है ?’ पीयूष
जरा नरमी से बोला।
‘नहीं
दिक्कत की बात नहीं।’ वह फुसफुसाई, ‘लगता
है बाहर कोई आया है।’
‘तो
क्या हुआ?’ पीयूष बोला, ‘आप देखिए मैं होल्ड करता हूं।’
‘आप
तो कुछ समझते ही नहीं।’ वह खीझती हुई बोली, ‘आप
फोन रखिए। अभी मैं मिला लूंगी।’
‘मिला
लूंगी क्या मतलब ?’ पीयूष भड़कता हुआ बोला, ‘मै होल्ड कर रहा हूं।’
‘आप
ड्रिंक-विंक तो नहीं किए हुए हैं ?’
‘क्या
मतलब है आप का ?’ पीयूष बोला, ‘आप को मैं ड्रिंक किए हुए लग रहा हूं ?’
‘नहीं-नहीं
मैं ने कब यह कहा ?’
‘तो
फिर क्या कहा ?’
‘कहा
नहीं। मैं तो सिर्फ पूछ रही थी।’
पीयूष बोला,
‘अच्छा चलिए थोड़ी
पी भी लिया तो क्या हर्ज हो गया ?’
‘हर्ज
तो हो ही गया।’ वह इसरार के साथ बोली, ‘पीना
ठीक नहीं।’
‘क्यों
?’
‘वो
गाना नहीं सुना है कि गम की दवा तो प्यार है, शराब
नहीं।’
‘सुना
भी है और देखा भी है।’
‘तो ?’ वह झूम कर बोली।
‘अरे
वही गाना न जो प्रेमा नारायण ने परदे पर गाया है उत्तम कुमार के लिए। अमानुष फिल्म
में।’ पीयूष ब्यौरा देते हुए बोला।
‘हां-हां
वही गाना। आप को तो सब याद है।’ वह खिलखिलाती हुई बोली।
‘उस
फिल्म में एक और गाना है,
दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा, बरबादी की तरफ ऐसा मोड़ा, एक भले मानुष को अमानुष बना के छोड़ा।’ पीयूष ने
गाते हुए उसी से पूछा कि,
‘यह गाना याद है
आप को ?’
‘हां-हां
याद है।’ वह बोली, ‘पर आप का दिल तो मैं नहीं तोड़ रही। फिर
काहें ऐसी बात कर रहे हैं ?’
‘नहीं
भई, दिल तोड़ने की बात भला कहां से आ गई ?’ पीयूष बोला, ‘मैं
तो सिर्फ गाने की याद दिला रहा था।’
‘अच्छा
तो ये बात है!’ वह जरा गुरूर से बोली।
‘बिलकुल!’
‘मतलब
आप आल राउंडर हो !’
‘आल
राउंडर मतलब ?’
‘यही
कि और चीजों के अलावा फिल्में और गाने भी जानते हैं आप !’
‘जानना
पड़ता है भई।’ पीयूष बोला,
‘अरे आप से मिला
तो आप को जान लिया। फिल्में देखीं तो फिल्में भी जान लीं। गाने सुने तो गाने भी
जान लिए। इस में आल राउंडर की क्या बात है ?’
‘बात
तो है !’ वह इतराई।
‘अच्छा
और क्या-क्या जानती हैं आप ?’
‘यही
कि सफल बिजनेसमैन हो आप ! आदमी भी अच्छे हो और....!’ कहते- कहते वह रुक सी गई।
‘और
! और क्या?’
‘अब
जाने दीजिए !’
‘क्यों
जाने दूं ?’ पीयूष बोला, ‘बताइए न कि और क्या ?’
‘क्या
करेंगे जान कर ?’ वह बड़ी मायूसी से बोली।
‘अरे, अपने बारे में जान लेने में हर्ज क्या है ?’
‘यह
मैं नहीं कह रही। आप के आस-पास के लोग कहते हैं कि आप बहुत बड़े बदमाश हो, गुंडा हो !’ वह बोली, ‘लोग बहुत डरते हैं आप से।’
‘अच्छा
!’
‘नहीं
यह मैं नहीं कर रही। मुझ को तो आप ऐसे नहीं लगते !’ वह बोली।
‘फिर
कैसा लगता हूं ?’
‘मुझ
को तो आप अच्छे लगते हो।’ उस ने जोड़ा, ‘लोगों
का क्या है ! किसी को कुछ भी कह दें !’
‘पर
मैं ने तो कभी किसी के साथ गुंडई नहीं की।’
‘मैं
ने कब कहा कि आप ने गुंडई की !’ वह फिर खीझी।
‘अच्छा
और क्या-क्या जानती हैं मेरे बारे में आप ?’
‘कुछ
नहीं जी। मैं तो बस यही जानती हूं कि आप मेरे लिए बहुत अच्छे हो!’
‘किस
मामले में ?’
‘हर
मामले में !’ वह रुकी और बोली, ‘एक
मिनट जरा रुकिए। पड़ोस का एक लड़का आया है !’
‘ठीक
है।’ पीयूष बोला, ‘निपटिए पहले उस लड़के से ही !’
‘बस
एक मिनट !’ कह कर वह उस लड़के से कहने लगी, ‘तुम्हारी
मम्मी यहां नहीं है बेटा ! वह तो देर हुए गईं !’
वह बोल रही थी कि वह लड़का ‘अच्छा आंटी!’ कहता हुआ शायद चला गया फिर
वह बोली, ‘हां, अब बताइए।’
‘था
कौन ?’
‘पड़ोस
का एक लड़का। मेरे बेटे के साथ खेलता है !’ वह बोली।
‘आप
का बेटा कहां है ?’ पीयूष ने पूछा।
‘स्कूल
गया है।’
‘अच्छा-अच्छा।’
‘बस
एक ही तो बेटा है। सोचती हूं किसी तरह पढ़ लिख जाए बस।’ वह उदास हो कर बोली।
‘क्यों
स्कूल तो जा ही रहा है न ?’
‘हां, जा तो रहा है। पर आगे भी इस की पढ़ाई का इंतजाम
अच्छा हो जाए। किसी अच्छे स्कूल में पढ़ाने की हैसियत हो जाए। किसी लायक बन जाए बस
!’
‘भगवान
चाहेंगे तो बिलकुल हो जाएगा !’
‘हो
तो तब जाएगा जब मेरा कुछ हो जाए !’
‘क्या
मतलब ?’
‘नर्सिंसग
की ट्रेनिंग ली है। अप्लाई कर रखा है। अब सर्विस लग जाए तो बेटे को ठीक से पढ़ाऊं।’
नर्सिंग सुन कर पीयूष थोड़ा बिदक कर बोला, ‘अप्लाई किया है तो हो ही जाएगा।’
‘हो
जाए तब न ?’ वह चिंतित होती हुई बोली, ‘पर अब आप से दूर हो जाऊंगी।’
‘क्यों
?’
‘फार्म
हम ने उत्तरांचल के लिए भर दिया है। तो दूर कहीं पहाड़ पर जाना पडे़गा।’
‘पहाड़
की जिंदगी तो बड़ी कठिन होती है।’
‘यही
तो !’
‘तो
इस में चिंता की क्या बात है ?’ पीयूष
बोला, ‘आप कहीं नीचे की पोस्टिंग ले लीजिएगा।’
‘नीचे
का मतलब ?’ वह उत्सुक होती हुई बोली।
‘हल्द्वानी
वगैरह कहीं।’
‘हां।
यह तो है।’ वह बोली, ‘देहरादून भी तो हो सकता है।’
‘हां, देहरादून भी हो सकता है।’
‘अब
हो जाए तब न ?’ वह बोली, ‘पता है जब स्वास्थ्य भवन जाती हूं तब जब कोई कहता है पिक्चर चलोगी ? घूमने चलोगी ? तो कितना ख़राब लगता है कि क्या बताऊं ?’
‘मैं
समझ सकता हूं।’ बात की तल्ख़ी को टालता हुआ वह बोला, ‘चलिए यह काम मैं करवा दूंगा।’
‘सच
!’ वह मारे ख़ुशी के फुदक पड़ी। बोली, ‘यह
हो जाता तो बहुत अच्छा था।’
‘कहा
न कि हो जाएगा।’ पीयूष बोला, ‘अरे
हां, क्या हुआ ब्लाऊज रफू हो गया?’
‘पहले
फाड़ते हैं और फिर पूछते हैं कि रफू हो गया ?’ वह
इठलाती हुई बोली।
‘ब्लाउज
ही तो फटा है कुछ और तो नहीं ?’ पीयूष
बोला, ‘यहां ओजोन की परत फटी जा रही है और
किसी को चिंता ही नहीं और आप हैं कि तभी से एक ब्लाऊज का फटा लिए बैठी हैं। अरे, कुछ और बात कीजिए। छोड़िए भी ब्लाऊज और उस की
रफूगरी।’
‘मैं
रफू बहुत अच्छा करती हूं।’ वह सांस छोड़ती हुई बोली, ‘लीजिए रफू भी हो गया ब्लाऊज। हो तो कब का गया होता पर इस मुई बिजली
ने मार रखा है।’ वह रुकी और फिर खुसफसुसाई, ‘तो
रात को आऊं ?’
‘कहा
न आप की मर्जी !’ पीयूष भीतर से सकपकाता हुआ बोला।
‘देखिए
आप खुद नहीं बुलाएंगे तो नहीं आऊंगी।’ वह बोली, ‘फिर
घर में आप को दिक्कत तो नहीं होगी ?’
‘बिलकुल
नहीं होगी। आप रात आइए। पर यहां नहीं, कहीं
और !’ पीयूष टालता हुआ बोला।
‘तो
फिर और कहां ?’ वह सकुचाती हुई फुसफुसाई।
‘कहीं
भी।’ पीयूष बहकता हुआ बोला।
‘कहीं
भी क्या मतलब ?’ वह सशंकित हो कर बोली।
‘किसी
गेस्ट हाउस या रेस्ट हाउस में ?’
‘लेकिन
कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं होगी ?’
‘कुछ
गड़बड़ नहीं होगा।’ पीयूष बोला, ‘और
जो इतना ही डर है तो कहीं बाहर चले चलते हैं ?’
‘कहां
?’
‘नैनीताल
या मसूरी। कहीं भी।’
‘नैनीताल, मसूरी तो जब मैं वहां रहूंगी तब आप आइएगा मेरे
मेहमान बन कर !’
‘तो
यहीं कहीं आस-पास चले चलते हैं !’
‘कहां
?’
‘नवाबगंज
या कानपुर !’ पीयूष बेफिक्री से बोला।
‘बड़ा
मुश्किल है। तीन घंटा जाओ,
तीन घंटे आओ। सारा समय आने-जाने में ही
बीत जाएगा।’
‘दो-तीन
दिन का प्रोग्राम बनाते हैं।’
‘इतना
समय है आप के पास ?’ वह खुश होती हुई बोली।
‘मैं
तो निकाल लूंगा। आप अपनी बताइए। और फिर आप के लिए तो मेरे पास समय ही समय है।’
‘ठीक
है बाहर की बात बाद में देखी जाएगी। आज मैं यहीं आऊंगी !’
‘नहीं
भई, कहा न कि आज यहां नहीं। आइए आज पर कहीं
और।’ पीयूष बोला, ‘बल्कि मैं तो कह रहा हूं कि आप अभी
आइए।’
‘अभी
समय है आप के पास ?’
‘बिलकुल
है तभी तो कह रहा हूं।’
‘लेकिन
हम को तो भूख लगी है। अभी खाना भी नहीं खाया है !’
‘यह
तो और अच्छी बात है !’
‘क्या
मतलब !’
‘मतलब
यह कि भूख मुझे भी लगी है। आइए और किसी अच्छे होटल में बढ़िया खाना खाते हैं।’
पीयूष बोला।
‘क्या
खिलाएंगे ?’
‘‘यही
चिली-विली। या जो आप खाना चाहें।’
‘पर
मैं तो प्योर वेजेटेरियन हूं।’
‘तो
क्या हुआ ? पनीर चिली और वेज चाओमिन खिलाएंगे।’
पीयूष ने कहा।
‘पर
मुझे चाओमिन अच्छी नहीं लगती।’
‘तो
डोसा खाएंगे। या कुछ और जो आप को पसंद हो।’
‘डोसा
ही खाएंगे। और हां, कुकरैल भी चलेंगे। ले चलेंगे ? '
‘बिलकुल
ले चलेंगे।’
‘इतना
समय है आप के पास ?’
‘हां, भाई।’ वह बोला, ‘यह बताइए कि डोसा कहां खाएंगी ?’
‘आप
बताइए !’ वह ठुनक कर बोली।
‘गांधी
आश्रम के पीछे। मद्रासी वाली दुकान पर !’
‘नहीं, वहां नहीं।’
‘तो ?’
‘ऐसी
जगह जहां इत्मीनान से बैठ सकें।’ वह बोली, ‘हम
को मोती महल वगैरह भी पसंद नहीं।’
‘तो
क्वालिटी में बैठें ?’
‘यह
क्वालिटी कहां है ?’ उस ने पूछा।
‘मेफेयर
सिनेमा के कैंपस में। अच्छा रेस्टोरेंट है।’
‘सिनेमा
भी देखें ?’
‘मेफेयर
तो बंद है। पर ठीक है डोसा खा कर कुकरैल। कुकरैल में क्लिंटन वाला ‘ओरल’ करिएगा।
और फिर इवनिंग शो सिनेमा कहीं देखेंगे। फिर रात आप की पहलू में ! ठीक ?’
‘बड़े
रोमैंटिक हो रहे हैं।’ वह बोली, ‘लेकिन
यह बताइए कि क्लिंटन वाला ओरल क्या है ? मैं
समझी नहीं।’
‘अरे
भई अख़बार नहीं पढ़तीं आप ?
मोनिका लेविंस्की के साथ क्लिंटन का
कहना है कि ओरल ही किया था !’
‘धत्
!’ वह बोली, ‘तो रात ही का रखिए। अभी दिन का
प्रोग्राम कैंसिल करिए !’
‘क्यों
?’
‘दोनों
नहीं हो पाएगा !’
‘तो
चलिए अभी रात का रात में देखेंगे। पर होगा ओरल भी !’
‘चलिए
ठीक है। कुकरैल में ‘ओरल’ होगा। पर मैं रात में ही आना चाहती हूं।’
‘लेकिन
मेरा अभी मन है !’
‘अच्छा
एक मिनट रुकिए !’
‘क्यों
क्या हुआ ?’
‘डाकिया
आया है मेरी रजिस्ट्री ले कर बाहर से आवाज दे रहा है !’ वह बोली, ‘आप एक मिनट रुकिए, मैं दस मिनट में आई !’
‘हद
है !’
‘क्या
?’
‘आप
कह रही है कि एक मिनट रुकिए दस मिनट में आई ! इस का क्या मतलब है ?’
‘अच्छा
अभी फोन रखिए ! मैं मिलाती हूं !’
‘कुछ
नहीं, फोन नहीं रखना। होल्ड कर रहा हूं आप
जल्दी आइए !’
‘क्यों
? क्या फोन का बिल नहीं पड़ता क्या ?’ वह बोली, ‘अच्छा
पांच मिनट में मैं मिलाती हूं!’
‘ठीक
है जल्दी आइए !’ कह कर पीयूष ने फोन रख तो दिया पर दो ही मिनट में फिर से रीडायल
कर दिया ! क्योंकि वास्तविक नंबर फोन का क्या था उसे मालूम तो था नहीं ! और दफ्तर
में दो तीन टेलीफोन लटक आस-पास मंडरा रहे थे। फोन करने के लिए।
‘हां, आप माने नहीं !’ वह हांफती हुई बोली, ‘मैं ने कहा था कि मैं मिलाऊंगी!’
‘मैं
ने ही मिला लिया तो क्या हुआ ?’ पीयूष
बोला, ‘ख़ैर, कैसी रजिस्ट्री थी?’
‘मेरी
है ! हैदराबाद से आई है !’ वह हांफती हुई बोली, ‘मैं
ने हैदराबाद भी अप्लाई किया था !’
‘तो
अब आप हैदराबाद जाएंगी ?’
‘देखते
हैं !’
‘कुछ
नहीं’, पीयूष बोला, ‘हैदराबाद के झंझट में मत पड़िएगा ! वहां फ्राड
ज्यादा होता है ! इस से बेहतर है देहरादून या नैनीताल-हल्द्वानी ! समझीं कि नहीं!’
‘ये
तो है !’
‘बल्कि
आप अभी कह रही थीं कि सिलाई वगैरह में आप की दिलचस्पी है तो बेहतर है कि आप एक
बुटिक खोल लीजिए ! नर्सिंग वगैरह से तो ठीक ही है!’
‘बुटिक
खोलने के लिए पूंजी चाहिए ! कहां है मेरे पास ?’
‘पूंजी?’ पीयूष बोला, ‘अरे
ये बैंक किस लिए हैं ? फाइनेंस करवा देंगे !’
‘सच ?’
‘तो
और क्या ?’ पीयूष बोला, ‘फाइनेंस कराइए और कारोबार शुरू! फिर काम ख़ुद मत
करिए ! कारीगर रखिए और खुद सुपरवाइज करिए !’
‘फिर
दुकान भी खोलनी पड़ेगी ?’
‘ना।’
पीयूष बोला, ‘दुकान खोलने के चक्कर में पड़िएगा नहीं
! नहीं दुकान और वर्कशाप दोनों नहीं चल पाएगी। सिर्फ वर्कशाप ! और दुकानों को
सप्लाई करिए! दस नहीं बीस ! बीस नहीं, दो
सौ दुकानों को ! फिर शहर के बाहर भी !’
‘यही
ठीक रहेगा !’ वह चहकी, ‘मैं चिकेन का भी काम जानती हूं !’
‘तो
फिर फाइनेंस की बात करूं ?’
‘अभी
नहीं !’
‘क्यों
?’
‘जरा
अक्टूबर तक देख लें !’ वह बोली, ‘क्या
पता नौकरी का कुछ बन जाए!’
‘कहा
न कि नौकरी को मारिए गोली ! और बन जाइए बुटिक क्वीन !’
‘ठीक
है। लेकिन थोड़ा सोच लूं।’
‘अरे
मैं हूं न सोचने के लिए !’ वह बोला, ‘और
क्या चिंता है आप की ?’
‘यही
कि बेटा पढ़ लिख जाए !’
‘और ?’
‘यह
कि एक कमरे का ही सही, एक अपना मकान हो जाए !’
‘कहां
पर ?’
‘गोमती
नगर में हो जाए तो अच्छा है ?’
‘रजिस्ट्रेशन
करवाया है ?’
‘करवाया
तो नहीं पर हमारी जान-पहचान की एक आंटी हैं मिसेज चौधरी, एल॰ डी॰ ए॰ में ! उन्हों ने कहा है कि दिलवा
देंगे !’
‘तो
फिर ?’
‘एक
बार हसबैंड को भेजा था। फिर वह दुबारा नहीं गए। हम से भी बोले कि तुम भी मत जाना।
वह बहुत बदनाम औरत है। मैं जानती हूं कि वह अच्छी है ! पर कुछ बात ऐसी हुई होगी कि
इन की नजरों में वह गिर गई।’ कह कर वह उदास हो गई !
‘बदनामी-नेकनामी
से क्या लेना ? आप को तो मकान चाहिए। ले लीजिए! कौन
कहीं उन के पड़ोस में रहना है!’
‘यही
तो !’ वह बोली, ‘दरअसल आंटी तो ठीक हैं! अंकल ही गड़बड़
निकले! आंटी बताती हैं कि स्मैक पीते थे।’ वह बोली, ‘आंटी ने उन से लव मैरिज की थी। भाग कर। तब वह ऐसे नहीं थे। फिर बंबई
चले गए और वहीं स्मैकची बन गए! जब कभी आते तो जेब में पुड़िया रहती। बच्चे पूछते कि
पापा यह क्या है ? तो वह कहते माता का परसाद है। एक बार
बेटियों को भी दे दिया। बेटियों ने जीभ पर रखते ही उल्टी कर दी।’ वह बोलती जा रही
थी, ‘वह तो आंटी बाद में अंकल से इतना
परेशान हो गईं कि बाराबंकी में स्मैक में ही फंसा कर उन्हें जेल करवा दिया।’ ‘यह
तो गलत किया।’ पीयूष बोला,
‘ऐसे ही था तो वह
उन्हें अस्पताल में भरती करा देतीं। इलाज हो जाता।’
‘अस्पताल
वगैरह सब कर के वह हार गई थीं। तब यह किया।’ वह बोली ‘सब किस्मत-किस्मत का फेर है
!’
‘यह
तो है !’ पीयूष बोला, ‘ख़ैर चलिए मकान का भी देखते हैं पर यह
बताइए कि गोमती नगर के अलावा कहीं और नहीं चलेगा ?’
‘सपना
तो गोमती नगर का ही देखा है।’ वह भावुक होती हुई बोली, ‘बचपन मेरा वहीं बीता है इस लिए भी !’
‘चलिए
गोमती नगर का ही देखते हैं।’ वह बोला, ‘पर
वहां तो रीसेल वाला मकान ही मिल पाएगा। चलिए फिर भी देखते हैं।’ वह बोला, ‘पर यह बताइए अभी डोसा के लिए कहां मिलें ?’
‘आप
जहां कहें ?’
‘हम
तो कह रहे हैं कि आज ही नैनीताल चलें ? चल
पाएंगी ?’
‘जहां
कहें वहां चलूंगी। पर आज ही कैसे ?’
‘तो
कब ?’
‘कानपुर
में हमारी एक बहन रहती है,
एक शाहजहांपुर में और एक राजस्थान में।
इन्हीं के यहां चलने का बहाना बनाऊंगी !’
‘तो
फिर राजस्थान ही चलते हैं !’
‘हां, राजस्थान है भी अच्छी जगह।’ वह चहक कर बोली, ‘वहां एक से एक जगहें हैं जहां चले जाओ तो कोई
किसी को मिलता ही नहीं। पूछता ही नहीं।’ उस ने किसी एक जगह का नाम भी लिया और बोली, ‘बहुत अच्छी जगह है। आप के साथ और मजा आएगा !’
फिर वह परेशान हो गई। बोली,
‘लेकिन पहले जरा
नौकरी का कुछ हो जाए !’
‘अच्छा
चलिए अपने डिटेल्स दीजिए !’
‘किस
बात का ?’
‘नौकरी
के लिए !’
‘अच्छा-अच्छा
!’ वह बोली, ‘प्रार्थना त्रिवेदी वाइफ आफ आनंद
त्रिवेदी।’
‘डेट
आफ बर्थ ?’ पीयूष जैसे सब कुछ जान लेना चाहता था !
‘डेट
आफ बर्थ में ही तो गड़बड़ हो गई !’ वह बिलबिलाती हुई बोली, ‘है तो मेरी डेट आफ बर्थ 29 अक्टूबर, 1964 की पर लिख गई 1961
की। यहां भी गड़बड़ हो गई।’
‘ओह
!’ पीयूष ने जोड़-जाड़ कर कहा, ‘फिर
तो आप 34 के बजाय 37 की हो गईं।’
‘हां
यह भी एक गड़बड़ है।’ वह बोली, ‘पापा
कहते हैं कि क्या पता था कि तेरी ऐसी शादी हो जाएगी और तुझे नर्सिंग करनी पड़ेगी !’
वह बोली, ‘पापा भी पछताते हैं!’
‘इस
में पछताने की क्या बात है ?’ वह
बोला, ‘अभी भी कुछ नहीं बीता। जिंदगी की
शुरुआत अब से ही सही फिर से शुरू की जा सकती है !’
‘कैसे
?’
‘बुटिक
खोल कर !’
‘हां, यह तो है !’ वह बोली तो पर बुझी-बुझी। फिर कहने
लगी, ‘अभी तो भूख लगी है।’ सांस छोड़ती हुई वह
बोली, ‘बड़े जोंरों की।’
‘तो
आइए मुझे खा लीजिए !’
‘आप
को भी खाऊंगी ! पर रात को।’ वह शरारती ढंग से खिलखिला कर बोली।
‘ख़ैर, रात को हमें खाइएगा ! अभी तो डोसा खाने आइए।’
‘कहां
खिलाइएगा ?’
‘जहां
आप कहिए !’
‘कोई
ऐसी जगह जहां इत्मीनान से बैठ सकें। ज्यादा भीड़भाड़ न हो !’
‘तुलसी
चलें ?’
‘हां, तुलसी भी ठीक है ! पर....।’
‘पर
क्या ?’
‘डोसा, अच्छा डोसा तो निशातगंज में एक जगह है वहां
मिलता है।’
‘कहां
?’
‘वृंदावन
में !’
‘यह
कहां है ?’
‘आई॰
टी॰ वाला ओवरब्रिज खत्म होता है न तो बाएं हाथ एक बेकरी है। बेकरी से जरा आगे चलिए
तो वृंदावन है !’
‘मैं
समझा नहीं।’
‘आप
ने वृंदावन नहीं देखा ?’
‘देखा
तो है पर मथुरा वाला ! निशातगंज वाला नहीं !’
‘यहां
भूख लगी है और आप को मजाक की पड़ी है।’ वह बोली, ‘निशातगंज
रेल क्रासिंग से फातिमा अस्पताल की ओर रास्ता जाता है ?’
‘हां, जाता है !’
‘तो
उस पर जाने की बजाय इधर बाएं हाथ वाली पटरी पर आइए तो एक बेकरी है। बेकरी के आगे
वृंदावन !’
‘मैं
नहीं ढूंढ़ पाऊंगा। आइए आप के साथ ही चलूंगा।’ उस ने पूछा, ‘बोलिए कहां मिल रही हैं ?’
‘निशातगंज
मंदिर पर !’
‘मंदिर
के किस तरफ ?’
‘मंदिर
पर ही !’
‘ठीक
है सवा एक बज रहे हैं आप कब तक मिलेंगी ?’
‘दो
सवा दो बजे तक !’ वह बोली,
‘अब फोन रखिए और
उठिए !’
‘हां, यह बताइए कि किस रंग का कपड़ा पहन रही हैं ?’ पीयूष घबराया हुआ बोला !
‘क्या
मतलब ?’
‘अरे
यही कि भीड़ में आप को ढूंढ़ने में दिक्कत न हो !’
‘अच्छा
फोन रखिए और उठिए !’
‘कपड़े
का रंग तो बता दीजिए ?’
‘काही
रंग की साड़ी पहन रही हूं !’ वह हड़बड़ाई हुई बोली, ‘ठीक है?’
‘हां, ठीक है !’
‘अच्छा
क्या रिट्ज में बैठें ?’
‘आप
जहां चाहें ! ’ पीयूष बोला,
‘पर यह बताइए कि
सप्रू मार्ग वाले रिट्ज कि महानगर वाले रिट्ज में ?’
‘महानगर
वाले में।’ वह बोली, ‘पर ऐसा तो नहीं कि उधर आप का बेटा कहीं
मिल जाए ! और गड़बड़ हो जाए !’
‘बेटे
वेटे की चिंता आप छोड़िए। आप बस आ जाइए !’
‘अच्छा
तो ठीक है थाने के सामने जहां ओवरब्रिज ख़त्म होता है, निशातगंज में जहां टैंपो रुकते हैं उस के सामने
शिव भंडार में मिलते हैं।’
‘शिव
भंडार ? मैं ने नहीं देखा !’
‘अरे, वह जो अलबेला चाट हाऊस है न?’
‘हां
!’
‘उसी
के नीचे शिव भंडार है।’
‘अच्छा-अच्छा
! पर वह तो थाने के सामने नहीं निशातगंज पुलिस चौकी के सामने है।’
‘थाना
हो या चौकी बस उस के सामने शिव भंडार में मिलिए।’ वह खुसफुसाई, ‘अम्मा जी दाल चावल खाने को कह रही हैं पर मैं
स्वास्थ्य भवन जाने का बहाना कर के निकल रही हूं।’ फिर बोली, ‘अब फोन मत करिएगा। हसबैंड आने वाले हैं। उन को
पता चल गया तो मुसीबत हो जाएगी।’ कह कर उस ने फोन रख दिया।
पीयूष का मन हुआ कि अब फ्लर्ट बहुत हो चुका है दुबारा फोन कर के अब
वह प्रार्थना त्रिवेदी को बता दे कि वह ‘वह’ नहीं है जिसे वह समझ रही हैं। और यह
कि वह पीयूष है। फिर भी अगर वह मिलना चाहती हैं तो आएं, उन का स्वागत है ! और उस ने जल्दी से फोन
रीडायल कर दिया ! फोन उस ने ही उठाया। पर पीयूष ने सोची हुई बात नहीं कही। यह सोच
कर कि कहीं प्रार्थना का आना रद्द न हो जाए। वह भावुक हो कर कहने लगा, ‘देखिए आप से आज बात कर के बड़ा आत्मिक सुख मुझे
मिला है। और एक बात कि आज आप को बदले रूप में मैं मिलूंगा। लेकिन आप नाराज बिलकुल
मत होइएगा।’ उस ने फिर से एक बार दरियाफ्त किया, ‘आप नाराज तो नहीं होंगी ?’
‘नहीं
!’ वह भी भावुक हो गई और खुसफुसाई कि, ‘मैं
निकल रही हूं। आप भी अब उठिए !’ कह कर उस ने फोन रख दिया। पीयूष को लगा कि यह तो
गलत हो गया। वहां जा कर कुछ अप्रिय घट गया तो ? उस
ने सोचा कि वह फिर से फोन मिला कर प्रार्थना को अपने बारे में साफ-साफ बता दे। उस
ने फोन फिर रीडायल किया। पर अब की फोन प्रार्थना ने नहीं शायद उस की सास ने उठाया।
पीयूष ने फोन काट कर फिर रीडायल किया कि कम से कम इस फोन का नंबर ही जान ले! फोन
फिर प्रार्थना की सास ने उठाया। पीयूष ने बताया कि वह टेलीफोन एक्सचेंज से बोल रहा
है और पूछा कि, ‘आप का टेलीफोन नंबर क्या है ?’ प्रार्थना त्रिवेदी की सास ने फोन नंबर हिंदी
में सौ-सौ कर के बता दिया। पीयूष ने घड़ी देखी। पौने दो बज गए थे। वह ज्यों चला उसे
लैट्रिन महसूस होने लगी। वह भाग कर ट्वायलेट गया। जल्दी-जल्दी निपट कर निशातगंज
पुलिस चौकी के सामने शिव भंडार पहुंचा। दिक्कत यह थी कि पीयूष को काही रंग कैसा
होता है यह भी नहीं पता था,
न ही प्रार्थना की डीलडौल या शकल-सूरत।
पर शिव भंडार बहुत छोटी जगह थी। वहां प्रतीक्षारत कोई औरत उसे नहीं दिखी। उस ने
आस-पास नजर दौड़ाई। कहीं कोई औरत ‘प्रतीक्षा’ में नहीं थी।
थोड़ी देर बाद एक दुबली-पतली औरत कांख में एक बैग दबाए उस पटरी से इस
पटरी भागती हुई आई और शिव भंडार की कुल्फी वाली दुकान पर खड़ी हो गई। खड़ी हो कर
इधर-उधर अकुलाई नजरों से देखने लगी। दो मिनट तक पीयूष उसे देखता रहा। सोचा कि उस
से जा कर पूछे कि क्या आप ने काही रंग की साड़ी पहन रखी है ? पर जब वह स्कूटर लिए उस के पास पहुंचा तो साड़ी
का रंग पूछने के बजाय उस से कहने लगा, ‘जरा
एक मिनट सुनिए !’ कह कर वह स्कूटर पर ही बैठा रहा। पर उस ने सुना नहीं कि शायद सुन
कर अनसुना कर दिया तो पीयूष ने एक बार फिर उस से कहा कि, ‘जरा एक मिनट सुनिए !’ अब की उस ने न सिर्फ सुन
लिया बल्कि पीयूष को घुड़का,
‘क्या बात है ? चलो यहां से !’ पीयूष दुम दबा कर भागा कि कहीं
कुछ अप्रिय न घट जाए ! पर वह ओवर ब्रिज से होता हुआ फिर वापस आया। स्कूटर थोड़ी दूर
खड़ी की। और सोचा कि जा कर प्रार्थना से माफी मांग ले कि, ‘गलती हो गई !’ फिर उस ने सोचा कि एक परची लिख
कर दे दे कि, ‘क्षमा कीजिए। गलती हुई और कि आप यहां
किसी का इंतजार करने के बजाय जाइए। या फिर उस अपने ‘परिचित’ को ही फोन कर के बुला
लीजिए। या फिर चलिए मेरे ही साथ वृंदावन में डोसा खाइए।’ वह यह सब सोच ही रहा था
कि उस ने देखा कि वहां से कूड़ा उठाने वाला जमादार उसे घूर रहा है। पीयूष को लगा कि
मामला गड़बड़ हो गया है। उस ने स्कूटर स्टार्ट की और वहां से चला गया। देखा कि
प्रार्थना फिर भी प्रतीक्षारत खड़ी थी। वह दुबारा लौट कर आया तो देखा कि एक सिपाही
शिव भंडार के भीतर-बाहर हो रहा है। पीयूष ने वहां से खिसक लेने में ही भलाई समझी।
दूसरे दिन उस ने वही फोन नंबर मिलाया। फोन प्रार्थना ने ही उठाया।
पीयूष की आवाज उस ने पहचान ली। बोली, ‘तुम
हो कौन ?’ वह जैसे अपना सारा गुस्सा उतार लेना
चाहती थी। बोली, ‘बहुत जूते पड़ेंगे !’ पीयूष ने फोन रख
दिया। फिर तीसरे दिन फोन मिलाया। उठाया किसी औरत ने ही। पीयूष ने प्रार्थना को ही
समझा। बोला, ‘उस दिन की अशोभनीय घटना के लिए
शर्मिंदा हूं।’ वह औरत थोड़ी तहजीब से बोली, ‘आप
हैं कौन ? अपना परिचय दीजिए ! और किस बात के लिए
क्षमा चाहते हैं ?’ पीयूष ने बताया कि, ‘परसों के फोन के लिए !’ वह बोली, ‘हां, सुना
कि परसों बहुत फोन आए। आप ही ने किया था ? आप
अपना परिचय बताइए !’ पीयूष ने कहा कि, ‘क्या
करेंगी मेरा परिचय जान कर आप फिर नाराज हो जाएंगी !’ वह बोला, ‘सच यह है कि हमें रांग नंबर मिल गया था। और मैं
तो आप को तभी बता देना चाहता था पर आप हर बार निकल रही हूं, निकल रही हूं, कह कर फोन रख देती थी।’
‘आप
की असल में मुझ से नहीं किसी और से बात हुई थी।’ वह औरत जिज्ञासा में भर कर बोली, ‘पर आप क्या कहना चाहते थे ?’ पीयूष ने कहा, ‘जाने दीजिए। अब तो गलती हो गई !’ कह कर फोन रख दिया। पर फिर से फोन
मिलाया तो फिर वही औरत थी। पीयूष बोला, ‘दुबारा
फोन इस लिए किया कि जिन से परसों बात हुई थी उन से कहिएगा जरूर कि मैं ने क्षमा
मांगी है।’
‘ठीक
है कह दूंगी।’ पर पीयूष का मन नहीं माना दो दिन बाद उस ने फिर उसी समय फोन किया
जिस समय पहले दिन किया था। प्रार्थना ने ही फोन उठाया। फोन उठाते ही वह बरसने लगी, ‘तुम हो कौन ?’ पीयूष का मन हुआ कि कह दे कि वही ‘नागरिक’ हूं जिस के साथ उस दिन आप
राजस्थान तक जाने को तैयार थीं और नैनीताल, देहरादून
में मेहमान बनाने को तैयार थीं। कुकरैल जा कर ‘ओरल’ को तैयार थीं और वृंदावन में
डोसा खा-खिला रही थीं, वगैरह-वगैरह ! पर पीयूष ने यह सब कहने
के बजाय सिर्फ इतना सा कहा कि, ‘हद
है आप तमीज से बात भी नहीं कर सकतीं ?’ और
फोन रख दिया।
वह समझ गया था कि फोन पर फ्लर्ट को अब प्रार्थना त्रिवेदी तैयार नहीं
हैं!
-15-
बर्फ़ में फंसी मछली
यह उस के लिए कोई नया अनुभव नहीं था। पर अनुभव तो था ही। प्रेम उस ने
कई बार किया था। जो लोग कहते हैं कि प्रेम सिर्फ एक बार होता है, उसे उन लोगों पर तरस आता है। उस का मानना है कि
जैसे किसी का एक बार खाना खाने से पेट नहीं भर सकता, वैसे ही किसी की जिंदगी सिर्फ़ एक प्रेम से नहीं चल सकती, हां यह जरूर हो सकता है कि किसी एक प्रेम की
तासीर ज्यादा हो, तो किसी और प्रेम की तासीर कम।
उसे याद है कि उस का पहला प्रेम रिश्ते की एक लड़की से हुआ। कायदे से
वह रिश्ते में भी नहीं थी। बल्कि रिश्तेदार के गांव से थी। वह पहले भी उस से मिला
था। पर पहली मुलाकात में उसे उस से प्यार नहीं हुआ था। एक बार तो वे दिन-रात शहर
में साथ रहे, तब भी प्यार नहीं हुआ। एक शादी में जब
वह घाघरा-शमीज पहन कर आई तो उस के दिल की घंटियां बज गईं। वह अचानक धक से रह गया।
‘दिल तो लई गवा, अब का होगा रे!’ फिल्मी गाना उस की
जबान पर खट से आ गया। पर अब वह कुछ कर नहीं सकता था सिवाय प्यार के। लेकिन तब वह
उस से कुछ कह भी नहीं पाया। सिर्फ प्यार करता रहा। एक तरफा। बिना कुछ बोले। बस
देखता रहा। उस बार उस रिश्तेदार के यहां से उस का लौटने का मन नहीं हुआ। पर लौटना
तो था ही। वह फिर-फिर गया उस रिश्तेदारी में। सब कोई मिलता पर वही नहीं मिलती। वह
जाता। खेतों से पूछता, मेड़ों से पूछता, फूल-पत्तियों और पेड़ों से पूछता, उस लड़की के बारे में। बिन बोले पूछता। टीनएज
का प्यार था यह। तीन चार साल चला जिसमें बमुश्किल वह दो बार मिली। मिली क्या दिखी।
बस। फिर उस का विवाह हो गया। लेकिन वह उस को भूल नहीं पाया। आज भी नहीं भूला।
लोग कहते हैं कि इश्क और मुश्क छुपाए नहीं छुपता। पर सच है कि उस का
यह प्यार किसी ने नहीं जाना। बहुत बाद में उस ने जब खुद पत्नी को बताया तो पत्नी
ने जाना। फिर मां ने। और मां को भी शायद पत्नी ने ही बताया।
फिर कालेज के दिनों में उसे दूसरा प्यार हुआ। दो लड़कियों से एक साथ।
फिर अचानक उस ने पाया कि एक और लड़की उसे अच्छी लगने लगी है। लेकिन इन तीनों में
से एक लड़की के प्यार में वह पागल हुआ। इसी बीच उसे मुहल्ले की भी एक लड़की अच्छी
लगने लगी। पर प्यार वह कालेज वाली उस लड़की से ही करता रहा। दीवानगी की हद तक। उसे
चिट्ठियां भी लिखता। उस के आने-जाने के रास्तों पर वह घंटों खड़ा रहता। कभी वह
दिखती, कभी नहीं दिखती। यह प्यार भी उस का
तीन-चार साल चला। पर यह भी एकतरफा था।
जाने वह कहां गई, और
वह कहां!
पर यह प्यार सारे शहर ने जाना।
इस के बाद कुछ और फुटकर प्यार किए उसने। कभी दफ्तर में, कभी राह में। कभी पड़ोस में, तो कभी कहीं भी। ऐसे फुटकर प्यारों की उसे
ठीक-ठीक याद भी नहीं है। वैसे भी उसे किसी प्यार में कभी कोई रिस्पांस मिला भी
नहीं ।
हां, जब वह ठीक-ठाक नौकरी में आ गया तो और
औरतों से प्रेम किया। उन औरतों का उसे रिस्पांस भी मिला और उन की देह भी। पर बाद
में जब उस ने पीछे मुड़ कर देखा तो पाया कि न तो वह प्यार था और न ही कोई खिंचाव
था। यह तो बस आदान-प्रदान था। जस्ट गिव एंड टेक!
लेकिन उस के मन में प्रेम कहीं न कहीं अंकुआता जरूर था। कभी कोई
अच्छा चेहरा देखता तो रीझ जाता। सोचता कि प्यार करे, पर व्यस्तता में प्यार का समय ही नहीं मिलता। बात आई-गई हो जाती।
लेकिन प्रेम की तलाश उस की ख़त्म नहीं होती। प्यार तलाशते-तलाशते धीरे-धीरे वह
अधेड़ हो गया।
मोबाइल और इंटरनेट का जमाना आ गया।
उस ने मोबाइल पर भी प्यार तलाशा। यहां रिस्पांस मिला और खूब मिला।
लगा कि जिंदगी में प्यार तो बहुत है। तो क्या यह ग्लोबलाइजेशन का असर था? या कुछ और। समझना मुश्किल था। ख़ैर, मोबाइल पर उस ने चैटिंग शुरू कर दी। अजब
अफरा-तफरी थी। लोग चैटिंग में जो एक दूसरे को जानते तक न थे, उस के मुहब्बत का इजहार कर रहे थे। अद्भुत था
यह छलावा भी। लोग चैटिंग में विश्वसनीय दोस्त ढूंढते। जीवन साथी ढूंढते। क्या औरत
क्या मर्द! क्या लड़के क्या लड़कियां! अजब खोखलापन था। या फिर यह लोगों का अकेलापन
था?
समझना कुछ नहीं, काफी
कठिन था। हैरान था वह लोगों के इस खोखलेपन पर। इस अकेलेपन पर।
क्या प्यार इतनी आसान और सस्ती चीज थी? पर वह देख रहा था कि लड़कियां बेधड़क हो रही थीं। वह कोई भी बात करने
को तैयार थीं। वह सीधे अपना नंबर देती और कहतीं कि बात करो। वह मिलने को भी तैयार
हो जातीं। और दो दिन फोन न करे तो मिस काल पर मिस काल करना शुरू कर देतीं।
हॉस्टलों में रहने वाली लड़कियां रात-रात भर चैट करतीं। वह चुप भी रहता तो उकसाती
रहतीं और सीधे-सीधे चैटिंग में ही संभोगरत हो जातीं। वह पहले इसे रोमैंटिक चैट
कहतीं, फिर सेक्स चैट कहतीं और कपड़े उतार कर
फक चैट पर बुला लेतीं।
तरह-तरह की मैथुन मुद्राएं पूछतीं और बतातीं। अजब घालमेल था।
कुछ लड़कियां मिलने के लिए भी बुलातीं। वह जब बताता कि वह तो अधेड़
है तो कुछ लड़कियां कतरातीं और पूछतीं कि पहले क्यों नहीं बताया? कुछ कहतीं कि इस से क्या फर्क पड़ता है? पैसा तो है न तुम्हारे पास? वह अफना जाता। एक लड़की नहीं मानी। वह मिलने
चली आई। वह समझाता रहा उम्र का गैप पर वह थी कि लिपटी जा रही थी। चिपटने को तैयार
थी। कहने लगी, ‘चैटिंग पर तो इतनी हॉट-हॉट बातें करते
हो और यहां कूल हो गए हो?
कम आन यार!’
वह महंगे-महंगे रेस्टोरेंटों में बैठने की आदी थी। महंगे गिफ्ट्स की
डिमांड भी करती। वह सेक्सी और सतही बातें लगातार करती रहती। वह किसी कंप्टीशन की
तैयारी कर रही थी। एक प्राइवेट हॉस्टल में रहती थी। खर्चे उस के बढ़ गए थे जो वह
चैटिंग फ्रेंडों से पूरा कर रही थी।
हां, उस का गुजारा सिर्फ एक फ्रेंड से नहीं
था।
बमुश्किल उस ने उस से पिंड छुड़ाया।
अभी इस से पिंड छुड़ाया ही था कि मुंबई की एक लड़की चैटिंग में फंस
गई। वह बार-बार मुंबई बुलाती। बताती कि अकेली हूं आ जाओ। वह खुद फोन करती और धकाधक
किस पर किस करती हुई कहती,
‘कुछ हॉट-हॉट, कुछ सेक्सी-सेक्सी बातें करो ना।’
वह तो यही चाहता ही था। खूब बातें होतीं। एक दिन उस ने पूछा कि, ‘तुम सर्फिंग नहीं करते?’
‘मतलब?’
‘नेट
पर सर्फिंग।’
‘नहीं।’
‘क्या?’
‘बस
ऐसे ही।’ वह टालता हुआ बोला।
‘अच्छा
तुम्हारी आई.डी. क्या है?’
‘मतलब?’
‘ओह, तुम बिलकुल बुद्धू हो।’ फिर उस ने बताया कि, ‘आई.डी. मतलब इंटरनेट एड्रेस।’
‘अच्छा-अच्छा।’
‘तुमने
कभी सर्फिंग नहीं की?’
‘मेरे
पास आई.डी. ही नहीं है।’
‘फुल्ली
लल्लू हो।’ वह भड़की और बोली, ‘मेरी
आई.डी. नोट करो। और आगे से इसी पर बात करना।’
‘क्या
बेवकूफी की बात करती हो?’
वह बोला, ‘मुझे कंप्यूटर इंटरनेट कुछ नहीं आता।’
‘तो
बुद्धू, पहले यह सीखो, फिर मुझ से बात करो।’
‘कहां
से सीखूं?’
‘तुम्हारे
शहर में साइबर कैफे नहीं है? या
कंप्यूटर इंस्टीट्यूट नहीं है?’
‘है
तो!’
‘तो
जाओ सीखो।’ यह कह कर उस ने फोन काट दिया।
अब वह कंप्यूटर-इंटरनेट सीखने लगा।
जल्दी ही वह सीख भी गया। अब यहां अंगरेजी उस की समस्या बन गई। इस का
भी निदान उस ने जल्दी ढूंढा। रोमन हिंदी का उस ने सहारा लिया। इतने से भी बात नहीं
बनी तो रैपिडेक्स इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स की किताब लाया। गाड़ी चल पड़ी।
वह सुनता और पढ़ता था कि इंटरनेट पर एक से एक सूचनाएं और जानकारियां
हैं। और यहां वह देख रहा था समूचा इंटरनेट सेक्स को समर्पित था। एक अजीब और बीहड़
दुनिया से वह परिचित हो रहा था। लोग डालर खर्च कर-कर के औरतों से चैटिंग कर रहे
थे। बी.बी.सी. की एक रिपोर्ट में उस ने पढ़ा कि इंटरनेट लोगों को बेवफा बना रहा
है। पर यहां तो लग रहा था जैसे समूची दुनिया ही बेवफा हो चली थी। बहुतेरी चैटिंग
साइटें औरतों की फोटुएं दिखा-दिखा, फ्री
रजिस्टर्ड का विज्ञापन दिखा लुभातीं, और
अंततः रजिस्ट्रेशन होते न होते क्रेडिट कार्ड के मार्फ़त डालर मांगने लगतीं। और
लोग डालर पर डालर खर्च कर रहे थे, औरतों
से बतियाने के लिए। इनमें रंडियों की भी संख्या अच्छी-ख़ासी थी। जो सीधे अपना रेट
बताती हुई हाजिर थीं। गरज यह कि औरत एक प्रोडक्ट में तबदील हो चली थी। ऐसे बिक रही
थी, जैसे-तेल, साबुन। हद थी यह भी! लग रहा था जैसे समूची
दुनिया सेक्स में समाई हुई थी। जैसे सेक्स के सिवाय कोई और काम ही न हो लोगों के
पास। हर कोई सेक्स में भुखाया और अघाया दिखता। रोटी की भूख से ज्यादा सेक्स की भूख
थी। तमाम औरतों की अपनी वेबसाइटें थीं। और वेबकैम पर वह खुद ही लाइव रहतीं। कपड़े
उतारती रहतीं, बतियाती रहतीं। कुछ बात उस की समझ में
आतीं और ज्यादातर नहीं आतीं। सेक्स की एक से एक टर्मानोलॉजी कि वात्स्यायन मुनि भी
शर्मा जाएं। एक से एक मैथुनी मुद्राएं कि ब्लू फिल्में भी पानी मांगें। एक से एक
अतृप्त आत्माएं, कामरस में इस कदर पागल कि इंद्र भी देख
कर सनक जाएं।
ग्लोबलाइजेशन की अद्भुत पराकाष्ठा थी यह।
रशियन, अमरीकन, अफ्रीकन, इंडियन, नाइजीरियन वगैरह-वगैरह सभी एक साथ हाजिश्र। कोई नस्ल भेद नहीं, कोई भाषा भेद नहीं, कोई उम्र का परहेज नहीं।
जो जहां चाहे लग जाए और अपनी अतृप्त वासनाओं-कामनाओं की धज्जियां
उड़ा ले। नंगई की यह हद थी। ग्लोबलाइजेशन की यह हद थी। गोया सेक्स-सेक्स न हो, बच्चों का खेल-तमाशा हो, जो जहां जब चाहे खेले-सो ले। प्यार, प्यार न हो कोई तमाशा हो। बाजा-गाजा हो!
सेक्स-सेक्स की इसी भीड़ में वह रशियन औरत भी मिली। प्यार से भरपूर और भावनाओं से
लबरेज। सेक्स नहीं, उस की प्राथमिकता में प्यार था। प्यार
में समाई वह लंबी-लंबी चिट्ठियां लिखती। साथ में अपनी फोटो भी अटैच करती रहतीं।
किस्म-किस्म की। बर्फीली घाटियों में खड़ी, बेंच
पर बैठी, मासूमियत की नदी बहाती, प्यार में वह ऐसे खोई दिखती कि लगता जैसे इस
ग्लोबलाइज होती दुनिया में वह अनूठी है। अप्रतिम है। औचक सौंदर्य में नहाई। उस की
चिट्ठियां भी, चिट्ठियां न हो कर लगता कि कोई कविता
हो। कोई पोर्ट्रेट हो। उस की निर्दोष और भावुक बातें उसे प्यार के ऐसे गहरे सागर
में खींच ले जातीं कि उन में से उस का निकल पाना बेहद-बेहद मुश्किल होता जा रहा
था।
अब वह चिट्ठियों में कई बार बहुत टफ अंगरेजी लिखने लगी। तो उस ने
लिखा कि मेरी अंगरेजी बड़ी कमजोर है। इतनी कि तुम्हारी चिट्ठियों का जवाब देने के
लिए अच्छी अंगरेजी जानने वाले किसी दोस्त की मदद लेनी पड़ती है। जवाब में उस ने
बताया कि मेरा भी हाथ अंगरेजी में बहुत तंग है। और कि उसे भी अंगरेजी में लिखने के
लिए अंगरेजी जानने वाले की मदद लेनी पड़ती है। फिर उस ने प्रस्ताव रखा क्यों न तुम
रशियन सीखो और मैं हिंदी। उस के प्रस्ताव को उस ने स्वीकार कर लिया और अपने शहर की
यूनिवर्सिटी में जा कर पता किया तो पता चला कि रशियन डिप्लोमा का कोर्स वहां पर
है। कुछ किताबें वगैरह लाया वह। उधर उस ने वहां पर इंडियन ऐंबेसी से संपर्क कर
हिंदी सीखने के लिए लिट्रेचर मंगा लिए और हिंदी सीखने लगी। उस ने यह बताया भी कि
वह हिंदी बड़ी तेजी से सीख रही है। जान कर उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। फिर उस ने बताया
कि हिंदी में एक फिल्म है ‘मेरा नाम जोकर’। जिस में एक हीरोइन है जो सर्कस में काम
करती है और इंडियन हीरो से प्यार करती है। अपने प्यार को परवान चढ़ाने के लिए
हिंदी सीखती है। फिल्म का हीरो भी रशियन सीखता है। और जब दोनों डिक्शनरी ले कर बात
करते हैं तो अजब-अजब फ्रेम सामने आते हैं। लेकिन अंततः वह रशियन हीरोइन इंडियन
हीरो को छोड़ कर चली जाती है। उस का दिल तोड़ देती है। कहीं तुम भी तो हमें नहीं
छोड़ दोगी। मेरा दिल तो नहीं तोड़ दोगी?
उस ने जवाब में लिखा कि इस फिल्म को मैं देखने की कोशिश करूंगी। और
हां, तुम मेरा दिल भले तोड़ दो, मैं नहीं तोड़ने वाली। उस ने हिंदी में लिखा था, ‘मैं अपनी बात की बहुत पक्की हूं।’ फिर उस ने
बताया कि इस फिल्म के हीरो राजकपूर हैं जो रूस में बहुत पापुलर रहे हैं, हो सकता है उस का रशियन वर्जन भी वहां मिल जाए।
उसे जान कर बड़ा आश्चर्य हुआ कि हफ़्ते भर के भीतर ही उस ने ‘मेरा नाम जोकर’ की
हिंदी और रशियन वर्जन जुगाड़ कर देख ली। और बड़ी तफसील से चिट्ठी लिखी। फिल्म के
एक-एक फ्रेम के बारे में कई-कई दिन डिसकस करती रही। वह अब हिंदी भी बहुत तेजी से
सीख रही थी। एक दिन वह बताने लगी कि मेरा नाम जोकर के हीरो की मां की तरह ही मेरी
मां भी है। वह भी उतनी ही मुझे चाहती है, जितनी
कि उस हीरो की मां। हां, मेरी मां मुझ से भी ज्यादा भावुक है और
कि वह भी हिंदी सीख रही है।
एक चिट्ठी में उस ने लिखा कि आज उस ने अपनी मां से उस का जिक्र किया
और कि मां ने उसे ब्लेसिंग दी है। एक और चिट्ठी में उस ने लिखा कि आज उस ने अपनी
एक फ़्रेंड से उस की चर्चा की। और कि फ्रेंड बोली कि तुम बड़ी खुशकिस्मत हो कि तुम
को ऐसा प्यार मिला है। वह उस को अपना ऐंजिल भी बताने लगी। ऐंजिल मतलब देवदूत। और
इस मैसेज को उस ने रिकॉर्ड कर के अटैचमेंट के साथ भेजा। उस का निर्दोष और प्यार
में नहाया चेहरा उसे आज भी नहीं भूलता।
उस की बातों में समाया टटकापन उस के मन की अलगनी पर आज भी कहीं टंगा
हुआ है।
उस के बात करने का अंदाज, उस
की चिट्ठियों की तफसील जैसे उसे किसी परीलोक में खींच ले जाते।
एक चिट्ठी में उस ने लिखा कि अब वह उस के बिना रह नहीं सकती। और कि
वह उस के पास उड़ कर इंडिया आ जाना चाहती है। चिट्ठी पढ़ कर उसे यकीन नहीं हुआ।
लेकिन उस की चिट्ठी का भाव लगभग वही था कि ‘पंख होते तो उड़ आती रे, तुझे दिल का दाग दिखलाती रे!’ चिट्ठी पढ़ कर वह
आकुल-व्याकुल हो गया और लगभग उसी भाव में उसे जवाब दिया। अगली चिट्ठी में उस ने
उसे अपना भावी पति घोषित कर दिया। तो वह अचकचाया और लिखा कि मैं तो शादीशुदा हूं।
और कि हमारे देश में दूसरी शादी करना कानूनन अपराध है और सामाजिक भी। और मैं खुद
भी अपनी बीवी-बच्चों से इतना प्यार करता हूं कि उन्हें छोड़ नहीं सकता। उस का जवाब
आया तो फिर प्यार क्यों किया? प्यार
भरी बातें क्यों की? फिर लिखा कि उस ने इंडिया आने की पूरी
तैयारी कर ली है। और कि वह कैसे उसे एयरपोर्ट पर फूल लिए रिसीव करेगा, इस कल्पना का भी बिलकुल पोएटिक अंदाज में पूरा
ब्यौरा उस ने परोस दिया था। यह सब पढ़ कर वह घबराया। और पलट कर लिखा कि वह क्यों
परेशान होती है? और कि यहां गरमी भी बहुत है, जिसे वह बर्दाश्त नहीं कर पाएगी। सो वह खुद ही
रूस उस से मिलने आ जाएगा। उस ने जवाब में लिखा कि उस के रूस आने से उसे मुश्किल
होगी। इस लिए वह न ही आए तो अच्छा।
‘फिर
हमारे प्यार का क्या होगा?’
उस ने चैटिंग में पूछा।
‘जो
भी होगा, इंडिया में होगा। रूस में नहीं।’
लंबी-लंबी बातें करने वाली ने संक्षिप्त-सा जवाब दिया।
‘अच्छा
चलो, कुछ दिन बाद सोच कर बताते हैं।’
‘कुछ
दिन क्या, कुछ पल भी अब मैं नहीं रह सकती
तुम्हारे बिना।’
‘ऐसा
भी क्या है?’
‘मैंने
पासपोर्ट भी बनवा लिया है और ऐंबेसी में जा कर वीजा के लिए भी बात कर ली है।’
‘आर
यू रियली सीरियस?’
‘बिलकुल।’
‘ओ.
के. माई लव!’ कह कर उस ने साइन आउट कर बात ख़त्म कर दी।
‘लेकिन
बात ख़त्म कहां हुई थी?’
उस के मेल पर मेल आते रहे। और वह कतराता रहा। कभी दाएं, कभी बाएं। लेकिन कब तक कतराता। आखि़रकार एक दिन
चैटिंग पर उस ने पूछ लिया,
‘अभी तुम हम को
जानती कितना हो? कि मेरे साथ रहने को तैयार हो!’
‘मैं
तुम से प्यार करती हूं बस!’ वह बोली, ‘अब
इस के बाद कुछ समझना रह जाता है क्या?’
‘हां, रह जाता है। कम से कम मेरे लिए तो रह ही जाता
है।’
‘जैसे
क्या?’
‘जैसे
मैं तुम्हारी फीलिंग्स के अलावा तुम्हारे बारे में कुछ भी नहीं जानता।’
‘क्या
जानना चाहते हो?’
‘जैसे
कि तुम्हारी सेक्सुअल लाइफ?’
‘ओ.
के.। मैं तुम्हें लेटर लिख कर डिटेल में बताऊंगी।’
‘क्यों? अभी क्यों नहीं?’
‘इस
लिए कि सेक्स मेरे लिए कोई कैजुअल सब्जेक्ट नहीं है।’
‘ओ.
के.। आई विल वेट फॉर यौर लेटर।’ कह कर उस ने फिर साइन आउट कर दिया।
दूसरे दिन उसे उस का लंबा लेटर मिला।
उस ने बताया था कि जैसे लव उस के लिए फीलिंग है, सेक्स भी उस के लिए एक बड़ी फीलिंग है। बिना
प्यार के वह सेक्स नहीं कर सकती। लेकिन रशियन पुरुष लव नहीं जानते, फीलिंग्स नहीं जानते, वह सिर्फ सेक्स जानते हैं। बिना प्यार का
सेक्स। वह औरत को, औरत नहीं कमोडिटी मानते हैं। सेक्स का
औजार मानते हैं। कहूं कि सेक्स ट्वायज मानते हैं। शराब पीते हैं, सेक्स करते हैं और औरत को ढकेल देते हैं। जैसे
वह कोई बेकार चीज हो।
ऐसे ही तमाम ऊबी और रूखी लेकिन तल्ख़ सचाइयों से उस की चिट्ठी भरी
पड़ी थी। पहली बार उस की चिट्ठी में तल्ख़ी दिखी थी। उस ने लिखा था कि इसी लिए वह
रशियन समाज से, रशियन पुरुषों से भागती है। ऐसे पुरुष
जिनके पास फीलिंग्स नहीं है, प्यार
नहीं है, प्यार का भाव नहीं है, से वह भागती है। और शायद इसी लिए वह इंडिया आना
चाहती है। उस की बांहों में समा जाना चाहती है। अनंत, अनंत और अनंतकाल के लिए। युगों-युगों तक के
लिए।
लेकिन तुम्हें रशियन पुरुषों के सेक्स के बारे में इतना डिटेल कैसे
मालूम है? उस ने चिट्ठी लिख कर पूछा।
‘मैं
डाइवोर्सी हूं। इस लिए सारे डिटेल्स जानती हूं।’ उस का जवाब आया। उस ने लिखा था, ‘तुम्हारे पास भी मैं सेक्स के लिए नहीं, प्यार के लिए, प्यार की प्यास बुझाने के लिए आना चाहती हूं। यहां मेरी हालत वैसे ही
है, जैसे कोई मछली पानी में हो और पानी जम
कर बर्फ बन जाए। मैं बर्फ में फंसी वह मछली हूं, जो न जी पाती है, न
मर पाती है। प्लीज मुझे इस बर्फ से उबार सको तो उबारो! मैं तुम्हारी बांहों में
सचमुच समा जाना चाहती हूं। मुझे अपनी बांहों में ले लो। इस चिट्ठी के साथ उस ने
अपनी एक फोटो भी अटैच की थी जिस में वह अपनी गोद में एक बिल्ली लिए बर्फ के मैदान
पर ऐसे खड़ी थी, गोया उस में धंस जाएगी।
उसे उस पर सचमुच प्यार आ गया।
हालां कि वह उस पर तरस खाना चाहता था। उस के मछली की तरह बर्फ में
फंसे रहने की उस की फांस यही कहती थी कि उस पर तरस खाया जाए। बर्फ के मैदान पर
खड़ी उस की फोटो भी यही चुगली खाती थी कि उस पर तरस खाया जाए। लेकिन उस की गोद में
समाई बिल्ली ऐसे उसे निहार रही थी, और
वह उस बिल्ली को, कि दोनों की मासूमियत पर उस को प्यार आ
गया। उसे प्यार आ गया उस की पुरानी बातों को याद करके। उस की पुरानी चिट्ठियों की
उन इबारतों को याद कर के प्यार आ गया जिनमें वह लगभग पोएटिक हो जाती और पोएटिक
होते-होते उसे किसी परीलोक में खींच ले जाती। उसे सचमुच उस पर बहुत प्यार आ गया।
उस ने एक दिन चैटिंग में कहा कि, ‘ठीक
है तुम इंडिया आ जाओ। पर यह बताओ कि तुम यहां रहोगी कैसे?’
‘कैसे? मतलब? तुम्हारे
साथ रहूंगी, तुम्हारी बांहों में। और कैसे?’
‘ओ.
के.।’
‘तुम्हारे
सिवाय और मैं कुछ सोचती ही नहीं।’
‘ओ.
के.।’
‘दिन-रात
सिर्फ तुम्हें सोचती हूं। कुछ और नहीं। सिर्फ तुम्हें।’
‘वह
तो ठीक है। पर जब तुम इंडिया आओगी, मैं
तब की बात कर रहा हूं ख़यालों और ख़्वाबों की नहीं।’
‘समझी
नहीं।’
‘मेरा
मतलब गुजारा कैसे होगा?’
‘मैं
ने सब सोच लिया है। और उस से भी पहले यह कि मैं तुम पर बोझ नहीं बनूंगी।’
‘ओह!’
‘हां, मैं ने सोच लिया है।’ वह रुकी और बोली, ‘मैं अपना बिजनेस करूंगी। तुम्हारी इंडिया में।’
‘किस
चीज का बिजनेस?’
‘उस
के बारे में मैं ने सोचा भी नहीं।’ वह बोली, ‘वहीं
आ कर तुम से एडवाइज लूंगी।’
‘फिर
भी कुछ तो सोचा होगा।’
‘कुछ
नहीं! यह तुम सोचोगे।’
‘तो
भी।’
‘अब
तुम्हारी इंडिया में किस चीज का बिजनेस चलेगा मैं क्या जानूं ?’ वह बोली, ‘वैसे
तुम्हें बताऊँ कि मैं कुक बहुत अच्छी हूं। नहीं होगा तो एक रेस्टोरेंट ही खोल
लूंगी। पर तुम इतना जान लो कि मैं तुम पर बोझ नहीं बनूंगी। और कुछ नहीं होगा, तो इतनी हिंदी जान गई हूं कि वहां के लोगों को
रशियन पढ़ा सकूं।’ वह तैश में आ गई।
‘ओ.
के.। ओ. के.।’ वह बोला, ‘कुछ और बात करें?’
‘नहीं, कोई और बात नहीं।’ कह कर वह खुद साइन आउट कर
गई। फिर बहुत दिनों तक उस का कोई मेल भी नहीं आया। ना ही वह चैट पर आई। इस बीच वह
दूसरी लड़कियों-औरतों से फ्लर्ट-चैट करता रहा। इन्हीं दिनों उसे कुछ नाइजीरियन और
अफ्रीकन लड़कियां भी चैट पर मिलीं। दो-तीन दिन तक वह रोमैंटिक-सेक्सी बातें करतीं।
और तन-मन-धन सब न्यौछावर करते-करते अचानक मदद मांगने पर आमादा हो जातीं। ढेर सारी
कसमें देतीं, अर्धनग्न फोटो अटैचमेंट के साथ भेजती
हुई उन लड़कियों की कहानियां लगभग एक जैसी होतीं।
फर्क सिर्फ चौहद्दी का होता। वह भी कुछ इस तरह की किसी का पति मर गया
होता, तो किसी का पिता। किसी न किसी हादसे
में इनकी हत्या हुई होती और वह किसी तरह जान बचा कर इस वक्त रिफ़्यूजी कैंप में रह
रही होतीं। उनके पति या पिता कई मिलियन डालर छोड़ गए होते। उन का कोई बिजनेस
पार्टनर होता, जो फारेनर होता, और वही फारेनर पार्टनर उसे बना कर वह इंडिया
में उस के नाम सारा पैसा ट्रांसफर कर के फिर से नई जिंदगी शुरू करना चाहतीं और उस
की हमसफर बनना चाहतीं। अजब गोरखधंधा था यह। वह कइयों के प्रस्ताव मानता गया। अपना
पूरा डिटेल बैंक एकाउंट सहित देता गया। फिर वह सब पैंतरा बदलती हुई डिप्लोमेटिक
खर्च के डिमांड पर आ जातीं। और यह खर्च भी हजारों नहीं लाखों में होता। वह समझ गया
कि यह सब औरतें और लड़कियां फर्जी हैं और किसी गैंग का हिस्सा हैं। इसी बीच
अप्रत्याशित रूप से उस की लाटरियां भी इंटरनेट पर खुलने लगीं। और सभी लाटरियां
मिलियन, बिलियन डालरों में होतीं। उस ने माथा
पकड़ लिया। जिस लाटरी के टिकट को उस ने कभी ख़रीदा नहीं, उनके बारे में कभी जाना नहीं, वहां कभी झांका नहीं, और वह लोग उसे अरबों-खरबों डालर देने पर आमादा
थे।
तो क्या इंटरनेट पर सिर्फ चार सौ बीसी ही होती है?
कहीं वह रशियन औरत भी उस के साथ चार सौ बीसी तो नहीं कर रही थी? उस ने यह सब सोचा। यह सब सोचते हुए ही उसे एक
चिट्ठी लिखी और पूछा कि तुम हो कहां?
कहां गुम हो?
उस का कोई जवाब नहीं आया।
काफी दिन बीत गए। अचानक एक दिन उस रशियन औरत की एक मेल दिखी। उस ने
झट से खोला। मेल एड्रेस जरूर उस का था लेकिन चिट्ठी उस की नहीं, उस की मां की ओर से थी। चिट्ठी में उस की लंबी
बीमारी का जिक्र था। उसे ब्लड कैंसर बताते हुए लिखा था कि वह बैठ नहीं सकती लेकिन
तुम्हारा नाम दिन-रात लेती रहती है। इंडिया-इंडिया बड़बड़ाती रहती है। वह इंडिया
जैसे उड़ जाना चाहती है। वह गहरे डिप्रेशन में है। हो सके तो तुम आ जाओ और उसे
इंडिया ले जाओ।
हालां कि वह जाने की स्थिति में नहीं है फिर भी वह जाना चाहती है।
क्या तुम आ सकोगे? और जो न आ सको तो अपनी कुछ फोटो तो भेज
ही दो। इसी से उसे तसल्ली हो जाएगी! आने-जाने में अगर पैसे वगैरह की दिक्कत आए तो
भी लिखना।
टिकट मैं यहीं से भेज दूंगी। एयरपोर्ट पर खुद आ जाउँगी। क्यों कि वह
तुम्हें देखना चाहती है, तुम से मिलना चाहती है। आ सकोगे तुम? चिट्ठी के साथ उस की कुछ फोटो थीं जिन में वह
बिस्तर पर अपनी बिल्ली के साथ लेटी थी। एक फोटो में उस ने देखा कि उस ने अपने
सिरहाने उस की एक बड़ी सी फोटो फ्रेम करवा कर दीवार में लटका रखी थी।
फोटो में उस की दशा देख कर वह रो पड़ा।
असमंजस उस का बढ़ता जा रहा था। वह रोज रूस जाने की तैयारी में लगा
रहा था। पासपोर्ट के लिए उस ने अप्लाई कर दिया था। वह आने-जाने के खर्च के लिए
पैसे भी बटोर रहा था। वह रूस जाना चाहता था पर उस रूसी औरत के खर्च पर नहीं।
पासपोर्ट और पैसे बटोरने के चक्कर में उस को कुछ समय लगेगा यह बताते हुए उस ने उस
की मां को चिट्ठी लिख कर बता दिया कि वह जल्दी ही आ रहा है। उस की मां ने उसे अपने
घर का पता भी भेज दिया। अब तो यह तय था कि वह कोई चार सौ बीस नहीं है। वह सचमुच उस
से प्यार करती है। इंटरनेट पर ही सही। वह उस के प्यार से अभिभूत था। वह उस को जी
रहा था, और उस के साथ ही मर भी रहा था।
पासपोर्ट उस का बन गया था। अब वीजा बनवाने का नंबर था।
वीजा बनवाने के लिए वह दिल्ली गया। रशियन ऐंबेसी से संपर्क किया।
टूरिस्ट वीजा के लिए।
वह दिल्ली हफ्ते भर तक रुका रहा। एक दिन वह अपनी मेल चेक कर रहा था
कि फिर उसे उस की मेल दिखी जो उस की मां ने ही लिखा था। मेल सिर्फ एक लाइन की थी, ‘रीम्मा इज डेड!’ वह साइबर कैफे में ही रो पड़ा।
वह वापस लखनऊ आया और पत्नी से लिपट कर रो पड़ा। पत्नी ने पूछा, ‘क्या हुआ?’
‘वह
नहीं रही!’ वह बुदबुदाया,
‘वह मर गई।’
‘कौन
मर गई?’ पत्नी अचकचाई
‘वही
जिस के लिए रूस जा रहा था।’
‘क्या?’
अब उस के घर में नया कोहराम मच गया था। पत्नी उसे ऐसे देख रही थी
गोया उसे सूली पर चढ़ा देगी। पहले और दूसरे प्यार की सूचना और कुछ फुटकर हरकतों पर
वह पहले ही से शक के सलीब पर था। और अब यह फिर!
सारा प्यार भस्म हो गया था।
बर्फ में फंसी मछली अब वह खुद बन गया था।
-16-
संगम के शहर की लड़की
वह रास्ते में अचानक रुक गया। नजारा ही कुछ ऐसा था। एक बीस-बाइस साल
की गोरी चिट्टी लड़की तेज-तेज चलती जा रही थी और उस के पीछे-पीछे एक पचास-पचपन साल
का आदमी लगभग दौड़ता हुआ,
‘सुनो तो! मेरी
बात तो सुनो।’ घिघियाता जा रहा था। साथ में एक सिपाही भी रायफल लिए उनके पीछे-पीछे, धीरे-धीरे चल रहा था। बिलकुल ख़ामोश अंदाज में।
बिना कोई हस्तक्षेप किए। और वह, ‘सुनो
तो, सुनो तो।’ घिघियाता ही जा रहा था।
लेकिन लड़की उस की एक नहीं सुन रही थी। उस ने गाड़ी सड़क के किनारे खड़ी की। फाटक खोल
कर बाहर निकला। फाटक बंद कर टेक लगा कर खड़े-खड़े उन दोनों को देखने लगा। लड़की थी कि
मान नहीं रही थी। और वह अधेड़ व्यक्ति था कि उसे छोड़ नहीं रहा था। मामला बढ़ते देख
वह उन दोनों के पास पहुंचा। पूछा, ‘बात
क्या है?’
‘क्या
बताऊँ भइया, कुछ समझ में नहीं आ रहा है।’ अधेड़
व्यक्ति ने लगभग हथियार डालते हुए कहा, ‘जरा
आप ही समझाइए!’
‘आखि़र
बात क्या है?’
‘मैं
कह रहा हूं कि यह तलाक ले ले। लेकिन यह मान ही नहीं रही है!’
‘क्या
बात कर रहे हैं?’ वह बोला, ‘आप ने इस से शादी की ही क्यों? शर्म
नहीं आई आप को? आप की बेटी जैसी है!’
‘बेटी
जैसी नहीं, बेटी ही है यह हमारी!’
‘ओह!’
वह बोला, ‘फिर किससे तलाक लेने को कह रहे हैं?’
‘इस
के पति से।’ वह बोला, ‘लेकिन यह मान ही नहीं रही है।’
‘आप
पिता हो कर भी बेटी से तलाक की बात क्यों कर रहे हैं?’
‘इस
लिए कि इस की शादी ग़लत हो गई है।’
‘ग़लत
हो गई मतलब?’
‘उस
की एक बीवी पहले से ही है।’
‘तो
उस से शादी की ही क्यों आपने?’
‘यही
तो ग़लती हो गई।’
‘ओह!
क्या आप को पहले से नहीं पता था?’
‘पता
होता तो करता क्यों?’ माथे पर हाथ फेरते हुए वह बोला।
‘लड़का
करता क्या है?’
‘कौन
लड़का?’
‘मतलब
आप का दामाद!’
‘रेलवे
में अफसर है।’
‘मिला
कैसे?’
‘विज्ञापन
के थ्रू।’
‘आप
ने कुछ जांच-पड़ताल नहीं की?’
‘की
तो थी।’ वह बोला, ‘लेकिन चूंकि दहेज नहीं ले रहा था, इस लिए ज्यादा ठोंक-पीट नहीं की।’
‘वह
रहने वाला कहां का है?’
‘गोंडा
का।’
‘और
आप लोग?’
‘इलाहाबाद
के।’
‘किस
जाति के हैं?’
‘ब्राह्मण।’
‘और
वह?’
‘वह
भी ब्राह्मण है।’
‘तलाक
का मुकदमा दायर हो गया है?’
‘हां।’
‘किसने
किया?’
‘लड़के
ने ही।’
‘क्यों?’
‘अब
वह अपने परिवार में लौटना चाहता है।’ वह बोला, ‘लौटना
चाहता है क्या बल्कि लौट चुका है।’
‘तो
यह कहां रह रही है?’ लड़की की ओर इंगित करते हुए उस ने पूछा।
‘मेरे
साथ इलाहाबाद में।’
‘ओह!’
उस ने पूछा, ‘लड़के को आपने समझाया नहीं?’
‘वह
अभी कहां है?’
‘अंदर
कोर्ट में है।’
‘मैं
उसे समझाने की कोशिश करूं?’
‘कोई
फायदा नहीं।’ वह बोला, ‘अब समझाना ही है तो उसे नहीं, इसे समझाइए। वह इसे दुत्कार रहा है और यह उस के
प्यार में पागल हुई जा रही है।’
‘कितने
दिन दोनों साथ-साथ रहे?’
‘ज्यादा
से ज्यादा दो-तीन महीने।’
‘शादी
हुए कितने दिन हुए?’
‘यही
कोई आठ महीने।’
‘बच्चे-वच्चे
की संभावना तो नहीं है?’ उस ने लड़की के पिता के कान में फुसफुसा
कर पूछा।
‘नहीं-नहीं।’
‘फिर
तो ठीक है।’ उस ने पूछा,
‘क्या दोनों के
साथ रहने की कोई संभावना नहीं है?’
‘अब
लड़का रखने को ही तैयार नहीं है तो क्या करें?’
‘आखि़र
दिक्कत क्या है?’
‘अब
यह तो वही जाने।’
‘लड़की
तलाक से मना क्यों कर रही है?’
‘यह
उस के प्यार में पड़ गई है।’
‘क्या
यह उसे पहले से जानती थी?’
‘नहीं
साहब। हम इलाहाबाद में थे और वह लखनऊ में। जानने की कोई सूरत ही नहीं थी।’ लड़की का
पिता बोला, ‘विज्ञापन के मार्फत जो भी
पत्राचार-बातचीत हुई, मुझ से ही हुई।’
‘शादी
बाजे-गाजे के साथ हुई या कोर्ट में?’
‘मंदिर
में।’
‘लड़के
की ओर से भी कोई था?’
‘उस
के चार-छः दोस्त थे।’
‘क्यों
उस के मां-बाप?’
‘उस
ने बताया था कि मां-बाप से पटती नहीं है।’
‘और
भाई-बहन, नाते-रिश्तेदार?’
‘कोई
नहीं आया था।’
‘तो
आप को खटका नहीं?’
‘खटका
तो था।’ सिर खुजलाते हुए लड़की का पिता बोला, ‘चूंकि
रेलवे की अच्छी नौकरी में था, दहेज
नहीं ले रहा था इस लिए यह सब कुछ सूझ कर भी नहीं सूझा। क्या बताऊं!’
‘अच्छा
चलिए कोर्ट में लड़के से बात करते हैं।’
‘वो
मानेगा नहीं साहब।’ बड़ी देर से पास में खड़ा सिपाही रायफल पर टेक लिए हुए बहुत उदास
स्वर में बोला, ‘पर आप भी ट्राई मार लीजिए।’
‘तुम
क्या इनके रिश्तेदार हो या जानने वाले?’
‘नहीं
साहब हम तो ड्यूटी पर हैं।’
‘तो
अपनी ड्यूटी करो, यहां बीच में क्यों घुस रहे हो?’
‘हमारी
ड्यूटी इन्हीं के साथ है साहब!’ सिपाही बोला, ‘हम
इनकी रच्छा में हैं साहब!’
‘ओह!
तो तुम भी इलाहाबाद से आए हो?’
‘हां, हुजूर।’
‘क्या
आप की सुरक्षा को भी ख़तरा है?’ उस
ने लड़की के पिता से पूछा।
‘असल
में क्या हुआ कि लड़के ने जब हमारी बेटी को अपने घर से निकाल दिया, तो हमने उस के खिलाफ दहेज के मुकदमे की अर्जी
थाने में दे दी। इलाहाबाद में ही। लड़का अरेस्ट हो गया। लेकिन फिर समझौता हो गया और
लड़का उसी दिन छूट गया। लेकिन उस ने समझौते को माना नहीं और हमारी लड़की को अपने घर
नहीं ले गया। हम फिर थाने गए। लेकिन थाने वाले माने नहीं। बोले तुम ड्रामा करते
हो।’ यह बताते-बताते लड़की का पिता रो पड़ा। वह बताने लगा, ‘फिर हम फेमिली कोर्ट गए। मेंटीनेंस के लिए।
इलाहाबाद में ही। लेकिन तब तक लड़के ने लखनऊ के फेमिली कोर्ट में तलाक का मुकदमा
दायर कर दिया। आज दूसरी पेशी है। पहली पेशी में उस ने गालियां दीं हम बाप-बेटी को।
मारने की धमकी दी। तो अब की इलाहाबाद से सुरक्षा-व्यवस्था ले कर चले ताकि कुछ
अप्रिय न हो जाए।’ इधर लड़की का पिता बोलता जा रहा था उधर वह लड़की लगातार रोए जा
रही थी। लग रहा था जैसे गंगा-जमुना में भारी बाढ़ आ गई हो।
खूब चटक सिंदूर लगाए, फेमिली
कोर्ट के अहाते के बाहर उस के आंसुओं की धारा शायद कोई संगम ही ढूंढ रही थी, जो उसे मिल नहीं रहा था। संगम के शहर की यह
लड़की अपने पिता की मूर्खता,
दहेज बचाने के लालच की यातना में, अपने पति से प्यार की याचना में ऐसे रोए जा रही
थी, निःशब्द गोया किसी छलनी से आटा गिरा जा
रहा हो, झर-झर, झर-झर। उसे कोई राह नहीं मिल रही थी। हालां कि वह बला की सुंदर थी, और उस की सुंदरता देख कर ही वह यहां रुका भी
था। उसे नहीं मालूम था कि इस लड़की की जिंदगी में इतना बड़ा तूफान आया हुआ है। उस की
अबोधता, मासूमियत, आंखों से लगातार बहते आंसू और माथे पर उस का
चटक सिंदूर सब मिलजुल कर एक ऐसा कंट्रास्ट रच रहे थे कि बरगद के पेड़ के नीचे लग
रहा था जैसे कोई नदी फूट पड़ेगी, आग
की नदी। हां, उस के मन में तो आग की नदी ही हिलोरे
मार रही थी। पिता की मूर्खता और पति की यातना में बिलबिलाई-तिलमिलाई वह लड़की किसी
की बात को मानने को भी तैयार नहीं थी। उस की जिद थी और लगातार थी कि वह अपने पति
के साथ ही रहेगी, चाहे जो हो जाए।
‘आप
कुछ कोशिश क्यों नहीं करते?’
उस ने लड़की के पिता से मुखातिब हो कर
कहा।
‘क्या
करें? अब उस की पहली पत्नी लखनऊ में रहने लगी
है उस के साथ।’
‘पहले
नहीं रहती थी?’
‘नहीं।’
‘तो
क्या हुआ? मैं फिर भी साथ रह लूंगी!’ लड़की रोती
हुई बोली।
‘पर
वह रखे तब तो?’
‘वह
नहीं रखे, तब भी मैं रह लूंगी।’ वह अपने पिता और
सिपाही की ओर देखती हुई बोली, ‘मुझे
कोई मुकदमा, कोई तलाक नहीं चाहिए!’
‘क्यों? क्यों नहीं चाहिए?’ लड़की का पिता बिलबिलाया।
‘क्यों
कि मैं उनके बिना रह नहीं सकती।’ वह बोली, ‘और
मैं दूसरी शादी भी नहीं कर सकती जैसा कि आप चाहते हैं।’
‘हे
भगवान! अब मैं क्या करूं?’
अपना सिर पकड़ कर जमीन पर बैठते हुए
लड़की का पिता रो पड़ा। अभी तक तो सिर्फ लड़की रो रही थी, अब पिता भी रोने लगा। उस ने सिपाही की ओर देखा
और लगा कि अब सिपाही भी रोने ही वाला है। अजब थी यह यातना। उसे लगा कि अब वह भी रो
पड़ेगा। उस ने सिपाही की ओर देखा और पूछा, ‘तुम
उस लड़के को पहचानते हो?’
‘हां
हुजूर! लंबा सा है।’ वह रायफल संभालते हुए तेजी से फेमिली कोर्ट की ओर चला और बोला, ‘आइए!’
कोर्ट के बरामदे में वह लड़का मिल गया। लंबा सा। हैंडसम सा। लगभग
तीसेक साल का। मतलब लड़की से लगभग आठ साल बड़ा।
‘हजूर!’
सिपाही लड़के से मुखातिब होता हुआ बोला, ‘ई
साहब आप से बात करना चाहते हैं।’
‘बोलिए!’
वह उस की ओर तरेरता हुआ बोला।
‘आप
जरा, इधर आएंगे!’ वह लड़की और लड़की के पिता
की ओर दिखाता हुआ बोला।
‘नहीं, आप यहीं बताइए।’ वह धीरे से गुर्राया। आंखों
में उस की बेतरह घृणा पसरी हुई थी।
‘अच्छा, वहां नहीं, न
सही, इस तरफ आएंगे? जरा भीड़ से हट कर!’ वह एक दूसरा पेड़ उसे दिखाते
हुए बोला।
‘नहीं, आप यहीं बताइए।’ वह बरामदे से जरा निकलता हुआ
बोला।
‘चलिए
यहीं बात करते हैं।’ उस ने बात शुरू की, ‘आख़िर
आप को अपनी पत्नी से दिक्कत क्या है?’
‘कोई
दिक्कत नहीं है।’ वह आंखें फैलाता हुआ बोला, ‘मैं
अपनी पत्नी के साथ बाखुशी रह रहा हूं।’
‘मैं
आप की पहली पत्नी की नहीं,
दूसरी पत्नी की बात कर रहा हूं।’ वह उस
की आंखों में आंखें डालता हुआ बोला, ‘आखि़र, उस को भी साथ रखने में दिक्क़त क्या है?’
‘दिक्कत
यह है कि मुझे अपनी और अपनी बीवी-बच्चे की जान प्यारी है।’ वह लगभग चबाता हुआ बोला, ‘और यह हम लोगों की जान की दुश्मन है!’
‘वह
कैसे?’
‘साथ
रखेंगे तो यह हम सब को जहर दे देगी।’
‘क्या
बात कर रहे हैं आप?’
‘बिलकुल
ठीक कह रहा हूं।’ वह लगभग डपटता हुआ बोला, ‘समझौते
की कोई गुंजाइश नहीं है। बताइए भला, जिसने
दहेज बचाने के लिए मैं शादीशुदा हूं जान कर भी, अपनी
लड़की की शादी की, उसी ने दहेज लेने का मुकदमा मेरे
खि़लाफ लिखवाने की कोशिश की। तो उस की लड़की कुछ भी कर सकती है।’
‘शादी
के पहले उन को मालूम था कि आप शादीशुदा हैं?’
‘सब
मालूम था।’
‘विज्ञापन
किसने दिया था?’
‘मैंने
दिया था।’
‘तो
विज्ञापन में लिखा था कि आप शादीशुदा हैं?’
‘नहीं।’
‘यह
तो चीटिंग हो गई?’
‘लेकिन
बाद में मैं ने बता दिया था।’
‘क्या
बता दिया था?’
‘यही
कि पहली पत्नी से मेरी नहीं पटती, क्यों
कि वह जाहिल है, इस लिए दूसरी शादी कर रहा हूं।’
‘और
वह अब जाहिल नहीं रही? और पटने लगी?’
‘हां, अब पटने लगी क्यों कि वह धोखेबाज नहीं है इस की
तरह। पहली पत्नी ने कोई रिपोर्ट नहीं लिखवाई इस की तरह। जब कि वह लिखवा सकती थी।’
‘हो
सकता है जल्दबाजी में उस से कोई ग़लती हो गई हो?’ वह
बोला, ‘पिता के कहने में आ गई हो।’
‘नहीं
ऐसा नहीं है।’ मैं ने थाने में उस से कहा था, ‘देखो
जिंदगी हमारी-तुम्हारी है,
पढ़ी-लिखी समझदार हो, किसी के कहने में मत आओ। लेकिन इसने मेरी एक न
सुनी और पुलिस मुझे बेइज्जत करती रही। वह बेइज्जती मैं नहीं भूल सकता।’
‘लेकिन
वह कितनी अबोध और निर्दोष है!’
‘अगर
इतनी अबोध और निर्दोष है तो आप खुद क्यों नहीं शादी कर लेते?’ वह उस की आंखों में आंखें डालते हुए बड़ी
बदतमीजी से बोला, ‘आप ही कर लीजिए शादी। कर दीजिए उस का
उद्धार!’
‘क्या
बेवकूफी की बात कर रहे हो?’
‘बेवकूफी
की बात मैं नहीं, आप कर रहे हैं। जब मैं ने एक बार कह
दिया कि कोई समझौता नहीं हो सकता तो नहीं हो सकता।’
‘आप
सरकारी नौकरी में हैं, आप जानते हैं कि अगर वह शिकायत कर दे
आप के ऑफिस में तो आप की नौकरी भी जा सकती है।’
‘जानता
हूं और अच्छी तरह जानता हूं कि वह कुछ भी नहीं कर सकती!’
‘क्यों
नहीं कर सकती?’
‘क्यों
कि इस मामले में कानून उस का साथ नहीं देता। अगर देता तो अब तक वह शिकायत कर चुकी
होती।’
‘आप
को उस की सुंदरता पर भी तरस नहीं आता?’
‘नहीं
आता।’ वह बड़ी हिकारत से बोला, ‘वह
सुंदर नहीं, विष कन्या है। जहर से भरा हुआ दिमाग़ है
उस का।’
‘वह
आप से बहुत प्यार करती है और कहती है कि आप के बिना रह नहीं सकती। आप के लिए अपने
मां-बाप को भी छोड़ने को तैयार है।’
‘वह
प्यार नहीं ड्रामा करती है। और बाप भी उस का बहुत धूर्त है।’
‘तो
कोई गुंजाइश नहीं बनती? कोई रास्ता नहीं निकलता?’
‘बिलकुल
नहीं।’
‘एक
बार फिर से सोच कर देखिए। मेरा कहा मान लीजिए।’
‘इस
मुद्दे पर तो मैं विधाता का भी कहना मानने वाला नहीं हूं। उस से कहिए जो करना हो
कर ले!’
‘यह
तो सरासर गुंडई है!’
‘जो
भी है अब आप जाइए! मुझे कोई बात नहीं करनी है।’ कह कर उस ने हाथ जोड़ लिए।
वह वापस लड़की और लड़की के पिता के पास आ गया। सिपाही भी साथ था। वह
अचानक किचकिचा कर लड़की के पिता से मुखातिब होता हुआ बोला, ‘दूबे जी, अगर
आप कहें तो कोर्ट के बाहर निकलते ही एही रायफल के कुंदा से साले को कूंच के रख
दूं। आप की रच्छा में हई हूं। कह दूंगा कि आप पर हमला किया था। साले की सारी शेखी
निकल जाएगी।’
‘कूंच
दो साले को!’
‘नहीं
कुछ मत करना!’ लड़की बिलबिलाती हुई बोली, ‘अगर
उन को छुआ भी तो जान पर खेल जाऊंगी। गवाही भी दे दूंगी तुम लोगों के खि़लाफ!’
‘ओह!
क्या करूं इस लड़की की समझ में नहीं आता! अभी दो और लड़कियां पड़ी हैं।’ लड़की का पिता
मेरी ओर मुखातिब होता हुआ बोला, ‘समझाइए
जरा इस को कि वह तलाक दे रहा है तो ले ले। फिर कहीं इस की दूसरी शादी कर दूंगा।
बाकी दो और इस से छोटी हैं। यह ऐसे ही रहेगी तो उन की भी शादी में मुश्किल होगी।
समझाइए भइया कुछ इस को समझाइए!’
‘अब
मान जाओ बिटिया!’ सिपाही भी मनुहार करता हुआ बोला, ‘ऊ लवंडा मानने वाला है नहीं।’
‘आप लोगों को जो करना हो करिए, मुझे जो करना होगा मैं करूंगी।’ कहती हुई वह मेरी तरफ मुख़ातिब हुई, ‘प्लीज, अब आप भी जाइए!’ और वह फिर से रोने लगी।
-17-
सफ़र में फ्रांसीसी
बनारस में गंगा घाट की सीढ़ियां उसे छोड़ नहीं रही थीं। लेकिन
रिजर्वेशन था और ट्रेन का समय हो चला था सो वह भरी दोपहर गंगा का मोह छोड़ कर
स्टेशन के लिए रवाना हो गया। रांड़ , सांड़
, संन्यासी की छवि वाला यह शहर अपने मोह के धागे
में उसे शुरू ही से बांधता रहा है। बनारस की गलियां , यहां की फक्क्ड़ई और लोगों का लगाव यहां के जाम
जैसा ही है। कभी छोड़ता नहीं। यह जाम ही है जो उसे स्टेशन से एक किलोमीटर पहले ऑटो
छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा है। बार-बार यह पूछने पर कि , ' और कितना समय लगेगा ? '
' समय
से पहुंचना मुश्किल जान पड़ रहा है। जैसा जाम दिख रहा है , लगता है , मेरे
साथ तो आप की ट्रेन पक्का छूट जाएगी। ' ऑटो
वाले ने स्पष्ट बता दिया है।
' फिर
? '
' आप
उतर कर पैदल चले जाइए। ' ऑटो वाले ने कहा , ' तब शायद ट्रेन मिल जाएगी। '
वह सामान समेत ऑटो से उतर कर पैदल चल पड़ा स्टेशन के लिए। तेज़-तेज़
चलता हुआ। ट्रैफिक में रास्ता बनाता हुआ। जगह-जगह उपस्थित गाय और सांड़ को प्रणाम
करता हुआ। रास्ता बनाता हुआ हांफते-डांफते किसी तरह स्टेशन पहुंचा। पता चला कि
प्लेटफार्म भी आख़िरी वाला है। किसी तरह भागता हुआ प्लेटफार्म पर पहुंचा। अपनी कोच
खोजता हुआ प्लेटफार्म पर चल ही रहा था कि ट्रेन सरकने लगी। सामने दिख रहे डब्बे
में घुस गया। लेकिन उस के घुसते ही ट्रेन अचानक रुक गई। शायद किसी ने चेन पुलिंग
कर दी है। खैर वह तमाम डब्बे लांघता हुआ अपनी कोच और बर्थ तक पहुंच गया। ट्रेन अभी
भी रुकी हुई है। अभी अपनी बर्थ पर अपने को वह व्यवस्थित कर ही रहा था कि एक
गेरुआधारी कमंडल लिए प्रसाद बांटते , काशी
और गंगा जल का माहात्म्य बताते , दक्षिणा मांगते उपस्थित हैं। उन से हाथ जोड़
लेता हूं। लेकिन सामने की बर्थ पर दो फॉरेनर दिख जाते हैं। उन के माथे पर विश्वनाथ
मंदिर का चंदन पहले ही से लगा हुआ है। गेरुआधारी उन्हें अपने जाल में लपेटना शुरू
कर देते हैं। लेकिन वह दोनों भी उस की ही तरह मुस्कुराते हुए हाथ जोड़ लेते हैं। यह
देख कर उसे बरबस हंसी आ गई। गेरुआधारी उस पर भुनभुनाते हुए आगे बढ़ जाते हैं। ट्रेन फिर सरकने लगी है।
एक फॉरेनर के हाथ में कोई एक किताब है। वह उस किताब का नाम पढ़ने की
कोशिश करता है। पर बहुत कोशिश के बावजूद पढ़ नहीं पाता। पहले उसे लगा था कि यह
अंगरेजी की कोई किताब होगी। पर वह अंगरेजी की किताब नहीं थी। मजबूरन उसे पूछना पढ़ा
, ' यू फ्राम ? '
' फ़्रांस
!'
वह समझ गया है कि उस फॉरेनर के हाथ में जो किताब है , फ्रेंच में है। फ्रेंच जिस में साइंस और
टेक्नॉलजी की सब से ज़्यादा किताबें हैं। लेकिन लोग समझते हैं ज्ञान विज्ञान की
सारी किताबें अंगरेजी में हैं। जब कि ऐसा नहीं है। हां , अंगरेजी ने यह होशियारी ज़रूर की है कि फ्रेंच
में लिखी साइंस की सारी किताबों को अंगरेजी में बिना अनुवाद किए जस का तस उठा लिया
रोमन में। बता दिया कि यह अंगरेजी है। फ्रेंच पीछे रह गई , अंगरेजी आगे निकल गई। कोई भी व्यक्ति , कोई भी भाषा इसी होशियारी , इसी लचीलेपन और इसी उदारता से आगे बढ़ सकती है ।
जैसे अंगरेजी बढ़ गई। ठस हो कर अड़ियल हो कर नहीं बढ़ सकती थी अंगरेजी। हर अच्छी चीज़
को बिना किसी ना नुकुर के पूरी ईमानदारी से स्वीकार कर लेना ही तरक्की की बड़ी
निशानी होती है।
दोनों फ्रांसीसियों से जब उस ने यह बात कही तो उन के चेहरों पर
कड़वाहट भरी मुस्कान आ गई। अंगरेजी जैसे उस की टूटी फूटी और कामचलाऊ थी , वैसे ही इन दोनों फ्रांसीसियों की अंगरेजी भी
टूटी फूटी और कामचलाऊ ही थी। लेकिन बतियाने के लिए काफी थी। मामूली सी केप्री और
टी शर्ट पहने दोनों फ्रांसीसी पचास , पचपन
के आस पास के थे। दोनों ही बचपन के दोस्त थे। उन का दोस्ताना अब तक अपनी बुलंदी पर
था। उन्हें उम्मीद थी कि उन का दोस्ताना आजीवन चलेगा। पूछा कि , ' इंडिया कैसे आना हुआ ? कोई ख़ास काम ?'
' नो
वर्क , वनली ट्रेवलिंग। '
पता चला दोनों गज़ब के घुमक्क्ड़ हैं। घुमक्क्ड़ी उन का नशा है , पैशन है। हर साल वह कहीं न कहीं घूमने के लिए
निकल जाते हैं। हर साल कम से कम एक महीना दुनिया का कोई न कोई देश घूमते हैं। उस
ने उन के मामूली कपड़ों पर नज़र डालते हुए पूछ लिया है , ' फिर तो आप लोग काफी पैसे वाले , रिच लोग हैं। '
' नो , नो ! नाट रिच। ' वह दोनों बताते हैं कि एक दोस्त छोटी सी नौकरी में है। जब कि दूसरे
की एक छोटी सी दुकान है। लेकिन घूमना उन का जूनून है। विद्यार्थी जीवन से ही उन को
घूमने का नशा है। पहले फ़्रांस के भीतर ही दोनों साथ-साथ घूमते थे , अब पूरी दुनिया घूम रहे हैं। सो हर महीने इस
घूमने के लिए छोटी-छोटी बचत करते रहते हैं। जहां भी जाते हैं पूरी प्लानिंग कर के
जाते हैं। गूगल आदि से हर जगह के बारे में जानकारी इकट्ठा करते हैं। दूरी , खर्चा सब का गुणा भाग करते हैं। अमूमन पेइंग
गेस्ट का ऑप्शन लेते हैं। या फिर कोई सस्ता गेस्ट हाऊस। होटल तो कभी सोचते ही
नहीं। सामान बहुत कम रखते हैं। इस बात पर उस ने चेक किया कि उन दोनों के पास एक-एक
हैण्ड बैग ही है। जिन में चार , छह
कपडे से ज़्यादा की जगह नहीं है। तब जब कि वह महीने भर से इंडिया घूम रहे हैं।
दूसरी तरफ वह है जो सिर्फ़ चार दिन के लिए बनारस आया था लेकिन बड़ा सा सूटकेस ले कर।
उसे अपनी बेटी की कही बात याद आ जाती है , ' पापा
कहीं जाइए तो कम से कम सामान ले कर चला कीजिए। आराम रहता है। ज़्यादा सामान रहने से
आदमी घूमता कम है , सामान ज़्यादा ढोता है। ' पर जाने क्यों वह दो दिन के लिए भी कहीं जाता
है तो कम से कम चार , छह सेट कपड़ा रख कर चलता है कि पता नहीं
क्या पहनने का मन कर जाए। और वह न रहने पर अफ़सोस हो। हां , जहाज की वजन सीमा ने ज़रूर ज़्यादा सामान ले कर
चलने पर ब्रेक लगा दिया है। लेकिन इन फक्क्ड़ फ्रांसीसियों को देख कर लगता ही नहीं
कि इतने कम कपड़ों में भी महीना भर घूमा जा सकता है। वह उन से पूछता भी है , ' इतने कम कपड़ों में कैसे काम चलता है ? '
' कोई
दिक्कत नहीं होती। ' वह बड़े ठाट से बताता है , ' घूमने आए हैं , कपड़ा पहनने नहीं। ' उस
का दूसरा साथी जैसे जोड़ता है , '
हियर
नो फैशन परेड ! '
' अच्छा
, जब कपड़े गंदे हो जाते हैं तब ? '
' जहां
ठहरते हैं , वहीँ साबुन से धो कर सुखा लेते हैं। '
' लांड्री
में नहीं देते ? ‘ वह पूछता है।
' नो
!' वह बोलता है , ‘ यह तो खर्चा बढ़ाना हुआ। '
वह दंग है फ्रांसीसियों की इस सादगी पर। उन की इस कमखर्ची पर।
' अच्छा
आप लोग सपरिवार क्यों नहीं घूमते। बिना परिवार के घूमने पर आप उन को मिस नहीं करते
? ' वह जोड़ता है , ‘ बिना परिवार के कहीं घूमना मुझे नहीं भाता ।
मिस करता रहता हूं , वाइफ को , बच्चों को । '
' मिस
तो हम भी करते हैं। ' एक फ्रांसीसी बोला , ' लेकिन कभी-कभी विद फेमली भी घूमने निकले हैं।
पर एक तो खर्च ज़्यादा हो जाता है। दूसरे , हर
साल बीवियां घूमना नहीं चाहतीं। ' दूसरे फ्रांसिसी ने बीच में जोड़ा , ' जूनून नहीं है
ट्रेवलिंग का उन लोगों में । शौक नहीं है। '
' ओ
के। ' कह कर उस ने पूछ लिया है कि , ' बनारस कैसा लगा ? '
' शानदार
! गंगा और गंगा का किनारा। हटने का , छोड़ने
मन नहीं करता। आरती , बोटिंग आल थिंग , वेरी व्यूटीफुल। ' तब तक दूसरा फ्रांसीसी , फ्रांसीसी लहजे में बोला , ' हर हर गंगे , हर हर महादेव ! ' फिर
दोनों ही बनारसीपन के विवरण और उस के विस्तार में आ गए । बताने लगे कि शहर कोई भी
हो , अमूमन वह शहर को भी ज़्यादातर पैदल चलते
हुए देखते हैं। टैक्सी वगैरह से बचते हैं।
' क्या
आप लोग स्प्रिचुवल हैं ?
' उस ने उन्हें
कुरेदने की कोशिश की।
' नो , नो ! ' दोनों
एक साथ बोले , ' वी आर वनली फनी !' एक ने जैसे जोड़ा , ' फनी ट्रेवलर !' वह बनारस और बनारसी लहजे को अख्तियार करने की कोशिश करते हैं। किसी
भी टूरिस्ट की तरह बनारस उन्हें भा गया है। सारनाथ भी गए थे एक दिन। दोनों बताने
लगे हैं कि वह तो चार दिन बनारस रह कर लौट रहे हैं। बनारस में और रहना चाहते थे।
मंदिर , गंगा और घूमना चाहते थे। लेकिन फरदर
प्लान और रिजर्वेशन के कारण वह जल्दी लौट रहे हैं। वह उन्हें बनारस और मोक्ष के
विवरण में ले जाता है। तो एक फ्रांसीसी
बोला , ' यस यस आरती। हम ने आरती देखी है। गंगा
आरती। व्यूटीफुल !'
' आप
को मालूम है कि पौराणिक कथाओं के मुताबिक बनारस , जिस का एक नाम काशी भी है , भगवान
शिव के त्रिशूल पर बसी है। धरती पर नहीं। '
' ओह
नो , डोंट नो। '
पर वह उन्हें राजा हरिश्चंद्र , उन
के सत्य , दान और डोम की नौकरी का किस्सा अपनी
टूटी-फूटी अंगरेजी में नैरेट करता है। दोनों यह किस्सा मुंह बा कर सुनते हैं। सुन
कर बोलते हैं , हाऊ इट्स पॉसिबिल ! '
' बट
इट वाज !' वह आहिस्ता से बताता है।
वह दोनों कंधे उचका कर रह जाते हैं।
फिर वह बनारस का डिटेल बताने लगते हैं। डिटेल बताते-बताते एक जगह विस्मय से
उन की आंखें फैल जाती हैं। उन का विस्मय है कि यह कैसे संभव है कि एक ही सड़क पर
सांड़ , गाय और आदमी एक साथ चलते हैं। ख़ास कर
बनारस की सड़कों पर जगह-जगह सांड़ का उपस्थित होना , उन का गोबर में लिथड़े होना , उन्हें
कतई अच्छा नहीं लगा है। यह बताने पर कि काशी की एक पहचान में यह भी शुमार है। रांड़
, सांड़ , संन्यासी
की अवधारणा भी बताता है वह । पर दोनों फ़्रांसिसी इसे ठीक नहीं मानते। मुंह बिचका
कर रह जाते हैं।
उन्हें हर हर महादेव की याद दिलाते हुए बताता हूं कि सांड़ के ही
प्रतिरुप बंसहा बैल यानि नंदी महादेव की सवारी कही जाती है। तो एक फ़्रांसिसी बोला , ' इट्स ओके , बट
वेरी हारेबिल !'
कोई स्टेशन आ गया है। कोई ट्रेन में चढ़ रहा है , कोई उतर रहा है। गहमागहमी सी है। हमारे ऊपर की
ख़ाली बर्थ पर एक फैशनेबिल महिला आ गई हैं। चाहती हैं कि मैं ऊपर चला जाऊं और वह
नीचे की बर्थ ले लें। विनय पूर्वक मना करता हूं। बताता हूं कि हम लोग साथ हैं और
हमारी बातचीत चल रही है। महिला दोनों फ्रांसीसियों को घूरती है और उस से पूछती है , ' आप इन के गाइड हो ? '
' नहीं
, सहयात्री हूं !'
महिला मुंह बनाती हुई ऊपर के बर्थ पर चली गई है। ट्रेन चल पड़ी है। वह
बाहर देख रहा है। किसी खेत में झुंड की झुंड महिलाएं पानी भरे खेत में धान रोप रही
हैं। वह सोचता है कि शायद धान रोपती यह औरतें कोई लोकगीत भी ज़रुर गा रही होंगी।
जैसे उस के गांव में गाती हैं। उधर ऊपर की बर्थ से महिला की नाक बजने लगी है
दिनदहाड़े। इधर दोनों फ्रांसीसियों से उस की बातचीत जारी है। वह बता रहे हैं कि यह
सफ़र उन का आगरा के लिए है। तीन दिन वह आगरा में रुकेंगे। ताजमहल देखेंगे। मथुरा और
वृंदावन भी। फतेहपुर सीकरी भी। पेइंग गेस्ट के रूप में उन की जगह बुक है छह सौ
रुपए प्रतिदिन के हिसाब से। बनारस में भी छह सौ रुपए प्रतिदिन के हिसाब से रुके
थे। इंटरनेट ने सब कुछ बहुत आसान कर दिया है। वह बता रहे हैं कि फ़्रांस से भी वह
पहले दिल्ली आए थे। आगरा से होते हुए दिल्ली लौटेंगे। वहां भी रुकने की जगह बुक है।
दिल्ली से फ़्रांस के लिए एयर टिकट बुक है।
भारत घूम कर दोनों फ़्रांसिसी बहुत खुश हैं। यह पूछने पर कि , ' क्या वह फिर भारत घूमने आएंगे ? '
' श्योर
। अभी साऊथ इंडिया हमारे प्लान में है। ' वह
बोले , ' इस बार नार्थ इंडिया का ही प्लान था। '
' कभी
नार्थ ईस्ट का भी प्लान कीजिए। '
' श्योर
! ' कहते हुए उन के हाथ में इंडिया का
नक्शा आ गया है।
' और
किन-किन देशों की यात्रा कर ली है उन्हों ने ? '
' पूरा
यूरोप , पूरा अमरीका। ' एक फ़्रांसिसी बोला , ' अब इधर की बारी है। '
' चीन
गए हैं कभी ? '
' यस।
बट चीन इज वेरी चीटिंग कंट्री। कदम कदम पर चीटिंग है। ' कहते हुए दोनों फ्रांसीसियों के चेहरे का ज़ायका
बिगड़ गया है। '
' और
पाकिस्तान ? '
' नो , नो ! ' एक
फ़्रांसिसी अपना चेहरा बिगाड़ते हुए बोला , ' सोच
भी नहीं सकते। '
' क्यों
? '
' इट्स
टेररिस्ट कंट्री। नाट सेफ फार टूरिस्ट। ' वह
बोला , ' नेवर !' उस के चेहरे पर अजब सी दहशत थी। पेरिस में दिल दहला देने वाली
आतंकवादी घटनाओं की तफसील में दोनों फ़्रांसिसी आ गए। बहुत देर तक वह उसी तफ़सील में
उलझे रहे। बिस्किट खाते हुए , चाय
पीते रहे और पेरिस को इस्लामिक आतंकवाद ने कैसे तहस नहस कर दिया था , देखते ही देखते कितने लोगों की जान चली गई थे
के डिटेल में वह आ गए थे। भूल गए थे काशी की गंगा और उस का दिलकश नज़ारा। आरती और
बोटिंग। सांड़ और उस की विद्रूपता। आगरा के ताजमहल की ख़ूबसूरती की चर्चा भी वह करना
भूल गए। गनीमत थी कि लखनऊ आ गया था। मैं उतरने लगा तो डब्बे से उतर कर वह दोनों
फ़्रांसिसी भी प्लेटफार्म पर आ गए। उसे सी आफ करने। दोनों उस से गले लगे और सेल्फी
ली। लेकिन उन के चेहरे पर आतंक की इबारत जैसे तारी थी।
स्टेशन से वह घर आ गया है। नहा-धो कर बिस्तर पर मसनद लगा कर बैठ गया
है। पर उस के कान में अभी भी गूंज रहा है , ' फनी
ट्रैवलर ! ' साथ ही वह सोचता है , कभी अवसर मिला , पैसा इकट्ठा हुआ तो वह भी दुनिया घूमेगा। कम से कम फ्रांस तो घूमेगा
ही। ऐसा सोचते ही उस ने नेट पर फ़्रांस के बारे में जानकारियां सर्च करनी शुरु कर
दी है। उसे याद आ गया है कि उस के शहर की यूनिवर्सिटी के इतिहास विभाग के लेक्चरर
जो कभी अंग्रेजीदां थे पर फ्रांस से रिसर्च कर जब लौटे थे तो कहते थे , ' यह तो फ्रांस जा कर ही समझ में आया , 'निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटन न हिय के सूल !' भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रसिद्ध कविता निज
भाषा का यह दोहा , वह जब तब सुनाते रहते थे। उस ने पाया
कि वह दोनों फ्रांसीसी सह यात्री भी अंगरेजी के बजाय फ्रेंच की किताब पढ़ रहे थे।
अंगरेजी उन की भी तंग थी ,
जैसे कि उस की है। वह पत्नी से चर्चा
करते हुए बताता है कि , '
मालूम है सफ़र में आज दो परदेसी मिल गए
थे। ' अचानक वह बात बदलता है कि , ' परदेसी नहीं , फ्रांसीसी मिले थे। दो फ्रांसीसी ! '
' परदेसी
कहा पहले फिर फ्रांसीसी कह रहे हैं। फ़र्क़ क्या है ? थे तो विदेशी ही। ' पत्नी
ने प्रतिवाद किया है।
' विदेशी
और फ़्रांसिसी में फ़र्क़ है। ' वह
बोला , ' फिर वह फनी ट्रैवलर थे। अपनी भाषा से
प्यार करने वाले। ' जल्दी ही वह पत्नी से फ्रांस यात्रा की
कल्पना करते हुए बताता है ,
थोड़ा-थोड़ा पैसा बचाते हैं। साल नहीं , तो दो-तीन साल में सही , फ़्रांस चलते हैं।
' न
नौ मन तेल होगा , न राधा नाचेगी ! ' कह कर पत्नी , कंबल ओढ़ कर लेट गई है। उस का मन हुआ है कि ए सी बंद कर दे। ताकि कोप
भवन का कंबल हट जाए। और उठ कर उस ने ए सी बंद कर दिया है। नींद आ गई है। सपने में
वह फ्रेंच सीखने लगा है।
-18-
ख़ामोशी
कामरेड मनमोहन की इन दिनों चांदी ही चांदी थी। सोने के दिन उन के लिए
जैसे प्रतीक्षारत ही थे। बेटे को कैट का इम्तहान दिलाने के लिए वह एक कालेज के
बाहर कार में उठंगे हुए बैठे थे। फॉरच्यूनर कार का शीशा बंद कर के। अचानक उन्हें
कुछ ज़्यादा पानी पीने , कुछ ए सी की ठंडक के चलते पेशाब की तलब
लगी। वह कार से उतरे। जगह खोजने लगे। अचानक उन का एक पुराना क्लासफेलो दिख गया। वह
अनमने हुए। कोशिश की कि वह उन्हें न देखे। एक कार के कोने में जा कर वह जिप खोल ही
रहे थे कि कार के भीतर बैठी एक औरत चिल्लाई , यह
क्या हो रहा है। वह वहां से हटे। थोड़ी दूर झाड़ देख कर जिप खोल दी। वहां भी किसी ने
टोका। लेकिन वह पुरुष था। सो उन्हों ने उस की परवाह नहीं की। पेशाब कर ज्यों पलटे
वह क्लासफेलो सामने आ गया। बोला , ' क्या
कामरेड ! यही करेंगे ? भाषणों में आग मूतते-मूतते कहीं भी
पैंट खोल कर मूत देंगे ?'
' क्या
करें यार , प्रेशर बहुत तगड़ा था। '
' तो
कहीं भी ? ' वह बोला , ' इधर किसी के घर का दरवाज़ा है। परिवार है। '
' ठीक
है , ठीक है। अब हो गया। ' मनमोहन जी बोले , ' और क्या हो रहा है ? '
' कुछ
नहीं बेटी को कैट का इम्तहान दिलवाने आया था। और आप ? '
' मैं
भी बेटे को लाया हूं , कैट के लिए ही। '
' क्या
? ' वह चौंकता हुआ बोला , ' और बेटा जो सेलेक्ट हो गया तो उस की फीस कैसे
भरेंगे। '
' भर
दिया जाएगा , लोन वगैरह ले कर। ' पीछा छुड़ाते हुए वह बोले। वह किसी तरह
क्लासफेलो से पीछा छुड़ा कर अपनी कार में आराम करने जाना चाहते थे। पर यह था कि
गोंद की तरह चिपका जा रहा था। मनमोहन जी उसे अपनी कार भी नहीं दिखाना चाहते थे।
क्यों कि फिर यह उस पर भी सवाल उठा सकता था।
' लेकिन
कामरेड आप तो मल्टी नेशनल कंपनियों , पूंजीपतियों
के खिलाफ बोलते और सोचते हैं। ' फिर
बेटा एम बी ए कर के किसी पूंजीपति , किसी
मल्टीनेशनल की ही नौकरी करेगा। फिर आप के सिद्धांत और पूंजीवाद से लड़ाई का क्या
होगा ? '
' अरे
, अपना काम भी शुरू कर सकता है , बिना मल्टीनेशनल या पूंजीपति की नौकरी किए। '
' वाह
! फिर तो वह खुद पूंजीपति बन जाएगा। ' वह
बोला , ' यह तो और ख़तरनाक होगा। '
' तो
क्या किया जाए ? बच्चों का सपना तोड़ दिया जाए ?'
' बिलकुल
नहीं। बच्चे जो करना चाहें करने दिया जाए। ' वह
बोला , ' लेकिन दूसरों के बच्चों को बहकाना भी
बंद कर दिया जाए। '
' कौन
बहका रहा है ? ' वह खीझता हुआ बोला।
' कामरेड
आप। आप के और आप जैसों के भाषण। ' वह
बहुत धीरे से बोला , ' आप के सिद्धांत। '
मनमोहन जी निरुत्तर थे। सो बोले , ' छोड़ो
यह सब और बताओ। '
' बताना
क्या , बस परिवार की गाड़ी किसी तरह खींच रहा
हूं। ' वह बोला , '
नेता तो हूं नहीं कि भाषण कुछ , जीवन कुछ। कामरेड भी नहीं हूं कि सब से
सिद्धांत बघारुं , लोगों को पागल बनाऊं और खुद व्यावहारिक
बना रहूं। '
' तुम
इतना व्याकुल भारत क्यों बने जा रहे। '
' व्याकुल
भारत नहीं हूं। अपने जैसे लोगों के भारत की बात बता रहा हूं। '
' अच्छा
तो फिर कभी मिलते हैं। ' कहते हुए मनमोहन जी ने क्लासफेलो की
तरफ हाथ मिलाने के लिए हाथ बढ़ा दिया। हाथ बढ़ा दिया कि अब वह और बहस नहीं चाहते।
छुट्टी चाहते हैं। वैसे भी धूप अब उन्हें और बर्दाश्त नहीं हो रही थी। क्लासफेलो
को यह अचानक अच्छा नहीं लगा। लेकिन हाथ मिला कर छुट्टी ली। मनमोहन जी इधर-उधर करते
हुए धीरे से अपनी कार में घुस गए। क्लासफेलो ने उन्हें फॉरच्यूनर कार में बैठते
हुए देख लिया और समझ गया कि कामरेड उस से क्यों बिदकते हुए चले गए। वह ज़रा रुका और
कामरेड की कार की तरफ बढ़ा। कामरेड की कार के शीशे पर नॉक किया। पर तब तक कामरेड
बीयर की चिल्ड बीयर खोल कर पीना शुरू कर चुके थे। क्लासफेलो को देख कर मनमोहन जी
फिर बिदके। लेकिन धीरे से दरवाज़ा खोल कर कहा , ' आओ , आओ ! ' क्लासफेलो
कार में हिचकते और चिहुंकते हुए बैठ गया। मनमोहन जी ने उस से पूछा , ' बीयर पियोगे ? '
' नहीं-नहीं।
मैं यह सब नहीं पीता। '
' अरे
बीयर है। '
' मैं
तो कोल्ड ड्रिंक भी नहीं पीता। '
' ठीक
है , ठीक है। रिलैक्स ! '
' एक
बात बताइए कामरेड ! '
' क्या
? '
'आप
तो मज़दूरों के नेता हैं। कामरेड हैं। आफिस भी देखा है कि पहले साइकिल से आते थे।
फिर रिक्शा से आते थे.अब ऑटो या ई रिक्शा से आते हैं। और यहां इतनी बड़ी और इतनी
मंहगी कार में। वह भी बीयर पीते हुए। ' वह
बोला , ' यह क्या है कामरेड ! '
' कुछ
नहीं है डियर। सब क़िस्मत है। '
' किस्मत
है कि चोंचला। ' ज़रा रुक कर वह बोला , ' फिर आप कब से क़िस्मत पर यक़ीन करने लगे ? आप तो नारा लगाते हैं , ' कमाने वाला खाएगा ! '
' नारा
लगाना गुनाह है ? '
' गुनाह
तो नहीं है। पर नगर निगम की नौकरी की तनख्वाह में आप यह कार तो एफोर्ड नहीं ही कर
सकते। '
' हम
कहां एफोर्ड कर पा रहे हैं। '
' फिर
?'
' बड़ा
बेटा , ठेकेदार है। उसी की कार है। मेरी नहीं।
'
' अच्छा
कामरेड के बेटे अब ठेकेदारी करने लगे हैं। बढ़िया है। ' कह कर वह बोला , ' अच्छा तो इजाज़त दीजिए। आप के आराम में ख़लल डाला , माफ़ कीजिएगा कामरेड ! '
'अरे
बैठो भी यार ! '
' क्या
बैठें , हमारी किस्मत ऐसी कहां। '
' कितने
जूते मारोगे ? पुराने दोस्त हो। बैठो भी। और बंद भी
करो मुझे जूते मारना। बाहर जा कर जाने किन-किन से मेरी ऐसी-तैसी करोगे। ' वह बोला , ' मेरी
मारते फिरोगे। '
' काहे
भला ! ' वह बोला , ' कामरेड सही ही कह रहे थे आप कि किस्मत की बात
है। नहीं पढ़ाई में मैं फर्स्ट डिवीजनर था , आप
फेलियर टाइप के। सरकारी नौकरी मुझे भी मिली। आप को भी। बल्कि सचिवालय में मुझे
नौकरी मिली। आप को नगर पालिका में। बाबू हो कर भी आप कामरेड बन गए , नेता बन गए। भाषण देने लगे। शहर के फिगर बन गए।
बड़ी सी मोटर में घूमने लगे। पर मैं खटारा स्कूटर ही ढकेल रहा हूं और आप शानदार कार
में। बाई द वे कौन सी कार है ? बहुत
मंहगी होगी। '
' अब
क्या पता। यह तो बेटा जाने। ' कह
कर मनमोहन जी ने पल्ला झाड़ लिया। फिर बोले , ' यह
बताओ जिस निर्मला के पीछे तुम पागल हुए घूमते थे , उस का कुछ आता-पता है ? '
' हां
, है तो। '
' कहां
है ?'
' इसी
शहर में है। एक आई ए एस अफसर की बीवी है। ' उदास
हो कर वह बोला।
' अरे कैसे पता चला ?
फिर
तो बड़े काम की चीज़ है। '
' उस
का पति एक बार मेरा बॉस बन गया। तो घर गया किसी काम से। तब पता चला। मैं ने उसे
देखा , और वह भी न देख ले मुझे कहीं , सो फौरन छुप गया। फिर उस के घर नहीं गया कभी। '
' ओह
! पर क्यों ?
' कामरेड
इस लिए कि जैसे आप मुझे लगातार यहां जलील किए जा रहे हैं। झूठ पर झूठ बोल कर मुझे
जूते मारते जा रहे हैं वैसे ही कहीं वह भी अपमानित करने लगती। मुलाजिम समझ कर आदेश
देने लगती। डांटने लगती। तू-तड़ाक करने लगती तो क्या करता। ' कहते हुए वह मायूस हो गया। बोला , ' आदमी , आदमी
की बेइज्जती नहीं बर्दाश्त कर पाता। फिर वह तो औरत है। तिस पर बॉस की बीवी। आई ए
एस की बीवी। आई ए एस वैसे भी खुदा होता है। कब किस मुलाजिम की ज़िंदगी बना-बिगाड़ दे
, कोई नहीं जानता। '
' सो
तो है ! '
' निर्मला
! अरे फिर मैं उस के पति के सामने भी कभी नहीं पड़ा। ' वह बोला , ' औरत
और अफसर दोनों से डर कर रहना ही सीखा है , इस
नौकरी में। मिडिल क्लास मीडियाकर बन गया हूं। किसी तरह परिवार चला रहा हूं। खर्च
चलाना मुश्किल हो गया है। ' वह ज़रा रुका और बोला , ' आप
ने चेक नहीं किया कि आप मुझे तब से तुम-तुम कह रहे हैं और मैं आप को आप-आप। जानते
है क्यों ? मैं अपनी औक़ात जानता हूं। बेशर्म तो
हूं नहीं। कामरेड तो हूं नहीं। कि आप की तरह झूठ बोलूं। पाखंड करुं । '
' तभी
से आप-आप कह कर भी जुतियाए जा रहे हो मुझे। फिर भी कह रहे हो कि !'
' अच्छा
तो कामरेड अब चलूं। इस कार में अब मेरा दम घुट रहा है। '
' अरे
, मैं सिगरेट फेंक देता हूं। बैठो तो सही। '
' सिर्फ़
सिगरेट से नहीं। इस माहौल से भी। ' कह
कर वह कार का फाटक खोलने लगा। नहीं खोल पाया तो मनमोहन जी ने खोल दिया।
वह चला गया तो मनमोहन जी सोच में पड़ गए।
पुराने दिनों की यादों में खो गए। याद आया कि क्लास में बात-बेबात
यही आदमी तेजू खां बना रहता। सभी अध्यापक इस की तारीफ़ करते। यह अच्छे नंबर भी
लाता। फर्स्ट डिवीजनर था। झुकता तब भी नहीं था। जैसे आज नहीं झुका। उन्हें अपने आप
पर खीझ आई और शर्म भी। यह तो फिर भी कार में अकेले जूतिया गया। पर याद आया ऐसे ही
एक समय एक कामरेड कवि भी उन्हें कैसे तो सरे आम बेइज्जत कर गया था। साथ में एक
पत्रकार भी था। हुआ यह कि उन दिनों मनमोहन जी कैश का काम देखते थे। तो एक दिन यह
कवि और पत्रकार आफिस आ गए। लाल सलाम कामरेड ! कहते हुए कैश केबिन के बाहर ही बैठ
गए। मनमोहन जी ने उन्हें कैश केबिन के भीतर ही बुला लिया। दो एक्स्ट्रा कुर्सियां
मंगवा कर बैठा लिया। यही ग़लती हो गई। बात करते हुए काम भी करते रहे। उस दिन स्वीपर
के वेतन के कुछ पेमेंट इन कामरेड साथियों के सामने करना बहुत भारी पड़ गया। हुआ यह
कि कुछ दस्तूर , कुछ आदतन हर स्वीपर के वेतन से फुटकर
नहीं है के बहाने दस , पांच रुपए काटते गए। यह रुटीन था। कुछ
ख़ास बात नहीं थी। जब लंच टाइम हुआ तो दोनों कामरेड साथियों को ले कर चाय की दुकान
पर चले गए। चाय-नाश्ते के बाद जब मनमोहन जी पेमेंट करने लगे तो कवि कामरेड भड़क
गया।
' जमादारों के शोषण के पैसे की चाय हम
नहीं पी सकते। हमें हजम नहीं होगी। ' भड़कते
हुए कामरेड कवि बोला।
' क्या
बेवकूफी की बात कर रहे हैं ? ' मनमोहन
जी कवि के आक्रोश पर पानी डालते हुए बोले। साथ बैठे हुए पत्रकार ने भी हाथ के
इशारे से उन्हें चुप रहने को कहा। लेकिन कवि तो भड़क कर शोला बनने को आमादा था।
किसी भी तरह क़ाबू आने को तैयार नहीं था।
' क्या
दिन दहाड़े पी कर आ गए हो ?
' मनमोहन जी
आहिस्ता से भड़के।
' हां
, पी कर आया हूं। तो ? ' कवि अब फुल वॉल्यूम में था। दहाड़ते हुए बोला , ' जो भी हो जमादारों के पैसे की चाय नहीं पी
सकता। ' पत्रकार की तरफ मुखातिब होते हुए कवि
बोला , ' पेमेंट
आप कर दीजिए। मैं बाद में आप को दे दूंगा। '
' लेकिन
पैसे तो इतने मेरे भी पास नहीं हैं कामरेड । ' बात
को टालते हुए पत्रकार बोला , ' जब
टेंट में पैसे नहीं हैं तो फिजूल की क्रांति बंद करो। चुपचाप बैठ जाओ। कामरेड
मनमोहन शरीफ़ आदमी हैं। सरे आम इन की टोपी मत उछालो। इन के आफिस के लोग भी यहां हो
सकते हैं। ' दुहराया उस ने , ' शांति से बैठ जाओ। '
लेकिन कामरेड कवि बैठने के बजाय दुकान के काउंटर पर उछलते हुए गया और
बोला , ' जो भी , जितना बिल है , मेरा
नाम लिख कर , मेरे नाम के आगे लिख लीजिए। ' फुल वॉल्यूम में बोला , ' शरीफ आदमी हूं। कवि हूं। यक़ीन कीजिए , पैसे होते ही जल्दी से जल्दी पेमेंट कर दूंगा।
लेकिन जमादारों का शोषण करने वाले इस हरामखोर कामरेड की चाय नहीं पी सकता। ' कवि फुल फ़ार्म में था। इधर से मनमोहन जी ने
दुकानदार को इशारा किया कि वह बात मान कर मामला ख़त्म करे। दुकानदार तजुर्बेकार था।
कवि की हां में मिलाई। इज्ज़त दी। उन का नाम लिखा। कवि दहाड़ा , ' नाम के आगे पैसे नोट कीजिए। ' दुकानदार ने पैसे भी नोट कर दिए। इस के बाद जेब
में हाथ डाल कर विजेता भाव से कामरेड कवि दुकान से निकला। पीछे-पीछे मनमोहन और
पत्रकार भी। दुकान से निकलते ही तीनों कामरेड फिर अगल-बग़ल हो गए। कवि को इंगित
करते हुए किचकिचा कर बोले ,
' दिमाग ज़्यादा
ख़राब हो गया है। कितने हज़ार रुपए मुझ से उधार ले चुके हो , कुछ याद है ? ' मनमोहन फिर धीरे से बोले , ' सारे
शहर की उधारी तुम पर है। किसी को एक पैसा कभी वापस किए हो। हरदम कोई न कोई बहाना
बना कर , दुनिया भर के झूठ बोल कर जिस-तिस से
पैसा उधार लेना तुम्हारा पेशा बन गया है। कभी बीवी बीमार , कभी बेटा बीमार। कभी बाप मार देते हो , कभी मां। जाने कितने बाप हैं , कितनी मां। शहर-शहर में तुम्हारी उधारी और शराब
के क़िस्से आम हैं। आए दिन तुम्हारी शराब की व्यवस्था भी मैं करूं। जब-तब तुम्हारे
घर का खर्च भी उठाऊं। कब तक अपने कवि को बेचते रहोगे , एक शराब की हरामखोरी खातिर। ' वह थोड़ा कर्कश हुए , ' और तुम्हें कोई कविता लिखे भी कितने बरस हुए
कामरेड कुछ याद भी है ? '
' याद
है। सब याद है। ' कवि भी अब मद्धम सुर में आ गए। बोले , ' पर जमादारों का पैसा ! बर्दाश्त नहीं हुआ। क्या
करूं। ' वह धीरे से बोले , ' दस हज़ार जमादार भी हों नगर निगम में तो दस रुपए
काटने पर महीने का कितना पैसा हुआ जोड़ा है कभी कामरेड ? ' थूकते हुए कवि बोले , ' थू है तुम्हारी कामरेडशिप पर कामरेड मनमोहन ! ' वह तड़के , ' अब
तो लाल सलाम बोलना भी हराम है , कामरेड
मनमोहन ! जाने और कितने गुल खिलाते होंगे कामरेड ! ' वह बोला , '
लाख गिरा , और लाख शराबी और उधारी में जीता हूं पर कोशिश
करूंगा कि अब मुलाक़ात न ही हो। जाने अब सो भी पाऊंगा कि नहीं। '
' भाग
यहां से कुत्ते। मत मिलना कभी। आज सरे आम मेरी इज्जत उछाल दी एहसानफरामोश ! ' इतना सुनते ही कवि मनमोहन को मारने के लिए टूट
पड़ा। पत्रकार ने किसी तरह बीच-बचाव किया। गुत्थमगुत्था हुए दोनों को छुड़ाया। कहा , ' क्या कर रहे हैं कामरेड आप लोग। कुछ तो शर्म
कीजिए। ' कवि छूटते ही पत्रकार से बोला , ' कामरेड अपनी पॉलिटिक्स अभी फाइनल कर लीजिए।
मेरे साथ चलना है या यहीं इस भ्रष्ट आदमी के साथ अपनी कामरेडशिप को दफ़न करना है।
फौरन फ़ैसला लीजिए। ' पत्रकार चुप रहा।
' ओ
के। समझ गया। ' हाथ माथे पर ले जा कर सैल्यूट मारते
हुए कवि बोले , ' लाल सलाम ! '
मनमोहन के आफिस के पास ऐसा कुछ कभी घट जाएगा , कभी सोचा नहीं था। पर घट गया था। पत्रकार को
विदा करते हुए आफ़िस पहुंचे। मन नहीं लगा तो तबीयत बिगड़ने की बात कह कर वह घर चले
गए।
मनमोहन के साथ ऐसा कुछ अब अक़सर घटने लगा। जल्दी ही मार्च आ गया। रोज
ही ब्रीफकेस भर-भर कर ले जाने लगे। हर मार्च का यही हाल था। एक दिन ठेकेदारों से
अच्छा कमीशन मिल गया था। 25
-30 लाख। ब्रीफकेस
डिजिटली लॉक कर चपरासी को दे दिया। आफिस से निकल कर ऑटो में ज्यों बैठे , चारो तरफ से इंटेलिजेंस वालों ने धर लिया।
चपरासी पीछे-पीछे ही था। घेरघार होते देख वह जहां था , वहीं रुक गया। ऐसे , जैसे किसी गरमी में हवा रुक जाए। चपरासी
होशियार था। माजरा समझते ही वह किसी दूसरे ऑटो में बैठ कर धीरे से निकल गया। उस
दिन अपने घर भी नहीं गया। मनमोहन जी की जामा-तलाशी हुई। हज़ार , बारह सौ रुपए ही उन के पास से निकले। जो
सामान्य बात थी। जाहिर है आफिस या बाहर से ही किसी ने इंटेलिजेंस को ख़बर की होगी।
वह तो चपरासी की होशियारी से वह बच गए। नहीं जो लाखो रुपए के साथ पकड़े गए होते तो
नौकरी से तो जाते ही। अखबारों में फ़ोटो छपती। सारी इज्जत मिट्टी में मिल जाती।
कामरेडशिप की हवा निकल जाती।
रंगे हाथ पकड़े जाने पर जमादारों का प्रदर्शन भी काम नहीं आता। क्यों
कि अमूमन होता यही था कि अगर कोई अफ़सर मनमोहन के खिलाफ ज़रा भी दाएं-बाएं होता , वह किसी न किसी बहाने जमादारों का प्रदर्शन
करवा देते। हड़ताल करवा देते। जमादारों के वेतन से भले फुटकर के बहाने वह हर बार
दस-बीस रुपए काट लेते थे पर जमादार लोग उन से खुश रहते। क्यों कि मनमोहन उन के
अटेंडेंस वगैरह वैरिफाई करने आदि के अड़ंगे नहीं लगाते। दस दिन के अटेंडेंस पर भी
पूरे महीने का वेतन रिलीज कर देते। यह कहते हुए , इतना मत गायब रहा करो यार ! जमादार तो जमादार लोग तो कंडक्टर अगर बस
में टिकट के दो रुपए कम ले तो टिकट लेना भूल जाते थे। यह नहीं सोचते कि बिना टिकट
पकड़े जाने पर जेल खुद जाएंगे। या जुर्माना भरेंगे। तो यह तो जमादार थे। मनमोहन की
नज़र में यह सभी कामरेड भी थे। नगर निगम से अलग भी कभी कोई धरना-प्रदर्शन होता तो मनमोहन
के कहने पर यह जमादार लोग ,
जिन्हें मनमोहन कभी कामरेड कहते तो बड़े
प्यार से स्वच्छकार कहते। फुल रिस्पेक्ट दे कर , प्यार से बात करते तो यह स्वच्छकार लोग भी मनमोहन पर जान लुटाते। बाहर भी मनमोहन की कामरेडशिप का
सिक्का इन स्वच्छकारों के कारण चलता।
चूंकि स्वच्छकारों में उन की कामरेड की छवि थी सो वह लोग कोई
छोटा-बड़ा काम फंसता तो मनमोहन में ही आसरा खोजते। एक तीस-पैतीस साल का स्वच्छकार
अचानक दिवंगत हो गया। लिवरसिरोसिस से। पी-पा कर सब कुछ गंवा चुका था। अब उस की
बेवा को नौकरी पानी थी। बच्चे छोटे थे। तो पूछते-पाछते वह मनमोहन के पास आई।
मनमोहन ने उस की मदद भी की। उस के हिस्से की दौड़-धूप भी। एक दिन वह अचानक रोने
लगी। मनमोहन ने पूछा क्या हुआ ? बताया
उस ने कि , ' घर में बच्चों को खाने के लिए अब कुछ
नहीं है। सब ने मदद बंद कर दी है। मनमोहन ने उस के आंसू पोछे। उस के घर का पूरा
खर्च संभाला। धीरे-धीरे उस बेवा को भी संभाला। उस की नौकरी भी लग गई। फिर भी वह उस
के घर का खर्च चलाते रहे। और उसे भी। काम पर भी उसे नहीं जाने देते। कहते मेरी
रानी हो , बन-ठन कर राज करो। थी भी वह रूपवती।
गोरी-चिट्टी भी। कुछ साल आराम से बीते। मनमोहन और उस बेवा के। बच्चे बड़े हो गए उस
स्वच्छकार बेवा के। एक रोज अंतरंग क्षणों में मनमोहन से उस ने बड़े बेटे की नौकरी
की बात चलाई। तो वह बोले ,
' घबराओ नहीं।
देखते हैं। ' लेकिन बहुत दिन हो गया , बात बनी नहीं। अब वह बेवा भड़कने लगी मनमोहन पर।
कहने लगी , ' लगता है आप के घर आ कर सब बताना पड़ेगा।
'
' आ
जाओ। जब चाहो। अंडे देने वाली मुर्गी मार डालो। ' वह मजा लेते हुए बोले , ' आजमा
लो यह हथकंडा भी। ' देखो , ' तुम्हारी बात को कोई मानता भी है। मेरे घर ही क्यों सारे शहर को बता
दो। ' वह ज़रा रुके और चश्मे से झांकते हुए
बोले , ' अपनी उमर देखो और हमारी उमर। हमें तो
अब चाहिए नहीं कोई। पर तुम्हें कोई मिलेगा भी अब ? वह भी यह सारा कांड करने के बाद। ' कह तो दिया बेधड़क उस बेवा से मनमोहन ने। पर भीतर-भीतर वह बेहद डर गए।
डर वह बेवा भी गई मनमोहन जी की इस बेफ़िक्री से। बोली , ' माफ़ कर दीजिए। मति मारी गई थी जो आप जैसे देवता
आदमी से ऐसा कह दिया। '
' कोई
बात नहीं मेरी रानी। हो जाती है मोहब्बत में ग़लती भी। ' वह बोले , ' इत्मीनान
रखो , कुछ करते हैं जल्दी ही। '
मनमोहन ने कह तो दिया पर जल्दी ही उस स्वच्छकार बेवा के खिलाफ व्यूह
भी रच दिया। एक दिन बिस्तर में प्रसन्न होने के बाद उसे बाहों में भींचे मनमोहन जी
बोले , ' बेटे को नौकरी देने के लिए तुम्हें
मरना पड़ेगा। '
' क्या
? ' मनमोहन की बाहों से किसी मछली की तरह
छटपटाती हुई छूटती हुई बोली , ' अब
आप मुझे मार डालेंगे ?'
' हां।
'
' कैसे
?'
' घबराओ
नहीं मेरी रानी , सिर्फ़ काग़ज़ पर मरोगी। '
' अच्छा-अच्छा।
' वह निश्चिंत होती हुई बोली , ' काग़ज़ के तो मालिक हैं आप। '
पहले श्मशान घाट से बेवा का मृत्यु प्रमाण पत्र बनवा कर नगर निगम में
रजिस्टर करवाया और मृतक आश्रित के नाम पर उस के बेटे को इत्मीनान से नौकरी दिलवा
दी। बेवा कभी नौकरी पर आती-जाती नहीं थी सो किसी ने गौर भी नहीं किया। उस का जोन
भी धीरे से बदल दिया। कुछ दिन छुट्टी के बाद बेवा का वेतन भी निकलने लगा और बेटे
का भी। बेवा भी खुश और बेटा भी। पर मनमोहन इस बेवा से पिंड छुड़ा लेना चाहते थे।
रास्ता खोज ही रहे थे कि वह दूसरे बेटे की नौकरी के लिए भी पीछे पड़ गई। मनमोहन ने
कहा , ' उसे बालिग़ तो हो जाने दो पहले। '
' आप
काग़ज़ के मीर मालिक हैं। उसे बालिग़ भी बनवा दीजिए और नौकरी भी दिलवा दीजिए , हां। '
मनमोहन ने फिर उस बेवा के बेटे को काग़ज़ पर बालिग़ बनवाया। उस बेवा का
फिर मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाया श्मशान घाट से। नगर निगम में रजिस्टर करवाया। और
मृतक आश्रित में नौकरी फिर दिलवा दी। अब एक ही परिवार के तीन लोग मृतक आश्रित पर
नौकरी कर रहे थे। अब वह स्वच्छकार बेवा डिमांडिंग बहुत हो गई थी। मनमोहन पर जब-तब
रौब गांठती रहती थी। बिस्तर में भी अब सुख देने के बजाय अनाप-शनाप डिमांड कर
उन्हें शूल सी चुभने लगी थी। बेटे की शादी हो गई थी। अब अपनी बहू को भी नौकरी
दिलाने की ज़िद उस की नई ज़िद थी। मनमोहन ने उसे समझाया कि , ' पाप उतना ही करो , जितने में पाप का घड़ा न भरे। अगर घड़ा भर गया तो
बहू की नौकरी तो छोड़ो , तुम तीनों की नौकरी भी जाएगी और जेल भी
होगी। '
बात खत्म हो गई थी तब। पर ख़त्म हो कर भी सचमुच नहीं हुई थी।
संसदीय राजनीति से भले कामरेड निरंतर खारिज होते गए थे। यहां तक कि
नगर निगम में भी कोई एक पार्षद कामरेड नहीं रह गया था पर धरना , जुलूस में यह भारी पड़ते। धरना , प्रदर्शन किसी का भी हो वामपंथियों का या किसी
अन्य दल का भी , मनमोहन के यह कामरेड लोग , मनमोहन के एक इशारे पर खड़े हो जाते। दस , बीस , पचास
रुपए का चंदा भी दे देते यह स्वच्छकार लोग। माइक , दरी तख्त तक की व्यवस्था मनमोहन कब कर देते प्रदर्शनों में , लोगों को पता भी नहीं चलता था। कब सब को चाय
समोसा भी मिल जाता , कोई नहीं जान पाता। पर जानने वाले
मनमोहन को जानते थे। मनमोहन नगर निगम से बाहर भी लोगों के दुःख-सुख में मदद करते।
तो लेखक , कवि , पत्रकारों ,
रंगकर्मियों में भी उन का रुतबा बन गया
था। अचानक लोगों ने पाया कि मनमोहन को कहानी लिखने का भी शौक़ हो गया। अखबारों में
उन की कहानियां भी छपने लगीं। किताब भी आ गई। लोग जानते थे कि इन कहानियों में कुछ
नहीं है पर कहानीकार चूंकि मनमोहन थे , सो
लोग बहुत शानदार कहानी बताते। मनमोहन छोटी पत्रिकाओं , जिन्हें लोग साहित्यिक पत्रिका कहते , उन को विज्ञापन भी दिलवाने लगे। आलोचक , संपादक उन के गुणगान गाने लगे। नाटककार उन की
कहानियों पर नाटक मंचित करने लगे। उन का जहां-तहां सम्मान भी होने लगा। खर्चा गो
कि परदे के पीछे से खुद उठाते थे। कामरेड के अलावा अब वह साहित्यकार भी हो गए थे।
लाल सलाम उन के पास पहले से था। सो लेखन भले न था स्वीकृति रातो-रात मिल गई। जैसा
कि तमाम लाल सलाम वाले लेखकों , कवियों
, आलोचकों , कहानीकारों
को मिल जाता है।
मनमोहन की प्रसिद्धि की तरह आय भी अब काफी बढ़ गई थी। मनमोहन विजिलेंस
छापे के बाद लेकिन काफी सतर्क हो गए थे। ठेकेदारों से बड़े पेमेंट वाले लाखों के
कमीशन अब नक़द लेने के बजाय चेक से लेते। ठेकेदार किसी भी बैंक में , किसी भी नाम से अकाउंट खोल देता। मनमोहन को
दस्तखत कर के चेकबुक थमा देता। पैसे की लिमिट बता देता। अब मनमोहन की मर्जी कि जब
जिस के नाम से जितना अमाउंट कितनी बार निकालें। बियरर निकालें कि अकाउंट पेयी। ऐसा
कि दायां हाथ निकाले , बाएं हाथ को पता न चले। इस के लिए
मनमोहन को बैंक एसोसिएशन वाले कुछ लोगों को पटाना पड़ा। रिश्वत देने वाला संबंधित
व्यक्ति बैंक वालों को भी उन का हिस्सा देता। अकाउंट में अचानक लाखो रुपए आते और
दस-बीस दिन में अकाउंट बंद हो जाता। बाद में धीरे-धीरे यह वाया बैंक वाली कला से
मनमोहन ने अपने निकटवर्ती अफसरों को भी परिचित करवाया। बताया कि यह बेस्ट और सेफ
पैसेज है। फिर उन अफसरों ने अपने दोस्त अफसरों को इस कला से परिचित करवाया।
बहुतेरे अफसरों के पुल मनमोहन ही बने। अब मनमोहन का समाज में और सम्मान बढ़ गया।
कामरेड थे ही। साहित्यकार भी। और अब रुतबा भी। इसी सिलसिले में उन का मिलना
निर्मला के पति से भी हुआ। निर्मला के दर्शन लाभ तो हुए ही , निर्मला के हाथ का चाय नाश्ता भी। निर्मला का
कंटीलापन और देह की लोच अभी भी कायम थी।
इस लिए मनमोहन तो निर्मला को वह पहचान गए। लेकिन निर्मला उन्हें नहीं पहचान पाई।
वह चाहते भी नहीं थे कि निर्मला उन्हें पहचाने।
इसी बीच किसी ने मनमोहन को बताया कि कमाने और नंबर दो का पैसा एक
नंबर का बनाने के लिए एन जी ओ चलाना भी बढ़िया रहता है। अब तक मनमोहन के पास नंबर
दो का भी पैसा खूब हो गया था। चुपके-चुपके कहां-कहां इंवेस्ट करें , दिन-ब-दिन समझना कठिन होता जा रहा था। कुछ
चिट-फंड कंपनियों में जमा पैसा , चिट-फंड
कंपनियों के भाग जाने से डूब गया था। तो पत्नी के नाम से क्रमशः दो एन जी ओ खुलवा
दिए। बाक़ायदा आफिस खोल कर। एक कंसल्टेंट , एक
सी ए को भी जोड़ लिया। एक सहायक नौकरी पर रख लिया। कंसल्टेंट और सी ए ने सब कुछ
अच्छे से मैनेज कर दिया। जल्दी ही उन का एन जी ओ सेमीनार वगैरह भी करवाने लगा।
इंकलाब ज़िंदाबाद और ऐश दोनों का आनंद मिलने लगा। एन जी ओ की दुनिया में आ कर
मनमोहन को पता चला कि और भी कई कामरेड एन जी ओ चला रहे हैं। मनमोहन यह तो जानते थे
कि वह एन जी ओ अपना नंबर दो का पैसा नंबर एक करने के लिए चला रहे हैं। पर बाक़ी
कामरेड कौन सा नंबर दो एक करने के लिए एन जी ओ चला रहे हैं समझना कठिन था।
एन जी ओ में मनमोहन के अनुभव ने उन्हें बताया कि नगर निगम में खामखा
छोटी-छोटी रिश्वतखोरी में जमीर बेचते और बेइज्जत होते रहे। एन जी ओ में तो
लाखों-करोड़ो की फंडिंग थी। मलाई ही मलाई थी। न गोबर , न भूसा , न
दूध। सीधे मलाई , मक्खन और घी ही था। उन्हों ने दोनों
हाथ डुबो दिए एन जी ओ में। मतलब दसो अंगुलियां घी में। और सिर कड़ाही में भी नहीं
था। एन जी ओ के आगे नगर निगम उन्हें बेकार लग रहा था। मुंह मारने के लिए एक से एक
सुंदर-सुंदर सामाजिक कार्यकर्ता भी थीं। कामरेडशिप यहां और चटक हो गई। निर्मला ने
इस में और मदद की। बस उसे इस में अपना बीस परसेंट चाहिए होता था। फंडिंग , वंडिंग करवाना निर्मला के लिए बाएं हाथ का खेल
था। धीरे-धीरे विदेशी फंडिंग भी मिलने लगी। निर्मला ने नंबर दो का पैसा ठिकाने
लगाने के लिए सिर्फ एन जी ओ ही की शरण नहीं ली थी। फ़ार्म हाऊस भी थे। लखनऊ से
लगायत नैनीताल तक। कृषि आय पर इनकम टैक्स का भी झमेला नहीं था। मनमोहन ने भी फ़ार्म
हाऊस की शरण ली। प्रापर्टी की प्रॉपर्टी , अय्यासी
की बेफिक्र जगह भी। सुख ही सुख बरस रहा था। दो-दो समाजसेवी सुंदरियां भी अब उन की
सेवा में थीं। एक नई कामरेडन बस सेवा करने की दस्तक दे रही थी। अब उस स्वच्छकार
बेवा का चक्कर भी वह छोड़ बैठे थे। अधेड़ हो चुकी थी , ऐसा गोया सूखा फूल। वह जब टोकती कभी-कभार फोन पर तो वह कहते क्या
करूं , अब तुम्हारे भर का रह नहीं गया हूं।
उमर हो गई है। अब ईच्छा भी नहीं होती। जब होगी , तुम्हारे पास नहीं आऊंगा तो कहां जाऊंगा , मेरी रानी। नगर निगम में भी मन उन का अब कम ही
लगता। सच तो यह है कभी एरिस्ट्रोक्रेट शराब पीने वाले मनमोहन अब खुद
एरिस्ट्रोकेटिक लाइफ जी रहे थे। हां , शराब
ज़रूर एरिस्ट्रोकेट छोड़ दी थी कब की। अब स्कॉच ही उन की पहली और आख़िरी पसंद थी। यह
भी पीते कम , पिलाते ज़्यादा थे।
शहर की लाइटिंग का काम भी अब उन के जिम्मे आ गया था। इस में तो कई
बार एन जी ओ से भी ज़्यादा पैसा था। राजधानी होने के कारण वी वी आई पी यथा
राष्ट्रपति , उपराष्ट्रपति , प्रधानमंत्री आदि जब-तब आते ही रहते थे। भले वह
दिन में ही आ कर दिन में ही लौट जाएं। पर उन के आने-जाने के मार्ग की सारी स्ट्रीट
लाइट बदल जाती थी। कागज़ पर ही सही बदल जाती थी। सारी की सारी स्ट्रीट लाइट। ऐसा भी
कई बार होता कि चार दिन के अंतर पर ही कोई दूसरा वी वी आई पी आता तो भी सारी
स्ट्रीट लाइट बदल जाती। अजब गोरखधंधा था। अमूमन नगर निगम आयुक्त और उप आयुक्त
प्रमोटी आई ए एस ही नियुक्त होते थे। पर कभी-कभी डायरेक्ट आई ए एस भी आ टपकते थे।
एक बार नगर आयुक्त और और उप आयुक्त दोनों ही डायरेक्ट आई ए एस आ गए। नगर आयुक्त तो
अनुभवी था कामकाज में। सो ज़्यादा मुश्किल नहीं किया। जल्दी ही सेट हो गया निगम के
सिस्टम में। मनमोहन के जाल में भी फिट हो गया। पर उप नगर आयुक्त नया था। अनुभवहीन
था। ईमानदारी का कीड़ा था उस में। एक मुख्यमंत्री रह चुके का दामाद उस का क्लासफेलो
रहा था। इस लिए भी वह अपने को पोलिटिकली भी साउंड मानता था। सो वह सिस्टम में नहीं
समाया। स्ट्रीट लाइट के बार-बार बदले जाने का आडिट करवाने पर ज़ोर मारने लगा।
मनमोहन ने उसे इशारे से समझाया भी कि सिस्टम समझिए। ज़रुरी है। पर उस डिप्टी
कमिश्नर की ईमानदारी फ़ुटबाल की तरह उछाल मार रही थी। बात बढ़ते देख नगर आयुक्त ने
भी उसे संकेतों में समझाया। फिर भी वह नहीं माना। फ़ाइल पर स्ट्रीट लाइट के ऑडिट के
आदेश कर दिए। मनमोहन ने अपनी स्वच्छकार शक्ति को तुरंत आज़माया। स्वच्छकारों की भीड़
ने उस अफ़सर के कमरे में घुस कर बेबात उसे इतना अपमानित किया , इतनी गालियां दीं कि वह रो पड़ा। दूसरे दिन वह
आफ़िस नहीं आया। सचिवालय गया। अपना तबादला करवाने की हिकमत लगाने। आख़िर उस का
तबादला हो गया। सारी हेकड़ी और सारी ईमानदारी हवा हो गई। कामरेड मनमोहन की फ़तेह की
ऐसी अनेक कहानियां नगर निगम के ही नहीं , शहर
और सचिवालय के लोगों में भी मशहूर थीं। उन की स्वच्छकार ब्रिगेड उन की बड़ी ताक़त
थी।
मनमोहन की नगरपालिका में जब नौकरी लगी तो उन्हें यह अच्छी नहीं लगी
थी। वह तो ख़ुद आई ए एस बनना चाहते थे। या कहिए कि उन के पिता उन्हें आई ए एस
बनवाना चाहते थे। लेकिन हाई स्कूल में उन का यह मंसूबा टूटता दिखा जब वह थर्ड
डिवीजन पास हुए। पिता उदास हुए तो किसी ने बताया कि आई ए एस के लिए डिवीजन का कोई
मतलब नहीं होता। बस ग्रेजुएट होना चाहिए। तो उन की उदासी कुछ दूर हुई। मनमोहन लेकिन इंटर क्या इलेविन्थ में ही फेल हो गए।
फिजिक्स , केमेस्ट्री , मैथ उन के दुश्मन बन गए थे। तो आर्ट साइड लेनी
पड़ गई। किसी तरह खींच-खांच कर इंटर पास किया विद ग्रेस। इसी बीच पिता बेटे की
नालायकी के डिप्रेशन में आ कर दुनिया से कूच कर गए। परिवार पेंशन पर गुज़ारा करने
लगा। पेंशन से परिवार का गुज़ारा मुश्किल हो गया। उन्हीं दिनों जनगणना शुरू हुई थी।
कुछ अस्थाई भर्ती हुई जनगणना में। मनमोहन जी की बहन नई-नई ग्रेजुएट हुई थी। उस ने
भी ट्राई किया। पर अस्थाई नौकरी मिलने में भी मुश्किल आ गई। उस ने मां को बताया।
मां , बेटी को ले कर जनगणना दफ़्तर पहुंची।
पता चला कि अब जो भी कुछ हो सकता था डायरेक्टर साहब ही कर सकते थे। डायरेक्टर से
मिलने के लिए मां-बेटी रोज जातीं। दिन भर बैठी रहतीं। दस दिन बाद किसी तरह
डायरेक्टर मिले। उन्हों ने भी कहा कि , ' अब
मुश्किल है। जो भी होना था , हो
गया है। पुराने लोग ही बहुत हैं। नए के लिए जगह कहां से निकालूं अब। '
मां उन के पैरों पर गिर पड़ी। बोली , ' आप को मेरे साथ जो भी करना हो कर लीजिए। पर इसे नौकरी दे दीजिए। ' घर की मुश्किलें भी गिड़गिड़ा कर बताईं। बोली , ' ज़िंदगी भर आप की गुलाम रहूंगी। '
' न-न।
ऐसा मत कीजिए। यह सब मत कहिए। ' वह
बोला , ' इस का फ़ोटो , बायोडाटा हमारे पी ए को दे दीजिए। देखता हूं , क्या हो सकता है। पर एक बात अच्छी तरह जान
लीजिए कि यह नौकरी पूरी तरह टेम्परेरी है। जनगणना ख़त्म , नौकरी ख़त्म। कभी परमानेंट नहीं होगी यह नौकरी।
पैसे भी बहुत कम मिलेंगे। '
' कोई
बात नहीं साहब ! ' वह बोली , ' डूबते को तिनके का सहारा भी बहुत है। '
कुछ दिन बाद उस की बेटी यानी मनमोहन जी की बहन को टेम्परेरी नौकरी
मिल गई। डायरेक्टर ने उसे फील्ड में भेजने के बजाय अपने कैंप में ही सहायक रख
लिया। पता ही नहीं चला कब फाइलें संभालते , डिक्टेशन
लेते वह डायरेक्टर की अंकशायनी बन गई। कहां तो डायरेक्टर को उस की मां अपने को
सौंप रही थी , कहां बेटी ने ही खुद को सौंप दिया। अब
आफिस में उस का रूतबा भी बढ़ गया था। कभी-कभार निदेशक जनगणना , गृह मंत्रालय , भारत सरकार लिखी अंबेसडर कार उसे घर छोड़ने जाने लगी। जनगणना की नौकरी
के नाम पर लड़की की शादी भी हो गई। डायरेक्टर साहब ने इंतज़ाम वगैरह में भी चुपके से
मदद की। शादी के बाद भी वह उन की अंकशायनी बनी रही। न खुद कभी उदास हुई , न डायरेक्टर साहब को उदास किया। लेकिन यह
चांदनी चार दिन वाली ही थी। जनगणना का काम खत्म हो गया। डायरेक्टर साहब का तबादला
हो गया। मनमोहन की बहन की नौकरी भी चली गई। अब तक मनमोहन भी किसी तरह खींच-खांच कर
ग्रेजुएट बन गए थे। किसी काम की तलाश में मारे-मारे फिर रहे थे। कि उन्हीं दिनों
वह डायरेक्टर साहब नगर निगम में प्रशासक नियुक्त हो गए। एक दिन उन की बांहों में
भिंची हुई बोली , ' मुझे यहां नगर निगम में नौकरी नहीं दे
सकते ?'
' दे
तो सकता हूं। पर यहां भी टेम्परेरी ही रहेगी। फिर तुम पहले से ही मेरे पास आती रही
हो। बात फैलते देर न लगेगी। तुम्हारी भी और हमारी भी बदनामी बहुत हो जाएगी। '
' अच्छा
मेरे छोटे भाई को नौकरी दे दीजिए। ऐसे तो बदनामी नहीं होगी ?'
और यह देखिए मनमोहन को घर बैठे-बैठे टेम्परेरी ही सही , नौकरी मिल गई। बहन के चक्कर में उन्हें काम भी
ठीक मिल गया। जहां दो पैसे ऊपर से भी मिल जाते थे। बहन का जोर इतना था कि यहां से
ट्रांसफर के पहले प्रशासक ने उन्हें धीरे से नियमित भी कर दिया और कैश की सीट पर
बैठा दिया। अब मनमोहन का भी विवाह हो गया।
मनमोहन भले आई ए एस नहीं बन पाए पर आई ए एस की कृपा और बहन की सीढ़ी पर चढ़
कर व्यवस्थित ज़िंदगी के हक़दार बन गए थे। नगर निगम में रहने का एक लाभ मनमोहन को यह
भी मिला कि सिनेमा घरों में मुफ़्त सिनेमा देखने को भी मिलता। सपरिवार। चाय-नाश्ता
सहित। नगर निगम के हाथ में सिनेमाघरों की नस सर्वदा दबी रहती थी। सफाई की जगह
गंदगी है की रिपोर्ट लगा कर चालान काटने का। कई बार ऐसे में सिनेमा घर बंद भी हो
जाते थे। कुछ दिन के लिए। तो नगर निगम के क्या बाबू , क्या अफ़सर , बल्कि
जमादार तक सिनेमा घरों के दामाद थे। दो-चार या दस टिकट के चक्कर में कौन चालान
कटवाए। मनोरंजन कर विभाग ,
नगर निगम , ज़िला प्रशासन , पुलिस हर कोई सिनेमाघरों का मुफ़्तखोर बन गया था।
जैसे कभी मनमोहन मुफ़्तखोर थे , अब
मनमोहन की शरण में बहुत मुफ्तखोर आ गए थे। कामरेड लोग तो थे ही और भी किसिम-किसिम
के लोग थे। मनमोहन भी कामरेड भले कहलाते थे , रहे
कभी नहीं। वह तो एक फ़ैशन के तहत कामरेड हो गए थे। जमादारों को खुश करने के लिए
कामरेड हो गए थे। उन के कामरेड का ही यह रंग था कि जमादार , जिन्हें वह बड़े दुःख के साथ स्वच्छकार कहते थे
कभी उन के खिलाफ मोर्चा नहीं खोला। स्वच्छकारों
को उन की अराजकता को अनुशासन में बांध कर रखना बहुत कठिन था। एक प्रशासनिक
अधिकारी मनमोहन की तारीफ़ करते हुए कहते , ' लेकिन
मनमोहन चुटकी बजाते उन्हें ऐसे संभाल लेते जैसे कोई संपेरा , सांप को। वह बताते कि एक बार जमादारों ने विधान
सभा घेरने का ऐलान किया। मुझे लगा कि प्रतीकत्मक घेराव कर चले जाएंगे। लेकिन वह तो
दारुलशफा रास्ते बिलकुल गुरिल्ला की तरह विधान भवन घेर लिए। उस समय विधान सभा का
सत्र भी चल रहा था। सारा ध्यान , सारा
प्रशासन उसी तरफ केंद्रित था। जमादार इतने आक्रामक हो जाएंगे , कभी किसी ने नहीं सोचा। पहले वह पचास-साठ की
संख्या में आए। हम ने उन्हें प्यार से समझाया , वह
मान कर चले गए। लेकिन दो घंटे बाद अचनाक जमादारों ने जैसे धावा बोल दिया। दो-तीन
हज़ार जमादार लंबा वाला झाड़ू ले कर विधान भवन पर टूट पड़े। जल्दी से विधान भवन के
सारे फाटक बंद करवा दिए। पुलिस ने बहुत रोका पर पुलिस वालों को धकेलते हुए सारे
जमादार , झाड़ू लिए , विधान भवन के फाटक पर चढ़ गए। विधान भवन के भीतर
खड़ा मैं गेट के दूसरी तरफ था। उन्हें प्यार से समझाता हुआ। लेकिन वह कुछ सुनने के
बजाय विधान भवन का गेट ऐसे हिला रहे थे कि बस तोड़ ही देंगे।
' मुझे
लगा कि अब यह फाटक तोड़ कर विधान भवन के भीतर घुस जाएंगे। और कि मेरी नौकरी तो गई।
बस भगवान का ध्यान कर , आंख बंद कर , जमादारों के सामने माथे पर दोनों हाथ जोड़ कर
खड़ा हो गया। गोया यह जमादार न हों , हमारे
भगवान हों। लेकिन मेरे हाथ जुड़े देख कर भी जमादार नहीं पिघले। जमादारों के भय से , बल से विधान भवन का फाटक थर-थर कांप रहा था और
मैं भी। कि तभी मनमोहन ने मुझे देखा सड़क से। मेरा इस तरह हाथ जोड़ कर खड़ा होना
उन्हें द्रवित कर गया। वह वहीँ से चिल्लाए , ' सर
इस तरह हाथ मत जोड़िए। अच्छा नहीं लग रहा। इन की मांगें मान लीजिए। ' मैं ने उन को इशारे से भीतर बुलाया। वह पीछे के
गेट से किसी तरह भीतर आए। तो मैं ने उन से कहा कि इन की मांगें मानना , न मानना मेरे हाथ में कहां है ?
ज़िला
प्रशासन और नगर निगम प्रशासन अलग-अलग है। पर कोशिश मैं पूरी करूंगा कि बात बन जाए।
मनमोहन मान गए। लगे जमादारों को समझाने। पर वह शोर में कुछ सुन ही नहीं रहे थे।
फिर मनमोहन ने कहा कि एक माइक मंगवाइए। माइक आया। मनमोहन जी ने माइक संभाला और
बोले , ' कामरेड आप लोग फाटक पर से पहले उतर
जाइए। ' यह कहना था कि सब के सब आज्ञाकारी
बच्चों की तरह फाटक से उतर गए। फिर मनमोहन ने इंकलाब ज़िंदाबाद का नारा लगवाया
दो-तीन बार और बोले , ' प्रशासन ने आप की ताक़त समझ ली है।
प्रशासन झुक गया है , आप की ताक़त के आगे। अभी देखा आप ने
साहब लोगों ने आप के आगे हाथ जोड़ा था। अब आप लोग अपने-अपने काम पर चलें। बाक़ी
बातें बैठ कर तय की जाएंगी। मैं ज़िम्मेदारी लेता हूं। ' सारे जमादार मनमोहन की बात सुन कर जाने लगे। दस
मिनट में खचाखच भरा , पूरा विधानसभा मार्ग खाली हो गया। ऐसे , जैसे कुछ हुआ ही न हो। '
नगर निगम में अफ़सर आते और जाते रहे पर कामरेड मनमोहन का रुतबा सर्वदा
बना रहा। सारे अफ़सर मनमोहन पर मेहरबान रहते। क्यों कि जमादार ही नहीं बाक़ी
कर्मचारी भी मनमोहन की मुट्ठी में आ गए थे। बाद में मेयर भी चाहे जिस पार्टी का हो
, मनमोहन से बना कर रहता। मनमोहन की लोकप्रियता
देखते हुए उन के चमचे कहते कि मनमोहन जी ज़रूर कभी मेयर हो जाएंगे। मनमोहन मेयर तो
नहीं बने लेकिन लोकप्रियता में उन के कोई कसर कभी नहीं रही। कामरेड होते हुए भी वह
बाक़ायदा पूजा-पाठ करते। पहले छुप -छुपा कर करते थे। अब नहीं। नगर निगम के सामने
पार्क में आयोजित दुर्गा पूजा में वह खुल कर शरीक़ होते। सर्वाधिक चंदा भी देते और
चढ़ावा भी भरपेट। कभी कोई कामरेड टोकता कि , ' यह
क्या कामरेड ? तो वह पहले तो टालते। पर जो नहीं ही
मानता तो कहते , ' कामरेड हम भारतीय कामरेड हैं। लाल सलाम
बोलते हैं न , तो दुर्गा जी भी लाल कपड़ों में हैं , उन को भी लाल सलाम बोल दो। बात ख़त्म। हम
मज़दूरों की लड़ाई लड़ने के कामरेड हैं। धर्म की लड़ाई लड़ने के लिए नहीं। ' पर कामरेड लोग जब-तब उन पर सवाल उठाते ही रहते
थे। कहते साला मनमोहन , हिंदू हो गया है , कामरेड नहीं रहा।'
लेकिन
शाम की शराब , सेमीनार कामरेडों को फिर मनमोहन से जोड़
देती। ऐसे ही किसी सेमीनार में वह कवि मिल गया मनमोहन से। छूटते ही बोला , ' तुम अब कामरेड हो कि माफ़िया ? '
' तुम
को क्या लगता है ? ' मनमोहन ने बिना भड़के धीरे से कहा।
' मुझे
तो लगता है अब तुम पूरमपुर माफ़िया हो। ' कवि
ने जोड़ा , ' बहुत चर्चे हैं अब तुम्हारे। एन जी ओ
तुम्हारे पास। फार्म हाऊस तुम्हारे पास। किसिम-किसिम की औरतें तुम्हारे पास। किसी
जमादार की बेवा को भी मदद करते-करते सुना रखैल बना लिया। फला-फला औरतें भी तुम भोग
रहे हो। सुना है फ़ार्म हाऊस भी बना लिया है। किसी आई ए एस की बीवी भी तुम से बहुत
मिलती है। सुना है , उस का ब्लैक , ह्वाइट करते हो। '
' सारी
बातें यहीं और अभी कर लोगे ? '
' तो
कब करें ? पता नहीं अब कब मिलोगे ? '
' आओ
कभी किसी शाम को बैठते हैं। सारे गिल-शिकवे दूर कर लेंगे। '
' अरे
हां , सुना है अब स्कॉच पीते-पिलाते हो। '
' सही
सुना है। आओ किसी शाम तुम्हें भी पिलाता हूं स्कॉच। '
' वही
जमादारों के पैसे से , जिन्हें तुम बहुत द्रवित हो कर
स्वच्छकार कहते हो। ' कवि ने अंदाजा लगाया कि चोट पूरी पड़ी
है कि कुछ कमी है फिर बोला , ' जब
जमादारों के पैसे की चाय नहीं पी तो कैसे सोच लिया कि स्कॉच पी लूंगा। ' वह बोला , ' तुम
माफ़िया ही नहीं , कमीने भी हो। कामरेड तो कतई नहीं।
हिप्पोक्रेट हो , हंड्रेड परसेंट। जमादारों के दलाल।
जमादारों और प्रशासन के बीच दलाली के अलावा तुम्हारी हैसियत क्या है भला ? कभी सोचा है ? '
' लगता
है तुम फिर पिए हुए हो। '
' पिए
तो मैं हमेशा रहता हूं। पर तुम्हें क्या। '
' तो
कुछ भी अनाप-सनाप बकोगे ?'
' बकूंगा
! ' वह बोला , ' लेकिन अनाप-सनाप नहीं। सच-सच। क्या कर लोगे ? '
कवि
बोला , ' कामरेड , तो देखो मैं भी आज की तारीख में पूरी तरह नहीं हूं। कोई नहीं है। सब
के सब हिप्पोक्रेट हैं। कामरेडशिप के नाम पर मैं खुद शराबी हूं। कोई कामरेड पिलाए , कोई कांग्रेसी पिलाए या भाजपाई। मुझे ख़ाक फर्क
नहीं पड़ता। जमादार भी पिलाए तो फर्क नहीं पड़ता। हां , जमादार का पेट काट कर कोई पिलाए , यह मंज़ूर नहीं। हरगिज मंज़ूर नहीं। '
कामरेड चुप ही रहे। क्या बोलते भला। ख़ामोशी भी कई बातों का जवाब होती
है। कामरेड यह बात अच्छी तरह जानते थे। उन की तरक़्क़ी में यह ख़ामोशी भी एक बड़ा
फैक्टर रही है , यह बात और लोग भी जानते हैं। इस से
होता यह कि कामरेड कई बार विवाद में रह कर भी विवादित नहीं होते। सब कुछ पानी की
तरह गुज़र जाता। उन की यह ख़ामोशी ही थी कि बहन की देह की बिना पर नगर निगम की नौकरी
में वह आए थे लोग यह तथ्य अब भूल चुके थे। यह ख़ामोशी ही थी कि एन जी ओ बना कर वह
करोड़ो में खेल रहे हैं , कम लोग जानते हैं। वह एक शेर है न : कई
जवाबों से अच्छी है ख़ामुशी मेरी / न जाने
कितने सवालों की आबरू रक्खे। तो कामरेड इस
शेर का वज़न और क़ीमत दोनों जानते थे और इस का लाभ मुसलसल लेते रहते थे। वह जानते थे
कि बहुत बोलने से बनती बात भी बिगड़ जाती है। बिगड़ी बात तो और उलझ जाती है। कामरेड
मनमोहन सिर्फ़ कामरेड ही नहीं , हद
दर्जे के काइयां भी थे। ऐसे कवि टाइप कामरेड को वह अपने ठेंगे पर भी नहीं रखते थे।
कोई उन के मुंह पर थूकता भी तो चेहरे से थूक पोछ कर मुसकुराते हुए वह आगे बढ़ लेते।
ऐसे जैसे कुछ हुआ ही न हो। कोई टोकता भी तो कहते कि , ' अगर रास्ते चलते आप का पांव अगर किसी नाबदान या
गोबर में पड़ जाए तो क्या पांव काट कर फेंक देंगे ? अरे भाई घर जा कर धो लेंगे। ज़्यादा से ज़्यादा साबुन लगा कर धो लेंगे।
कि ढिंढोरा पीटते हुए गंदे पांव ही बिस्तर में घुस जाएंगे ? ' वह कहते , ' मैं
तो धो लेता हूं , साबुन लगा कर। डिटॉल डाल कर। अपनी आप
जानिए। '
कामरेड मनमोहन की यही बातें उन्हें भौतिक रुप से न सिर्फ़ सफल और
समृद्ध बनातीं बल्कि कई सारे भटके हुए कामरेडों की शरणस्थली भी बनातीं। सफल और
दुनियादार बनातीं।
इधर कामरेड मनमोहन का एम बी ए करने वाला बेटा अब बिल्डर बन चुका था।
सफल बिल्डर। शहर में उस के बनाए मॉल और अपार्टमेंट लोगों की शान का सबब थे। अरबों
का साम्राज्य उस का अठखेलियां ले रहा था। पिता की तरह कम्युनिज़्म का बुखार उस ने
कभी पाला भी नहीं। न किसी हिप्पोक्रेसी की झंझट में पड़ा। इन दिनों वह एक जातिवादी
पार्टी के मुखिया को डट कर फंडिंग कर रहा है और राज्यसभा जाने की फ़िराक में है।
-19-
शिकस्त
वह बहुत मेहनत और द्वंद्व फंद कर के कैबिनेट मंत्री के पद तक पहुंचा
था। आस्था , निष्ठा को विष्ठा बनाते , दल-बदल को धता बताते , घात-विश्वासघात सब की हदें लांघता हुआ वह यहां
तक पहुंचा था। और अब यह फ़िल्मी अभिनेत्री , मंत्री
पद पर लांछन लगा कर उस का मंत्री पद छीन लेना चाहती थी। और वह मंत्री पद किसी सूरत
गंवाना नहीं चाहता था। चाहे जो हो। उस के पिता भी विधायक रहे थे लेकिन वह उसी में
ख़ुश थे। मंत्री पद की कभी सोची भी नहीं थी। पिता पूरमपुर गांधीवादी तो नहीं थे पर
गांधीवादी पार्टी में थे। निरंतर दो बार विधायक रहे थे। तीसरी बार चुनाव हार गए।
पर विधायक निवास का फ़्लैट नहीं छोड़ा। बीमारी के बहाने उसे रोके रहे। पार्टी की ही
सरकार थी। सो तीन महीने के लिए वह फ़्लैट पुन : आवंटित करवा लिया था। पर तीन साल
बाद भी काबिज रहे। छोड़ा नहीं विधायक निवास का वह फ़्लैट।
वह भी तब तक राजनीति में कूद-फांद करने लगा। पर उस का मक़सद पिता की
तरह कोरी राजनीति करना नहीं था। वह पैसा कमाना चाहता था। सत्ता की सवारी और पैसा
दोनों ही उस का लक्ष्य था। विधायक होते हुए भी पैसे के लिए उस ने रंगदारी , अपहरण से भी गुरेज़ नहीं किया। देखते ही देखते
वह लखपति और लखपति से करोड़पति बन गया। अरबपति और खरबपति होने के लिए राजपथ उसे
बुला रहा था। आहिस्ता-आहिस्ता नहीं , वह
सरपट इस राजपथ पर दौड़ता जा रहा था। और यह देखिए वह अरबपति भी बन गया। इसी बीच उस
ने अपहरण और रंगदारी के पैसे से एक रसूख़दार कॉलोनी में एक साथ के बड़े-बड़े चार
अलग-अलग प्लॉट ख़रीद कर उन पर एक आलीशान बंगला बनवा लिया था। नाम रखा ह्वाइट हाऊस।
यह ह्वाइट हाऊस का ख़याल अमरीका जा कर ही उसे आया था। अमरीकी राष्ट्रपति के ह्वाइट
हाऊस की तरह सफ़ेद रंग में समाया और इतराता हुआ यह ह्वाइट हाऊस जल्दी ही मशहूर भी
हो गया। संभ्रांत लोगों को बुला कर गृह प्रवेश भी हो गया। विधायक निवास के मामूली
फ़्लैट से निकाल कर पिता को भी इसी ह्वाइट हाऊस में विराजमान कर दिया। दिलचस्प यह
कि जिस बड़े व्यवसाई के दोनों बेटों का अपहरण किया था कभी , उस व्यवसाई ने भी अपने नए आलीशान बंगले का नाम
ह्वाइट हाऊस ही रखा। उस व्यवसाई का बंगला और भव्य और ज़्यादा सफ़ेदी में दमकता था।
ह्वाइट हाऊस बना कर ही वह ख़ुश नहीं हुआ। अपहरण , ठेका और रंगदारी में डूबा यह आदमी अब शिक्षा माफ़िया बन कर अचानक
उपस्थित हो गया। मैनेजमेंट कालेज , इंजीनियरिंग
कॉलेजों की चेन पर चेन खोलता जा रहा था। बहुत से भ्रष्ट अफ़सर उस के इस शिक्षा
व्यवसाय में अपना काला धन इनवेस्ट कर रहे थे। कोई ख़ुशी-ख़ुशी तो कोई जबरिया।
लक्ष्मी की जैसे बरसात हो रही थी।
और यह देखिए अब कैबिनेट मंत्री पद भी उस के चरणों में अनायास लोटने
लगा। सरकार बनाने में जोड़-तोड़ का यह हासिल था। पार्टी तोड़ कर दूसरी पार्टी की
सरकार बनवा देने का तोहफ़ा था यह।
अब कैबिनेट मंत्री बनते ही उस ने खरबपति होने के लिए कुबेर का दरवाज़ा
खटखटा दिया था। जाने कितनी फाइलों के वारे-न्यारे करते हुए उस के पांव अब ज़मीन पर
नहीं थे। बिलकुल इसी वक़्त दस हज़ार करोड़ के टेंडर की फ़ाइल उस की मेज़ पर थी। बस उस
के एक अनुमोदन के लिए तरसती हुई। उस की एक दस्तखत की दरकार थी। बस ठेका लेने वाली
कंपनी के सी ई ओ से उस ने सौ करोड़ का इशारा कर दिया था। सी ई ओ ने मुस्कुरा कर उस
का इशारा फौरन मंज़ूर कर लिया था। पर साथ ही उस ने हिंदी फ़िल्मों की एक ख़ास
अभिनेत्री से हमबिस्तरी की भी फ़रमाइश इशारों में नहीं खुल कर , कर दी थी। इन दिनों उस का यह जैसे दस्तूर सा बन
गया था , व्यसन सा बन गया था कि मुद्रा के साथ
मैथुन का भी वह जुगाड़ जिस तिस से हर सौदे में करने को कह देता था। न कोई शील , न कोई संकोच। ऐसे जैसे किसी से कह रहा हो कि
चाय पिला दो या पान खिला दो। वह औरतों की फ़रमाइश खुल कर कर देता। कभी कोई
अभिनेत्री , कभी कोई मॉडल , कभी कोई और सुंदरी। लाखो , हज़ारो करोड़ के सौदे में यह सब बहुत आसान सा
मामला होता था। अमूमन लोग मान जाते थे। इस बार भी उस की बात मान ली गई थी। उस ने
कह दिया था कि अभिनेत्री की देह पर दस्तख़त करने के बाद ही वह फ़ाइल पर भी दस्तख़त कर
देगा। सब कुछ डन था। बस अभिनेत्री ने कह दिया कि इस के लिए मिनिस्टर को मुंबई ही
आना होगा। उस ने यह प्रस्ताव सुनते ही ठुकरा दिया। यह कहते हुए कि इतना समय कहां
है उस के पास। कि एक रात की हमबिस्तरी के लिए वह मुंबई आए और जाए। मुंबई जाने का
कारण भी क्या बताएगा। फिर मुंबई उस के क़ाबू में नहीं। कहीं अभिनेत्री ने कोई
वीडियो , फ़ोटो करवा लिया तो ? लेने के देने पड़ जाएंगे। अंतत: अभिनेत्री ने
रेट दोगुना कर दिया। एक करोड़ से दो करोड़ कर दिया। अभिनेत्री नई थी और बाज़ार में
चढ़ी हुई। सो अभिनेत्री की डिमांड भी पूरी कर दी गई। दो करोड़ रुपए एडवांस उस को दे
दिए गए।
आने-जाने के फ़्लाइट का बिजनेस क्लास का टिकट , होटल का स्वीट आदि तय हो गया। तय तारीख़ और समय
पर अभिनेत्री होटल आ गई। उस को बता दिया गया कि अभिनेत्री आ गई है। उस ने बताया कि
आज तो कैबिनेट मीटिंग है। और भी व्यस्तताएं हैं। आज की मुलाक़ात कैंसिल करवा दीजिए।
दो दिन बाद का रख लीजिए। दो दिन बाद का सुनते ही अभिनेत्री भड़क गई। बोली , ' फिर तो न हो पाएगा। ' उस ने जोड़ा , ' बार-बार मुंबई से लखनऊ आने का रीजन क्या दूंगी ? '
अभिनेत्री उस की पसंदीदा थी। सो उस ने अभिनेत्री के नखरे को क़ुबूल कर
लिया। कैबिनेट मीटिंग के बाद ही वह सीधे होटल पहुंच गया। साथ में दो मुंहलगे दोस्त
भी थे। वह उन दोस्तों को चकित करना चाहता था कि देखो आज किस अभिनेत्री की देह को
भोग रहा है। अभिनेत्री का स्वीट अलग था , उस
का स्वीट अलग। फ्लोर एक था। अब एक ईगो फिर फंसा कि कौन किस के स्वीट में जाए। उस
की ज़िद थी कि अभिनेत्री आएगी , वह
नहीं जाएगा। अंतत : अभिनेत्री आई। साथ में और दो लोगों को देख कर अभिनेत्री भड़की।
उस ने बताया कि , ' घबराओ नहीं ,
अपने यार हैं। '
' तो
क्या यह लोग भी ? '
' अरे
नहीं ! बस मैं ही। ' और उन दोनों दोस्तों को बाहर के
ड्राइंग रुम में छोड़ कर अभिनेत्री को ले कर भीतर बेडरुम में चला गया।
स्कॉच की बोतल खोलते हुए अभिनेत्री से उस ने पूछा , ' आप भी लेंगी न ! '
' श्योर
!'
फ़िल्म और पॉलिटिक्स की इधर-उधर की बातों के बीच स्कॉच के दो-तीन पेग
लगाने के बाद जब हल्का सा सुरुर सवार हो गया तो उस ने अचानक अभिनेत्री को बाहों
में दबोच लिया।
' अरे
! ' कह कर अभिनेत्री अचकचा गई।
' क्यों
क्या हुआ ?'
' इस
तरह अचानक ! '
' अचानक
ही सब कुछ हमारे साथ होता है। ' अभिनेत्री
के कपोल पर चुंबन की बरसात करते हुए वह बुदबुदाया। वह अभिनेत्री को जैसे कच्चा चबा
जाना चाहता था। थोड़ी देर तक वह यों ही भालू की तरह अभिनेत्री की देह को धांगता
रहा। पर यह सब कुछ , सारा पौरुष , सारा जोश बाहरी तौर पर था। भीतर से वह जोश नहीं
छलक पा रहा था। भीतर-भीतर वह लाचारी महसूस कर रहा था। जाने कैबिनेट मीटिंग में
मुख्यमंत्री से हो गया आकस्मिक विवाद था कि अभिनेत्री की ऐंठ थी , कि क्या था , वह समझ नहीं पाया। पर अभिनेत्री के साथ वह सहज नहीं हो पा रहा था।
अभिनेत्री भी उसे ' कोआपरेट ' नहीं कर रही थी। ऐसे पेश आ रही थी गोया देह
नहीं , लाश हो। बिलकुल ठंडी। कोई गर्मजोशी
नहीं। बाहरी तौर पर भी नहीं। फिर उसे इधर तो जल्दी-जल्दी है , उधर आहिस्ता-आहिस्ता की याद आ गई। और इसे
अभिनेत्री को सुनाया भी। इस पर अभिनेत्री मुस्कुरा कर रह गई। फिर वह बड़ी देर तक वह
इधर-उधर की बातें करता रहा। थोड़ी बहुत चिकोटी भी की अभिनेत्री को। लेकिन अभिनेत्री
ने उस से धीरे से कह दिया ,
' बी जेंटिल ! ' वह समझ गया कि काट बकोट नहीं चल पाएगी। सो
जेंटली उस से बतियाते हुए ही उसे बाहों में फिर से घेरने लगा। अभिनेत्री से कहा , ' कुछ तो कोआपरेट कीजिए ! ' इतना सुनते ही अभिनेत्री भी उस का सहयोग करने
लगी। वियाग्रा का एक डोज वह एहतियातन ले कर आया था। लेकिन अपेक्षित जोश उस की देह
से दूर था। अधर पान पर वह आ गया। लगा कि कुछ बात बन जाएगी। वह आहिस्ता-आहिस्ता
अभिनेत्री को निर्वस्त्र करता रहा। इधर-उधर उस की देह चूमता , चाटता और सहलाता रहा। अब तक अभिनेत्री का सारा
प्रतिरोध और नारी सुलभ संकोच समाप्त हो चुका था। अब वह खुल कर इंज्वॉय कर रही थी।
दो करोड़ का उस का उत्साह मंत्री को निराश नहीं करना चाहता था। लेकिन वह पटरी पर
नहीं आ रहा था तो नहीं आ रहा था। अभिनेत्री उसे सारा सुख देने पर आमादा थी लेकिन
अभिनेत्री के आगे अब वह हार रहा था। तो क्या वह अभिनेत्री को पा जाने की ख़ुशी के
तनाव में शिथिल हो रहा था ?
वह अचानक अभिनेत्री के वक्ष पर टूट पड़ा। ऐसे जैसे कोई शिकारी शेर
किसी हिरन पर टूट पड़े और उसे मुंह में दबोच ले। अभिनेत्री को मिनिस्टर का यह अंदाज़
अच्छा लगा। वह ऐसे शिकारियों , ऐसे
पुरुषों को पसंद करती थी। उस ने अचानक अधर छोड़ अभिनेत्री के वक्ष को दबाते हुए
निप्पल को चूसना शुरु कर दिया। ऐसे कि जैसे अभिनेत्री के वक्ष फूल कर गुब्बारा हो
जाना चाहते थे। गैस वाला गुब्बारा। अभिनेत्री के वक्ष भी उस के हाथों की क़ैद से
छूट कर मुख के आकाश में गुब्बारे की तरह उड़ जाना चाहते थे। अभिनेत्री अपने पूरे
उरोज पर थी। अब वह जल बीच मीन प्यासी की तरह छटपटा रही थी और बुदबुदा रही थी , ' कम आन मिस्टर मिनिस्टर ! ' उस की वजाइना में हुक उठी थी। कूक रही थी यह
हूक मुसलसल। लेकिन मिस्टर मिनिस्टर कम आन की जगह गो , वेंट , गान
की स्थिति में थे। जो भी कुछ ज्वार था देह में, सब
बाहर-बाहर ही था। हाथ में ,
अधर और जिह्वा में। असल मर्दानगी को
काठ मार गया था। अभिनेत्री ने बहुत बकअप किया। लेकिन सब बेअसर। अब वह
आहिस्ता-आहिस्ता अभिनेत्री पर सवार , उस
के वक्ष से ऊपर बढ़ता हुआ अधर से भी ऊपर होते हुए और-और ऊपर हो रहा था। अभिनेत्री
समझ गई मिस्टर मिनिस्टर की मंशा। वह धीरे से बुदबुदाई , ' इस के लिए तो कुछ और प्लस करना पड़ेगा , मिस्टर मिनिस्टर ! '
' इट्स
ओके ! ' कह कर वह और ऊपर हुआ।
अब अभिनेत्री मुख मैथुन में व्यस्त थी। और मिस्टर मिनिस्टर फ़ार्म में
आ रहे थे। अभिनेत्री द्वारा प्रस्तुत अनुपम सुख में वह ऊभ-चूभ थे ही कि मोबाइल की
रिंग टोन से वह डिस्टर्ब हो गए। मोबाइल की तरफ वह हाथ बढ़ा ही रहे थे कि अभिनेत्री
ने उन्हें हाथ के इशारे से रोका। पर वह रुका नहीं। क्यों कि रिंगटोन रुटीन नहीं , स्पेशल थी। मुख्यमंत्री का फ़ोन था। मुख्यमंत्री
ने जाने किस बात के लिए अपने बंगले पर तुरंत बुला लिया था। कहा कि , ' आइए , कुछ
ज़रुरी वार्ता करनी है। फ़ोन रख कर वह पुन : युद्धरत हुआ। पर अब फिर से युद्ध में
उतरना कठिन हो गया। अभिनेत्री से सहयोग मांगा। अभिनेत्री भी हार गई। बोली , ' अब मैं भी थक गई हूं ! '
फिर
जैसे जोड़ा , ' रोक रही थी। पर आप रुके ही नहीं। '
' कैसे
रुकता ? '
' क्यों
?'
' अरे
चीफ़ मिनिस्टर की काल थी। '
' तो
क्या ? ' अभिनेत्री बोली , ' ऐसे में यमराज की कॉल इग्नोर कर दी जाती है।
बाद में कॉल बैक कर लेते। '
' ओ
के। ' वह बोला , ' अब मैं जा रहा हूं। नसीब में होगा तो फिर कभी
मिलेंगे। '
' इट्स
अपान यू ! ' वह धीरे से बुदबुदाई , ' सी यू ! '
वह कमरे से निकल गया। बाहर ड्राइंग रुम में उस के दोस्त शराब पी रहे
थे। वह बोला , ' अभी तो मैं जा रहा हूं। ' फिर धीरे से बोला , ' पता नहीं क्यों आज मिस हो गया। '
' क्या
? ' दोनों दोस्त एक साथ बोल पड़े , ' नो फ़ायर ?'
' नो
फायर ! ' उदास होते हुए वह बोला , ' चीफ़ मिनिस्टर को भी यही टाइम मिला था , वार्ता के लिए। कैबिनेट में बात नहीं कर पाए।
अब फिर बुला लिया है। कैबिनेट में मिले थे तो कुछ गरमा-गरमी हो गई थी। देखते हैं
क्या बात है। ' कह कर वह निकल गया। बोला , ' तुम लोग इंज्वॉय करो। '
अभिनेत्री कमरे में ही थी अभी। उस ने तो शराब इंज्वॉय करने के लिए
दोस्तों से कहा था। दोस्तों ने समझा कि अभिनेत्री को इंज्वॉय करना है। कुछ शराब का
सुरुर था , कुछ अभिनेत्री का सुरुर। दोनों
अभिनेत्री को इंज्वॉय करने कमरे में चले गए। अभिनेत्री ने तब तक कपड़े भी नहीं पहने
थे। चादर ओढ़े लेटी पड़ी थी। इन दोनों को देखते ही हकबका गई। ज़ोर से बोली , ' कौन हो तुम लोग ?'
' भइया
के दोस्त हैं। '
' कौन
भइया ?'
' वही
जो अभी यहां से गए हैं। '
एक ने जैसे जोड़ा , ' भइया कह गए हैं , इंज्वॉय करो ! '
' ऊ
तो मुख्यमंत्री के टेंशन में फ़ायर कर नहीं पाए।
तो हम ही लोग कर देते हैं। ' दूसरा
बोला।
' ह्वाट
रबिश इट ! ' गेट आऊट ! ' अभिनेत्री चीखी।
' चिल्लाओ
मत ! ' एक बोला , ' आराम से रहो। ' कहते हुए एक बिस्तर पर चढ़ गया। फिर अभिनेत्री पर। अभिनेत्री
नहीं-नहीं करती रही। पर उस की नहीं-नहीं सुनने वाला कोई नहीं था। बारी-बारी दोनों
दोस्तों ने अभिनेत्री का मान-मर्दन किया। और कपड़े पहन कर जाने लगे। अचानक
अभिनेत्री ने उन्हें ' सर-सर !' कह कर एड्रेस किया और बोली , ' अब
तो आप लोगों ने इंज्वॉय कर ही लिया है। रात बहुत हो गई है सो प्लीज़ मुझे भी मेरे
रुम तक छोड़ दीजिए। '
' कोई
बात नहीं छोड़ देते हैं आप को , आप
के रुम में। ' एक दोस्त बोला , ' चलिए ! ' वह
बोला , ' आप का रुम भी आबाद कर देते हैं। '
कपड़े पहन कर बिस्तर की दो चादर ओढ़ कर अभिनेत्री किसी गाय की तरह उन
के साथ चल पड़ी। हालां कि अभिनेत्री का स्वीट भी इसी फ्लोर पर था। और चाभी उस के
बैग में उस के पास ही थी। पर लिफ़्ट में आ कर बोली , ' मेरे रुम की चाभी असल में रिसेप्शन पर है। वहां से चाभी ले लेते हैं
पहले। '
' ओ के मैडम ! '
रिसेप्शन पर आते ही वहां उपस्थित सिक्योरिटी गार्ड को इंगित करती हुई
अभिनेत्री चीख़ी , ' इन दोनों को पकड़ो। इन्हें जाने मत
देना। ' अभिनेत्री के चीख़ते ही और भी गार्ड तथा
दूसरे लोग आ गए। मिनिस्टर के वह दोनों दोस्त सकपका गए और भागने लगे। अभिनेत्री ने
रिसेप्शन पर चिल्ला कर कहा , ' यह
दोनों रेपिस्ट हैं। पकड़ो इन्हें। दोनों ने मेरे साथ रेप किया है। ' गार्ड और लोगों ने दौड़ा कर दोनों को पकड़ लिया।
' आप
तुरंत पुलिस को कॉल कीजिए और इन्हें अरेस्ट करवाइए। ' रिसेप्शनिस्ट को एड्रेस करती हुई अभिनेत्री
बोली , ' मुझे तो पहचानते ही होंगे आप लोग। '
' जी
मैंम कौन नहीं जानता आप को ? रिसेप्शनिस्ट
बोली , ' आप इतनी बड़ी स्टार हैं। '
' तो
तुरंत पुलिस बुलाइए। इन्हें अरेस्ट
करवाइए। ' अभिनेत्री बोली , ' मेरे पास इन के रेप के सुबूत हैं। '
' जाओ-जाओ
! तुम जैसी के तिरिया चरित्र हम लोग जानते हैं। ' एक आदमी बोला।
' तुम
हमारे भइया को नहीं जानती। ' दूसरा
आदमी बोला , ' पुलिस आएगी तो उलटे तुम्हीं को अरेस्ट
कर के ले जाएगी। '
' प्लीज़
काल पुलिस ! ' अभिनेत्री रिसेप्शनिस्ट से बिफर कर
बोली , ' नहीं मुझे पुलिस कमिश्नर को काल करनी
पड़ेगी इतनी रात को। '
' क्या
सुबूत है तुम्हारे पास ?
' एक रेपिस्ट ने
पूछा। फिर बोला , ' कोई रेप-सेप नहीं हुआ है किसी के साथ। ' वह बोला , ' हम
लोग तो भइया के साथ आए थे। अब जा रहे हैं। '
' कौन
भइया ? ' रिसेप्शनिस्ट ने पूछा।
' माननीय
मंत्री जी को नहीं जानती ?
' दूसरा रेपिस्ट
मंत्री का नाम लेता हुआ बोला।
मंत्री का नाम आते ही रिसेप्शनिस्ट चौकन्नी हो गई। सहम गई। फिर धीरे
से उस ने अपने हायर मैनेजमेंट को इस वाकये से वाक़िफ़ करवा दिया। जल्दी ही जनरल
मैनेजर वग़ैरह आ गए। रात के एक बजे इस सेवेन स्टार होटल में अजब अफ़रा-तफ़री मची हुई
थी। बात एक स्टार अभिनेत्री और एक पॉवरफुल मिनिस्टर के बीच की सुनते ही समूचा होटल
मैनेजमेंट सिर के बल खड़ा हो गया। प्रबंधन ने अभिनेत्री को बैठा कर समझाना शुरु
किया।
' मैम
, आप के पास रेप के कुछ एविडेंस हैं क्या ? सोच लीजिए पुलिस आएगी तो पूछेगी। '
' है
न एविडेंस ! ' वह देह पर ओढ़ी हुई चादर को उतार कर , हाथ में ले कर बोली , ' इन चादरों पर इन के स्पर्म हैं। रेप के सुबूत। ' उस ने जैसे जोड़ा , ' आप मेरा मेडिकल करवा दीजिए। '
होटल प्रबंधन ने डिप्लोमेसी बरती। दूसरी तरफ मिनिस्टर को भी सारे
वाक़ये से वाकिफ़ करवाया। अब मिनिस्टर ने मोबाईल पर अपने दोस्तों को अर्दब में लिया।
यह सब होते ही , इतन
सब सुनते ही वह दोनों आदमी अभिनेत्री के पैर पकड़ कर बैठ गए। कहने लगे , ' माफ़ कर दीजिए बहन जी ! '
उधर मिनिस्टर ने अभिनेत्री का इंतज़ाम करने वाले सी ई ओ को इतनी रात
में फ़ोन कर अभिनेत्री को संभालने और मामले को रफ़ा-दफ़ा करवाने के लिए कहा।
' विल
मैनेज सर ! ' उस ने मिनिस्टर को एश्योर करते हुए कहा
, ' डोंट वरी सर ! '
सी ई ओ ने अभिनेत्री को मैनेज करने वाले एजेंट को फ़ोन किया और कहा कि
इस बखेड़े को दस मिनट में ख़त्म कर के मुझे बताओ। एजेंट ने अभिनेत्री से बात की।
लेकिन अभिनेत्री ने एजेंट की एक न सुनी। एजेंट ने जब बहुत मिन्नतें कीं तो
अभिनेत्री ने कहा , ' ठीक है। पुलिस को नहीं इंवाल्व करती
हूं। लेकिन इन दोनों ने जो रेप किया है , इन
का ख़ामियाजा क्या है ? '
' आप
क्या चाहती हैं मैम ! '
' मिनिस्टर
के लिए दो में आई थी। इन दोनों के चार-चार दिलवा दो ! '
' यह
तो बहुत ज़्यादा है मैम ! '
' देन
फारगेट इट ! ' अभिनेत्री बोली , ' यू नो , आई
हैव सॉलिड प्रूफ़ ! दोनों के स्पर्म हैं मेरे पास। जो बेड शीट पर पोछा था दोनों ने।
वह बेड शीट मेरे पास है। मेडिकल में मेरी वजाइना में भी प्रूव होगा। और वो
मिनिस्टर ! साला नामर्द ! कहां जाएगा वह इस के बाद। और जो भी तुम्हारे क्लाइंट की
डील है , उस का क्या होगा ? ' वह बोली , ' सरकार
हिल जाएगी !'
अभिनेत्री की यह सारी बात एजेंट ने सी ई ओ को बताई। सी ई ओ ने
मिनिस्टर को। मिनिस्टर डर गया। सी ई ओ से कहा , ' जैसे
भी हो उस रंडी को निपटाओ। मेरे ऊपर कोई छींटा नहीं पड़े। कल तुम्हारा आदेश निर्गत
हो जाएगा। '
' वेरी
वेल सर ! ' वह धीरे से बोला , ' डन सर ! गुड नाइट सर ! '
हालां कि रात के दो बज गए थे। सो सी ई ओ को गुड मॉर्निंग बोलना चाहिए
था। जो भी हो अंतत : डील फ़ाइनल हो गई। अभिनेत्री की डिमांड पूरी हो गई। अभिनेत्री
का कहना था कि यह चार-चार करोड़ यानी आठ करोड़ मुंबई में इस रात ही उस के घर पहुंच
जाना चाहिए ताकि सुबह की फ़्लाइट वह इत्मीनान से पकड़ सके। अगर ऐसा नहीं होता है तो
वह फ़्लाइट छोड़ देगी। सीधे पुलिस में जा कर या आन लाइन रिपोर्ट लिखवा देगी। मीडिया
बुला लेगी। मिनिस्टर का रेजिगनेशन तो हो ही जाएगा।
आख़िर सुबह हुई और अभिनेत्री को सी ऑफ़ करने के लिए होटल का पूरा हायर
मैनेजमेंट हाजिर था। जाते समय अभिनेत्री ने वह दोनों बेडशीट होटल प्रबंधन को
दिखाते हुए अपने पास रख लिया। कहा कि , ' यह
दोनों बेडशीट मैं लिए जा रही हूं। '
' नो
इशू मैम ! ' होटल के जनरल मैनेजर ने झुक कर
अभिनेत्री से कहा।
अभिनेत्री की फ़्लाइट टेक ऑफ़ होने तक मिनिस्टर सोया नहीं। नींद ही
नहीं आ रही थी उस ह्वाइट हाऊस में। उस का ह्वाइट हाऊस , उसे ब्लैक हाऊस की तरह दिखने लगा था। जब फ़्लाइट
के टेक ऑफ होने की ख़बर मिली तब वह नहाने गया।
दूसरे दिन उस होटल में कोई पुलिस तो नहीं पर एक अख़बार का रिपोर्टर
पहुंचा। तहक़ीक़ात करने। होटल मैनेजमेंट ने रिपोर्टर की ख़ूब आवभगत की और बताया कि इस
होटल में ऐसी कोई घटना नहीं घटी। न ही मुंबई से आई कोई अभिनेत्री उन के यहां ठहरी।
न कोई मिनिस्टर आया। रिपोर्टर के पास ट्रिप सही थी पर वह आवभगत में इतना मगन हो
गया कि ख़बर निकाल नहीं पाया। उसे इस ख़बर की ट्रिप देने वाला पछता कर रह गया।
अभिनेत्री की देह पर दस्तख़त से वंचित मंत्री ने दूसरे दिन दस हज़ार
करोड़ के ठेके की फ़ाइल पर दस्तख़त कर दिए। प्रमुख सचिव से कह कर आदेश भी निर्गत करवा
दिया। उसी शाम दोस्तों के साथ शराब पीते हुए मिनिस्टर बोला , ' बेटा तुम लोग तो हमारी मिनिस्ट्री पर ग्रहण लगा
बैठे थे। ' फिर उस ने जोड़ा , ' मालूम है तुम दोनों लोगों का इंज्वॉय कितने का
बैठा है ! '
' कितने
का ? '
'आठ
करोड़ का। '
' क्या
? ' कह कर दोनों दोस्तों ने मुंह बा दिया।
लेकिन दूसरे दिन जब मुख्यमंत्री ने उसे फिर बुला लिया तो वह घबराया।
मुख्यमंत्री ने अब की आफ़िस में बुलाया। मुख्यमंत्री की मेज़ पर दस हज़ार करोड़ रुपए
के उक्त ठेके की फ़ाइल थी। फ़ाइल के साथ अभिनेत्री के साथ आपत्तिजनक स्थिति में फ़ोटो
भी। मुख्यमंत्री ने उस के पहुंचते ही कुछ कहा नहीं। फ़ाइल और फ़ोटो सामने कर दी। सौ
करोड़ के बाबत भी पूछा। प्रत्युत्तर में वह बेशर्मी से बोला , ' यह मेरे ख़िलाफ़ साज़िश है। '
' तो
क्या यह फ़ोटो फेक है ? '
' पूरी
तरह फेक है। ' उस ने कहा , ' फ़ोटोशॉप का कमाल है। '
' पर
उस दिन कैबिनेट में भी आप इसी कपड़े में थे। मुझे कैबिनेट के बाद ही ख़बर मिली कि आप
होटल में रंगरेलियां मनाने गए हैं। इसी लिए आप को फ़ौरन बुलाया था। ताकि सरकार की
फ़ज़ीहत न हो। पर आप ने तो फंसा दिया। '
' मुख्यमंत्री
जी , यह साज़िश है। '
' साज़िश
तो है सरकार को घेरने की। और आप जानते हैं कि भ्रष्टाचार को ले कर हमारी ज़ीरो
टालरेंस की नीति है। ' मुख्यमंत्री ने कहा , ' चुपचाप इस्तीफ़ा लिख दीजिए। नहीं आप को बर्खास्त
करना पड़ेगा। यह अच्छा नहीं लगेगा। मैं यह ठेका भी निरस्त कर रहा हूं। '
' ऐसा
न कीजिए। ' वह बोला , ' मैं साबित कर दूंगा। ' वह ज़रा रुका और बोला , ' दो दिन में साबित कर दूंगा कि साज़िश है। '
' सब
कुछ साबित हो चुका है। आप के दोस्तों की कुंडली भी आ गई है। आप की औरतबाज़ी और
भ्रष्टाचार की कई कहानियां इकट्ठी हो गई हैं। क्या-क्या साज़िश के फ़्रेम में
मढ़िएगा। सरकार की छीछालेदर मत करवाइए। इस्तीफ़ा लिख दीजिए अभी। सरकार और आप के हित
में यही है। बात दब जाएगी। नहीं बात अगर मीडिया में लीक हो गई तो आप का पोलिटिकल
मर्डर हो जाएगा। '
' बस
दो दिन का समय दे दीजिए। '
' दो
मिनट का समय है। ले लीजिए। नहीं हमारी चिट्ठी तैयार है , आप की बर्खास्तगी की। दस्तख़्त कर के महामहिम को
भेजना शेष है। ' मुख्यमंत्री ने जैसे जोड़ा , ' आप
पोलिटिकल नहीं कारपोरेट वार का शिकार हो गए हैं। '
' क्या
?'
' जी
! ' मुख्यमंत्री ने कहा , ' इस कारपोरेट वार में हम अपनी सरकार नहीं
क़ुर्बान कर सकते। न कोई छींटे आने दे सकते। '
' कौन
कंपनी है ?' उस ने पूछा।
' कोई
कंपनी हो। ' मुख्यमंत्री ने कहा , ' कोई पीछे पड़ कर आप के सारे कपड़े उतार दे , इस से बचिए। आप के तमाम धंधे हैं। कालेज वगैरह
भी हैं। ' मुख्यमंत्री बोले , ' आप की यह अश्लील फ़ोटो अगर किसी गैर ज़िम्मेदार
आदमी के हाथ लग गई तो सोशल मीडिया पर वायरल होते देर नहीं लगेगी। सोशल मीडिया पर
लोग आप को भून कर खा जाएंगे। '
' कारण
क्या बताऊं ?'
' किस
बारे में ?'
' इस्तीफ़े
के बाबत। '
' निजी
कारण। स्वास्थ्य आदि कुछ भी लिख सकते हैं। ' मुख्यमंत्री
ने कहा , ' जैसे भी हो हम अपनी सरकार के मुंह पर
कालिख नहीं पुतने दे सकते। ' मुख्यमंत्री
बोले , ' यह ठीक है कि यह सरकार बनाने में आप का
बहुत योगदान रहा है। लेकिन इस सरकार को गिरने से बचाना भी क्या आप की ज़िम्मेदारी
नहीं बनती ? '
एक घंटे बाद ही न्यूज़ चैनलों पर स्वास्थ्य कारणों से उस के इस्तीफ़े
की ख़बर चल गई। दूसरे दिन अख़बारों में भी यह ख़बर छप गई।
अब वह पता करवा रहा है कि आख़िर किस कारपोरेट घराने ने उस की मिट्टी
इस तरह पलीद करवा दी। पर पता नहीं चल पा रहा। उस ने उस कंपनी के सी ई ओ से भी कई
बार पूछा है कि , ' आख़िर कौन कंपनी है , जिस ने इस तरह उस का मंत्री पद छिनवा कर उस का
राजनीतिक गुरुर भी छीन लिया। वह कहने लगा , ' बरबाद
कर दूंगा उस कंपनी को। ईंट से ईंट बजा दूंगा उस की। जानता नहीं है , वह मुझे अभी। कहीं वह छिनाल अभिनेत्री तो टूल
नहीं बन गई ? '
' नो
सर , नो टूल। ' सी ई ओ ने उसे बताया है कि आप के लफंगे दोस्तों
ने सारा गुड़-गोबर किया है। ऐसी ट्रिप सीक्रेट होती है। आप यह भी नहीं जानते। '
' तो
हमारे लफंगे दोस्त टूल बन गए ? '
' नो
सर। वह न्यूज़ बनवा गए आप के इस ट्रिप की। न आप होटल उन को ले गए होते। न वह रेप
करते। न हंगामा होता। होटल भी कारपोरेट वार में टूल होते हैं। वहीं से कहीं बात
इधर-उधर हुई। और हमारे किसी एराइवल ने कैच कर लिया। '
' तो
वह फ़ोटो। मेरे साथ उस रंडी की फ़ोटो ?'
' फारगेट
सर ! ' सी ई ओ बोला , ' मे बी उस ने अपने मोबाइल से मैनेज कर लिया हो।
आप को ब्लैकमेल करने के लिए। ख़ैर , अब
जो होना था , हो गया। हमारा तो बहुत बड़ा नुकसान हो
गया। इतना पैसा बर्बाद हुआ और हमारी डील भी रद्द हो गई। हमारी जो फ़ज़ीहत हुई है , शिकस्त हुई है , ऐसी शिकस्त कभी नहीं हुई थी। पूरे कारपोरेट वर्ल्ड में हमारी शिकस्त
और फ़ज़ीहत के ही चर्चे हैं। '
' और
यहां जो हमारी पोलिटिकल शिकस्त हुई है ? ' उस
ने पूछा , ' उस का क्या करुं ? ' वह बोला , ' आहिस्ता-आहिस्ता
आया था यहां तक। बहुत मेहनत की थी। तुम्हारे कारपोरेट की लड़ाई में हम कहीं के नहीं
रहे। वह दो कौड़ी का मुख्यमंत्री , उस
रंडी की फ़ोटो दिखा कर हमारा इस्तीफ़ा ले लिया। उस के पास वह फ़ोटो पहुंची कैसे ?'
' फॉरगेट
इट सर ! ' वह बोला , 'आहिस्ता-आहिस्ता लोग भूल जाएंगे। आप फिर
मिनिस्टर बनेंगे। '
' तुम
तो ऐसे बोल रहे हो मिनिस्ट्री न हो , हलवा
हो। '
'हलवा
से भी आसान है सर ! ' सी ई ओ बोला , ' हम लोग कुछ करते हैं सर। '
' अच्छा।
'
' सर
सब ठीक होगा। हम इस शिकस्त को अपनी जीत में बदल कर जल्दी ही दिखाएंगे। '
' क्या
बक रहे हो ?'
' बक
नहीं रहा। सच बोल रहा हूं। ' सी
ई ओ बोला , ' आप नहीं जानते मनी में पावर बहुत है।
यही मनी आप को भी फिर से पावरफुल बनाएगी। '
' देखते
हैं। '
' सर
हम ने आप से सौ करोड़ वापस मांगे ? जब
कि डील रद्द हो गई। '
' नहीं।
'
' मांगेंगे
भी नहीं। ' वह बोला , ' हमारी फ्रेंडशिप , हमारा ट्रस्ट पक्का है। इस लिए नहीं मांगेंगे।
बस आप शांत रहिए। आप की दस्तख़त से ही हम अपनी शिकस्त को जीत में बदलेंगे। आप हमारे
बहुत काम की चीज़ हो। '
बात भले ख़त्म हो गई थी। पर उसे लग रहा था कि उस की शिकस्त तब नहीं
हुई थी जब मुख्यमंत्री ने उस से इस्तीफा मांग लिया था। असली शिकस्त तो अब हुई है।
ऐसे लग रहा है , जैसे वह उस सी ई ओ का कुत्ता बन गया
हो। कारपोरेट वर्ल्ड का कुत्ता। सी ई ओ के , ' आप
हमारे बहुत काम की चीज़ हो। ' में
वह अपने कुत्तेपन को खोज रहा है।
जल्दी ही उस सी ई ओ का फिर फ़ोन आया। कि वह फला विभाग की एक डील करवा
दे। ऑफर भी तगड़ा और एक दूसरी मशहूर अभिनेत्री के साथ हमबिस्तरी का बोनस। तो क्या
वह मंत्री पद गंवाने के बाद भी महत्वपूर्ण बना हुआ है ? काम की चीज़ बना हुआ है। मंत्री से दल्ला बन गया
है। कॉरपोरेट जगत का दल्ला।
इन दिनों कॉरपोरेट जगत के काम करवाने के लिए वह स्पेशलिस्ट मान लिया
गया है। वह सी ई ओ ही नहीं , तमाम
और सी ई ओ और मालिकान भी उसे काम की चीज़ मानने लगे हैं। इस से बड़ी शिकस्त और क्या
हो सकती है भला।
वह कॉरपोरेट जगत का दल्ला बन गया है। दुलरुआ दल्ला ! शराफ़त की भाषा
में जिसे लाइजनर कहा जाता है।
इधर तो जल्दी-जल्दी है , उधर
आहिस्ता-आहिस्ता , उसे फिर याद आ गया है। उसे एक जज की भी
याद आ गई है जिस ने न्यायपालिका में क्रांति का बिगुल बजा कर इस्तीफ़ा दे दिया था।
बाद में एक लॉ कंसल्टेंसी खोल कर लाइजनिंग करने लगा था। उस के भी कुछ कोर्ट केसेज
उस जज ने ख़त्म करवा दिए। मनमाफ़िक पैसे ले कर। जज और क्लायंट के बीच का दल्ला हो
गया था वह पूर्व जज। और अब वह ख़ुद कॉरपोरेट और सरकार के बीच का दल्ला बन गया है।
ऐसी शिकस्त उस की होगी , यह भला कहां जानता था वह। तो क्या यह
ह्वाइट हाऊस , ब्लैक हाऊस में तब्दील होता जा रहा है , आहिस्ता-आहिस्ता !
मारे दहशत के उस ने पूरे बंगले की पेंटिंग करवाना शुरु कर दिया है।
ह्वाइट हाऊस की ह्वाइटनेस पर कोई एक धब्बा भी नहीं चाहता वह।
-20-
सुलगन
वह डाक्टर लड़की जिसे वह अपनी बहू बनाना चाहता था , लड़की भी तैयार थी। पत्नी को भी इलाज के बहाने
दिखा दिया। लड़की ने अपने पिता का नंबर दिया। पर जब लड़की के पिता से बात किया तो वह
पहले तो बहुत ख़ुश हुआ। क्यों कि बेटी की शादी खोजते-खोजते वह तंग हो गया था। थक सा
गया था। बात ही बात में पता चला कि लड़की , बेटे
से चार साल बड़ी है। लड़की के पिता ने ही बात बदल दी और बिन कुछ कहे मना कर दिया।
फ़ोन कर के वह बताना चाहता था कि किसी शादी में लड़की चार साल छोटी हो सकती है तो
लड़का भी हो सकता है। पर लड़की के पिता ने उस का फ़ोन उठाना ही बंद कर दिया। वह उस
डाक्टर लड़की से मिलता रहा। लड़की ने ही एक दिन कहा , ' मेरे पापा ऐसे ही हैं। ' वह
धीरे से बोली , ' तभी तो मेरी शादी तय नहीं हो पा रही। ' इलाज ख़त्म हो गया। पर वह डाक्टर लड़की फ़ोन कर
अभी भी हालचाल लेती रहती है। उस ने उसे अब बेटी कहना शुरु कर दिया है।
ऐसी स्थितियां उस की ज़िंदगी में अकसर कभी ओस की बूंद की तरह टपकती
रही हैं , कभी बारिश की बौछार की तरह बरसती रही
हैं। पहले वह चिंतित हुआ करता था। सुलगता रहता था। पर अब ऐसे इन स्थितियों को छिटक
देता है जैसे कोई कैरम की गोटी। कैरम भी उस ने बहुत सीखने की कोशिश की पर कभी सीख
नहीं पाया। शतरंज भी नहीं सीख पाया। इसी लिए ज़िंदगी की शतरंज में वह हर बाज़ी हारता
रहा। जैसे बचपन में क्रिकेट खेलते हुए वह कभी ठीक से क्रिकेट भी नहीं खेल पाता था।
ख़ास कर बॉलिंग करने में उसे बहुत मुश्किल होती थी। भीतर से आवाज़ आती थी कि किसी को
आऊट कर उस का खेल कैसे बिगाड़ दूं। बहुत सीधे बॉल फेंकता था। ताकि अगला आऊट न हो।
भले रन आऊट हो जाए , कैच आऊट हो जाए पर विकेट आऊट नहीं।
अपनी बॉल से विकेट नहीं गिरने देता था , वह
सामने के खिलाड़ी का।
यह कुछ-कुछ ठीक वैसे ही था जैसे उस के हिंदी मीडियम वाले इंटर कालेज
में गणित और अंगरेजी विषय बुखार की तरह बच्चों में प्रचलित थे। लेकिन अंगरेजी के
एक अध्यापक थे जो किसी भी तरह मार-पीट कर अपने सेक्शन के बच्चों को यू पी बोर्ड के
इम्तहान में कभी भी फेल नहीं होने देते थे। लड़का कितना भी गधा हो। भले हिंदी या
किसी और विषय में फेल हो जाए पर अंगरेजी में वह फेल नहीं होने देते थे। थे वह
हिंदी के अध्यापक नियुक्त थे। नियुक्ति उन की हिंदी के अध्यापक पद पर थी पर पढ़ाते
वह अंगरेजी थे। क्यों कि अंगरेजी के जो दो प्रवक्ता थे , दोनों ही नेता थे। माध्यमिक शिक्षक संघ के
नेता। बारी-बारी दोनों एम एल सी भी बने। सो स्कूल आते ही नहीं थे। कभी आते भी
स्कूल तो क्लास में नहीं आते थे। तो हिंदी के अध्यापक अंगरेजी पढ़ाते थे। बहुत
मनोयोग से पढ़ाते थे। इस से उन का फ़ायदा यह होता था कि उन्हें अंगरेजी के अच्छे
ट्यूशन मिल जाते थे। एक समय तो वह ज़िले के कलक्टर के बेटे को भी ट्यूशन पढ़ाने लगे
थे। इतनी धाक थी उन की अंगरेजी के मास्टर के रुप में। फिर तो वह बाक़ायदा अंगरेजी
की कोचिंग भी चलाने लगे। ख़ूब पैसा कमाया। बड़ा सा घर बनवाया।
उस की ज़िंदगी भी कुछ-कुछ ऐसी ही थी। जैसे हिंदी अध्यापक का अंगरेजी
का क्लास लेना। करतब कुछ और। क़िस्मत कुछ और। क्या पता किसी और भी के साथ भी ऐसा
होता होगा। या नहीं भी होता होगा। क्या पता। ऐसे ही जब स्कूल के दिनों में वह
प्यार करना चाहता था तो नहीं कर पाया। कभी कह नहीं पाया। चिट्ठी लिखता रहा , पर कभी दे नहीं पाया। हिम्मत ही नहीं पड़ी।
सिनेमा भी कई उस ने आधे ही देखे हैं। पूरा सिनेमा देखने की हिम्मत ही नहीं थी तब।
दो लड़के मिल कर सिनेमा का एक टिकट ख़रीदते थे। एक इंटरवल तक देखता था , दूसरा इंटरवल बाद। पहले कौन देखेगा , इस के लिए टॉस पड़ता था। टॉस भी अपनी क़िस्मत को
अकसर पीटता रहता था। अकसर उस का नंबर इंटरवल बाद का आता था। अगले लड़के को अगर
फर्स्ट हाफ पसंद आता था तो फिर किसी दूसरे दिन का टिकट कटता था। फिर इंटरवल के
पहले वह देखता था , इंटरवल बाद दूसरा। अगर अगले को फर्स्ट
हाफ़ पसंद न आए तो अगला टिकट कैंसिल। ऐसा फर्स्ट हाफ , सेकेण्ड हाफ का बंटवारा दो कारण से होता था। एक
तो पूरा पैसा न होना। पर इस से भी बड़ा कारण होता था कि घर वालों को पता न चले। अगर
घर से चार घंटे ग़ायब रहे तो घर वालों को सिनेमा का शक़ हो जाता था। अगर डेढ़-दो घंटे
ही ग़ायब रहे तो काहे का सिनेमा। कोई शक़ नहीं।
कोई शक़ न करे चरित्र पर तब इस का ख़याल बहुत रहता था। इतना कि
कभी-कभार अकेले में किया गया हस्त मैथुन भी हिला देता था। दो-चार दिन चेहरा
गिरा-गिरा रहता था। आत्मग्लानि से। कि ग़लत काम हो गया है। इसी लिए प्रेम पत्र लिख
कर भी मुल्तवी हो जाता था कि लड़की क्या सोचेगी , उस के बारे में। तब के ज़माने में ऐसे ही था। और उस के बारे में तो
ऐसे ही था। उस का एक क्लासफेलो अब जब वाट्सअप , फ़ेसबुक
आदि देखता है , बच्चों को फ्रीहैंड देखता है। वर्जनाओं
से मुक्त देखता है तो आह भर कर कहता है , यार
हम लोग ग़लत समय पैदा हो गए थे। बेकार हस्तमैथुन
और स्वप्नदोष में ज़िंदगी बरबाद करते रहे। अब पैदा होना चाहिए था।
नौकरी भी वह नहीं करना चाहता था। कभी नहीं करना चाहता था। पर करता
रहा। नौकरी के लिए जाने क्या-क्या गंवाता रहा। आत्मसम्मान , आत्मा को मारता रहा। साथ के लोग रिश्वत पीटते
रहे। जाने क्या-क्या करते और भोगते रहे। पर उसे यह सब देख कर कुढ़न होती थी। कम में
गुज़ारा करता रहा , बढ़िया के सपने देखता रहा। पर मिला
नहीं। एक सहयोगी टांट करते हुए कहता भी , ' बेटा
, बैठे-बैठे कुछ नहीं मिलता। हाई रिस्क , हाई गेन। नो रिस्क , नो गेन। लेकिन जो सिनेमा देखने की हिम्मत नहीं
रखता था , प्रेम पत्र लिख कर देने की हिम्मत नहीं
रखता था , वह हाई रिस्क तो बहुत दूर की बात , कोई रिस्क नहीं ले सकता था। हिंदी का अध्यापक
बन कर अंगरेजी पढ़ाने क्या ,
अंगरेजी बोलने भी नहीं आया। जैसे
क्रिकेट में बॉलिंग करते हुए किसी को विकेट आऊट करना ख़राब लगता था , ज़िंदगी में भी ख़राब लगता रहा।
उस डाक्टर लड़की का अभी फ़ोन आया। वह पूछ रही थी , ' अंकल आप की तबीयत अब कैसी है ? '
' ठीक
है !'
' और
आंटी की ? '
' वह
भी ठीक हैं , अब। '
' अच्छा
आप के बेटे की शादी तय हो गई ?
' अभी
तो नहीं। ' उस ने पूछा , ' और तुम्हारी ?'
' नो
अंकल ! इतना आसान तो नहीं है शादी तय होना। ' वह जैसे जोड़ती है , ' न मेरे पापा आप जैसे हैं , न मैं आज की लड़कियों जैसी। '
' हूं
! ' कह कर वह बात को टाल देता है।
उम्र के इस मोड़ पर जाने कैसे एक औरत से दोस्ती हुई। बिलकुल मोगरा सी
सुगंधित दोस्ती। धीरे-धीरे मचलती हुई महकने लगी। फिर आहिस्ता-आहिस्ता बुझने लगी।
बुझती रही वह , सुलगता रहा वह। जल्दी ही वह किसी
अगरबत्ती की तरह सुलग कर बुझ गई। वह उस के जन्म-दिन पर मिलता। वह उस के जन्म-दिन
पर मिलता। चुपचाप। बैठे-बैठे गाना सुनते। अगर तुम साथ हो / दिल ये संभल जाए / अगर
तुम साथ हो / हर ग़म फिसल जाए सुनते-सुनते वह अचानक उस की ज़िंदगी से फिसल गई।
वह पहले सिगरेट से बहुत नफ़रत करता था। फिर अचानक कभी-कभार सिगरेट
पीने लगा। सोचता कि कभी बड़ा सा घर बनाएंगे। टैरेस पर बैठ कर चाय और सिगरेट पिएंगे।
कभी पाइप भी पिएगा। सिगार भी। सिगार तो कभी-कभार दोस्तों ने पिला दिया। पर पाइप वह
अभी भी कभी नहीं पी सका। एक बार सोचा कि सिगार ख़रीद कर चुपके से पिए। पर सिगार के
डब्बे का दाम सुन कर , सिगार पीना मुल्तवी कर दिया। सोचा कि
कभी कोई दोस्त पिला देगा तो पी लेगा। ऐसे मद में पैसा खर्च करने में उसे बहुत
तकलीफ होती है। ठीक उस मिसरे की ध्वनि में , सुना
है आबशारों को बड़ी तकलीफ़ होती है। / चरागों से मज़ारों को बड़ी तकलीफ़ होती है।
पर बाज़ार में टहलते-टहलते उस ने सिगार का एक डब्बा ख़रीद लिया है। घर आ कर बालकनी
में खड़े हो कर सिगार सुलगा लिया है। ऐसे जैसे सेकेंड हाफ की कोई फ़िल्म देख रहा हो।
ऐसे जैसे लड़की , लड़के से चार साल बड़ी निकल गई हो। ऐसे
जैसे वह प्रौढ़ स्त्री अगरबत्ती की तरह सुलगती हुई बुझ कर ज़िंदगी से फिसल गई हो।
ऐसे जैसे वह हस्तमैथुन के बाद पराजित मन लिए बालकनी में खड़ा है। सिगार सुलग रही है
और वह ख़ुद भी। जैसे हिंदी के अध्यापक की अंगरेजी क्लास में बैठा है ताकि अंगरेजी
में फेल न हो। अध्यापक अचानक हाथ आगे करने को कहता है। हाथ आगे करते ही छड़ी से
सड़ाक से मारता है। वह मार बर्दाश्त कर लेता है। क्यों कि अंगरेजी में उसे फेल नहीं
होना है। सिगार हाथ से छूट कर नीचे गिर गई है। कि फिसल गई है , उस औरत की तरह। अब सिगार भी साथ नहीं है। वह
लेकिन सुलग रहा है।
डाक्टर लड़की का फ़ोन आ गया है। पूछ रही है , ' कैसे हैं अंकल ? ' ऐसे जैसे वह भी सुलग रही हो।
-21-
स्ट्रीट चिल्ड्रेन
वह तीन थे। दो लड़की, एक
लड़का। तीनों तीन देश के। एक लड़की चीन की, एक
मलयेशिया की। लड़का सिंगापुर का। बीस-बाइस की उम्र में तीनों ही थे। बेपरवाह और
जवानी में मस्त। जब लड़का ट्रेन में आ कर अपनी बर्थ पर बैठा तो उस के सामने दो लड़कियां
थीं। अंकल चिप्स खाती हुई। बेपरवाही में चपर-चपर करती हुई। मलयेशियाई लड़की को देख
कर उसे भ्रम हुआ कि वह भारतीय है। उस की सारी अदाएं भी पंजाबी लड़कियों जैसी ही थी।
बनारस स्टेशन की इस दोपहर में प्लेटफार्म पर खड़ी ट्रेन में यह दोनों लड़कियां किसी
फूल की तरह महक और चहक रही थीं। अंकल चिप्स का पैकेट जब खाली हो गया तो चीनी लड़की
ने उसे बर्थ के नीचे फेंकने के बजाय अपने बैग से एक पोलीथीन थैला निकाला और उसे
उसी में रख दिया। फिर थैले से ही उस ने पेस्ट्री निकाली ओर फिर दोनों झूम कर खाने
लगीं। खिलखिलाने लगीं। बिलकुल बेपरवाह हो कर। उसे इन लड़कियों को इस तरह बेपरवाह और
मस्त देख कर अच्छा लगा। अभी कोच में ज़्यादा लोग नहीं थे। धीरे-धीरे लोग आ रहे थे
कि तभी एक भगवाधारी आदमी घुसा। माथे पर चंदन लगाए। चंदन और फूल लिए। वह डब्बे में
बैठे लोगों को चंदन लगा कर फूल दे कर पैसे मांगने लगा। कोई दे देता, कोई नहीं। वह भगवाधारी जब उस के पास आया तो उस
ने हाथ जोड़ते हुए कहा कि मेरे माथे पर तो चंदन लगा हुआ है। बाबा विश्वनाथ मंदिर
का। वह भगवाधारी उदास हो कर आगे बढ़ गया। अब कोच में लोग भरपूर आ गए थे। उस के ऊपर
की बर्थ पर भी एक लड़का आ गया। आते ही उस ने कोच अटेंडेंट को बुलाया और लड़कियों को
इंप्रेस करता हुआ डांटने लगा कि ‘अभी तक ए सी क्यों नहीं चलाया?’ वह चुपचाप उस की डांट सुनता रहा। फिर धीरे से
बोला, ‘इंजन नहीं लगा है अभी।’
‘क्या? इंजन नहीं लगा है अभी।’ वह चीख़ा, ‘इंजन भी नहीं लगा है?’
‘जी!’
‘ओह
माई गॉड।’ वह माथा पकड़ कर बैठ गया। बोला, ‘तो
ट्रेन लेट हो जाएगी!’ कोच अटेंडेंट धीरे से खिसक गया। कि तभी ए सी चलने लगा। ए सी
की ठंडी हवा मिलते ही लड़कियां चहक उठीं।
ट्रेन चल दी थी। और लड़कियां
परेशान हो गई थीं। उन की बातचीत से लग रहा था कि जैसे उन्हें किसी और का भी इंतज़ार
था जो नहीं आ पाया है।
दोनों लड़कियां अंगरेजी में ही बात कर रही थीं। उन की अंगरेजी बहुत
अच्छी नहीं थी तो ख़राब भी नहीं थी। ट्रेन चलने के कोई दस मिनट बाद लड़का आया। उस
के आते ही दोनों लड़कियों के बुझे चेहरे खिल उठे। लड़कियों ने उस लड़के से पूछा कि
अभी तक कहां थे? तो उस ने बताया कि अपनी सीट पर तुम
लोगों का इंतज़ार करता रहा और जब लग गया कि तुम लोग नहीं आओगी तो मैं ही आ गया।
‘वंडरफुल।’
दोनों लड़कियां एक साथ बोल कर मुसकुरा पड़ीं। अब यह तीनों एक बर्थ पर बैठ गए। चीनी
लड़की ने अपने बैग से कुछ बिस्कुट निकाले और तीनों ही खाने लगे। उन्हें देख कर लगा
जैसे यह तीनों ट्रेन की किसी बर्थ पर नहीं, किसी
पेड़ की डाल पर बैठे हों और कि कोई पक्षी हों।
दीन-दुनिया की कोई परवाह नहीं।
‘ह्वेयर
इज़ योर बैग?’ मलयेशियाई लड़की ने लड़के से पूछा।
‘ऑन
माई सीट!’ लड़का बेपरवाही से बोला।
‘एंड
मैप?’
‘ओह!
जस्ट वेट!’ कह कर लड़का तुरंत उठ खड़ा हुआ। और फिर तेज़ी से निकल गया।
अब उसने भारतीय जैसी दिख रही लड़की से बात करने की कोशिश की। और पूछा
‘तुम तीनों बी एच यू में पढ़ते हो?’
‘ह्वाट?’ लड़की अचकचाई।
‘ओह!
यू डोंट नो हिंदी?’
‘नो
सर!’ कह कर वह मुसकराई।
‘बट
यू लुक लाइक इंडियन!’ उस ने जैसे जोड़ा, ‘आर
यू तमिलियन?’ क्यों कि उस के हाव-भाव भले पंजाबिनों
जैसे थे पर उसमें मद्रासी लुक भी था।
‘नो सर, आई
एम फ्राम मलयेेशिया !’
‘ओ.
के. !’ ओ. के. !’
दोनों की ही अंगरेजी टूटी फूटी थी पर बात करने भर के लिए काफी थी।
पता चला कि तीनों ही स्टूडेंट तो थे पर बी. एच. यू. या भारत में कहीं नहीं पढ़ते
थे। तीनों की पढ़ाई अपने-अपने देशों में ही हो रही थी। तो क्या वह तीनों भारत घूमने
आए थे?
मकसद तो उन का घूमना ही था। पर वह एक काम ले कर आए थे। एक एन जी ओ के
थ्रू । कोलकाता में स्ट्रीट चिल्ड्रेन पर काम करने का एक प्रोजेक्ट ले कर वह आए
थे। तीनों ही पहले से परिचित नहीं थे। भारत आ कर वह कोलकाता में ही एक दूसरे से
परिचित हुए थे। और इन में दोस्ताना हो गया था। कोलकाता में पंद्रह दिन गुज़ार कर वह
लौट रहे थे। कोलकाता के बाद बनारस उन का दूसरा पड़ाव था। अब वह दिल्ली के रास्ते
में थे। प्रोजेक्ट का काम उन का पूरा हो चुका था। अब बस घूमना ही घूमना था। फिलहाल
उन तीनों के दिमाग में दिल्ली घूम रही थी।
वह लड़का अपनी सीट से अभी लौटा नहीं था। तब तक उस ने मलयेशियाई लड़की
से बात जारी कर रखी थी। मलयेशियाई लड़की बता रही थी कि उस का इंडियन लुक देख कर
अकसर लोग धोखा खा जाते हैं। इंडिया में तो
लोग उसे इंडियन मान ही लेते हैं। बाहर भी लोग उसे इंडियन कहने लगते हैं। बात ही
बात में वह बताती है कि एक तरह से वह इंडियन है भी। क्यों कि उस के ग्रैंड फ़ादर
इंडियन मूल के ही थे। यह बताते हुए वह किसी गौरैया के मानिंद चहक पड़ती है, ‘आई लव इंडिया! आई लव इंडियंस टू।’
‘क्या
किसी इंडियन से शादी करने वाली हो तुम भी?’ उस
ने पूछा।
‘आई
डोंट नो सो फार।’ कह कर उस ने कंधे उचकाए, ‘मे
बी, आर में नॉट बी। बट डोंट नो। बिकाज़ आई
डोंट थिंक एबाउट मैरिज! प्रेजेंटली आइ एम स्टंडीइंग एंड ट्रैवलिंग ओनली!’ उसने फिर
दोहराया, ‘बट आई लव इंडिया एंड इंडियंस!’
‘क्या
इस के पहले भी वह कभी भारत आई है?’
‘नो!
दिस इज फार दि फर्स्ट टाइम!’
‘ओ.
के.। फिर आना चाहोगी?’
‘ओह
श्योर!’ कहते हुए उस की पूरी बतीसी बाहर आ जाती है।
लड़का अपना बैग लिए हुए आ चुका था। आते ही अपने मोबाइल से वह माइकल
जैक्सन का गाया एक गाना बजा देता है। गाना सुनते ही चीनी लड़की झूम जाती है। तीनों
ही कंधे और गरदन हिला-हिला कर झूमने लगते हैं। ऊपर की बर्थ पर लेटा लड़का भी उठ कर
अपनी बर्थ पर झूमने का ड्रामा करता है पर उस लय में झूम नहीं पाता। उसे देख कर समझ
में आ जाता है कि हिंदी गानों पर वह चाहे जो कर सकता है पर अंगरेजी गानों की उसे न
समझ है न अभ्यास। पर वह पूरी बेशर्मी से लगा पड़ा है। गाना खत्म होते ही चीनी लड़की
चहकती बोलती है, ‘यह नंबर मेरे पापा को भी बहुत पसंद है।
वह तो इस के दीवाने हैं।’
‘ओह
यस!’ कहते हुए लड़के ने अब दूसरा गाना लगा दिया है। अब फिर तीनों झूम रहे हैं।
बिस्कुट, चिप्स खाते हुए। तभी वेंडर आ जाता है।
उस से कटलेट-आमलेट ख़रीद कर खाने लगते हैं। ऊपर की बर्थ पर बैठे लड़के को तीनों
लिफ़्ट नहीं देते। सो वह हार कर अपनी बर्थ पर लेट जाता है ।
अब लड़के ने अपने बैग से एक बड़ा सा मैप निकाल लिया है। दिल्ली घूमने
का प्लान बना रहे हैं। दिल्ली के बाद उन्हें मुंबई भी जाना है। दिल्ली को वह एक
दिन में घूम लेना चाहते हैं। राष्ट्रपति भवन, कुतुबमीनार, लाल किला, नेशनल
म्यूजियम, बिरला भवन, त्रिमूर्ति भवन सब कुछ वह एक दिन में धांग लेना
चाहते हैं। वह नक्शा देख कर एक जगह से दूसरी जगह की दूरी डिसकस कर रहे हैं।
उसे इन बच्चों की मासूमियत पर तरस आता है। वह अपनी टूटी-फूटी अंगरेजी
में बताता है कि एक दिन में इन जगहों की दूरी तो नापी जा सकती है लेकिन इन जगहों
को ठीक से देखा या जाना नहीं जा सकता।
‘तो
कितने दिन लग सकता है?’ लड़का उदास हो कर पूछता है।
‘कम
से कम तीन या चार दिन।’
‘लेकिन
हमारे पास तो सिर्फ़ एक हफ्ता ही बचा है।’ मलयेशियाई लड़की बोलती है।
‘और
हम ने दिल्ली के लिए सिर्फ़ दो दिन शेड्यूल किया किया है।’ चीनी लड़की बोली, ‘एक दिन घूमना, एक दिन रेस्ट। हम बहुत थक गए हैं। देन मुंबई।’
‘तो
क्या हुआ?’ टाइम तो तुम लोगों के पास है ही। वह
बोला, ‘रेस्ट कैंसिल करो। और अगर पैसे की बहुत
दिक्कत न हो तो दिल्ली से मुुुंबई ट्रेन के बजाय फ़्लाइट ले लो। टाइम बच जाएगा। और
दिल्ली मुंबई अच्छे से घूम लो। रेस्ट घर पहुंच कर कर लेना। वैसे भी तुम लोग यंग
हो। दिक्कत क्या है?’
यह सुन कर तीनों बच्चों के मुंह झरनों जैसे खुल गए हैं। ओ. के., ओ. के., ओ.
के.! की जैसे बारिश हो गई है। चेहरे फूल जैसे खिल गए हैं और देह पत्ते जैसी हिलने
लगी है।
अब वह दिल्ली का मैप ले कर दिल्ली को धांग लेने का प्लान बना रहे हैं
और पूछ रहे हैं कि कहां, कहां कैसे-कैसे घूमें? ओर कि कितना टाइम किस-किस जगह लगेगा।
वह बता रहा है कि तीन दिन में दिल्ली की ज़रूरी जगहें कैसे घूमें और देखें।
चीनी लड़की बीच में टोकती है, ‘लेकिन
सिर्फ़ ऐतिहासिक या और ज़रूरी जगहें। मॉल, मार्केट
एटसेक्ट्रा बिलकुल नहीं।’ वह जैसे जोड़ती है, ‘यह
सब बहुत देख चुके हैं। यह अपने यहां भी बहुत है।’ और वह सिंगापुरी लड़का भी चीनी
लड़की की बात पर सहमति जताता है।
वह बता रहा है कि राष्ट्रपति भवन देखने में तो एक घंटा से भी कम ही
लगता है लेकिन सारी औपचारिकता वगैरह मिला कर आधा दिन उस के लिए। फिर वहां से निकल
कर बोट क्लब, इंडिया गेट का लुक मारते हुए लोकसभा
भवन देखते हुए होटल जाओ। थोड़ा रेस्ट ले कर शाम को लाल किला जाओ। लाल किला बाहर से
देखो। चांदनी चौक मार्केट देखो। वैसी मार्केट शायद तुम्हारे चीन, मलयेशिया, सिंगापुर
में न हो। जामा मस्जिद जाओ। फिर लाल किला वापस लौटो। सब आसपास है। वॉकिंग डिस्टेंस
। लाल किले में शाम को लाइट एंड साउंड प्रोग्राम ज़रूर देखो। बारी-बारी हिंदी और अंग्रेजी
में होता है। डेढ़-डेढ़ घंटे का। तुम लोग अंग्रेजी वाला देखो। वेरी इंट्रेस्टिंग
प्रोग्राम। लाल किला और दिल्ली के बारे में एक्सीलेंट जानकारियां बिलकुल ड्रामाई
अंदाज़ में। किले का सारा वैभव जैसे आंखों के सामने उपस्थित हो जाता है।
तीनों बच्चे यह डिटेल्स जान कर बहुत खुश होते हैं। लड़का धीरे-से
पूछता है,‘एंड नेक्सट डे?’ और दिल्ली का नक्शा उस के सामने रख देता है।
‘सुबह
ब्रेकफास्ट ले कर निकलो। कुतुबमीनार देख लो। फिर कुछ खा पी कर आ जाओ बिरला भवन।
यहां गांधी से मिलो।’
‘यू
मीन महात्मा गांधी?’ मलयेशियाई लड़की ने पूछा।
‘हां।’
‘पर
उन की हत्या हो गई न?’
‘हां, पर उन के विचार तो हैं। उन की यादें , उन की धरोहर तो हैं।’ उस ने कहा, ‘उन से मिलो।’
‘ओह
यस!’
तब तक कोई स्टेशन आ गया है। ट्रेन रुक गई है। दो तीन लोग चढ़ते-उतरते
हैं। ट्रेन चल देती है। और बच्चों की बातचीत भी।
वह बता रहा है कि इसी बिड़ला भवन में गांधी की हत्या गोडसे ने की थी।
चीन की लड़की बताती है कि,
‘यस आई हैव सीन?’
‘ह्वाट?’ बाकी दोनों बच्चे अचरज से मुंह बा देते हैं और
वह मुसकुरा कर रह जाता है।
‘यस
इन फ़िल्म गांधी।’ वह जैसे जोड़ती है, ‘डायरेक्टेड
बाई एटनबरो!’
‘ओ. के., ओ. के.!’ कह कर दोनों बच्चे शांत हो जाते हैं।
उन की शांत मासूमियत देख कर उसे अच्छा लगता है।
वह बता रहा है कि, ‘गांधी
लिट्रेचर, गांधी के तमाम काम, उन की वैचारिकी आदि को जानने समझने के लिए
चाहिए तो एक पूरा दिन। सब कुछ देखोगे तो गांधी तुम्हारे दिल में उतर जाएंगे।’
‘वाव!’
मलयेशियाई लड़की बोली।
‘लेकिन
तुम लोग आधा दिन में भी यह सब कुछ कर सकते हो। फिर जाओ तीन मूर्ति। एक घंटे, डेढ़ घंटे यहां लगाओ। पंडित नेहरू को भी जानो।
फिर जाओ गांधी समाधि। एक घंटा, दो
घंटा यहां गुजारो। शांति भी मिलेगी, सुकून
भी। पीस एंड ट्रैक्यूलिटी!’
‘एंड
नेक्स्ट डे?’ मैप दिखाते हुए लड़का बोला।
‘नेशनल
म्यूजियम देखो।’ वह बोला,
‘चाहिए तो यहां
भी पूरा दिन। लेकिन चार-पांच घंटे यहां गुज़ारो। खा-पी कर दिन ग्यारह बजे जाओ।
खुलता ही तभी है। इत्मीनान से देखो। इंडियन कल्चर, हेरिटेज, हिस्ट्री एटसेक्ट्रा। नए-पुराने दोनों
भारत से रूबरू हो सकते हो। यहां से लोदी गार्डेन भी जा सकते हो। मौज- मस्ती करो और
शाम की फ़्लाइट से मुंबई उड़ जाओ। नेक्स्ट डे से वहां घूमो।’
‘ओ.
के.!’ कह कर चीनी लड़की बोली, ‘दिल्ली
इतने में ही फिनिश?’
‘नहीं
और भी बहुतेरी जगहें हैं। पर तुम लोगों के पास टाइम कहां है? अगर स्प्रिचुअल हो तो लोटस टेंपल देख सकती हो।
बहाई लोगों का। बिरला मंदिर है। निजामुद्दीन औलिया की मजार है। पुराना किला है।
हुमायूं का मकबरा है। मिर्ज़ा गालिब का घर है। और भी तमाम चीजे़ं हैं, जगहें हैं, लोग
हैं।’ वह बोला लोग तो दिल्ली जाते हैं तो मेट्रो में भी घूमते हैं। पर मेट्रो तो
तुम्हारे देश में भी है ही। लेकिन जो नहीं है तुम्हारे यहां, और सिर्फ़ भारत में ही है, दिल्ली में ही है, कहीं और नहीं, मैं सिर्फ़ उस की बात कर रहा हूं।’
‘ओ.
के. सर!’ कह कर लड़का अपने बैग से मुंबई का मैप निकाल कर खोलता हुआ बोला, ‘प्लीज़ गाइड मी एबाउट मुंबई ।’
‘सारी
! मुझे मुंबई के बारे में बहुत ज़्यादा
नहीं पता। मैं खुद अभी तक मुंबई नहीं गया।’ वह बोला, ‘बाक़ी मैप तुम्हारे पास है ही। नेट और गूगल तुम्हारे पास है ही।’
‘ओ.
के. सर! ओ. के.!’ कह कर लड़के ने अपना लैपटॉप ऑन कर दिया।
‘आप
बिलकुल मेरे पापा की तरह बातों को पूरी ईमानदारी से बताते हैं।’ चीनी लड़की उसे
बहुत मान देती हुई बोली,
‘मेरे पापा भी जो
बात नहीं जानते उस के लिए आनेस्टली सॉरी बोल देते हैं। लेकिन जो बात जानते हैं
एक-एक डिटेल बड़ी मुहब्बत से बताते हैं। ' कह
कर वह भावुक हो गई।
‘तुम
भी तो मेरी बेटी की ही तरह उसी प्यार से मेरी बातें सुन रही हो। समझ रही हो।’
‘यस
अंकल!’
‘आई
एम आल्सो लाइक योर डॉटर!’ मलयेशियाई लड़की बड़े नाज़ से बोली।
‘बिलकुल!’
‘एंड
मी?’ लड़का जैसे व्याकुल हो गया।
‘यू
आर लाइक सन!’
‘वाव!
कह कर आ कर उस की बर्थ पर आ कर उस के गले लग गया। मारे खुशी के उस के आंसू आ गए।
थोड़ी देर बाद वह बोला, ’एक्चुअली मेरे फादर अब नहीं हैं। सो आई
मिस हिम!’ कह कर वह फिर रो पड़ा।
मलयेशियाई लड़की लड़के के पास आ गई है। उस के कंधे पर हाथ रख कर उसे
सांत्वना देती है। लेकिन वह लड़का गुमसुम है। निःशब्द है। लड़की कहती है, ‘अंकल प्लीज़!’
‘ओह
श्योर!’ और लड़के को खींच कर फिर से अपने गले लगा लेता है। उस का माथा चूम लेता है।
लड़का मंद-मंद मुसकुराता है। तीनों बच्चे मुसकुराने लगते हैं। ट्रेन के इस कोच की
यह केबिन जैसे किसी घर में तब्दील हो गई है।
फिर कोई स्टेशन आ गया है। बच्चों से बातचीत जारी है। टूटी-फूटी
अंगरेजी में। बच्चे जैसे सब कुछ बता देना चाहते हैं, सब कुछ जान लेना चाहते हैं फटाफट! लेकिन भाषा कई बार बैरियर बन जाती
है। बात समझ में नहीं आती। सब असहाय हो जाते हैं। उच्चारण में भी कई बातें डूब
जाती हैं। पर भावनाएं एक दूसरे की समझ जाते हैं। वह पूछता है कि, ‘तुम लोग बनारस भी घूमे क्या?’
‘हां
घूमे न। विश्वनाथ मंदिर, संकट मोचन। गंगा बाथ, एंड गंगा बोटिंग। घाट एंड आरती आलसो।’ चीनी
लड़की बोली, ‘वेरी मच इंज्वाय दिस होली प्लेस एंड
फेल्ट पीस।’
वह अचानक पूछ लेता है कि, ’तुम
लोग जो स्ट्रीट चिल्ड्रन प्रोजेक्ट पर काम कर के लौट रहे हो, वहां काम करते हुए यह लैंगवेज बैरियर नहीं आया?’
‘आया
न बार-बार आया।’ मलयेशियाई लड़की बोली।
‘हां
तुम लोग न हिंदी जानते हो,
न बांगला, न अच्छी इंग्लिश। फिर भी कैसे काम किया?’
‘फीलिंग्स
एंड फैक्टस!’ चीनी लड़की बोेली,‘ लोकल
लोग जो थोड़ी बहुत भी अंगरेजी जानते थे उन से हेल्प ली। बट इन बच्चों की बदहाली
जानने के लिए, उन का असुरक्षा बोध जानने के लिए जिस
चीज़ की ज़रूरत थी, वह हमारे पास थी।’
‘वो
क्या?’
‘फीलिंग्स
एंड सेंटीमेंट्स! इनवाल्वमेंट!’ चीनी लड़की कंधे उचकाते हुई बोली।
‘फीलिंग्स
तो ऐसी थी बल्कि है!’ सिंगापुरी लड़का बोला,‘ हम
लोग तब अपने को भी स्ट्रीट चिल्ड्रेन समझने लगे थे। बदहाल और पूरी तरह इनसिक्योर!’
वह ज़रा ज़ोर दे कर बोला, ‘कम्पलीटली अनाथ!’
‘तुम
तो अभी भी अनाथ हो!’ मलयेशियाई लड़की उसे चिढ़ाती हुई बोली।
‘हां, हूं!’ वह चिढ़ता हुआ ही बोला, ‘तो?’ वह
ज़रा देर रूका और उदास हो कर बोला, ‘तुम
लोग नहीं हो क्या?’
सब लोग, यकायक चुप हो गए। सन्नाटा सा छा गया
पूरी केबिन में। गहरा सन्नाटा!
‘हम
सभी अनाथ हैं!’ वही थोड़ी देेर बाद फिर धीरे से बोला, ‘वी आल आर स्ट्रीट चिल्ड्रेन ! टोटली इन सिक्योर! फीलिंग लेस! सारी
चिंता सिर्फ़ खाने की है। कि कैसे खाना मिले? क्रिमिनल्स
का कैरियर बन कर। यौन शोषण का शिकार हो कर या किसी धर्मार्थ संस्था की भीख पा कर
या चाइल्ड लेबर बन कर।’ वह जैसे फट पड़ा, ‘और
हम?’ वह बुदबुदाया,‘ किसी एन. जी. ओ. का टूल बन कर!’ वह किसी तरह
उसे शांत करवाता है। वह शांत तो हो जाता है। पर बुदबुदाता है, ‘बट इट्स ए फैक्ट अंकल!’
अचानक वेंडर आ गया है खाने का आर्डर लेने। बात बदल गई है।
मलयेशियाई लड़की खाने का आर्डर तुरंत देना चाहती है। पर चीनी लड़की उसे
रोकती है। और वेंडर को थोड़ी देर रूक कर आने को कहती है। वह जब चला जाता है तो वह
बताती है कि, ‘ट्रेन का बोगस खाना खा-खा कर हम बोर हो
गए हैं।’ वह ज़रा रूकती है और पूछती है, ‘अंकल
कमिंग स्टेशन पर कहीं बाहर से खाना बुक नहीं हो सकता फ़ोन पर?’
‘बाहर
से तो नहीं लेकिन लखनऊ स्टेशन पर एक बढ़िया
रेस्टोरेंट खुला है जहां मुगलिया नानवेज डिश मिलता है। ट्रेन वहां रूकेगी भी आधा
घंटा। तो तुम लोग खाना पैक करवा सकते हो जा कर।’
‘नहीं-नहीं
बुक करने पर खाना कोच में भी आ सकता है। मेरे पास उस का नंबर है। मैं अभी बुक कर
देता हूं। ऊपर की बर्थ पर बैठा लड़का यह कहते हुए चीनी लड़की की मदद में नीचे उतर
आया है। नीचे उतर कर वह मीनू पूछने लगता है। तो साइड पर बैठा एक आदमी उसे एक
चाइनीज रेस्टोरेंट की तजवीज देने लगता है। साथ ही चाइनीज रेस्टोरेंट का नंबर
मिलाने लगता है। मीनू पूछने लगता है। बात होते-होते ऊपर की बर्थ वाला लड़का और साइड
की बर्थ वाला आदमी बहस में उलझ जाते हैं। बात ही बात में साइड की ऊपर की बर्थ वाला
भी बहस में कूद पड़ता है। सब के सब लड़कियों की मदद में आ जाते हैं। अंततः चाइनीज रेस्टोरेंट वाला आदमी
अपना पलड़ा भारी मान कर बाकी दोनों को चुप रहने का फैसला सुना देता है। वह दोनों
चीनी लड़की और चाइनीज रेस्टोरेंट के नाम पर उदास होते हुए चुप भी हो जाते हैं। और वह
जैसे राजा बन कर कुछ चाइनीज डिश के नाम लेते हुए चीनी लड़की से पूछता है कि क्या
खाओगी? पर यह सब वह हिंदी में पूछता है सो
चीनी लड़की कुछ समझ नहीं पाती और हिकारत से पूछती है, ‘ह्वाट?’
अब वह ज़मीन पर आ जाता है। अंगरेजी बोल नहीं पाता । सो ऊपर की बर्थ
वाला लड़का कमान फिर संभाल लेता है और चाइनीज डिश की पूरी फे़हरिस्त खोल बैठता है।
लड़की यह सब सुनते-सुनते आजिज आ जाती है और धीरे से उस से कहती है, ‘नो-नो! इन इंडिया, आई लाइक वनली इंडियन डिश!’
यह सुन कर सब के मुंह खुले के खुले रह जाते हैं।
‘येस
आई लाइक वनली इंडियन फूड एंड वेजेटेरियन फूड ! ओ. के !’ चीनी लड़की बिलकुल दादी
अम्मा के अंदाज़ में बोलती है। कोई कुछ नहीं बोलता।
‘अंकल
प्लीज हेल्प मी !’ वह कहती है, ‘इन
लोगों से नंबर ले कर आप ही हमारे लिए अच्छी सी डिश बुक कर दीजिए !’
‘ओ.
के., ओ. के. !’
ऊपर की बर्थ वाला लड़का खुद बढ़ कर नंबर दे देता है और कि कुछ
वेजेटेरियन डिश भी बुदबुदाने लगता है।
कहता है, ‘ अंकल, हमारी भी इन से दोस्ती करवा दीजिए। आप तो लखनऊ उतर जाएंगे। मैं
दिल्ली तक जाऊंगा इन के साथ। इन सब को दिल्ली भी ठीक से घुमवा दूंगा। थोड़ी मेरी
तारीफ़ कर दो न!’
लेकिन अंकल उस लड़के की बातों में नहीं आते। खाना बुक कर के उस लड़के
से कहते हैं कि, ‘देखो ये सब सीधे बच्चे हैं। इन्हें
अपने ढंग से खाने और घूमने दो। आफ़्टर आल ये देश के मेहमान भी हैं। इन को भारत की
अच्छी इमेज़ ले कर अपने देश लौटने दो। कोई शार्ट कट की ज़रूरत नहीं है। यह सब
तुम्हारे ड्रामे की इंप्रेशन में आने वाले भी नहीं।’
‘तो
मैं ड्रामा कर रहा हूं? इंप्रेशन जमा रहा हूं? और आप अंकल?’
‘हमारे
तो तुम भी बच्चे हो और यह सब भी। बाक़ी तुम जानो। पर देश की शान, मान और मर्यादा रखना हम सब का काम है।’ वह बोला, ‘लाइन मारने की लिए पूरी दुनिया पड़ी है पर इन
बच्चों को बख्श दो!’
‘ओ.
के. अंकल, ओ. के.?’ कहते हुए उस लड़के ने हाथ जोड़े और अपनी बर्थ पर ऊपर चढ़ कर फिर सो गया।
थोड़ी देर बाद चीनी लड़की ने पूछा कि, ‘बात
क्या है अंकल?’
‘कुछ
नहीं बेटी! तुुम लोग अपनी जर्नी इंज्वाय करो।’
‘कुछ-कुछ
तो समझ में आया है आप दोनों की बात को फील किया है हम ने भी।’ वह बोली।
‘लीव
दैट बेटी, एंड इंज्वाय!’
‘आप
मुझे बेटी भी बोल रहे हैं और बता भी नहीं रहे।’
‘नथिंग
सीरियस!’ वह बोला, ‘ही इज़ ए गुड ब्वाय। डोंट वरी!’
‘ओ.
के.।’ कह कर वह चुप हो गई। और एक अंगरेजी गाना लगा कर सुनने लगी।
अंकल भी अपनी बर्थ पर कंबल ओढ़ कर लेट गए।
लखनऊ आ गया है। बच्चों का
खाना भी कोच में आ गया है। वह बच्चों को विश करते हुए ट्रेन से उतर आया है।
प्लेटफार्म पर। तीनों बच्चे भी ट्रेन से उतर कर उस के साथ प्लेटफार्म पर आ गए हैं।
बारी-बारी तीनों गले मिलते हैं। तीनों की आंखें नम हैं। ऐसे जैसे वह अपने पिता से
बिछड़ रहे हों। अंकल की भी आंखें छलक पड़ती हैं। वह भी तो अपने बच्चों से बिछड़ रहे
हैं।
-22-
एक आवारा रात विमान में विचरते हुए
जाना था जापान , पहुंच
गए चीन ! कल की रात मेरे साथ यही हो गया। बैंगलौर
से कल रात दस बजे की फ्लाइट थी।
लेकिन बैंगलौर के जालिम ट्रैफिक जाम और इंडिगो की मनमानी के चलते छूट गई। सवा नौ
बजे रात एयरपोर्ट के लाउंज में दाखिल हो गया। लेकिन लंबी लगी लाइन के चलते रुकना
पड़ा और अंतत: सब से निवेदन कर बोर्डिंग काउंटर तक पहुंचते -पहुंचते 9 - 30 हो गया।
काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने कहा कि अब आप लेट हो गए। फिर एक दूसरे काउंटर पर भेजा। वहां बैठी लड़की ने कहा कि अब
अगली फ्लाइट का टिकट लीजिए। मैं ने
प्रतिवाद किया कि अभी समय है। जाने दीजिए। लेकिन उस ने इंकार कर दिया। पूछा कि
कोई सीनियर मैनेजर हो तो बताएं। बताया उस ने। मैं गया। युवा मैनेजर ने कहा , आप पांच मिनट पहले भी आए होते तो कुछ करता। अब
नामुमकिन है। कह कर उस ने हाथ जोड़ लिया। मेरी दुबारा रिक्वेस्ट पर ए टी सी वगैरह
से बात का टोटका किया और फिर मना कर दिया। मैं ने बताया कि सवा नौ बजे से ही तो
यहां-वहां टहल रहा हूं। वह बोला , पर
आप मेरे पास अब आए हैं। मैं ने पूछा , फिर
? उस ने कहा , आप
मेरे पिता जैसे हैं , सो आप की मदद करना चाहता हूं। दो ऑप्शन
है। एक अभी 12 - 10 पर वाया पुणे एक फ्लाइट है जो सुबह 6 - 20 पर लखनऊ पहुंचा देगी। दूसरी सुबह दस बजे के
आस-पास है। दोपहर में डाइरेक्ट लखनऊ पहुंचा देगी। दोनों ही विकल्प में एक हज़ार
रुपए का अतिरिक्त भुगतान करना था। मैं ने रात एयरपोर्ट पर बैठ कर गुज़ारने के बजाय
जहाज में उड़ते हुए बिताने का फैसला लिया। कहां रात 12 - 30 तक लखनऊ आ जाना था , घर
का खाना नसीब होना था , अब एयरपोर्ट पर दो की जगह बीस खर्च कर
बासी-तिबासी भोजन नसीब में आया। मन खिन्न था सो कुछ ज़्यादा खाने का मन भी नहीं था।
वैसे भी एयरपोर्ट पर सारे दुकानदार डाकू की भूमिका में होते हैं। खाने-पीने की तो
खैर बात ही क्या। इन के दाम सुन कर फाइव स्टार होटल शर्मा जाएं। खैर , मजबूरी थी खाया-पीया।
थोड़ी देर में हवाई पट्टी पर पांव रखते ही खिन्नता भाग गई। सारा क्षोभ
भस्म हो गया। यह मौसम का जादू था। सावन की झूमती हवा का कमाल था। वैसे भी बैंगलौर
का ट्रैफिक जाम चाहे जितना बेहूदा हो , जितना
जालिम हो लेकिन मौसम सुहाना और जादुई है। मस्ती भरी हवा , तिस पर सावन के गहराते बादर मौज से मिलवा ही
देते हैं। अगस्त मास में ऐसा मस्त और दिलकश मौसम बैंगलौर की फिजा में ही चार दिन
महसूस किया। लखनऊ , गोरखपुर , दिल्ली में तो सावन की फुहारों के बावजूद उमस
का महीना है , अगस्त का महीना। लेकिन बैंगलोर में उमस
नहीं , उमंग थी मौसम की। खनक थी सावन की। चहक
और बहक में लिपटी हुई हवा थी। 17
अगस्त को दिन साढ़े दस बजे जब एयरपोर्ट पर उतरा था , तब ही से यह चहकी-बहकी हवा साथ हो चली थी। इस सनकी हवा का संग-साथ मन
में सुरूर भरने के लिए बहुत था। लगातार निर्झर झरती और बहती रही यह हवा। अब यही
मदमस्त हवा फ्लाइट छूटने के कारण मन के भीतर बसी तमाम खिन्नता और क्षोभ को भी धोती
हुई अपने साथ बहाए लिए जा रही थी। सीट पर
सिट डाऊन होते ही ग़ालिब याद आ गए। जगजीत सिंह की गायकी याद आ गई। आह को चाहिए इक
उम्र असर होने तक की तासीर ने मन को मगन कर दिया। तिस पर विंडो सीट। जगजीत की आवाज़
में ग़ालिब को सुनते-सुनते ही पुणे पहुंच गया। रात 1 - 35 पर वहां लैंड करते ही सावन की फुहार मिली। फुहार में भीजते हुए
लाऊंज में आया और फिर लाउंज से भी बाहर आ गया। फुहार बाहर भी मिली। सड़क किनारे
खुले एक रेस्टोरेंट में किसी की मेज पर थाल में रखा लाल , कुरकुरा डोसा दिखा। मन ललच गया। एक डोसा और काफी ले कर मैं भी बैठ गया। रात के
दो बज रहे थे। कारें आ-जा रही थीं। एयरपोर्ट से बाहर के रेस्टोरेंटों पर चहल-पहल
जारी थी। गोया कोई रेलवे स्टेशन हो। उस का कोई प्लेटफार्म हो। ऐसा माहौल किसी और
एयरपोर्ट पर या उस के बाहर मैं ने कभी नहीं देखा है , जैसा पुणे के एयरपोर्ट पर देख रहा था। इसी
रेस्टोरेंट में एक एयरलाइंस की कई सारी लड़कियां अपनी ड्रेस में बैठी अपने दो
सीनियर से काम करने के टिप्स ले रही थीं। सीनियर लोग भी पूरे बासिज्म और आसक्ति के
साथ लड़कियों के साथ मुखातिब थे। तभी बीस-बाईस बरस की एक लड़की खट-खट करती , मचलती उस खुले रेस्टोरेंट में बिलकुल खुली हुई
आई। शार्ट हाफ पैंट में। घुटने से भी ऊपर आधी खुली जांघ। कोट-पैंट और टाई में
उपस्थित आधा दर्जन लड़कियों को भी उस एक अकेली लड़की का यह लुक चौंका गया है । मेरी
मेज के सामने ही एक कुर्सी पर आ कर वह धप्प से बैठ गई। चौंका मैं भी। फिर मुझे लगा
कि यह पुणे है , क्या पता कोई फ़िल्म शूट हो रही हो।
लेकिन बड़े ध्यान से इधर-उधर चेक किया। कहीं , कोई
कैमरा , लाइट , डायरेक्टर नहीं था। अपने इस खुले लुक पर भटक रही , सब की निगाहों से बेख़बर वह लड़की काफी पीने लगी , सिगरेट का धुआं उड़ाती। उस के सिगरेट पीने की
अदा देख कर मुझे भी सिगरेट पीने का मन हो आया। तलब लग गई। पर अफ़सोस कि सिगरेट आदि
मैं कभी ख़रीद कर नहीं पीता। पीता नहीं हूं , पिलाई
गई है वाली स्थिति होती है मेरे साथ सर्वदा। बहरहाल कुरकुरा डोसा और गरम काफी , बरसते सावन की इस फुहार में अब आलू के स्वाद
में तब्दील हो रहा था। टाई , पैंट
, कोट में उपस्थित लड़कियां भी इस एक लड़की को
झुक-झुक कर , मुड़-मुड़ कर ऐसे देख रही थीं , गोया झूला झूल रही हों। इन लड़कियों के दोनों
बॉस भी अब टिप्स देने के बजाय टिप्स ले रहे थे। आंखों-आंखों में। कम वस्त्र पहने
एक लड़की इतना व्यस्त कर देती है एक साथ कई सारे लोगों को। अजब था यह देखना भी।
लवकुश दीक्षित का एक गीत याद आ गया है :
रुपदंभा बड़ी कृपण हो तुम
अल्पव्यसना कसे वसन हो तुम।
बहरहाल बेसिन में हाथ धोते हुए मैं ने शीशे में भी उसे भरपूर लुक
किया। ख़ूब ध्यान से। लेकिन उसे किसी की परवाह नहीं थी। रेस्टोरेंट से चलते हुए मैं
सोच रहा था कि इस का मतलब है , पुणे
में क़ानून व्यवस्था बहुत बढ़िया है। कि एक अकेली जवान लड़की रात दो बजे भी ऐसे ड्रेस
में निश्चिंत रह सकती है। यह अच्छी बात है। वापस लाउंज में आ कर बेमतलब इस दुकान , उस दुकान घूमने लगा। कभी किसी चीज़ का दाम
देखते-पूछते , कभी किसी चीज़ का। खरीदना मुझे कुछ नहीं
था , यह तो मैं जानता था। लेकिन ऊंघते , अलसाते यह दुकानदार भी क्या नहीं जानते थे कि
मुझे कुछ नहीं ख़रीदना। कितना तो धैर्य होता है इन में। दाम भले दस गुना , बीस गुना हो हर चीज़ का लेकिन इन दुकानदारों का
धैर्य तो सौ गुना होता है। फिर मैं ने सोचा कि आख़िर वह कौन लोग हैं जो सारा शहर , सारा बाज़ार छोड़ कर एयरपोर्ट पर इन डकैतों से
लुटने खातिर खरीददारी करते हैं। लोग खरीदते तो हैं , तभी यह दुकानें हैं। हालां कि पुणे का एयरपोर्ट मुंबई एयरपोर्ट के
आगे चूजा है। दिल्ली , लखनऊ , बैंगलौर , हैदराबाद आदि के आगे भी बौना है। बहुत
ही छोटा। कुछ-कुछ गौहाटी जैसा। फिर भी रौनक है यहां। उदासी नहीं तारी है , गौहाटी या कोझिकोड [ कालीकट ] एयरपोर्ट की तरह।
दुकानों के चक्कर मार कर एक कुर्सी पर बैठ गया हूं। बुद्धिनाथ मिश्र की कविताएं
सुनते हुए। गीतों में माधुर्य , कंठ
में मिठास मिल कर जैसे चंदन की खुशबू तिरती है बुद्धिनाथ जी के गीतों में। खेत की
सरसो भेजती रोज पीली चिट्ठियां अनगिन जैसे बिंब और मनुहार , उस की पुलक और मादकता । एक बार और जाल फ़ेंक रे
मछेरे जैसे आशावादी गीत। मन में जैसे पुकार भर देते हैं। उल्लास और मनुहार में
नहला देते हैं। नहला ही रही है सावन की
बरखा पुणे की हवाई पट्टी को। बिलकुल झूम कर। इधर बुद्धिनाथ जी गा रहे हैं ;
प्यास हरे, कोई घन बरसे
तुम बरसो या सावन बरसे
सावन ही नहीं बरस रहा , बादर
ही नहीं बरस रहे , बुद्धिनाथ जी के गीत भी बरस रहे हैं , मेरे मन में। बहुत भीतर तक। मैं भी बरस रहा हूं
किसी की याद में डूब कर। ब्रह्म वेला में इस बरखा की बहार में बुद्धिनाथ जी का गीत
जैसे पावस को पावन करते हुए मुझ अकिंचन को अपनी मादकता में महका और बहका रहा है।
चंदन के लेप की तरह। यह बरखा भी जैसे कितनों की प्यास हर लेना चाहती है। कितनों
में प्यास बो देना चाहती है। बरखा ऐसी ही होती है। बुद्धिनाथ जी को संदेश भेज कर
बता दिया है कि इस ब्रह्म वेला में आप को सुन रहा हूं। विमान उड़ने वाला है। आकाश
भर आप का साथ। खैर , भीजने से बचने की आड़ में एक जोड़ा आपस
में लिपटा जा रहा है। गोया दोनों , एक-दूसरे
का छाता हों। जवानी ऐसी ही होती है। कभी छाता बन जाती है , कभी छाता उड़ा देती है। हमारे पास फ़िलहाल कोई छाता नहीं है। सो
भीजते-भाजते हम भी सिट डाऊन हो गए हैं। विंडो से बरखा को निहारते हुए। यह सोचते
हुए कि पुणे कभी फिर बुलाना ऐसे ही अचानक , औचक। जैसे बरखा को बुला लिया है। रमानाथ अवस्थी
ने लिखा ही है :
जिंदगी ऐसी नदी है जिसमें
देर तक साथ बह नहीं सकते।
टेक ऑफ़ हो गया है। जहाज जब किसी शहर से उड़ता है तो उड़ते ही उस शहर का
वैभव , उस का सौंदर्य , उस की सामर्थ्य बता देता है। उतरते समय भी। ख़ास
कर रात में। शहर की रौशनी ,
शहर का खाया-पीया-जीया बता देती है।
समंदर , पर्वत सब। दिन हो तो उस की हरियाली , उस की गगनचुंबी इमारतें। अब अलग बात है कि आज
तक कोई विमान तो गगन चूम नहीं पाया , बादल
छू कर ही लौट आता है। तो इन मल्टी स्टोरी बिल्डिंग को गगनचुंबी आख़िर कहते क्यों
हैं। बुद्धिनाथ जी का काव्यपाठ जारी है बीच आकाश में। कोंपलों सी नर्म बांहों में
गुलमोहर के दिन के लिए भटकते हुए। जैसे ग़ालिब को जगजीत सिंह गा रहे थे बैंगलौर से
पुणे के बीच। तब बैंगलौर की मदमाती हवा का संग-साथ था , अब पुणे की बरखा की बहक और महक है। वह मोंगरा
था , यह चंदन है। सुगंध दोनों तरफ है। बस
सुमन नहीं है। आंख मूंदे सुनते-सुनते नींद का एक मीठा झोंका आ गया है । वैसे भी
मैं सुतक्कड़ बहुत बड़ा हूं। लेकिन कई बार रात में जागना अच्छा लगता है। जैसे आज की
रात। बहुत सारी रातें लिखते हुए
जगाती-जागती हैं तो कुछ रातें कुछ सुनते-देखते हुए। पर आज की रात तो हवा में , हवा से बतियाते हुए गुज़र रही है। कई बार रात
में भी हवाई यात्राएं हुई हैं पर ऐसी आवारा रात हवा में नहीं मिली। ऐसी आवारगी
नहीं मिली। आकाश में नहीं मिली। मदमाती हवा और बऊराई बरखा का ऐसा संग साथ हो और एक
साथ , एक रात में तीन-तीन प्रदेश और तीन-तीन
शहर की सरहद और उस की धरती को प्रणाम करने का यह दुर्लभ संयोग , यह आकाशीय आवारगी पहली बार नसीब हुई है। सड़कों
पर पैदल , स्कूटर और कार से तो बहुतेरी बार
आवारगी की है सूनी रातों में। अकारथ। पर किसी पूरी रात में ऐसी आकाशीय आवारगी तो
बस अब की ही मिली । ग़ालिब ,
बुद्धिनाथ मिश्र , माहेश्वर तिवारी और रमानाथ अवस्थी का काव्य
सुनते हुए ऐसी सुहानी यात्रा की सनक सर्वदा मिलती रहे। फ्लाइट ऐसे ही न छूटती रहे
पर ऐसी यात्रा , ऐसी आवारगी तो मिलती रहे। यह लीजिए
जैसे नींद का झोंका अचानक टूट गया था , उसी
झोंके के साथ नींद अचानक खुल गई है। विंडो से देख पा रहा हूं कि बादलों के झुंड पर
सूर्य की लाली पूरे सौंदर्य के साथ उपस्थित हो रही है। गोया कोई लाल नदी हो। कोई
पर्वत हो। कोई लाल पठार हो। उगते हुए सूर्य को हाथ जोड़ कर , सिर झुका कर प्रणाम करता हूं। पंडित रमानाथ
अवस्थी काव्यपाठ कर रहे हैं :
आज इस वक्त आप हैं,हम
हैं
कल कहां होंगे कह नहीं सकते।
जिंदगी ऐसी नदी है जिसमें
देर तक साथ बह नहीं सकते।
वक्त मुश्किल है कुछ सरल बनिये
प्यास पथरा गई तरल बनिये।
जिसको पीने से कृष्ण मिलता हो,
आप मीरा का वह गरल बनिये।
जिसको जो होना है वही होगा,
जो भी होगा वही सही होगा।
किस लिये होते हो उदास यहाँ,
जो नहीं होना है नहीं होगा।।
आपने चाहा हम चले आये,
आप कह देंगे हम लौट जायेंगे।
एक दिन होगा हम नहीं होंगे,
आप चाहेंगे हम न आयेंगे॥
लखनऊ आ गया है। लखनऊ की धरती , लखनऊ
की इस सुबह को प्रणाम !
-23-
एक जीनियस की विवादास्पद मौत
विष्णु प्रताप सिंह जीनियस तो थे ही स्मार्ट भी बहुत थे और प्राइवेट
सेक्टर की नौकरी में होने के बावजूद खुद्दार भी ख़ूब थे। यह उनकी खुद्दारी ही थी
जो उनकी ओर सब को बरबस खींचती थी। उनके प्रतिद्वंद्वी और विरोधी भी उनकी इस
खुद्दारी की ख़ास इज्जत करते। इनके बारे में और तमाम बातें लोग करते पर उनकी खुद्दारी की बात आती तो लोगों की
चर्चा में जैसे विराम आ जाता। पर अब जब वह मरे थे तो जितने मुंह उतनी बातें थीं।
क्यों कि वह स्वाभाविक मौत नहीं मरे थे और अपने शहर में नहीं मरे थे। हालांकि यह
लखनऊ शहर भी उनका अपना शहर नहीं था। पर चूंकि कोई तीन दशक वह इस शहर में गुजार
चुके थे, लगभग बस गए थे तो अब यह उनका अपना शहर
ही था।
लखनऊ वह जब पढ़ने आए झांसी के किसी गांव से तो नहीं जानते थे कि यहीं
बस जाएंगे। इंग्लिश लिट्रेचर से एम. ए. करने के लिए जब वह दाखिल हुए लखनऊ
यूनिवर्सिटी में तो यह दाखिला ही उनके लखनऊ रहने का सबब बन गया। एक क्लासफेलो से
उनकी आंखें लड़ीं तो उन्होंने फेरी भी नहीं। एम. ए. फाइनल करते न करते उन्होंने उस
क्लासफेलो से कोर्ट मैरिज कर ली। लड़की के घरवालों की ओर से ऐतराज बड़ा हलका सा था
लेकिन बाबू विष्णु प्रताप सिंह के घर से ऐतराज पहाड़-सा था। क्योंकि लड़की पिछड़ी
जाति की थी और वह चौबीस कैरेट के क्षत्रिय। लेकिन विष्णु बाबू इस पहाड़-से ऐतराज
से भी टकरा गए। सो घर वालों ने इनसे और इन्होंने घर वालों से नाता तोड़ लिया।
फिर तो बस गए लखनऊ में। भूल गए झांसी वांसी। मर गए लेकिन नहीं गए
झांसी। पुरखों की जमीन जायदाद की भी कभी नहीं सोची उन्होंने। लखनऊ में ही उन्होंने
तब की एक बड़ी कंपनी में बतौर अप्रेंटिस रोजी रोटी शुरू की।
पत्नी एक नर्सरी स्कूल में टीचर हो गईं। नौकरी में दोनों के उतार
चढ़ाव आते जाते रहे। गोया समुद्र में ज्वार भाटा। लेकिन विष्णु बाबू ने कंपनी नहीं
छोड़ी। अप्रेंटिस से शुरू हो कर पचास वर्ष से कम की उम्र में ही वह उसी कंपनी में
अब जनरल मैनेजर हो चले थे। जब कि पत्नी एक इंटर कालेज में लेक्चरर। इस बीच तीन
बच्चे भी हुए। एक बेटा पोलियो की चपेट में आ गया। वह बेटे को ले कर गए लिंब सेंटर, एक एक्सपर्ट डाक्टर को दिखाने। डाक्टर ने चेक
अप के दौरान कुछ बताने में कोई फैक्चुअल गलती
कर दी तो विष्णु बाबू उस एक्सपर्ट डाक्टर पर डपट पड़े। डाक्टर ने उल्टा
उन्हें डपटते हुए पूछा कि,
‘डाक्टर मैं हूं
कि आप ?’
‘डाक्टर
आप ही हैं पर मेडिकल साइंस आप ठीक से नहीं जानते। लेकिन मैं जानता हूं।’ कह कर
उन्होंने बेटे को वहां से उठाया और चलने लगे। साथ गए दो दोस्तों और पत्नी ने टोका
भी कि, ‘बड़ा डाक्टर है !’ और जोड़ा भी कि, ‘बेटे की जिंदगी का सवाल है !’ पर विष्णु बाबू
माने नहीं। बोले, ‘बेटे की जिंदगी का चाहे जो हो पर इस मूर्ख डाक्टर को जो
मेडिकल साइंस ठीक से नहीं जानता उसके हाथों मैं अपने बेटे की जिंदगी हरगिज हवाले
नहीं कर सकता।’
‘बड़े
बदतमीज आदमी हैं आप !’ डाक्टर बोला, ‘आख़िर
किस बेस पर आप बोल रहे हैं कि मैं मेडिकल साइंस नहीं जानता।’
‘बेस
यह रहे !’ कह कर विष्णु बाबू ने अपना ब्रीफकेस खोल कर पोलियो से जुड़े तमाम देशी
विदेशी लिट्रेचर डाक्टर की मेज पर पटक दिए ! बोले, ‘मेडिकल कालेज में तो आप ठीक से नहीं पढ़े। अब से पढ़ लीजिए। फिर
पेशेंट्स देखिए !’
डाक्टर हकबक रह गया।
विष्णु बाबू बेटे को ले कर घर आ गए।
दरअसल विष्णु बाबू भले प्राइवेट कपंनी की नौकरी में थे पर चीजों के
बारे में जानने की उनकी ललक उन्हें आल राउंडर बनाए रहती। सांइस, मेडिकल साइंस, हिस्ट्री, ज्यागर्फी, पॉलिटिक्स, स्पोर्ट, कामर्स से लगायत फिजिक्स, लिट्रेचर यहां तक कि ज्योतिष और खगोल शास्त्र
तक के विषयों पर वह हमेशा अपडेट रहते। टाइम, न्यूजवीक, आब्जर्वर जैसी पत्रिकाओं, अख़बारों को वह नियमित मंगाते और पढ़ते थे।
जानकारी का जज्बा इतना कि फुटपाथी दुकानों तक से वह काम की किताबें छांट कर सस्ते
दामों में ले आते। इतवार को नक्खास बाजार में लगने वाली कबाड़ मार्केट तक से वह
तमाम किताबें छान लाते। सो किसी भी विषय पर पूरे कमांड के साथ वह बतियाते।
क्षत्रिय वह भले थे पर मांसाहार और शराब छूते तक न थे। हां, मिठाई उनकी कमजोरी थी। वह कहते भी कि, ‘इस मामले में मैं ब्राह्मण हूं।’ वह जोड़ते, ‘ब्राह्मणम् मधुरम् प्रियम् !’ वह खुद भी खूब
मिठाई खाते और यार दोस्तों को भी खिलाते। वह हमेशा सूटेड बूटेड रहते पर टाई नहीं
लगाते। टाई की जगह स्कार्फ बांधते। वह जब कभी मूड में होते तो स्कार्फ ढीली टाइट
करते, किसी दोस्त को पटाते हुए कहते, ‘आओ चलो, तुम्हें
मिठाई खिलाते हैं!’
विष्णु प्रताप सिंह की जिंदगी ऐसे ही मिठास क्षणों को जीते-भोगते
गुजर रही थी।
कि अचानक उनकी जिंदगी में एक नमकीन क्षण आ गया। उनकी एक नई पर्सनल
असिस्टेंट आ गई। थी तो वह पचीस-तीस के बीच की और नाम के आगे कुमारी लिखती थी। पर
जल्दी ही अफवाह उड़ी कि वह डाइवोर्सी है। इस अफवाह में एक पुछल्ला यह भी जुड़ा कि
उसके दो बच्चे भी हैं। जो भी हो यह बात अफवाह थी या सच इसकी सत्यता न किसी ने
जांची, न आगे जांचने की जरूरत समझी।
अफवाहबाजों को तो इसके तथ्य और सत्य को जानने में जरा भी दिलचस्पी नहीं थी। वह तो
उसके चाहने वालों की क्यू में लग गए थे। क्या बुड्ढे क्या जवान ! सभी क्यू में थे।
उस की मदद, उस की रक्षा में हाजिर !
उस लड़की का नाम बिंदू बंसल था और वह तमाम सहयोगियों की ‘मदद’ और
‘रक्षा’ वाली लालसा की लपटों से परेशान थी। पर इस लालसा लपट की सूची में अभी तक
उसके बॉस विष्णु प्रताप सिंह नहीं समाए थे। बिंदू ने लालसा लपट उम्मीदवारों से
सुरक्षा ख़ातिर एक ख़ामोश गुहार विष्णु प्रताप सिंह से की। पर उन्होंने इस ओर तब कुछ ख़ास ध्यान नहीं
दिया। बिंदू की ख़ामोश गुहार को रुटीन के जंगल में छोड़ दिया। लेकिन रुटीन के इस
जंगल में कुत्ते, भेड़िए बहुत थे सो उसने एक दिन शेर से
स्पष्ट रूप से सुरक्षा की गुहार लगा दी।
विष्णु प्रताप सिंह हालां कि पचास की उम्र पार कर गए थे पर एक बार प्रेम विवाह के
भंवर में लिपटने के बाद अन्य औरतों में उनकी दिलचस्पी लगभग नहीं रह गई थी। उनकी
सारी दिलचस्पी मिठाई में थी। पर अब बिंदू नाम की एक औरत उनसे सुरक्षा की भीख मांग
रही थी। और वह जाने क्यों अब चाह कर भी उसे रुटीन के जंगल में छोड़ना नहीं चाहते
थे। सो वह रुटीन के जंगल में शिकार तलाशते कुत्ते, भेड़ियों से बिंदू को बचाने के लिए बिलकुल जंगल के राजा शेर की ही
तरह सामने आ गए। कुछ चीते,
तेंदुए टाइप के लोग अफनाए भी पर सिर्फ
अफना कर रह गए।
सामने शेर जो था। जंगल का राजा।
बिंदू बंसल अब बिंदू जी कहलाने लगी थीं। किसी कि हिम्मत ही नहीं
पड़ती आंख उठा कर उन्हें देखने की। पीठ पीछे चाहे जो टिप्पणी चलाएं लोग लेकिन
बिंदू जी के सामने चीते, तेंदुए, कुत्ते, भेड़िए आदि सभी की नजरें नत रहतीं।
क्या सीनियर, क्या जूनियर सभी की।
बिंदू जी आख़िर विष्णु प्रताप सिंह की रक्षा-सुरक्षा में थीं और वह
कंपनी के जनरल मैनेजर थे। जंगल के राजा।
कुत्तों, भेड़ियों ने तो नहीं पर चीता, तेंदुआ टाइप लोगों ने इस रक्षा-सुरक्षा का रंग
पूरा मसाला मिला कर पहले कंपनी के एम. डी. और फिर चेयरमैन तक पहुंचाया। पर चेयरमैन
और एम. डी. ने अपने खुद्दार जनरल मैनेजर के खि़लाफ ऐसी खुसफुस टाइप की शिकायत को
सुना ही नहीं। कहा कि, ‘कंपनी के काम में जो कोई लापरवाही वह
कर रहे हों तो बताएं।’ और बात यहीं ख़त्म हो गई।
पर विष्णु-बिंदू की बात ख़त्म नहीं हुई। सुलगती रही।
बिंदू जी तो नहीं पर विष्णु जी अब जब तब बिंदू जी के घर भी जाने लगे।
बात आगे और बढ़ी। अब वह गले की स्कार्फ ढीली-टाइट करते बिंदू जी को मिठाई भी
खिलाने लगे। तेंदुआ, चीता टाइप लोगों ने बिंदू मिठाई में
नमक मिला कर विष्णु प्रताप सिंह की पत्नी
को परोसा। पर उन्होंने इस नमक को इस ख़ामोशी से सुना कि जैसे कुछ सुना ही नहीं और
जब सुना ही नहीं तो कोई जवाब या प्रतिक्रिया भी नहीं आई। उन्होंने तो विष्णु
प्रताप सिंह तक से इस नमक का जिक्र नहीं किया। पर इधर तो नमक अब ब्लड प्रेशर की
हदें लांघते हुए बढ़ रहा था।
अब दफ्तर में विष्णु प्रताप सिंह का नया नाम चल गया था शुगर और बिंदू
बंसल का नाम ब्लड प्रेशर ! पर पीठ पीछे और खुसफुस अंदाज में । अब जहां शुगर और
ब्लड प्रेशर दोनों एक साथ हों वहां सेहत पर कुछ न कुछ असर तो पड़ेगा ही। पड़ा भी, बात एम. डी. तक फिर पहुंचाई गई। जनरल मैनेजर
विष्णु प्रताप सिंह के पास फोन आया एम. डी. का। विष्णु प्रताप सिंह ने उलटे एम.
डी. को डपट लिया, ‘आप की हिम्मत कैसे हुई मुझ से ऐसी रबिश
टाक की !’ कह कर उन्होंने फोन पटक दिया। बिंदू जी को बुलाया। इस्तीफा बोल कर
लिखवाया। कहा कि ‘तुरंत टाइप करके ले आओ !’
‘लेकिन
विष्णु जी अचानक ? आख़िर....।’ बिंदू बंसल की जबान
फंस-फंस जा रही थी।
‘कहा
कि तुरंत टाइप कर ले आओ।’ विष्णु प्रताप सिंह बिंदू बंसल पर गरजे।
‘मैं
कहती हूं एक बार पुनर्विचार कर लीजिए !’ बिंदू बंसल बोलीं, ‘मेरी बात मान लीजिए !’ वह रुआंसी हो गईं।
‘सब
विचार कर लिया है।’ वह बोले, ‘तुम
टाइप कर रही हो कि मैं हाथ से लिख लूं ?’ विष्णु
प्रताप सिंह अब की डपट कर नहीं, बड़े
सर्द आवाज में बोले। बिंदू बंसल समझ गईं
कि मामला संगीन है। सो ‘अभी टाइप कर लाती हूं सर !’
उसी तरह सर्द आवाज में बोलती हुई बिंदू बंसल चैम्बर से बाहर निकल
गईं। उनकी शोख़ चाल भी इस क्षण सर्द चाल में बदल गई थी।
बिंदू बंसल को विष्णु प्रताप सिंह का इस्तीफा टाइप करने में ज्यादा
समय नहीं लगा। कंप्यूटर पर हालांकि उनकी उंगलियों की दस्तक बड़ी ठंडी थी पर दफ्तर
में यह ख़बर गरम थी कि विष्णु प्रताप सिंह की एम. डी. ने खाल खींच ली है।
इस्तीफा पर दस्तख़त कर चपरासी से एम॰ डी॰ के पास भेज कर विष्णु
प्रताप सिंह अपनी व्यक्तिगत चीजें बटोरने लगे। किताबें ज्यादा थीं।
बिंदू बंसल भी उनकी मदद में थीं। अभी वह यह सब सहेज ही रहे थे कि फोन
फिर बजा। विष्णु प्रताप सिंह ने खुद उठाया। उधर से एम. डी. थे, ‘यह इस्तीफा क्यों भेज दिया ?’ उन्होंने बात को टालते हुए कहा, ‘अरे, मैंने
तो सिर्फ मजाक किया था आप से ! भूल जाइए उस बात को।’
‘मेरा
आप का मजाक का रिश्ता रहा है कभी ?’ विष्णु
प्रताप सिंह बोले, ‘अभी आप की उम्र हमसे मजाक की नहीं है।
आप के पिता और इस कंपनी के चेयरमैन तक ने कभी मुझ से कोई हलकी बात नहीं की और फिर
मैंने कंपनी को कहां से कहां पहुंचाया है, इसका भी लिहाज नहीं आया आप को ?’ विष्णु प्रताप सिंह बहुत ठंडे ढंग से बोले, ‘मेरा इस्तीफा मंजूर करने का अगर आप में दम नहीं
है तो इसे अपने पिता के पास दिल्ली भिजवा दीजिए।’
‘लेकिन
सुनिए तो !’
‘कुछ
नहीं, मैंने इस्तीफा दे दिया है और थोड़ी देर
में घर जा रहा हूं।’ कह कर विष्णु प्रताप सिंह ने फोन रख दिया।
थोड़ी देर बाद वह जब अपनी कुछ व्यक्तिगत चीजों और किताबों से
लदे-फंदे दफ्तर से बाहर निकले तो कैम्पस के गेट पर दरबान ने उन्हें रोक लिया।
विष्णु प्रताप सिंह ने दरबान से डपट कर पूछा, ‘क्या
बात है ?’
‘साहब, तलाशी लेनी है !’ दरबान जरा बेरुखी से बोला।
‘मेरी
तलाशी !’ विष्णु प्रताप सिंह सकपकाए। बोले, ‘लेकिन
यह सब मेरी व्यक्तिगत चीजें हैं।’ कार का फाटक खोलते हुए उन्होंने दरबान से आतुर
हो कर कहा, ‘तुम खुद देख लो। कंपनी की कोई भी चीज
नहीं है।’
‘पर
साहब आप कुछ नहीं ले जा सकते।’ दरबान बोला, ‘एम.
डी. साहब ऐसा ही बोला है।’
‘रुको
मैं खुद एम. डी. से बात करता हूं।’ कार से उतर कर वाचमैन हट में रखे इंटरकाम फोन
की ओर विष्णु प्रताप सिंह बढ़े।
‘लेकिन
एम. डी. साहब दफ्तर में नहीं हैं।’ दरबान उनको फोन करने से रोकते हुए बोला।
‘पर
अभी तो थे। मेरी बात भी हुई है।’ विष्णु प्रताप सिंह आहत होते हुए बोले।
‘हां, थे तो पर अभी-अभी पांच मिनट पहले निकल गए।’ कह
कर दरबान दो दूसरे आदमियों से कह कर कार के भीतर से किताबें वगैरह निकलवाने लगा।
एक क्लर्क आगे बढ़ कर सामानों की लिस्ट बनाने लगा। दफ्तर के और भी लोग गेट पर
इकट्ठे होने लगे। विष्णु प्रताप सिंह के अपमान की इंतिहा थी यह। बाकी सामान
उन्होंने खुद कार से निकाल कर बाहर फेंका और कार स्टार्ट कर चलने लगे तो दरबान ने
उन्हें फिर रोका। तो विष्णु प्रताप सिंह उसे गुरेरते हुए लेकिन सर्द आवाज में बोले, ‘अब क्या है ? सब तो खुद ही निकाल दिया।’
‘हां, लेकिन पीछे डिग्गी भी देखना है !’ दरबान पूरी
बेरुखी से बोला।
‘ओफ्फ
! इतना ह्यूमिलिएशन !’ वह बुदबुदाते हुए कार बंद कर बाहर निकले। डिग्गी खोली। बोले, ‘ठीक से देख लो। कहो तो इंजन भी खोल दूं।’
‘नहीं
साहब, इंजन मत खोलिए।’ डिग्गी में रखी
स्टेपनी हिला डुला कर देखते हुए दरबान बुदबुदाया, ‘साहब गुस्सा मत होइए। गरीब आदमी हूं, नौकरी कर रहा हूं।’
‘ठीक
है, ठीक है।’ खीझते हुए विष्णु जी ने कार
स्टार्ट की। पर गेट पर आ बटुरे दफ्तर का एक भी आदमी उनकी सहानुभूति में आगे नहीं
आया। बिंदू बंसल भी नहीं। वह तो अपने क्यूबिकल से ही बाहर नहीं आईं।
पर गेट पर विष्णु जी के साथ क्या-क्या घटा उसका पूरा ब्यौरा
बारी-बारी कई लोगों ने लगभग तंज करते हुए उन्हें सुनाया। पर बिंदू बंसल ने कोई
प्रतिक्रिया नहीं दी।
लोगों ने कयास लगाया कि बिंदू बंसल भी कल से आफिस नहीं आएंगी। लेकिन
वह दूसरे दिन क्या चौथे, पांचवें दिन भी आईं। बावजूद इस रुटीन
के जंगल में चीतों, तेंदुओं, कुत्ते, भेड़ियों की बढ़ आई गश्त के। इनकी गश्त
बढ़ गई थी और उन का शेर इस्तीफा दे गया था।
बिंदू बंसल परेशान थीं। बेहद परेशान। पर परेशानी की लकीरें चेहरे पर
वह नहीं आने देती थीं।
एक पुराना एडिशनल जनरल मैनेजर अब कंपनी का नया जनरल मैनेजर बना दिया
गया था। बिंदू बंसल अब इस नए जनरल मैनेजर की मातहत थीं। नया जनरल मैनेजर यानी इस
रुटीन के जंगल का नया राजा। पर बिंदू बंसल ने न सिर्फ उसे अपना शेर नहीं माना
बल्कि उसकी उपेक्षा भी शुरू कर दी। पांच बजते न बजते उनका बैग तैयार हो जाता और वह
चलने लगतीं तो नया जनरल मैनेजर उन्हें थोड़ी देर और रुकने को कहता। वह टालती हुई
बोलतीं, ‘सर देर तक रुक पाना मेरे लिए पॉसिबिल
नहीं है।’ वह जोड़तीं, ‘एक तो अंधेरा हो जाता है दूसरे, घर में भी बहुत काम है।’
‘पर
पहले तो आप रात दस-दस बजे तक रुकती थीं।’ नया जनरल मैनेजर द्विअर्थी मुसकान फेंकता
हुआ बोलता, ‘तब अंधेरा नहीं होता था ?’ वह लगभग आदेश देता, ‘अभी बैठिए कुछ जरूरी काम है। देर होने पर कंपनी
की कार आपको घर छोड़ आएगी।’ बिंदू बंसल फिर भी आनाकानी करतीं तो जनरल मैनेजर लगभग
किचकिचाता, ‘देखिए नौकरी करना आप की मजबूरी है यह
मैं जानता हूं। इस लिए जैसा कहता हूं चुपचाप वैसा ही कीजिए।’ इशारा साफ होता कि
मेरे साथ भी वही संबंध रखो और मेरी गोद में आ जाओ। जैसे पुराने जनरल मैनेजर के साथ
मिठाई खाती थी, मेरे साथ भी खाओ। पर बिंदू बंसल नए
जनरल मैनेजर की मिठाई खानी तो दूर उसकी मिठाई की ओर देखती भी नहीं थीं। यह बात नए
जनरल मैनेजर को नागवार गुजरती और वह तरह-तरह से बिंदू बंसल को तंग करता। एक बार
उसने बहक कर बिंदू बंसल का हाथ पकड़ लिया तो बिंदू बंसल ने झट दूसरे हाथ से अपनी
सैंडिल निकाल ली। ऐन वक्त पर चपरासी ने बीच बचाव किया।
बात आगे बढ़ गई। बिंदू बंसल को अनुशासनहीनता के आरोप में डिसमिस करने
की जनरल मैनेजर ने पहल की। पर इस कंपनी में ट्रेड यूनियन तब स्ट्रांग थी।
यूनियन के लोग आगे आए और बिंदू बंसल के डिसमिसल की बात यहीं दफन हो
गई। फिर भी वह लंबी छुट्टी पर चली गईं। मेडिकल लीव पर। अफवाहों ने फिर हवा पकड़ी
कि मेडिकल लीव नहीं, एबॉर्शन लीव पर गईं हैं मैडम। तो कोई
कहता नहीं मिस्टर शुगर के यहां ब्लड प्रेशर जी अपना प्रेशर बढ़ाने गईं हैं। कोई
कहता कि अब क्या आएंगी ? लेकिन बीस दिन के मेडिकल लीव के बाद
फिटनेस सर्टिफिकेट के साथ वह आईं। उसी दिन उनका ट्रांसफर एकाउंट्स सेक्शन में कर
दिया गया।
जाति की बनिया भले थीं बिंदू बंसल पर एकाउंट्स में जीरो थीं। हाई
स्कूल तक में मैथ उन्होंने नहीं पढ़ी थी। होम साइंस ले कर किसी तरह हाई स्कूल पास
कर इंटर किया था। बी. ए. में दो बार फेल हो कर किसी तरह सोसियोलॉजी, एजूकेशन, साइकॉलजी
टाइप सब्जेक्ट ले कर थर्ड डिवीजन पास हुई थीं और अब एकाउंट्स सेक्शन से उनका पाला
पड़ा था। दूसरे, एकाउंट्स का सेक्शन हेड नए जनरल मैनेजर
का चंपू था। एकाउंट्स सिखाने के नाम पर वह बिंदू बंसल को अपने पास ही बैठाता था और
जब तब द्विअर्थी बातें करता रहता। वह हिप से ब्रा साइज तक की बातें करता और खुसफुसा
कर पूछता, ‘बिना मर्द के आप कैसे रहती हैं ?’ बिंदू बंसल उसकी बातों का बिना जवाब दिए
ख़ामोशी से पी जातीं। लेकिन सेक्शन हेड की द्विअर्थी बातों का पिटारा ख़त्म नहीं
होता। उकता कर बिंदू उठ खड़ी होतीं। तो खीझ कर वह पूछता, ‘क्या बात है ?’
‘बाथरूम
जा रही हूं।’
‘क्या
खाती हो जो इतना बाथरूम जाती हो ?’ वह
किचकिचा कर लेकिन इस बात को द्विअर्थी टच दे कर खुसफुसा कर पूछता। बिंदू बंसल
निरुत्तर हो जातीं और बाथरूम जाने के बजाय बैठ जातीं। थोड़ी देर बाद सेक्शन हेड
द्विअर्थी मुसकान फेंकता पूछता, ‘रुक
गई क्या ?’
‘क्या
?’ बिंदू बंसल अचकचा कर पूछतीं।
‘अरे, वही बाथरूम और क्या ?’ फिर वह तुरंत जोड़ता,’ आप का पीरियड आज तक कभी रुका है कि नहीं ?’
बिंदू बंसल तिलमिला कर रह जातीं। पर बोलतीं फिर भी कुछ नहीं। क्यों
कि नौकरी उनकी सचमुच की मजबूरी थी और वह सेक्शन हेड की शिकायत भी नहीं करतीं।
क्यों कि वह सारी बातें खुसफुसा कर धीमी आवाज में ही करता। दूसरे, वह नए जनरल मैनेजर का चंपू था। तीसरे, इस में उन की ही बदनामी थी। क्यों कि पुराने
जनरल मैनेजर विष्णु प्रताप सिंह के साथ उनका नाम उछल ही चुका था। सो वह चुप ही
रहतीं।
विष्णु प्रताप सिंह लखनऊ की यह कंपनी छोड़ने के कुछ दिन बाद दिल्ली
की एक बड़ी कंपनी में कंसलटेंट हो गए थे। पर बिंदू बंसल को वह भूले नहीं थे। जब
कभी लखनऊ आते तो अपने परिवार से भी ज्यादा समय वह बिंदू बंसल के साथ बिताते।
दिल्ली से वह उन्हें जब तब फोन भी करते और चिट्ठियां भी लिखते। फोन पर खुल कर बात
संभव नहीं बन पाती और चिट्ठियां घर में या दफ्तर में किसी और द्वारा पढ़ लिए जाने
का ख़तरा होता। सो चिट्ठियों में भी वह संकेतों में ही अपनी बात लिखते। हालां कि
बाद में बिंदू बंसल ने चिट्ठियों के लिए डाक घर में एक बाक्स नंबर ले लिया। लेकिन
बात सिर्फ चिट्ठियों से ही नहीं निपटने वाली थी। वह अपनी कुछ-कुछ परेशानियां
विष्णु जी को बतातीं और कुछ-कुछ क्या ज्यादा कुछ छुपा जातीं। क्यों कि दिल्ली में
विष्णु जी भी परेशान ही थे। इस नई कंपनी में उन्होंने देखा कि पुराने अनुभवी और
काबिल मैनेजरों की कोई ख़ास जरूरत नहीं थी। ज्यादातर जगहों पर, नए-नए एम. बी. ए. वाले लड़के-लड़कियों की भरमार
भी थी और डिमांड भी। पुरानों की जरूरत लगभग नहीं थी। हां, रिटायर्ड आई. ए. एस॰, आई॰, पी.
एस. अफसरों की खपत जरूर थी। जो प्रशासनिक और अन्य कामों के बजाय कंपनी के लिए
लॉयजनिंग के कामों में ज्यादा लगाए जाते थे और वेतन के नाम पर मोटी रकम डकारते।
सो विष्णु जी दिल्ली में एक तरह से अनफिट और अनसेटिल्ड थे। तो ऐसे
में वह बिंदू बंसल को दिल्ली में भला कहां एडजस्ट करवाते ? लेकिन बिंदू बंसल की सेक्शन हेड से पंगेबाजी
बढ़ती ही जा रही थी। एक दिन एक लेजर में भारी हेर फेर दिखा कर बिंदू बंसल को अपने
आगोश में इनवाइट करने पर आमादा हो गया। बोला, ‘कुछ
नहीं होगा। मैं बचा लूंगा। बस आज शाम मेरे साथ फला होटल चली चलो।’
‘सवाल
ही नहीं !’ बिंदू बंसल ने बड़ी सख़्ती से कहा।
‘तो
फिर तुम्हें अब ब्रह्मा भी नहीं बचा सकते।’ सेक्शन हेड बोला, ‘कंपनी
तुम्हें डिसमिस तो करेगी ही, हेराफेरी
के आरोप में एफ. आई. आर. भी दर्ज कराएगी। और यूनियन इसमें कुछ नहीं कर पाएगी।
क्यों कि मामला स्पष्ट रूप से हेराफेरी का
है।’ बिंदू बंसल सेक्शन हेड के दबाव में आ गईं। होटल तो उसके साथ शाम को नहीं गईं
पर आफिस के पर्सनल डिपार्टमेंट में जा कर अपना इस्तीफा सौंप गईं।
विष्णु जी को रात फोन कर अपने इस्तीफा की ख़बर दी और कहा कि ‘विष्णु
जी प्लीज मेरे लिए भी दिल्ली में ही कुछ प्रबंध कीजिए।’ उन्होंने जोड़ा, ‘आफिस की तो प्राब्लम जो यहां थी सो थी ही, सच यह भी है कि अब मैं आप के बिना भी नहीं रह
सकती। सो प्लीज कुछ कीजिए !’ दो तीन महीने लखनऊ में यहां वहां भटकने के बाद सचमुच
वह दिल्ली चली गईं पर तब तक विष्णु जी भी फिर से इस्तीफा दे चुके थे और इधर-उधर
मार पीट कर सो काल्ड कंसलटेंसी कर रहे थे।
पर गुजारे लायक पैसे बटोर लेते थे। लखनऊ में खर्चे की चिंता उन्हें वैसे भी नहीं
थी। पत्नी की लेक्चररशिप चल रही थी और शांति से चल रही थी। पर बिंदू जी के भी
दिल्ली पहुंच जाने की ख़बर से उनकी पत्नी निशा कुशवाहा की शांति में थोड़ी खलल
जरूर हुई पर विष्णु जी से उन्होंने फिर भी तब कुछ नहीं कहा। शुरू-शुरू में विष्णु
जी ने लोक लाज की परवाह करते हुए बिंदू बंसल के दिल्ली में रहने की अलग व्यवस्था
की। पर यह अलग वाली व्यवस्था बाद में भारी पड़ने लगी। लगभग सो काल्ड कंसल्टेंसी
में तीन-तीन इस्टेब्लिशमेंट चलाना विष्णु जी को भारी पड़ने लगा। हालां कि लखनऊ में
परिवार का खर्च पत्नी चलाती थीं तो भी दिल्ली से लखनऊ भी आने जाने का खर्च तो था
ही। इसे ही वह तीसरा इस्टेब्लिशमेंट कहते। इस बीच बिंदू बंसल के लिए छोटी मोटी
नौकरी की ख़ातिर खुद भी दौड़ भाग की उन्होंने। जान-पहचान के दायरे में वह बिंदू
बंसल को अपने परिचय के मार्फत भेजना नहीं चाहते
थे। फिर भी एक कंपनी में कुछ जगहें उन्हें पता चलीं जहां बिंदू जैसी
औरत एडजस्ट हो सकती थी। वहां का मैनेजर चावला विष्णु प्रताप सिंह को जानता भी था।
यह बात उन्होंने बिंदू बंसल को बताई और उसके कुछ डिटेल्स दिए कि कैसे वह कनविंस
होता है और कहा कि, ‘जाओ यहां तुम्हारी नौकरी पक्की है।’
साथ ही जोड़ा भी कि, ‘लेकिन मेरा जिक्र भूल कर भी नहीं करना
!’ बिंदू बंसल सज-धज कर टैक्सी से पहुंचीं विष्णु जी के साथ कनॉट प्लेस जहां उस
कंपनी का दफ्तर था। पालिका बाजार की पार्किंग से दोनों अलग हो गए। बिंदू बंसल, चावला के पास इंटरव्यू के लिए पहुंचीं। विष्णु
जी की बताई तरकीबों को आजमाया। चावला सचमुच प्रभावित हो गया। बिंदू बंसल बातचीत
में बिलकुल निश्चिंत हो गईं कि अब तो यह नौकरी उनके हाथ में है। चावला ने उनसे
पूछा भी कि, ‘कब से ज्वाइन करना चाहेंगी ?’ बिंदू बंसल कुछ जवाब देतीं कि तभी ‘हाय गजब
कहीं तारा टूटा’ वाली बात हो गई। चावला ने अचानक दुबारा बायोडाटा पर नजर डालते हुए
होंठ गोल किए और बोला, ‘ओह तो आप इस कंपनी में लखनऊ में काम कर
चुकी हैं?’
‘जी
मैं लखनऊ की ही हूं।’ बिंदू बंसल पूरे कानफिडेंस के साथ बोलीं।
‘ओह
तब तो आप विष्णु प्रताप सिंह को भी जानती होंगी....?’
‘नो
सर !’ चावला की बात काटते हई बिंदू बंसल पूरे कानफिडेंस से अतिरिक्त चतुराई घोलती
हुई बोलीं, ‘बिलकुल नहीं सर !’
‘अच्छा
!’ चावला ने कंधे उचकाए। बोला, ‘पर
मैं जानता हूं। ही इज ए नाइस मैंन। बहुत ही खुद्दार, बहुत ही तेज। जीनियस है वह जीनियस !’ चावला रुका और बोला, ‘पर उसी कंपनी में जिस में वह बरसों जी. एम. रहा, आप ने भी काम किया और उस जीनियस को आप नहीं
जानतीं ?’
‘नो
सर ! वेरी सॉरी !’ बिंदू बंसल का कानफिडेंस हिल चुका था पर चतुराई नहीं।
‘ठीक
है आप को बाद में थ्रू लेटर इंटीमेट कर दिया जाएगा।’ चावला बोला, ‘अभी आप चलिए !’
बिंदू बंसल की सारी सज-धज, अतिरिक्त
चतुराई, विष्णु जी की बताई तरकीबें, कानफिडेंस आदि सब पर पानी फिर गया था।
अपनी कंसलटेंसी ट्रिप से लौट कर शाम को जब विष्णु जी बिंदू से कनॉट
प्लेस में ही मिले तो उन की उदासी देख कर वह समझ गए कि बात बनी नहीं है। तो भी
उन्हों ने बिंदू का कंधा ठोंकते हुए कहा, ‘दिस
इज नॉट ए लास्ट चांस।’ वह चहकते हुए बोले, ‘डोंट
वरी। फिर कहीं देखेंगे।’
एक रेस्टोरेंट में मिठाई खाने खिलाने के बाद विष्णु जी बिंदू जी का
हाथ, हाथ में लिए जनपथ की सैर कर रहे थे कि
अचानक चावला सामने दिख गया। बिंदू बंसल तो घबरा कर मुंह छुपाने की जगह ढूंढ़ने
लगीं पर विष्णु जी ने बिलकुल मिठाई खाने खिलाने वाले अंदाज में एक हाथ से स्कार्फ
ढीली टाइट करते हुए दूसरा हाथ हिला कर चावला को विश किया। चावला ने भी भलमनसाहत
दिखाई। हाथ हिलाते हुए तेजी से आगे बढ़ गया। बाद में बिंदू ने पूरे इंटरव्यू का
वाकया बताया और यह भी कि उनके बताए मुताबिक कैसे उन्होंने चावला से उन्हें जानने
से सिरे से इंकार कर दिया था। यह ब्यौरे देती हुई वह बोलीं, ‘नौकरी तो नहीं ही दी नासपीटे ने और यहां मिल भी
गया !’
‘डोंट
वरी !’ विष्णु जी बिंदू की हिप हलके से थपथपाते और मुसकुराते हुए बोले, ‘यह
लखनऊ नहीं, दिल्ली है। यहां इस सब की इतनी नोटिस
नहीं ली जाती।’
‘पर
मैं तो लखनऊ की हूं। कैसे भूल जाऊं कि....।’
‘कुछ
नहीं, दिल्ली आई हो तो दिल्ली में रहने की
आदत डालो।’
‘अपने
तो आप अभी तक दिल्ली में रहने की आदत डाल नहीं पाए, दिल्ली वाले बन नहीं पाए और हमें नसीहत दे रहे हैं।’
‘क्या
बात कर रही हो ?’
‘तो
हम दोनों साथ-साथ क्यों नहीं रह सकते ?’ बिंदू
जी अब इस मौके को छोड़ना नहीं पकड़ लेना चाहती थीं। बोलीं, ‘जब यह लखनऊ नहीं, दिल्ली है और यहां लोग ऐसी बातों की नोटिस नहीं लेते तो यह क्या हुआ
कि आप जमुना पार रहें और मैं रोहिणी में। यह किस लिए ?’
‘इस
लिए कि लखनऊ के कुछ लोग यहां भी रहते हैं और लखनऊ से जब तब लोग दिल्ली भी आते रहते
हैं।’
‘तो
लखनऊ के लोगों के लिए रखिए जमुना पार का अपना ऐड्रेस। रोहिणी में चल कर मेरे
ऐड्रेस पर रहिए।’
‘मकान
मालिक ऐतराज करे तो ?’
‘ऐतराज
क्यों करेगा ? किराया नहीं देते हैं क्या ?’
‘चलो
जल्दी ही ऐसा कुछ सोचते हैं।’ कह कर विष्णु जी ने इस चैप्टर को यहीं क्लोज कर
दिया। लेकिन बिंदू बंसल ने यह चैप्टर ओपेन रखा। बड़े मनुहार से कहा, ‘आज आप रोहिणी चले चलिए। बहुत दिन हो गया।’
विष्णु जी ने हूं-हां कर के टालना चाहा। पर बिंदू की मनुहार को अंततः टाल नहीं
पाए। गए रोहिणी। फिर धीरे-धीरे रोहिणी में वह रहने लगे। लेकिन जल्दी ही मकान मालिक
का ऐतराज आ गया। रोहिणी के ही दूसरे सेक्टर में मकान किराए पर लिया । लेकिन ऐतराज
ने पीछा यहां भी नहीं छोड़ा। अंततः विष्णु जी ने फरीदाबाद में एक फ्लैट ख़रीद
लिया। अब दोनों आराम से रहने लगे। गोया मियां बीवी हों। प्रेमी प्रेमिका नहीं।
बिंदू जी ने यहां फरीदाबाद में आ कर अपना नाम भी बदल लिया। कॉलोनी वालों के लिए अब
वह रीता सिंह थी। फरीदाबाद की ही एक फैक्ट्री में पर्सनल असिस्टेंट की नौकरी भी कर
ली उन्होंने। गाड़ी चल क्या दौड़ पड़ी।
अलबत्ता लखनऊ में निशा कुशवाहा यह सब जान सुन कर दुखी हुईं। पर कभी
किसी से मुंह नहीं खोला। फरीदाबाद में एक बार विष्णु जी की बीमारी की ख़बर सुन कर
वह पहुंचीं भी। यहां बिंदू बंसल ऊर्फ रीता सिंह से उनका सीधा साबका पड़ा। बस
झोंटा-झोटौव्वल भर नहीं हुआ बाकी सब हुआ। अंततः बिंदू बंसल ही अपना ब्रीफकेस बांध
कर लखनऊ चल पड़ीं। कुछ दिन निशा कुशवाहा रहीं फरीदाबाद में विष्णु जी की तीमारदारी
में। वह जब स्वस्थ हो गए तो लखनऊ वापस आ गईं। समझा बुझा कर कि अभी कुछ नहीं
बिगड़ा। बोलीं, ‘मैं लखनऊ वापस इस लिए जा रही हूं कि
बच्चे अकेले हैं और मेरी लेक्चररशिप कनफर्म है। फिर इस उम्र में कहीं नौकरी भी
मिलने से रही। तो यहां कैसे रहूं ? खर्च
कैसे चलेगा?’ उन्होंने विष्णु जी से भी कहा कि, ‘ऐसी ही कंसलटेंसी करनी है तो चलिए लखनऊ ही आप
भी रहिए। मैं क्या कोई भी कुछ नहीं कहेगा !’
‘तुम
चाहती हो मैं पराजित व्यक्ति की तरह चल के लखनऊ रहूं अब?’
‘मेरी
जिंदगी में आप ही मेरे हीरो हैं। क्यों चाहूंगी कि आप पराजित व्यक्ति की तरह कहीं
रहें।’ वह बोलीं, ‘आप को लगता है कि लखनऊ रहने में आप की
पराजय है तो यहीं रहिए। लेकिन कुछ लोक लाज की परवाह कीजिए। बच्चे बड़े हो गए हैं
उनकी सोचिए। सोचिए कि जब बच्चे जानेंगे कि पापा ऐसा कर रहे हैं तो क्या बीतेगी उन
पर। क्या मुंह दिखाऊंगी मैं।’ फिर अपने पुराने प्यार का वास्ता दिलाया। बताया कि
अपने परिवार से टकरा कर, दकियानूसी मान्यताओं को दरकिनार कर आप
ने मुझ से विवाह किया था। तब से लखनऊ में आप की इमेज एक बहादुर आदमी की है। पर वही
लखनऊ जब जानेगा कि आप यह सब कर रहे हैं और आप से नहीं न सही, मुझ से दबी जबान भी पूछेगा तो मैं क्या जवाब
दूंगी ? क्या कहूंगी कि मेरा हीरो मर गया है ?’ कहती हुई वह रोने लगीं और रोती हुई ही वह लखनऊ
लौटीं।
लेकिन घर आ कर वह सहज हो गईं। ऐसे कि जैसे कुछ घटा ही न हो। पर मन
में तो जैसे बाढ़ आई हुई थी। पर इस बाढ़ को वह काम के कई-कई बांध बना कर रोके
रहीं। विष्णु जी फिर-फिर लखनऊ आते रहे, फरीदाबाद
जाते रहे। पर निशा कुशवाहा फिर नहीं गईं फरीदाबाद।
गईं फरीदाबाद तो वह विष्णु जी के निधन पर ही।
आधी रात गए यह दुखद ख़बर फोन पर फरीदाबाद से बिंदू बंसल ने निशा
कुशवाहा को दी। बिंदू ने फोन पर सीधे निधन की ख़बर नहीं दी। फोन पर उन्होंने
भर्राई आवाज में बताया कि,
‘विष्णु जी की
तबीयत अचानक बहुत बिगड़ गई है।’ कहते हुए वह रो पड़ीं। रोती हुई ही वह बोलीं, ‘उनके जीवन और मौत के बीच बहुत कम फासला रह गया
है....।’ फिर वह बोल नहीं पाईं। रोती रहीं लगातार फोन पर। लेकिन इधर निशा कुशवाहा
यह ख़बर सुन कर रोई नहीं। विष्णु जी की बीमारी और तकलीफ के डिटेल्स पूछती रहीं।
लेकिन बिंदू बंसल की रुलाई थी कि थम नहीं रही थी। वह बोलतीं तो ख़ैर क्या ? निशा कुशवाहा ने विष्णु जी से बात करवाने को
कहा तब भी बिंदू बंसल रोती ही रहीं। रोती हुई ही बोलीं, ‘बस आप तुरंत आ जाइए।’
फोन कट गया था। आधी रात फोन की घंटी सुन कर बच्चे भी जग गए थे। और
फोन पर मां की बातचीत से दुखद ख़बर का अंदाजा भी लग गया था। किसी ने किसी से कुछ
कहा नहीं। सभी ख़ामोश थोड़ी देर बैठे रहे। सभी की आंखें सवाल दर सवाल में सुलग रही थीं। पर जवाब दर
जवाब तो छोड़िए जवाब का एक बिंदु भी नहीं
दिख रहा था जो प्रस्थान बिंदु का काम कर सके। अंततः चुप्पी तोड़ी निशा जी की बड़ी
बेटी ने। बोली, ‘फरीदाबाद अब तो चलेंगी मम्मी ?’
‘हां
बेटी !’ वह बोलीं, ‘हम सभी चल रहे हैं और अभी !’ उनकी आवाज
में जरा भारीपन तो आ गया था पर आंखें सूखी ही थीं। भींगी नहीं उनकी आंखें। जरा रुक
कर बेटी से वह बोलीं, ‘कुछ कपड़े लत्ते ब्रीफकेस में भरो और
रेलवे इंक्वायरी फोन कर पता करो कि दिल्ली के लिए अभी गाड़ी कितने बजे की है ?’
तब रात के दो बज रहे थे। रेलवे इंक्वायरी का फोन तुरंत मिल गया।
बताया गया कि सुबह पांच बजे गोमती के अलावा और कोई ट्रेन दिल्ली के लिए अभी नहीं
है। सो गोमती पकड़ना तय हुआ। पर अब एक बड़ी दिक्कत खड़ी हुई पैसों की। चार लोगों
के आने-जाने का टिकट। टैक्सी और अन्य खर्चे। महीने का आखि़री हफ्ता था और पैसे घर
में कुल जोड़ कर तीन चार हजार से ज्यादा नहीं थे। ‘क्या करूं ?’ निशा जी खुद से बुदबुदाईं। तभी शुक्ला जी की
उन्हें याद आई। शुक्ला जी अभी युवा थे पर विष्णु जी के बहुत ही प्रिय। लखनऊ की जिस
कंपनी में विष्णु जी जनरल मैनेजर थे, शुक्ला
जी अभी भी वहीं काम कर रहे थे। शुक्ला जी विष्णु जी की तो इज्जत करते ही थे, निशा जी का भी बहुत आदर करते थे। अलग बात है कि
वह बिंदू बंसल को भी रिस्पेक्ट देते थे। तो इस लिए कि वह विष्णु जी से जुड़ी हुई
थीं। ख़ैर, निशा जी ने घड़ी देखी; रात के ढाई बजे थे। उन्होंने डायरी निकाली; शुक्ला जी का फोन नंबर ढूंढ़ा और मिलाया। फोन
शुक्ला जी ने ही उठाया।
‘भइया
जी मैं निशा बोल रही हूं। विष्णु जी की पत्नी !’
‘नमस्ते
भाभी जी !’ शुक्ला जी नींद से जागते हुए बोले, ‘कहिए
क्या हो गया?’
‘भइया
जी माफ करिए कि आप को इतनी रात में फोन करना पड़ा।’
‘नहीं, कोई बात नहीं। आप हुकुम कीजिए।’
‘हुकुम
की बात नहीं है, भइया जी हमारी थोड़ी मदद कीजिए !’
‘हां, हां बताइए !’
‘अभी
इसी वक्त हमें कुछ पैसे चाहिए।’
‘कितने
?’
‘दस
बीस हजार जो भी हों अधिक से अधिक !’
‘क्यों
क्या हो गया ?’
‘भइया
जी, अभी थोड़ी देर पहले फरीदाबाद से बिंदू
जी का फोन आया था। वह बहुत रो रही थीं। रोते हुए ही बताया कि विष्णु जी की तबीयत
ज्यादा बिगड़ गई है। तो भइया जी हम तुरंत गोमती से निकल रहे हैं बच्चों को ले कर।’
वह भावुक हुईं। बोलीं, ‘आप कुछ कर सकेंगे ?’
‘हां, देखता हूं।’ शुक्ला जी बोले, ‘इतने पैसे तो शायद घर में नहीं होंगे। फिर भी
मैं इंतजाम करता हूं।’
‘तो
भइया जी, जो भी हो सके घर पर मेरे अभी पहुंचा
देंगे ? जल्दी से जल्दी?’
‘हां, हां। बस मैं पहुंच रहा हूं।’
शुक्ला जी ने फोन रख कर पत्नी को जगाया। बोले, ‘घर में जितने भी पैसे हों सब के सब निकालो।’
‘हुआ
क्या ?’ पत्नी ने नींद में ही पूछा, ‘किसका फोन था ?’
‘निशा
भाभी का। विष्णु जी की तबीयत अचानक बहुत बिगड़ गई है।’
‘तो
अब फरीदाबाद जाएंगे ?’
‘मैं
नहीं, निशा भाभी जा रही हैं, पैसे उन्हों ने मांगे हैं।’
‘कितने
निकालूं ?’
‘कहा
न जितने हैं सब ! बीस पचीस हजार। जो हो सब !’
‘इतने
पैसे कहां हैं ?’
‘तुम
अपनी बचत वाले पैसे भी निकाल लो न ?’
‘तब
भी इतने नहीं हो पाएंगे।’
पैसा निकालते हुए शुक्ला जी की पत्नी थोड़ी अनमनस्क हुईं। पर मामला
चूंकि विष्णु जी का था सो वह कुछ बोलीं नहीं। जोड़ गांठ कर कुल आठ हजार ही निकले।
शुक्ला जी घबराए। एक दोस्त को फोन किया। उसने भी पांच हजार ही देने को कहा। शुक्ला
जी ने कहा भी कि, ‘सुबह बैंक खुलने के बाद जैसे भी होगा, पैसे आज ही दे देंगे।’
‘लेकिन
हों तब दूं न ?’ दोस्त नींद में ही बड़बड़ाया।
‘ख़ैर
चलो निकाल कर पैसे बाहर रखो। मैं तुम्हारे घर पहुंच रहा हूं।’
पैसे ले कर शुक्ला जी विष्णु जी के घर पहुंचे। साढ़े तीन बज गए थे।
निशा जी तैयार बैठी थीं मय बच्चों के। शुक्ला जी को देखते ही उठ कर खड़ी हो गईं।
बोलीं, ‘भइया जी इतनी रात में आप ही एक आसरा
दिखे। माफ कीजिएगा आप को परेशान कर दिया।’
‘कोई
बात नहीं भाभी जी ! आप जाइए विष्णु जी को देखिए। पैसों की और जरूरत होगी तो पहुंच
कर फोन करिएगा। मैं और इंतजाम कर के खुद पहुंचूंगा। दिन में तो बैंक भी खुल
जाएंगे।’
‘अच्छा
भइया जी देखूंगी वहां पहुंच कर !’ वह बोलीं, ‘एक
काम और नहीं कर देंगे ?’
‘बताइए
!’
‘हम
सब को स्टेशन नहीं छोड़ देंगे ?’ वह
बोलीं, ‘जाने सड़क पर कोई सवारी मिले कि न
मिले। सुबह पांच बजे की ट्रेन है।’
‘चलिए
बारी-बारी कर के सबको छोड़ देता हूं।’
फिर शुक्ला जी ने स्कूटर से दो बार में निशा जी और उन के बच्चों को
स्टेशन पहुंचाया। रिजर्वेशन था नहीं सो टिकट ख़रीद कर किसी तरह ट्रेन में उन के
बैठने का बंदोबस्त किया। ट्रेन छूटने से पहले फरीदाबाद में विष्णु जी के घर का पता
और फोन नंबर लिया।
ट्रेन छूटने के बाद शुक्ला जी स्टेशन से बाहर आए। उन्हें बेचैनी
महसूस हुई! इसी बेचैनी में वह एक पी. सी. ओ. पहुंचे और विष्णु जी के फरीदाबाद वाले
घर का फोन मिलाया। जाने किसने फोन उठाया। विष्णु जी की तबीयत के बारे में शुक्ला
जी ने पूछा, ‘अब कैसी तबीयत है विष्णु जी की ?’
‘तबीयत
की पूछते हो ? वह तो रात ही मर गया।’
‘आप
कौन बोल रहे हैं ?’ पूछते हुए शुक्ला जी को रुलाई आ गई।
‘मैं
तो जी पड़ोसी हूं। तुम हमको नहीं जानोगे !’ वह पड़ोसी बोला, ‘यहां तो क्रिमिनेशन की तैयारी हो रही है। बस
लखनऊ से इस के बच्चों के आने का वेट हो रहा है।’
‘अच्छा
बिंदू जी से बात करवा दीजिए।’ शुक्ला जी रुलाई रोकते हुए बोले।
‘कौन
बिंदू ?’
‘बिंदू
जी !’
‘यहां
कोई बिंदू नहीं है भाई ! तुम कौन बोल रहे हो !’
‘मैं
लखनऊ से शुक्ला बोल रहा हूं।’
‘तो
इस के बच्चों को भेजो !’
‘बच्चे
अभी गोमती ट्रेन से यहां से चल चुके हैं।’
‘फिर
तो ठीक है !’ पड़ोसी फोन पर बोला, ‘कब
तक ट्रेन आ जाएगी यहां?’
‘दो
ढाई बजे तक दिल्ली पहुंचती है।’
‘ओ
हो तब तक तो शाम हो जाएगी फरीदाबाद आते-आते।’ वह बोला, ‘ख़ैर चलो आने दो।’ कह कर उसने फोन खुद ही काट
दिया।
शुक्ला जी ने ताबड़तोड़ दिल्ली में दो तीन और लोगों को फोन मिलाया।
जो लोग कि विष्णु जी को जानते थे और लखनऊ से दिल्ली गए थे। इनमें एक वाजपेयी जी को
तो विष्णु जी के निधन की ख़बर पहले से थी और वह फरीदाबाद के लिए बस निकल ही रहे
थे। शुक्ला जी ने वाजपेयी जी से कहा कि, ‘कुछ
पैसे वैसे भी लेते जाइएगा और हो सके तो
कोई छोटा ट्रक ही सही विष्णु जी की बॉडी लखनऊ भेजने के लिए अरेंज करवा
दीजिएगा।’
‘देखो
भाई देखते हैं।’ वाजपेयी जी बोले, ‘ट्रक
वगैरह की दिक्कत तो नहीं होने दी जाएगी, न
पैसे की। उनकी फेमिली जैसा कहेगी, वैसा
कर दूंगा। बाकी पेंच तो तुम जानते ही हो !’
‘क्या
पेंच ?’
‘ख़ैर
छोड़ो यह सब। यह मौका यह सब बतियाने का नहीं है। फोन रखो। मैं फरीदाबाद के लिए
निकल रहा हूं।’ वह बोले,
‘आखि़र वह जीनियस
मेरा भी दोस्त था !’
शुक्ला जी घर पहुंचे उदास-उदास। बिखरे-बिखरे। पत्नी ने पूछा, ‘क्या हुआ?’
‘विष्णु
जी नहीं रहे !’ कहते-कहते शुक्ला जी फूट-फूट कर रोने लगे।
पत्नी ने सांत्वना दी। पर शुक्ला जी रोते रहे। पत्नी ने पानी दिया, फिर चाय लाई। चाय पी कर शुक्ला जी लेट गए।
थके-हारे से। लेटे-लेटे सो गए। नौ बजे के करीब पत्नी ने उन्हें झिंझोड़ा, ‘नौ बज रहे हैं। आफिस नहीं जाएंगे क्या ?’
‘नहीं
आज आफिस नहीं जा पाऊंगा !’ लेटे-लेटे शुक्ला जी बोले, ‘आफिस फोन कर के तुम्हीं बता देना कि तबीयत ठीक
नहीं है। ?’
‘डाक्टर
के यहां चलें ?’
‘‘नहीं, कहीं नहीं।’ कह कर शुक्ला जी लेटे ही रहे। खाना
भी नहीं खाया।
शाम हुई तो उठे। एक कप चाय पी और कपड़े पहन कर घर से निकले। एक पी.
सी. ओ. पहुंचे। शाम के साढ़े चार बज गए थे। फरीदाबाद विष्णु जी का फोन मिलाया।
किसी अपरिचित ने ही उठाया। उसने बताया कि विष्णु जी की फेमिली लखनऊ से पहुंच गई है
और अब सब लोग उनके क्रिमिनेशन के लिए निकल रहे हैं।
‘क्या
बॉडी लखनऊ नहीं आएगी ?’
‘नहीं
जी। उनकी फेमिली क्रिमिनेशन यहीं चाहती है।’
‘जरा
उनकी पत्नी से बात करवा दीजिए।’
‘बात
अभी नहीं हो सकती। वह बाहर बॉडी के पास बैठी हैं।’ कह कर उस अपरिचित ने फोन काट
दिया।
उदास हताश शुक्ला जी घर लौट आए।
फिर फरीदाबाद फोन नहीं किया शुक्ला जी ने। दो दिन बाद विष्णु जी के
लखनऊ वाले घर गए। यह सोच कर कि अंत्येष्टि के बाद निशा जी और उनके बच्चे लखनऊ लौट
आए होंगे। पर उनके घर पर ताला था। उनके सामने के पड़ोसी से पूछने पर पता चला कि, ‘अब वे लोग विष्णु जी के श्राद्ध के बाद आएंगे।’
‘क्या
वे लोग झांसी गए हैं ?’ शुक्ला जी ने यह समझ कर पूछा कि क्या
पता विष्णु जी के पैतृक निवास पर श्राद्ध किया जाए।’
‘नहीं
फरीदाबाद में ही हैं।’
‘आप
को किसने बताया ?’
‘निशा
जी का परसों रात ही फोन आया था।’
‘अच्छा-अच्छा
!’ कह कर शुक्ला जी लौट लिए। यह सोचते हुए कि निशा जी ने उनको फोन कर के यह सूचना
क्यों नहीं बताई ?’
पर अब सोचने से कोई फायदा नहीं था। विष्णु जी नहीं रहे तो किस बात का
अधिकार उस परिवार पर !
एक महीना से अधिक बीत गया विष्णु जी के निधन को। फिर भी निशा जी का
फोन नहीं आया। तो भी एक शाम शुक्ला जी विष्णु जी के लखनऊ वाले घर पहुंच गए। निशा
जी कोई दस मिनट बाद ड्राइंग रूम में आईं। शुक्ला जी को यह भी खला।
ख़ैर, वह आईं तो बिलकुल सामान्य ढंग से। उनको
देख कर ऐसा लगा नहीं कि उन पर पहाड़ टूटा हो, वह
विधवा हो गई हों ! घर में एक सन्नाटा-सा जरूर था पर उनके बच्चों के बर्ताव में भी
निराशा नहीं थी। सभी कुछ पहले-सा, सामान्य
सा था।
थोड़ी देर बाद औपचारिक होने के बाद शुक्ला जी ने सवालों को सुलगाना
शुरू किया। उन से रहा नहीं गया। बोले, ‘अंत्येष्टि
के लिए विष्णु जी की बॉडी लखनऊ क्यों नहीं लाईं ?’ वह बोले, ‘यहां लखनऊ में पूरी गरिमा से उनकी
अंत्येष्टि हुई होती!’ पर निशा जी कुछ बोली नहीं। शुक्ला जी ने सवाल फिर दुहराया
तो भी निशा जी टाल गईं। बोलीं, ‘जाने
दीजिए भइया जी। अब जो बीत गया सो बीत गया !’ उन्हों ने एक ठंडी सांस ली।
‘आप
जानते हैं हमारी व्यवस्था ! यहां तक उनकी बॉडी ले आने में मुश्किल बहुत थी !’
‘क्या
वाजपेयी जी ने कुछ व्यवस्था नहीं की ?’
‘नहीं
भइया जी, वाजपेयी जी ने तो दरवाजे पर ला कर ट्रक
खड़ा कर दिया था। लेकिन हमीं ने मना कर दिया।’ वह रुकीं और बोलीं, ‘विष्णु जी को तो आप जानते ही रहे हैं।’ वह
बोलीं, ‘जीते जी जब वह किसी का एहसान नहीं लेते
थे तो मैंने सोचा अब मरने के बाद भी उन को किसी के एहसान से क्यों लादें !’
‘यह
तो ठीक है पर आप चाहतीं तो लखनऊ आ कर वाजपेयी जी को बाद में ट्रक के पैसे वापस भेज
सकती थीं।’
‘वो
तो ठीक है।’ वह बोलीं, ‘पर मुश्किलें और भी कई थीं।’
‘और
क्या मुश्किल थी ?’
‘बिंदू
जी भी नहीं चाहती थीं कि बॉडी लखनऊ लाई जाए। उनका श्राद्ध भी वहां बिंदू जी की ही
जिद के नाते करना पड़ा।’
‘बिंदू
जी !’ बिंदू जी का नाम सुन कर शुक्ला जी थोड़ा लटपटाए। पर खुल कर कुछ नहीं पूछ
पाए।
‘हां
भइया जी, बिंदू जी !’ निशा जी की नदी का जैसे
बांध टूट रहा था।
बोलीं, ‘आप को भइया जी, शायद पता नहीं कि बिंदू जी दिल्ली-फरीदाबाद में
विष्णु जी के साथ रहती थीं। बाकायदा पत्नी की तरह !’
‘क्या
कह रही हैं आप ?’ शुक्ला जी और लटपटाए, ‘कब शादी की इन लोगों ने ?’
‘शादी
का तो पता नहीं पर रह रहे थे ऐसे ही।’ वह बोलीं, ‘बिंदू जी ने तो वहां कॉलोनी
में अपना नाम भी बदल लिया है। वह अब रीता सिंह हैं वहां, बिंदू बंसल नहीं।’ ठंडी सांस छोड़ती हुई वह
बोलीं, ‘गनीमत कि वह विष्णु बंसल नाम पर नहीं
आए। बाकी हो तो वह गए ही थे।’ शुक्ला जी चुप थे लेकिन निशा जी बोल रही थीं, ‘भइया जी, अब
आप से क्या छुपाना ? देर सबेर आप को कहीं न कहीं कोई बताता
ही। आज मैं ही बता दे रही हूं।’
‘तो
आप को पहले से मालूम था ?’
‘मालूम
तो लखनऊ से ही था।’ वह बोलीं, ‘पर
मुझे अपने आप पर, विष्णु जी के प्यार पर इतना ज्यादा
यकीन था कि कोई परवाह नहीं की। सोचा कि टेंपरेरी फेज है, निकल जाएगा।’ वह बोलीं, ‘अब क्या पता था कि यह मेरी और विष्णु जी की
जिंदगी का डैमेज फेज बन जाएगा।’
शुक्ला जी फिर चुप थे। पर निशा जी चुप नहीं थीं।
वह बोलती जा रही थीं, ‘मैं
भी विष्णु जी का क्रिमिनेशन लखनऊ में करना चाहती थी। पर जानते हैं उनकी बॉडी यहां
क्यों नहीं ले आई ?’
‘क्यों
?’
‘क्यों
कि विष्णु जी अपनी मौत नहीं मरे थे।’
‘क्या
?’
‘हां, जब मैं फरीदाबाद पहुंची तो विष्णु जी की बॉडी पूरी
की पूरी नीली पड़ चुकी थी। कहीं-कहीं काली भी।’
‘क्या
मतलब ?’
‘हां, उनको जहर दिया गया था।’ वह बोलीं, ‘भइया जी, अब
ऐसे में उनकी बॉडी कैसे लखनऊ लाती। लोग यहां देखते तो क्या कहते ? फिर कहीं रास्ते में पुलिस चेक करती, सवालों के घेरे में फंसाती तो किस-किस को
क्या-क्या जवाब देती मैं भला ?’
‘जहर
किस ने दिया ?’
‘बिंदू
जी के अलावा उनके साथ था कौन ?’
‘तो
आप ने पुलिस में रिपोर्ट क्यों नहीं की ?’
‘क्या
होता इस से ?’
‘जहर
देने वाले को जेल होती !’
‘और
विष्णु जी का ?’ निशा जी बोलीं, ‘कितनी इज्जत ख़राब होती उन की। कितनी बदनामी
होती उनकी। बात अख़बारों तक में उछलती। मेरा कितना अपमान होता ?’ वह बोलीं, ‘मैं
नहीं चाहती थी कि विष्णु जी की इज्जत पर कोई बट्टा आए। उन्होंने जो किया वो किया
पर मैं नहीं चाहती थी कि उनकी शान में कोई दाग लगे!’ वह बोलीं, ‘‘पता है एक बार मैंने उनसे लखनऊ वापस आने की बात
कही थी तो जानते हैं उन्होंने क्या कहा था मुझ से ?’ वह बोलीं, ‘कहने लगे कि तुम चाहती हो मैं पराजित
व्यक्ति की तरह चल के लखनऊ रहूं अब ?’ तो
भइया जी इस लखनऊ में जहां वह विजयी की तरह रहे उनकी बॉडी ला कर मरने के बाद उन्हें
पराजित नहीं देखना चाहती थी !’ एक ठंडी सांस लेती हुई वह बोलीं, ‘लोगों की नजर में भले वह अब मरे हैं पर भइया जी, मेरे लिए तो विष्णु जी कब के मर चुके थे। तभी
जब वह बिंदू जी के साथ रहने लगे थे।’
‘पर
आप ने कभी चर्चा नहीं की।’
‘क्या
चर्चा करती ? कोई फायदा था क्या ? सिवाय छिछालेदर के और क्या मिलता ?’ वह
बोलीं, ‘फिर मैं सोचती थी कि कभी तो विष्णु जी
लौटेंगे ? लौटेंगे मेरे पास ! पर क्या करूं वह
लौटे ही नहीं।’ निशा जी ऐसे बोलीं जैसे बहुत बड़ी लड़ाई वह हार गई हों।
थोड़ी देर तक ड्राइंग रूम में चुप्पी पसरी रही।
‘भइया
जी कोई विश्वसनीय वकील आप की जानकारी में हो तो बताइए!’ कह कर निशा जी ने ही
चुप्पी तोड़ी।
‘क्यों
? क्या होगा ?’
‘अब
क्या-क्या बताऊं आप को ?’
वह बोलीं, ‘विष्णु जी को तो छीन ही लिया था बिंदू जी ने, उनकी सारी प्रापर्टी, सारा कैश भी हड़प लिया !’ वह बोलीं, ‘लाखों रुपए तो मरने के बाद गड़प लिए। बैकों में
हेरा-फेरी कर के।’
‘ऐसा
कैसे हो सकता है ?’
‘क्यों
नहीं हो सकता ?’ वह बोलीं, ‘मरने के बाद ही दो तीन दिनों में उनके सभी बैंक
खाते ख़ाली हो गए। पुराने चेकों के मार्फत।’ वह कहने लगीं, ‘जब तक बैंकों में जा कर मैं सूचना देती तब तक
पैसे बाई चेक निकल चुके थे।’ उन्होंने जोड़ा, ‘और
यह काम सिवाय बिंदू जी के और कौन कर सकता है ?’
‘मैं
नहीं मान सकता !’ शुक्ला जी ने धीमे से प्रतिवाद किया। यह सोच कर कि निशा जी की
सौतिया डाह की चिंगारी अभी बुझी नहीं है।
‘क्यों
नहीं मान पा रहे हैं भईया जी ? मैं
सही कह रही हूं।’
‘चलिए, बिंदू जी ने एक बार ऐसा किया भी तो मान लिया।
लेकिन ये बताइए कि विष्णु जी इतने खुद्दार और ईमानदार आदमी थे, बेईमानी, दलाली
कभी की नहीं तो इतना पैसा उनके पास आया कहां से कि लाखों रुपए बिंदू जी ने गड़क
लिए ?’
‘भइया
जी, आप कुछ नहीं जानते हैं।’ निशा जी बोलीं, ‘अब आप को मैं बताती हूं कि कैसे विष्णु जी के
पास लाखों रुपए आए।’ वह बोलीं, ‘विष्णु
जी ईमानदार और खुद्दार थे सही है पर बुद्धिमान भी बहुत थे। दलाली, बेईमानी नहीं की कभी उन्होंने। पर दूसरे और कई
काम किए और ख़ूब पैसे कमाए।’
‘क्या
?’ शुक्ला जी चौंके।
‘चौंकिए
नहीं। कोई गलत काम नहीं किया विष्णु जी ने।’ निशा जी बोलीं, ‘आप को मालूम नहीं। घर खर्च में वह मुझे एक पैसा
नहीं देते थे। अपने वेतन से घर का खर्च मैं चलाती थी। उनका पॉकेट खर्च तक। जब वह
लखनऊ में थे।’
‘तो
अपनी सेलरी का क्या करते थे वह ?’
‘वही
तो बता रही हूं।’ निशा जी बोलीं, ‘अपनी
सेलरी कई दूसरे कामों में वह लगाते थे। जैसे शेयर ख़रीदने बेचने का काम करते थे वह
शुरू में। बाद में ज ब पैसे बढ़े तो जगह-जगह जमीनें ख़रीदने बेचने लगे। जमीन वाला
बिजनेस उनका काफी जम गया था।’ वह बोलीं, ‘मैं
भी सोचती थी कि चलो पैसा कहीं लगा ही रहे हैं, उड़ा
तो नहीं रहे हैं। पर क्या पता था कि सारा पैसा ऐसे डूब जाएगा।’
‘तो
इसमें वकील क्या करेगा ?’
शुक्ल जी भौंचकिया कर पूछ बैठे।
‘वकील
ही तो कर सकता है।’ वह बोलीं, ‘कुछ
चीजों के उल्टे सही डिटेल्स मेरे पास हैं। कुछ वह कानूनी ढंग से निकालेगा। बाकी
विष्णु जी के कुछ और दोस्तों से भी मैं दरियाफ्त कर रही हूं।’ वह बोलीं, ‘पर ज्यादातर हिसाब किताब, डिटेल्स तो बिंदू जी ने दबा लिए हैं, वह भी उनसे उगलवाना है।’ बोलीं, ‘अभी दो तीन चक्कर दिल्ली-फरीदाबाद के मैं और
लगाऊंगी। आप भी साथ चलेंगे ?’
‘क्या
करूंगा मैं चल कर ?’
‘बिंदू
जी से थोड़ा टोह लीजिएगा। विष्णु जी के दोस्तों से पूछिएगा।’
‘देखिए
सोचता हूं।’
‘असल
में हुआ क्या कि जब अंत्येष्टि के लिए हम लोग विष्णु जी की बॉडी ले कर श्मशान घाट
जाने लगे तो सभी लोग गए पर बिंदू जी नहीं गईं। सबने जोर दिया पर वह नहीं गईं।
जानते हैं वह क्या बोलीं ?’
‘क्या
?’
‘बिंदू
जी कहने लगीं कि मैं विष्णु सिंह जी को इतना प्यार करती थी कि अब उनको जलते हुए
नहीं देख पाऊंगी ! मैंने सबके सामने उनको टोका भी कि मुझ से भी ज्यादा प्यार करती
हो ? जानती हो मेरे प्यार के लिए विष्णु जी
ने अपना पैतृक घर परिवार छोड़ दिया। तो जानते हैं वह बेशर्म क्या बोली ? कहने लगी लेकिन मेरे प्यार के लिए विष्णु जी ने
आप को छोड़ दिया।’
‘छोड़ा
नहीं भटक गए थे। मैंने बताया कि उनके प्यार की निशानी मेरे पास उन के बच्चे हैं।
तुम्हारे पास क्या है ? तो वह कहने लगी उनका प्यार जो वह अंतिम
समय तक मेरे साथ रहे।’
‘तभी
तुम ने उन को मार डाला !’
‘मैंने
नहीं आप ने उन को मारा !’
निशा जी बोलीं, ‘सब
के सामने ऐसी घड़ी में वह बेशर्म इस तरह बोले जा रही थी तो मैं ही चुप हो गई।
विष्णु जी की मर्यादा को ध्यान में रख कर!’ निशा जी बोलती जा रही थीं, ‘और जब चार-पांच घंटे बाद हम लोग श्मशान घाट से
लौटे तब तक विष्णु जी के कागज-पत्तर, हिसाब-किताब, कैश-वैश सब को ठिकाने लगा चुकी थीं बिंदू जी !
हम हाथ मलते रह गए।’ निशा जी बोलती जा रही थीं, ‘भइया
जी बताऊं आप को कि विष्णु जी तो अब रहे नहीं। पर वहां लोग बता रहे थे कि इनके जीते
जी ही बिंदू जी एक बैंक मैनेजर से पेंग मारने लगी थीं। वह जब तब घर भी आने लगा था।
विष्णु जी इस बात को ले कर बहुत परेशान रहने लगे थे। बिंदू जी से उनका इस बात को
ले कर इधर झगड़ा भी बहुत बढ़ गया था। विष्णु जी के सारे कागज पत्तर, हिसाब-किताब, चेकों को इधर-उधर भी उसी बैंक मैनेजर की मदद से बिंदू जी ने किया।’
वह कहने लगीं, ‘आप को पता है कि विष्णु जी का अभी
श्राद्ध भी नहीं हुआ था और बिंदू जी उस बैंक मैनेजर के साथ खुले आम हमारे सामने ही
उसकी कार में घूमने लगी थीं। तो यह क्या है?’
‘अच्छा
फरीदाबाद वाला फ्लैट विष्णु जी के ही नाम है ?’
‘ना
!’
‘फिर
?’
‘पहले
इन्हों ने अपने ही नाम ख़रीदा था। बाद में बिंदु जी के नाम कर दिया।’
‘ओह
!’
‘पर
मैं बिंदू जी को ऐसे ही छोड़ूंगी नहीं।’ वह बोलीं, ‘भइया जी, बस आप किसी विश्वसनीय वकील का पता
कीजिए। ऐसा वकील जो औरतों वगैरह के चक्कर में नहीं फंसे। नहीं, बिंदू जी का क्या है उसी को फंसा लें।’
‘अरे
नहीं !’
‘नहीं
भइया जी ! उनका क्या है कि बिना पतवार की नाव की तरह ऐसे पेश हो जाती हैं कि जो
चाहे जिधर बहा ले जाए ! और फिर वह खुद नाव के साथ बह जाता है। नाव बची रह जाती है
और पतवार चलाने वाला गुम हो जाता है।’ कहते हुए उनकी आंखें थोड़ी नम हो गईं। बोलीं, ‘जैसे हमारे विष्णु जी गुम हो गए!’
ड्राइंग रूम में फिर चुप्पी पांव फैला गई।
शुक्ला जी बुझे मन से लौट आए थे। समय बीतता गया। पर शुक्ला जी इस
त्रिकोण में दोषी कौन था,
पलड़ा किस का भारी था, इसकी थाह नहीं पाते थे। माप नहीं पाते थे।
विष्णु जी, निशा जी और बिंदू जी। तीनों को एक साथ
खड़ा कर वह कोई ऐसा एक बिंदु नहीं तय कर पाते थे कि इनमें सचमुच दोषी कौन है का कम
से कम प्रस्थान बिंदु ही निकल आए। हां, निशा
जी द्वारा बताया गया बिंदू जी का वह संवाद उन्हें रह-रह जलाता रहता कि, ‘मैं विष्णु सिंह जी को इतना प्यार करती थी कि
अब उनको जलते हुए नहीं देख पाऊंगी !’ और फिर निशा जी का उनको टोकना और जलाता कि, ‘मुझ से भी ज्यादा प्यार करती हो ?’
शुक्ला जी का यह जलना थमता नहीं था। जलते ही रहते थे वह जब तब।
कुछ समय बाद लखनऊ में ही शुक्ला जी को वाजपेयी जी मिल गए। दिल्ली से
आए उन्हें दो दिन हो गए थे। बातचीत दुनिया-भर की होती रही। कई लोग थे। सो शुक्ला
जी सुलग-सुलग कर रह जाते थे। विष्णु जी के बारे में कुछ-पूछ नहीं पा रहे थे। लेकिन
थोड़ी देर बाद जब दो तीन लोग ही रह गए तो शुक्ला जी ने विष्णु जी के निधन का
प्रसंग बिना किसी भूमिका के छेड़ दिया। बोले, ‘वाजपेयी
जी आप ने दोस्ती का तकाजा पूरा नहीं किया !’
‘क्या
कहते हो ?’ वाजपेयी जी बोले, ‘क्या-क्या नहीं किया ?’
‘हम
तो विष्णु की बॉडी का पोस्टमार्टम करवाना चाहते थे। पूरी तैयारी कर ली थी। क्यों
कि तुम शायद जानते ही हो कि विष्णु स्वाभाविक मौत नहीं मरा। बॉडी उसकी नीली पड़ गई
थी। स्पष्ट था कि प्वाइजन था। अब यह प्वाइजन उसने खुद खाया, बिंदू ने खिलाया कि किसी और ने खिलाया या फिर
कुछ और हुआ, यह तो पोस्टमार्टम से ही पता चलता। और
फिर मान लो किसी तरह कोई प्वाइजन या कुछ और ही हुआ तो उसे हॉस्पिटल क्यों नहीं ले
गई बिंदू ? पड़ोसियों को या किसी को भी इत्तिला
मरने के बाद ही क्यों दी ? पहले क्यों नहीं दी ? ऐसे तमाम सवाल थे जो पोस्टमार्टम और पुलिस में
रिपोर्ट के बाद ही खुलते और हमने इसकी पूरी तैयारी की। मिश्रा तथा और भी विष्णु के
तमाम दोस्त जो वहां इकट्ठे हुए थे सबकी
यही राय थी।’ वाजपेयी जी बोलते जा रहे थे, ‘बस
हम लोग लखनऊ से विष्णु की वाइफ का वेट कर रहे थे। वह पहुंचते ही विष्णु की बॉडी से
लिपट कर रोने लगी। रोते-रोते कहने लगी, ‘विष्णु
सिंह मैंने तुमको मार डाला!’ और बार-बार, जोर-जोर
से दहाड़ें मार-मार कर वह यही कहती रही कि विष्णु सिंह मैंने तुम को मार डाला! हम
लोग तो अवाक रह गए यह सुन कर। बाद में जब वह शांत हुईं तो हम लोगों ने पोस्टमार्टम
की बात पूछी तो उसने पूरी सख़्ती से मना कर दिया। कहने लगी इससे विष्णु जी की
बदनामी बहुत होगी ! यह बात भी ठीक थी। सो हम सभी चुप लगा गए। बॉडी लखनऊ ले जाने के
लिए मैंने ट्रक भी मंगवा दिया। लखनऊ जाने से भी उसने मना कर दिया। फिर विष्णु जी
की वाइफ और बिंदू दोनों सौतों-सी लड़ने लगीं।’ वाजपेयी जी बोले, ‘अब इसमें हम क्या कर सकते थे। सिवाय ख़ामोश
रहने के ! लेकिन दो औरतों के चक्कर में एक जीनियस ऐसी विवादास्पद मौत मरेगा, यह हम नहीं सोचते थे।’
‘यह
तो है !’ कह कर शुक्ला जी ख़ामोश हो गए। पर जलते जरूर रहे बिंदू बंसल के उस कहे की
आग में कि, ‘मैं विष्णु सिंह जी को इतना प्यार करती
थी कि अब उनको जलते हुए नहीं देख पाऊंगी ?’ तो
क्या मैं खुद देख पाता विष्णु जी को जलते हुए ? लखनऊ
ही में सही ! शुक्ला जी खुद से पूछते हैं। या कि निशा जी की तरह बिंदू जी को टोक
कर, ‘मुझ से भी ज्यादा प्यार करती हो ?’ विष्णु जी को जलते हुए देखते ? शुक्ला जी कुछ भी तय नहीं कर पाते। और खुद ही
जलने लगते हैं इन सवालों और संवादों की आग में।
उनका जलना ख़त्म नहीं होता।
हां, लेकिन बिंदू जी फरीदाबाद से फिर लखनऊ
नहीं लौटीं !
-24-
घोड़े वाले बाऊ साहब
बाबू गोधन सिंह इन दिनों परेशान हैं। उन की परेशानी के कोई एक दो
नहीं कई कारण हैं। लेकिन तुरंत-तुरंत उन की परेशानी के दो कारण हैं। एक तो वह अपनी
बैलगाड़ी का एक चक्का बदलना चाहते हैं और जो संपर जाए तो बैलों की जोड़ी में से कम
से कम एक दाहिने बैल को बेंच कर नया ले लें। जो जुगत बन जाए तो जोड़ी ही बदल दें !
पर कैसे ?
एक समय था जब बाबू गोधन सिंह को घोड़े बदलने में देर नहीं लगती थी और
आज बैल बदलने के लिए, बैलगाड़ी का चक्का बदलने के लिए भी
उन्हें चारों ओर देखना पड़ रहा है! वह बुदबुदाते भी हैं, ‘सब समय-समय का फेर है !’
वह जमाना ही और था। तब गोधन सिंह की तूती बोलती थी। बल्कि उन से भी
ज्यादा उन के घोड़ों की तूती बोलती थी। और घोड़े भी ऐसे जैसे, ‘राणा की पुतली फिरी नहीं, चेतक तुरंत मुड़ जाता था।’ बाबू गोधन सिंह भी
घोड़ों के एक-एक रोएं का खुद ख़याल रखते थे। उन के पट्टीदारों के घर हाथियां
बंधतीं पर वह घोड़ा ही बांधते थे। घोड़ों से जैसे उन्हें इश्क था। घुड़सवारी जैसे
उन की सांस थी, उन की धड़कन थी। तबीयत जो ख़राब हो तो
वह एक टाइम खाना भले न खाएं पर घुड़सवारी जरूर करते। घोड़ों की जीन कसे बिना उन का
खाना हजम नहीं होता था! घोड़े भी जैसे उन की राह देखते रहते।
बाबू गोधन सिंह का भी काम तब दो एक घोड़ों से नहीं चलता था। चार-छह
घोड़े हरदम उन की घुड़साल में रहते ही रहते थे। काला, सफ़ेद, लाल।
किसिम-किसिम के रंग और नस्ल के घोड़े। बाबू गोधन सिंह जब घोड़े पर चढ़ कर निकलते
तो गांव में लोग उन्हें देखने के लिए उमड़ पड़ते।
बाद के दिनों में अपनी घुड़सवारी दिखाने की उन्हें लत सी पड़ गई।
‘दर्शक’ बने रहें इस चक्कर में वह जब घोड़े पर बैठ कर निकलते तो गरीब गुरबा में
कुछ कपड़ा-लत्ता, पैसा-कौड़ी भी बांटने लगे। भीड़ और
बटुरने लगी। भीड़ देख कर बाबू गोधन सिंह की छाती और मूंछ दोनों अकड़ जाती। उन के
रौब में और इजाफा हो जाता। साथ ही भीड़ देखने की ललक भी बढ़ जाती।
धीरे-धीरे इस भीड़ की ललक में बाबू गोधन सिंह कब शादी-ब्याह के पहले
द्वारपूजा की अगुवानी करने लग गए इस का पता उन्हें भी नहीं चला। पहले पहल वह अपनी
पट्टीदारी की लड़की की शादी में जब बारात आई तो अपना घोड़ा ले कर पगड़ी बांधे
अगुवानी के लिए निकले। फिर जाने क्या सूझी कि वह खेतों में घुड़सवारी के करतब
दिखाने लगे। फिर तो गांव में ठाकुर बिरादरी की किसी की बेटी की शादी हो बाबू गोधन
सिंह की घुड़सवारी वाली अगुवानी के बिना द्वारपूजा होती नहीं थी। धीरे-धीरे बाबू
गोधन सिंह आस-पास के गांवों के ठाकुरों की लड़की की शादी में द्वारपूजा की अगुवानी
करने लगे। सिलसिला बढ़ता गया और वह ठाकुरों की लकीर लांघ कर ब्राह्मणों की बेटियों
की शादी की द्वारपूजा में भी अगुवानी के लिए मशहूर हो गए। और जल्दी ही वह सारी
सीमाएं तोड़ कर छोटी-बड़ी सभी जातियों की बेटियों की शादी की द्वारपूजा में अगुवानी
करने लगे। बाबू गोधन सिंह का नाम भी अब धूमिल होता जा रहा था। लोग अब उन्हें बाबू
गोधन सिंह की जगह सिर्फ बाबू साहब ही कहने लगे थे। बाबू साहब लोग वैसे तो गांव में
और भी थे पर बाबू गोधन सिंह को लोग जिस ठसक और आदर से बाबू साहब कहते, किसी और बाबू साहब को नहीं। बाबू गोधन सिंह की
लोकप्रियता दिन-ब-दिन बढ़ती जाती। इतनी कि अब वह बाबू साहब भी नहीं, बाऊ साहब कहलाने लगे थे। इलाके में उन की
लोकप्रियता का आलम यह था कि लोग कहते कि अगर वह एम॰ पी॰, एम॰ एल॰ ए॰ का चुनाव लड़ें तो जीत जाएं। पर वह
तो राजनीति नाम से चिढ़ते थे। और जब चुनाव-चुनाव कुछ ज्यादा ही उन के नाम के आगे
जुड़ने लगा, फिर कुछ राजनीतिक पार्टियों के लोग उन
से मिलने भी आने लगे तो वह खीझ गए। कलफ लगा कर खद्दर का सफेद धोती कुर्ता बड़ी शान
से पहनने वाले बाबू गोधन सिंह ने अचानक खद्दर पहनना छोड़ कर रंगीन टेरीकाट का
कुर्ता और सूती धोती पहननी शुरू कर दी। खद्दर के सभी कुर्ते धोती उन्हों ने अपने
हरवाह फेंकुआ को दे दिए। इस फेर में कुछ दिनों तक वह घुड़सवारी के करतब दिखाना भूल
गए। वह तो भला हो गोपी कोइरी का कि उसी बीच उस की बेटी की शादी पड़ गई और वह 'दोहाई बाऊ साहब’ कहते हुए उन के दरवाजे पहुंच
गया। बाऊ साहब को भी जैसे आक्सीजन मिल गई। वह न सिर्फ अगुवानी के लिए तैयार हो गए
बल्कि गोपी कोइरी को पांच सौ एक रुपए भी बिटिया की शादी में बतौर मदद दे बैठे।
बोले, ‘न्यौता है ! रख ले!’
फिर तो उस दिन की अगुवानी भी देखने लायक थी।
इधर तुरही-नगाड़ा बजा, उधर
बाऊ साहब का घोड़ा दौड़ा। लोगों ने दांतों तले उंगली दबा ली। ऐसी घुड़सवारी बाऊ
साहब की लोगों ने पहले कभी देखी नहीं थी। पर बाऊ साहब पर तो जैसे जुनून सवार था
घुड़सवारी के करतब दिखाने का।
फिर तो जैसे सिलसिला ही चल निकला। इधर तुरही-नगाड़ा बजता उधर बाऊ
साहब का घोड़ा दौड़ता ! अब लोग दूर-दूर से बाऊ साहब की अगुवानी देखने आने लगे।
इतने जितने नाच देखने नहीं आते थे। बल्कि कई तो खाना बांध कर साथ लाते थे कि शाम
को बाऊ साहब की अगुवानी देखेंगे और रात में नाच ! फिर आने-जाने का कौन झमेला पाले
! तो कुछ चतुर दर्शक बारात में ही पैठ कर भोजन के बहाने ‘आलू परोरा और अरवा चावल’
काट लेते।
बाऊ साहब की अगुवानी अब इस इलाके में किंवदंती बन चली थी। पर बाऊ
साहब कितने परेशान और तबाह हैं इस की ख़बर किसी को नहीं थी। वह किसी को पता लगने
भी नहीं देते थे। खद्दर की कलफ लगी धोती और कुर्ता भले ही उन से बिसर कर उन की
अकड़ के इजाफे को धूमिल करते थे पर लुजलुजे टेरीकाट के कुर्ते में भी उन की मूंछों
की कड़क पहले ही जैसी थी।
पर करें तो क्या करें ?
इन कड़क मूछों का वारिस उन्हें नहीं मिल रहा था। सात-आठ बरस बीत गए
थे उन की शादी के पर वह संतान सुख से वंचित थे। मार पूजा-पाठ, सोखा- ओझा, झाड़-फूंक, देवता-पित्तर, अनौती-मनौती सब कर धर कर वह हार चुके थे। पर बात थी कि बनती नहीं थी।
उल्टे उन की धर्मपत्नी को जब तब चुड़ैल धर लेती थी सो वह परेशान रहने लगे थे।
संतान न होने के गम में वह घोड़े बढ़ाते जाते। कुछ पंडितों ने गऊ सेवा की सलाह दी
तो उन्हों ने घोड़ों के साथ-साथ गायों की संख्या भी बढ़ा दी। घुड़साल-गऊशाला दोनों
ही बराबर थे। गायों का तो गोबर, सानी-पानी
भी वह खुद करने लगे। पर बात तब भी नहीं बनी। फिर कुछ लोगों ने बिहार में मैरवां
बाबा के थान जाने की सलाह दी।
बाऊ साहब मैरवां बाबा के थान गए। मैरवां जा कर एक संन्यासी साधु की
शरण ली। उस के हाव-भाव बाऊ साहब को अच्छे नहीं लगे पर संतान का सवाल था सो चुप
लगाए रहे। शुरू में उस ने बाऊ साहब से कुछ पूजा-पाठ करवाए और बबुआइन पर डोरे डाले।
पर उस की दाल नहीं गली। फिर उस ने उपवास के आदेश दिए। दिन भर निराजल व्रत और शाम
को एक समय फलाहार। दोनों जने के लिए। कहा कि, ‘ब्रह्मचर्य
भी दोनों जने के लिए जरूरी है।’ रात में वह लौंग भभूत भी करता। दिन में वह बाऊ
साहब को कुछ जड़ी-बूटी ढूंढने के लिए भेजने लगा और बबुआइन से अपनी सेवा करवाता।
सेवा करवाते-करवाते वह एक दिन बबुआइन को बाहों में भर कर लिटाने लगा। पहले तो
बबुआइन अचकचा गईं और कुछ समझी नहीं और जब तक कुछ समझतीं-समझतीं तब तक वह संन्यासी
उन्हें निर्वस्त्र कर चुका था। बबुआइन थीं तो निराजल व्रत और बाऊ साहब जड़ी बूटी
ढूंढने के लिए दूर भेजे गए थे सो संन्यासी ने बबुआइन को संतान सुख देने का इरादा
बना लिया था। बबुआइन भले निराजल व्रत थीं, दम
देह से बाहर था पर उन की पतिव्रता स्त्री ने कहीं भीतर से जाेर मारा और उन्हों ने
संन्यासी को दुत्कारते हुए अपने ऊपर से ढकेल दिया। संन्यासी भन्नाया और धर्म-कर्म
की धौंस दी। कहा कि, ‘धर्म में अड़चन बनोगी तो संतान सुख
नहीं मिलेगा।’ उस ने धमकाया और कहा कि, ‘यह
देह भोग भी अनुष्ठान का एक हिस्सा है ! सो अनुष्ठान पूरा होने दो नहीं, बड़ा पाप पड़ेगा।’
बबुआइन ने पलट कर संन्यासी की दाढ़ी नोंच ली और पास पड़ी लौंग भभूत
उस की आंखों में झोंक दिया। संन्यासी, ‘अनर्थ-अनर्थ, घोर अनर्थ !’ चीख़ने लगा। बबुआइन बोलीं, ‘कुछ अनर्थ-वनर्थ हमारा नहीं होने वाला। जो होगा, वह तेरा होगा।’ वह देह पर जल्दी-जल्दी कपड़े
लपेटती हुई बोलीं, ‘हम से कहता है ब्रह्मचर्य जरूरी है और
अपने ‘भोग’ करना चाहता है। मलेच्छ ! तुझे नरक में भी जगह नहीं मिलेगी!’
‘अब
भी कहता हूं कि बुद्धि से कार्य ले मूर्ख औरत ! और अनुष्ठान पूरा हो जाने दे, मुझे भोग करने दे, यही विधान है, प्राचीन विधान है, कइयों
को इस से संतान सुख मिल चुका है ! पर तू अभागन है जो अनुष्ठान में बाधा डाल रही
है।’ संन्यासी अपनी आंख मलता हुआ बोला।
‘ऐसे
मुझे नहीं चाहिए संतान सुख !’ कह कर बबुआइन ने उस आंख मलते संन्यासी को जोर की एक
लात मारी ! जाने कहां से बबुआइन में इतनी ताकत आ गई थी। दर्द से कराहता हुआ
संन्यासी बोला, ‘छोड़ दे मेरी कुटिया अभागन।’ वह जोर से
चीख़ा, ‘और इसी समय छोड़ दे ! तूने मेरा और
मेरी कुटिया दोनों का अपमान किया है।’
बबुआइन ने झटपट उस की कुटिया छोड़ते हुए कहा, ‘तू क्या छुड़ाएगा, मैं ख़ुद ही तेरी यह पाप की कुटिया छोड़े जा
रही हूं !’ और अभी जब पुलिस आ कर तुझ पर डंडे बजाएगी तब तुझे समझ आएगा कि कैसे
संतान के लिए अनुष्ठान में भोग जरूरी होता है।’
‘तो
पापिन तू पुलिस के पास जाएगी ?’ वह
संन्यासी गुर्राया।
‘बिलकुल
जाऊंगी। सौ बार जाऊंगी।’ वह बोलीं।
‘जा
अभागन जा !’ संन्यासी बोला,
‘जरूर जा। तुझे
संतान सुख जरूर मिलेगा।’
संन्यासी बोला, ‘मुझ
से तो तू बच गई, छूट गई मेरे हाथ से, पर पुलिस तुझे नहीं छोड़ेगी। तुझे संतान सुख
जरूर देगी।’ उस ने जोड़ा,
‘ऐसा भी बहुत हो
चुका है और जो तू समझ रही है कि पुलिस मुझे डंडे लगाएगी तो यह तेरा अज्ञान है औरत!
पुलिस यहां डंडे नहीं ‘हफ्ता’ लगाती है। वह क्या खा कर डंडे लगाएगी? हा-हा।’ कह कर वह संन्यासी फिर से चिलम में भरी
चरस पीने लगा।
बबुआइन उस की बातें सुन कर एक बार के लिए तो डर गईं। पर जल्दी-जल्दी
अपना सामान बांधा और कुटिया के बाहर आ कर बाऊ साहब के इंतजार में बैठ गईं। बाऊ
साहब जो संतानोत्पत्ति के अनुष्ठान ख़ातिर जड़ी-बूटी लेने गए थे। कहीं दूर। बहुत
दूर।
सांझ घिरते-घिरते बाऊ साहब आ भी गए। बबुआइन को मय सामान के बाहर बैठे
देख कर कुछ तो वह खुद ही समझ गए, जो
बाकी रहा बबुआइन की आंखों और उन के छलकते आंसुओं ने समझा दिया। बाऊ साहब बबुआइन को
ले कर कुटिया के भीतर गए और जिस संन्यासी के रोज सुबह-शाम पांव छूते थे उसे पैरों
से दोनों जने मार कर बाहर आ गए। वह संन्यासी चरस में धुत्त था, उस की सेहत पर कुछ असर नहीं पड़ा। बबुआइन के
कहे पर बाऊ साहब पुलिस में भी गए। पर जैसा कि उस संन्यासी ने कहा था कि, ‘पुलिस यहां डंडे नहीं हफ्ता लगाती है।’ वैसे ही
हुआ। उल्टे बबुआइन ही पुलिस के सवाली फंदे में आ गईं। पुलिस ने उन से रात थाने में
रुकने को कहा तो बबुआइन डर गईं। उन्हें उस संन्यासी की कही बात याद आ गई कि, ‘मुझ से बच गई, छूट गई मेरे हाथ से, पर
पुलिस तुझे नहीं छोड़ेगी। तुझे संतान सुख जरूर देगी।’ बबुआइन को उस का कहा यह भी
याद आया कि, ‘ऐसा भी बहुत हो चुका है।’ बबुआइन ने
बाऊ साहब को यह सारी बातें खुसफुस-खुसफुस कर के बताईं तो बाऊ साहब भी सशंकित हुए
और खाना खाने के बहाने थाने से रुखसत हुए। हालां कि पुलिस वालों ने उन्हें रोका और
कहा कि, ‘भोजन की चिंता मत करें, यहीं मंगवा देते हैं।’ पर बाऊ साहब दो कदम आगे
जा कर बोले, ‘अरे जाएंगे कहां, खा कर यहीं आएंगे और यहीं सोएंगे।’ तो पुलिस
वाले निश्चिंत हो गए। लेकिन बाऊ साहब निश्चिंत नहीं हुए। वह सवारी ढूंढ कर सीधे
छपरा पहुंचे। वहां नहीं रुके। स्टेशन पर कोई गाड़ी नहीं थी रात में तो वहीं वेटिंग
रूम में रुक गए। सुबह गाड़ी मिली और वह घर वापस आए।
उदास और परेशान !
गांव में लोग पूछते और बार-बार पूछते कि ‘क्या हुआ ?’ अब क्या हुआ का क्या जवाब देते बाऊ साहब। गांव
की ‘ज्ञानी’ और ‘अनुभवी’ औरतें भी बबुआइन से ‘ठिठोली’ फोड़तीं। किसिम-किसिम की। पर
बबुआइन लोक लाज के डर से चुप लगा जातीं। लेकिन गांव क्या जवार के लोग भी चुप नहीं
थे। सब के सब उम्मीदों की ढेर पर उछल रहे थे कि अब तो बाऊ साहब के ख़ानदान का
चिराग आने वाला है। पर उम्मीदों के खोखले ढेर पर आख़िर लोग कब तक उछलते ? दो साल, तीन
साल बीत गया और बाऊ साहब के यहां बबुआइन के खटाई खाने का दिन नहीं आया, सोहर गाने का दिन नहीं निकला।
और अब तो गांव जवार के क्या, बाऊ
साहब क्या बबुआइन भी परेशान रहने लगीं कि आख़िर ख़ानदान के चिराग बिना वह क्या
करेंगी। बाऊ साहब तो घोड़ों में अपनी इस चिंता का घाम उतार लेते थे। पर बबुआइन
क्या करें?
हां, क्या करें बबुआइन ?
हार मान कर बबुआइन ने बाऊ साहब को दूसरी शादी कर लेने को कह दिया। न
सिर्फ कह दिया बल्कि पूरा दबाव भी डाला और डलवाया। पर बाऊ साहब तैयार नहीं थे। वह
कहते, ‘जब संतान सुख लिखा होगा तो एक ही पत्नी
से मिल जाएगा। नहीं लिखा होगा तो दो क्या चार शादियां कर लूं नहीं मिलेगा।’
‘शुभ-शुभ
बोलिए !’ बबुआइन उन का मुंह पकड़ती हुई कहतीं, ‘ऐसा
नहीं कहते,’ और बाऊ साहब चुप रह जाते।
बबुआइन आख़िरकार नहीं मानीं और अपनी एक ममेरी बहन से बाऊ साहब का
रिश्ता तय करवा दिया। बारात विदा हुई तो लोढ़ा ले कर बबुआइन ने खुद बाऊ साहब को
परीछा। टीका लगाया।
पर बारात विदा होने के बाद जाने क्यों वह रोईं भी और बहुत रोईं। उन
को लगने लगा था कि बाऊ साहब अब उन से बिछड़ जाएंगे। उन के नहीं रहेंगे। यही
सोचते-सोचते वह और रोने लगतीं। आख़िरकार वह रोते-रोते घुड़साल में चली गईं और
एक-एक कर के सभी घोड़ों को दुलराने लगीं। और जब बाऊ साहब के सब से प्रिय घोड़े के
पास वह पहुंचीं तो उस से चिपट गईं और फफक-फफक कर रोने लगीं।
सांझ हो गई थी। पर उधर दूल्हा बने बाऊ साहब भी उदास थे। द्वारपूजा की
बेला तो वह और भी उदास हो गए। ख़ास कर जब बैंड बाजे के साथ तुरही-नगाड़ा बजा तो वह
बेकल हो गए। बहुत दिनों बाद बल्कि उन के लिए तो यह पहली बार हो रहा था कि
तुरही-नगाड़ा बज रहा था और उन का घोड़ा और वह अगुवानी में नहीं थे। वह बहुत छटपटाए
और एक बार तो उन्हों ने सोचा भी कि दूल्हे की भूमिका से जरा देर छुट्टी ले कर वह
अगुवानी की भूमिका में हो लें। लड़की के पिता को बुला कर मजाक ही मजाक में उन्हों
ने यह बात ‘मामा जी मामा जी !’ संबोधित कर बड़े मनुहार से कही भी। पर मामा जी
सकुचा गए। बोले, ‘आप भी का कहते हैं दामाद जी! आज और एह
बेला ई बात भूल जाइए।’ वह बोले, ‘अभी
तो आप दूल्हा बाबू हैं। यही बने रहें। इसी में आप की भी शोभा है। और हमारा भी इसी
में शोभा है !’
पर डोली के अगल-बगश्ल घोड़ों की पदचाप सुन-सुन कर बाऊ साहब परेशान हो
गए। उन्हें अपने प्रिय घोड़े की याद आ गई और साथ ही बबुआइन की भी।
बाऊ साहब बबुआइन के बारे में सोचने लगे कि वह कितना उन्हें चाहती
हैं। उन्हें और उन के ख़ानदान को। कि ख़ानदान का चिराग हो इस के लिए वह अपनी सौत
तक लाने को तैयार हो गईं। यहां तक कि उन्हें ख़ुद परीछ कर भेजा। वह बबुआइन की याद
में भावुक हो गए। उन की आंखें भर आईं। यहां तक कि जब वह अपनी दूसरी पत्नी की मांग
में सिंदूर भर रहे थे तब भी उन की आंखों में बबुआइन ही थीं, उन के भावों में बबुआइन ही थीं। वह मांग में
सिंदूर ऐसे भर रहे थे जैसे वह बबुआइन की मांग में सिंदूर भर रहे हों। और उन्हें
अपने पहले ब्याह की याद आ गई। जब कि इधर ससुराल की औरतें बाऊ साहब के साथ ठिठोली
और मजाक पर आमादा थीं। लेकिन बाऊ साहब तो बबुआइन की याद में भींग रहे थे।
आख़िर बाऊ साहब दूसरी बबुआइन को भी ब्याह कर घर पहुंचे। तब भी बड़की
बबुआइन, (हां, अब वह बड़की बबुआइन हो गई थीं।) बढ़-चढ़ कर बाऊ साहब और छोटकी को
परीछ रही थीं। यहां तक कि सुहागरात के लिए भी छोटकी बबुआइन के पास बाऊ साहब को
पकड़ कर बड़की बबुआइन ही ले गईं। बड़की बबुआइन जब बाऊ साहब को छोटकी बबुआइन के
कमरे में छोड़ कर आने लगीं तो जाने यह छोटकी बबुआइन से उम्र का गैप था या बड़की
बबुआइन से लगाव बाऊ साहब कूद कर बड़की बबुआइन से लिपट कर दहाड़ मार कर रोने लगे।
जैसे कोई बच्चा अपनी मां से लिपट कर रो रहा हो। पर बड़की बबुआइन उन्हें समझा बुझा
कर चली आईं। लेकिन थोड़ी ही देर बाद बाऊ साहब भाग कर बड़की बबुआइन के कमरे में आ
गए। और उन से लिपट गए। धीरे-धीरे बड़की बबुआइन के कपड़े उतारने लगे। बड़की बबुआइन
हालां कि बुदबुदाती रहीं,
‘आज की रात हमारी
नहीं, छोटकी की है।’ पर बाऊ साहब माने नहीं
और यह रात बड़की बबुआइन पर ही न्यौछावर कर गए।
दूसरी सुबह बड़की बबुआइन ने छोटकी से माफी मांगी और कुछ ‘गुन’ भी उसे
बताए बिलकुल भौजाई अंदाज में। ऐसे जैसे भाभी ननद को बताए।
लेकिन बाऊ साहब तो बाऊ साहब ! बड़की बबुआइन का पल्लू छोड़ते ही नहीं
थे। हार मान कर बड़की बबुआइन कुछ काम निकाल कर नइहर चली गईं।
वापस आईं तो बिलकुल धर्म की गठरी बन कर। गोया बड़की बबुआइन नहीं
संन्यासिन हों। बाऊ साहब भी तब तक छोटकी बबुआइन में रम गए थे। पर बड़की बबुआइन का
यह संन्यासिन रूप उन्हें चौंका गया। वह तो बाद में बड़की बबुआइन ने उन्हें इस का
राज बताया कि ख़ानदान के चिराग के लिए यह पूजा पाठ बहुत जरूरी है। छोटकी बबुआइन के
रूप जाल में रीझ चुके बाऊ साहब भी आंख मूंद कर मान गए। अब अलग बात है कि गांव में
लोग खुसफुसाते कि भरी जवानी में बड़की बबुआइन सधुआइन होइ गईं !
आलम यह था कि बड़की बबुआइन पूजा पाठ में रम गई थीं और बाऊ साहब छोटकी
बबुआइन में। कई बार यह भी होने लगा कि छोटकी बबुआइन, बड़की बबुआइन को हाशिए पर रखने लगीं, उन्हें अपमानित करने लगीं। जिसे बड़की बबुआइन इतने दुलार से लाई थीं
वही अब उन की सौत बनने लगी। बड़की बबुआइन ने कभी इस का बुरा नहीं माना। सब कुछ वह
हंस कर टाल जातीं। लेकिन बाऊ साहब छोटकी बबुआइन की गुलामी में इतने अंधे हो गए कि
बड़की बबुआइन का अपमान उन्हें दिखाई ही नहीं देता था। हां, यह जरूर था कि बड़की बबुआइन के लाख ‘नहीं-नहीं’
रटने के बाजवूद बाऊ साहब कभी-कभी उन के साथ भी रात गुजार लेते थे।
मन फेर वास्ते।
छोटकी बबुआइन के आए तीन-चार साल होने लगे पर समय बाऊ साहब का नहीं
बदला। न ही उन का दुर्भाग्य। छोटकी बबुआइन के सारे ‘गुन-जतन’ और बड़की बबुआइन के
लाख पूजा-पाठ के बावजूद बाऊ साहब के ख़ानदान के चिराग का दूर-दूर तक पता नहीं था।
छोटकी बबुआइन के खटाई खाने के दिन का इंतजार, इंतजार
ही बना रह जाता। उल्टे अब होने यह लगा कि बड़की बबुआइन के साथ-साथ छोटकी बबुआइन को
भी चुड़इल धरने लगी थी। अब की बार बाऊ साहब ने सोखा-ओझा के अलावा डॉक्टरों की भी
सेवाएं लेनी शुरू कर दी थीं।
पर सब बेअसर था।
गांव में चरचा चल पड़ी कि बाऊ साहब के भाग्य में संतान नहीं बदा है।
अब जो पट्टीदार दूर-दूर रहते थे, जलन
रखते थे, वह भी अब करीब आने लगे, मीठा व्यवहार करने लगे। क्या तो बाऊ साहब की
जमीन-जायदाद आख़िर कौन संभालेगा?
एक तरह से कंप्टीशन ही लग गया था कि कौन पट्टीदार बाऊ साहब का ज्यादा
सगा है। सब उन की ख़ातिरदारी में लगे रहते। पर बड़की बबुआइन सब कुछ समझते हुए भी
अनजान बनी पूजा-पाठ में लगी रहतीं। छोटकी बबुआइन को भी वह पूजा-पाठ के लिए समझातीं
पर वह उन की सुनती ही नहीं थीं। समय धीरे-धीरे कटता जा रहा था साथ ही बड़की बबुआइन
की चिंताएं भी। बाऊ साहब तो अपने घोड़ों और द्वारपूजा की अगुवानी में फिर से मगन
हो गए थे। लेकिन बड़की बबुआइन बड़े पशोपेश में थीं कि आख़िर बाऊ साहब के ख़ानदान
का चिराग कहां से लाएं ?
एकाध बार उन्हों ने किसी बच्चे को गोद लेने की भी बात बाऊ साहब से
चलाई।
लेकिन बाऊ साहब ने न इंकार किया न हां किया। वह टाल गए।
उन्हीं दिनों एक युवा ब्राह्मण बड़की बबुआइन को पोथी सुनाने आने लगा।
पोथी सुनाते-सुनाते वह बड़की बबुआइन की छलकती देह भी देखने लगा। बड़की बबुआइन भी
अब चालीस की उम्र छू रही थीं। पर उन की गोरी चिट्टी देह, देह का गठाव उन्हें तीस-पैंतीस से नीचे का ही
भास दिलाता था। संतान न होने के नाते भी उन की देह ढली नहीं थी, उठान पर थी। ब्राह्मण था भी तेइस-पच्चीस बरस
का। पोथी सुनाते-सुनाते वह अनायास ही बड़की बबुआइन की उठती-गिरती छातियां देखने
लगता। भगवान ने भी बड़की बबुआइन को संतान भले नहीं दिया था पर सुंदरता और सुंदर
देह देने में कंजूसी नहीं की थी। बड़की बबुआइन जब चलतीं तो उन के नितंबों को ही
देख कर लोग पागल हो जाते।
और वह युवा ब्राह्मण ?
वह तो जैसे उन का उपासक ही बन चला। बड़की बबुआइन के आगे उस का
ब्रह्मचर्य गलने लगता। लेकिन बड़की बबुआइन युवा ब्राह्मण की इस उपासना से बेख़बर
भगवान की ही उपासना में लीन थीं। युवा ब्राह्मण यह तो जानता था कि बड़की बबुआइन
संतान के लिए लालायित हैं सो एक दिन हिम्मत कर उस ने महाभारत की कथा बांचनी शुरू
कर दी। बड़की बबुआइन ने ब्राह्मण को मना भी किया कि, ‘महाभारत वह न सुनाएं। महाभारत सुनने से घर में झगड़ा होता है।’ पर
युवा ब्राह्मण उन्हें महाभारत सुना देने पर आमादा था। कहा कि, ‘एक-दो अध्याय सुनने से कोई हानि नहीं होती।’
बड़की बबुआइन मान गईं। तो ब्राह्मण ने महाभारत का वह प्रसंग बड़की बबुआइन को
सुनाना शुरू किया जिस में ऋषि वेद व्यास नियोग से अंबिके, अंबालिके और दासी को संतान सुख देते हैं।
ब्राह्मण ने इस कथा को पूरे मनोयोग, पूरे
लालित्य और पूरे विस्तार से सुनाया और उस ने पाया कि कथा सुन कर बड़की बबुआइन
विचलित भी हुईं। फिर उन्हों ने बात ही बात में ब्राह्मण से पूछा भी कि, ‘नियोग क्या आज के युग में भी संभव है ?’ युवा ब्राह्मण का ब्रह्मचर्य भले बड़की बबुआइन
के आगे गल रहा था पर ईमान अभी नहीं गला था। उस ने साफ बता दिया कि, ‘मेरी जानकारी में आज के युग में नियोग संभव
नहीं है फिर....’ कह कर वह चुप हो गया।
‘फिर
क्या ?’ बड़की बबुआइन में उत्सुकता जागी।
‘संतान
के लिए किसी ब्राह्मण की मदद लेना भी धर्म ही है।’ वह युवा ब्राह्मण संकोच बरतते
हुए बोला।
‘क्या
बात करते हैं पंडित जी !’ नाराज होती हुई बड़की बबुआइन उस ब्राह्मण से बोलीं, ‘अब आप जाइए !’ ब्राह्मण चुपचाप चला गया। फिर
नहीं आया। बड़की बबुआइन ने बुलवाया भी नहीं।
कुछ दिनों बाद जब बड़की बबुआइन का चित्त स्थिर हुआ तो उन्हों ने उस
युवा ब्राह्मण को बुलवा भेजा। वह ब्राह्मण आया और फिर से पोथियां पढ़ने लगा। दिन
बीतने लगे। एक दिन बड़की बबुआइन ने भरी दुपहरिया में उस युवा ब्राह्मण से फिर
महाभारत में वर्णित ऋषि वेद व्यास द्वारा अंबिके, अंबालिके और दासी को नियोग से संतान सुख देने की कथा सुनाने को कहा।
पहले तो युवा ब्राह्मण ने उन्हें मना कर दिया पर जब बड़की बबुआइन का इसरार ज्यादा
बढ़ा तो ऋषि वेद व्यास का नियोग प्रसंग वह ब्राह्मण सुनाने लगा। नियोग प्रसंग
सुनते-सुनते कब बड़की बबुआइन उस के चरणों में लेट गईं उसे पता ही नहीं चला। जब पता
चला तो पहले तो वह घबराया कि कहीं अनर्थ न हो जाए, कहीं बड़की बबुआइन नाराज न हो जाएं पर जल्दी ही उस ने हिम्मत बटोर का
बबुआइन के गाल पर पड़े आंसुओं को धोती की कोर से पोंछा। फिर उन के बालों को
सहलाया। और जब देखा कि बड़की बबुआइन जागी हुई भी हैं पर आंखें बंद किए निष्चेष्ट
लेटी पड़ी हैं तब धीरे से उस ने एक हाथ नीचे से उन के नितंबों पर फेरा और दूसरा
उरोजों पर। बड़की बबुआइन एक क्षण के लिए तो कुनमुनाई कसमसाईं पर दूसरे ही क्षण वह
आंखें बंद किए-किए समर्पिता के भाव में आ गईं। ब्राह्मण युवा था और अनुभवहीन भी।
जल्दी ही स्खलित हो गया। बड़की बबुआइन उदास हो गईं। पर क्या करें अब तो वह उस के
आगे समर्पित हो चुकी थीं। इज्जत तो गंवा ही चुकी थीं और संतान प्राप्ति की लालसा
भी उन्हें दबोचे हुई थी। संतान प्राप्ति की लालसा में अब वह हर भरी दुपहरिया में
उस युवा ब्राह्मण के आगे समर्पित होने लगीं। वह ब्राह्मण बाऊ साहब की तरह उन्हें
पूरी तरह तृप्त तो नहीं कर पाता था पर बड़की बबुआइन भी उस के साथ देह नहीं, संतान जीती थीं। मन में एक मलाल भर कर कि, ‘यह तो पाप है।’ पर अब वह करें तो भी तो क्या ? संतान की चाह में पतिव्रत धर्म और इज्जत वह
दोनों ही गंवा चुकी थीं। सब कुछ के बावजूद वह उदास भी रहने लगीं। ब्राह्मण उन्हें
बहुत बहलाने की कोशिश करता पर एज गैप सामने आ जाता। वह छोटा पड़ जाता। दीन तो वह
था ही, हीन भी हो जाता। पर धीरे-धीरे बड़की
बबुआइन को लगने लगा कि अब इस युवा ब्राह्मण से भी उन्हें तृप्ति मिलने लगी है। और
कभी-कभी तो वह बाऊ साहब से भी ज्यादा तृप्ति दे देता।
बाऊ साहब एक बार में ही करवट बदल लेते। पर यह युवा ब्राह्मण करवट ही
नहीं बदलता। घंटे भर में ही दो बार-तीन बार तृप्त करता। वह तृप्त करता और बबुआइन
उसे भरपूर दक्षिणा देतीं।
इस देह तृप्ति और दक्षिणा का संयोग आखि़र रंग लाया। बड़की बबुआइन की
मंथली इस बार रुक गई। उन की कोख हरी हो गई। वह खुशी से दोहरी हो गईं। उस दुपहरिया
वह युवा ब्राह्मण के प्रति ज्यादा कृतज्ञ थीं। ज्यादा तृप्त भी हुईं। फिर उस को
ऐसे चूमती रहीं जैसे वह उन के होने वाले बच्चे का पिता नहीं, ख़ुद होने वाला बच्चा हो।
पर बड़की बबुआइन ने यह बात तुरंत-तुरंत किसी को नहीं बताई। बाऊ साहब
को भी नहीं कि कहीं उन्हें कोई शक न हो जाए। ख़ुद तो वह खुशी से समायी न फूलतीं।
पर वह खुशी किसी और पर जाहिर नहीं करतीं। एक तो मारे लाज से। दूसरे, टोने-टोटके के डर से। फिर एक डर यह भी था कि
कहीं गर्भ पक्का न हो तो ?
कुछ अपशकुन हो जाए तो ? पर जब दूसरे और तीसरे महीने भी मंथली नहीं हुई
और उलटियां शुरू हो गईं तो गांव भर में बाऊ साहब ने लड्डू बंटवाए। मंदिर-तीर्थ किए
और बड़की बबुआइन के लिए लेडी डॉक्टर का प्रबंध किया। संयोग देखिए की बड़की बबुआइन
ने बेटे को जन्म दिया। बधावे बजने लगे। घर में औरतें सोहर गाने लगीं और बाहर
हिजड़े नाचने लगे। नगाड़ा-तुरही बजने लगे।
गांव झूम उठा। बाऊ साहब की ख़ुशी में सभी शरीक थे। और बाऊ साहब? वह तो अपना प्रिय सफेद घोड़ा ऐसे दौड़ाते जैसे
वह चेतक हो और खुद राणा प्रताप !
लेकिन इस सारे क्रम में कोई अगर दुःखी था तो दो लोग। एक तो बाऊ साहब
के पट्टीदार और दूसरे छोटकी बबुआइन। पर यह लोग अपना दुःख जाहिर नहीं करते।
और वह युवा ब्राह्मण ?
उस की तो जैसे लाटरी खुल गई।
बाऊ साहब ने उसे पांच बीघा जमीन दे कर उस की एक कुटिया कम आश्रम बनवा
दिया। क्या तो बड़की बबुआइन का पूजा-पाठ और इस ब्राह्मण के आशीर्वाद से ही बाऊ
साहब को संतान सुख मिला था।
सच भी यही था।
बड़की बबुआइन ने भी उस युवा ब्राह्मण की सेवा में कसर नहीं छोड़ी। पर
साथ ही उस की पोथी-पत्र की कसम भी ले ली कि वह इस राज को राज ही रहने देगा, मर जाएगा पर भेद नहीं खोलेगा। वह और तो सब कुछ
मान गया, अपने मन और जबान पर लगाम लगा लिया पर
तन का वह क्या करे ? वह बार-बार मौका देख कर बड़की बबुआइन
के सामने याचक बन कर खड़ा हो जाता। पर बड़की बबुआइन उस की याचना के आगे पिघलती ही
नहीं थीं। उन्हें वैसे भी देह सुख की तलाश नहीं थी। संतान सुख की तलाश उन की पूरी
हो ही चुकी थी। लेकिन वह युवा ब्राह्मण बिना बड़की बबुआइन की देह फिर भोगे छोड़ने
वाला नहीं था। आख़िर बड़की बबुआइन को उस के आगे झुकना ही पड़ा। उस की देह के नीचे
आना ही पड़ा। वह युवा ब्राह्मण भी अब ढीठ हो चुका था और ‘अनुभवी’ भी।
धीरे-धीरे बड़की बबुआइन को भी उस से सुख मिलने लगा। वह देह सुख में
डूबने लगीं। और बाऊ साहब ?
उन्हें लगता बाऊ साहब अब बुढ़ा रहे
हैं। देह लीला अब उन के मान की नहीं रही। सो अब वह थीं, ढींठ और अनुभवी हो चला युवा ब्राह्मण था, उस का आश्रम था और देह भोग था। नतीजा सामने था
बड़की बबुआइन के पांव फिर भारी थे।
खुशियां फिर छलछलाईं।
अब वह दो बेटों की मां थीं। धीरे-धीरे युवा ब्राह्मण की कृपा से वह
‘दूधो नहाओ पूतो फलो’ को चरितार्थ करती हुई अब तीन-तीन बेटों की मां बन चली थीं।
एक बेटे की शक्ल तो बड़की बबुआइन से मिलती थी पर बाकी दो किस पर गए थे यह बाऊ साहब
के लिए शोध का विषय था। क्यों कि उन पर तो एक भी बेटा नहीं गया था। फिर भी वह यही
सोच कर खुश थे कि अब उन के तीन-तीन बेटे हैं।
लेकिन छोटकी बबुआइन खुश नहीं थीं। उन की हालत अब बिगड़ती जा रही थी।
बड़की बबुआइन के तीन-तीन बेटे और उन के एक भी नहीं। तब जब कि बाऊ साहब संतान सुख
के लिए ही उन्हें ब्याह कर लाए थे। बड़की बबुआइन की तरह छोटकी बबुआइन ने भी अब
पूजा-पाठ शुरू कर दिया। एक बार बाऊ साहब से वह मैरवां बाबा के थान चलने के लिए भी
अड़ीं पर बाऊ साहब ने उन्हें डांट दिया। बोले, ‘वहां
सब अघोड़ी रहते हैं।’
अंततः छोटकी बबुआइन ने भी पोथी सुनना शुरू किया लेकिन उन का ब्राह्मण
युवा नहीं, बूढ़ा था। दूसरे, छोटकी बबुआइन का लावण्य भी अब जाता रहा था।
मारे कुंठा के वह घुलती जा रही थीं। पर देह सुख की लालसा उन की अभी मरी नहीं थी।
तिस पर बाऊ साहब उन के लिए पूरे नहीं पड़ते थे। महीने में दो एक बार ही उन के पास
आते और जल्दी ही छितरा कर छिटक जाते। छोटकी बबुआइन भुखाई की भुखाई रह जातीं, तृप्त भी नहीं हो पातीं। हार मान कर वह बाऊ
साहब से चिपटने लगतीं तो आजिज आ कर बाऊ साहब उठ कर बड़की बबुआइन के कमरे में चले
जाते।
तो क्या करें अब छोटकी बबुआइन ?
हार मान कर वह बड़की बबुआइन की शरण में गईं। वह जैसे बड़की बबुआइन की
दासी सी बन गईं। बहुत सेवा करने के बाद आख़िर एक रोज उन्हों ने बबुआइन से पूछ ही
लिया राज की बात। बोलीं,
‘दीदी एक बात
पूछूं?’
‘पूछो
!’ दर्प में ऊभ-चूभ बड़की बबुआइन बोलीं।
‘आख़िर
कौन सा उपाय करती हैं जो आप के एक नहीं तीन-तीन बेटे हो गए!’ वह बड़की बबुआइन की
मनुहार करती, लजाती हुई बोलीं, ‘हम को भी बता न दीजिए दीदी ! जिंदगी भर आप के
चरणों में रहूंगी।’ कह कर छोटकी बबुआइन, बड़की
बबुआइन के पैर पकड़ कर गिड़गिड़ाईं। लेकिन बड़की बबुआइन सिर पर पल्लू रखती हुई उठ
खड़ी हुईं। और बिन कुछ बोले चली गईं। लेकिन छोटकी बबुआइन ने भी जैसे ठान ही लिया
था। वह जब तब सांझ-सवेरे,
रात-दुपहरिया बड़की बबुआइन के पैर पकड़
कर गिड़गिड़ाने लगतीं, ‘हम को भी बता न दीजिए दीदी !’ पर बड़की
बबुआइन चुप लगा जातीं। आख़िर वह बतातीं भी तो क्या बतातीं? लेकिन जब ‘हम को भी बता न दीजिए दीदी !’ का
दबाव बहुत बढ़ गया तो बड़की बबुआइन एक दिन पिघल गईं। छोटकी पर उन्हें दया आ गई।
पल्लू सिर पर रखती और पांव फैलाती हुई उन्हों ने संतान सुख का सूत्र दे दिया, ‘बाऊ साहब के भरोसे रहोगी तो कुछ नहीं होगा।’ वह
खुसफुसाईं, ‘अपना इंतजाम खुद करो !’ कह कर वह
किंचित मुसकुराईं। ऋषि वेद व्यास की नियोग कथा बरास्ता अंबिके, अंबालिका सुनाई और बोलीं, ‘लेकिन सावधानी से किसी को पता न चले। आख़िर
ख़ानदान की इज्जत का सवाल है।’ और फिर उदास हो कर लेट गईं। छोटकी बबुआइन बड़ी देर
तक उन के पांव दबाती रहीं।
संतान सुख का सूत्र छोटकी बबुआइन के हाथ भी लग ही गया था। जल्दी ही
उन के भी पांव भारी हो गए। छोटकी बबुआइन का ब्राह्मण भी बूढ़ा भले था पर इतना भी
नहीं कि संतान सुख न दे सके। पर छोटकी बबुआइन को तो सिर्फ संतान सुख ही नहीं, देह सुख की भी तलाश थी। अंततः उन्हों ने भी एक
युवा ब्राह्मण तलाश लिया था जो दीन भी था और हीन भी लेकिन देह सुख और संतान सुख
देने में प्रवीण और निपुण। देखते-देखते छोटकी बबुआइन के भी तीन संतानें हो गईं। दो
बेटा, एक बेटी। उधर बड़की बबुआइन के भी एक
बेटी हो गई थी। इस तरह बाऊ साहब के जहां संतान नहीं होती थी और अब सात-सात संतानें
हो गई थी। खर्चे बढ़ गए थे। ज्यादातर खेत सीलिंग में फंस गए थे जो बचे थे खर्च
निपटाने के चक्कर में बिकने लग गए थे। सब से ज्यादा खर्च बाऊ साहब का घोड़ों पर था
और बच्चों पर। आठ घोड़ों में से अब तीन घोड़े ही उन के पास रह गए थे। इन में भी दो
बूढ़े़। वह परेशान रहने लग गए थे। पट्टीदारों के घरों से हाथियां हट गई थीं, पर बाऊ साहब के घर से घोड़े नहीं। घोड़े और
घुड़सवारी जैसे उन की सांस थे। साल दर साल खेत बिकते जा रहे थे और खर्च बढ़ता जा
रहा था। तिस पर तीन घोड़े वह नए ख़रीद कर लाए थे।
‘लेकिन
सिर्फ घोड़े भर ख़रीद लेने से तो काम चलता नहीं, घोड़ों को चना भी चाहिए होता है।’ छोटकी बबुआइन एक दिन भुनभुनाईं।
सुनते ही बाऊ साहब गुस्से से लाल-पीले हो गए। और एक झन्नाटेदार थप्पड़ लगा दिया।
यह पहली बार था जब बाऊ साहब ने किसी औरत पर हाथ उठाया था। हाथ उठा कर वह भी पछताए।
लेकिन वह करते भी तो क्या करते ? पहली
बार ही किसी ने उन से उन के घोड़ों के बाबत सवाल उठाया था। वह एक बार मौत मंजूर कर
सकते थे पर उन के घोड़ों की शान में कोई बट्टा लगा दे यह उन्हें मंजूर नहीं था। वह
चाहे कोई भी हो।
पर खर्चे कैसे रोकें ?
आख़िर एक दिन उन्हों ने बड़की-छोटकी दोनों बबुआइनों को बुला कर एक
साथ बैठाया। खर्चे काबू करने पर राय मशविरा किया और उठने से पहले फरमान जारी कर
दिया। दोनों बबुआइनों से साफ-साफ कह दिया बाऊ साहब ने कि अब उन्हें और बच्चे नहीं
चाहिए। उन्हों ने अंगरेजी शब्द ‘बर्थ कंट्रोल’ का भी इस्तेमाल किया। उन को लगा कि
बबुआइनें जाने मानें या न मानें सो ‘गवर्मेंट’ का डर भी दिखाया और बताया कि, ‘यह सिर्फ हम ही नहीं गवर्मेंट भी कहती है कि
बर्थ कंट्रोल करो।’ उन्हों ने जोड़ा ‘नहीं जेल भेज देगी।’
दोनों बबुआइनों ने आंखों-आंखों में एक-दूसरे को देखा और सचमुच डर
गईं।
सवाल था कि वह दोनों बबुआइनें तो परहेज कर जाएं। लेकिन उन युवा
ब्राह्मणों का वह क्या करें ?
बड़की बबुआइन ने तो अपने को कंट्रोल कर लिया और ब्राह्मण को भी समझा
कर बर्थ कंट्रोल कर लिया। लेकिन छोटकी ?
वह अपने आप को ही कंट्रोल नहीं कर पाईं। देह सुख के फेर में पड़ कर
फिर से गर्भवती हो गईं। अब वह क्या करें ? दिक्कत
यह भी थी कि इन दिनों बाऊ साहब भी बर्थ कंट्रोल के फेर में छोटकी के पास नहीं जाते
थे और छोटकी बबुआइन गर्भवती हो गई थीं। अब वह कहां मुंह दिखाएं। बाऊ साहब को क्या
जवाब दें ?
अंततः वह एक चमाइन से पेट मलवाने लगीं कि बच्चा गिर जाए। पर कुछ नहीं
हुआ। उन्हों ने बहुत दिनों बाद चुड़इल धरने का भी टोटका किया कि सोखा-ओझा की मार
पीट से बच्चा गिर जाए। बच्चा तब भी नहीं गिरा। फिर वह चुपके-चुपके एक झोला छाप
डॉक्टर के इलाज में पड़ गईं। बच्चा तो पूरा नहीं गिरा, वह जरूर मर गईं।
बाऊ साहब बहुत दुखी हुए और नाराज भी। उस झोला छाप डॉक्टर को
जूतों-लातों से ख़ूब मारा। और पुलिस के हवाले कर दिया। उसे जेल जाना पड़ा। पर जेल
जाते-जाते उस ने सच भाख दिया। वह भी सार्वजनिक। बाऊ साहब जैसे आसमान से गिरे। गिरे
तो महीनों बिस्तर से उठे नहीं। वह तो बड़की बबुआइन की सेवा और तपस्या ने उन्हें
जिला दिया नहीं, डॉक्टर तो जवाब ही दे चुके थे।
बाऊ साहब के इलाज में खर्चा बहुत हो गया था। इतना कि बड़की बबुआइन को
उन के घोड़े तक बेचने पड़ गए। पर जब बाऊ साहब ठीक हो कर खड़े हुए बड़की बबुआइन ने
खुद कर्जा कुर्जी जुगाड़ कर बाऊ साहब के लिए सफेद घोड़ा ख़रीद दिया था क्यों कि वह
जानती थीं कि बिना घोड़े के बाऊ साहब जी नहीं सकते थे। और सचमुच बाऊ साहब घोड़ा
देखते ही जीन कस कर उस पर सवार हो उसे सरपट दौड़ाने लगे। उन के पहले जैसे दिन फिर
वापस आ गए। वह फिर से शादी की द्वारपूजा की अगुवानी करने लगे उसी आन, उसी बान और उसी शान से।
पर यह कितने दिन चल सकता था? सात-सात
बच्चों का खर्च, बेटियों की शादी की चिंता तिस पर घोड़े
का शौक। बाऊ साहब के लिए अब यह सब कुछ भारी पड़ता जा रहा था। आख़िर कब तक खेत
बेंच-बेंच कर वह घोड़ा ख़रीदें और उसे खिलाएं ? वह
सोचते और सो जाते।
अब होने यह लगा था कि जैसे पहले बाऊ साहब अगुवानी करते थे तो साथ में
लड़की के पिता को न्यौता के नाम पर कुछ मदद भी जरूर करते थे। लेकिन अब जब वह
अगुवानी करते थे तो घोड़े की ख़ुराक के नाम पर कुछ मदद ले लेते थे।
विवशता थी उन की यह लोग भी समझते थे। लेकिन इस सब के बावजूद उन की
अगुवानी देखने वाले दर्शकों का तांता नहीं टूटा था। दर्शकों का ग्राफ उल्टे बढ़ा
ही था। एक तरह से मान लिया गया था कि जिस द्वारपूजा की अगुवानी बाऊ साहब न करें, वह शादी, शादी
नहीं।
पर जल्दी ही भ्रम टूटा। लोगों का भी और बाऊ साहब का भी।
बाऊ साहब के लिए वैसे भी अगुवानी तो मात्र बहाना थी, उन का मकसद तो पहले ही से उन के मन में साफ था
कि उन की घुड़सवारी लोग देखें। बस ! घुड़सवारी में उन के प्राण बसते थे। पर यह शौक
अब उन के लिए दिन-ब-दिन शाही शौक बनता जा रहा था। खेत बिकते जा रहे थे। फिर कुछ
लोगों ने बाऊ साहब को समझाया कि अब आज का घोड़ा तो मोटर साइकिल है। एक बार ख़रीद
लीजिए और जब चलाइए तभी पेट्रोल भरवाइए। घोड़े की तरह नहीं कि बैठा कर भी चना
खिलाइए।
बात बाऊ साहब की समझ में आ गई थी। उन्हों ने फिर खेत बेंचा और एक
राजदूत मोटर साइकिल ख़रीदी।
पर अब यह राजदूत मोटर साइकिल चलाए कौन ? बाऊ साहब ने इस राजदूत मोटर साइकिल को चलाने के
लिए बाकायदा वेतन दे कर एक ड्राइवर रखा। दो बरस में उन्हों ने तीन मोटर साइकिल
ख़रीदी और चार ड्राइवर बदले। पर जो बात घुड़सवारी में थी वह इस मोटर साइकिल में
नहीं बनी। एक तो उन्हें सिकुड़ कर पीछे बैठना पड़ता था और उन्हीं की तनख़्वाह पाने
वाला सीना तान कर आगे बैठता था। फिर भी वह मूंछें ऐंठ कर गर्दन आगे निकाल कर
बैठते। लोग कहते भी थे कि,
‘वो देखो घोड़े
वाले बाऊ साहब जा रहे हैं।’ तो उन्हें बुरा लगता। बहुत बुरा। दूसरे उन्हें जितने भी
ड्राइवर मिले सब बेइमान मिले।
हरदम मोटर साइकिल बिगाड़ देते और बनवाने के नाम पर मैकेनिक से मिल कर
मोटर साइकिल के पार्ट बदलवा देते। कुछ दिन में फिर मोटर साइकिल कबाड़ा हो जाती।
औने-पौने दामों में बेचना पड़ता। वह परेशान हो गए। मोटर साइकिल
बेचते-ख़रीदते। दूसरे घुड़सवारी जैसा चैन भी उन्हें इस सवारी में नहीं मिलता था।
हार मार कर उन्हों ने मोटर साइकिल बेंच दी और फिर नहीं ख़रीदी।
पर बिना सवारी किए वह जीते तो कैसे भला ? उन की सांस फूलने लगी। तो क्या वह फिर से घोड़ा
ख़रीदें ?
पर वह घोड़े के खर्चे से डर गए। फिर उन्हों ने बहुत सोच समझ कर एक बैलगाड़ी
बनवाई। एक जोड़ी बढ़िया बैल ख़रीदे। ख़ास इस बैलगाड़ी के लिए। इन बैलों को वह हल
में नहीं जुतने देते थे शुरू में। फिर बाद में वह हल में भी जुतने लगे। पर इन
बैलों का फिर भी ख़ास ख़याल रखते थे बाऊ साहब। फिर जब बैलगाड़ी में इन बैलों को
बांध कर बाऊ साहब चलते, इन बैलों के गले में बंधी घंटियां जब
खन-खन बजतीं तो बाऊ साहब का रोयां-रोयां पुलकित हो जाता। लोग कहते भी कि, ‘वो देखो घोड़े वाले बाऊ साहब जा रहे हैं।’ यह
सुन कर उन्हें जरा धक्का सा लगता पर दूसरे ही क्षण वह फिर से मूंछें ऐंठ कर बैलों
की लगाम ढीली कर उन की पूंछें ऐंठने लगते तो यह बैल भी घोड़े की तरह तो नहीं लेकिन
दौड़ने जरूर लगते थे। बैलों का यह दौड़ाना भी बाऊ साहब को अच्छा लगता।
वह लोगों से कहते भी कि, ‘उस
निगोड़ी मोटर साइकिल से तो ठीक ही है यह बैलगाड़ी। सिकुड़ कर पीछे तो नहीं बैठना
पड़ता। और उस से भी बड़ी बात कि लगाम अपने हाथ में है। न सही घोड़े की, बैलों की ही लगाम। लगाम तो है अपने हाथ।’ बाऊ
साहब यह कह कर ठसक से भर जाते और मूंछें ऐंठने लग जाते।
और द्वारपूजा की अगुवानी ?
अगुवानी अब वह भूल गए थे। गांव में भी किसी लड़की की शादी पड़ती तो
वह कोशिश कर के गांव से बाहर चले जाते कि जब घोड़ा ही नहीं तो कैसी द्वारपूजा, कैसी अगुवानी ?
पर बैलगाड़ी ?
बैलगाड़ी तो वह दौड़ाते। कुछ लोग कहते भी कि, ‘क्या हो गया है बाऊ साहब को? दुनिया बैलगाड़ी से तरक्की कर जेट, कंप्यूटर और ऐटम युग में जा रही है और बाऊ साहब
बैलगाड़ी और बैलों की लगाम में ही लगे बैठे हैं?’ बाऊ साहब ऐसा कहने वालों से कोई तर्क नहीं करते। कहते, ‘यह तो अपने मन और चैन की बात है।’
पर एक बार जब उन का बेटा एक बोरा गेहूं बेंच कर सिर्फ एक जूता ख़रीद
कर लाया,एक्शन जूता। तब उन्हों ने जब उसे टोका
तो वह भी कहने लगा ‘बाबू का चाहते हैं कि हमहूं आप की तरह बैलगाड़ी युग में जिएं ?’ सुन कर बाऊ साहब सकते में आ गए।
इसी बीच एक घटना और घटी। उन के दूसरे बेटे का गांव के एक पट्टीदार के
लड़के से झगड़ा हुआ। तो बाऊ साहब उस पर नाराज हो गए। पंचायत बैठी तो बाऊ साहब
जानते थे कि पट्टीदार का लड़का मैरवां बाबा के थान की ‘कृपा’ से पैदा हुआ था। बात
ही बात में वह उसे दोगला कह बैठे। बोले, ‘जानता
हूं मैरवां के दोगली संतान !’ फिर क्या ? पट्टीदार
भी अपनी पर आ गया। बोला,
‘तो बाऊ साहब आप
के यहां ही कौन सब कुछ ठीक ठाक है ? आप
के भी सभी पुत्र ऋषि पुत्र ही हैं।’ वह बोला, ‘आप
आंख मूंदें तो मूंदें समूचा गांव थोड़े ही आंख मूंदेगा।’
सुन कर बाऊ साहब मरने मारने पर आमादा हो गए।
घर आ कर बड़की बबुआइन से जिरह करने लगे। बड़की बबुआइन बोलीं, ‘लोगों का क्या है जो चाहे कह दें। पर आप कैसे
मान गए इस बात को ? आप तो जानते हैं सब भगवान के आशीर्वाद
से है।’ बड़की बबुआइन बोलीं, ‘फिर
आप काहे इन नीचों के मुंह लगते हैं ?’
पर बड़की बबुआइन उस रोज बाऊ साहब से हरदम की तरह आंख मिला कर ई सब
नहीं बोलीं। बाऊ साहब उदास हो गए और बिना खाना खाए ही रात सो गए।
पर नींद थी कहां ?
बाऊ साहब के पास घोड़ा नहीं था, यह
वह मन मार कर बर्दाश्त कर गए थे पर अब आन भी न रहे यह उन्हें बर्दाश्त नहीं था।
करवट बदल-बदल कर वह सोचते रहे। वह अपने आप ही से बुदबुदाए भी कि, ‘अगर यह सब साले ऋषि पुत्र हैं तो अच्छा था कि
वह निःसंतान ही रहते। निरवंश ही रहते। आख़िर क्या जरूरत थी उधार के अंश से वंश
चलाने की ? कौन राजपाट था जो राजगद्दी ख़ाली रह
जाती? रही बात खेती-बारी की तो वह भी तो अब
बिकती ही जा रही है।’ वह बुदबुदाते रहे और अकुलाते रहे। अफनाते रहे और बार-बार, फिर-फिर यही सोचते रहे कि यह सब क्या सचमुच ऋषि
पुत्र हैं ? मतलब दोगले हैं ? उन के अपने अंश नहीं हैं? उन के अपने खून नहीं हैं ? तो कौन हैं ये सब ? आख़िर किस ऋषि की संतानें हैं ये सब ? कहीं पूजा-पाठ करने वाले उन ब्राह्मणों की तो
नहीं ? उन की शकलों से बच्चों की शकल की मिलान
भी वह ख़यालों ही ख़यालों में करने लगे।
उलटी-सीधी और तमाम बातें सोचते-सोचते सुबह हो गई थी पर बाऊ साहब की
आंखों में नींद नहीं समाई।
नींद आंखों में कैसे समाती भला ? वह
तो बेकल थे।
इस विकलता का कोई जवाब भी उन्हें ढूंढ़े नहीं मिलता था। छोटकी बबुआइन
तो पाप की गठरी बन कर मर चुकी थीं, बड़की
बबुआइन सब कुछ भगवान पर छोड़ देतीं। उन ब्राह्मणों से पूछने की हिम्मत नहीं होती
थी बाऊ साहब की। कहीं श्राप दे दें सब तो ? और
फिर इस सवाल को सार्वजनिक रूप से कुरेदने में अपनी ही बेइज्जती थी। सो वह इस सवाल
को मन ही मन कुरेदते रहते और बैलगाड़ी हांकते रहते।
अब फर्क उन के बैलगाड़ी हांकने में भी आ गया था। पहले जैसे वह शौकिया
घोड़े दौड़ा कर अगुवानी करते थे पर बाद के दिनों में घोड़े की ख़ुराक के नाम पर
कुछ पैसे ले लेते थे, ठीक वैसे ही वह अब बैलगाड़ी भी शौकिया
हांकना भूल गए थे। गांवों में लोगों के पास अब सामान ढोने के लिए ट्रैक्टर-ट्राली
भी था। डनलफ भी। और बाहर सड़कों पर ट्रक। फिर भी बैलगाड़ी की जरूरत अभी भी
थी। सो बाऊ साहब की बैलगाड़ी भी अब लदनी
करने लगी थी। बाऊ साहब के साग-सब्जी का खर्च निकल जाता था। कोई टोकता भी कि, ‘का बाऊ साहब ?’ तो वह छूटते ही बोलते, ‘कोई
आन की गाड़ी तो हांक नहीं रहा। फिर अपनी ही बैलगाड़ी हांक रहा हूं। कुछ लाद लिया
तो का हुआ ?’ वह जैसे जोड़ते, ‘एक पंथ दो काज। खर्च का खर्च निकलता है और अपनी
ड्राइवरी भी जिंदा रहती है।’ वह हंसते हुए गला खंखार कर सफाई पर उतर आते, ‘अरे, पहले
घोड़ा ड्राइव करता था, फिर मोटर साइकिल ड्राइव करवाया। पर
ड्राइव करवाना हम को रास नहीं आया तो अब बैलगाड़ी ड्राइव कर रहा हूं।’
वह कहते, ‘क्या करें मशीनी चीज हम ड्राइव नहीं कर
सकते मोटर साइकिल, जीप, मोटर क्या चीज है? एरोप्लेन
ड्राइव करते।’ वह ठसक से भर कर बोलते, ‘घोड़े
की भी लगाम हमारे हाथ में रहती थी, अब
बैलगाड़ी की लगाम अपने हाथ है।’ कह कर ठठ्ठा लगाते कहते, ‘बैलगाड़ी हो, घोड़ा हो, बीवी हो या कुछ और सही, लगाम अपने हाथ में होनी चाहिए। तभी ड्राइव करने
का मजा है।’ कह कर वह मूंछें ऐंठते और बैलों को ललकार कर अपनी बैलगाड़ी ‘ड्राइव’
कर देते।
उन के इस ‘ड्राइव’ में उन की सारी चिंताएं डूब जातीं !
-25-
बड़की दी का यक्ष प्रश्न
बस अभी हिचकोले ही खा रही थी कि अन्नू ने मुझे अपनी सीट पर बुलाया।
मैं अभी अपनी सीट से उठी ही थी कि बस एक स्पीड ब्रेकर पर भड़भड़ कर गुजरने लगी।
मैं गिरते-गिरते बची। अन्नू की सीट पर जा कर बैठी तो वह बोला, ‘हियरिंग एड लगा लीजिए।’ मैं ने उसे बताया कि, ‘लगा रखा है।’ तो वह बोला, ‘बड़की बुआ से मिलेंगी?’ इस बीच बस किसी ट्रक को ओवरटेक करने लगी।
ओवरटेक और तेज हार्न के बीच अन्नू की आवाज गुम सी गई। उस ने बात फिर दुहराई, ‘बड़की बुआ से मिलेंगी?’ उस ने अपना मुंह मेरे कान के पास ला कर और जोर
से कहा, ‘उन का कस्बा बस आने ही वाला है।’
मैं ने सहमति में सिर हिला दिया।
बड़की दी हम दस भाई बहनों में दूसरे नंबर पर थी और सात बहनों में सब
से बड़ी। भाई बहनों में मैं सब से छोटी थी। मैं अब कोई पचास की थी और बड़की दी कोई
‘पचहत्तर’ की। घर में वह बड़की थी और मैं छोटकी। इस तरह हमारे उस के बीच उम्र का
कोई पचीस बरस का फासला था। पर विडंबना यह थी कि मेरे पैदा होने के पहले ही बड़की
दी विधवा भी हो चुकी थी। बाल विवाह का अभिशाप वह भुगत रही थी। उस का दांपत्य जीवन
बमुश्किल दो ढाई बरस का ही था। पेट में पलता एक जीव छोड़ कर जीजा जी हैजे की भेंट
चढ़ गए। बड़की की जिंदगी उजड़ गई थी। वह तब सोलह सतरह की ही थी। उस के एक बेटी
हुई। वह बेटी ही उस की जिंदगी का आसरा बन गई।
बड़की दी के साथ भगवान ने भले अन्याय किया था पर मायका और ससुराल
दोनों ही उसे भला मिला था। उस को एक पति की कमी छोड़ किसी और बात की कमी नहीं होने
दी। जवानी आने के पहले ही उस के बाल कट गए। साथ ही विधवा जीवन की तमाम शर्तें उस
ने ख़ुशी ख़ुशी ओढ़ लीं। घर से बाहर वह निकली तभी जब अधेड़ हो गई। उस के बाल पकने
लगे और देह पर झुर्रियों ने दस्तक दे दी। सालों साल तक लोगों ने उस की आवाज तो दूर
उस के पैरों की आवाज भी नहीं सुनी थी। पर अब जब बड़की दी घर से बाहर निकली तो एक
दूसरी ही बड़की दी थी। उस की आवाज कर्कश हो चली थी और पैरों में जैसे तूफान समा
गया था। माना गया कि यह उस के विधवा जीवन के फ्रस्ट्रेशन का नतीजा है। एक बार
बड़के भइया से गांव के किसी ने शिकायत की कि, ‘तुम्हारी
बहन बहुत टेढ़ा बोलती है।’ तो बड़के भइया ने पलट कर उसे जवाब दिया था, ‘बोलती टेढ़ा जरूर है। पर हमारी मूंछ तो टेढ़ी
नहीं करती।’
और सच जवानी आने के पहले ही विधवा हो जाने वाली बड़की दी के बारे में
किसी ने न खुसफुस की, न खुसफुस सुनी, न बड़की दी की नजरों में कोई चढ़ा, न किसी की नजर उस पर पड़ी। पर जिंदगी के
पचहत्तर बरस बेदाग रहने वाली बड़की दी की जिंदगी पर अब एक दाग लग गया था। लोगों की
उंगलियां उस पर अनायास ही उठ गई थीं। मायके और ससुराल दोनों ही से उस का रिश्ता
जैसे ख़त्म सा हो गया था। छोटके भइया कहते, ‘हमारे
लिए तो बड़की दी मर गई।’
यह वही छोटके भइया थे जो अभी हाल तक यह कहते नहीं अघाते थे कि बड़की
दी ने हमारी तीन पीढ़ी को अपनी गोद में खिलाया है। हम भी इस की गोद में खेले, हमारा बेटा भी खेला, और अब हमारा पोता भी खेल रहा है।’ जवाब में
बड़की दी हुमक कर कहती, ‘और का !’ कह कर वह बालकनी में छोटके
भइया के पोते को तेल मालिश करने लगती। फिर जैसे ख़ुद से ही कहती, ‘अब ई हमारे मान का नहीं। बहुत उछलता है। और
हमारे पास अब शक्ति नहीं रही। बुढ़ा गई हूं।’ कहते हुए छोटके भइया के पोते को गोद
से उछालती और उस से तुतला कर पूछती, ‘है
न बुढ़ऊ !’ फिर जैसे जोड़ती, ‘न
तोहरे दांत, न हमरे दांत। कहो बुढ़ऊ !’ कहते कहते
वह बच्चे के हाथ-पैर दबा-दबा कंधे तक ले जा, ले
जा साइ-सुई खिलाती और वह खिलखिला कर हंसने लगता। छोटके भइया के पोते यानी अन्नू के
बेटे से बड़की दी को जाने क्यों बहुत लगाव था। अन्नू को भी वह बहुत मानती थी।
अन्नू बचपन में बड़की दी से बहुत डरता था। उस की कर्कश आवाज और झन्नाटेदार थप्पड़
अच्छे अच्छों को डराता था। अन्नू तब टीन एजर था। गांव में किसी की बारात विदा हो
रही थी। दुल्हा जा रहा था। अन्नू तमाम लड़कों के साथ टेंपो पर लटका आ रहा था। दूर
से ही उस ने बड़की दी को देख लिया। फिर क्या था मारे डर के वह चलते टेंपो से उतर
पड़ा। जान तो बच गई पर सिर बुरी तरह फूट गया था। वह घटना सोच कर अन्नू आज भी सिहर
उठता है। अन्नू बड़की दी से डरता बहुत था, पर
उन्हें मान भी बहुत देता था। जाने क्या था कि बचपन से ही अन्नू जब कभी और कहीं भी
बीमार पड़ता, बड़की दी कहीं भी होती आ धमकती। और
अन्नू की सेवा टहल में लग जाती। कम से कम तीन बार वह अन्नू को मौत के मुंह से खींच
कर लाई थी। बड़की दी डॉक्टर तो क्या पढ़ी लिखी भी नहीं थी। पर किस बीमारी में क्या
खिलाना चाहिए, कैसे रहना चाहिए, क्या देना चाहिए आदि-आदि उसे सब मालूम था। और
अन्नू ही क्यों कोई भी बीमार पड़े तो बड़की दी प्राण प्रण से सेवा टहल में लग
जाती। वह न तो बीमार से परहेज करती, न
बीमारी से घृणा। वह जैसे सब कुछ आत्मसात कर लेती। और भूत की तरह बीमारी के पीछे
पड़ जाती, उसे भगा कर ही दम लेती।
बड़की दी जहां भी रहती चाहे मायका हो या ससुराल, पूरे दबदबे से रहती। मजाल क्या था कि बड़की दी
की बात कोई काट दे। उस के आगे क्या छोटे, क्या
बड़े सभी दुबके रहते। वह डट कर घर के सारे काम करती। हाड़ तोड़ मेहनत। कोई मना भी
करता तो कहती, ‘काम न करूं, तो बीमार पड़ जाऊं।’ सो लोग बड़की दी का सहारा
ढूंढते। ससुराल और मायका दोनों ही जगह उसे रखने की होड़ मची रहती। पर कहां रहना है, यह बड़की दी ख़ुद तय करती। और जहां ज्यादा
जरूरत समझती, वहीं रहती। पर सब का सहारा बनने वाली
बड़की दी उम्र के इस चौथेपन में ख़ुद सहारा ढूंढने लग गई। उम्र जैसे-जैसे ढलती जा
रही थी, वैसे-वैसे अवसाद और निराशा में घिरती
बड़की दी आशा की एक किरण ढूंढते-ढ़ूंढते छटपटाने लगती। फफक-फफक कर रोने लगती।
रोते-रोते कहती, ‘अभी तो जांगर है। करती हूं, खाती हूं। पर जब जांगर जवाब दे जाएगा, तब मुझे कौन पूछेगा?’ हर किसी से बड़की दी का यही एक सवाल होता, ‘तब हमें कौन पूछेगा ?’ हमारे जैसे लोग उसे दिलासा देते, ‘सब पूछेंगे।’ और अन्नू उन्हें चुप कराते हुए
कहता, ‘मैं पूछूंगा। जब तक मैं जिंदा हूं, बड़की बुआ आप को मैं देखूंगा। मैं आप की सेवा
टहल करूंगा।’ छोटके भइया,
भाभी भी बड़की दी से यही बात कहते। उस
की ससुराल में उस के देवर भी उसे दिलासा देते। पर बड़की दी को किसी की भी बात पर
विश्वास नहीं होता। वह फफक-फफक कर रोती और पूछती, ‘जब हम अचलस्त हो जाएंगे तो हमें कौन पूछेगा?’ बड़की दी रोती जाती और पूछती, ‘हमें कौन देखेगा।’ वह आधी रात में अचानक उठती
और रोने लगती। और पूछने पर यही यक्ष प्रश्न फिर दुहरा देती।
और फिर वह मन ही मन अपनी बेटी की याद करती। अपने यक्ष प्रश्न का जवाब
बड़की दी जैसे अपनी बेटी में ही ढूंढती। उस की बेटी जो अब नाती पोतों वाली हो गई
थी। पर बड़की दी के लिए जैसे वह अभी भी दूध पीती बच्ची थी। वह अपनी बेटी को हमेशा
असुरक्षा में घिरी पाती। और अपना सब कुछ उस पर न्यौछावर करती रहती। रुपया-पैसा, कपड़ा-लत्ता, जेवर-जायदाद जो भी उस के पास होता, वह चट बेटी को पठा देती। और बेटी भी उसे जैसे कामधेनु की तरह दुहती
रहती। और यह बात लगभग हम सब लोग जानते थे कि बड़की दी के प्राण उस की बेटी में ही
बसते हैं। पर पता नहीं क्यों हम सब लोग यह नहीं जान पाए कि बड़की दी अपने यक्ष
प्रश्न, ‘तब हमें कौन पूछेगा?’ का जवाब भी अपनी बेटी में ही ढूंढती है। ढूंढती
है, और पूछती है। तो शायद इस लिए भी कि इस
पुरुष प्रधान समाज में हम कभी यह नहीं सोच या मान पाते कि मां बेटी के घर भी जा कर
रह सकती है। ख़ास कर उस समाज में जहां मां-बाप बेटी के घर का पानी भी नहीं पीते
हों।
ख़ैर, बड़की दी शुरू से ही एक-एक कर अपने
सारे जेवर, चांदी के रुपए और तमाम धरोहरें बेटी को
थमाती गई। और दामाद उसे शराब और जुए में उड़ाता गया। धीरे-धीरे उधर दामाद की लत
बढ़ती गई और इधर बेटी की मांग। पर बड़की दी ने कभी भी उफ नहीं की। बड़े जतन से
जोड़े गए एक-एक पैसे वह बेटी को देती गई। बेटी ने कभी यह नहीं सोचा कि लाचार मां
को भी कभी इन पैसों की जरूरत पड़ सकती है। वह तो आती या पति को भेजती अपनी
परेशानियों का चिट्ठा ले कर। और बड़की दी इधर-उधर से पैसे जोड़ कर पठा देती। पर
बात जब ज्यादा बढ़ गई तो बड़की दी धीरे-धीरे हाथ बटोरने लगी। उस ने दो एक बार
दामाद पर लगाम लगाने की भी कोशिश की। शराब और जुए के लिए टोका-टाकी की। तो उस ने
जा कर बड़की दी की बेटी की पिटाई की। और कहा कि आइंदा अपनी मां को टोका टोकी के
लिए मना कर दो नहीं तो फांसी लगा कर मर जाऊंगा। बेटी ने मां को टोका टोकी के लिए
मना कर दिया। और बड़की दी मान भी गई।
यह तब के दिनों की बात है जब बड़की दी का दबदबा था और उस के पास कोई
यक्ष प्रश्न भी नहीं था। लेकिन धीरे-धीरे बड़की दी का जोड़ा बटोरा धन, जेवर सब चुक गया और दामाद बेटी की आमद भी कम से
कमतर हो गई। पर कहा न कि बेटी में बड़की दी के प्राण बसते थे। वह कहीं शादी ब्याह
में नेग के साड़ी, कपड़े, पैसे पाती, चट-पट बेटी को पठा देती। बिन यह सोचे
कि इस की उसे भी जरूरत है। पहले तो बड़की दी की बेटी दामाद की उस के ससुराल और
मायके दोनों ही जगह ख़ूब आवभगत होती। कुछ समय तक तो यह सोच कर कि बेटी दामाद हैं।
और बाद के दिनों में बड़की दी से डर कर कि कहीं उस के दिल को ठेस न पहुंचे। पर
दामाद की ऐय्याशी जब ज्यादा बढ़ गई, उस
की नजर घर की बेटियों, औरतों पर भी फिरने लगी तो उस का
आना-जाना तो कोई फिर भी नहीं रोक पाया पर आवभगत में वह ‘भाव’ ख़त्म हो गया।
धीरे-धीरे दामाद ने आना बंद कर दिया। वैसे भी बड़की दी के पास उसे देने के लिए कुछ
बाकी नहीं रह गया था। बड़की दी ने उसे पैसे देना बंद किया तो उस का जुआ शराब भी कम
हो गया। बड़की दी भी अब अधेड़ से बूढ़ी हो चली थी। उस की देह पर अब झुर्रियों ने
घर बना लिया था और जबान पर वह यक्ष प्रश्न, ‘तब
हमें कौन देखेगा ?’ बस सा गया था।
और संयोग ही था कि बड़की दी का यक्ष प्रश्न जल्दी ही कसौटी पर कस
गया। वह तब ससुराल में ही थी। रात में अचानक उस का पेट फूल गया। अब तब हो गई। और
खुद बड़की दी को भी लगा कि अब वह नहीं बचेगी। लेकिन वह बच गई। बड़की दी के यक्ष
प्रश्न का जवाब भी आ गया था। मायका, ससुराल
सब उस के साथ था। उस के देवर ने इलाज का खर्चा उठाया। पैसा कम पड़ा तो सूद पर ले
आया। आख़िर आपरेशन हुआ था।
छोटके भइया भी पूरी तैयारी से थे। पर बड़की दी के देवर ने कहा कि, ‘यह हमारा धर्म है, हमें शर्मिंदा मत करिए। हम भी भौजी की गोद में
खेले हैं,’ इस बीमारी में बड़की दी के बेटी दामाद
भी आए थे। पर इस मौत के क्षण में भी उन्हें बड़की दी की तिजोरी ही नजर आती रही। उन
का सारा जोर बड़की दी को उस शहर के नर्सिंग होम से निकाल कर अपने कस्बे में ले
जाने पर रहा। दामाद बड़की दी के देवर को लगातार डांटता ही रहा, ‘आप लोग यहां इन्हें मार डालेंगे। हम को ले जाने
दीजिए।’ बेटी भी इसी बात पर अड़ी रही। दरअसल बेटी दामाद को लगता था कि बड़की दी अब
बचेगी नहीं। सो उन्हें अपने अख़्तियार में ले कर उन के हिस्से की खेती बारी भी
लिखवा लें। सो उन की नजर बड़की दी के इलाज पर नहीं, उन की जायदाद पर थी। बड़की दी शायद होश में होती तो चली भी जाती। पर
वह तो बेहोश थी। और उस का देवर दामाद की मंशा जानता था, सो छोटका भइया को सामने खड़ा कर दिया। और बड़की
दी को नर्सिंग होम से नहीं जाने दिया।
आपरेशन के बाद बड़की दी बच जरूर गई थी, पर अब सचमुच उस की देह जवाब दे गई थी। आंखों की रोशनी मद्धिम पड़ गई
थी। देह से फूर्ति बिसर गई थी। उस की सारी सक्रियता ख़त्म हो गई थी। वह चार छः कदम
चलती और जमीन जरा भी ऊंची-नीची पड़ती तो गिर पड़ती।
बड़की दी का यक्ष प्रश्न अब कहीं ज्यादा सघनता के साथ उस के सामने
उपस्थित था, उस की पनीली आंखों से छलछलाता हुआ।
वादे के मुताबिक अन्नू उसे अपने साथ ले गया। पर बड़की दी का शहर में
मन नहीं रमा। वह कहती, ‘यहां तो कोई बतियाने के लिए भी नहीं
मिलता।’ वह बरस भर में ही गांव वापस आ गई। फिर गई, फिर वापस आई। इसी तरह वह आती जाती रही। फिर अन्नू ने उस की आंखों की
मोतियाबिंद का आपरेशन करवाया। इस बहाने उस की बेटी का बेटा, बेटी और पतोहू भी बड़की दी से आ कर मिलने लग
गए। गुपचुप-गुपचुप तय हो गया कि बड़की दी अब अपने हिस्से के सारे खेत और जायदाद
बेटी के नाम लिखेगी। एक बार अन्नू से भी बड़की दी ने इस बारे में पूछताछ की। अन्नू
ने बड़की दी को साफ बताया कि कानूनी रूप से तो यह ठीक है, लेकिन सामाजिक और पारिवारिक परंपरा के हिसाब से
यह ठीक नहीं है। अन्नू ने बड़की दी को फिर यह भी कहा कि जिस ससुराल में आप का इतना
मान है, उसे क्यों मिट्टी में मिलाना चाहती
हैं। और आगाह किया कि अपने जीते जी यह काम मत करिएगा। और फिर आप की बेटी चाहेगी तो
आप के मरने के बाद भी आप की जमीन-जायदाद कानूनन मिल जाएगी। और ज्यादा से ज्यादा आप
चाहिए तो गुपचुप एक वसीयतनामा लिख जाइए। बड़की दी ने अन्नू की बात मुझे भी बताई और
राय मांगी। मैं ने भी अन्नू की राय को ही ठीक बताया।
बड़की दी मान गई थी।
अन्नू के यहां से वापस जाने के बाद बीते दिनों बड़की दी ससुराल में
थी। उस से मिलने उस की बेटी का बेटा आया। वह आया तो बड़की दी ठीक-ठाक थी। लेकिन जब
जाने लगा तो वह ‘बीमार’ हो गई। बेटी के बेटे ने कहा, ‘चलो नानी डॉक्टर को दिखा दें।’ बड़की दी का देवर भी मान गया। बोला, ‘जाओ नाती नानी को दिखा लाओ।’ पर नाती बड़की दी
को जो डॉक्टर को दिखाने ले गया तो फिर पलट कर नहीं आया। बड़की दी भी नहीं आई। सुबह
से शाम हुई। बड़की दी नहीं आई तो देवर ने समझा कि शहर में रुक गई होंगी भौजी। पर
जब दो-चार दिन नहीं, हफ्ते दस दिन बीत गए तो देवर का माथा
ठनका। वह भाग कर छोटके भइया के पास गया। पर बड़की दी वहां थी कहां जो मिलती। बड़की
दी मिली तो अपनी बेटी के घर। और वापस आने को तैयार नहीं। वह देवर वापस आ गया। अब
दूसरा वाला देवर लेने गया तो दामाद खुल कर लड़ पड़ा। गुथ्थम गुथ्था हो गए दामाद
ससुर। पर बड़की दी नहीं आई। देवर ने बड़की दी से कहा भी कि, ‘बेटी का अन्न जल खा कर हमारे मुंह पर कालिख मत
लगवाओ भौजी। लौट चलो।’ पर बड़की दी नहीं मानी।
देवर लौट कर छोटके भइया के पास आया और सारा हाल बता कर कहा, ‘चलिए आप ही ले आइए। आख़िर समाज में हम कैसे
मुंह दिखाएं। अब तो लोग यही कहेंगे कि जब भौजी करने धरने लायक नहीं रहीं तो हम ने
घर से निकाल दिया। और फिर भगवान ने उन का पहले ही बिगाड़ा था, और अब वह बेटी का अन्न, जल ले कर अपना अगला जनम भी बिगाड़ रही हैं। इस
पाप के भागीदार हम लोग भी होंगे।’ पर छोटके भइया नहीं गए। बोले, ‘बड़की दी अब हमारे लिए मर गई।’
फिर कुछ दिनों बाद बड़की दी ने सारी जायदाद बेटी के नाम लिख दी। और
एक दिन उस की बेटी का बेटा छोटके भइया के पास पहुंचा और कहा कि, ‘नानी को बुलवा लीजिए। लेकिन उस को उस की ससुराल
मत भेजिएगा। वहां लोग उसे जहर दे कर मार डालेंगे।’ पर छोटके भइया का जवाब फिर वही
था, ‘बड़की दी हमारे लिए मर गई।’ और अब
उन्हीं छोटका भइया का बेटा अन्नू चलती बस में पूछ रहा था मुझ से कि, ‘बड़की बुआ से मिलेंगी ?’ मैं ने सहमति में सिर हिला दिया और पूछा कि, ‘पता मालूम है ?’
‘मालूम
तो नहीं हैं पर मालूम कर लेंगे। छोटा कस्बा है। कोई मुश्किल नहीं होगी।’ अन्नू
बोला।
‘हां, मिल एरिया है। मिल ही जाएगा।’ मैं ने कह दिया।
‘कहीं
पापा नाराज हुए तो ?’ अन्नू ने पूछा।
‘देखा
जाएगा। पर अभी तो बड़की दी से मिल लें।’ कह कर मैं भावुक हो गई।
ढूंढते-ढूंढते आख़िर मिल गया बड़की दी के दामाद का क्वार्टर। घर में
पहले अन्नू घुसा फिर मैं,
अन्नू की बीवी और अन्नू के छोटे भाई
मुन्नू और चुन्नू।
बड़की दी बिस्तर पर लेटी नीचे पैर लटकाए छत निहार रही थी। अन्नू ने
उस के पैर छुए तो एकाएक वह पहचान नहीं पाई। हड़बड़ा गई। पर मुन्नू ने जब पैर छुए
तो वह पहचान गई। उठ कर बैठ गई। मुझे देखते ही वह भावुक हो गई। बोली, ‘छोटकी तू !’ और मुझे भर अकवार भेंटने लगी।
अन्नू की बीवी ने बड़की दी के पैर छुए और अपने बेटे को बड़की दी की गोद में बिठा
दिया। बड़की दी, ‘बाबू हो, बाबू हो’ कह कर उसे जोर-जोर से गुहारने लगी। फिर उसे बुरी तरह चूमने
लगी और फफक कर रो पड़ी। पर अन्नू का बेटा बड़की दी की गोद में नहीं रुका और
रोते-रोते उतर गया। अन्नू के बेटे के गोद से उतरते ही बड़की दी का भावुक चेहरा
अचानक कठोर हो गया। अपने चेहरे पर जैसे वह लोहे का फाटक लगा बैठी। वह समझ गई थी कि
अब उस से अप्रिय सवालों की झड़ी लगाने वाली हूं मैं। पर उस की उम्मीद के विपरीत
मैं चुप रही।
बिलकुल चुप।
बड़की दी ने जैसे अचानक अपने चेहरे पर से लोहे का फाटक खोल दिया। सिर
का पल्लू ठीक करती हुई वह फिर से भावुक होने लगी। बोली, ‘अन्नू का तो नहीं जानती थी पर तुम्हारी बात
जानती थी। जानती थी कि छोटकी जरूर आएगी।’
‘पर
तुम यहां क्यों आई बड़की दी ?’ कहती
हुई मैं बिलख कर रो पड़ी।
‘अब
मुझ से और नहीं सहा जा रहा था।’ बड़की दी बोली, ‘अब
मेरी उमर सेवा टहल करने की नहीं रही। और मेरी सेवा टहल की किसी को कोई फिकर ही
नहीं थी। न नइहर में न ससुराल में।’ बोलते-बोलते वह रोने लगी। रोते-रोते कहने लगी, ‘अब मुझे सहारे की जरूरत थी। मैं चाहती थी कोई
मुझे पकड़ कर उठाए- बैठाए। मेरी सेवा करे। पर करना तो दूर कोई मुझे पूछता भी नहीं
था।’ बड़की दी आंचल से आंसू पोंछते हुए बोली, ‘चलते-चलते
गिर पड़ती तो कोई आ कर उठा देता। या खुद ही फिर से उठ जाती। पर कोई हरदम साथ-साथ
नहीं होता।’ वह बोली, ‘कोई मुंह बुलारो नहीं होता। नइहर हो या
ससुराल हर जगह लोग यही समझते रहे कि बड़की को तो बस खाना और कपड़ा चाहिए।’ वह
सिसकने लगी। बोली, ‘जवानी तो हमने खाना और कपड़े में काट
लिया, बुढ़ापा नहीं काट पाई। क्यों कि
बुढ़ापा सिर्फ खाना और कपड़े से नहीं कटता।’ बड़की दी बोलती ही जा रही थी, ‘मैं ऊब गई थी ऐसी जिंदगी से।’
‘तो
तुम छोटके भइया के पास आ गई होती।’
‘वह
आया भी कहां बुलाने ?’ वह बोली, ‘फिर जब से वह नौकरी से रिटायर हुआ है, खिझाने बहुत लगा है। घर भर को दुखी किए रहता है। मुझे भी जब-तब
खिझा-खिझा कर रुला देता। फिर एक बार बात ही बात में वह मुझ पर और पैसा कौड़ी खर्च
करने से मना करने लगा। कहने लगा मेरे खर्चे ही बहुत हैं। पेंशन में गुजारा नहीं चल
पाता।’
‘तो
तुम अन्नू के पास चली जाती।’ मैं ने कहा तो अन्नू भी कहने लगा, ‘हां, मैं
ने तो कभी आप की जिम्मेदारी से इंकार नहीं किया।’
‘हां, अन्नू ने इंकार नहीं किया।’ हामी भरती हुई
बड़की दी बोली, ‘पर अन्नू के यहां तो और मुश्किल थी। वह
और बहू दिन में दफ्तर चले जाते और बच्चे स्कूल। फिर बाबू रह जाता और मैं। मैं अपने
को संभालती कि बाबू को। फिर मैं यह भी नहीं समझ पाती कि अन्नू मेरी देखभाल के लिए
मुझे अपने पास ले गया है कि अपने बच्चे की देखभाल करने के लिए मुझे लाया है। और
मुझे हर बार यही लगता कि अन्नू बच्चे की देखभाल के लिए ही मुझे लाया है।’ बड़की दी
बोली, ‘ख़ैर, बाबू को देखने में कोई बुराई नहीं थी। पर मैं वहां अकेली पड़ जाती।
कोई बोलने बतियाने वाला नहीं होता वहां। एक बार फाटक बंद होता तो फिर शाम को ही
खुलता। फिर आते ही बच्चे,
बहू, अन्नू सभी टी॰वी॰ देखने लगते, खाना
खाते सो जाते। मेरे लिए जैसे किसी के पास समय ही नहीं होता।’ वह बोली, ‘तो मैं क्या करती अन्नू के यहां भी जा कर। जब
वहां भी मुझे कोई देखने वाला नहीं था। उठाने-बैठाने वाला नहीं था।’
‘यहां
कौन है उठाने-बैठाने वाला ?’
मैं बिफर कर बोल बैठी।
‘हैं
न !’ बड़की दी सहज होती हुई बोली, ‘चार-चार
जने हैं उठाने-बैठाने वाले। नाती, नतिनी, नतोहू सभी हमारी सेवा में लगे रहते हैं।
उठती-बैठती हूं तो हरदम पकड़े रहते हैं।’ कहते हुए जैसे उस के चेहरे पर एक दर्प सा
छा गया।
बड़की दी के चेहरे पर यह संतोष भरा दर्प देख कर मुझे कहीं खुशी भी
हुई। अभी हमारी बात चीत चल ही रही थी कि बड़की दी की बेटी की छोटी बेटी आ गई जिस
की उमर कोई सोलह-सत्रह बरस रही होगी। वह कहने लगी, ‘आइए, आप लोग बड़े वाले कमरे में बैठिए।’
‘नहीं
हम लोग यहीं ठीक हैं।’ अन्नू बोला, ‘फिर
अभी हम लोग चले जाएंगे।’
‘बिट्टी
कहां है ?’ मैं ने पूछा तो बड़की दी बोली, ‘बंबई गई है। उसे कैंसर हो गया है।’ उस ने जोड़ा, ‘पर घबराने की बात नहीं है। अभी शुरुआत है।
डॉक्टर ने कहा है ठीक हो जाएगी। बंबई में अभी उस की सिंकाई चल रही है।’
‘अच्छा
अपनी जमीन-जायदाद का क्या किया ?’ मैं
सीधे प्वाइंट पर आ गई और पूछ लिया, ‘किसी
को लिख दिया कि नहीं ?’
‘हां, लिख दिया।’ कहती हुई बड़की दी बिलकुल कठोर हो
गई। वह पूरी दृढ़ता से बोली, ‘बिट्टी
को लिख दिया।’
‘पर
तुम ने यह तो ठीक नहीं किया बड़की दी !’ मैं ने भी पूरी दृढ़ता और कठोरता के साथ
कहा, ‘जो देवर जिंदगी भर तुम्हारे लिए जी जान
से खड़े रहते रहे, उन के साथ यह ठीक नहीं किया।’ मैं
बोलती गई, ‘बिट्टी को जो जमीन-जायदाद लिख दी, तो लिख दी तुम्हें यहां रहने नहीं आना चाहिए था
बड़की दी।’
‘तो
मैं वहां क्या करती ? गिरते-पड़ते जान दे देती। बेवा तो थी
ही, बेसहारा मर जाती ?’ उस ने तल्ख़ी से पूछा।
‘नहीं।
जब बिट्टी और उस के बच्चे,
पतोहू तुम्हारी सेवा करने को तैयार थे
तो तुम इन्हें बारी-बारी अपने घर ही बुला कर कर रखती। यह वहीं तुम्हारी सेवा टहल
करते।’ मैं बोली, ‘पर कुछ भी कहो बड़की दी मैं तुम्हारी
सारी बातें मान सकती हूं। पर यह बात नहीं मानने वाली। तुम्हारी गोद में मैं भी
खेली हूं। तुम मुझ से बहुत बड़ी भी हो। पर बड़की दी, बेटी के घर आ कर यह तुम ने ठीक नहीं किया।’
‘क्यों
ठीक नहीं किया ?’ यह बात बड़की दी ने नहीं, बिट्टी की बेटी ने कहा जो अभी-अभी बड़े कमरे
में हम लोगों से चल कर बैठने के लिए कह रही थी। उस ने अपना सवाल फिर से उसी तल्ख़ी, तेजी और तुर्शी से दरवाजे के बीच खड़ी-खड़ी
दुहराया, ‘क्यों ठीक नहीं किया ?’
‘नहीं, जमीन-जायदाद लिखनी थी बिट्टी दीदी को तो लिख
देतीं बड़की बुआ पर यहां रहना नहीं चाहिए था।’ अन्नू बोला, ‘हमारे घर रह लेतीं। पापा के पास रह लेतीं।’
‘क्यों
रह लेतीं ?’ बिट्टी की बेटी दहाड़ती हुई बोली, ‘जब दिया यहां, तो वहां क्यों रहेंगी ?
‘छोटके
भइया कहते हैं कि हमारे मुंह पर कालिख पोत दिया।’ बोलते-बोलते मुझे रुलाई छूट गई।
बोली, ‘वह कहते हैं कि अब तो दुनिया यही कहेगी
कि जब तक काम करने लायक थी,
तब तक रखा। और जब बूढ़ी और लाचार हो गई, काम करने लायक नहीं रही तो घर से निकाल दिया।
तभी तो बड़की दी बेटी के घर रहने लगी !’
‘बेटी
के घर रहने लगी तो क्या पाप कर दिया ?’ बिट्टी
की बेटी फिर ललकार कर बोली,
‘मां-बाप बेटे के
साथ रह सकते हैं तो बेटी के साथ भी क्यों नहीं रह सकते हैं ?’
‘नहीं
रह सकते। हमारे यहां यह परंपरा नहीं है। दोष माना जाता है। माना जाता है कि नरक
मिलता है....।’
‘और
कीड़े पड़ते हैं।’ बात काटती हुई बिट्टी की बेटी जोर से बोली, ‘आप तो इन के देवरों वाली भाषा बोल रही हैं।
नानी के देवर भी कहते हैं कि कीड़ा पड़ेगा।’ वह गुर्राती हुई बोली, ‘पहले जब इन के देवर लोग यहां आते थे, दस-दस दिन रह कर खाते थे, जाते थे तो किराया भी ले जाते थे। तब उन को
कीड़ा नहीं पड़ता था। तो अब इन को कीड़ा क्यों पड़ेगा ? तब जब कि हमारा नहीं, अपना ही खा रही हैं। रही बात पानी की तो यह
हमारा क्वार्टर नहीं है, मिल का क्वार्टर है, कोई पुश्तैनी गांव नहीं।’ वह यहीं नहीं रुकी।
बोली, ‘आप लोग इन्हें बरगलाने आए हैं।’
‘देखिए
अब आप प्लीज चुप हो जाइए। अब और बदतमीजी मत करिए।’ अन्नू बोला, ‘जिन से आप लगातार बदतमीजी से पेश आ रही हैं वह
इन की सगी छोटी बहन हैं। सो यह भी आप की नानी हुईं। वह बोला, ‘और हम लोग इन को बरगलाने नहीं, इन से मिलने आए हैं। इन को देखने आए हैं। इन की
जमीन जायदाद से हम लोगों का कुछ लेना-देना नहीं है।’ बावजूद इस के वह फिर बोलने
लगी तो अन्नू ने उसे अब की जरा कड़ाई से डांटा, ‘प्लीज
चुप हो जाइए।’
पर बड़की दी उस की बदतमीजी पर कुछ नहीं बोली। ऐसे बैठी रही जैसे कुछ
हुआ ही न हो। किसी ने कुछ कहा ही न हो। यह वही बड़की दी थी जो मुझे कभी कोई कुछ
कहता तो उस का मुंह नोच लेने को हरदम तैयार रहती थी। वही बड़की दी आज गुमसुम सी
चुप थी। और मैं सिसक-सिसक कर रो रही थी।
इसी बीच बिट्टी की वह बेटी बिस्किट और पानी ले कर आई। पर पानी किसी
ने पिया नहीं। बिस्किट किसी ने छुआ नहीं। माहौल गंभीर हो गया था। तब तक चुन्नू
कैमरा लिए आया और अन्नू से पूछने लगा, ‘भइया
सब के साथ बुआ की एक फोटो खींच लूं?’
‘हां, हां।’ अन्नू बोला। चुन्नू अभी कैमरे का लेंस
ठीक कर ही रहा था कि बड़की दी का एक नाती आया और फोटो खींचने से चुन्नू को मना
करने लगा।
चुन्नू ने अन्नू से चिल्ला कर कहा, ‘भइया यह फोटो खींचने से मना कर रहे हैं।’
‘तो
रहने दो।’ अन्नू भी कुछ-कुछ उत्तेजित हो गया था।
तनावपूर्ण स्थिति देख कर मैं समझ गई अब यहां और रुकना ठीक नहीं है।
माहौल बिगड़ सकता है। सो अन्नू से कहा कि, ‘अब
चला जाए।’ अन्नू ने भी कहा,
‘हां, उठिए।’ कह कर वह उठ खड़ा हुआ। उठते-उठते मुझे
रुलाई फूट पड़ी। उठ कर चलने लगी तो सोचा कि बड़की दी जरा रुकने को कहेगी। पर उस ने
नहीं कहा। मैं ने चलते-चलते बड़की दी को भर अकवार भेंटा। वह भी फफक कर रोने लगी।
मैं तो रो ही रही थी। अन्नू भी रोने लगा। बोला, ‘बड़की
बुआ हम आप को कभी नहीं भूलेंगे। और हमारे लायक आप जब भी जो भी समझिएगा, कहिएगा, जरूर
करूंगा।’ इस बीच अन्नू की बहू भाग कर बस में गई। और अपने ब्रीफकेस से एक नई साड़ी
निकाल कर ले आई। कुछ पैसे और साड़ी बड़की दी को देने लगी। उस ने ले लिया। हम सब के
सब रोते हुए घर से बाहर आ गए। बस में आ कर बैठे। पलट कर देखा तो बड़की दी के घर का
दरवाजा बंद हो गया था। बड़की दी के नाती, नतिनी
जो घर में लड़ने पर आमादा थे, औपचारिकतावश
भी बस तक या घर के बाहर तक छोड़ने नहीं आए थे। न ही बड़की दी।
बस स्टार्ट हो गई थी। सांझ घिरते-घिरते जैसे दोहरी हो रही थी। बस
फर्राटे से चली जा रही थी कि तभी अन्नू ने मुझे फिर अपनी सीट पर बुलाया। उस की
आंखें नम देख कर मैं भी सिसकने लगी। बोली, ‘जाने, बड़की दी के भाग्य में क्या बदा है। पता नहीं
भगवान उसे कैसी मौत देंगे।’
‘मैं
तो सोच रहा था कि अब तक जो हुआ सो हुआ। अब से बड़की बुआ को अपने पास लेते चलूं।’
अन्नू कहने लगा, ‘मैं तो कहने भी जा रहा था कि बड़की बुआ
चलिए। पर कहूं-कहूं कि तभी चुन्नू ने बताया कि बुआ की फोटो नहीं खींचने दे रहे
हैं। तो मैं चुप रह गया। यह सोच कर कि जब यह लोग फोटो नहीं खींचने दे रहे हैं तो
ले कैसे जाने देंगे ?’
‘ठीक
ही किया, जो नहीं कहा।’ मैं बोली, ‘बड़की दी आती भी नहीं। और तुम्हारी बात ख़ाली
जाती।’
‘पर
अब होगा क्या बड़की बुआ का ?’ अन्नू
ने पूछा।
‘भगवान
जाने क्या लिखा है।’ मैं बोली, ‘अभी
तक तो बेटी के नाम जायदाद लिख कर, बेटी
ही के घर रहने वाले मैं ने जितने भी देखे हैं, सब
की दुर्दशा ही हुई है। जमीन-जायदाद लिखने के साल दो साल तक अगले की पूछ रहती है
फिर लोग उसे दुत्कार देते हैं कुत्ते की मौत मरने के लिए। अपने घर के पिछवाड़े
हरिमोहन बाबा को ही देखो। उन का क्या हाल हुआ। बेटी के यहां मरे। देह में कीड़े
पड़-पड़ गए थे। न उन्हें जीते जी कोई छूने वाला था, न मरने ही के बाद। भरी बरसात में वह मरे थे। कोई उन की लाश फूंकने
वाला भी नहीं था वहां। अंततः गांव के लोग गए। और फिर उन के भतीजे ने ही उन्हें
आख़िरकार आग लगाई। यही हाल हमारे गांव की सुभावती का हुआ। भीख मांग कर मरी बेचारी।
ओफ्फ ! और बड़की दी यह सब किस्से जानती थी, फिर
भी यह कर बैठी। और फिर इस के यहां तो और मुश्किल है। बिट्टी को वह कैंसर बता ही
रही थी। कहीं वह मर-मरा गई तो क्या होगा ? दामाद
पहले ही से जुआरी और शराबी है। हे राम क्या होगा बड़की दी का!’
‘घबराइए
नहीं। हम लोग हैं न। बड़की बुआ की ऐसी स्थिति नहीं होने देंगे।’ अन्नू बोला।
‘हां, ध्यान रखना अन्नू।’
‘एक
बात है छोटकी बुआ।’ अन्नू बोला, ‘बड़की
बुआ के इस फैसले में सिर्फ उन का ही दोष नहीं हैं उन के देवर भी सब दुष्ट हैं। वह
सब बड़की बुआ की देखभाल तो करते थे पर ऊपरी तौर पर, और दिखावटी। उन सब की नजर भी बड़की बुआ की जमीन पर ही थी।’
‘यह
तुम कैसे कह सकते हो ?’
‘शुरू-शुरू
में बड़की बुआ जब मेरे पास रहने आई थीं तो एक बार इन का एक देवर आया। जो पुलिस में
है। सुबह-सुबह आया और कहने लगा भौजी आप तुरंत चलिए, छोटकी भौजी बीमार हैं। बचेंगी नहीं। आप को तुरंत बुलाया है। पर बड़की
बुआ उस का झूठ ताड़ गईं। हम से कहने लगीं कि अगर देवरानी मरती होती तो यह वहां उस
की दवा-दारू में लगता, हम को बुलाने थोड़े ही आता। पर वह
बड़की बुआ की कमजोर नस भी जानता था। और उस ने तुरंत एक दूसरा दांव भी फेंका। कहा
कि रास्ते में बिट्टी का घर पड़ेगा, उस
से भी भेंट करवा दूंगा। बड़की बुआ आनन-फानन तैयार हो गईं। और वह आने के एक घंटे के
भीतर ही बुआ को लिवा ले गया। बड़की बुआ को बिट्टी के इस घर पर पहली बार वही ले कर
आया था। तो रास्ता तो उसी ने खोला।’
‘पर
वह आनन-फानन बड़की दी को तुम्हारे यहां से ले क्यों गया ?’
‘उसे
अंदेशा था कि कहीं बड़की बुआ की जमीन मैं अपने नाम न लिखवा लूं।’ अन्नू बोला, ‘जब कि ऐसा पाप मैं ने कभी सपने में भी नहीं
सोचा था। फिर जब बड़की बुआ को यह बात पता चली तो उन्हों ने अपने देवर को इस बात के
लिए बड़ी लताड़ लगाई।’
‘पर
यह बात तुम्हें किसने बताई ?’
‘बड़की
बुआ ने ही।’ अन्नू बोला,
‘बड़की बुआ कहने
लगीं, पाप उस के मन में ख़ुद था, पर लांछन तुम पर लगा रहा था।’ अन्नू बोला, ‘यह जमीन-जायदाद भी बड़ी अजीब चीज है। क्या-क्या
न करवा दे।’
‘हमको
तो पता चला है कि बड़की बुआ के देवर भी अब आपस में उन की जमीन के लिए लड़ने लगे
थे।’ मुन्नू बताने लगा, ‘हर कोई चाहता था कि अकेले उसी के नाम
बड़की बुआ अपनी सारी जमीन लिख दें। सब के सब उन्हें फुसलाने से ले कर धमकाने तक
में लगे थे, तभी तो बड़की बुआ घर छोड़ कर बिट्टी के
घर चली गईं।’
‘हमने
तो सुना है बड़की बुआ ने जो जमीन-जायदाद बिट्टी के नाम लिखा है, उस के ख़िलाफ उन के देवरों ने मुकदमा भी कर
दिया है।’ चुन्नू ने कहा।
‘हो
सकता है कर दिया हो।’ मैं बोली, ‘देवर
भी सब दुष्ट हैं ही। सब दुष्ट न होते तो बड़की दी भला ऐसा क्यों करती ? बेटी के घर जा कर भला क्यों अपना अगला जनम भी
बिगाड़ती। यह जनम तो उस का बिगड़ा ही था जो जवानी आने से पहले ही विधवा हो गई। और
अब अंत समय में बेटी का अन्न-जल लेने उस के घर पहुंच गई, अगला जनम भी बिगाड़ने।’
‘आप
लोग क्या तभी से वितंडा खड़ा किए हुए हैं ?’ पीछे
की सीट पर बैठी अन्नू की बहू बुदबुदाई, ‘आख़िर
वह अपनी बेटी ही के पास तो गई हैं। बेटी के पास न जाएं तो किस के पास जाएं ? रही बात जमीन-जायदाद की तो वह भी अगर बेटी को
लिख दिया तो क्या बुरा कर दिया ? कौन
सा आसमान फट पड़ा। किस को अपने बच्चों से मोह नहीं होता।’
‘हां, यह बात भी ठीक है।’ अन्नू बीवी की हां में हां
मिलाते हुए बोला।
‘दुनिया
कहां से कहां पहुंच गई। रीति-रिवाज, परंपराएं
और मान्यताएं बदल गईं। यहां तक कि बड़की बुआ बदल गईं।’ अन्नू की बहू बोली, ‘पर आप लोग अभी भी नहीं बदले। तभी से बेटी का घर, बेटी का घर आप लोगों ने लगा रखा है। अरे, एक मां अगर अपनी बेटी और उस के बच्चों के बीच
अपनी पहचान ढूंढना चाहती है, उन
के साथ अपनी जिंदगी के अंतिम दिन बिताना चाहती है, अपनों में खो जाना चाहती है और इस के लिए जो अपना सर्वस्व गंवा भी
देती है तो बुरा क्या है ?’
‘इस
में बहुत बुरा नहीं है बहू।’ मैं बोली, ‘पर
यहां बात दूसरी है। बड़की दी तो बेटी के मोह माया में फंस गई है। वह तो वहां
अपनत्व ढूंढने गई है पर बिट्टी और दामाद तो उसे कामधेनु माने बैठे हैं। बिट्टी को
कैंसर हो गया है। पता नहीं वह जिएगी कि मरेगी। और दामाद ठहरा जुआरी, शराबी। ऐसे में बड़की दी का क्या होगा ? मैं तो साफ देख रही हूं कि बड़की दी फंस गई है।
वह सब उसे अपने यहां सेवा करने के लिए नहीं ले गए हैं। उन की नजर तो उस की
जमीन-जायदाद पर है। देखा नहीं कि अभी चार महीने भी उसे नहीं हुए यहां आए। और सब
कुछ लिखवा लिया। जाहिर है कि नीयत साफ नहीं है। नीयत साफ होती तो वह चार दिन का लड़का फोटो खींचने से
भला क्यों रोकता ? और वह लड़की बेबात हम से क्यों झगड़ने
लगती भला ?’
‘यही
बात गड़बड़ लगी मुझे भी।’ अन्नू की बहू बोली, ‘पर
बुआ जी को जो अच्छा लगे वही करने दीजिए।’
‘हां, अब तो यही हो सकता है।’
मैं ने देखा मेरी और बहू की बात चीत के बीच अन्नू सोने लगा था। जाने
सो रहा था कि सोने का अभिनय कर रहा था। फिर भी मैं थोड़ी देर तक उस के साथ उस की
सीट पर ही बैठी रही। बैठी रही और सोचती रही कि क्या बड़की दी ने बिट्टी के मोह में
यह सब किया ? क्या बच्चों का मोह मां को ऐसे ही बांध
लेता है ? कि गलत सही का खांचा आदमी भूल जाता है।
जैसे कि द्वापर युग में धृतराष्ट्र भूल गया था दुर्योधन के अंध मोह में ? और इस कलयुग में गलत सही का खांचा भूल गई है
बड़की दी बिट्टी के अंध मोह में ?
क्या पता ?
मेरे तो बच्चे ही नहीं हैं। मेरे भी बच्चे होते तो शायद यह बात ठीक
से समझती। निःसंतान मैं क्या जानूं यह सब ? यह
सोच कर ही रोने लगती हूं। रोती सिसकती अपनी सीट पर आ बैठती हूं। शायद बड़की दी के
काट से बड़ा है मेरा काट। मैं सोचती हूं कि बड़की दी की जगह अगर मैं होती तो क्या
मैं भी बिट्टी के लिए वही सब करती, जो
बड़की दी कर गई है, परंपरा और संस्कार सब को दरकिनार करती
हुई !
क्या पता !
और फिर जब मैं भी बड़की दी जितनी बूढ़ी हो जाऊंगी तो हमें कौन देखेगा? बड़की दी का यह यक्ष प्रश्न क्या मेरा भी यक्ष
प्रश्न नहीं बन जाएगा ? तो मैं कहां जाऊंगी। फिर यह सोच कर
संतोष मिलता है कि निःसंतान ही सही बड़की दी की तरह मैं बेवा तो नहीं हूं। हमारा
पति तो है। हम दोनों जन एक साथ रह लेंगे। दोनों एक दूसरे की सेवा करते हुए।
हमारी बस को एक ट्रक बड़ी तेजी से ओवरटेक करता हुआ, तेज-तेज हार्न बजाता हुआ गुजर रहा है। और बाहर, अंधेरा गहराता ही जा रहा है। और यह घुप अंधेरा
जैसे मेरे मन के भीतर कहीं बहुत गहरे धीरे-धीरे उतरने लगा है।
मैं फिर से रोने लगी हूं। और बस चलती जा रही है भड़भड़ करती हुई।
शायद फिर कोई स्पीड ब्रेकर है !
-26-
सुमि का स्पेस
नोएडा में अट्टा जैसी जगह में जब सुमि ने एक फ्लैट ले कर अकेले रहना
शुरू किया था तो जैसे उस के जान-पहचान और रिश्तेदारों पर पहाड़ टूट पड़ा था। एक
पारंपरिक परिवार की लड़की अकेली रहे और तिस पर अट्टा जैसी जगह में ? लगभग सभी ने नाक-भौं सिकोड़ी थीं। नाक-भौं तो
जब वह एम.सी.ए. की पढ़ाई करने नोएडा पहुंची थी तब भी सिकोड़ी थीं लोगों ने लेकिन
वह डिगी नहीं और अपने शहर लखनऊ को छोड़ कर नोएडा कूच कर गई थी। शुरू के कुछ दिन उस
ने हॉस्टल में गुजारे। पर हॉस्टल में उसकी दिक्कतें कम होने के बजाए बढ़ गईं।
सेक्टर 12 में हॉस्टल था और ग्रेटर नोएडा पढ़ने
जाना होता था। आने-जाने, रहने-पढ़ने किसी भी मायने में हॉस्टल
मुफीद नहीं था। लड़कियों का घोषित हॉस्टल होने से लाइनबाज शोहदे भी इर्द-गिर्द
मंडराते रहते। एक बार तो सुमि के नाम से हॉस्टल में एक लफंगे का फोन भी आ गया। वह
लफंगा फोन पर सीधे-सीधे प्रपोज करने लगा। वह घबराई कि वह उस का नाम कैसे जानता है ? पूछा उस ने उस से तो उस ने फोन काट दिया। उस ने
बहुत जोर डाल कर सोचा तो याद आया कि कुछ देर पहले मम्मी को फोन करने पी.सी.ओ. पर
गई थी। फोन में कुछ ख़राबी थी सो वह तेज-तेज बोल रही थी। इसी तेज-तेज बोलने में उस
ने अपना नाम भी बोला था कि,
‘मम्मी मैं
सुमित्रा बोल रही हूं।’ शायद इस लफंगे ने वहीं पी.सी.ओ. पर फोन पर बोलते समय नाम
सुन लिया होगा। तभी सुमित्रा डार्लिंग पर आ गया था। नहीं अमूमन लोग और सहेलियां
उसे सुमि नाम से ही बुलाते-जानते हैं।
सुमि तो वह अब बनी है। नहीं पहले तो सुमित्रा ही थी। सहेलियां
चिढ़ाती भी थीं कि, ‘क्या बहन जी टाइप नाम रखा है ? बदलो इसे ! इस ऐतिहासिक टाइप नाम को बदलो।’ और
नाम बदलने का यह दबाव भी बी.एस.सी. में आ कर बढ़ा। पर वह टालती रही। लेकिन जब
एम.एस.सी. में कुछ दोस्त टाइप शरीफ लड़के भी इस सुमित्रा नाम पर गुरेज खाने लगे तो
वह सर्टिफिकेट में न सही बोलचाल में सुमि बन गई। सुमि फिजिक्स में एम.एस.सी. कर
रही थी तब जब कि उस के परिवार और नाते रिश्तेदारों की तमाम लड़कियां हाई स्कूल में
ही मैथ वगैरह से पिंड छुड़ा कर होम-साइंस के रास्ते अब सोसियोलॉजी, एजूकेशन जैसे सब्जेक्ट्स में एम.ए. कर रही थीं।
एम.एस.-सी. में भी उसकी क्लास में सिर्फ चार लड़कियां थीं बाकी लड़के। हालांकि
दिक्कत फिर भी थी। सुमित्रा से सुमि बन कर बहन जी टाइप, ऐतिहासिक टाइप सुमित्रा नाम से संबोधन में ही
सही छुट्टी पा ली थी उस ने। पर हरकतों, मिजाज
और लुक में फिर भी वह बहन जी ही रही ! लड़कों को यह बात भी चुभती थी।
और कभी-कभी उस को भी।
लड़के जब ज्यादा बोर करते, इस
बहन जी वाले लुक और मिजाज पर कमेंट्स ज्यादा जब करते तो वह कहती, ‘क्या बहन जी टाइप, बहन जी टाइप लगा रखा है ?’ वह जोड़ती, ‘जैसी
हूं, वैसी हूं।’ और फिर जैसे डपटती, ‘तुम लोगों से राखी बंधवाने को तो मैं कह नहीं
रही हूं ?’ और मुसकुराती तो सब बोलते, ‘नहीं, नहीं
सुमित्रा जी इतनी लिनिएंसी तो आप आगे भी बरतेंगी ही!’ कहते और फूट लेते सब लड़के।
हां, लेकिन जब एम.एस.सी. प्रीवियस में सुमि
के नंबर 96 परसेंट आए तो लड़के ही नहीं
यूनिवर्सिटी भी सीरियस हो गई इस बहन जी टाइप सुमित्रा को ले कर। नहीं, सुमित्रा नहीं सुमि को ले कर। हां, सुमित्रा अब घर में भी सुमि बन चली थी। सिवाय
मम्मी को छोड़ कर। घर भर सुमि कहता पर मम्मी सुमित्रा ही फरमातीं। तो जब सुमि 96 परसेंट नंबर लाई तो यह मम्मी भी सीरियस हुईं।
सुमि के पापा से बोलीं,
‘96 परसेंट लाई है, उड़ रही है, यह
तो ठीक है। पर अब फाइनल पार करे तब तक इस की शादी-वादी की भी चिंता करिए। सुमित्रा
के पापा बोले, ‘निश्चिन्त रहो मणि जी से हम पहले ही
बतिया चुके हैं। उन का लड़का एम. सी. ए. कर रहा है। वह बोले क्या वादा किए बैठे
हैं कि बेटे को एम. सी. ए. कर कहीं नौकरी में आ जाने दीजिए। शादी आप ही की बेटी से
होगी।’ कह कर सुमित्रा के पापा निश्चिन्त हो गए। पर सुमित्रा की मम्मी नहीं। बोलीं, ‘वह तो ठीक है। पर दो चार जगह और भी नजर दौड़ाते
रहिए। जब तक तय न हो जाए शादी बेटी की तब तक निश्चिन्त बैठना ठीक नहीं।’ पर
सुमित्रा के पापा निश्चिन्त ही रहे। पत्नी के बहुत टोका-टोकी करने पर वह एक दिन
मणि जी के यहां हो भी आए और फिर से समधी बनने का निश्चिन्त आश्वासन पा लौट आए। साथ
में लड़के की कुंडली फोटो भी लाए।
वापस आ कर पंडित जी से कुंडली मिलवाई। शादी बन रही थी और उन्हों ने
देखा लड़के की फोटो भी सुमि को पसंद आ गई थी। बेटी की शादी के चाव में खुश
सुमित्रा के पापा यह भी भूल गए कि उन की बेटी और मणि जी का बेटा एक दूसरे को पहले
ही से जानते हैं और कि वह उन के घर भी कभी-कभी आता-जाता रहा है। बेटी के बाप थे न!
सो भूल-भाल गए थे।
पर सुमित्रा की मम्मी नहीं भूली थीं। याद था कि मणि जी का लड़का
हैंडसम भी है और लंबा भी। तीसरे, एम.सी.ए.
कर रहा है। सो सुमित्रा के पापा से एक दिन बोलीं, ‘जब कुंडली मिल ही गई है और मणि जी शादी के लिए तैयार भी हैं तो कम से
कम बर-बरीक्षा ही कर लीजिए।’
‘कहा
था हम ने पर मणि जी बोले सब इकट्ठे हो जाएगा, आप
काहे परेशान होते हैं।’ सुमित्रा के पापा विह्नल हो कर बोले।
‘दहेज-वहेज
भी पूछे हैं कि का लेंगे ?’
सुमित्रा की मम्मी बोलीं, ‘कहीं ऐन वक्त पर ढाका जइसा मुह बा दें तो ?’
‘पूछा
भई, पर दहेज की बात भी वह टाल गए हैं।’ वह
बोले, ‘मणि जी तो कहते हैं कि हम कुछ नहीं
मांगेंगे। आप को जो देना होगा, दे
दीजिएगा।’
‘यही
बात गड़बड़ लग रही है।’
‘तुम
को तो हर बात गड़बड़ ही लगती है।’ वह बोले, ‘अरे
मर्द की जबान भी कोई चीज होती है ? और
मणि जी मर्द आदमी हैं।’
बात ख़त्म हो गई।
लेकिन बात सचमुच ख़त्म कहां हुई थी ?
सुमि इधर यूनिवर्सिटी टॉप कर गई थी और उधर मणि जी का बेटा एम.सी.ए.
कर के मुंबई में एक मल्टी नेशनल कंपनी ज्वाइन कर चुका था। सुमि मुंबई जाने के सपने
बुनने लगी थी। छोटी बहन ठिठोली फोड़ती कि, ‘दीदी
हम लोगों को फिल्मों की शूटिंग दिखाएगी। शाहरुख़, प्रीति जिंटा,
तब्बू और आमिर ख़ान से मिलवाएगी!’ फिर
जैसे जोड़ती और पूछती, ‘है न दीदी ?’ सुमि यह सब सुन कर मुसकुराती और कहती, ‘पहले मुंबई पहुंचने तो दो !’
पर सुमि मुंबई नहीं नोएडा पहुंची। वह भी अकेली। पढ़ने के लिए। हुआ यह
कि सुमि के पापा निश्चिन्त थे मणि जी जैसी मर्दानी जबान पर और मगन थे अपनी बेटी की
उपलब्धियों पर। फिजिक्स जैसे विषय में यूनिवर्सिटी टॉप की थी उस ने। पर वह यह नहीं
जान पाए कि कॅरियर की भी एक ऐसी दुनिया है जो टॉपरों को भी कुचल देती है।
मणि जी का लड़का एक बार मुंबई से वापस आया तो ख़बर सुन कर सुमि के
पापा पहुंचे मणि जी के पास कि अब तो बर-बरीक्षा हो ही जाए। पर मणि जी ने कहा कि, ‘शुक्ला जी, हम
ने बेटे से बात की है। आप के आने के पहले ही बात की है। और वह इस शादी से इंकार
करता है।’
‘क्यों
मणि जी ?’ सुमि के पापा अचकचाए, ‘क्यों ?’
‘वह
कहता है कि एम.सी.ए. लड़की से ही शादी करेगा !’
‘क्या
?’ सुमि के पापा जैसे बैठ से गए, ‘मेरी बेटी भी यूनिवर्सिटी टॉपर है मणि जी !’
‘हां, शुक्ला जी ! पर शादी मुझे नहीं, बेटे को करनी है !’
‘मणि
जी, भले मेरी बेटी टॉपर है पर मैं दहेज भी
पूरा दूंगा।’ सुमि के पापा बोले, ‘मेरी हैसियत पांच सात लाख रुपए ही देने की है।
पर आप कहिएगा तो घर-दुआर बेंच कर पंद्रह बीस लाख तक दे दूंगा।’ कह कर वह मणि जी के
पैर पड़ गए।
‘अरे
नहीं शुक्ला जी !’ मणि जी सुमि के पापा को उठाते हुए बोले, ‘बात दहेज-वहेज की नहीं है।’ वह बोले, ‘मेरा बेटा अमरीका जाना चाहता है। वहीं सेटिल्ड
होना चाहता है। तो वह चाहता है कि उसकी लाइफ पार्टनर भी उस के ही कॅरियर वाली हो
ताकि साथ-साथ रह सके। साथ-साथ रहे और काम भी करे ताकि खर्चे में कोई दिक्कत न आए।
ऐसा वह सोचता है !’ वह बोले, ‘दिक्कत
मेरी ओर से नहीं, उसी की ओर से है।’
‘लेकिन
मणि जी मैं ने तो आप की जबान को मर्द की जबान मान कर कहीं और कोई शादी देखी भी
नहीं।’
‘लेकिन
अब क्या करें ?’
‘बेटे
से एक बार मैं भी बात कर लूं ?’ कहते
हुए सुमि के पापा की हिचकियां बंध गईं। बोले, ‘मैं
ने तो उसे दामाद मान ही लिया है और मेरी बेटी भी शायद उसे पति मान चुकी है।’
‘हां, पर वह अटल है। उस से मिलने से कोई फायदा नहीं।
बल्कि आप को और तकलीफ होगी।’
‘फिर
ठीक है।’ कह कर सुमि के पापा अपने घर आ गए। दूसरे दिन से उन्हों ने सुमि के लिए
दूसरे रिश्ते खोजने की लगभग मुहिम चला दी। रिश्ते खोजते-खोजते वह थक-से गए। वह अब
किसी से यह बताते भी नहीं थे कि उन की बेटी यूनिवर्सिटी टॉपर है। क्योंकि वह यह
जान गए थे कि यह टॉपर होना सिर्फ मृगतृष्णा है। आज की तारीख़ में डिग्रियों, नौकरियों और दहेज के मायने बदल गए थे, वह यह अब जान रहे थे। वह यह सब जान ही रहे थे
कि अचानक एक दिन सुमि बोली,
‘पापा मेरे लिए
वर खोजना बंद कर दीजिए !’
‘क्यों
भई ?’ थोड़ी खीज, थोड़े दुलार से सुमि के पापा बोले।
‘क्यों
शादी नहीं करनी क्या ?’ मम्मी जी बिलबिलाईं।
‘शादी
करूंगी मम्मी जी !’ सुमि बोली, ‘पर
अब एम.सी.ए. करने के बाद ही।’
सुमि के पापा को जैसे राह मिल गई थी। हालां कि सुमि की मम्मी इस पक्ष
में नहीं थीं कि सुमि के एम.सी.ए. का इंतज़ार किया जाए। पर सुमि ने फैसला कर लिया
था और उस के पापा ने सहमति दे दी थी सो वह चुप न रहते हुए भी चुप लगा गईं। सुमि ने
फैसला भले कर लिया था कि अब एम.सी.ए. के बाद शादी करेगी पर उस का डिप्रेशन बढ़ता
ही जा रहा था। फिर भी वह एम.सी.ए. के एंट्रेंस एग्जाम की तैयारी में लग गई। कुछ
टॉपर होने के कांप्लेक्स,
कुछ शादी टूटने का डिप्रेशन, एंट्रेंस एग्जाम में वह सेलेक्ट नहीं हो पाई।
सुमि के पापा जैसे हार-से गए। मम्मी तो रोने लग गईं। पर सुमि नहीं हारी। सब कुछ के
बावजूद हौसला नहीं हारी। फिर से तैयारी शुरू की। कानपुर के एक कोचिंग से
कॉरेसपॉन्डेंस कोचिंग शुरू की। दिन-रात एक किया और अंततः दूसरी बार के एंट्रेंस
एग्जाम में सेलेक्ट हो गई एम.सी.ए. के लिए। ग्रेटर नोएडा में सीट मिली। दाखि़ला
लिया और हॉस्टल में रहने लगी। सुमि के पापा मणि जी के घर एक बार फिर गए कि, ‘अब तो मेरी बेटी भी एम.सी.ए. करने लगी है।’ पर
मणि जी बोले, ‘शुक्ला जी, अब तो मेरा बेटा यू.एस.ए. जा रहा है। जाने कब
शादी करेगा, मुझे भी नहीं पता।’
शुक्ला जी लौट आए। पर अब की टूट कर नहीं लौटे। हां, इस बारे में उन्हों ने न तो सुमि को बताया न
सुमि की मम्मी को। अलबत्ता सुमि को एनकरिज करने में लग गए।
सुमि भी धीरे-धीरे कॅरियरिस्ट होने की राह लग गई।
हॉस्टल में दिक्कत और चिल्ल-पों ज्यादा बढ़ गई तो वह सेक्टर 27 यानी अट्टा में एक छोटा-सा फ्लैट ले कर अकेले
रहने आ गई। चार हजार रुपए महीने का यह दो कमरे का एल.आई.जी. फ्लैट महंगा तो था, पर कनविनिएंट ज्यादा था। नोएडा के किसी और
सेक्टर में दो ढाई हजार रुपए में भी फ्लैट मिल सकता था पर सुमि ने अपने पापा को
समझाया कि, ‘फिर भी वह महंगा पड़ेगा।’
‘वह
कैसे ?’ पापा ने पूछा।
‘वह
ऐसे कि पापा कनवेंस वाइज महंगा पड़ेगा।’ वह बोली, ‘अट्टा से लगभग सभी बसें गुजरती हैं और हर जगह के लिए आसानी से मिल
जाती हैं। कोचिंग वगैरह जाने में आसानी होगी। नोएडा के बाकी किसी सेक्टर में यह
फेसिल्टी नहीं है। तो रिक्शे, ऑटो
के चक्कर में ज्यादा पैसे पड़ जाएंगे। दिक्कत होगी सो अलग।’ बेटी की यह मैथमेटिक्स
सुमि के पापा को ठीक लगी सो वह मान गए थे।
थे तो सुमि के पापा भी मैथमेटिक्स के ही टीचर और उन्हों ने
मैथमेटिक्स में ही एम.एस.सी. की थी पर आज के दिन ब दिन बदलते कॅरियर की मैथमेटिक्स
में वह अपने को फिट नहीं पाते थे। हां, लेकिन
अपनी मैथमेटिक्स को वह थैंक्यू जरूर कहते जिस के चलते वह कॉलेज में पढ़ाने के
साथ-साथ कोचिंग भी चलाने लगे थे। यह कोचिंग का ही बूता था कि वह सुमि की पढ़ाई का
ख़र्चा उठा ले रहे थे।
खै़र, हॉस्टल में फोन पर जब सुमि का पूरा नाम
सुमित्रा कह कर लफंगे ने उसे प्रपोज करने की कोशिश की तो वह घबरा गई। दूसरी शाम उस
ने फिर मम्मी को फोन किया और पूरा किस्सा बताते हुए कहा कि, ‘मम्मी, पापा
से कहिए कि हमें एक मोबाइल ख़रीद दें !’
‘देखो
इंतजाम करती हूं !’
शुक्ला जी ने मामले की नजाकत समझी और नोएडा जा कर बेटी के लिए मोबाइल
ख़रीद दिया।
बात तेजी से लोगों के बीच फैली कि सुमि अब मोबाइल रखती है। सवालों के
तार भी सुलगे। शुक्ला जी के रिश्तेदारों, पट्टीदारों
ने दबी जबान उलटे-सीधे कमेंट्स भी पास किए। एक पट्टीदार यहां तक आ गए कि कहीं वह
खुद भी ‘मोबाइल’ हो गई तो ?’
‘मास्टर
साहब के दहेज का खर्च बच जाएगा और का !’ एक दूसरे पट्टीदार ने बात पूरी की।
शुक्ला जी ऐसे कमेंट्स सुन कर बिफरे, पर रहे चुप-चुप ही। क्यों कि सुमि जब नोएडा पढ़ने गई थी तब भी
कमेंट्स बाजार में उछाल आया था। पर बेटी की शादी और कॅरियर की झूम में शुक्ला जी
ने कमेंट्स बाजार में आए उछाल को यूं ही उछाल दिया था।
पर अब की वह बिफरे।
और जब सुमि अट्टा जैसी जगह में अकेले रहने पहुंची तो कान सब के फिर
खड़े हो गए। कमेंट्स बाजार में उछाल ही उछाल था। अश्लीलता और अभद्रता की हद तक।
इतना कि बात शुक्ला जी से होते-हवाते सुमि तक पहुंची। रिश्ते की एक बहन ने सुमि को
उस के मोबाइल पर बताया। लेकिन सुमि अब तक गरमी-बरसात खाते-खाते इतनी पक्की हो गई
थी कि डिप्रेस नहीं हुई। पर उसे मम्मी, पापा
का ख़्याल आया। खास कर पापा का। क्यों कि इस पुरुष प्रधान समाज में बेटी के कलंक
पिता को ही ज्यादा फेस करने पड़ते हैं। यह बात वह जानती थी सो पापा-मम्मी को फोन
किया और बिना किसी भूमिका के पूछा, ‘पापा
आप मुझ पर भरोसा तो करते हैं न !’
‘हां, सुमि हां !’ शुक्ला जी का गला रुंध गया। बोले, ‘पर बेटी यह बात तुम्हें मुझ से पूछने की जरूरत
आई कैसे ?’
‘कुछ
नहीं पापा ! बस यूं ही !’
‘फिर
भी बेटी !’
‘पापा
आप तो जानते ही हैं इस मेल-मेंटालिटी वाली सोसाइटी को।’ वह बोली, ‘कुछ बातें मुझ तक भी पहुंचती हैं। छन-छन कर ही
सही। सो पापा मुझे लगा कि मैं ही आप से बात कर लूं !’
‘ठीक
किया बेटी !’ शुक्ला जी बोले, ‘तुम
इस सब की चिंता छोड़ो। मैं यह सब फेस करना सीख गया हूं। बस तुम अपना कॅरियर, अपनी पढ़ाई देखो!’ वह जैसे आशीर्वाद पर उतर आए, ‘टॉप करो एम.सी.ए. भी !’
‘वो
तो है पापा !’ सुमि बोली,
‘पर मम्मी को भी
समझा दीजिएगा। क्यों कि आप तो जानते हैं पापा कि आप लोग टूटेंगे तो फिर मैं भी टूट
जाऊंगी!’
‘नहीं
बेटी, तुम अपना मॉरल हाई रखो। हम लोग इतनी
कच्ची मिट्टी के नहीं बने हैं।’ वह बोले, ‘फिर
हमें तुम पर यकीन है। यकीन नहीं होता तो इतनी दूर अकेले तुम्हें पढ़ने को भेजा ही
क्यों होता ?’
‘बस
पापा हमें आप से यही यकीन चाहिए था !’
‘ओ.
के. बेटा !’
सुमि इस के बाद और मनोयोग से पढ़ाई में लग गई। अब तक उस ने एक
कम्प्यूटर भी ले लिया और इंटरनेट सर्विस भी। इंटरनेट पर बड़ी देर-देर तक डटी रहती।
खाना बनाने का झंझट उस ने पाला नहीं था। हालां कि खाना बनाना उसे आता था तो भी समय
बचाने के लिहाज से उस ने टिफिन सर्विस ही बेहतर समझी। हां, कपड़े वह जरूर घर में ही धोती और प्रेस करती
थी।
वह भी पढ़ने से फुर्सत मिलती तो !
हां, जब बहुत सुलगती तो अट्टा पीर की मजार
के चक्कर मार आती। या थोड़ी देर वहां खड़ी रह लेती। टी.वी. वगैरह तो घर में रखा
नहीं था। कभी एंटरटेनिंग मूड होता तो कंप्यूटर पर ही सी.डी. लगा कर कुछ फिल्मी
गाने-वाने सुन लेती। फिर भी जब जी नहीं मानता तो मम्मी-पापा से बात कर लेती। कुछ
सहेलियां भी थीं उस की लेकिन सभी पढ़ने में ही मगन। ज्यादातर अपने घरों से दूर।
कुछ के रिश्तेदार या जानने वाले इस नोएडा या दिल्ली में थे पर वहां भी वह कम ही
जाती थी। क्यों कि वहां पहुंचने पर कई बेतुके सवाल सुलग जाते।
सुमि के भी एक दूर के रिश्तेदार थे जो नोएडा में सपरिवार रहते थे। वह
जाती कभी-कभार उनके यहां तो पाती कि सवालों की सिलवटें कई-कई हैं वहां और एक यह डर
भी कि कहीं सुमि उन के यहां रहने की पेशकश न कर दे। और यह डर भी इतना सतह पर होता
कि सुमि को साफ दिख जाता। जब हॉस्टल में रहती थी तो कभी-कभार उनके यहां रात में
रुकी भी पर जब देखा कि उन लोगों का डर, उन
लोगों के ऊल-जलूल सवाल ज्यादा बढ़ गए हैं तो वहां जाना एक दम से बंद कर दिया।
अट्टा में जब रहने लगी तब भी नहीं गई।
अट्टा में सब माल के पीछे थोड़ी दूर पर ही वह रहती और वह लोग अट्टा
बाजार में आते लेकिन सुमि की सुधि लेने कभी उस के फ्लैट पर नहीं जाते। कभी फोन भी
नहीं करते तो सुमि ने भी चुप्पी साध ली। बाकी सहेलियों के रिश्तेदारों का भी लगभग
यही हाल था। सो सब आपस में ही अपना-अपना सन्नाटा तोड़तीं। ब्वाय फ्रेंड सुमि ने
बनाए नहीं थे सो सब की सब गर्ल फ्रेंड ही थीं। और अब तक लगभग सभी के पास मोबाइल आ
चुका था। पर मोबाइल का मतलब हरदम बतियाना तो नहीं था। क्यों कि बतियाने का बिल भी
भुगतना था। सो सब एस.एम.एस. के जरिए आपस में सन्नाटा तोड़तीं। मोबाइल फोनों के रेट
देखते हुए कई बार मोबाइल बदल लेतीं। पर रोज-रोज तो मोबाइल नंबर बदला नहीं जा सकता
था। वैसे भी अकेले रहने के कारण बदनामी के बादल उड़ते रहते थे। फिर रोज-रोज मोबाइल
बदलने की बात तो बदनामी के बादल में इजाफा ही करना था। सो सभी गर्ल फ्रेंडों ने
मिस-काल वाली कोडिंग शुरू कर दी मोबाइल पर। जैसे कि सिर्फ एक रिंग पर फोन काट देने
का मतलब हम ठीक हैं, तुम कैसी हो ? तो दूसरी भी एक रिंग दे कर बता देती कि ठीक
हैं। ऐसे ही दो रिंग का मतलब होता कि पढ़ रहे हैं। तीन रिंग का मतलब सोने जा रहे
हैं, डिस्टर्ब मत करना। और जब चार रिंग और
उस से ज्यादा हो जाए तो मतलब अब बात करनी ही है, फोन उठाओ ! यह और ऐसे-वैसे कोड बनाते-बदलते इन गर्ल फ्रेंडों की
पढ़ाई और कॅरियर के बीच पसरा सन्नाटा टूटता जुड़ता रहता।
इस सन्नाटा तोड़ने-जुड़ने के बीच सुमि में और कई बदलाव आने लगे थे।
पहले वह कॅरियर कांशस नहीं थी, पर
अब कॅरियर कांशस हो गई थी। और भरपूर !
एम.सी.ए. अब उस की मंजिल नहीं थी, न
ही मणि जी का लड़का। वह बात ऐसे करती गोया आकाश उस की सीमा ही न हो, आकाश से भी आगे जाने की बात करती। वह तो कहती, ‘स्काई इज नॉट अवर लिमिट !’
एक बार उस के एक मामा जी नोएडा उस से मिलने गए और उस से कहा कि, ‘जब इतनी ब्रिलिएंट हो, इतनी मेहनत करती हो और अभी तुम्हारे पास उम्र
भी है तो सर्विसेज में क्यों नहीं ट्राई करती ?’
‘सर्विसेज
मींस ऐडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस ?’
‘बिलकुल
!’
‘कोई
फायदा नहीं !’
‘क्यों
?’
‘है
मेरी एक फ्रेंड !’ वह बोली,
‘मुझ से तीन साल
सीनियर है। फर्स्ट अटेंप्ट में ही सिलेक्ट हो गई। लेकिन देखती हूं जब देखो तब उस
के ट्रांसफर का बस्ता तैयार रहता है।’ वह बिलबिलाई, ‘कहीं सेटिल्ड होकर रह ही नहीं सकती वह !’
‘अरे, यह तो शुरू के दिनों की बात है !’
‘क्यों
? मैं तो देखती हूं अकसर अख़बारों में कि डी.एम., कमिश्नर भी आए दिन बदलते रहते हैं। वे भी थोक
भाव में।’ वह जैसे बिफरी।
‘तो
तुम क्या करना चाहती हो ?’
मामा जी ने पूछा, ‘प्राइवेट सेक्टर की नौकरी ? यानी पूंजीपतियों की गुलामी ?’
‘नहीं
मैं अपनी ख़ुद की कंपनी खोलूंगी।’
‘कब ?’
‘अरे, अभी पढ़ाई तो पूरी कर लूं।’
‘वो
तो ठीक है।’ मामा जी बोले,
‘पर सोचो यह
कंपनी खोलने के लिए लाइसेंस या और जरूरी फॉर्मेलिटीज कौन निर्धारित करेगा ? जानती हो यही ब्यूरोक्रेट्स !’
‘तो
क्या हुआ ?’ वह बोली, ‘यह तो एक प्रोसीजर है !’
‘पर
यह प्रोसीजर तय करने वाली तुम खुद क्यों नहीं बन सकती ?’ मामा जी बोले, ‘रही बात आए दिन ट्रांसफर्स की तो यह बात सभी ऐडमिनिस्ट्रेटर्स पर
लागू नहीं होती।’ मामा जी बोलते जा रहे थे, ‘जो
लालची या भ्रष्ट होते हैं या झक्की उन्हीं पर लागू होती हैं।’
‘ये
तो है !’
‘अरे, डॉक्टर ने कहा है कि डी.एम.की पोस्टिंग चाहिए
!’ मामा जी बोले, ‘सोचो सुमि जब तुम ऐडमिनिस्ट्रेटिव
सर्विस में आओगी तो समझो कि देश का भाग्य लिखोगी। डी.एम., कमिश्नर कोई सीमा नहीं है। भारत सरकार में
सेक्रेटरीज तक आते-आते तुम प्लैनिंग करोगी देश के लिए। उस प्लैनिंग को इंप्लीमेंट
करोगी। तब एक नहीं लाखों कंपनियों का भाग्य लिखोगी !’ वह बोले, ‘कभी इस तरह भी सोच कर देखो!’
‘आप
ठीक कह रहे हैं। पर मैं अभी इस बारे में नहीं सोच रही।’ वह बोली, ‘जरूरी नहीं कि कोई कंपनी ही खोलूं। वो तो अभी
आप ने एक बात कही तो मैंने यह बात कह दी।’ वह बोली, ‘अभी तो एम.सी.ए. करने के बाद भी मेरी पढ़ाई ख़त्म होने वाली नहीं
है।’
‘अरे
अब क्या करोगी ?’
‘एम
टेक कर सकती हूं। गेट में ऐडमिशन ले सकती हूं।’ सुमि बोली, ‘और जो आप देश का, कंपनियों का भाग्य लिखने की बात कर रहे हैं, हो सकता है मैं विश्व का भाग्य लिखूं!’
‘वो
कैसे भई सुमि ?’ मामा जी चौंके।
‘न्यूक्लियर
साइंटिस्ट बन के। क्या पता मैं मुंबई में भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर ज्वाइन कर लूं।
हो सकता है नासा ज्वाइन करूं।’ वह बोली, ‘मैं
इस की तैयारी भी कर रही हूं।’
‘अरे, गजब !’ मामा जी उचक कर बोले, ‘मतलब स्काई इज नॉट अवर लिमिट वाली बात तुम हवा
में नहीं कहती ?’
‘बिलकुल
नहीं।’
‘तो
फिर यू.एस.ए. गए मणि जी के बेटे का क्या होगा ?’ मामा
जी कुछ-कुछ मजाक, कुछ-कुछ गंभीर हो कर बोले।
‘क्या
कह रहे हैं मामा जी।’ सुमि किंचित् शर्माते हुए पर चहक कर बोली, ‘वह तो मेरी स्पेस से जाने कब का गुम हो चुका है
!’
‘क्या
?’
‘तो
क्या मामा जी !’
‘मतलब
नासा ज्वाइन कर मेरी भांजी भी कल्पना चावला जैसी बनेगी !’
‘नहीं
मामा जी !’ वह बोली, ‘कल्पना चावला या कल्पना चावला जैसी
क्यों ?’
‘फिर
?’
‘सुमित्रा
शुक्ला ही क्यों नहीं ?’
‘देखो
बेटा, यह उड़ान बड़ी दूर की है, देरी भी बहुत होगी। फिर तुम्हारी शादी वगैरह की
चिंता में जो तुम्हारे मम्मी-पापा गल रहे हैं उन का क्या होगा?’
‘समझा
लूंगी उन को भी !’ सुमि संजीदा हो कर बोली।
‘तो
क्या सुमि के अंतरिक्ष यानी सुमि के स्पेस में शादी नाम का कोई स्पेस शटल गुजरेगा
भी कि नहीं ?’
‘गुजर
भी सकता है मामा जी !’ वह बोली, ‘पर
मुझे पहले अपना स्पेस तो बना लेने दीजिए !’
इस तरह लगभग-लगभग ‘ऊधो मोहि जोग सिखावन आए’ वाली बात हो गई। दरअसल
सुमि के मामा नोएडा अनायास नहीं सायास आए थे। पर आए यह जताते हुए कि अनायास आए
हैं। उन्हें दरअसल सुमि के मम्मी पापा ने उन्हें यह समझा कर भेजा था कि वह
सुमित्रा के मन की थाह ले लें कि वह शादी के बारे में क्या सोचती है ? सुमि के पापा तो जान गए थे कि सुमि ने अपनी
शादी अपने कॅरियर के साथ कर ली है पर सुमि की मम्मी यह मानने को तैयार नहीं थीं।
परंपरा के मुताबिक वह अब सुमि के हाथ पीले कर देना चाहती थीं। वह जब-तब बड़बड़ाती
भी रहतीं कि, ‘जवान जहान बेटी है कहीं हाथ से निकल गई
तो समाज में क्या मुंह दिखाएंगे ?’ वह
कहतीं, ‘पहले से ही एक बदनामी हो गई है कि
नोएडा, दिल्ली जैसी जगह में अकेली रहती है।’
लेकिन जब भी वह सुमि से शादी की चर्चा करतीं तो वह कहती, ‘अरे मम्मी, अभी
टाइम कहां है ?’
‘चौबीस
साल की हो गई।’ मम्मी कुढ़ती हुई बोलतीं, ‘अब
कब टाइम आएगा ?’
‘जब
आएगा तब बता दूंगी मम्मी !’ वह बड़े प्यार से बोलती।
कुछ दिन बाद मम्मी फिर वही शादी की टेर लेतीं तो सुमि कहती, ‘क्या मम्मी, आप
के पास शादी के अलावा और कोई सब्जेक्ट नहीं है क्या ?’
‘हां, नहीं है।’ वह बोलतीं, ‘मेरे लिए सिर्फ तुम ही नहीं हो, एक और बैठी है।’
‘वह
भी पढ़ तो रही है न ?’
‘मैं
कुछ सुनने वाली नहीं।’ मम्मी कहतीं, ‘शादी
कर लो फिर जा कर ससुराल में और आगे की पढ़ाई करना।’
‘ओह
पापा आप ही मम्मी को समझाइए।’ वह कहती कि, ‘क्या
बताऊं? दुनिया कहां से कहां जा रही है पर
मम्मी के स्पेस में शादी के सिवाय कुछ समाता ही नहीं।’
‘तुम्हारी
मम्मी ठीक कहती हैं बेटी।’ सुमि के पापा कहते, ‘कॅरियर
जरूरी है पर शादी भी जरूरी है !’ कह कर वह मां-बेटी के बीच लगभग असहाय हो जाते। उन
की यह असहायता तब और बढ़ जाती जब कोई पड़ोसी, कोई
रिश्तेदार, कोई मित्र कोई नया किस्सा लिए हाजिर हो
जाता।
वह और डिप्रेस हो जाते !
उस दिन मेहता जी खांसते-खंखारते आए और बोले, ‘शुक्ला जी, अब
तो अजब-गजब हो रहा है !’
‘क्या
हो गया मेहता जी !’ सुमि के पापा ने बड़ी सहजता से पूछा।
‘कुछ
नहीं भइया शुक्ला जी !’ वह खंखारे फिर बोले, ‘अब
जमाना पलट गया है !’
‘हुआ
क्या ?’
‘हुआ
? अरे क्या-क्या नहीं हो गया !’ वह बोले, ‘मामला ऐसे पलटा है गोया आसमान धरती पर आ गया हो
!’
‘पहेलियां
ही बुझाएंगे या कुछ फरमाएंगे भी मेहता जी !’
‘कुछ
नहीं भइया शुक्ला जी, पहले बाप बेटों पर रूल करते थे और अब
बेटे बाप पर रूल करने लगे हैं।’
‘क्या
मतलब ?’
‘अरे
एक किस्सा हो तो बताएं। यहां तो एक साथ तीन-तीन किस्से सामने आ रहे हैं !’ मेहता
जी सस्पेंस बढ़ाते जा रहे थे।
‘मेहता
जी, कुछ बताएंगे भी या सस्पेंस ही क्रिएट
किए रहेंगे !’
‘मेरे
तीन डॉक्टर दोस्त हैं। तीनों अपने-अपने बेटों के चक्कर में गुगली खा रहे हैं।’
‘क्या
मतलब है ?’
‘एक
डॉक्टर, सक्सेना हैं। उन का बेटा अमरीका में
इंजीनियर है। अब शादी करने इंडिया आ रहा है।’
‘यह
तो अच्छी बात है।’ शुक्ला जी सहज होते हुए बोले।
‘हां, अच्छी बात तो है।’ मेहता जी बोले, ‘पर वह लगे हाथ बाप पर एहसान भी कर रहा है और उन
के लाखों रुपए भी बर्बाद कर रहा है।’
‘अच्छा
दहेज नहीं ले रहा होगा।’
‘नहीं
भइया, दहेज-वहेज का तो कोई मसला ही नहीं।
क्यों कि शादी तो वह अपनी ही मर्जी से कर रहा है। वह भी पंडितों में।’
‘तो
फिर ?’
‘उस
की फरमाइश है कि शादी के बाद जो हफ्ता दस रोज यहां रहेगा तो उसे वेस्टर्न स्टाइल
का कमरा, बाथरूम वगैरह चाहिए।’
‘क्यों, अटैच्ड बाथरूम वगैरह तो डॉक्टर साहब के घर में
होगा ही !’
‘है
भइया शुक्ला जी, पर उस में बाथ टब, स्टीम बाथ वाले तामझाम नहीं हैं।’ मेहता जी
बिदकते हुए बोले, ‘सो तोड़-फोड़ मचाए हुए हैं घर में।
क्या तो बेटा हनीमून यहीं मनाएगा। और डॉक्टर साहब इसी में खुश हैं। खुश हैं कि
शादी में चलने ही के लिए सही बेटे ने बाप को पूछ तो लिया।’ मेहता जी बोलते जा रहे
थे, ‘चलो वेस्टर्न बाथरूम चाहिए, अच्छी बात है। पर उस को बनाने के लिए पैसे भी
भेज देता बेटा तो डॉक्टर सक्सेना इस बुढ़ौती में व्यर्थ के खर्च के झमेले से तो बच
जाते !’
‘ये
तो है।’ शुक्ला जी किंचित चिंतित होते हुए भी बोले।
‘पर
क्या करें भइया शुक्ला जी बेटे के बाप ठहरे !’ मेहता जी बोले, ‘और सुनिए डॉक्टर आनंद का किस्सा। बेटे को भेजा
सिंगापुर पढ़ने के लिए। पढ़ने के बाद वहीं दो लाख रुपए महीने की नौकरी करने लगा।
एक दिन अचानक बाप को फोन किया। कहने लगा कि पापा मैं शादी करना चाहता हूं।’
डॉक्टर आनंद बोले, ‘हां, बेटा मैं भी यही सोच रहा हूं। लड़की देख भी रखी
है। आओ देख कर पसंद कर लो। पसंद कर लोगे तो उसी से शादी कर देंगे।’
मेहता जी बोले, ‘जानते
हैं लड़का क्या बोला ?’
‘क्या
बोला ?’
‘बोला
कि पापा लड़की तो मैं ने पसंद कर ली है। फिर डॉक्टर आनंद बोले तो हमें क्यों फोन
किया बेटे ? वह बोला कि पापा यह पूछना था कि शादी
सिंगापुर से करेंगे कि इंडिया से ?’ मेहता
जी बोले, ‘भइया शुक्ला, डॉक्टर साहब बताते हैं कि गुस्सा तो बहुत आया
पर अपने को उन्हों ने काफी कंट्रोल किया और प्रैक्टिकल होते हुए कहा कि बेटा तुम
जहां खुश रहो। तुम कहोगे तो इंडिया से शादी कर लेंगे, तुम कहोगे तो सिंगापुर से शादी कर लेंगे। तुम
को जहां पसंद हो बताओ। हम तैयार मिलेंगे। क्यों कि बेटा तुम्हारी खुशी में ही
हमारी खुशी है।’ तो जानते हैं बेटा क्या बोला? बोला
कि ठीक है पापा, ‘उस से’ डिसकस कर के फिर फोन करूंगा।’
‘उस
से मतलब ?’
‘मतलब
अपनी बिलवेड से डिसकस करने की बात।’ मेहता जी बोले, ‘तो भइया उस ने उस से डिसकस किया और बाप को फोन किया कि पापा ठीक है
हम लोग इंडिया से ही शादी करेंगे। अब ये बताइए कि आप लखनऊ से ही शादी करेंगे कि
बेंगलूर से ?’
‘बेंगलूर
से क्यों ?’
‘अरे
भई लड़की बेंगलूर की है।’
‘अच्छा-अच्छा
!’
‘तो
भइया शुक्ला जी डॉक्टर आनंद फिर सरेंडर कर गए बेटे के आगे और बोले कि बेटा तुम
बेंगलूर से करो, लखनऊ से करो, सिंगापुर से करो चाहे कहीं से करो हम तुम्हारे
साथ हैं। तो लड़का बोला कि ठीक है पापा उस से डिसकस कर के फोन करते हैं।’ मेहता जी
बताते जा रहे थे, ‘हमने डॉक्टर आनंद से पूछा कि इस तरह
बेटे के आगे सरेंडर क्यों कर दिया ? तो
वह कहने लगे कि मेहता जी क्या है कि बच्चों की खुशी में ही अपनी खुशी है। डॉक्टर
साहब कहने लगे कि मेहता जी,
शादी बेटे की ही होनी है और उस ने अपनी
शादी तय कर ली है। ऐसे में अगर मैं विरोध करूं भी, असहमति जताऊं भी तो क्या फायदा ? परिवार
में सिवाय खटास आने के और कुछ नहीं होगा। फिर बेटा जिम्मेदार है, समझदार है, हम
से ज्यादा सेलरी उठा रहा है इसी उम्र में तो उस की बात मान लेने में हर्ज क्या है, ?’ मेहता जी बोले, ‘मैं ने जाति-बिरादरी की बात उठाई तो डॉक्टर साहब बोले, ‘दुनिया ग्लोबलाइज हो गई है। और मैं तो मेडिकल
साइंस जानता हूं। इस सब में भी कुछ नहीं रखा’। और फिर जानते हैं, डॉक्टर आनंद बड़े खुशनसीब निकले। एक दिन बेटे
ने फोन कर के कहा कि, ‘पापा ठीक है हम लोग लखनऊ से ही शादी
करेंगे। आप तारीख़ें वगैरह पक्की कर के हमें बता दीजिए !’ मेहता साहब बोले, ‘डॉक्टर आनंद तो फिर भी खुशनसीब निकले लेकिन
डॉक्टर श्रीवास्तव तो बहुत ही बुरे फंसे।’
‘उन
का क्या हुआ मेहता जी ?’ शुक्ला जी असहज होते हुए बोले।
‘कुछ
नहीं। हुआ तो डॉक्टर आनंद वाला ही, बेटे
के आगे सरेंडर वाला हाल पर जरा ज्यादा शार्ट कट के साथ।’ मेहता जी शुक्ला जी के
बिना पूछे ही चालू रहे, ‘डॉक्टर श्रीवास्तव का बेटा भी डॉक्टर
है। नौकरी लंदन में करता है। पढ़ा यहीं लखनऊ मेडिकल कालेज का ही है। यहीं अपनी एक
बैचमेट से टांकेबाजी कर बैठा था। लड़की इलाहाबाद की थी। दूसरी बिरादरी की थी फिर
भी दोनों के मां-बाप ने मिल कर शादी की तारीख़ें तय कर लीं। नवंबर की कोई तारीख़
तय हुई थी। डॉ. श्रीवास्तव जब मिलते तब ठनकते कि मेहता जी इलाहाबाद बारात में चलने
के लिए तैयार रहिए। मैं भी उन्हीं की टोन में टोन मिलाता हुआ कहता, ‘तैयार हूं भाई पहले बारात ले तो चलिए।’ मेहता
जी बोले, ‘पर अचानक एक दिन देखता क्या हूं कि भरी
दोपहर में डॉक्टर श्रीवास्तव अपने बेटे-बहू को लिए कार से निकल रहे हैं हार फूल
माला से गुंथे हुए। मैं हकबकाया। पूछ बैठा कि सगाई-वगाई कर के आ रहे हैं क्या
डॉक्टर साहब ! वह बोले, ‘नहीं मेहता जी हम तो शादी कर के आ रहे
हैं, इलाहाबाद से।’ मेहता जी बताने लगे, मैं ने शिकायती लहजे में पूछा कि भइया डॉक्टर
साहब हम को बारात में क्यों नहीं ले गए ? तो
डॉक्टर साहब कहने लगे कि कहां मेहता जी ! बारात गई कहां ? कहिए कि हमीं लोग किसी तरह पहुंच गए इलाहाबाद
शादी में, यही बहुत था। मैं ने पूछा क्या मतलब, तो डॉक्टर साहब बोले कि भइया मेहता जी, अचानक बेटे का दो दिन पहले रात में फोन आया कि, ‘पापा मम्मी को ले कर इलाहाबाद पहुंचिए। मैं भी
फ्लाइट पकड़ कर पहुंच रहा हूं। परसों शादी कर रहा हूं।’
‘ऐसा
क्यों किया उस ने ?’ शुक्ला जी ने मेहता जी से सादा-सा सवाल
किया।
‘क्या
तो उस की बिलवेड उस के बिना रह नहीं पा रही थी। उस के पास लंदन जाना चाहती थी और
उस के मां-बाप बिना शादी के भेजने को तैयार नहीं थे।’ मेहता जी बोले।
‘अजब
है !’ कह कर शुक्ला जी ख़ामोश हो गए। मेहता जी भी बताते-बताते थक गए थे। सारा हाल
बता कर उन का पेट भी हल्का हो गया था सो वह शुक्ला जी के घर से चल दिए।
मेहता जी तो चले गए पर अब ड्राइंग रूम में सुमि की मम्मी शुक्ला जी
से जिरह करने के लिए हाजिर हो गईं। शुक्ला जी समझ गए कि अब खै़र नहीं है। सो वह भी
घर से बाहर निकलने की जुगत में लग गए। लेकिन सुमि की मम्मी जो इस बीच चाय पिलाने
के बहाने ड्राइंग रूम में आते जाते मेहता जी की सारी बातें कान लगा कर सुन रही थीं
बोलीं, ‘सुमि के पापा जी कहीं जाइए नहीं।’
‘क्यों
क्या हुआ ?’
‘कुछ
नहीं, सुमि को अभी फोन मिलाइए और शादी के
बारे में बात कीजिए !’
‘अरे, उस को पढ़ाई तो पूरी कर लेने दो !’
‘कुछ
नहीं।’ सुमि की मम्मी बोलीं, ‘मेहता
जी ने जितने किस्से अभी सुनाए हैं, वह
सब बड़े लोगों के बेटे हैं। और फिर बेटे हैं, बेटियां
नहीं !’ वह बोलीं,
‘फिर
हमारी तो बेटी है। कहीं यह भी ऐसी वैसी बात पर अड़ गई तो मैं तो सुमि के पापा जी, जी नहीं पाऊंगी!’ कह कर वह रोने लगीं। सुमि के
पापा उन्हें चुप कराते हुए बोले, ‘रोओ
नहीं। मौका देख कर बात करूंगा।’
‘नहीं
अभी बात करिए !’
‘अरे
कोई लड़का-वड़का देख भी तो लूं।’ वह बोले, ‘कहीं
बात आगे बढ़े तब तो उसे की कनसर्न मांगूं ?’
‘क्या
मांगूं ?’
‘अरे, उस की राय मांगूं ! और क्या ?’ शुक्ला जी बोले, ‘फिर उस की पढ़ाई और कॅरियर की चिंता मुझे भी है। फिर वह जब कह चुकी
है कि एम.सी.ए. के बाद ही शादी करेगी तो क्या बार-बार टोकना ?’
‘आप
तो कुछ समझते ही नहीं।’ वह बोलीं, ‘समझते
ही नहीं कि आप बेटे के नहीं बेटी के बाप हैं। बेटों के बापों से मुकाबला मत करिए।’
‘समझता
हूं भई !’ वह बोले, ‘पर मैं अपनी बेटी की भावनाएं भी समझता
हूं। कह कर शुक्ला जी ने हाथ के इशारे से बता दिया कि बस यह चैप्टर यहीं समाप्त !
लेकिन चैप्टर समाप्त कहां हुआ था ?
कुछ दिन बाद एम.सी.ए. फाइनल का रिजल्ट आ गया था और सुमि का सेलेक्शन
भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर के लिए संभावित था। घर में खुशियों का जैसे खजाना आ गया
था। पर सुमि की मम्मी जी फिर भी सुमि की शादी की चिंता में थीं। सुमि के पापा जी
पर उन का जोर नहीं चल पा रहा था। क्यों कि वह तो बेटी के सफल कॅरियर में ही बहके
हुए थे। हार कर सुमि की मम्मी जी अपने ससुर की शरण में गईं। उन से ही गुहार की कि, ‘अपने बेटे को समझाएं। समझाएं कि कॅरियर लड़कों
का होता है, लड़कियों का नहीं !’
सुमि के बाबा ने बहू की गुहार को गंभीरता से लिया। खानदान की नाक का
सवाल बनाते हुए सुमि के पापा को समझाया-बुझाया। पर सुमि के पापा ने कोई इफ बट किए
बिना अपने पिता के आगे सरेंडर कर दिया और कहा कि आप की भी नातिन है, आप ही सीधे उस से बात करिए। पिता ने अपने
बुढ़ापे का बहाना लिया और कहा कि नई पीढ़ी है, नया
ख़ून है, कहीं तू-तड़ाक कर गई तो इस बुढ़ापे में
तकलीफ होगी। पर सुमि के पापा ने अपने पिता को आश्वस्त किया कि सुमि ऐसी उद्दंड नई
पीढ़ी वाली लड़कियों में से नहीं है, दुनिया
देख रही है; सभ्यता, सलीका जानती है सो बात करने में कोई हर्ज नहीं है।
सुमि के बाबा ने सुमि को समझाने का बीड़ा उठाया। समझाया भी कई-कई
चक्रों में। पर सुमि के कॅरियरस्टिक तर्कों-कुतर्कों में अभी वह उलझे ही थे कि
भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर में न्यूक्लियर साइंटिस्ट के पद पर उस के सेलेक्शन की
ख़बर आ गई। तैयारी शुरू हो गई उसके मुंबई जाने की।
मम्मी की बात,
बाबा की बात, यानी सुमि की शादी की बात धरी की धरी रह गई।
सुमि की मम्मी अब उंगलियों पर उस की उमर जोड़ती सुमि के पापा से जब
तब उस की शादी की बात चलाती हुई कहतीं, ‘बताइए
26-27 बरस की हो गई !’ पर सुमि के पापा
ज्यादातर समय चुप ही रहते। जब ज्यादा होता तो कहते, ‘सुमि की मम्मी, तुम्हारी
ही कोख से पैदा हुई सुमि बदल गई, तुम
भी बदलो।’ वह कहते, ‘जिंदगी का मतलब सिर्फ शादी ही नहीं है।
और फिर 26-27 की उम्र कोई ज्यादा नहीं है ऐसी तेज
और होनहार लड़की के लिए।’ वह जोड़ते, ‘सुमि
अब न्यूक्लियर साइंटिस्ट हो गई है। अपनी जिंदगी की साइंस भी उसे ही तय करने दो !’
सचाई एक यह भी थी कि सुमि के पापा की नजर में सुमि के मैच का कोई
लड़का भी नहीं था। सचाई यह भी थी कि सुमि के मैच के लड़के से शादी करने के लिए
उतने पैसे भी उन के पास नहीं बचे रह गए थे। सुमि की पढ़ाई में पैसे खर्च हुए ही
थे। छोटी बेटी और बेटे की पढ़ाई का खर्च भी बढ़ता जा रहा था। बेटा बीटेक कर रहा था
तो छोटी एम.बी.ए.। सरकार ने भी कोचिंग पर अब रोक लगा दी थी। शादी के लिए पैसा लाते
भी तो शुक्ला जी कहां से लाते ? पर
सुमि की मम्मी की चिंताओं का पार नहीं था। वह बार-बार सुमि की उम्र जोड़तीं और
कहतीं आख़िर बेटी की मां हूं। फिर बतातीं कि इस उमर में तो मैं तीन बच्चों की मां
बन गई थी। मेरे दो बच्चे पढ़ने जाने लगे थे और ये है कि कहती है कि, ‘सॉरी मम्मी, शादी
के बारे में अभी कोई डिसकशन नहीं !’ वह बिलबिलातीं तो सुमि के पापा जैसे
आध्यात्मिक हो जाते, मनोवैज्ञानिक हो जाते। कहते, ‘बताइए बच्चे जब छोटे होते हैं, बोल भी नहीं पाते तब भी बिन कहे मां बच्चों की
बात समझ जाती है। बच्चे को क्या चाहिए जान जाती है।’ वह जैसे जोड़ते, ‘पर वही बच्चे जब बड़े हो जाते हैं और कई बातें
साफ-साफ कहते हैं और वही मां उन की बात नहीं समझ पाती !’
‘मां
का दिल आप मर्द क्या समझें ?’ सुमि
की मम्मी लगभग असहाय हो कर कहतीं और किचेन में घुस कर बरतन खटर-पटर कर पटकने
लगतीं। गोया सारा गुस्सा,
सारा मलाल बर्तनों पर ही उतार देतीं।
ऐसे ही एक रोज किचेन में सुमि की मम्मी खटर-पटर किए पड़ी थीं कि
मेहता जी सपत्नीक आ पहुंचे।
सब का किस्सा सुनाने वाले मेहता जी आज कल खुद किस्सा बने घूम रहे थे।
मेहता जी का मंझला बेटा एम.बी.ए. कर लखनऊ की ही एक प्राइवेट कंपनी
में नौकरी कर रहा था और दफ्तर की ही एक लड़की के चक्कर में पड़ा था। न सिर्फ लड़की
के चक्कर में पड़ा था, खुले आम उस के साथ घूमता था, न सिर्फ घूमता था बल्कि जब तब वह उस के साथ घर
भी आ जाती थी। यहां तक तो ठीक था। पर अब वह उस से शादी करना चाहता था। बिरादरी से
बाहर की होने के बावजूद मेहता जी को तो कोई ख़ास आपत्ति नहीं थी। घुमा फिरा कर वह
लगभग राजी थे पर अपनी पत्नी को राजी नहीं कर पा रहे थे। उन की पत्नी को ऐतराज था
और सख़्त ऐतराज था। यों तो ऐतराज उन के कई थे। पर बड़े ऐतराज दो तीन थे। एक तो यह
कि बिना शादी के ही वह उन के लड़के के साथ घूम रही थी। दूसरे, शादी हुए बिना ही वह ससुराल आने लगी थी और
अकसर। तीसरा ऐतराज और सख़्त था कि वह बिना शादी हुए ससुराल आ जाती थी और उन के
पांव भी नहीं छूती थी। ऐतराज दरअसल यही महत्वपूर्ण था कि वह उन के पांव क्यो नहीं
छूती थी ? डॉक्टर आनंद ने एक बार मजाकवश ऐतराज
जताते हुए पूछा कि, ‘आखि़र वह आप के पांव क्यों छुए ?’
‘मैं
सास हूं उस की !’ मिसेज मेहता बिफरीं, ‘इस
लिए उसे मेरे पांव छूने चाहिए।’ वह बोलीं, ‘बताइए
शादी से पहले ही उस का यह बर्ताव है, मेरी
इस तरह उपेक्षा कर रही है तो शादी के बाद क्या करेगी ?’
‘चलिए
मेहता जी, आप शादी की तैयारी कीजिए !’ डॉक्टर
आनंद मुसकुराते हुए बोले,
‘भाभी जी ने तो
अपने को अभी से उस की सास घोषित कर लिया है तो फिर दिक्कत की कोई बात है नहीं !’
‘क्यों
नहीं दिक्कत है ?’ मिसेज मेहता बिदकीं, ‘दिक्कत ही दिक्कत है!’
‘भाभी
जी आप इतनी खूबसूरत हैं, इतनी यंग दिखती हैं तो हो सकता है वह
आप को अपनी सहेली का दर्जा देते हुए ही आप के पैर न छूती हो !’
डॉक्टर आनंद फिर मजाक पर आ गए।
‘तो
हम को मम्मी जी, मम्मी जी क्यों बोलती है ?’ मिसेज मेहता बोलीं, ‘भाई साहब वह मुझे सहेली नहीं दुश्मन समझती है, मुझे हर्ट करती है, ह्यूमिलिएट करती है!’
‘अच्छा, आप के बेटे को तो प्यार करती है ?’
‘कहीं
प्यार व्यार नहीं करती !’ मिसेज मेहता का वार जारी था, ‘वह तो अपने बाप का दहेज बचाने के लिए मेरे बेटे
को फंसाए पड़ी है।’
‘तो
आप को दहेज भी चाहिए क्या ?’
‘किस
को काटता है दहेज ?’
‘हमें
तो भाई काटता भी है, हर्ट भी करता है और ह्यूमिलिएट भी करता
है यह दहेज लेना!’ डॉक्टर आनंद मिसेज मेहता के वजन में ही बोले, ‘मैंने तो भाई अपने बेटे की शादी में दहेज-वहेज
जैसी कोई बात चलाई भी नहीं।’
‘आप
क्या दहेज की बात चलाते जब शादी आप के बेटे ने खुद तय कर ली !’
‘नहीं
भाभी जी, आप यहां गलत बोल रही हैं।’ डॉक्टर आनंद
बोले, ‘मेहता जी जानते हैं कि मैं भी जहां
बेटे की शादी की बात चला रहा था, विद
आउट लेन-देन चला रहा था।’ डॉक्टर आनंद बोले, ‘क्यों
मेहता जी ?’
‘हां, भई डॉक्टर आनंद सही बोल रहे हैं।’ मेहता जी बोले, ‘बच्चों की खुशी में ही हम सब की खुशी है, इस लिए तुम भी जिद छोड़ो, मान जाओ !’
‘कैसे
मान जाऊं ?’
‘मान
जाइए भाभी जी !’ डॉक्टर आनंद बोले, ‘नहीं
कहीं बेटा आप लोगों की मर्जी के बगैर शादी कर लेगा तो क्या पोजीशन बनेगी आप लोगों
की?’ वह बोले, ‘जमाना बदल गया है भाभी जी, आप
भी अब बदलिए !’
लेकिन मिसेज मेहता नहीं बदलने से बाज नहीं आ रही थीं, लोगों और खुद मेहता जी के लाख समझाने पर भी मान
नहीं रही थीं और उन की होने वाली बहू भी उन के पांव नहीं छू रही थी सो बात अटकती
जा रही थी।
ख़ैर, मिसेज मेहता जब मेहता जी के साथ शुक्ला
जी के घर आईं तो शुक्ला जी के घर भी सुमि की शादी पुराण का पाठ सुमि की मम्मी और
बाबा चला रहे थे। सुमि के पापा को हाजिर नाजिर मान कर !
और सुमि ?
सुमि तो मुंबई में भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर में बैठी एक और सपना
बुनने में लग गई थी। नासा ज्वाइन करने का सपना।
पर यहां शुक्ला जी के ड्राइंग रूम में सुमि की मम्मी के सपने टूट रहे
थे। उन को लग रहा था कि अब वह सुमि का कन्यादान नहीं कर पाएंगी। अपने ससुर से इस
चर्चा में लगी पड़ी थीं कि मिसेज मेहता और मेहता जी आ पड़े और साथ ही अपनी समस्या
भी इस चर्चा में नत्थी कर बैठे। पूछ बैठे सुमि के बाबा जी से कि, ‘पंडित जी आप बुजुर्ग हैं, अनुभवी हैं, आप
ही कुछ निदान सुझाइए ! बताइए कि बच्चों को कैसे रास्ते पर लाया जाए कि वह मां-बाप
की इच्छा का भी सम्मान करना सीखें।’
लेकिन सुमि के बाबा जी ने अपनी इस तीसरी पीढ़ी के कॅरियर, प्रेम और लंपटई का निदान ढूंढ पाने में अपने को
अक्षम बता दिया। पर हां, एक नई स्थापना भी वह दे बैठे। बोले, ‘सब इंगलिश मीडियम की पढ़ाई का कसूर है। बच्चों
के बिगड़ने की जड़ में अगर कोई है तो वह है इंगलिश मीडियम की पढ़ाई, इंगलिश मीडियम का खाना, इंगलिश मीडियम का कल्चर और इंगलिश मीडियम का
रहन-सहन।’ वह कहने लगे, ‘जब तक यह इंगलिश मीडियम रहेगा, बच्चे नहीं सुधरेंगे। किसी के भी बच्चे !’
पर इस पूरे प्रसंग में शुक्ला जी चुप ही रहे।
लेकिन सुमि का कॅरियर चुप नहीं था। नासा में उस के जाने की संभावनाएं
शहर के कई हलकों में चर्चा का सबब बन चली थीं। शुक्ला जी के कॉलेज में भी यह चर्चा
चलती। तमाम साथी अध्यापक उन्हें रश्क से देखते तो कुछ जलन के साथ भी देखते, पर तमाम विद्यार्थी सम्मान के भाव से जब उन्हें
देखते तो उन का माथा और ऊंचा हो जाता। और याद आता अपनी बेटी सुमि द्वारा जब तब
गाया जाने वाला वह गाना। जब वह टीन एज थी और बाल सुलभ ठुमके के साथ गाती थी, ‘दिल है छोटा-सा, छोटी-सी आशा,
मस्ती भरे मन में, भोली-सी आशा, चांद तारों को छूने की आशा, आसमानों
में उड़ने की आशा !’
सुमि जब यह फिल्मी गाना गाती थी तब शुक्ला जी उस के मन की गहराई की
थाह नहीं लगा पाए थे, नहीं जान पाए थे कि उन की यह भोली-सी
बेटी, भोली-सी आशा लिए सचमुच आसमान में उड़ने
की आशा बांध रही है, अपने पैरों को तौल रही है। क्यों कि वह
तो तब अपनी बाल सुलभ ठुमके के साथ ‘कुचि-कुचि रकमा!’ भी गाती और गाते-गाते पढ़ने
बैठ जाती। बोलती, ‘बाप रे, बड़ा होमवर्क है और इतने सारे चैप्टर रिवाइज करने हैं !’
और आज सचमुच वह आसमान में उड़ने के लिए छलांग तो लगा ही चुकी है। वह
सोचते। वह यह भी सोचते कि क्या उन की सुमि भी कल्पना चावला के टक्कर की या उस से
आगे की साइंटिस्ट बन सकेगी ?
यह और ऐसे कई सवाल खुद से ही करते और सुलगते रहते भीतर ही भीतर।
सुमि को ले कर सुलगने वाले समाज में और भी बहुतेरे थे। शुक्ला जी के
कॉलेज का स्टाफ, रिश्तेदार, जान-पहचान और मुहल्ले के लोग। लफंगे और शोहदे
टाइप के लोग भी! किसिम-किसिम के कमेंट्स !
ज्यादातर कमेंट्स सुमि के अविवाहित रह जाने को ले कर होते। कोई कहता, ‘मुंबई में तो भइया बिन शादी ब्याह के भी औरतें
मर्दां के साथ रहती हैं।’ कोई कहता, ‘साइंटिस्टों
की दुनिया वैसे भी परदे में रहती है। भीतर-भीतर पता नहीं क्या-क्या हो जाता है !’
तो कोई सुमि के नासा जाने की संभावना टटोलता हुआ बोलता, ‘बंध जाएगी किसी अंग्रेज के गले ! इंडियन मर्द
तो उस के नसीब में रहा नहीं।’ तरह-तरह की अभद्र और अश्लील टिप्पणियां कभी छन-छन कर
तो कभी किसी बरतन की तरह छमक कर शुक्ला जी के कानों और आंखों से दिल में घाव करती
रहतीं। पर बेटी सुमि के कॅरियर की चमक एंटीबायटिक बन कर उन के घावों को सुखाती
रहती !
वह सोचते कि अगर सुमि बेटी नहीं बेटा होती तो क्या तब भी ऐसी ही
टिप्पणियां, ऐसी ही अश्लील, अभद्र टिप्पणियां फिर भी लोग करते ? फिर वह सोचते कि काश सुमि बेटी नहीं, बेटा होती। लेकिन फिर दूसरे ही क्षण वह सोचते
कि बेटी होते हुए भी जो कॅरियर की उछाल सुमि ने ली है, समाज में जो उन का मस्तक ऊंचा किया है, क्या पता कल्पना चावला की तरह देश का मस्तक भी
ऊंचा करे ! बेटी हो कर भी जो मन को संतोष दिया है सुमि ने, जो नाम रोशन किया है सुमि ने, इस निम्न मध्यवर्गीय बाप की बेटी ने, यह कोई बेटा भी भला कर पाता ? नहीं, यह
सुमि ही कर सकती है, सिर्फ उन की बेटी सुमित्रा ही कर सकती
है !
शुक्ला जी आश्वस्त हो जाते यह सब अकेले-अकेले ही सोच कर।
लेकिन एक दिन सुमि का फोन आया तो वह टूट से गए। कुछ देर पहले ही किसी
ने कमेंट किया था कि वह बेटी की कमाई खा रहे हैं, इसी लिए उस की शादी नहीं कर रहे। वह इस घाव को अभी सुखा ही रहे थे कि
सुमि का फोन आ गया। रो पड़े वह फोन पर ही। बोले, ‘बेटी मैं टूट गया हूं। मुझे संभालो !’
‘क्या
हुआ पापा।’ उधर से सुमि घबराई। शुक्ला जी कुछ बोल नहीं पाए।
‘क्या
हुआ पापा !’
‘कुछ
नहीं बेटी मैं टूट गया हूं।’ वह बोले, ‘मैं
बिलकुल अकेला पड़ गया हूं। तुम नहीं समझतीं कि क्या-क्या ताने सुनने पड़ते हैं !’
‘एबाउट
माई मैरिज न पापा !’
‘हां, बेटी !’ वह रुंधे गले से ही बोले, ‘अब तो लोग कहने लगे हैं कि मैं बेटी की कमाई खा
रहा हूं इस लिए उस की शादी नहीं कर रहा हूं। अब बोलो बेटी मैं क्या करूं ?’
‘पापा
आप मेरे साथ तो हैं ना ?’
सुमि बोली, ‘आप ही टूट जाएंगे तो सोचिए मेरा क्या होगा ?’ कहते-कहते सुमि भी रो पड़ी। बोली, ‘पापा एक आप ही तो हैं जो मेरे साथ हैं। आप ही
के भरोसे से तो मैं इतना आगे आ पाई हूं।’ वह बोली, ‘थोड़ा-सा और मुझ पर ट्रस्ट कर लीजिए ! और फिर पापा मैं आप के साथ हूं
! प्लीज पापा ! प्लीज !’
‘ठीक
है सुमि मैं तुम्हारे साथ हूं।’ वह बोले, ‘पर
बेटी, मेरा भी ध्यान रखना। मुझे नासा ज्वाइन
करने अमरीका नहीं जाना, इसी समाज में रहना है। यह भी ध्यान
रखना बेटा कि तुम्हारी स्पेस अब और है, हमारी
स्पेस और !’
‘नो
पापा, आप के बिना मेरी कोई स्पेस नहीं है !’
वह बोली, ‘जो स्पेस मैं ने बनाई है, वह आप को ले कर ही बनाई है। फिर पापा हम यहां
जो न्यूक्लियर साइंटिस्ट बने हैं तो ह्यूमन सोसाइटी की बेहतरी ही के लिए। फिर आप
तो मेरी रीढ़ हैं पापा ! बस थोड़ा-सा अपने को संभालिए, मुझ पर ट्रस्ट कीजिए। और लोगों का क्या है ? उन की बातों पर कान ही मत दीजिए !’
‘ओ.
के. बेटा, तुम अपना ध्यान रखना !’ कह कर शुक्ला
जी ने बात ख़तम कर दी।
पर बात ख़तम सचमुच में नहीं हुई थी।
सुमि की मम्मी फिर से उस के मामा को उस के पास मुंबई भेजने की तैयारी
में लग गईं कि वह जा कर उसे फिर से समझाएं। समझाएं कि शादी-वादी कर के अपनी
गृहस्थी बसाए। नहीं उमर जब निकल जाएगी तो ये साइंस-फाइंस किसी काम नहीं आने वाली।
मामा जी गए मुंबई !
सुमि देखते ही समझ गई। मुसकुराई और बोली, ‘फिर ऊधो मोहि जोग सिखावन आए !’
‘क्या
सुमि ?’ मामा जी बोले, ‘तुम तो बस आते ही शुरू हो गईं।’
‘क्या
?’
‘अरे, आते ही तो सारा पोल मत खोलो !’
‘अच्छा, अच्छा ! सॉरी, वेरी सॉरी !’
शाम को बैठे मामा जी सुमि के साथ और बोले, ‘‘बेटी अब तो तुम्हारा स्ट्रगल ख़त्म हो गया ! अब
क्या दिक्कत है ?’
‘स्ट्रगल
ख़त्म हो गया ?’ सुमि चौंकी। बोली, ‘मामा जी स्ट्रगल तो अब शुरू हुआ है।’
‘क्या
?’ अब मामा जी चौंके। बोले, ‘तो इस के पहले क्या कर रही थी?’
‘वो
स्ट्रगल के पहले के स्टेप्स थे।’
‘क्या
?’
‘हां, मामा जी !’ वह बोली, ‘आप की तरह लखनऊ में सचिवालय की फाइलें नहीं
निपटानी हैं यहां। न ही पापा की तरह लेक्चर ख़त्म कर घर जाने की छुट्टी होती है
यहां।’ वह बोली, ‘एक-एक डिटेल्स पर यहां सालों खपाना
पड़ता है फिर भी कुछ हासिल होगा ही, कोई
गारंटी नहीं !’
‘खै़र, छोड़ो यह सब और मेन प्वाइंट पर आओ !’
‘मामा
जी, आप पापा जी से क्यों नहीं कुछ बात करते
?’ वह बोली, ‘उन
की अंडरस्टैंडिंग को क्यों नहीं आब्जर्व करते ?’
‘इस
लिए सुमि कि मैं तुम्हारी मम्मी का छोटा भाई हूं पति नहीं।’ वह बोले, ‘और तुम्हारी मम्मी मुझे आज भी चपत लगा सकती
हैं।’
‘वह
चपत तो मैं भी खा सकती हूं मम्मी की।’ वह बोली, ‘लेकिन
मामा जी थोड़ा-सा समय और दे दीजिए न ! और मम्मी को भी समझाइए प्लीज !’
सुमि की इस प्लीज के आगे मामा जी टिक नहीं पाए।
बैरंग लौट आए मुंबई से मामा जी !
पर शहर में कुछ गलियों, कुछ
सड़कों, कुछ ड्राइंग रूमों का रंग अभी भी सुमि
की चर्चाओं में खिला हुआ है। कोई उस की तारीफ में कसीदे पढ़ता है तो कोई अश्लील और
अभद्र फब्तियां कसता है तो कोई सुमि के बाप शुक्ला जी को लानतें भेजता है !
पर सुमि के स्पेस में अब यह सब कुछ पहुंचने से रह जाता है। हर बार उस
के स्पेस की स्ट्रगल डेनसिटी से यह सब अनायास ‘स्लिप’ हो जाता है !
और सुमि के पापा शुक्ला जी ?
शुक्ला जी की दूसरी बेटी एम.बी.ए. करने के बाद अब दिल्ली में एक
मल्टी नेशनल कंपनी ज्वाइन कर चुकी है। वह अब उस को सेटिल्ड कराने में लग गए हैं।
तरह-तरह के आरोपों टिप्पणियों से बेपरवाह हो चले हैं वह !
हां, सुमि के स्पेस में अपनी बहन को इनकरेज
करने की स्पेस जरूर शेष है वह स्लिप नहीं होती।
-27-
हवाई पट्टी के हवा सिंह
दूसरे महायुद्ध के समय बनी यह हवाई पट्टी आठ लोगों की जान की इस क़दर
दुश्मन हो जाएगी, यह उसे क्या, किसी भी को नहीं मालूम था। लग रहा था कि जान अब
गई कि तब गई। बस जहाज के उस जीप से टकरा जाने भर की देर थी। दोनों पायलट लगातार एक
साथ गालियां और भगवान, दोनों उच्चारते जा रहे थे। सुबह का समय
था। लग रहा था गांव के सारे लोग हवाई पट्टी पर ही बसने आ गए हों।
या कि कोई मेला लगा हो, सब
लोग मेला देखने आ गए हों। उसने और भी हवाई पट्टी और हवाई अड्डे देखे थे। पर ऐसी
हवाई पट्टी भगवान न किसी को दिखाए। उसने बिहार में बन रही नई सड़कों पर खलिहान
होते देखा था। हाइवे पर हेलीकाप्टर उतरते देखा था। पर यहां तो हवाई पट्टी पर उपले
पाथे जा रहे थे। न सि़र्फ पाथे जा रहे थे उनके ढेर के ढेर लगे हुए थे। चारपाइयां
बिछी हुई थीं। साइकिल, मोटर साइकिल और जीप ऐसे चल रही थीं
गोया हवाई पट्टी नहीं सड़क हो। लोग ऐसे टिके-बसे पड़े थे वहां जैसे वह हवाई पट्टी
नहीं धर्मशाला हो! ग़नीमत कि कोई झोपड़ी या घर नहीं बना था। यह सारा दृश्य देख कर
पायलट ने जहाज में बैठे नेता जी से कहा कि, ‘वापस
लखनऊ चलते हैं। यहां लैंड करना जान जोखिम में डालना है।’
‘कहीं
कुछ नहीं।’ नेता जी बोले,
‘जुगाड़ बना कर
किसी तरह उतारो।’
‘क्या?’ पायलट चीख़ा।
‘अरे
लैंड करो!’ नेता जी भी चीखे़।
‘चलिए
देखते हैं।’ पायलट अबकी चीख़ा नहीं।
लेकिन नीचे वह क्या सभी देख रहे थे कि भीड़ बढ़ती जा रही थी। लोग
दौड़-दौड़ कर हवाई पट्टी पर आ रहे थे। औरत, बच्चे, बूढ़े जवान सब के सब। हवाई पट्टी के चारों ओर
फैले गेहूं के खेतों में भी लोग ही लोग थे। जो हवाई पट्टी की तरफ बढ़े आ रहे थे।
यह नज़ारा देख कर पायलट फिर बुदबुदाया, ‘मुश्किल
है सर।’
‘चाह
लो तो सब आसान है, न चाहो तो सब मुश्किल है।’ नेता जी
बोले, ‘यह प्रेस पार्टी अगर समय पर
मुख्यमंत्री जी के कवरेज में नहीं पहुंची तो समझ लो कि पेमेंट भी तुम्हारा फंस
जाएगा। लाखों रुपए तुम्हारी कंपनी के फंसेंगे और हमारी तो जो फज़ीहत होगी सो होगी
ही।’
‘ओ.के.
सर!’ पेमेंट की बात पर पायलट थोड़ा चिंतित हुआ और सेफ़ लैंडिंग की जुगत में लग
गया। फिर भी बोला, ‘सर यह हेलीकाप्टर नहीं प्लेन है।’
‘तो
प्लेन जगह देख कर ही प्लेन को लैंड करो।’
‘ओ.के.
सर !’ पायलट बोला, ‘आई ट्राई माय बेस्ट !’
‘नहीं
भाई, जान जोखिम में मत डालो।’ देवेंद्र बोला, ‘जान देकर मुख्यमंत्री को कवर करने का शौक़ नहीं
है हम लोगों को। ख़बर लिखने आए हैं, ख़बर
बनने नहीं।’
‘ओ.के.
सर! ओ.के. सर!’ पायलट थोड़ा रिलैक्स हो कर बोला।
नेता जी ने हाथ जोड़ कर होठों पर उंगली रख कर देवेंद्र से चुप रहने
का अनुरोध किया। देवेंद्र चुप हो गया।
पायलट प्लेन को उस हवाई पट्टी से कम से कम पचास क़िलोमीटर दूर उड़ा
कर ले गया। हवाई पट्टी पर उपस्थित जनता को यह एहसास कराने के लिए कि जहाज अब यहां
नहीं उतरेगा। जहाज तो गया! फिर कोई पांच सात मिनट प्लेन को पायलट यूं ही इधर-उधर
उड़ाता रहा। दूसरा पायलट नक्शे पर कंपास घुमाता देखता रहा। फिर अचानक पायलट प्लेन
को फिर उस हवाई पट्टी के पूर्वी छोर पर ले आया और ख़ूब नीचे तक ले आकर लगातार यों
मंडराता रहा गोया बस अब वहां उतरने वाला हो! सारी की सारी जनता वहीं बटुर आई।
टकाटक ऊपर ताकती हुई। पायलट मसखरी पर उतर आया। नेता जी से मुसकुराते हुए नीचे
देखता हुआ बोला, ‘उतार दूं सर यहीं पर!‘
‘अरे
नहीं। सारी पब्लिक हमें उतरते ही मार डालेगी। अगर एक को भी खरोंच लगी तो!’
‘अच्छा
तो आप को लग रहा है कि आप प्लेन नहीं कार में हैं कि पब्लिक खरोंच लगने पर आप को
मार डालेगी?’ रोमी बोला, ‘अरे हुजूर, यह
प्लेन है। यहां जो लैंड कर गया प्लेन तो पहले प्लेन के परखचे उड़ेंगे, हमारी, आप
की चटनी बनेगी, जहाज में आग लगेगी, फिर हम सब ईंट की तरह उस में पकेंगे। और ये
बेचारे तो जाने कहां होंगे।!’
‘तो?’ नेता जी घबराए।
‘अरे
ऐसा कुछ नहीं होगा सर! आप बिलकुल मत घबराएं।’ एक पायलट ने फिर आश्वस्त किया। बोला, ‘अभी तो पब्लिक का मज़ा लीजिए।’ कह कर पायलट
सचमुच प्लेन को बिलकुल एयर फ़ोर्स के किसी लड़ाकू विमान की तरह कलाइयां खिलाते हुए
लगातार हवाई पट्टी के पूर्वी छोर पर बिलकुल नीचे तक लगातार घुमाता रहा। गोल-गोल।
गोल-गोल घुमाते हुए अचानक उस ने फर्राटा भरा, थोड़ा
ऊपर गया और हवाई पट्टी के पश्चिमी छोर पर जहां सिवाय उपले और चारपाइयों के कुछ
नहीं था, जहाज को अचानक लैंड कर दिया। अब जहाज
रनवे पर बेतहाशा दौड़ रहा था। अपनी पूरी स्पीड के साथ। दूर-दूर तक ख़ाली थी हवाई
पट्टी। सारा जन सैलाब पूर्वी छोर पर था। पायलट अपनी डिप्लोमेसी और पायलटी के
अंदाज़ पर मन ही मन मगन होता हुआ नेता जी को इंगित कर बोला, ‘सर अब तो आपको चीफ़ मिनिस्टर साहब फज़ीहत नहीं
करेंगे?’
‘नहीं
भई। अब तो ठीक है!’ नेता जी बोले।
‘अरे
बाप रे!’ पायलट अचानक खूब ज़ोर से चीख़ा।
‘अब
क्या हुआ?’ नेता जी घबराए।
‘वह
देखिए।’ पायलट ने बाईं तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘साला
खुद भी मरेगा, हम लोगों को भी मारेगा।’
सबका जी धक से रहा गया।
एक जीप प्लेन के समानांतर हवाई पट्टी पर दौड़ रही थी। न सिर्फ़ दौड़
रही थी प्लेन से बाक़ायदा होड़ किए हुए लगातार आगे बढ़ने की कोशिश कर रही थी। बिना
ख़तरे की परवाह किए। जीप का ड्राइवर न सिर्फ़ प्लेन से होड़ किए था बल्कि पायलट को
लगातार ललकारता चल रहा था जैसे देखें कि, कैसे
हम से आगे जा पाते हो, देखें तो भला? वह एक हाथ से स्टेयरिंग संभाले दूसरे हाथ से
इशारों-इशारों में लगातार ललकार रहा था।
‘अगर
कहीं आगे से मोड़ कर सामने आ गया या बगल में ही कहीं से टकरा गया तो समझिए प्रलय
है सर।’ जीप वाले को इंगित करते हुए पायलट बौखला कर बोला।
‘तो
उसको हाथ के इशारे से तुम भी रोको।’ नेता जी बोले, ‘रुकने को कहो।’
‘सर
यह जीप नहीं प्लेन है!’ पायलट हड़बड़ाता हुआ चीख़ा, ‘कि उस की तरह हाथ बाहर निकाल कर इशारे करूं!’
प्लेन और जीप की समानांतर दौड़ जारी थी। और सब की जान सांसत में।
‘बस
सर ईश्वर से प्रार्थना कीजिए सभी लोग।’ पायलट हड़बड़ी में चीख़ा। सामने दूर से
भीड़ भी पास आती दिख रही थी।
सबके हाथ पांव फूल गए। सबने आंख मूंदी और हाथ जोड़ लिए। देवेंद्र ने
देखा अपने को वामपंथी शो करने वाले कामरेड चंद्रशेखर ने भी आंख मूंदी, हाथ जोड़ा और ज़ोर-ज़ोर से हनुमान चालीसा का
पाठ करने लगा। तो विनय महामृत्युंजय के मंत्र पढ़ने लगा। देवेंद्र और बाक़ी साथी
आंख बंद कर निःशब्द बैठ गए। चंद्रशेखर का हड़बड़ाया हुआ हनुमान चालीसा पाठ देख कर
एक क्षण के लिए देवेंद्र को हंसी आ गई। पर मृत्यु की कल्पना करते ही वह भी संयत हो
कर आंख मूंद कर ईश्वर को याद करता बैठा रहा।
अचानक प्लेन एक झटके के साथ रुक गया। पायलट ने इमरजेंसी ब्रेक लगाया
था। प्लेन रुकते ही दोनों पायलटों ने एक साथ हाथ जोड़ कर ईश्वर को धन्यवाद दिया।
बोले, ‘थैंक गॉड!’
पर सामने दौड़ती आती हुई भीड़ थी। दोनों पायलट फिर बोले, ‘ओह गॉड!’
‘क्या
सर सिक्योरिटी के लिए नहीं कहा था एडमिनिस्ट्रेशन से?’ नेता जी को इंगित करते हुए एक पायलट ने कहा।
‘क्या
पता?’ नेता जी आती भीड़ देख कर खुश होते हुए
बोले, ‘पार्टी आफ़िस वालों ने कहा तो होगा।’
‘कहा
होता तो कम से कम दो सिपाही तो नज़र आते यहां।’ एक पायलट घबराते हुए बोला, ‘प्लेन तो हमने संभाल लिया। सेफ लैंडिंग करवा दी
पर अब यह भीड़ कौन संभालेगा?’
‘मैं
संभालता हूं।’ नेता जी दहाड़ कर बोले, ‘फाटक
खोलो।’
‘क्या
बताऊं हेलीकाप्टर होता तो फ़ौरन टेक आफ़ कर लेता। अब यह प्लेन है, टेक आफ़ के लिए रन ज़रूरी है। रन कैसे हो इस
भीड़ के आगे?’
‘भीड़
से तुम लोगों को परेशानी क्या है?’ नेता
जी ठनके।
‘अरे
यह भीड़ प्लेन के एक-एक पुर्जे उठा ले जाएगी। किस-किस को रोकेंगे आप?’ पायलट बोला, ‘अब
आप लोगों की ज़िम्मेदारी है कि सभी लोग मिल कर भीड़ संभालिए। प्लीज़ प्लेन के पास
किसी को आने मत दीजिएगा।’
‘यह
कैसे संभव है?’ देवेंद्र बोला।
‘यही
तो - यही तो!’ एक पायलट बड़े अफ़सोस के साथ बोला। साथ ही उसने प्लेन का फाटक खोल
दिया और कहा, ‘फिर भी देखिए जो बन सके।’
फिर, एक एक कर सब लोग प्लेन से उतरे। और
दोनों पायलट समेत आठों लोग प्लेन को चारों ओर से घेर कर हाथ जोड़े हुए खड़े हो गए।
फिर देवेंद्र ने देखा कि भीड़ तो चारों तरफ से आ रही थी। कुछ लोग साइकिल, मोटर साइकिल और स्कूटर पर भी थे। वह जीप वाला
भी अपनी जीप ले कर पास तक आ गया था। मूछों पर ताव देता उस का ड्राइवर बिलकुल
विजेता मुस्कान लिए खड़ा था। उधर भीड़ थी कि पास आती जा रही थी।
हम सभी असहाय खड़े थे। हाथ जोड़े। रोमी ने चंद्रशेखर को छेड़ते हुए
कहा, ‘कामरेड!’
‘हां, बोलो!’ चंद्रशेखर बेफिक्री से बोला।
‘कुछ
नहीं कामरेड अपना हनुमान चालीसा एक बार फिर शुरू कर दो!’ रोमी बोला।
‘क्या
बेवकूफी की बात करते हो!’ चंद्रशेखर बिदक गया।
‘नहीं
तब जान बचाई थी, अब जहाज बचाओ।’
‘चलो
पहले भीड़ फेस करो!’ चंद्रशेखर गंभीर हो कर बोला।
लेकिन भीड़ का पहला जत्था आ चुका था। यह भीड़ थोड़ी शरीफ थी। हाथ
जोड़ने भर से मान गई थी। और थोड़ी दूर पर खड़ी हो कर बड़े रश्क से जहाज को देखने
का सुख लेने लगी। एक लड़का अपनी साइकिल पर बैठे-बैठे ही दूसरे लड़के से बोला, ‘ई तो बहुत छोटा जहाज है। इस से बड़ा-बड़ा जहाज
तो हम लखनऊ के अमौसी हवाई अड्डा पर देख चुका हूँ।’
‘एतना
नज़दीक से?’ दूसरे लड़के ने अपनी साइकिल पर टेक ले
कर खड़े होते हुए पूछा।
‘हां, एतना नज़दीक से तो नहीं।’ वह ज़रा रुका और बोला, ‘पर लखनऊ के चिड़िया घर में खड़े जहाज में तो
अंदर भी गया हूँ। वो भी इस से बड़ा है।’
‘वो
उड़ता भी है क्या?’ उस लड़के ने फिर पूछा।
‘हां, उड़ता तो नहीं है।’
‘पर
यह तो उड़ता है। वह बोला,
‘असल में तो ई
नेता वाला जहाज है।’
‘तुम
को कैसे पता?’
‘एक
बार और एक नेता ऐसे ही जहाज में कई साल पहले यहां आए थे। वो क्या नाम था?’ वह जैसे याद करते हुए बोला, ‘हां कांशीराम।’
‘अच्छा?’ बड़े कौतूहल से पहले वाले से पूछा।
‘हां, पर तब फ़ोर्स बहुत थी। पूरी हवाई पट्टी चारों
तरफ से फ़ोर्स घेरे हुए थी। कोई नज़दीक नहीं आ पाया था। बल्कि कुछ लोगों की पुलिस
वालों ने पिटाई भी कर दी थी। बस सब दूर-दूर से देखते रहे।’
‘पर
अब की तो फ़ोर्स नहीं आई है।’
‘क्या
पता आ रही हो।’ वह बोला,
‘जहाज पहले आ गई, फ़ोर्स लेट हो गई हो!’
‘हो
सकता है।’ मुंह पिचकाते हुए दूसरा बोला।
भीड़ बढ़ती और पसरती जा रही थी। सौ से अधिक लोग हो गए थे। इन के आगे
आठ लोगों का हाथ जोड़ कर मना करना बेमानी हो गया था। अब लोग प्लेन को न सिर्फ़
क़रीब से बल्कि बड़े कौतूहल से छू-छू कर देख रहे थे। कोई प्लेन की बाडी छू रहा था, कोई पहिए, तो
कोई उस के डैनों को लपक कर छू लेना चाहता था।
दोनों पायलटों की सांस ऊपर नीचे हो रही थी। होश गुम थे।
रोमी लोगों को मना करने के चक्कर में दो बार पिटते-पिटते बचा था।
चंद्रशेखर किनारे जा कर अख़बार बिछा कर बैठ गया था। किसी से कुछ कहना, या मना करना दीवार में सिर मारने के बराबर हो
गया था। एक शोहदा टाइप लड़का प्लेन के अंदर घुसने के जुगाड़ में था। देवेंद्र से
वह कह रहा था, ‘अंदर से भी देखना है!’ बिलकुल
धौंसियाने के अंदाज़ में। देवेंद्र ने हाथ जोड़ कर पायलट की ओर इंगित किया। वह
लड़का पायलट से भी पूरी दबंगई से बोला, ‘अदर
से भी देखना है।’
उसके साथ दो लड़के और आ जुड़े थे। लग रहा था कि पायलट ने अगर ग़लती
से भी इंकार कर दिया तो पिट ज़रूर जाएगा। अजब हौच-पौच मचा हुआ था। हालत यह थी कि
अगर कोई भी किसी को रोके तो उस का पिट जाना तय था। और संभव था कि पूरी भीड़ उसे
पीटने लग जाती। लेकिन पायलट होशियार था। लोगों का मनोविज्ञान वह भी पढ़ रहा था। तो
जब उस शोहदे टाइप लड़के ने अपनी ख्वाहिश फिर से दुहराई और पूरी दबंगई से कि, ‘अंदर से भी देखना है।’ तो पायलट ने तुरंत
फुर्ती दिखाई। हाथ जोड़ कर बोला, ‘हां, भइया बिलकुल!’ और उस ने जोड़ा, ‘आइए!’ फिर लड़के को ले कर प्लेन के गेट की तरफ
पूरी मस्ती से चला। देवेंद्र हैरत में पड़ गया उस पायलट की मस्ती को देख कर। वह भी
इस तनाव में। वह कुछ अनिष्ट की चिंता में पड़ गया। लेकिन वह पायलट तो उन लड़कों को
ले कर प्लेन के गेट तक गया और अचानक ठिठक कर रुक गया। शोहदों की अगुवाई कर रहे लड़के
के कंधे पर हाथ रख कर बाक़ी लड़कों से भी वह पायलट मुखातिब हुआ, ‘भइया आप सब तो पढ़े लिखे लोग दिखते हैं।’
‘हां, हां बिलकुल!’ सभी लड़के लगभग एक सुर में बोले।
‘चलिए
यह तो बहुत अच्छी बात है।’ पायलट बोला, ‘यह
हम लोगों का बड़ा भारी सौभाग्य है भइया कि आप पढ़े लिखे लोग मिल गए।’
‘वो
तो है।’ एक लड़का अकुलाते हुए बोला, ‘पर
अंदर तो ले चलो!’
‘हां, भइया ले तो चलते हैं। पर एक समस्या है।’ पायलट
ज़रा रुका और अंदाज़ा लगाया कि उस का दांव सही पड़ा है या नहीं। और जब उस को लगा
कि वह सही जा रहा है तो बोला, ‘समस्या
यह है कि अभी आप को अंदर ले तो चलता हूं।’ वह फिर ज़रा रुका और भीड़ की तरफ हाथ
दिखाते हुए बोला, ‘पर जो कहीं पीछे-पीछे सारी जनता
जनार्दन भी आ गई जहाज के अंदर तो हम आप तो फंस ही जाएंगे, प्लेन को भी कहीं नुकसान पहुंच गया, चरमरा गया, आग
लग जाए या कुछ और हो जाए। अंदर जा कर कौन क्या कर दे, कौन जानता है?’ वह धीरे से बोला, ‘आप
लोग तो पढ़े लिखे हैं और ज़िम्मेदार भी दीखते हैं। तो आप लोग तो कुछ गड़बड़ नहीं
करेंगे। पर ये जनता जनार्दन! किस-किस को और क्या-क्या रोकेंगे?’
‘ये
तो है!’ लड़का चिंतित हुआ।
‘तो
भइया ऐसा करिए कि आप लोग थोड़ी ज़िम्मेदारी संभाल लीजिए।’ पायलट बोला, ‘भीड़ को थोड़ा जहाज से दूर करवाने में हम लोगों
की मदद कीजिए।’ पायलट बोला,
‘आप लोग लोकल हैं
और ज़िम्मेदार भी हैं। पढ़े लिखे तो हैं ही। चाहिए तो अपने जैसे कुछ और दोस्तों को
ले लीजिए बस जनता जनार्दन को जहाज से एक फर्लांग दूर भेज दीजिए!’
‘फिर?’
‘फिर
क्या आप सब भइया लोगों को हम चल कर अंदर से जहाज पूरा का पूरा दिखा देंगे।’ उस ने
जोड़ा ‘जहाज की सीट पर बैठा दूंगा।’
‘ठीक
है, पर धोखा मत देना!’ लड़के ने पायलट को
तरेरते हुए कहा।
‘अरे
नहीं भइया आप क्या बात कर रहे हैं?’ पायलट
बोला, ‘हम अपने वादे के पक्के हैं!’
‘ठीक
है!’
‘और
भइया देखिएगा कि कुछ गड़बड़ न हो। जहाज में कोई तोड़फोड़ नहीं करे। आखि़र कुछ
गड़बड़ होगा तो आप लोगों का इलाक़ा है, आप
ही लोगों की बेइज्ज़ती होगी! और जो सब कुछ सही सलामत रहा तो भइया आप ही लोगों का
नाम रोशन होगा।’
‘घबराओ
मत!’ लड़के ने पायलट की पीठ पर पूरी दबंगई से हाथ रखा, ‘अभी हम सब को किनारे करवाते हैं।’ कह कर उस ने
अपने साथियों को इशारा करते हुए कहा, ‘चलो
जी, इन सब को पहले हटवाओ।’
भीड़ अब तक मक्खियों की तरह पूरे जहाज के इर्द गिर्द छा गई थी। जहाज
का ऊपरी हिस्सा छोड़ कर हर जगह भीड़ ही भीड़ थी। मक्खियों की तरह छाई यह भीड़
उड़ाने पर मक्खियों की तरह उड़ने वाली भी नहीं थी। और तो और आस पास के गांवों से
भीड़ चली आ रही थी गोया जहाज नहीं उतरा हो, मेला
लगा हो। फिर बच्चे, जवान, बूढ़े सभी की ललक, उत्साह, लगन और उछाह कोई कैसे रोक सकता था भला? अपने पूरे भोलेपन, अपनी पूरी मासूमियत, अपनी पूरी सहजता और पूरी निष्ठा से जहाज को छू
कर, देख कर और जी कर ये गांव वाले अपने को
धन्य कर रहे थे। जिस नैसर्गिक सुख में वह आकंठ डूबे पड़े थे, आस पास के खेतों में फूले सरसों के पीले फूलों
की मादकता और गेहूं की बालियों में भर रहे दूध का दुलार भी इन के सुख के आगे अब
लजा रहा था। इन के चेहरों पर छाई अनकही हरियाली के आगे गेहूं के खेतों की हरियाली
पानी मांग रही थी। ख़ास कर अबोध बच्चों की आंखों में समाई कौतूहल भरी तरलता उन के
रंग बिरंगे स्वेटरों में और चटख हो रही थी। किशोर और जवान हो रही लड़कियों की इस
जहाज को छूने की तड़प ऐसे लग रही थी गोया कोई ओस की बूंद बस अभी-अभी किसी फूल या
पत्ती पर टपकी हो और अभी-अभी उगे टटके सूरज की लाली उसे लील जाना चाहती हो, उसे चाट कर जैसे तृप्त हो जाना चाहती हो या फिर
वह ओस की बूंद ही अनायास छलक कर या छिटक कर टूट जाने को बेक़रार हो जाए। इन की
तड़प कुछ-कुछ ऐसा ही दृश्य परोस रही थी। और पल्लू लिए हुई औरतों की दिपदिपाती
आंखें मानो सूरज की चमक को भी फीका कर रही थीं। एक आदमी अपने कंधे पर बेटे को
बिठाए जहाज के बाएं डैने के नीचे एक हाथ से बेटे को पकड़े और दूसरा हाथ कमर पर रखे
जहाज के पहियों को बेसुध देख रहा था। बेख़बर। और उस का बेटा दोनों हाथों से जहाज
के डैनों को ऐसे छूने की कोशिश कर रहा था, गोया
डैनों को छूते ही वह उड़ जाएगा और उस की नाक से बहता नेटा सूख कर चिकना हो जाएगा।
एक बूढ़ी औरत की झुर्रियों में जो उड़ान दिख रही थी; लग रहा था अगर वह जहाज को छू लेगी तो उस की झुर्रियां उड़न छू हो
जाएंगी, वह जवान हो जाएगी। ऐसे जाने कितने
दृश्य थे जो देवेंद्र को विभोर कर रहे थे। सोए हुए को जैसे जगा रहे थे। जयशंकर
प्रसाद की कविता ‘बीती विभावरी जाग री!’ क्या ऐसे ही समय के लिए लिखी गई रही होगी? ‘तू अब तक सोई है आली/आंखों में भरे विहाग री!
बीती विभावरी जाग री!’ देवेंद्र सोचता है। सोच कर अकुलाता है।
उधर भीड़ भी अकुला गई है। शोहदे लड़के पूरी ज़िम्मेदारी और पूरी
गंुडई से लोगों को जहाज से दूर करने में जुट गए हैं। एक लड़के ने तो लोगों को
डराने के लिए अपनी पैंट की बेल्ट निकाल कर हाथ में ले ली है और रह-रह कर उसे भांज
रहा है, जम़ीन पर पटक रहा है। कह रहा है, ‘जहाज देखो पर दूर से। छू-छू कर नहीं। चलो हटो, दूर हटो!’ एक लड़का लोगों को ढकेल-ढकेल कर दूर
कर रहा है। एकाध लोगों को थप्पड़ भी मार रहा है। लोग ललक भरी आंखों से दूर हट रहे
हैं। गोया उन के सिर का ताज कोई छीन ले रहा हो। एक सपना हो जो शीशे की तरह टूट रहा
हो। और यह शोहदे लड़के अपनी ललक पूरी करने के लिए लोगों की ललक छीन रहे हैं, लील रहे हैं।
ऐसा क्यों होता है?
देवेंद्र सोचता है। उस के द़तर में भी संपादक और मैनेजर ने अपनी
तनख्वाह बढ़वाने के लिए, अख़बार मालिकों की नज़र में अपनी
उपयोगिता दिखाने के लिए पिछले महीने खर्च घटाने की आड़ में एक साथ अख़बार से बीस
लोगों के इस्तीफ़े जबरिया लिखवा लिए थे।
यह क्या है?
वह जैसे टूट जाता है।
भीड़ का जहाज के पास से हटना ज़रूरी था। पर इस तरह अपमानित हो कर? अपमानित करना तो ज़रूरी नहीं था? ख़ैर, धीरे-धीरे
जहाज के पास से मक्खियों का छत्ता यानी भीड़ धीरे-धीरे छंट गई है। पायलट लड़कों को
बड़ी आशा और प्रशंसा भरी नज़रों से देखता है और लगभग आदेश देते हुए कहता है, ‘हवाई पट्टी पर एक भी आदमी नहीं दिखना चाहिए। एक
फर्लांग दूर कम से कम होनी चाहिए भीड़!’
‘जी
सर, जी सर!’ लड़के अब पायलट की जी हुजूरी
पर उतर आए हैं। उधर नेता जी बता रहे हैं कि, ‘पार्टी
ऑफिस में बात हो गई है। हम लोगों को मीटिंग प्लेस पर ले जाने के लिए दो कार आ रही
हैं और फ़ोर्स के लिए भी कहा जा चुका है।’
‘पर
अभी तक क्यों नहीं कहा था?’
चंद्रशेखर बिदक कर पूछता है।
‘आफ़िस
में जिस को यह मेसेज डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन को कनवे करना था वह बीमार हो कर
हास्पिटलाइज़ हो गया है।’
‘ओह।’
चंद्रशेखर बोला, ‘तो साला हम लोगों को भी हास्पिटलाइज़
करवाना चाहता था?’
‘यहां
आस पास कोई थाना या पुलिस चौकी नहीं है?’ विनय
ने एक शोहदे लड़के से डपट कर पूछा।
‘थाना
तो नहीं है पर एक-डेढ़ क़िलोमीटर पर पुलिस चौकी है।’ लड़का फुर्ती से बोला।
‘तो
वहीं से पुलिस वालों को बुला लाओ।’ विनय ने कहा।
‘किस
काम के लिए।’ लड़के ने पूछा ।
‘इस
भीड़ को क़ाबू करने के लिए।’ विनय बोला।
‘इस
भीड़ के लिए तो हम लोग ही काफी हैं सर। पुलिस को बुलाने की क्या ज़रूरत है?’
‘है
न तुम नहीं समझोगे।’
‘क्या
नहीं समझूंगा?’ लड़का तिरछा हो गया।
‘अरे
कहीं पब्लिक में कोई भड़क गया तो? कोई
मारपीट हो गई तो?’
‘तो
पुलिस संभाल लेगी इस भीड़ को?’ लड़का
तंज़ करते हुए बोला, ‘यह भीड़ पुलिस चौकी के पुलिस के वश की
है भी नहीं।’
‘क्यों?’
‘पुलिस
वाले आते ही पब्लिक से दो-दो, पांच-पांच
रुपए की वसूली के चक्कर में पड़ जाएंगे।’ लड़का बोला, ‘तब पब्लिक ज़रूर भड़क जाएगी। फिर जहाज को आग
लगा देगी।’
‘अच्छा?’ विनय बोला, ‘तब
तो रहने दो।’
भीड़ वैसे भी अब जहाज से कुछ दूर हो गई थी। जहाज को अपलक निहारती
भीड़ को देख कर देवेंद्र का मन हुआ कि वह भी धीरे से जा कर उस भीड़ में घुस जाए और
उन के साथ ही वह भी जहाज को टुक-टुक निहारे। अपनी इस रूमानियत पर वह पुलकित हो
गया। साथ ही अपनी इस नादानी पर उसे हंसी भी आई।
हड्डियों को चीरती ठंड और देह को सुख देती, सहलाती धूप के कोलाज में इस उपेक्षित पड़ी हवाई
पट्टी पर खड़े जहाज को दूर से देखती भीड़ निराला की कविता ‘अबे सुन बे गुलाब! भूल
मत, गर पाई खुशबू रंगों आब/खून-चूस खाद का
तूने अशिष्ट/डाल पर इतरा रहा कैपिटलिस्ट!’ की आंच देती उपस्थित थी।
उधर शोहदे लड़कों को पायलट जहाज के भीतर बारी-बारी ले जा - ले आ रहा
था। लड़के अपनी सफलता के नशे में चूर थे और पायलट अपनी डिप्लोमेसी के नशे में।
मारे खुशी के पायलट ने लड़कों के लीडर को सिगरेट पेश किया तो लड़के ने झपट कर
सिगरेट की पूरी डब्बी झटक ली। सिगरेट फूंकते हुए उस ने डब्बी को ग़ौर से घूरा और
पायलट से पूछा, ‘इंपोर्टेड है?’
‘हां, है तो!’ पायलट इतराया।
‘शराब
भी है क्या?’ पूछते हुए लड़के ने पायलट के कंधे पर
हाथ रख दिया। जैसे वह उस का कितना बड़ा यार हो।
‘नहीं
- नहीं!’ पायलट उस लड़के से छिटकते हुए बोला।
‘बीयर
भी नहीं है?’
‘नहीं
तो?’
‘हमने
सुना है जहाज में बीयर, शराब हमेशा होती है। और लड़कियां
घूम-घूम कर पिलाती हैं।’ लड़के ने जोड़ा, ‘हमने
कई पिक्चर में देखा भी है।’
‘हां, हां वह यात्री विमानों में होता है। ख़ास कर
इंटरनेशनल लाइट्स में।’ पायलट बोला, ‘यह
तो चार्टर्ड प्लेन है सिक्स सीटेड।’
‘मतलब?’ लड़के ने बोला।
‘छोटा
जहाज है। थोड़ी-थोड़ी दूरी के लिए!’ पायलट ने कंधे उचका कर कहा, ‘अभी आप ने भीतर जा कर देखा ही है। कोई लड़की
नहीं, कोई शराब नहीं।’
‘क्या
पता अंदर छुपा लिया हो फिर दिखाया हो?’ लड़का
शरारती मुसकान के साथ बोला।
‘नहीं
भइया आप से क्या छुपाना?’
पायलट सफाई देते हुए बोला, ‘चलिए फिर से देख लीजिए।’
‘चलो!’
लड़के ने जैसे आदेश दिया।
‘आइए
भइया!’ पायलट उसे ले कर फिर से प्लेन के भीतर जाता है। लड़का उदास हो कर प्लेन की
सीढ़ियों से उतरता है। पायलट से कहता है, ‘अच्छा
एक काम करो! इस जहाज में एक बार हम लोगों को भी बैठा कर उड़ा दो!’ वह ज़रा रुकता
है और कहता है, ‘ज़्यादा नहीं तीन चार चक्कर!’
‘ठीक
है भइया जी! बस जब वापसी में जाएंगे तो आप लोगों को भी घुमा देंगे।’ पायलट बोला, ‘आखि़र आप लोगों ने इतनी ज़िम्मेदारी से भीड़ को
संभाला है।’
‘धोखा
मत देना।’ लड़का तरेरते हुए बोलता है, ‘नहीं
पेट्रोल डाल कर दियासलाई दिखा देंगे तुम्हारे जहाज को! और यही रिपोर्टर लोग न्यूज़
लिखेंगे इस की। आंखों देखा हाल।’
‘अरे
नहीं भइया इस की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी।
‘पायलट
हाथ जोड़ कर बोला, ‘आप लोगों को हम घुमाएंगे। ज़रूर
घुमाएंगे।’
‘घुमाएंगे
नहीं उड़ाएंगे।’
‘हां, हां। वही-वही। उड़ाएंगे भइया।’
दोनों पायलट में एक पायलट लगातार प्लेन की निगरानी में था और दूसरा
पायलट लड़कों की मिज़ाज़पुर्सी में। कि तभी बारी-बारी दो कार हवाई पट्टी पर आ कर
रुकीं। एक-एक कार में तीन-तीन लोग बैठ गए। एक पायलट लपक कर आया और नेता जी से हाथ
जोड़ कर खुसफुसाया, ‘सर जल्दी फोर्स भिजवाइए नहीं इन लड़कों
को बहुत देर तक मैं नहीं झेल पाऊंगा।’ वह बोला, ‘मेरी
तो अब फटने वाली है। बहुत हो गया।’
‘फ़ोर्स
भी आ रही है। भारी फ़ोर्स! घबराओ नहीं।’ नेता जी उचक कर बोले, ‘वेल डन!’
दोनों कार पायलट को वहीं छोड़ निकल गईं। सांय-सांय!
‘वेल
डन! पायलट ने मुंह-बिचका कर नीचे पुच्च से थूका और एक भद्दी सी गाली दी फिर
दुहराया, ‘वेल डन!’
हवाई पट्टी के बाद सड़क बहुत अच्छी नहीं थी। रास्ते में पुलिस चौकी
दिखी तो विनय ने कार रुकवा दी। पर पुलिस चौकी में कोई था ही नहीं। एक चाय वाले ने
बताया, ‘सब की ड्यूटी मुख्यमंत्री में लगी है।’
कार फिर चल पड़ी। हिचकोले खाती कार जैसे तैसे आगे बढ़ रही थी। आधे घंटे बाद जा कर
कहीं मेन रोड आई तो सड़क की दशा थोड़ी सुधरी।
सभास्थल पर पहुंचने पर पता चला कि मुख्यमंत्री का हेलीकाप्टर आ चुका
है। पर वह अभी सभास्थल पर नहीं आए हैं। किसी लोकल नेता का भाषण चल रहा था। और वह
बीच-बीच में ‘मुख्यमंत्री जी बस हमारे बीच में आने ही वाले हैं’ संपुट की तरह
जोड़ता जा रहा था। सभा स्थल पर ही लखनऊ से आए रिपोर्टरों के ब्रेकफास्ट की
व्यवस्था है। ठीक मंच के बगल में। कनात लगा कर। हालां कि लंच का समय हो चला है पर
रिपोर्टरों का ब्रेकफास्ट चल रहा है। बीच ब्रेकफास्ट में हूटर सायरनों की आवाज़
सुन कर विनय खड़ा हो जाता है। चंद्रशेखर अफना कर पूछता है, ‘क्या हो गया?’
‘लगता
है सी एम आ गए।’ विनय आकुल हो कर बोला।
‘तो?’ चंद्रशेखर ठंडे स्वर में पूछता है।
‘नहीं
चलना तो पड़ेगा यहां से!’
‘क्यों
भाषण यहां से नहीं सुनाई देगा क्या?’ चंद्रशेखर
बोला, ‘या अपनी शकल दिखा कर ही सी एम का भाषण
नोट करोगे?’
‘और
फिर भाषण भी वही पुराना। जैसे रिकार्ड बज रहा हो। हर जगह वही-वही बातें। बस दो चार
लोकल इशू का ज़िक्र अलग से। ऐसे जैसे किसी कपड़े पर पैवंद!’ रोमी बोला।
‘हां, पर इस मुग़ालते में मत रहना बेटा कि पुराना
भाषण ही लिख मारना।’ संजय बोला, ‘पता
है बरेली के एक रिपोर्टर ने पिछले ह़ते सी एम की एक रैली कवर कर के लखनऊ रिपोर्ट
भेज दी। लीड बन कर छप भी गई। पर बाद में पता चला कि सी एम तो बरेली गए ही नहीं थे।
वह रैली कैंसिल हो गई थी। देर हो जाने के कारण। पर पट्ठे ने रिपोर्ट - घर बैठे
पुरानी कतरनों को निकाल कर लिख दी।’
‘ओह!’
फिर क्या हुआ उस का?’ देवेंद्र ने पूछा।
‘हुआ
क्या अख़बार ने खेद प्रकाश छोटा सा छाप दिया। रिपोर्टर को सस्पेंड कर लखनऊ से अटैच
कर दिया है।’ संजय ने बताया।
‘ख़ैर, हम लोग तो अब यहां से चलें।’ विनय फिर बोला।
‘हां-हां।’
चंद्रशेखर बोला।
सभी लोग मंच के बगल की कनात से निकल कर मंच के सामने बनी प्रेस गैलरी
में आ गए। लोकल रिपोर्टरों ने उचक-उचक कर, लपक-लपक
कर लखनऊ के रिपोर्टरों को सलाम बजाया। देवेंद्र ने ग़ौर किया इलेक्ट्रानिक मीडिया
के भी दो लोग सी एम को कवर करने लखनऊ से आए हैं। उस ने चंद्रशेखर को कुरेद कर उन
सब को दिखाया भी। चंद्रशेखर बोला, ‘लगता
है साले सब सी एम के तलवे चाटते उन के साथ ही आए हैं।’
‘सो
तो है।’ देवेंद्र ने निरापद भाव से कहा।
‘लेने
दो सालों को विजुअल!’ चंद्रशेखर बोला, ‘प्रिंट
में रहने का नुकसान और इलेक्ट्रानिक में रहने का फ़ायदा आखि़र यों ही तो नहीं है।’
‘ये
तो है!’
मुख्यमंत्री का भाषण शुरू हो गया था। वह रत्नगर्भा धरती का बखान कर
रहे थे और हुंकार रहे थे,
‘कुंडा का गुंडा!
अब उस की गुंडई और नहीं चलने देंगे। सांप के फन की तरह कुचल कर रख देंगे।’
वगै़रह-वगैरह।
मुख्यमंत्री का भाषण ख़त्म हो गया है। डाक बंगले पर लंच की व्यवस्था
है। लंच चल रहा है। अचानक संजय मुख्यमंत्री के पास पहुंचता है, ‘भाई साहब आज तो हम लोगों को आपने मरवा ही दिया
था?’
‘क्या
हो गया?’ मुख्यमंत्री मुसकुरा कर पूछ रहे हैं।
‘इससे
तो बेहतर होता कि हम लोग बाई रोड आए होते!’ विनय उचक कर बीच में बोला।
‘पहेली
ही बुझाएंगे कि कुछ बताएंगे भी आप लोग?’ मुख्यमंत्री
ने पूछा।
‘कुछ
नहीं। जिस हवाई पट्टी पर हम लोगों का प्लेन उतरा वहां उपले पाथे जा रहे थे।
बेशुमार भीड़ थी। और फोर्स टोटली नदारद थी।’ चंद्रशेखर ने डिटेल देते हुए कहा, ‘वह तो पायलट सब होशियार थे, डिप्लोमेसी में एक्सपर्ट थे सो जान बच गई।’ फिर
जीप के रेस की, भीड़ के घेर लेने जैसे ब्यौरे भी
चंद्रशेखर ने मुख्यमंत्री को बताए।
मुख्यमंत्री ने पीछे खड़े एसपी को मुड़ कर तरेरा और आंखों ही आंखों
में डपटा।
‘सर, हमारे पास कोई प्रायर इनफार्मेशन थी नहीं।
इनफार्मेशन मिलते ही फोर्स वहां पहुंच गई है! प्लेन सेफ है सर!’ झुक कर पूरी
विनम्रता से एस पी ने सी एम को बताया।
‘बताइए
समय से आप के पार्टी आफ़िस ने इनफ़ार्म ही नहीं किया।’ विनय ने फिर उतावली दिखाई।
अब सी एम ने पत्रकारों के साथ आए अपनी पार्टी के नेता जी को तरेरा।
‘असल
में पाठक जी को इनफ़ार्म करना था। वह कल ही हास्पिटलाइज़ हो गए।’
‘तो
आप भी हास्पिटलाइज़ हो गए होते!’ यहां आने की क्या ज़रूरत थी?’ मुख्यमंत्री बोले, ‘अगर मीडिया के हमारे मित्रों को कुछ हो गया
होता दुर्भाग्य से तो मैं देश को मुंह दिखाने लायक़ होता भला? मुंह पर कालिख पुतवा देते आप लोग!’
‘अरे
वह तो कहिए चंद्रशेखर जी हम लोगों के साथ थे। तो चंद्रशेखर जी ने हनुमान चालीसा
पढ़नी शुरू कर दी। सो बच गए!’ देवेंद्र ने गंभीर हो गए माहौल को लाइट करने की
कोशिश की।
‘अरे, चंद्रशेखर जी!’ मुख्यमंत्री मुसकुराते हुए बोले, ‘आप तो कामरेड ठहरे और फिर हनुमान चालीसा!’
‘क्या
करें वह स्थिति इतनी संगीन हो गई थी। जान पर बन आई थी तो बचपन के संस्कार ने ज़ोर
मारा।’ चंद्रशेखर सकुचाते हुए बोला, ‘फिर
मरता क्या न करता?’
‘ये
तो है।’ मुख्यमंत्री बोले,
‘अभी पिछले ह़ते
हम खुद फंस गए थे। देवेंद्र जी भी थे। क्यों देवेंद्र जी याद है वो गाज़ियाबाद में?’
‘हां-हां!’
देवेंद्र बोला, ‘वह तो पायलट होशियार थे कि असली संकट
हम लोगों को पता ही नहीं चलने दिया।’’
‘पर
संकट निकल गया!’ मुख्यमंत्री हाथ जोड़ कर बोले, ‘ईश्वर
की कृपा थी।’
लंच ख़त्म हो गया था।
सब लोग वापसी की तैयारी में पड़ गए।
मुख्यमंत्री इलेक्ट्रानिक मीडिया वालों को साथ ले कर निकल गए।
मुख्यमंत्री का काफिला निकला तो सब लोग निकले।
लखनऊ से आई प्रिंट मीडिया की टीम भी पृथ्वीगंज के लिए चल पड़ी।
पृथ्वीगंज हवाई पट्टी के लिए। रास्ते में चंद्रशेखर ने देवेंद्र से पूछा, ‘गाज़ियाबाद में हुआ क्या था?’
‘हुआ
ये कि मुख्यमंत्री को इटावा और गाज़ियाबाद में तीन चार जगह भाषण देना था। तो लखनऊ
से हेलीकाप्टर में चार पत्रकारों को और दो नेताओं को ले जाने की व्यवस्था हुई। दो
पत्रकार आ नहीं पाए। तो दो पत्रकार और दो नेता हेलीकाप्टर में इटावा के लिए चले।
बीयर-सीयर पीते हुए। पर वहां सैफई हवाई पट्टी पर ही हेलीकाप्टर से पत्रकारों को
उतार कर बाई रोड इटावा भेजा गया। क्या तो मुख्यमंत्री को बाई प्लेन आना था और हवाई
पट्टी चूंकि सैफई में ही थी सो प्लेन वहीं लैंड करता और फिर मुख्यमंत्री को
पत्रकारों के हेलीकाप्टर से इटावा आना था।’ देवेंद्र बोला, ‘इन फैक्ट मुख्यमंत्री को टाइम बचाने की गरज से
प्लेन और हेलीकाप्टर दोनों चाहिए था। सो फिलर के तौर पर पत्रकारों को हेलीकाप्टर
में बैठा दिया गया। ख़ाली क्यों जाए हेलीकाप्टर? तो इटावा की जनसभाओं के बाद मुख्यमंत्री ने हेलीकाप्टर छोड़ दिया
सैफई में और गाज़ियाबाद के लिए प्लेन ले लिया।
हम लोग फिर हेलीकाप्टर से गाज़ियाबाद गए। वहां भी कई जनसभाएं थीं।
ख़त्म होते-होते सूरज डूबने को आ गया। अब हिंडन एयर बेस पर वापस आए तो हेलीकाप्टर
के पायलट ने हाथ जोड़ लिया कि, ‘अंधेरा
होने वाला है। ऐसे में लखनऊ के लिए उड़ना रिस्क है। सुबह ही चल पाऊंगा।’
मुख्यमंत्री के डे अफसर जो उन के सचिव भी थे, उन
तक बात पहुंचाई गई। उन्हों ने डी.एम. गाज़ियाबाद को बुलाया जो एक सरदार था, उस से पत्रकारों को लखनऊ मेल से लखनऊ भिजवाने
का इंतज़ाम करने को कहा। उस ने हामी भर दी और इंतज़ाम में जुट गया। कि तभी
मुख्यमंत्री का काफिला आ गया। उन के डे अफसर ने उन्हें बताया कि हेलीकाप्टर के
पायलट ने अंधेरे का रिस्क लेने से इंकार कर दिया है। कह रहा है कि अब सुबह ही उड़
पाएगा।’
‘तो
यह लोग कैसे जाएंगे।’
‘लखनऊ
मेल से अरेंजमेंट करने को डी.एम. से कह दिया है।’
‘तो
इन की न्यूज़?’
‘मेरा
तो यहां नोएडा में आफ़िस है ही। यहीं से रिपोर्ट भेज दूंगा।’ देवेंद्र ने विनम्रता
से कहा।
‘नोएडा
से आप जो रिपोर्ट फाइल कीजिएगा, कट
पिट कर लखनऊ में कैसे छपेगी मैं जानता हूं।’ मुख्यमंत्री बोले, ‘आप दोनों लोग मेरे साथ प्लेन से चलिए और लखनऊ
में ही रिपोर्ट लिखिए।’
फिर मुख्यमंत्री ने साथ आए दो नेताओं को ‘लखनऊ मेल से आइए या सुबह
हेलीकाप्टर से,’ कह कर हम लोगों को साथ ले लिया। जाने
क्या हुआ कि प्लेन ने टेक आफ़ किया कि पांच मिनट बाद ही कंट्रोल रूम से उस का
संपर्क टूट गया। कोई दस मिनट तक प्लेन एक ही जगह गोल-गोल चक्कर काटता रहा। चांदनी
बिखरी थी सो रात में भी हिंडन नदी साफ दिख रही थी। लगातार वहीं जब प्लेन चक्कर
काटता रहा तो मैं ने बगल में बैठे मुख्यमंत्री के सचिव को नीचे की तरफ दिखाया और
बताया कि, ‘यह देखिए प्लेन एक ही जगह लगातार बड़ी
देर से चक्कर काट रहा है।’ उन्हों ने भी देखा तो पीछे मुड़ कर पायलट से पूछा कि, ‘बात क्या है? सब ठीक तो है न?’
‘जी
सर!’
‘तो
एक ही जगह चक्कर क्यों काट रहे हो?’
‘नहीं
तो सर!’ पायलट बोला, ‘एवरीथिंग इज इन आवर कंट्रोल!’
सब लोग निश्चिंत हो गए। मुख्यमंत्री अपने झोले से भुना चना मखाना
निकाल कर हम सब को खिलाने लगे। थोड़ी देर बाद ही चंबल दीखने लगा। चांदनी में चंबल
के बीहड़ों को आकाश से निहारना अलौकिक है। उस के सौंदर्य का बखान शब्दों में
बांधना मेरे लिए मुश्किल है। ठीक वैसे ही जब हेलीकाप्टर से दिन में चलें तो नीचे
की हरियाली आप का मन मोह लेती है। तो दिन की दुपहर में हरियाली और रात की चांदनी
में चंबल के बीहड़ों को निहारने का अनिर्वचनीय सुख सचमुच अकल्पनीय है डियर
चंद्रशेखर! मुझे तो बच्चन जी का वह गीत याद आ गया कि, ‘चांदनी में सब क्षमा है।’ फिर बगल में ताज की
झलक! ताज और चंबल का कंट्रास्ट! ताज की चमक में, चंबल की गमक!’ देवेंद्र बोला, ‘लेकिन
यह सारा सुख लखनऊ में उतर कर एक क्षण के लिए सुन्न हो गया। जब दोनों पायलट जहाज से
उतर कर एयरपोर्ट को दोनों हाथों से स्पर्श कर हाथ माथे पर लगा कर एक दूसरे से चिपट
कर रोने लगे। लॉबी में आ कर सी एम के सचिव ने जब पूछा, ‘क्या बात है बड़े सेंटीमेंटल हो रहे हैं आप
लोग!’
‘कुछ
नहीं सर जब आप ने पूछा था कि एक ही जगह क्यों चक्कर काट रहे हैं तो सर मालूम है आप
को तब कंट्रोल रूम से हमारा संपर्क टूट गया था। हम लोग बड़ी उलझन में थे। कि चीफ
मिनिस्टर सर प्लेन में हैं और कहीं कुछ अनहोनी हो गई तो? इसी लिए एक ही जगह चक्कर काट कर कंट्रोल रूम से
संपर्क बनाने में लगे थे।’ वह बोला, ‘थैंक
गॉड कि हम लोग सकुशल यहां लैंड कर गए!’
‘अरे!’
कह कर सी एम के सेक्रेट्री भी उस पायलट से गले लग गए। और फिर तो सभी
एक दूसरे से गले मिलने लगे और कहने लगे कि पता नहीं कौन इतना भाग्यशाली था जिसके
भाग्य से हम सभी बच गए। और हमारी आंखों के आगे हवाई दुर्घटनाओं में मारे गए कई
नेताओं के चेहरे घूम गए।’ देवेंद्र बोला, ‘और
देखो आज भी हम लोग किस मूर्खता में फंस कर बचे हैं। यह मूर्खता हम सब की जान भी ले
सकती थी।’
‘ये
तो है।’ चंद्रशेखर बोला।
‘और
यह भी जान लो डियर कि अगर अभी भी फोर्स वहां नहीं होगी और मुझे लगा कि सेफ टेक आफ़
नहीं हो पाएगा तो तय मान लो कि मैं तो उस प्लेन में बैठने से रहा।’
‘तो
ख़बर कैसे लिखेंगे देवेंद्र जी!’ संजय बोला, ‘या
कि नहीं लिखेंगे?’
‘देखो
डियर ख़बर लिखना रोजी रोटी है। कोई बार्डर की तैनाती नहीं कि सरहद बचानी ही है सो
जान दे दूं।’ देवेंद्र बोला, ‘फिर
ये दो कौड़ी का भाषण लिखने के लिए जान पर खेलना मेरी समझ से तो बाहर है!’
‘और
वह भी उपेक्षितों की तरह!’ चंद्रशेखर बोला, ‘मुख्यमंत्री
तो इलेक्ट्रानिक मीडिया को साथ लेकर सेफ ज़ोन में घूम रहा है, कवरेज, फुटेज
और बाइट के नाम पर। और हम प्रिंट मीडिया वालों को बाबा आदम के जमाने वाली हवाई
पट्टी पर उतार देता है मरने के लिए जहां उपले पाथे जा रहे हैं। न कोई बाउंड्री, न बैरिकेटिंग। न कोई रख-रखाव!’ वह बोला, ‘ठीक कहते हैं देवेंद्र जी अगर सेफ टेक आफ़ की
नौबत नहीं दिखी तो मैं भी नहीं बैठूंगा।’
‘एक
बात बताऊं कामरेड चंद्रशेखर तुम्हें।’ देवेंद्र बोला, ‘चुनावी कवरेज में जो रोमांच पहले हुआ करता था
वह अब इस कदर रिरियाहट और अपमान में बदल जाएगा, मैं
नहीं जानता था। पहले हम लोगों को अपनी रिपोर्टरी पर जिस तरह नाज़ हुआ करता था अब
उतनी ही शर्म आती है।’
‘ये
बात तो है देवेंद्र जी!’
‘तुम्हें
पता है मैं ने साइकिल चला कर भी रिपोर्टरी की है। कई कवरेज किए हैं। लेकिन तब जो
जोश, जो सम्मान खुद की नज़र में था, जिस तरह सिर उठा कर चलता था, अब जहाज से चलने में भी वह बात कहां है।’
देवेंद्र बोला, ‘अब वो फख्र की जगह एक गहरे शर्म ने ले
ली है। जानते हो क्यों?’
‘क्यों?’
‘बशीर
बद्र का एक मिसरा है, ये ज़बां किसी ने ख़रीद ली, ये कलम किसी का गुलाम है!’
‘सो
तो हो गया है यह सौ फीसदी सच!’ संजय तड़प कर बोला।
इस तरह बोलते बतियाते पृथ्वीगंज हवाई पट्टी आ गई। पी.ए.सी. की ट्रकें
खड़ी थीं। हवाई पट्टी को चारों तरफ से पी.ए.सी. ने घेर रखा था। भीड़ भी थी पर बहुत
थोड़ी सी। सूरज अपनी नरमी पर था। शाम के कोई चार बजने वाले थे। दोनों पायलट हवाई
पट्टी पर प्लेन के पास कुर्सी लगाए पांव फैलाए सिगरेट फूंक रहे थे।
प्लेन के पास पहुंच कर देवेंद्र ने चारों तरफ नज़र दौड़ाई। हवा जैसे
ठहर गई थी। चारों तरफ पी.ए.सी. के जवानों को खड़ा देख कर लगा गोया खेतों में भी
कर्यू लग गया हो! फिर बोला,
‘अब तो
सिक्योरिटी पूरी है।’
‘पूरी
नहीं सर! हाई सिक्योरिटी है। परिंदा भी पर नहीं मार सकता।’
‘वो
तो ठीक है। पर बड़े पोलिटिकल हो रहे हो।’ संजय ने पूछा, ‘और वह सुबह के हवा सिंह टाइप लड़के नहीं दिख
रहे?’
‘भाड़
में जाएं साले सब हवा सिंह।’ पायलट धुआं छोड़ता हुआ हिकारत से बोला, ‘सालों ने नाक में दम कर रखा था।’
‘हूं।’
संजय धीरे से बोला, ‘मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं।’ और
मुसकुराया।
‘वो
तो ठीक है सर, पर बाक़ी लोग कहां हैं?’
‘आ
रहे हैं, वह लोग भी आ रहे हैं। उन की गाड़ी
थोड़ी पीछे थी।’ संजय बोला,
‘आप लोगों ने
खाना-वाना खाया।’
‘जी
सर!’
‘कैसे?’
‘लंच
पैकेट और पानी की बोतलें ले कर चले थे लखनऊ से।’
‘अच्छा-अच्छा।’
‘तब
तक दूसरा ग्रुप भी आ गया। वह लोग कार से उतर ही रहे थे कि सुबह वाले लड़के भी उन
के पीछे-पीछे लग लिए। यह नज़ारा देखते ही एक पायलट पास खड़े पी.ए.सी. के दो जवानों
पर किचकिचाया, ‘अरे, वह लड़के साले फिर आ रहे हैं। उन लड़कों सालों को जा कर वहीं रोको!
नहीं साले सब लंबा बवाल काट देंगें। फिर हवा सिंह बन कर हम पर रौब गांठने लगेंगे।
कहेंगे जहाज में बैठा कर उड़ाओ। जैसे जहाज नहीं बैलगाड़ी हो।’
पी.ए.सी. के दोनों जवान बड़ी फुर्ती से दौड़े और लपक कर उन लड़कों को
रोक दिया। एक लड़के ने पी.ए.सी. के जवान से ज़बरदस्ती करनी चाही तो उस ने उसे वहीं
पीट कर ढकेल दिया। बाक़ी लड़के वहीं से पायलट को इंगित कर चिल्लाए भी, ‘सर! सर! सुनिए तो सर!’
लेकिन पायलट ने उन लड़कों की तरफ देखा तक नहीं।
‘पायलट
सर! आप ने वादा किया था कि हम लोगों को दो तीन राउंड जहाज पर घुमाएंगे!’ एक लड़का
ज़ोर-ज़ोर से चीख़ रहा था। पर पायलट ने यह सब सुन कर भी अनुसना कर दिया।
‘सर
मेरी बात तो सुनिए!’ यह तीसरा लड़का चीख़ा।
अब हम लोग प्लेन में चढ़ रहे थे। उधर लड़के समवेत स्वर में मां बहन
की गालियों में चीख़ने लगे थे! और पी.ए.सी. के जवान उन्हें धकियाते जा रहे थे। पर
गालियां बदस्तूर जारी थीं। इन समवेत गालियों के बीच प्लेन का इंजन गड़गड़ाया, रनवे पर दौड़ा।
इस बार रेस में कोई पैरलेल जीप नहीं थी। चारों तरफ वर्दीधारी
रायफलधारी जवान ही जवान थे। हेलमेट लगाए।
प्लेन टेक आफ़ कर गया।
हमारे कानों में प्लेन की गड़गड़ाहट के साथ ही उन लड़कों की समवेत
गालियां भी गड़गड़ा रही थीं। उन हवा सिंहों की गालियां जो हवा हो गए थे।
-28-
चनाजोर गरम वाले चतुर्वेदी जी
चनाजोर गरम वाले चतुर्वेदी जी चतुर्वेदी जी अपने बेटे की शादी के
पंडाल में गेंदे के फूल की माला पहने ऐसे घूम रहे थे गोया बच्चे हों। लेकिन उनके
चेहरे पर बच्चों का-सा उल्लास नहीं, एक
फीकी-सी मुसकुराहट थी। फिर भी वह इधर-उधर फुदकने का जैसे अभिनय कर रहे थे। बारात
की अगुवाई करते हुए दुल्हा बने बेटे की कार के आगे चलते हुए उनके गले में माला तो
नहीं थी पर चाल में वह गमक और गरूर भी नहीं था जो शादी-ब्याह में दुल्हे के पिता
में अमूमन देखा जाता है। और तो और उनके बगल में उनके साथ चले रहे कभी उनके कट्टर
दुश्मन रहे माथुर साहब को देख कर कुछ लोगों के मुंह अचरज से खुले तो खुले ही रह
गए। हां, माथुर साहब की चाल में जरूर गमक थी।
गमक ही नहीं गुरूर भी साफ दिख रहा था माथुर साहब की चाल में और चेहरे पर कलफ लगी
हंसी भी। माथुर साहब चतुर्वेदी जी से कद में भी लंबे थे और लकदक सूट में भी थे। पर
चतुर्वेदी जी अपनी पुरानी रवायत के मुताबिक खादी की सफेद पैंट, खादी की ही एक प्लेन गेहुंए रंग का कोट, खादी की सफेद कमीज पर खादी ही की एक सिल्क टाई
बांधे हुए थे। कद तो उनका माथुर साहब से दबा हुआ था ही, खुशी और चाल भी उनकी बहुत दबी-दबी थी। लगता ही
नहीं था कि यह वही चतुर्वेदी जी हैं, खुर्रांट
अफसर के रूप में कुख्यात ! सचिवालय के गलियारों में अपने छोटे कद के बावजूद
लंबा-लंबा डग भरते हुए जब वह चलते तो उनके सख़्त कदमों से सचिवालय के बरामदों में
जैसे सन्नाटा पसर जाता। चतुर्वेदी जी चाल में ही सख़्त नहीं थे, फाइलों पर लिए गए निर्णयों में भी कहीं, ज्यादा सख़्ती बरतते थे। भ्रटाचार और अनियमितता
की परछाईं भी उन्हें छूते हुए डरती क्या कांपती थी। जब वह प्रशासनिक सेवा के लिए
चुने गए तब से अब तक उनके ऊपर राई भर का भी आरोप नहीं लगा था। उनके जीवन-व्यवहार
में सिद्धांत जैसे खून बन कर टपकता रहता था। इतना कि मातहत अफसर तो अफसर, वरिठ अफसर, मंत्री
और मुख्यमंत्री तक उनसे घबराते। जब वह एक जिले में कलक्टर थे तो उनकी नेकनीयती और
ईमानदारी का बखान करते, चनाजोर गरम बेचने वाले अपने गाने में
उनका नाम ले कर गाते और चनाजोर गरम बेंचते। असर कहिए, असीर कहिए, उनमें
उस ईमानदारी की तासीर भी अभी बाकी थी। अब वह प्रमुख सचिव पद तक आ पहुंचे थे लेकिन
उनके घर से ज्यादा अच्छा फर्नीचर उनके दफ्तर के बाबुओं के घर पर था। ऐसा भी नहीं
था कि ईमानदारी की कमाई से ही सही वह अच्छा फर्नीचर नहीं ख़रीद सकते थे, ख़रीद सकते थे पर फालतू और दिखावे के खर्च भी
उन्हें तकलीफ देते थे। जब वह प्रशासनिक सेवा में आ गए तो एक बार उनके एक मुंह लगे
दोस्त ने लगभग टांट करते हुए उनसे कहा कि, ‘अब
तो तुम ख़ुदा हो गए हो।
‘कैसे
?’ मुसकुराते हुए चतुर्वेदी जी ने ‘संक्षिप्त’ में
ही पूछा।
‘अरे
भाई अपने देश में आई. ए. एस. अफसर ख़ुदा ही तो होता है।’ वह बोला, ‘अब तुम भी देश का भाग्य लिखोगे।’
‘भाग्य
लिखू्गा तो नहीं।’ चतुर्वेदी जी जरा रुक कर बोले, ‘भाग्य लिखने वाला तो वह ऊपर वाला है पर हां, देश का भाग्य जिसे तुम कह रहे हो उसे जरा
संवारूंगा जरूर।’
‘देखना
डीयर याद रखना अपनी इस बात को।’ दोस्त बोला, ‘कहीं
यह संवारने की बात भूल कर बाकी आई. ए. एस. अफसरों की तरह भैंस बन कर देश को चरने न
लगना।’
‘निश्चिंत
रहो, देश को संवारूंगा ही, चरूंगा नहीं।’ चतुर्वेदी जी ने दोस्त को ही
नहीं अपने को भी आश्वस्त किया था।
और इस आश्वस्ति के दम पर सच बात पर वह बड़ों-बड़ों से टकरा जाते।
पहले कभी-कभी टकराते थे पर अब यह टकराना उनका कुछ ज्यादा ही बढ़ गया
था। इतना कि बावजूद उनकी प्रशासनिक क्षमता, ईमानदारी
के लोग उन्हें झक्की करार देने लगे। कुछ लोग उन्हें फ्रस्ट्रेटेड और बदतमीज भी
बताने लगे। लेकिन चतुर्वेदी जी पर फिर भी फर्क नहीं पड़ता। वह किसी गलत बात के
खि़लाफ अड़ते तो अड़े ही रहते। उनका यह अड़ना उनके तबादले से ही टूटता। पहले पांच
साल वाली सरकारें जब होती थीं, बार-बार
चुनाव नहीं होते थे, तब तबादले भी कम होते थे। पर अब जैसे
बार-बार चुनाव और अस्थाई सरकारों का दौर शुरू हुआ वैसे ही प्रशासनिक अधिकारियों के
तबादले भी बंबई की बरसात की मानिंद हो गए। कब और कैसे कौन कहां गिर जाए किसी को
पता नहीं। हां, पैसों और जातियों के गणित में निपुण
प्रशासनिक अधिकारियों का कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाता। पर चतुर्वेदी जी इस गणित, इस हवा के खि़लाफ पड़ते। फिर उनकी ईमानदारी, देश को संवारने की जिद उन्हें झक्की और
फ्रस्ट्रेटेड घोषित करवा देती। कोई मंत्री उन्हें अपने विभाग का प्रमुख सचिव बनाने
से ही कतरा जाता। कहता, ‘अरे, चतुर्वेदी है तो बड़ा कड़ा अफसर। ईमानदार भी है। पर दिक्कत क्या है
कि हर फाइल, हर आदेश वह घुमाता ही रहेगा। सरकार गिर
जाएगी पर कभी कोई शासनादेश नहीं हो पाएगा।’ सो कभी अपने नाम की तूती बजवाने वाले
चतुर्वेदी जी महत्वहीन होते गए। कभी महत्वपूर्ण विभागों में सालों साल गुजरने वाले
चतुर्वेदी जी महत्वहीन विभागों में भी कुछ महीने नहीं गुजर पाते और तबादला आदेश पा
जाते। उनकी आंखों के सामने उनके सपनों का देश चूर-चूर हो रहा था। बेईमान, भ्रट और चापलूस अफसरों का गिरोह उनका देश भैसों
की तरह चर रहा था और वह झक्की तथा फ्रस्ट्रेशन के आरोपों में कैद मक्खियां मारने
के लिए अभिशप्त हो गए थे। कभी बेहद लोकप्रिय अफसर के रूप में शुमार होने वाले
चतुर्वेदी जी अब बेहद अलोकप्रिय अफसरों में शुमार क्या थे, भरसक इकलौते थे। लेकिन पानी सिर से आगे तब और
गुजर गया जब पहले उनका एक बैचमेट चीफ सेक्रेटरी बन गया और फिर कुछ समय बाद उनसे दो
बैच नीचे वाला भी उन्हें चीफ सेक्रेट्री की कुर्सी पर बैठा दिखा। कोई मुख्यमंत्री
उन्हें अपना चीफ सेक्रेट्री बनाने के जिक्र भर से भड़क जाता। कहता, ‘अरे वह सनकी चतुर्वेदी! खुद भी ईमानदारी का
कीड़ा खाएगा और हमें भी खिलाएगा। सरकार का एक काम-काज नहीं होने देगा। खुद तो पागल
है ही, पूरी सरकार को पागल बना देगा। कोई बात
सुनेगा ही नहीं। गुण-दो और नियमानुसार में सारी सरकार होम कर देगा। अरे, वह नहीं !’ आजिज आ कर वह भारत सरकार में
सेक्रेटरी हो कर चले गए। पर मिला वहां भी उन्हें महत्वहीन विभाग। भारत सरकार में
वह पहले भी डिप्टी सेक्रेट्री, ज्वाइंट
सेक्रेट्री और एडीशनल सेक्रेट्री रह चुके थे पर महत्वपूर्ण विभागों में। तब उन्हें
लगता था कि देश उनकी क्षमता का भरपूर सदुपयोग कर रहा है। योजनाएं बनाने और उनको
इंपलीमेंट करवाने के वह मास्टर माने जाते थे तब।
पर अब वही चतुर्वेदी जी सबके लिए बोझ बन गए थे। जिस ईमानदारी, कर्तव्यनिठा ने उन्हें कभी लोकप्रियता के शिखर
पर बिठाया था, उनके नाम से चनाजोर गरम तक बिकवाया था, आज वही ईमानदारी, वही कर्तव्यनिष्ठा उन्हें क्रेक डिक्लेयर कर उनके गले में मन भर का
पत्थर बन लटक गई थी।
‘ओह
रे देश !’ वह बुदबुदाते। और तब और आहत महसूस करते जब उनके ही कैडर के उनसे जूनियर
अफसर भी उनकी खिल्ली उड़ाते। उनके अपने कैडर आई. ए. एस. छोड़िए, पी. सी. एस. अफसर भी अब उनका मजक उड़ाने लगे
थे। भले ही पीठ पीछे सही। जैसे भारत सरकार में आई. ए. एस. अफसरों में नार्थ इंडियन
वर्सेज साउथ इंडियन की जब तब तलवारें खिंची रहती हैं वैसे ही चतुर्वेदी जी के
प्रदेश में एक समय आई. ए. एस. अफसरों में ब्राह्मण वर्सेज कायस्थ की तलवारें खिंची
रहती थीं। तब चतुर्वेदी जी इस तलवारबाजी में अपने ऊपर एक दाग लगा बैठे थे।
ब्राह्मण खेमे का अनायास ही एक बार उन्होंने नेतृत्व संभाल लिया। और खूब डट कर
संभाल लिया। ब्राह्मण वर्सेज कायस्थ में तब तलवारबाजी बिलकुल कूल वे में चली पर
ऐसी चली कि शासन के तमाम काम-काज पर लगभग ताला लग गया। फाइलें किसी न किसी खेमे
द्वारा कहीं न कहीं, किसी न किसी कोयरी द्वारा लटक जातीं।
जिसे शासकीय भाषा में ‘लंबित’ बताया जाता। अंततः तब के मुख्यमंत्री ने बड़ी
होशियारी से इन ब्राह्मण-कायस्थ अफसरों की कूल तलवारबाजी के बीच हरिजन आई. ए. एस.
अफसरों की ताजपोशी शुरू कर दी। और धीरे-धीरे लगभग इन की हवा निकाल दी।
तब की कूल तलवारबाजी में यही चतुर्वेदी जी और यही माथुर साहब
अपने-अपने खेमों के सरदार थे। और बाद के दिनों में भी इन की तलवारें भोंथरी भले ही
पड़ गईं पर म्यान में नहीं गईं। और आज यही माथुर साहब गुलाबी साफा बांधे चतुर्वेदी
जी के बेटे की शादी में उनके बगलगीर बन किसी विजेता की तरह ऐसे कदम बढ़ाते चल रहे
थे गोया समधी वही हों। चतुर्वेदी जी तो बस उनके साथ यूं ही चले आए हैं। हारे हुए
कदमों से !
तो यह क्या था ? क्या
चतुर्वेदी जी अपने परिवार में भी हार गए थे ?
नहीं !
चतुर्वेदी जी के जीवन का दरअसल यह भी एक द्वंद्व था। जो एक जातिवादी
होने का एक दाग उन्होंने कुछ बरस पहले अपने दामन पर लगाया था संभवतः उस दाग से
छुट्टी पाने के अनमन कश्मकश में वह थे। वह अपने बेटे की बारात एक कायस्थ की बेटी
से ब्याहने के लिए ले कर आज आए थे। और यह माथुर साहब उनकी होने जा रही बहू के मामा
हैं और वह बारात में चतुर्वेदी जी के साथ नहीं, वरन
जनवासे से बारात रिसीव कर विवाह पांडाल तक लाने की भूमिका में हैं। सब कुछ भूल-भाल
कर !
तो क्या चतुर्वेदी जी भी सब कुछ भूल-भुला गए हैं ?
ख़ैर द्वारचार, द्वारपूजा
के बाद वह लगभग अकेले ही पूरे पांडाल में माला पहने इधर से उधर मेढक की तरह फुदक
रहे थे। उन के गांव की बोली में कहें तो पलिहर के बानर की तरह ! इत्तफाक था कि
यहां पांडाल में उन्हें पहचानने वाले कम ही लोग थे। इन्हीं थोड़े से लोगों में
चतुर्वेदी जी का वह पुराना मुंहलगा दोस्त भी था जो अब यूनिवर्सिटी में फिजिक्स
पढ़ाता था, जिसने प्रशासनिक सेवा में चुने जाने पर
एक समय उनसे लगभग टांट करते हुए कहा था कि, ‘अब
तो तुम ख़ुदा हो गए हो!’ पर वह उछल कर चतुर्वेदी जी के पास नहीं गया। दूर से ही
देखता रहा। बारातियों की भीड़ डिनर वाले ब्लॉक में जल्दी ही छंट गई। क्यों कि
बाराती ज्यादा आए ही नहीं थे। बारात में आई. ए. एस. बिरादरी के लोग ही नहीं दिखे
तो वी. वी. आई. पी. टाइप लोगों की बात ही बहुत दूर थी। ख़ैर, जब घरातियों ने भी खाना खा लिया तो चतुर्वेदी
जी ने सोचा कि बिना नाज-नखरे के वह भी भोजन खुद ही कर लें। यह सोच कर वह प्लेटों
वाली टेबिल पर पहुंचे। जाने क्यों प्लेट उठाने के पहले वह आंखों से चश्मा उतार कर
उसका शीशा पोंछ ही रहे थे कि उनका वह पुराना दोस्त अंततः उनके पास चल कर आया और
उनका कंधा पकड़ कर हाथ मिलाते हुए बेटे के विवाह की बधाई दी। ‘अच्छा हुआ जो तुम
खुद ही आ गए।’ बधाई स्वीकार कर चतुर्वेदी जी आंखों पर चश्मा चढ़ाते हुए बोले, ‘दरअसल मैंने किसी को बुलाया ही नहीं। व्यर्थ का
तामझाम होता।’ वह बोले, ‘बस घर के लोग और रिश्तेदार ही आए हैं
बारात में।’
‘मैं
भी चतुर्वेदी बाराती बन कर नहीं आया हूं।’
‘तो
अब बन जाओ।’ दोस्त की पीठ पर धौल जमाते हुए मुसकुरा कर चतुर्वेदी जी बोले।’
‘नहीं
बन सकता !’
‘क्यों, इतना नाराज हो ?’
‘नहीं
भाई, मैं लड़की पक्ष की ओर से आया हूं।’
‘ओ
हो ! तो ये बात है।’ चतुर्वेदी जी एक फीकी मुसकान फेंकते हुए बोले।
‘श्रीवास्तव
जी ने बेटी के ब्याह का निमंत्राण जब भेजा तो कार्ड पर लड़के के पिता के तौर पर
तुम्हारा नाम पढ़ कर एक बार मुझे लगा कि तुम्हीं हो पर चूंकि नाम के साथ आई. ए.
एस. नहीं लिखा था सो लगा कि तुम नहीं हो!’ दोस्त जरा रुका और बोला, ‘फिर तुम ठहरे चौबीस कैरेट के ब्राह्मण। सोचा कि
तुम कहां कायस्थ की बेटी से अपना बेटा ब्याहोगे ?’
‘यहां
कायस्थ ब्राह्मण की बेवकूफी मत झाड़ो !’ चतुर्वेदी जी जरा रुके और बोले, ‘देखो डीयर सच बात यह है कि बच्चों की खुशी में
ही अपनी भी खुशी है।’
‘यह
बात तो है।’
‘मेरा
बेटा और श्रीवास्तव जी की बेटी साथ ही जॉब में हैं। श्रीवास्तव जी भी इंजीनियर
जरूर हैं पर हैं ईमानदार। मेरे लिए इतना ही काफी है कि एक ईमानदार आदमी की बेटी
मेरी बहू बन रही है जिसे कि मेरा बेटा पसंद करता है। बस !’
‘चलो
चतुर्वेदी तुम थोड़ा ही सही बदल तो गए इसी जनम में।’
‘सवाल
बदलने का नहीं है।’
‘तो?’
‘सवाल
संवारने का है!’ चतुर्वेदी जी बोले, ‘तुम्हें
दिए वादे के मुताबिक देश का भाग्य तो ठीक से नहीं संवार पाया, मौक ही नहीं मिला जातिवादी सरकारों की फजीहत
में तो क्या करता भला ? सिनिकल मान लिया लोगों ने उलटे !’ कहते
हुए चतुर्वेदी जी की आंखें छलछला आईं। वह बोले, ‘सोचा
कि बेटे का ही भाग्य संवार दूं। उस की मर्जी ही से सही। हर जगह हवा के खि़लाफ होना
जरूरी है ? सो बेटे की खुशी को अपनी खुशी मान मैं
भी आ गया हूं बारात में। क्यों कि बच्चों की खुशी में ही अपनी खुशी है।’ वह बोले, ‘आखिर कहां-कहां खुशी होम करें ?’
‘भाभी
जी नहीं दिख रहीं ?’ दोस्त ने बात को बदलते हुए पूछा।
‘आई
कहां हैं जो दिखें ?’
‘क्यों
?’
‘कुढ़ी
हुई हैं। हमारे कुछ रिश्तेदार वगशैरह भी नहीं आए हैं। समझ सकते हो।’ चतुर्वेदी जी
बोले, ‘समझाऊंगा पत्नी को भी, लोगों को भी। धीरे-धीरे बताऊंगा कि जाति-पांति
में कुछ नहीं धरा। बेटे की पसंद है। फिर ईमानदार आदमी की बेटी है।’ वह जरा रुके और
बोले, ‘फिर कुंवारी लड़की की कोई जाति-पांति
नहीं होती। वह तो पूरी तरह पवित्र होती है। शास्त्र भी शायद ऐसा बता गए हैं। और
फिर समाज बदल रहा है, ग्लोबलाइज हो गया है।’ कहते हुए
चतुर्वेदी जी अचानक दोस्त से बोले, ‘आओ
आइसक्रीम भी खा लें।’ ‘हां-हां !’ कह कर दोनों दोस्त आइसक्रीम खाने लगे। भीड़ लगभग
छंट गई थी। कि अचानक दो तीन लोग आ कर चतुर्वेदी जी से मुखातिब हो गए। बोले, ‘आप चतुर्वेदी जी हैं ?’
‘हां, हां बताइए !’ विनम्र होते हुए चतुर्वेदी जी
बोले।
‘आप
ही के बेटे से श्रीवास्तव जी की बिटिया का ब्याह हो रहा है ?’
‘हां, हां हो रहा है। क्यों ?’
‘नहीं, नहीं वैसे ही पूछा क्यों कि कायस्थ की बिटिया
और पंडित का बेटा!’
‘तो ?’
‘कुछ
नहीं, कुछ नहीं!’
‘अरे, आप फलां जिले में कलक्टर थे ?’ एक दूसरा व्यक्ति कुछ याद करता हुआ-सा बोला।
‘हां, क्यों ?’
‘अरे, तब तो आप चनाजोर गरम वाले चतुर्वेदी जी हो!’
‘क्या?’ चतुर्वेदी जी अचकचा गए और फिर बोले, ‘हां, हां!’
‘फिर
तो कवनो बाति नाहीं।’ वह निम्न मध्यवर्गीय व्यक्ति बाकी लोगों की तरफ मुड़ा और
बोला, ‘ई चनाजोर गरम वाले चतुर्वेदी जी हैं।
इन कुछ भी कर सकते हैं। काहें से कि बहुतै ईमानदार, बहुतै सख़्त!’
‘अच्छा-अच्छा
ऊ चनाजोर गरम वाले कलक्टर साहब हैं, आप
!’
‘और
का ?’ कह कर सभी ने चतुर्वेदी जी के पांव
छूने शुरू कर दिए। और हाथ जोड़ चले गए।
‘यह
चनाजोर गरम तुमने कब बेंचा भाई।’ दोस्त ने पूछा।
‘तुम
नहीं जानते ?’ चतुर्वेदी जी बिलकुल निश्छल हंसी हंसते
हुए बोले, ‘अरे बेचा नहीं बिकवाया ?’
‘क्या
?’ मजा लेते हुए दोस्त बोला, ‘यह धंधा कब किया?’
‘मैं
जब कलक्टर था तब मेरा नाम ले कर ईमानदारी की छौंक लगा कर सब चनाजोर गरम बेचते थे।’
चतुर्वेदी जी बोले, ‘चलो यह तो साबित हुआ कि कभी तो ऐसा दौर
था जब मैं सिनिकल नहीं था,
बोझ नहीं था सिस्टम पर।’
‘बोझ
तो तुम आज भी नहीं हो। बस जैसे बेटे के लिए लचीले हुए हो, अपने ईमानदारी के पेंचों को भी थोड़ा लचीला कर
दो।’
‘अब
क्या ख़ाक मुसलमां होंगे ?’
‘क्या
मतलब ?’
‘देखो
यार एक तो जिंदगी की ए. बी. सी. अब फिर से शुरू नहीं हो सकती। दूसरे अब साल डेढ़
साल में रिटायरमेंट हो जाएगा। तो अब क्या मुसलमां होना और क्या हिंदू होना।’
तब तक चतुर्वेदी जी के समधी श्रीवास्तव जी गुलाबी साफा बांधे हाथ
जोड़े हुए आ गए। बोले, ‘फेरे पड़ गए हैं भाई साहब ! बधाई हो।’
वह बोले, ‘आइए बाकी रस्में भी पूरी कर ली जाएं।’
‘हां, हां क्यों नहीं।’ कह कर चतुर्वेदी जी
श्रीवास्तव जी के साथ-साथ विवाह मंडप की ओर बढ़ चले।
बिस्मिल्ला खां के बजाए रिकार्ड से शहनाई की धुनें भीतर बज रही थीं।
मंद-मंद और बाहर गाना बज रहा था, ‘डोला
रे, डोला रे, डोला रे, दिल डोला रे....!’ तेज-तेज।
और नौजवान लड़के नाच रहे थे।
-29-
फ़ेसबुक में फंसे चेहरे
राम
सिंगार भाई इन दिनों फ़ेसबुक पर हैं। उन्हों ने जब एक दोस्त के कहने पर अपना
एकाउंट फ़ेसबुक पर खोला था तब वह यह हरगिज नहीं जानते थे कि वह फ़ेसबुक पर नहीं
अपने अकेलेपन की, लोगों
के अकेलेपन की आंधी में समाने का एकाउंट खोल रहे हैं। फ़ेसबुक खोल कर कई बार राम
सिंगार भाई सोचते हैं तो सोचते ही रह जाते हैं।
'आदमी के आत्म विज्ञापन की यह राह क्या उसे
अकेलेपन की आह और आंधी से बचा पाएगी?'
वह पत्नी से बुदबुदा कर पूछते हैं। पत्नी उन का
सवाल समझ ही नहीं पाती। बगल के स्टूल पर चाय-बिस्किट रख कर वापस किचेन में चली
जाती है। वह फिर से लोगों की पोस्ट देखने लग जाते हैं। एक गिरीश जी हैं। हिमाचल की
वादियों से लौटे हैं। नहाते-धोते, खाते-पीते
सारी तस्वीरें पोस्ट कर बैठे हैं। फ़ोटो में पत्नी-बच्चे सभी हैं। पर यह देखिए
कमेंट भी इस फ़ोटो पर यही लोग कर रहे हैं। 'गज़ब
पापा, नाइस
पापा।' पत्नी
का भी कमेंट है, 'ब्यूटीफुल।' गिरीश जी खुद भी 'वेरी नाइस' का कमेंट ठोंके बैठे हैं।
अद्भुत।
मिसेज सिन्हा ने तो अपनी ही फ़ोटो पोस्ट की
है। देवर लोग कमेंट लिख रहे हैं, 'ब्यूटीफुल, भाभी जी।' ननदोई लिख रहे हैं, 'मैं तो फ़िदा हो गया!' मिसेज सिन्हा पलट कर जवाब देती हैं : 'जीजा जी आप का दिल दीदी जी के
पास पहले ही से फंसा है मैं जानती हूं।'
एक किसी और का कमेंट भी है जो लगता है मिसेज सिन्हा का कुलीग है। लिखा है, 'क्या बात है, बहुत जम रही हैं।' मिसेज सिन्हा ने पलट कर जवाब दिया है, 'आफिस की ही है। रीतेश ने
क्लिक की है।' राम
सिंगार भाई किसी मित्र से फ़ोन पर बता रहे हैं मन की तकलीफ और फ़ेसबुक को बहाना
बनाए हैं। बता रहे हैं, 'बताइए
आदमी इतना अकेला हो गया है कि अपनी ही फ़ोटो पर अपने ही घर में चर्चा नहीं कर पा
रहा है। फ़ेसबुक पर चर्चा कर रहा है। आफिस के लोग भी फ़ेसबुक या ट्विट पर बात कर
रहे हैं आरकुट से हालचाल ले रहे हैं?
और तो और सदी के सो काल्ड महानायक भी ट्विट पर
अपना खांसी-जुकाम परोसते ही रहते है जब-तब। हर सेकेंड जाने कितनी स्त्रियां
गर्भवती होती हैं, मां
बनती हैं। पर इन महानायक की बहू जब विवाह के चार बरस बाद मां बनती है तो वह ट्विट
कर दुनिया को बताते हैं। हद है। और तो और इन्हीं के एक पूर्व मित्र हैं। महाभ्रष्ट
हैं। खुद को दलाल, सप्लायर
सब बताते हैं। राजनीतिक गलियारे से खारिज हैं इन दिनों। वह भी ब्लाग पर जाने
क्या-क्या बो रहे हैं।'
'फैशन है राम सिंगार भाई! फ़ैशन!!' मित्र जैसे जोड़ता है, 'और पैशन भी!'
'भाड़ में जाए ऐसा फ़ैशन और पैशन!' राम सिंगार भाई किचकिचाते
हैं।
'आप फिर भी देख तो रहे हैं राम सिंगार भाई!' मित्र चहकते हुए कहता है।
'सो तो है।'
कह कर राम सिंगार भाई फ़ोन रख देते हैं।
फिर फ़ेसबुक पर लग जाते हैं। किसी अरशद की नई
पोस्ट देख रहे हैं। अरशद का शग़ल कहिए,
पागलपन कहिए या कोई महत्वाकांक्षाएं, अकसर किसी राष्ट्रीय या
अंतरराष्ट्रीय पत्रिका के कवर पर अपनी बड़ी सी फ़ोटो पेस्ट कर पोस्ट लगा देते हैं।
बड़ी मासूमियत के साथ यह लिखते हुए कि,
'क्या करें अब की फलां मैगजीन ने मुझ पर कवर स्टोरी
की है।' अरशद
की पोस्ट देख कर लगता है जैसे दिन रात वह फ़ेसबुक पर ही बैठे रहते हैं। अपना खाना, सोना, घूमना, काम-धाम, कहां जाना है, कहां से आए हैं सब कुछ का
ब्यौरा परोसते रहते हैं। पल-प्रतिपल। कभी अपनी पुरानी फ़ोटो के साथ तो कभी नई
फ़ोटो के साथ। इन फ़ोटुओं का बखान भी ऐसे गोया गांधी जी किसी गोलमेज कांफ्रेंस से
लौटे हों। बिलकुल बहस तलब बनाते हुए। और एक से एक बुद्धिहीन इस पर दिमाग ताक पर रख
कर कि घोड़े पर बैठा कर बे सिर पैर का कमेंट करते हुए जमे बैठे हैं।
'यह कौन सी दुनिया बना रहे हैं हम?' राम सिंगार भाई बुदबुदाते
हैं।
'क्या है?'
पत्नी अचानक चाय का कप उठाते हुए थोड़ा कर्कश
आवाज़ में पूछती है।
'कुछ नहीं।'
वह बहुत धीरे से बोलते हैं।
'पता नहीं क्या-क्या अपने ही से बतियाते रहते
हैं।' कहती
पत्नी फिर चली जाती है।
अगली पोस्ट एक कवि की है। फ़ोटो में एक प्रख्यात
आलोचक के पीछे कंधे पर हाथ रखे ऐसे खड़े हैं गोया महबूबा के पीछे खड़े हों। एक
ख़ूबसूरत अपार्टमेंट के सामने खड़े दोनों मुसकुरा रहे हैं। राम सिंगार भाई फ़ोटो
पर क्लिक करते हैं। बड़ी कर के देखने के लिए। फ़ोटो बड़ी हो जाती है। मौखिक ही
मौलिक है के प्रवर्तक रहे आलोचक की यह मासूम मुस्कान देखने लायक है। इतने करीब से
भला उन्हें कोई
छू भी सकता है और वह फिर भी मुसकुरा सकते हैं,
देख कर अच्छा लगता है आंखों को। राम सिंगार भाई
फ़ोटो के नेक्स्ट पर क्लिक करते हैं। करते ही जाते हैं नेक्स्ट-नेक्स्ट-नेक्स्ट।
कवि की पत्नी की फोटुएं हैं। साज-सिंगार करती हुई स्टेप बाई स्टेप। आगे से, पीछे से। ड्रेसिंग टेबिल के
सामने जूड़ा बांधते भी, स्टेप पर स्टेप। कुछ कमेंट भी
हैं। प्रशंसात्मक कमेंट। लगभग चाकलेट की तरह चुभलाते हुए कमेंट। कवि की विवाह की
फ़ोटो भी हैं और उन के लाल और लाली की भी। मतलब बेटे और बेटी की। कुछ किताबों के
कवर और उनकी समीक्षाएं भी। माता-पिता नहीं हैं,
भाई,
बहन,
नाते रिश्तेदार नहीं हैं। लोग-बाग नहीं हैं।
पत्नी है, बेटा
है, बेटी
है और आलोचक है। क्या एक कवि को सिर्फ़ इतना ही चाहिए? तो क्या यह कवि भी अकेला हो
गया है?
वह सोचते हैं जिस समाज में कवि भी अकेला हो जाए
वह समाज कितने दिन तक सड़ने से बचा रह पाएगा?
राम सिंगार भाई फ़ेसबुक लॉग-ऑफ कर कंप्यूटर टर्न
ऑफ कर देते हैं। बिस्तर पर आ कर लेट जाते हैं। पर मन फ़ेसुबक में फंसे तमाम चेहरों
में ही लगा पड़ा है। वह सोचते हैं कि क्या यह वही फ़ेसबुक है जिसने उत्तरी अफ्रीका
और कि अरब जगत में तानाशाहों के खि़लाफ चल रहे जन विद्रोह में शानदार भूमिका निभाई
है। इतना कि चीन जैसे देश के तानाशाहों ने मारे डर के चीन में फ़ेसबुक पर बैन लगा
दिया। क्या वह यही फ़ेसबुक है जिस के सदस्यों की संख्या 75 करोड़ को पार कर एक अरब होने
की ओर अग्रसर है? क्या
यह वही फ़ेसबुक है जिस पर तमाम राष्ट्राध्यक्ष अपनी बात कहने के लिए प्लेटफ़ार्म
की तरह इस्तेमाल करते हैं। जनता से संवाद करते हैं। फे़सबुक हो ट्विटर या आरकुट!
अपने प्रधानमंत्री तो खै़र संसद या प्रेस से भी नहीं बोलते। मौन साध जाते हैं। पर
गूगल बोलता है कि अब वह भी फ़ेसबुक की तरह गूगल प्लस लाएगा। लाएगा क्या ला भी
दिया। पर वह नशा नहीं घोल पाया जो फ़ेसबुक ने लोगों के जेहन में घोल रखा है। क्या
यह वही फे़सबुक है? जो
सब को हिलाए हुए है?
फिर वह बुदबुदाते हैं कि, 'है तो वही फ़ेसबुक!' राम सिंगार भाई के दफ़्तर में
एक सहयोगी के जन्म दिन की सूचना उन्हें फ़ेसबुक पर ही मिली। उन्हों ने फ़ेसबुक पर
उन्हें जन्म दिन की बधाई लिखी। और उन के नाम पर क्लिक कर उन के प्रोफ़ाइल पर बस
यूं ही नज़र डाली। उन्हों ने देखा कि तमाम सूचनाओं के साथ उन की पढ़ाई एक नामी
गर्ल्स डिग्री कॉलेज में हुई दर्ज थी। दूसरे दिन उन्हों ने आफिस में जन्म दिन की
बधाई देते हुए लगभग चुहुल करते हुए तमाम सहयोगियों को यह सूचना परोसी कि 'देखिए भाई यह फला गर्ल्स
डिग्री कालेज के पढ़े हुए हैं।' उन
सहयोगी को यह बात चुभ गई। तो राम सिंगार भाई ने बताया कि, 'भाई, सपना देख कर तो बता नहीं रहा
हूं। आप ने अपने फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल पर खुद दर्ज कर रखा है।' तो यह कहना भी उन को नागवार
गुज़रा। बोले, 'फिर
आप ने ही लिख दिया होगा।'
'मैं कैसे आप की प्रोफ़ाइल में कुछ लिख सकता हूं?'
'आप कुछ भी कर सकते हैं।'
'ओह आप का जन्म दिन है आज। कम से कम आज तो
कड़वाहट मत घोलिए। और मस्ती कीजिए।'
'आप ही तो सब कुछ कर रहे हैं।'
बात बढ़ती देख राम सिंगार भाई ने क्षमा मांगी और
चुपचाप अपनी सीट पर आ कर बैठ गए थे। फिर भी उन्होंने फ़ेसबुक पर लगातार उन की
प्रोफ़ाइल चेक की पर गर्ल्स कालेज में उनके पढ़ने का डिटेल हटा नहीं था। दो महीने
बाद तब हटा जब उन्होंने समय निकाल कर एक सहयोगी की मदद ली। और अपनी बर्थ डे की
फ़ोटो पोस्ट की। पता चला कि वह खुद कुछ पोस्ट नहीं कर पाते। किसी न किसी सहयोगी की
मदद ले कर पोस्ट कर पाते हैं। पिछली दफ़ा भी दफ़्तर में नई आई एक लड़की से एकाउंट
खुलवाया था। तो उस ने अपने कालेज का नाम रूटीन में लिख दिया। जिसे यह चेक कर नहीं
पाए। पर फ़ेसबुक पर बने रहने का जो शौक़ था,
जो रोमांच था,
जो अकेलेपन की आंच और सब से जुड़े रहने का चाव
था, उन्हें
फ़ेसबुक से बांधे रहा। राम सिंगार भाई के साथ भी यही कुछ ऐसे-ऐसे ही तो नहीं है पर
है कुछ-कुछ ऐसा-वैसा ही। आख़िर पचास-पचपन के फेंटे में आने के बाद टेकनीक से
दोस्ती बहुधा कम ही लोग कर पाते हैं। ज़्यादातर नहीं कर पाते। राम सिंगार भाई भी
नहीं कर पाते। मेल एकाउंट खोलना हो,
फ़ेसबुक एकाउंट खोलना हो, कुछ पोस्ट करना हो, अटैच, कापी, पेस्ट वह सब कुछ बच्चों के
भरोसे करते-कराते हैं। छोटा बेटा इसमें ज़्यादा मददगार साबित होता है। पर जो भी
कुछ होता है वह उसे री-चेक ज़रूर कर लेते हैं। कहीं कुछ ग़लत होता है या कई बार
सही भी होता है और उन्हें शक हो जाता है तो फ़ौरन रिमूव करवा देते हैं। न सिर्फ़
फ़ेसबुक या इंटरनेट पर बल्कि असल ज़िंदगी में भी वह इसी अदा के आदी हैं।
फ़ेसबुक पर राम सिंगार भाई चैटिंग भी करते हैं।
इसमें रोमन में टाइप कर के काम चलाते हैं। क्यों कि अंगरेजी बहुत आती नहीं और
हिंदी में टाइप करने आता नहीं। सो रोमन बहुत मुफ़ीद पड़ती है। याहू मैसेंजर पर भी
कभी-कभी राम सिंगार भाई चैटिंग करने पहुंच जाते हैं। फर्जी मेल आई-डी बना कर। यह
फर्जी मेल आई-डी भी उन्होंने बेटे से बनवाई है। पर पासवर्ड खुद डाला। बेटा यह देख
कर हौले से मुस्कराया। पर जाहिर नहीं होने दिया। टीनएज बेटा समझ गया कि बाप कुछ
खुराफात करने की फ़िराक़ में है। याहू मैसेंजर पर फर्जी नाम से चैटिंग में राम सिंगार
भाई अपनी सारी यौन वर्जनाएं धो-पोंछ डालते हैं। वह भी खुल्लमखुल्ला। औरतें भी एक
से एक मिल जाती हैं कभी असली, कभी
नकली। कभी देशी-कभी विदेशी। मर्दों से ज़्यादा दिलफेंक, ज्यादा आक्रामक मूड। फुल
सेक्सी अवतार में। वात्स्यायन के सारे सूत्रों को धकियाती, नए-नए सूत्र गढ़ती-मिटाती, एक नई ही दुनिया रचती-बसाती।
एक दिन तो हैरत में पड़ गए राम सिंगार भाई। एक देसी कन्या बार-बार गैंगरेप की
गुहार लगाने लगी। कहने लगी, 'हमें
गंदी-गंदी गालियां दो। अच्छी लगती हैं।'
राम सिंगार भाई टालते रहे। अंततः उस ने लिखा, 'कैसे मर्द हो जो गाली भी नहीं
दे सकते? गैंगरेप
भी नहीं कर सकते?' वगैरह-वगैरह
मर्दानियत को चुनौती सी देती। तमाम अभद्र और अश्लील बातें। गालियों की संपुट के
साथ। ऐसे तमाम वाकये उन के साथ मैसेंजर की चैटिंग में हुए। कभी इस तरह, तो कभी उस तरह।
पर फ़ेसबुक की चैटिंग में यह सब चीज़ें नहीं
मिलीं राम सिंगार भाई को। चूंकि पूरी पहचान के साथ ज़्यादातर लोग होते हैं, सब के संवाद का नया पुराना
रिकार्ड भी होता है तो लोग-बाग शालीनता की खोल में समाए रहते हैं। थोड़ा-बहुत
इधर-उधर की फ़्लर्ट के बावजूद शालीनता का शाल वन उन के पर्यावरण को फिट बनाए रखता
है। पर जो अकेलेपन और संत्रास का तनाव तंबू पाते हैं फ़ेसबुक पर राम सिंगार भाई तो
हिल जाते हैं। जो दिखावा कहिए, आत्म
विज्ञापन कहिए, आत्म
मुग्धता या चाहे जो कहिए वह उन्हें फ़ेसबुक से तो जोड़ता है, पर भीतर-भीतर कहीं गहरे
तोड़ता है। बताइए भाई लोग कोई गाना सुनते हैं,
अच्छा लगता है तो उस का वीडियो अपलोड कर देते
हैं कि लीजिए आप भी सुनिए। गाना जाना पहचाना है,
हर कहीं सुलभ है। फिर भी लोग यहां देख-सुन कर
बाग-बाग हो जाते हैं। कमेंट पर कमेंट,
खोखले ही सही,
भर देते हैं। नाइस, ब्यूटीफुल, वाह, वाव, गज़ब! अब इस सड़न को, इस मूर्छा को, इस झुलसन को राम सिंगार भाई
किस हरसिंगार की छांह में ले जा कर पुलकाएं कि लोगों का अकेलापन टूटे, संत्रास और तनाव छंटे। राम
सिंगार भाई क्या करें?
ऐसे ही जब एफ़ एम टाइप रेडियो चैनलों पर कुछ लोग
एनाउंसरों के झांसे में आ कर अपने घर की पूरी कुंडली बांच डालते हैं, ख़ास कर महिलाएं तो राम
सिंगार भाई को बहुत कोफ़्त होती है। बहुएं अपनी सास की शिकायत, लड़कियां अपने ब्वाय फ्रेंड
के ब्यौरे और लड़के अपनी गर्ल फ्रेंड की बेवकूफियां झोंकते रहते हैं तो कुछ लड़के
भी अपनी मम्मी की अंधविश्वास टाइप शिकायतें छांटते मिलते हैं। कार ड्राइव करते यह
सब सुनते राम सिंगार भाई हंस पड़ते हैं। तो कभी खीझ पड़ते हैं। अब देखिए राम
सिंगार भाई फिर फ़ेसबुक पर है। एक जोशी जी हैं जो किसी रेडियो पर ब्राडकास्टर हैं।
रेडियो पर हिंदी बोलते हैं पर फ़ेसबुक पर अंग्रेजी बूकते हैं और अपने इलाहाबाद
यूनिवर्सिटी में पढ़े होने का दम भी भरते रहते हैं जब-तब। पूरे दंभ के साथ।
अंगरेजी बूकते हुए। कभी किसी कामेडियन की क्लिप पोस्ट करते, कभी अपने ब्राडकास्टर की
क्लिप पोस्ट करते जो होती हिंदी में ही हैं,
पर वह उन का नैरेशन अंगरेजी में ही
छौंकते-बघारते मिलते हैं। किसी ने उन की इस अंगरेजी टेंडेंसी पर तल्ख़ कमेंट लिखा
तो उन्हों ने सफाई भी दी कि वह हिंदी में टाइप नहीं कर पाते और कि रोमन में हिंदी
लिखना उन्हें बेवकूफी लगती है। हालांकि यह बात उन्हों ने रोमन में ही लिखी।
अपने इन जोशी जी की एक और अदा है कि अगर कोई
महापुरुष टाइप व्यक्ति दिवंगत होता है तो वह फट उस से अपने ब्राडकास्टर का रिश्ता
जोड़ते हैं और अपना रूप सुरसा की तरह बढ़ा लेते हैं और संबंधित व्यक्ति की एक
फ़ोटो अपलोड करते हुए अंगरेजी में बता देते हैं कि कैसे उन्हों ने फलां का
इंटरव्यू लिया था। जैसे कि अभी-अभी जब हुसैन का निधन लंदन में हुआ तब उन्हों ने
हुसैन की एक फ़ोटो अपलोड की और बताया कि उन दिनों वह अपनी शादी की तैयारियों में
थे। पर जब उन्हें फोन पर बताया गया कि हुसैन शहर में हैं तो वह छुट्टी रद्द कर उन
का इंटरव्यू कर आए। अब इंटरव्यू में हुसैन ने उन से क्या कहा यह उन्हों ने बताने
की ज़रूरत नहीं समझी। बताना भी उन को सिर्फ़ यही था कि वह हुसैन से मिले थे। ऐसे
गोया हुसैन से नहीं, वह
फ़िराक़ से मिले थे। बरक्स आने वाली नस्लें तुम पर फख्र करेंगी हमअसरो कि तुमने
फ़िराक़ को देखा था। आत्म विज्ञापन की इस बीमारी को अपने मनोवैज्ञानिक लोग किस
कैटेगिरी में रखते होंगे राम सिंगार भाई नहीं जानते। नहीं कमेंट में लिखते ज़रूर।
अब देखिए एक पत्रकार भी हैं फ़ेसबुक पर। उन की एक पोस्ट जोशी जी पर भी भारी है। उन
की एक पोस्ट बताती है कि वह ओबामा से मिलने वाशिंगटन गए। कि उन्हें ख़ास तौर पर
बुलाया गया। गो कि वह हिंदी अखबार में थे। इस बारे में उन्हों ने विस्तार से कहीं
इंटरव्यू भी दिया है और उस का लिंक भी पोस्ट किया है। पर पूरे इंटरव्यू में ओबामा
के साथ उन की फ़ोटो तो है पर अपने इंटरव्यू में ओबामा ने उन से क्या कहा, या ओबामा से इन्हों ने क्या
पूछा, इसका
कहीं ज़िक्र नहीं है।
एक हिंदी के लेखक हैं। उन्हें अंतरराष्ट्रीय
टाइप का लेखक होने का गुमान है। उन के इस गुमान के ट्यूब मैं कुछ संपादक-आलोचक लोग
हवा भी भरते रहते हैं। वह भी अक्सर अंगरेजी में सांस लेते फ़ेसबुक पर उपस्थित
रहते हैं। जैसे कुछ अभिनेता अभिनेत्री काम हिंदी फ़िल्म में करते हैं पर उसके बारे
में बात अंगरेजी में करते हैं। एक आलोचक हैं,
समाजशास्त्री भी हैं। कबीर के लिए जाने जाते
हैं। वह फ़ेसबुक पर भी कबीर को नहीं छोड़ते। कबीर ही भाखते हैं पर अंगरेजी में ही।
एक और पोस्ट है। एक महिला हैं जो अपनी कंपनी के चेयरमैन से लिपट कर खड़ी है। यह
बताती हुई कि आज ही उन का भी बर्थ डे है और कंपनी के चेयरमैन का भी। कमेंट्स भी
नाइस, ब्यूटीफुल
वाले हैं। यह कौन सा अकेलापन है? इस
की कोई तफ़सील जाने किसी समाजशास्त्री,
किसी मनोवैज्ञानिक या किसी और जानकार के पास है
क्या? जो
आदमी अपनी पहचान किसी अंगरेजी या किसी बड़े से जुड़ कर ही ढूंढना चाहता है? भले ही वह कोई अपराधी, माफिया या धूर्त या ठग ही
क्यों न हो? क्या
पृथ्वी आकाश से मिल कर बड़ी होती है?
या कि फिर कोई नदी किसी सागर से मिलने के बाद
नदी रह जाती है क्या? राम
सिंगार भाई के मन में उठा यह सवाल जैसे सुलग सा जाता है।
ऐसे लगता है जैसे लोग अपना विज्ञापन खुद तैयार
कर रहे हों? तो
क्या यह सारे लोग विज्ञापनी उपभोक्ता संस्कृति के शिकार हो चले हैं। लोग यह बात
आख़िर क्यों नहीं समझना चाहते कि इस विज्ञापनी संस्कृति ने लोगों के जीवन में फूल
नहीं, कांटे
बिछाए हैं। यह विज्ञापनी संस्कृति जैसे आप के सोचने के लिए कुछ छोड़ती ही नहीं। वह
जताना चाहती है कि आप कुछ मत सोचिए,
आप के लिए सारा कुछ हम ने सोच लिया है। आप कहां
रहेंगे, क्या
खाएंगे, क्या
पहनेंगे, कहां
सोएंगे, क्या
सोचेंगे, क्या
बतियाएंगे और कि क्या सपने देखेंगे,
यह भी हम बताएंगे। यह सब आप हम पर छोड़िए। आदमी
के सपनों के दुःस्वप्न में बदलते जाने की यह कौन सी यातना है भला? जो विज्ञापनी उपभोक्ता
संस्कृति हमारे लिए किसी दुर्निवार रेशमी धागे से हमारे यातना शिविर बुन कर तैयार
कर रही है? कि
आदमी या तो फ़ेसबुक पर फूट पड़ता है या रिरियाता हुआ अपना विज्ञापन रच कर किसी
कुम्हार की तरह अपने ही को रूंध देता है?
किसी कबीर की तरह अपनी यातना की चदरिया बुन लेता
है?
'तह के ऊपर हाल वही जो तह के नीचे हाल / मछली बच
कर जाए कहां जब जल ही सारा जाल' की
तर्ज पर ही यही हाल बहुतेरे ब्लागधारियों का है। क्या विवेकानंद, क्या गांधी, लोहिया, टालस्टाय, टैगोर, अरस्तु, प्लेटो, मैक्समूलर सब के जनक जैसे यही
लोग हैं। लगता है इन्हीं ब्लागों को पढ़ कर ही यह लोग पैदा हुए थे। कालिदास, भवभूति, बाणभट्ट, शेक्सपीयर, बायरन, कीट्स, काफ्का इन के ही चरण पखार कर
खड़े हुए थे। अद्भुत घालमेल है। दो ब्लागिए भिड़े हुए हैं कुत्तों के मानिंद कि यह
कविता मेरी है। तीसरा ब्लागर बताता है कि दोनों की ही नहीं अज्ञेय की है। एक
मार्कसिस्ट घोषणा कर रहे हैं अज्ञेय की भी नहीं यह तो फलां जापानी की है। फ़ेसबुक
पर भी यह मार काट जब तब मच जाती है। एक शायरा हैं;
उन्होंने अपनी जो फ़ोटो लगा रखी है, हूबहू अभिनेत्री रेखा से
मिलती है। राम सिंगार भाई उन की सुंदरता का बखान करते हुए उन्हें एक दिन संदेश लिख
बैठे और धीरे से यह भी दर्ज कर दिया कि आप की फ़ोटो रेखा से बहुत मिलती है। उन का
ताव भरा जवाब आ गया कि मैं फ़ोटो और शेर किसी और के नहीं अपने ही इस्तेमाल करती
हूं। अब क्या करें राम सिंगार भाई तब,
जब बहुतेरी महिलाओं ने अपनी फ़ोटो की जगह
अभिनेत्रियों या माडलों की फ़ोटो पेस्ट कर रखी है। सुंदर दिखने का यह एक नया कौशल
है कि आंख में धूल झोंकने की कोई फुस्स तरक़ीब?
राम सिंगार भाई समझ नहीं पाते और बुदबुदाते हैं
कि कल को मां की फीगर ठीक नहीं रहेगी तो लोग मां भी बदल लेंगे?
राम सिंगार भाई के आफ़िस में एक शुक्ला जी हैं।
वह फ़ेसबुक से अतिशय प्रसन्न हैं कि उन की बेटी की ज़िंदगी नष्ट होने से बच गई।
हुआ यह कि वह अपनी एक बेटी की शादी एक एन.आर.आई. लड़के से तय करने के लिए बात चला
रहे थे। बात फ़ाइनल स्टेज में थी कि तभी किसी की सलाह पर वह एन.आर.आई. लड़के का
फ़ेसबुक पर फ़ाइल उस की प्रोफ़ाइल देख बैठे। प्रोफ़ाइल में पार्टी में ड्रिंक, लड़कियों से लिपटने-चिपटने के
कई फ़ोटो पोस्ट कर रखे थे उस के दोस्तों ने। शुक्ला जी का मोहभंग हो गया।
एन.आर.आई. लड़के से भी इस बारे में पूछा। वह कोई साफ जवाब नहीं दे सका। बात ख़त्म
हो गई। फ़ेसबुक पर वैसे हजारे, स्वामी
की चर्चा भी है और उन के प्रशंसक भी खूब हैं। पर सतही और भेड़िया धसान में लिप्त।
अब देखिए कि किसी ने जूते-चप्पलों के एक ढेर की फ़ोटो पोस्ट कर दी है। शायद किसी
मंदिर के बाहर का दृश्य है। और जूते भी कूड़े के ढेर की शक्ल में हैं। अब हर कोई
अपने कमेंट्स में इन जूतों को नेताओं पर दे मारने की तजबीज देने में लग गया है।
कोई पत्रकारों के हवाले इन जूतों को करने के भी पक्ष में है। तो कोई अपने फटे
पुराने जूते भी देने की पेशकश कर रहा है।
कमेंट्स की जैसे बरसात है। बताइए जूते के ढेर पर
ढेर सारे कमेंट्स। राम सिंगार भाई एक मित्र से इस की निरर्थकता पर चर्चा करते हैं
तो मित्र उन्हें ही डपट बैठता है, 'तो
काहें फ़ेसबुक-वेसबुक पर जा कर अपना समय नष्ट करते हो मेरे भाई!' वह चुप रह जाते हैं। ऐसे ही
एक दफ़ा जब वह न्यूज चैनलों पर भूत-प्रेत,
सास-बहू,
लाफ्टर चैलेंज जैसे कार्यक्रमों की तफ़सील में
जा कर एक मित्र से कहने लगे, 'बताइए
ये भला न्यूज चैनल हैं? खबर
के नाम पर चार ठो खबर में दिन रात पार कर देते हैं और न्यूज के नाम पर अंधविश्वास
परोसते हैं, मनोरंजन
परोसते हैं। वह भी घटिया।' तो
उस मित्र ने भी जैसे बिच्छू की तरह डंक मारते हुए कहा, 'देखते ही क्यों हैं आप यह
न्यूज चैनल? क्यों
अपना टाइम नष्ट करते हैं?' राम
सिंगार भाई ने तब से उन न्यूज चैनलों को देखना बिलकुल तो नहीं बंद कर दिया पर कम
बहुत कर दिया। उन का समय बचने लगा। वह यह बचा समय बच्चों के साथ शेयर करने लगे, माता-पिता के साथ बैठने लगे।
पड़ोसियों से फिर मिलने-जुलने लगे। कि तभी यह इंटरनेट पर सर्फिंग की बीमारी ने
उन्हें घेर लिया। वह सर्फिंग करने लगे। फिर समय उन का नष्ट होने लगा। तो क्या वह
यह सर्फिंग भी बंद कर दें? छोड़
दें फ़ेसबुक-वेसबुक?
राम सिंगार भाई सचमुच सब कुछ छोड़-छाड़ कर अपने
गांव आ गए हैं। यहां इंटरनेट नहीं है। टी.वी. तो है,
टाटा स्काई भी है कि सभी चैनल देख सकें। पर
बिजली नहीं है। बिजली तो शहरों से भी ग़ायब होती है पर इनवर्टर थोड़ा साथ दे जाता
है। लेकिन गांव में तो इनवर्टर बेचारा चार्ज़ भी नहीं हो पाता। हां लेकिन गांव में
सड़क हो गई है। डामर वाली। सड़क के किनारे पाकड़ के पेड़ के नीचे कुछ सीनियर
सिटीज़न की दुपहरिया-संझवरिया कटती है। राम सिंगार भाई भी पहुंच जाते हैं वहीं
दुपहरिया शेयर करने। तरह-तरह की बतकही है। आरोप-प्रत्यारोप है। चुहुल है, चंठई है। ताश का खेल है। खैनी
का गदोरी पर मलना, ठोंकना, फूंकना, खाना-थूकना है। और दुनिया भर
की बातें हैं। नाली, मेड़
का झगड़ा, शादी, ब्याह, गौना, तीज, चौथ का ब्योरा है। किस का
लड़का, किस
का नाती कहां तक पहुंचा इस सब की तफ़सील है,
कौन किस से फंसा,
कौन किस से फंसी के बारीक़ ब्यौरे भी। मंहगाई
डायन को लानतें हैं। और इस सब पर भी भारी है कुछ रिटायर्ड लोगों की पेंशन में
डी.ए. की बढ़ोत्तरी।
एक रेलवे के बड़े बाबू हैं जिन को रिटायर हुए भी
बीस बरस से ज़्यादा हो गए हैं। वह दो बार अपनी आधी पेंशन बेच चुके हैं। एक बार तब
जब रिटायर हुए थे। बड़े बेटे को घर बनवाना था तो उस ने 'कुछ मदद' कर दीजिए के नाम पर पी.एफ.
ग्रेच्युटी सहित पेंशन भी उन की आधी बिकवा दी। दस साल बाद छोटे बेटे का नंबर आ
गया। बेटा तो नहीं पर छोटी बहू उन की आधी पेंशन भी खींचती रही और रिटायर होने के
दस साल बाद फिर उनकी आधी पेंशन बिकवा दी कि आख़िर मेरा भी कुछ हक़ होता है। और अब
बीस बरस बाद वह फिर फुल पेंशन के हक़दार हो गए हैं। अब और पेंशन बिक नहीं सकती। सो
गांव के सीनियर सिटीज़ंस में सर्वाधिक पेंशन बड़े बाबू की ही हो चली है। यह जान कर
सेना से रिटायर एक कंपाउंडर हैं, बड़े
बाबू की खिंचाई करते हुए चुहुल करते हुए कहते हैं,
'तो बड़े बाबू अब आप रेलवे पर फुल बोझ हैं।' और चुहुल वश जोड़ते हैं, ' अब तो आप को मर जाना चाहिए!' 'क्या?' बड़े बाबू चौंके।
'अरे बारी-बारी पेंशन दो बार बेंचने के बाद भी
पूरी पेंशन ले रहे हैं आप। रेलवे का ए.सी. पास भी भोग रहे हैं और अस्पताल का मजा
भी मुफ़्त में। तो और क्या हैं रेलवे पर जो आप बोझ नहीं हैं तो?' वह बोलते ऐसे हैं जैसे बड़े
बाबू यह सब रेलवे खर्च पर नहीं उन के खर्च पर भोग रहे हैं। और वह जैसे फिर
जोड़ते हैं, 'अब
तो आप को फुल एंड फ़ाइनल मर जाना चाहिए।'
'भगवान कहां पूछ रहे हैं।' बड़े बाबू की आंखों की कोरें
भींग जाती हैं, 'कोई
पाप किया था जो इतने साल जी गया हूं।'
वह धोती की कोर से आंखें पोंछते हुए बोलते हैं, ' मर तो मैं गया ही हूं। बस देह
बाक़ी है।' दरअसल
बड़े बाबू के बेटे उन्हें सिर्फ पेंशन दुहने की मशीन माने बैठे हैं। और जब-तब आपस
में रार ठाने रहते हैं। सो बड़े बाबू दुखी हैं। पेंशन वैसे भी उन के हाथ आती कहां
है? छह-छह
महीने की पेंशन दोनों बेटों में बंट जाती है। उन के हाथ आती है तो सिर्फ तकरार। सो
जो बड़े बाबू अभी डी.ए. जोड़ कर बताते हुए छलक रहे थे कि, 'मेरी पेंशन तो इतनी!' वही बड़े बाबू रुआंसे हो कर
उदास हो गए हैं।
भरी दुपहरिया एक सन्नाटा सा पसर गया है इस पाकड़
के पेड़ के नीचे कि तभी एक नौजवान अपनी जगह से उठ कर बड़े बाबू के पास आता है। उन
के पांव छूते हुए कहता है, 'बड़े
बाबू बाबा बुरा मत मानिएगा कंपाउंडर बाबा का! उन की बात का!' वह जैसे जोड़ता है, 'रेलवे पर आप जो होंगे, होंगे मैं नहीं जानता। मैं तो
बस इतना जानता हूं कि इस गांव के लिए आप भगवान हैं! नहीं जो आप न होते तो इस गांव
में यह सड़क न होती, स्कूल
न होता, बिजली
न आई होती? तो
आप का जीवन इस गांव के लिए बहुत ज़रूरी है। आप और लंबा जीएं! शत-शत जिएं!' नौजवान की यह बात सुन कर सब
लोग बड़े बाबू को हौंसला देते हैं। कंपाउंडर भी आ कर उन के पैर छूते हुए उन से
माफी मांगते हुए कहता है, 'भइया
माफ कीजिए! मज़ाक-मज़ाक में आप से हम थोड़ा कड़ा बोल गए! अप्रिय बोल गए!'
'अरे कोई बात नहीं।' बड़े बाबू सहज होते हुए बोले, 'यह तो मैं भी समझता हूं।
हमारे आपस की बात है।' पाकड़
के पेड़ के नीचे बैठी सभा अब सहज हो चली है। पर राम सिंगार भाई सहज नहीं हो पाते।
उन के मन में सवाल सुलगता है कि बड़े बाबू आख़िर कैसे गांव के भगवान बन गए। आखिर
किस जादू की छड़ी से बड़े बाबू ने गांव में सड़क,
स्कूल और बिजली की व्यवस्था करवा दी? राम सिंगार भाई के मन में उठा
यह सवाल जैसे उनके चेहरे पर भी चस्पा हो जाता है। वह नौजवान राम सिंगार भाई की
शंका को समझ गया। बोला, 'चाचा
आप तो रहते हैं, शहर
में। गांव-गाड़ा के बारे में कुछ जानते तो हैं नहीं।' वह ज़रा रुका और बोला, 'असल में कुछ साल पहले हमारा
गांव अंबेडकर गांव घोषित हुआ। अलक्टर,
कलक्टर,
सी.डी.ओ. फी.डी.ओ., ई.डी.ओ. बी.डी.ओ. सब अफसरान
आने लगे। गांव को विकसित करने के लिए। विकास करने के लिए। यहां-वहां नाप जोख करते, मीटिंग करते चले जाते। हरदम
आपस में इंगलिश में बतियाते। हम लोग कुछ समझ ही नहीं पाते थे। मीटिंग होती, इंगलिश होती पर विकास नहीं
होता गांव का और अफसर चले जाते।'
'फिर?'
राम सिंगार भाई ने जिज्ञासा में मुंह बाया। 'फिर क्या था एक बार अफसरान
अंगरेजी में गिट-पिट कर रहे थे इसी पाकड़ के पेड़ के नीचे। कुर्सी पर बैठ कर। ई
हमारे बड़े बाबू बाबा भी यहीं खड़े धोती खुंटियाए उन की गिट-पिट सुनते-सुनते अचानक
भड़क गए। बोले, ' तो
सारा काम आप लोग कागज पर ही करेंगे।'
'क्या कागज पर करेंगे?' एक अफसर ने बड़े बाबू को
डपटते हुए पूछा। 'इस
अंबेडकर गांव का निर्माण। इस गांव का विकास! इस गांव की सड़क, स्कूल और बिजली। और क्या!' बड़े बाबू ने उस अफसर की उसी
को टोन में डपटा। 'तुम
को कैसे मालूम! कि यह सब कागज पर होगा?'
'आप लोग इंगलिश में यही तो तब से बतिया रहे हैं।' यह बात थोड़ा अदब से लेकिन
इंगलिश में बड़े बाबू ने कही। तो अफसरों की इस पूरी टीम के माथे पर पसीना आ गया।
एक अफसर कंधे उचकाते हुए, बुदबुदाते
हुए बोला, 'ओह
यू देहाती भुच्च! डू यू नो इंगलिश?'
'वेरी वेल सर!'
बड़े बाबू ने मुस्करा कर कहा। तो अफसरों की टीम
आनन-फानन सिर पर पांव रख कर भाग गई।'
'अच्छा!'
राम सिंगार भाई ने मुसकुरा कर पूछा। 'इतना ही नहीं चाचा जी!' वह नौजवान बोला, 'बड़े बाबू ने फिर जन सूचना
अधिकार के तहत गांव के विकास के बारे में पूरी सूचना मांगी। योजना, बजट, समय सीमा वग़ैरह। फिर तो वही
अफसर बड़े बाबू बाबा के आगे पीछे घूम कर सारे काम करवाने लगे और देखिए न! बड़े
बाबू के एक इंगलिश जानने भर से समूचा गांव विकास में नहा गया। कहीं कोई घपला नहीं
हो पाया!' नौजवान
बोला, 'आज
भले देश अन्ना हजारे को जानता हो पर हमारे गांव में तो बड़े बाबू पहले ही उन का
काम अपने गांव में कर बैठे हैं।' 'अरे
तो वइसे ही थोड़े न!' कंपाउंडर
बोला, 'बड़े
बाबू अंगरेजों के जमाने के मैट्रिक पास हैं। फुल इंगलिश जानते हैं। इन के इंगलिश
के आगे बड़े-बड़े हाकिम-अफसर पानी भरें!'
राम सिंगार भाई यह सब सुन कर मुदित हुए। फिर
दूसरे ही क्षण वह सोचने लगे कि, वह
अब इस बड़े बाबू के फ़ेस का, इस
गांव के फ़ेस का, इस
गांव के लोगों के फ़ेस का क्या करें?
और खुद से ही बुदबुदा बैठे, 'हां लेकिन यह फ़ेस फ़ेसबुक पर
नहीं हैं!' 'कुछ
कहा चाचा जी आप ने?' नौजवान
ने भी बुदबुदा कर ही पूछा। 'अरे
नहीं, कुछ
नहीं।' शहर
वापस आ कर कुछ दिन अनमने रहे राम सिंगार भाई। नहीं बैठे नेट पर सर्फिंग करने। नहीं
खोला अपना फ़ेसबुक एकाउंट! पर एक दिन अचानक वह फ़ेसबुक एकाउंट खोल बैठे। अपने गांव
का यह पूरा क़िस्सा संक्षेप में बयान किया। टुकड़े-टुकड़े में बयान किया। और पूछा
कि हमारे फ़ेसबुक के साथियों में यह सरोकार,
यह जन सरोकार क्यों नहीं दीखता? बड़े बाबू वाले फ़ेस या गांव
वाले फ़ेस हमारे फ़ेसबुक से नदारद क्यों हैं?
साथ में उन्हों ने अपने गांव की कुछ फ़ोटो भी
पोस्ट की। राम सिंगार भाई की इस पोस्ट पर फ़ेसबुक में कोई खास हलचल नहीं हुई। कोई
कमेंट नहीं आया। जब कि उन्हों ने दूसरे दिन देखा कि एक जनाब ने एक माडल की फ़ोटो
पोस्ट की थी। उस माडल की नंगी पीठ पर कुछ लिखा था। अंगरेजी में लिखा था। उस नंगी
पीठ के बहाने साइड से उस का नंगा वक्ष भी दिख रहा था। देखते ही देखते सौ से अधिक
कमेंट एक घंटे के भीतर ही आ गए थे। एक से एक मोहक,
छिछले,
मारक और कामुक कमेंट्स!
हां,
तीसरे दिन राम सिंगार भाई ने देखा कि उन के गांव
वाली पोस्ट पर भी एक-एक कर दो कमेंट आए थे। एक ने लिखा था इतनी कठिन हिंदी मत लिखा
कीजिए कि डिक्शनरी देखनी पड़े। दूसरे ने लिखा था कि देहाती बात लिख कर बोर मत किया
करो! राम सिंगार भाई ने अपना कमेंट लिख कर पूछा दोनों फ़ेसबुक मित्रों से कि आख़िर
कौन सी बात समझ में नहीं आई और कि किस बात ने बोर किया? जवाब के नाम पर फिर एक सवाल
उसी दिन आ गया था एक कमेंट में। सवाल अंगरेजी में ही था कि यह सरोकार क्या होता है? हां, यह भी बताएं कि जन सरोकार भी
क्या होता है? आखिर
यह है क्या? हां, कमेंट में सरोकार और जन
सरोकार रोमन में लिखा था। यह पढ़ कर राम सिंगार भाई ने माथा पीट लिया। और तय किया
कि अब वह फिर कभी फ़ेसबुक पर नहीं बैठेंगे। फ़ेसबुक में फंसे इन चेहरों से बात
करना दीवार में सिर मारना है, कुछ
और नहीं। यह बात भी उन्हों ने अपने पोस्ट में लिखी और फ़ेसबुक एकाउंट लॉग-ऑफ़ कर
दिया। कुछ दिनों तक फ़ेसबुक से अनुपस्थित रहने के बाद राम सिंगार भाई फ़ेसबुक पर
अब फिर से उपस्थित रहने लगे हैं। यह सोच कर कि एक सिर्फ़ उन के अनुपस्थित रहने से
तो फ़ेसबुक बदलेगा नहीं, उपस्थित
रहने से शायद कोई फ़र्क़ पड़े।
तो क्या राम सिंगार भाई फ़ेसबुक के नशे के आदी
हो गए हैं
।
-30-
सूर्यनाथ की मौत
‘मम्मी
आओ भी!’
‘नहीं
बेटा नहीं।’
‘अरे
आओ भी।’ कह कर नेहा ने मम्मी का हाथ पकड़ कर खट से खींच कर चलते हुए एस्केलेटर पर
चढ़ा दिया। पीछे से बुलबुल भी एस्केलेटर पर चढ़ गई। और ज़रा ज़ोर से बोली, ‘बकअप मम्मी!
बस ऐसे ही सीधी खड़ी रहना। डरना नहीं। मैं पीछे खड़ी हूं।’
‘पर
मेरी तो जान निकली जा रही है।’ मम्मी धीरे से बुदबुदाईं।
‘कुछ
नहीं होगा मम्मी। बस खड़ी रहो।’ कहते हुए उस ने देखा कि मम्मी ने आंखें बंद कर ली
हैं तो बोली, ‘नहीं
मम्मी आंखें बंद मत करो खुली रखो।’
सो मम्मी ने आंखें खोल लीं। मम्मी
देख कर अचरज में थीं कि कैसे तो एस्केलेटर की सीढ़ियां एक दूसरे पर चढ़ती उतरती जा
रही थीं। इतने में झट से फ़्लोर आ गया। नेहा मम्मी का हाथ पकड़ कर खट से एस्केलेटर
की सीढ़ियां छोड़ कर फ़र्श पर आ गई। और बोली,
‘देखा मम्मी कितना तो आसान था
एस्केलेटर पर चढ़ना। फिर तुम्हारे घुटने भी नहीं दुखे, न सांस
फूली। जैसा कि सीढ़ी चढ़ने में तुम्हें हो जाता है।’
मम्मी मुसकुरा पड़ीं।
उधर बुलबुल मम्मी से मोबाइल मांग
कर तुरंत एक फ़ोन मिला कर खिलखिलाती हुई बता रही थी कि, ‘पता है अलका
मेरी मम्मी आज एस्केलेटर पर चढ़ गईं।’ और वह मम्मी के एस्केलेटर पर चढ़ने का बखान
ऐसे करती जा रही थी गोया मम्मी एस्केलेटर पर नहीं चांद पर चढ़ गई हों।
‘और
तुम्हारे पापा?’ उधर
से अलका पूछ रही है फ़ोन पर बुलबुल से।
‘नहीं
यार पापा तो सीढ़ियों से आ रहे हैं। अकेले ही।’
‘और
तुम्हारा भाई?’
‘वह
तो सब से पहले छटक कर चढ़ गया था। एक पापा को छोड़ कर सभी एस्केलेटर यूज कर रहे
हैं।’
‘मींस
इट्स योर बिग एचीवमेंटस ऑफ दिस डेल्ही टूर!’
‘ओह
येस! ये तो है यार कि मम्मी एस्केलेटर पर चढ़ गईं। चलो अब रखती हूं। पापा दिख गए
हैं। इधर ही आ रहे हैं।’
‘इट्स
ओ.के.!’
‘कौन
थी?’ मम्मी
मुसकुराती हुई पूछ रही हैं, ‘जिस
से मेरी इतनी तारीफ कर रही थी?’
‘अलका
थी मम्मी।’ कह कर उस ने मम्मी को मोबाइल वापस दे दिया।
सूर्यनाथ बरसों बाद दिल्ली आए
हैं। सपरिवार। अपने चचेरे भाई के बेटे की शादी में। शादी के चार दिन पहले ही आ गए।
बच्चों ने कहा कि, ‘पापा
जब इतना खच-वर्च कर के दिल्ली चल रहे हैं तो चार छह दिन पहले चलिए। शादी भी अटेंड
हो जाएगी और दिल्ली भी इस बहाने घूम लेंगे।’
सूर्यनाथ मान गए।
लेकिन टिकट कटाने के पहले भाई से
पूछ लिया कि, ‘अगर
हम लोग चार छह दिन पहले ही से आ जाएं तो कैसा रहेगा?’
‘यह
तो बहुत ही अच्छा रहेगा।’ भाई ने कहा,
‘घर में चार छह दिन पहले से
चहल-पहल हो जाएगी।’ उन्हों ने जोड़ा,
‘कुछ और लोग भी पहले से आ रहे हैं।
बहनें तो आ ही रही हैं।’
‘फिर
तो ठीक है।’ सूर्यनाथ ने कहा और पूछा,
‘रहने वहने की क्या व्यवस्था है? दिक्कत हो
तो मैं कोई गेस्ट हाऊस वग़ैरह बुक करा लूं।’
‘नहीं
इस की क्या ज़रूरत है?’ भाई
बोले, ‘घर
में ही सभी साथ रहेंगे। वैसे आस पास के कुछ घरों में कमरों की व्यवस्था कर ली है।
एक पूरा मकान भी जो पड़ोस में ख़ाली है,
हफ़्ते भर के लिए किराए पर ले रहा
हूं। फिर भी जगह कम पड़ी तो त्रिपाल लगा लेंगे। जैसे भी हो हम लोग साथ रहेंगे भाई।
मज़ा आएगा। खाना बनाने के लिए हफ्ते भर ख़ातिर हलवाई अलग से बुक कर लिया है।’
‘फिर
तो ठीक है।’ कह कर सूर्यनाथ ने फ़ोन रख दिया। और फिर दिल्ली जाने के लिए
रिज़र्वेशन करवा लिया। लेकिन दिल्ली पहुंचने पर जैसा कि मध्यवर्गीय परिवारों में
होता है, भाई
के लगभग सारे इंतज़ाम लड़खड़ा गए
थे। ख़ास कर रहने सोने के। मकान जो किराए पर मिलने वाला था, नहीं मिला।
कमरे भी सभी पड़ोसियों ने नहीं दिए। और कि दिल्ली घूमने के चाव में कुछ रिश्तेदार
पहुंच चुके थे। पट्टीदार हो कर भी सूर्यनाथ भी सपरिवार पहुंच चुके थे। घर में खुले
हिस्से में त्रिपाल तो लग गई थी। पर वह सिर्फ़ धूप रोकने के लिए थी। लेकिन हो गई
थी बारिश। सो त्रिपाल जगह-जगह से चू-चू कर आफत मचाए थी। सो पहली रात सूर्यनाथ और
उन के परिवार की एक सस्ते से गेस्ट हाऊस की डारमेट्री में गुज़री। दूसरी रात
जहां शादी का रिसेप्शन होना था, उस
कम्यूनिटी सेंटर के दड़बेनुमा कमरे में बीती। सूर्यनाथ को लगा कि अब वह बीमार पड़
जाएंगे। सो अगले ही दिन उन्हों ने भाई से क्षमा मांगते हुए घर से दूर अपने आफिस के
गेस्ट हाऊस में शरण ली। बाद में पत्नी ने ताना भी दिया कि, ‘उन के अपने
भाई तो अभी आए नहीं और आप छह दिन पहले ही आ गए तो यह अपमान तो होना ही था।’
‘अरे
भाई बच्चों के दिल्ली घूमने के चक्कर में छह दिन पहले आ गया था। फिर भाई ने कहा था
कि सब साथ रहेंगे, मज़ा
आएगा। तो लगा कि सारे परिवार के साथ रहने का सुख मिलेगा।’
‘कुछ
नहीं आप को पहले ही इस गेस्ट हाऊस में आ जाना था।’
‘अरे
शादी व्याह में, भीड़
भाड़ में यह सब चीज़ें हो जाती हैं।’
‘खाक
हो जाती हैं!’ पत्नी बोली, ‘अपनी
बहनों को तो घर में रखा। बहनोइयों के लिए कमरे की व्यवस्था की। अपने ससुरालियों के
लिए कमरे की व्यवस्था की। बस हमी लोग डारमेट्री और कम्युनिटी सेंटर के दड़बे में
गए। कोई और नहीं।’
‘चलो
छोड़ो।’
‘आप
भूल सकते हैं इस अपमान को मैं नहीं।’
‘अब
द्रौपदी की तरह केश मत खोल लेना।’ सूर्यनाथ बोले,
‘शादी में आए हैं। घर की शादी है।
इस को मान अपमान से मत जोड़ो। बहनें मेहमान हैं,
ससुरालीजन मेहमान हैं, हम लोग
मेहमान नहीं हैं। घर के हैं। और घर में सुख-दुख हो जाता है।’
पत्नी चुप हो गई।
अब जब घूमने का प्रोग्राम बना तो
सूर्यनाथ चाहते थे कि बिरला भवन में गांधी स्मृति,
तीन मूर्ति, राष्ट्रपति
भवन, गांधी
समाधि, सफदरजंग
में इंदिरा गांधी का घर, नेशनल
म्यूज़ियम, कुतुबमीनार, लाल क़िला, अक्षरधाम
मंदिर आदि देखना-दिखाना। जब कि बच्चों की सूची में मॉल, मैट्रो और
प्रगति मैदान था।
पहला दिन अक्षरधाम मंदिर में
गुज़र गया। यहां का स्थापत्य, वास्तु शिल्प,
व्यवस्था, सुविधाएं, सफाई और
खुलापन अच्छा लगा। पारंपरिक मंदिरों जैसी पंडा लोगों की मनमानी, लूट खसोट
नहीं थी। बस बात-बात पर जेब ज़रूर ढीली होती रही। जो मध्यवर्गीय परिवारों के लिए
हाथ बटोर लेने का सबब बन गई। सूर्यनाथ ने भी कई जगह हाथ बटोरे। क्यों कि साथ में
दस लोग और थे। दूसरा दिन बिरला भवन में गांधी स्मृति, तीन मूर्ति
भवन में निकल गया। साथ में अपने बच्चे तो थे ही,
घर के और बच्चे भी लदे फने आ गए
थे। गांधी स्मृति में जब आधा दिन से भी अधिक गुज़र गया तो बहन का एक टीन एज लड़का
अपने भाई से धीरे से बोला, ‘आज
तो चट गए यार!’ यह सुन कर सूर्यनाथ का मन ख़राब हो गया। गांधी स्मृति में समय
बिताने, ढेर
सारी जानकारी पाने का सुख नष्ट हो गया। सूर्यनाथ के मन में आया कि उस लड़के से
डांट कर कह दें कि, ‘बेटा
अब तुम फिर से नाथूराम गोडसे मत बनो।’ पर वह चुप ही रहे। यह सोच कर कि आखि़र
किस-किस गोडसे को वह डांटते फिरेंगे। जाने कितने तो गोडसे हैं। क़दम-क़दम पर
गोडसे। रास्ते में वापसी के समय लगभग सभी बच्चों ने समवेत स्वर में फ़ैसला दिया कि, ‘कल मॉल और
मेट्रो में घूमा जाएगा।’
‘पर
कल के लिए तो पापा ने राष्ट्रपति भवन देखने का पास बनवा रखा है। साथ ही अपने एक
दोस्त से भी मिलने का समय तय कर रखा है।’ नेहा ने सब की बात काटते हुए कहा। तो सभी
बच्चे चुप हो गए। गोया सांप सूंघ गया हो। शाम को घर में रस्में थीं। बच्चों ने खूब
तेज़ म्यूज़िक लगा कर खूब डांस-वांस किया। बड़ों ने बैठ कर खूब चूहुल की। कुछ
बुजुर्गों ने नाक भौं सिकोड़ी और काशन दिए। खाते-पीते आधी रात हो गई। सुबह खा पी
कर जब राष्ट्रपति भवन जाने लगे सूर्यनाथ तो पता चला घर के अधिकतर लोग राष्ट्रपति
भवन देखने चलने को तैयार। सभी औरतें,
सभी बच्चे। पर कार एक थी। इनोवा
थी। जगह थी। सो सूर्यनाथ के परिवार के बैठने के बाद पीछे की जगह में पांच छह टीन
एज बच्चे पहले दिनों की तरह ठूंस ठांस कर बैठ गए। बाक़ी लोगों के लिए तय हुआ कि घर
की क्वालिस हो जाए। फिर भी सभी के बैठने की समस्या आई।
बात चली कि दो-तीन टैक्सी मंगवा
ली जाए। पर टैक्सी कौन मंगवाए? स्पष्ट था कि जो मंगवाए वही पैसा दे सो सभी कतरा गए।
सिटी बस से चलने को कोई तैयार नहीं हुआ। दो-दो जगह बस बदलने का भी फेर था। सूर्यनाथ ने
शुरू में तो संकोच किया। पर जब देखा कि सभी सारा भार उन्हीं पर डालने पर आमादा हैं
और उन्हें बेवज़ह चढ़ाए जा रहे हैं तो उन्हों ने
पहले तो हिसाब जोड़ा। चार पांच
हज़ार से ज़्यादा रुपए टैक्सी में लग जाने थे सब को ले जाने में। नाश्ता पानी अलग।
सो उन्हों ने हाथ खड़े कर दिए। कहा कि,
‘राष्ट्रपति भवन का पास बनवाने का
ज़िम्मा लिया था। जितने लोग चाहें चलें।’ उन्हों ने जैसे जोड़ा, ‘पचीस लोगों
का पास मैं ने बनवा दिया है। और लोग चलना चाहें तो उन का भी पास बन जाएगा। पर सब
को ले चल पाने की सामर्थ्य मुझ में नहीं है। अपनी-अपनी सुविधा से लोग वहां
पहुंचें। मैं इंतज़ार कर लूंगा।’
‘यह
भी तो हो सकता है कि आप की इनोवा तीन चार राउंड में बारी-बारी सब को यहां से लेती
चले।’ भाई के ससुराल पक्ष की एक औरत बोली। तो जवाब ड्राइवर ने दिया, ‘फिर तो दिन
भर हम लोग आप सब को ढोते ही रह जाएंगे। आप सब राष्ट्रपति भवन कब देखेंगे?’
घर की औरतों-बच्चों ने यह सुनते
ही सूर्यनाथ को ऐसे घूर कर देखा गोया उन्हों ने उन सब का कुछ छीन लिया हो। इन में
बहनें भी थीं, बहनों
के बच्चे भी और भाई के ससुरालीजनों की औरतें और बच्चे भी। इन सभी के पुरुष पक्ष इस
समय अद्भुत रूप से अंतर्ध्यान थे। यह सब देख कर सूर्यनाथ ठगे से रह गए। चुपचाप कार
में बैठे। और ड्राइवर से धीरे से बोले,
‘चलो भाई! राष्ट्रपति
भवन चलो!’
सूर्यनाथ तो क़ायदे से यह इनोवा
कार भी अफोर्ड नहीं कर सकते थे। वह तो उन के एक अधिकारी मित्र ने दिल्ली घूमने के
लिए व्यवस्था करवा दी थी। वह मित्र जानते थे सूर्यनाथ की ईमानदारी, उन की जेब
और उन का संकोच भी। शुरू में उन्हों ने ना नुकुर की भी। पर मित्र ने कहा कि, ‘आप की
सुविधा के लिए नहीं मैं तो भाभी जी और बच्चों की सुविधा के लिए कार भेज रहा हूं।
नहीं बच्चे बिचारे बसों में धक्के खाते फिरेंगे।’ बेमन से सही, सूर्यनाथ
मान गए थे। नहीं उन्हें जो अपनी जेब से खर्च कर के जो घूमना होता तो सिटी बस या
आटो से ही घूमते। दिक्कत यही थी आटो में सभी एक साथ आ नहीं पाते। हालां कि पिछली
दफ़ा जब वह दिल्ली आए थे तब बच्चों के साथ आटो और बस में ही घूमे थे। पर अब
बेटियां बड़ी हो गई थीं। बस की भीड़भाड़ में चलना मुश्किल था और एक आटो में सभी एक
साथ बैठ नहीं सकते थे। इस लिए भी मित्र की बात मान गए थे सूर्यनाथ!
राष्ट्रपति भवन के एक गेट पर
प्रहरी ने जांच करते हुए पास देखा। सभी सदस्यों को गिना। पूछा, ‘पास तो आप
का पचीस लोगों का है।’
‘हां, पर आए दस
लोग ही हैं। बाक़ी लोग आ नहीं पाए।’
‘ओ.के., ओ.के.।’ कह
कर उस ने सभी को आगे बढ़ने का इशारा किया। और वाकी टाकी पर हम लोगों के पहुंचने का
संदेश रिसेप्शन पर कर दिया। रिसेप्शन पर और भी कुछ लोग हैं जो राष्ट्रपति भवन
देखने आए हैं। कुछ लोग तमिलनाडु से हैं,
कुछ महाराष्ट्र से। लोग ज़्यादा
हैं और गाइड सिर्फ़ दो। दो ग्रुप बन गए। घूमने लगे लोग राष्ट्रपति भवन के गलियारे।
ये हाल, वो
हाल। यह चीज़, वह
चीज़। गाइड ब्यौरे बता रहा है। सभी बच्चे खुश हैं,
बेहद खुश! राष्ट्रपति भवन के
बड़े-बड़े गलियारों को बच्चे अपनी बाहों में भर लेना चाहते हैं। वह गाना गाते हुए
उछलना-दौड़ना चाहते हैं। एक लड़का गाना शुरू करता ही है कि गाइड होठों पर उंगली रख
कर तरेरने लगा। लड़का चुप हो गया। गाइड बता रहा है कि यहां कुल 340 कमरे हैं।
बच्चों का मुंह खुला का खुला रह जाता है जब वह दुहरा कर गाइड से पूछते हैं, ‘340 कमरे!’
‘जी
340 कमरे!’
‘होगा
यार!’ एक लड़का दूसरे लड़के से कहने लगा,
‘देखा नहीं अभी जब बाथरूम ही हाल
जैसा है। हमारे क्लास रूम से भी दोगुना बड़ा बाथरूम है तो होगा 340 कमरा भी।’
गाइड दरबार हाल दिखा रहा है, अशोक हाल
दिखा रहा है। यहां की खूबियां बता रहा है,
‘बेल्ज़ियम का शीशा, इरान की
कालीन, वहां
का फानूश, वहां
की लकड़ी।’ वह जोड़ रहा है कि, ‘इस हाल की फ़र्श और इंडिया गेट की छत का लेबिल एक
है।’
बच्चे यह सुन कर मुंह बा जाते हैं
और जैसे पक्का कर लेना चाहते हैं। सब एक साथ पूछते हैं, ‘इंडिया गेट
की छत और इस की फ़र्श का लेवल सचमुच एक बराबर है?’
‘जी
बराबर है!’ गाइड संक्षिप्त सा बोलता है।
‘और
यहां होता क्या है?’ एक
लड़के ने पूछा है।
‘मंत्री
जी लोग शपथ लेते हैं।’ गाइड फिर धीरे से बोला है।
‘ओह
तभी अपने मिनिस्टर्स का दिमाग हमेशा ख़राब रहता है,
सातवें आसमान पर रहता है।’ बुलबुल
बिदकती हुई बुदबुदा रही है, ‘इसी
लिए ज़मीन पर नहीं रहते मिनिस्टर्स!’
यह सुन कर सूर्यनाथ को अपनी जवानी
याद आ जाती है। तब लगभग उन की भी यही उम्र थी जो आज बुलबुल की है। सूर्यनाथ भी तब
छात्र थे और अपने पिता के साथ राष्ट्रपति भवन देखने आए थे। तब जब के गाइड ने तमाम
ब्यौरे बताते हुए बताया था कि, ‘यहां मंत्री जी लोगों की शपथ होती है।’ तो सूर्यनाथ
ने गाइड से पूछा था, ‘अच्छा
ब्रिटिश पीरियड में इस हाल का क्या इस्तेमाल होता था?’
‘अंगरेज
साहब लोग!’ गाइड पुराना था, उम्रदराज़
सो माथे पर ज़ोर डालते हुए ज़रा देर रुका था और फिर मुसकुरा कर बताया था, ‘अंगरेज साहब
लोग यहां डांस करते थे। ड्रिंक के बाद मेम साहब लोगों के साथ। उन का नाच घर था
यह।’
‘ओह
तभी यह मंत्री लोग पूरे देश को नाच घर में तब्दील कर जनता को नचा रहे हैं।’
सूर्यनाथ नाम का लड़का तब बुदबुदाया था। सूर्यनाथ अब प्रौढ़ हो गए हैं। स्थितियां
बदतर हुई हैं। और आज उन की बेटी बुलबुल भी कुछ उसी तरह बुदबुदा रही है। शब्द बदले
हुए हैं पर चुभन और चिंता वही है। यथार्थ का पदार्थ वही है।
गाइड बच्चों को डायनिंग हाल में
लाया है। बता रहा है कि, ‘यहां
एक साथ ढाई सौ लोग आमने सामने बैठ कर खाना खा सकते हैं। खाते ही हैं।’ वह छत
दिखाता है, उस
के झरोखों की तफ़सील में जाता है कि,
‘जब डिनर होता है तो ऊपर छत से
बैंड पार्टी अपना बैंड बजाती है-लाइव। टेप नहीं बजता।’ वह बता रहा है कि मेहमान
वेजेटेरियन हैं कि नान वेजेटेरियन यह बताने के लिए तरह-तरह के फूल रखे होते हैं।
वेटर फूल से ही समझता है कि वेज देना है कि नान वेज।’
बच्चे कई जगह फ़ोटो खींचने को
मचलते हैं। पर कैमरा, मोबाइल
सभी कुछ रिसेप्शन पर ही जमा करवा लिए गए हैं। बच्चे अफना कर रह जाते हैं।
राष्ट्रपति से भी मिलना चाहते हैं बच्चे। पर गाइड शर्माते हुए बताता है, ‘एप्वाइंटमेंट
लेना पड़ता है।’
‘तो
एप्वाइंटमेंट ले लीजिए।’ एक लड़का इठलाता है।
‘सॉरी
भइया, एप्वाइंटमेंट
हम नहीं दिला सकते। बड़े साहब लोग दिलाते हैं। और कई दिन लग सकता है।’
‘ओह!’
वह मुगल गार्डेन दूर से दिखाते
हुए कहता है, ‘अभी
तो बंद है। एलाऊ नहीं है।’
‘जो
आर्किटेक्ट की मूर्ति लगी है, उसे फिर से देख सकते हैं?’ बुलबुल गाइड
से जैसे इसरार करती है।’
‘हां, वह देख
लीजिए!’
‘फ़ोटो
भी खींच लें?’
‘वो
कैसे हो सकता है?’ गाइड
फिर शर्माते हुए कहता है!
बच्चे राष्ट्रपति भवन के
आर्किटेक्ट एडविन लौंडसियर लुटयेंस की मूर्ति के पास आ कर खड़े हो गए हैं। दुबारा।
मूर्ति के नीचे लिखे डिटेल्स पढ़ने लगते हैं। बुलबुल कहती है कि, ‘यह अच्छा है
कि यहां आर्किटेक्ट को भी आनर दिया गया है। मूर्ति लगा कर।’ वह जैसे जोड़ती है, ‘पहली बार
किसी बिल्डिंग में आर्किटेक्ट की मूर्ति भी सम्मान से लगाई गई है।’
‘तो
दीदी इतनी बड़ी बिल्डिंग भी देखी है क्या कभी?’
एक लड़का बोलता है,
‘इतना
बड़ा कैंपस!’
‘हां
नहीं देखा। पर सोचो जब ताजमहल बनाने वाले कारीगरों के हाथ काट लिए जाते हैं और
यहां आर्किटेक्ट की मूर्ति लगा दी जाती है तो फ़र्क़ तो है। आखि़र ये भी रूलर थे
और वो भी रूलर थे। तो फ़र्क़ तो है!’
सभी बच्चे सहमति में सिर हिलाते
हुए चुप हैं। पर मुंडेर पर बैठे कबूतर चुप नहीं हैं। उन की चहचहाहट जारी है। भीतर
जो नहीं कर पाए थे बच्चे वह बाहर आ कर पूरी धमाचौकड़ी के साथ कर रहे हैं। मतलब
फ़ोटोग्राफ़ी और उछल कूद! सूर्यनाथ खुश हैं बच्चों को खुश देख कर।
साऊथ ब्लाक, नार्थ ब्लाक
की चौहद्दी भी बच्चे छू रहे हैं, फोटो खींचने के बहाने। बोट क्लब पर बोटिंग सोटिंग, लइया चना कर
के अब वह लोग इंडिया गेट पर हैं। एक लड़का इंडिया गेट की छत को निहारते हुए हाथ
ऊंचा कर के राष्ट्रपति भवन के फ़र्श की थाह ले रहा है गोया वह नाविक हो और बांस का
लग्गा नदी में डाल कर पानी की थाह ले रहा हो! एक लड़का उस की मंशा समझ कर उसे
टोकता भी है, ‘यह
दिल्ली का इंडिया गेट है किसी नदी का पानी नहीं।’
पर वह सब की अनसुनी किए अपना हाथ
ऊपर किए थाह पर थाह लिए जा रहा है। कुछ-कुछ बुदबुदाता हुआ सा।
‘पापा
आप को अपने दोस्त से भी मिलना था आज?’
नेहा पूछती है।
‘हां, मिलना तो
है।’ सूर्यनाथ बोले, ‘पर
उन का फ़ोन आएगा। जब वह फ्री होंगे तभी तो मिल पाएंगे?’
‘पर
एप्वाइंटमेंट तो आज का ही था?’ नेहा ने फिर पूछा तो सूर्यनाथ ने स्वीकृति में सिर
हिलाया।
‘दोस्त
से भी मिलने के लिए एप्वाइंटमेंट लेना पड़ता है?’
बहन का एक बेटा जो गंवई परिवेश
में पला बढ़ा है, बड़े
कौतूहल से पूछता है।
‘हां, लेना तो
पड़ता है। क्यों कि दोस्त बिजी बहुत रहता है।’ सूर्यनाथ धीरे से बुदबुदाते हैं।
‘असल
में अंकल सीनियर आई.ए.एस. अफसर हैं।’ बुलबुल बताते हुए इतराती है।
‘ये
सीनियर आई.ए.एस. क्या होता है?'
‘डिस्ट्रिक्ट
मजिस्ट्रेट जानते हो?’
‘हां, ज़िलाधिकारी
न!’
‘तो
उस से भी बहुत बड़े अफसर हैं अंकल! भारत सरकार में सेक्रेट्री हैं। किसी स्टेट के
चीफ सेक्रेट्री के बराबर। लखनऊ जाते हैं तो स्टेट गेस्ट हो जाते हैं।’
‘अच्छा-अच्छा!’
बच्चों की यह सब बात सुन कर
सूर्यनाथ को बड़ा ख़राब लगता है। पर वह चुप रहते हैं। अब बच्चे सब की देखा देखी
फ़ोटो खींचने लगे हैं। इसी बीच दोस्त के पी.ए. का फ़ोन आ गया है। पूछ रहा है, ‘सर किस जगह
हैं।’
‘क्यों
इंडिया गेट पर हूं।’
‘राष्ट्रपति
भवन घूम आए?’
‘हां।’
‘तो
सर आधे घंटे में आ जाइए! बॉस आने वाले हैं। बॉस आप सब के साथ ही लंच करेंगे। फिर
नेक्स्ट मीटिंग में चले जाएंगे।’
‘अच्छी
बात है!’ सूर्यनाथ ने पूछा, ‘कमरा
नंबर वग़ैरह बताएंगे?’
‘ड्राइवर
सब जानता है सर! वह आप को रिसेप्शन तक ले आएगा। वहां आप का पास बना रखा है। हमारे
स्टाफ का एक आदमी वहां मिलेगा। आप को बॉस के पास ले आएगा।’
‘अच्छी
बात है!’
मित्र गदगद हैं। सूर्यनाथ को
सपरिवार अपने आफिस में पा कर। बच्चे विह्वल हैं कि इतने बड़े अफसर के आफिस में
बैठे हैं। मित्र ने फ्रूट लंच का इंतज़ाम कर रखा है। हालां कि पूरा अमला उन की
खिदमत में है पर वह खुद एक-एक चीज़ उठा-उठा कर दे रहे हैं, ‘सूर्यनाथ जी
यह लीजिए, भाभी
जी यह!’
लखनऊ की राजनीति से ले कर
पर्यावरण, पानी
और मंहगाई तक पर बात हो रही है। और लंच भी। मित्र कह रहे हैं, ‘दिल्ली से
विदा होने के पहले एक दिन घर भी आइए न हमारे। बच्चों से भी भेंट हो जाएगी।’
‘क्या
है कि अब अगले दो दिन शादी में ही व्यस्त रहना है। फिर संडे की रात में वापसी है।’
‘तो
संडे को आइए न!’ कहते हुए वह पी.ए. से पूछते हैं,
‘संडे को कोई मीटिंग वग़ैरह तो
नहीं है़?’
‘है
सर, दो
मीटिंग्स हैं। पर दो बजे तक ख़त्म हो जाएंगी।’
‘ओ.के.।
तो सूर्यनाथ जी संडे की शाम हमारे गरीब खाने पर!’ वह बोले, ‘चार बजे तक
मैं घर पहुंच जाऊंगा। आप लोग तभी आ जाइए!’
‘ठीक
बात है!’
मित्र के आफिस से निकले सूर्यनाथ
सब को ले दे कर तो बाहर देखा धूप खड़ी थी। धूप देख कर उन को लगा कि अभी तो काफी
समय है। फिर उन को एक और मित्र की याद आ गई। मन हुआ कि उस से भी मिल लिया जाए।
मोबाइल निकाला जेब से। फ़ोन मिलाया। बताया कि,
‘आप की बेदिल दिल्ली में हूं।
मिलना चाहता हूं।’
‘अभी
आप कहां हैं।’ मित्र चहकते हुए बोले।
‘रफ़ी
मार्ग पर हूं।’ फिर सूर्यनाथ ने मंत्रालय का नाम बताया।
‘अच्छी
बात है। मैं तो अभी गाज़ियाबाद की तरफ हूं। एक डेढ़ घंटा लग सकता है वहां तक
पहुंचने में।’
‘इतनी
देर यहां बैठ कर क्या करूंगा?’
‘अकेले
हैं कि और भी कोई है।’
‘नहीं-नहीं
सपरिवार हूं। बच्चे भी हैं।’
‘तब
तो बहुत अच्छा!’ मित्र बोले, ‘फिर आप साकेत आ जाइए। वहां सेलेक्ट सिटी वाक नाम का
एक बड़ा सा मॉल है। उस के पीछे ही मेरा आफ़िस है। जब तक मैं पहुंचूंगा तब तक आप
बच्चों को मॉल घुमाइए!’
‘क्या
बेवकूफी की बात करते हैं आप?’
‘क्या
हो गया?’
‘आप
जानते हैं मुझे और मॉल घूमने के लिए कह रहे हैं?’
‘आप
को कब मॉल घूमने के लिए कहा?’
‘तब?’
‘बच्चों
को घुमाने के लिए कहा।’ मित्र ने कहा,
‘गुस्सा मत होइए। बच्चों को
घुमाइए। खुश हो जाएंगे। तब तक मैं पहुंच कर आप को फ़ोन करता हूं।’
‘अच्छी
बात है।’
मॉल का नाम सुनते ही बच्चों में
खुशी की खनक समा गई। सभी सूर्यनाथ के पास सिमट आए। उन के चेहरों पर जैसे हज़ार वाट
के हायलोजन बल्ब की चमक छा गई। लद-फन कर चल पड़े साकेत के सेलेक्ट सिटी वाक की
तरफ। रास्ते में कई जगह जाम से भी भिड़ंत हुई और फिर अचानक आ गई बारिश से भी। लेडी
श्री राम कालेज पड़ा रास्ते में तो बुलबुल बोली,
‘पापा ज़रा यह कालेज भी देख लें।’
‘देख
लो!’
पर गेट पर चौकीदार ने सभी जेंट्स
को रोक दिया। मम्मी-बेटी गईं। थोड़ी देर बाद घूम-घाम कर खुश-खुश लौटीं। नेहा बोली, ‘हम लोगों को
पढ़ना तो यहां चाहिए था।’
ख़ैर पहुंचे सेलेक्ट सिटी वाक।
बच्चे एस्केलेटर पर चढ़ गए। और
अजब यह कि सूर्यनाथ की पत्नी भी। पर सूर्यनाथ सीढ़ियों से ही चढ़े। मॉल क्या था
ऐश्वर्य का क़िला था। एक लड़का बोला भी दिल खोल कर कि, ‘ज़न्नत है
ज़न्नत!’ पर चार छ शो रूम, दुकानें
घूमते ही ज़न्नत की हक़ीक़त सामने आ गई। प्याज की तरह परत दर परत बेपरदा होती गई
ज़न्नत और उस की हक़ीक़त।
एक शो रूम में बेल्ट की क़ीमत
पांच हज़ार रुपए से शुरू हो रही थी। टी शर्ट और शर्ट का भी यही हाल था। बीस हजार
पचीस हज़ार की एक कमीज़। साठ हज़ार-सत्तर हज़ार से साड़ियों की रेंज भी शुरू हो
रही थी। जूता-चप्पल का भी यही हाल था। पांच हज़ार,
दस हज़ार! सूर्यनाथ ने
जैसे सांस खींच ली। डर गए यह सोच कर कि कहीं कोई बच्चा कोई चीज़ ख़रीदने की
फर्माइश न कर बैठे। बस एस्केलेटर पर चढ़ना उतरना ही अफोर्डेबिल था बाक़ी सब सपने
से भी बाहर था। सूर्यनाथ की पत्नी जैसे सकते में थीं। कह रही थीं, ‘आखि़र कौन
ख़रीदता होगा इतना मंहगा सामान!’
‘क्या
मम्मी!’ बुलबुल धीरे से बोली, ‘चुप भी रहो। देखो लोग सामान ख़रीद भी तो रहे हैं!’
‘इतना
मंहगा!’ सूर्यनाथ की पत्नी फिर खदबदाईं,
‘बताओ पांच हज़ार रुपए में तो
तुम्हारे पापा सूट सिलवा लेते हैं और यहां सब से सस्ती बेल्ट ही पांच हज़ार रुपए
की है।’ वह जैसे हांफने लगीं, ‘सूट तो फिर यहां एक लाख रुपए का होगा।’
‘होगा
नहीं मम्मी है!’ बेटा कालर खड़ी कर,
कंधे उचकाते हुए बोला, ‘इस से भी
ज़्यादा का है। बोलो ख़रीदोगी मेरे लिए।’
मम्मी क्या बोलतीं भला। चुप ही
रहीं।
‘घबराओ
नहीं मम्मी, आज
नहीं तो कल को मैं भी खरीदूंगी इस मॉल से तुम्हारे लिए साड़ी, भइया के लिए
सूट। बस मेरा नाम तुम एम.बी.ए. में लिखवा दो!’
‘दस
लाख रुपए सालाना फीस भर कर!’ मम्मी ने जैसे फुंफकार भरी, ‘बाक़ी सब के
पेट में जहर डाल दूं और तुम्हारा नाम एम.बी.ए. में लिखवा दूं पांच हज़ार की बेल्ट
और सत्तर हज़ार रुपए की साड़ी ख़रीदने के लिए! अरे,
इतने पैसे में तो तुम्हारी शादी
हो जाएगी पगली!’
‘चुप
भी करो मम्मी! सारा डिसकसन क्या यहीं कर लोगी?’
नेहा ने हाथ जोड़ कर कहा। मम्मी
चुप हो गईं।
लड़के अलग झुंड बना कर घूम रहे
थे। ख़ास कर एक बहन का बेटा जो गंवई परिवेश से आया था, टीन एज था, भौंचक था।
फिर भी सभी लड़के जान गए थे कि यह मॉल उन
की ख़रीदारी के वश का नहीं है।
बावजूद इस के सभी लड़कों की ख्वाहिश थी कि मॉल के किसी रेस्टोरेंट में चल कर कुछ
खा पी लिया जाए। या सिनेमा भी देख लिया जाए। सूर्यनाथ के बेटे को लड़कों ने यह काम
सौंपा। उस ने सूर्यनाथ से तो नहीं पर मम्मी से दबी ज़बान सभी बच्चों की ख्वाहिश
बताई। फिर बात सूर्यनाथ तक आई। पत्नी ने दबी ज़बान ही कहा, ‘बच्चों को
कुछ खिला पिला दीजिए!’
‘इस
मॉल में?’ सूर्यनाथ
भड़के।
‘हां, बच्चे यही
चाहते हैं।’
‘जहां
सौ दो सौ रुपए की पैंट की बेल्ट पांच हज़ार रुपए में मिलती हो वहां के रेस्टोरेंट
में भी यही आग लगी होगी।’ सूर्यनाथ ने लंबी सी सांस भरी, ‘भई मेरी तो
हैसियत नहीं है।’
सूर्यनाथ की यह बात सुन कर बच्चे
उदास हो गए। बेहद उदास। सूर्यनाथ भी। बच्चों की उदासी देख कर। उदास चेहरा लिए
बच्चे फिर घूमने लगे इस फ़्लोर से उस फ़्लोर। एस्केलेटर की
ऐसी तैसी करते हुए। सूर्यनाथ
पत्नी के साथ एक बेंच पर बैठ गए। आते-जाते लोगों को निहारते हुए। खास कर बेलौस और
बेअंदाज़ औरतों को। पत्नी यह सब देख कर कुढ़न की नदी में कूदने ही वाली थीं कि
मित्र दिख गए। सूर्यनाथ ने चिल्ला कर उन्हें पुकारा तो वह झेंप गए। सभी की नज़रें
सूर्यनाथ पर आ कर टिक गईं। इतनी कि सूर्यनाथ भी झेंप गए। क़रीब आ कर मित्र ने हाथ
मिलाया, गले
मिले और धीरे से बुदबुदाए, ‘गांव
का मेला नहीं है यहां सूर्यनाथ जी,
मॉल है यह! इतना चिल्लाने की
ज़रूरत नहीं है!’
‘अरे
तो भला कैसे बुलाता आप को? आप
कहीं और आगे बढ़ जाते तो?’
‘मोबाइल
है आप के पास! फ़ोन कर सकते थे!’
‘ओह
सॉरी!’
‘कोई
बात नहीं!’ मित्र सूर्यनाथ की पत्नी की ओर मुड़े,
‘भाभी जी नमस्कार! बच्चे कहां हैं?’
‘यहीं
इसी मॉल में घूम रहे होंगे कहीं।’
‘अच्छा!
अच्छा!’ कह कर मित्र भी बेंच पर बैठ कर अपनी दाढ़ी खुजाने लगे। बोले, ‘बहुत समय
बाद मिले हम लोग!’
‘हां, कोई चार
पांच साल तो हो ही गए होंगे।’ सूर्यनाथ बोले,
‘वह तो फ़ोन है कि हम लोगों का
संपर्क बना रहता है!’
‘कहां, अब तो आप
एस.एम.एस. भी नहीं भेजते!’
‘असल
में आलसी हो गया हूं।’ सूर्यनाथ ने जोड़ा,
‘और असल में अब वह हूब, वह ललक भी
नहीं रह गई ज़िंदगी में। लगता है जैसे चीज़ें हाथ से छूटती जा रही हैं।’
‘हां, वह तो देख
ही रहा हूं। अभी आप चिल्लाने लगे थे। और ठाठ-बाट से कपड़े पहनने वाले ठहरे पहले
आप! अभी देख रहा हूं तुड़े मुड़े लुंज पुंज कपड़े पहने!’
‘असल
में खादी के कपड़े में यही तो परेशानी है!’ सूर्यनाथ बोले, ‘अभी बारिश
हुई थी। एक लड़का भींग कर आया और मेरी गोद में बैठ गया। उस के भींगे कपड़ों ने
मेरे कपड़े की कलफ ही उतार दी। तुड़-मुड़ गई कमीज अलग।’ झेंपते हुए सूर्यनाथ बोले।
तभी बच्चों का झुंड आ गया।
सूर्यनाथ के पास। बेटे से उन्हों ने कहा,
‘अंकल के पांव छुओ!’
बारी-बारी सभी बच्चों ने मित्र के
पांव छुए। बच्चों के पांव छूने से मित्र पुलकित हो गए। बोले, ‘आइए बच्चों
को कुछ खिला-पिला दें।’ कह कर वह खड़े हो गए।
‘अरे
नहीं!’ सूर्यनाथ ने उन का हाथ पकड़ कर खींच लिया और बेंच पर बिठा दिया। लेकिन वह
फिर से खड़े हो गए। बेटे को बाहों में भरते हुए बोले, ‘आओ बच्चों
तुम लोगों को कुछ खिलाते पिलाते हैं।’
‘अरे
मान भी जाइए!’ सूर्यनाथ ने मित्र की मनुहार की,
‘हम लोग दो चार नहीं दस लोग हैं।’
‘दस
लोग!’ मित्र अचकचाए।
‘हां
भई घर के और भी बच्चे साथ में हैं।’
‘तो
क्या हुआ हैं तो घर के ही बच्चे!’
‘आप
समझिए भी!’ सूर्यनाथ संकोच से भर गए।
‘कुछ
नहीं, बस
आइए!’ कह कर उन्हों ने सूर्यनाथ का हाथ पकड़ कर खींच लिया। और बोले, ‘आइए भाभी जी, आप भी आइए!’
बेमन से चले सूर्यनाथ भी। पर
बच्चों के उल्लास का ठिकाना नहीं था। बच्चों की यह खुशी देख कर सूर्यनाथ को अपना
बचपन याद आ गया। जब वह चार आने पैसे ले कर अपने गांव से दशहरा का मेला देखने
निकलते थे। लगता था उस चार आने में गोया वह पूरा मेला ख़रीद लेंगे। जी भर कर मेला
देखते और उस चार आने में से पांच छ पैसा बचा भी ज़रूर ले आते थे। गट्टा, बताशा, लक्ट्ठा, भोपा, लढ़िया, गुब्बारा, मूंगफली
ख़रीद कर भी। धान के खेतों को फलांगते,
गीत गाती औरतों के हुजूम को चीरते
फुदकते मेला जाने का सुख और उल्लास ही कुछ और था। जैसे वह धान के खेतों को फलांगते
मेला जाते थे, आज
कुछ-कुछ वैसे ही बच्चे एस्केलेटर पर झूमते जा रहे थे। धान की बालियों की तरह झूमते
महकते-गमकते। बच्चों के साथ पत्नी भी एस्केलेटर पर थीं। मित्र भी। पर सूर्यनाथ ने
फिर हाथ जोड़ लिए। सीढ़ियों से वह पहुंचे।
मित्र बच्चों की खुशी से गदगद।
रेस्टोरेंट में बच्चे विजयी
मुद्रा में बैठे। मित्र ने मीनू लिया। उन के चेहरे पर शिकन आ गई। पर जल्दी ही
उन्हों ने इस शिकन को ऐसे पोछा, गोया पसीना पोंछ रहे हों। बहुत जोड़ घटा कर प्रति
व्यक्ति दो सौ ग्राम कोक और पचास ग्राम चिप्स भी कोई बारह-चौदह सौ रुपए का पड़ा दस
लोगों के लिए। पेमेंट पहले करना था और सेल्फ सर्विस थी सो खु़द ही अपनी सीट पर ले
कर आना था। बाहर पचास-साठ रुपए में मिलने वाली दो लीटर कोक की एक बोतल यहां बारह
सौ रुपए में पड़ गई थी। मित्र के ज़ेब पर यह डाका सूर्यनाथ को नहीं सुहाया। वह फूट
पड़े, ‘इतनी
लूट! आखि़र कोई लिमिट होती है!’
‘सूर्यनाथ
जी यहां पैसा सामान का नहीं जगह का है। ऐसा तो इस दिल्ली में होता रहता है। लोग
अनाप-शनाप कमा रहे हैं। सो अनाप-शनाप ख़र्च कर रहे हैं।’
‘मुझे
लगता है आप भी इस मॉल में पहली बार आ रहे हैं!’
‘इस
मॉल में तो नहीं पर हां, इस
रेस्टोरेंट में पहली बार आया हूं।’
‘तो
इस मॉल में खरीददारी करते हैं आप?’ सूर्यनाथ जैसे भड़क गए।
‘नहीं-नहीं।’
मित्र बोले, ‘ज़रा
आहिस्ता बोलिए सूर्यनाथ जी!’
‘अच्छा-अच्छा
फिर?’
‘ख़रीदारी
की हैसियत यहां नहीं है हमारी। अरे,
घूमने-फिरने आते हैं। फिर देख-दाख
कर चले जाते हैं।’
‘तो
ये कौन लोग हैं जो यहां खरीदारी करते हैं?’
‘होंगे
लोग! हम को आप को इस से क्या लेना-देना!’
‘लेना-देना
है न!’
‘क्या
सूर्यनाथ जी आप भी! कहां फंस रहे हैं। अरे इंज्वाय कीजिए घर चलिए!’
‘पचास-साठ
रुपए की चीज़ बारह सौ रुपए में ख़रीद कर आप इंज्वाय कर सकते हैं हम तो नहीं।’
सूर्यनाथ धीमी पर सख़्त आवाज़ में बोले!
‘अब
इस को इशू तो मत बनाइए!’
‘पर
इशू तो है! हमारे बनाने या न बनाने से क्या फ़र्क पड़ता है!’ सूर्यनाथ भड़के रहे।
‘ख़ैर
छोड़िए भी। यह बताइए कि बच्चों की पढ़ाई लिखाई कैसी चल रही है? दिल्ली कैसे
आना हुआ?’
‘आप
तो यहीं बैठे-बैठे एस.एम.एस. स्टाइल में पूछने लगे।’ सूर्यनाथ बोले,
‘पढ़ाई
लिखाई बच्चों की ठीक ही चल रही है। बेटी एम.बी.ए. करना चाहती है।’
‘तो
कर लेने दीजिए!’
‘साल
भर की फीस और खर्चा दस-बारह लाख हो जाएगा! मतलब दो साल में बीस-बाइस लाख रुपए कैसे
क्या करूं समझ नहीं आता। बच्चों को भी लोग कैसे पढ़ा ले रहे हैं, इतनी
मंहगी-मंहगी फीस भर कर समझ नहीं आता। शादी-व्याह भी करना ही है।’
‘एजूकेशन
लोन ले लीजिए!’
‘कितनी
किश्तें भरेंगे। अभी इंश्योरेंश की किश्त है,
घर की किश्त है, कार की
किश्त है, बीमारी-दवाई
है, रुटीन
खर्चे हैं। मंहगाई है। काजू-बदाम के भाव दाल हो गई है।’
‘समस्या
तो है भई!’
‘किसी
तरह तोप ढांक कर गृहस्थी चला रहे हैं। नहीं सच बताएं ज़िंदगी जीनी मुश्किल हो गई
है। और बच्चों की इच्छाएं जैसे हरदम पंख पसारे उड़ती रहती हैं। पर बच्चों की
इच्छाएं मारता रहता हूं बात-बेबात और खुद मरता रहता हूं। क्षण-क्षण जीता हूं, क्षण-क्षण
मरता हूं। गोया ज़िंदगी नहीं जी रहा। घात-प्रतिघात का खेल, खेल रहा
हूं।
‘सूर्यनाथ
जी इस तरह टूटने से तो काम चलता नहीं। समय के साथ बदलना और जीना सीखिए!’
‘मतलब
करप्ट हो जाऊं? बेइमान
हो जाऊं?’
‘यह
तो मैं ने नहीं कहा!’
‘मतलब
तो आप का यही है। ख़ैर, चाहे
जो हो ज़िंदगी की ए.बी.सी.डी. फिर से तो शुरू नहीं कर सकता!’
‘यही
ग़लती कर रहे हैं आप। चाइनीज़ या जापानी जानने वाले आदमी से आप हिंदी में बात
करेंगे तो वह आप की बात क्या ख़ाक समझेगा! फिर दो ही सूरत बनती हैं या तो आप उसे
अपनी हिंदी सिखाइए या फिर खुद उस की भाषा सीखिए। नहीं मत बात कीजिए! तो सूर्यनाथ
जी ज़िंदगी की ए.बी.सी.डी. बार-बार शुरू करनी पड़ती है, लाइफ़ तभी
स्मूथ चल सकती है। फ्लेक्सेबिल बनिए। अड़ना-अकड़ना छोड़ दीजिए। जिंदगी खूबसूरत हो
जाएगी।’
‘चलिए
देखता हूं।’ सूर्यनाथ बोले, ‘अब
चला जाए यहां से?’
‘बिलकुल!’
नीचे आ कर मित्र ने विदा मांगी।
बच्चों ने उन के पांव छुए।
चलते-चलते बेटे के कंधे पर हाथ रख कर कहने लगे,
‘अपने पापा को भी थोड़ा अपनी तरह
स्मार्ट बनाओ! जींस-वींस पहनाओ। यह क्या ढीले-ढाले कपड़े पहनाते हो!’
बेटे ने कुछ कहा नहीं। मुसकुरा कर
सिर हिला कर सहमति दी।
‘तो
क्या सूर्यनाथ अब जींस-टी शर्ट पहनेंगे?’
सूर्यनाथ ने जैसे अपने आप से
पूछा। और जवाब भी खुद ही दिया, ‘हरगिज़ नहीं।’
बच्चे मॉल के बाहर लगे फौव्वारों
के इर्द गिर्द खड़े हो कर फ़ोटो खींचने-खिंचवाने लगे।
सूर्यनाथ चुपचाप खड़े बच्चों की
खुशी उन की खुशी में समाई खनक को अपनी भीतर भी खोजने लगे। इस बीच बच्चों ने दो तीन
बार सूर्यनाथ को बुलाया भी कि, ‘पापा आप भी आइए,
आप की भी फ़ोटो खींच दें। पर
सूर्यनाथ नहीं गए। हाथ हिला कर मना कर दिया।
दिल्ली बदल गई। देश बदल गया। गांव
बदल गया। रास्ते और बाज़ार बदल गए। पर सूर्यनाथ नहीं बदले। उन की अकड़ नहीं छूटी, मिजाज नहीं
बदला।
घर पहुंच कर बच्चे मॉल के मंहगे
सामान का, वहां
जाने का, वहां
के रेस्टोरेंट में चिप्स खाने और कोक पीने का वर्णन इस भाव से कर रहे हैं गोया
एवरेस्ट की चोटी छू कर आए हों। छोटे शहर से आए बच्चे दिल्ली के मॉल कल्चर की
चकाचौंध में गुम हो गए हैं। उन के बखान में एक बार भी राष्ट्रपति भवन, बिरला भवन, गांधी
स्मृति या नेशनल म्यूज़ियम का ज़िक्र नहीं है। बहन का एक लड़का बता भी रहा है अपनी
मां से कि, ‘मामा
तो बहुत कंजूस हैं। वह तो उन के दोस्त आ गए तो उन्हों ने खिलाया पिलाया। और हां, हम लोग
एस्केलेटर पर भी खूब चढे़। वो मुफ़्त था!’
सूर्यनाथ की पत्नी भी यह सब सुन
रही हैं। सुनती हुई सूर्यनाथ को देख रही हैं बड़े ग़ौर से यह सोचती हुई कि
सूर्यनाथ कहीं भड़क न जाएं, नाराज
न हो जाएं।
लेकिन सूर्यनाथ नाराज़ नहीं होते।
किस-किस से नाराज हों वह भला? हां, उन के मन में ज़रूर यह आता है कि वह भाग कर बिरला भवन
में गांधी स्मृति चले जाएं। और जहां गांधी को गोडसे ने गोली मारी थी, वहीं खड़ा
हो कर प्रार्थना करने के बजाय चीख़-चीख़ कर कहें कि हे गोड़से, आओ हमें और
हम जैसों को भी मार डालो!
पर वह देख रहे हैं कि उन के
इर्द-गिर्द ढेर सारे गोडसे आ गए हैं। पर कोई गोडसे गोली नहीं मारता। सब व्यस्त हैं, बाज़ार में
दाम बढ़ाने में व्यस्त हैं। सूर्यनाथ बिना गोली खाए ही मर जाते हैं।
उधर दिल्ली में चांद निकल आया है।
आसमान पूरी तरह साफ हो गया है।
-31-
मेड़ की दूब
गांव
से मां की एक लंबी चिट्ठी आई है। बल्कि कहूं कि हर बार की तरह बुलावा आया है।
लेकिन इस बार एक ख़ास तरह का। वह ख़ुद यहां आना चाहती है। इस नाते बुलाया है कि आ
कर हमें ले चल।
चिट्ठी
के मुताबिक, खेतों में तो आग लग ही गई है, लगान की किस्त न जमा करने से कुर्क अमीन गाय-गोरू भी
खूंटे से खुलवा ले गया है। गांव, भाई-बिरादरी
से लगभग ख़ाली हो चुका है। सिर्फ कुछ बुजुर्ग लोग और चंद बड़े घरानों के तथा बनिए
और बकिया मजूर ही रह गए हैं। मजूरों में भी नौजवान लड़के बंबई-कलकत्ता भागने लगे
हैं। क्यों कि मजूरी अब रोजाना से गिर कर आधी हो गई है, वो भी बड़ी मुश्किल से। ट्यूबवेलों से बिजली तो गायब
ही थी,
अब पंपिंग सेटों का डीजल भी लापता
हो चुका है। हां,
चोरी-छिपे और बड़ी सोर्स-सिफारिश
से कहीं-कहीं ब्लैक में डीजल मिल रहा है, वो
भी बड़े मुश्किलन। संझवाती जलाने के लिए मिट्टी का तेल भी ब्लैक में, वो भी बड़े जुगाड़ के बाद।
दुखरना
खेत में पानी चलाने के लिए उधार रुपया खोजता रहा, उधार
न मिलने पर अपनी औरत और पतोहू की नथिया, बेसर, झूलन, कड़ा-छड़ा, हुमेल और हंसुली आदि सारे जेवर सेठ के वहां गिरवी रख
कर उस ने किसी तरह खेत सींचा। कुल-कुल करने के बाद भी खेत में जवानी नहीं लौटी।
खेत के सारे धान सूख कर पुआल हो गए। दुखरना अब पगला कर मारा-मारा फिर रहा है।
....पुरोहित जी अपना पंचांग देख कर बता गए हैं, कि इस वर्ष खण्ड वृष्टि का ही योग प्रबल है। कहीं
प्रलयंकारी बाढ़ आएगी तो कहीं भयंकर सूखा पड़ेगा। संसार में बड़ा पाप बढ़ गया है।
इस पाप से उद्धार होने के लिए हवन-होम, जाप-तप
आदि करना पड़ेगा। पुरोहित जी की ही राय से गांव में अनिश्चित अखंड हरिकीर्तन जारी
है।
....गांव के छोटे लड़के रोज मेघ राजा को खुश करने के लिए
घर-घर,
दरवाजे- दरवाजे, घूम कर काच-कचौटी खेलते हैं। हर दरवाजे पर कीचड़ कर
के उस में नंगी देह बच्चे दिन-दिन भर लोटते-पोटते रहते हैं....
....गांव की नई लड़कियां दिन में कजरी गाती हैं, बूढ़ी औरतें चारों पहर पानी बरसने के लिए तरह-तरह की
मनौतियां मानती हैं। तो रात में जवान औरतें हल-जुआठा ले कर खेतों में नंगी हो कर
हल चलाती हैं पर ये बेरहम देव इतना बेईमान ठहरा कि सारे बादरों को हजम कर जाता है।
लाख मनौतियों और जुगाड़ों के बाद भी वर्षा की एक बूंद तक पृथ्वी को मयस्सर नहीं
होती....
और
अब तो बेटवा हालत यहां तक पहुंच गई है कि काहे न आकाश ही धरती पर गिरा दिया जाए, खेतों में हंसिया नहीं जाने की। घर की पूंजी भविष्य
को सुधारने में पहले ही डूब चुकी है। कुल मिला कर गांव अब जीता-जागता नरक हो गया
है। मैं क्या-क्या गिनाऊं। अब ख़ुद ही आ कर देख लेना।
इन
नाते बेटा,
चिट्ठी पाते ही तुरंत आ जाओ, हमहूं तैयार बैठी हैं।
सावन-भादों
का महीना और आकाश को घेरे ढेर सारे बादल। काले, भूरे, उनीले और तहीले बादलों को देख कर बरसात की उम्मीद
बंधती है। लेकिन बेरहम पछुआ हवा बादलों को बटोर अपने डैनों पर चढ़ा कर उड़ा ले
जाती है और रह जाता है बादलों से वीरान आग उगलता आसमान....छिटपुट बादलों में कैद
सूरज वैसे ही चमकने लगता है जैसे
बैसाख और जेठ में दहकता था।
धान, कोदो, सांवा, टागुन और मक्का की फसलें झुलस कर नेस्तनाबूद हो चुकी
हैं। नदियां सिमट कर अपने दोनों कगारों के बीच दफन हैं। क्या ताल, क्या पोखर और क्या पोखरी....सब का पेट ख़ाली हो चुका
है। सारे मेड़ और चकरोड....बैशाख-जेठ जैसे आग की तरह तपते हैं।
दुर्दिन
को झेलना कितना कठिन होता है। सोचता हूं क्या यही वह गांव-जवार है, जहां नदियां-नाले मिल कर बरसात में सागर का रूप धर
लेते हैं। बाढ़ में गांव के रास्तों की पहचान डूब जाती है। पड़ोसी गांव तक पहुंचना
दूभर हो जाता है। आख़िरकार,
हमारे बाप-दादों की यह कहावत, ‘टाटी ओट हजार कोस’ किस
जालिम ने कैद कर ली है ?
विश्वास नहीं पड़ता कि ये वही
गांव,
वही जवार है जो आज सांय-सांय कर
रहे हैं। खेतों की धरती सूखा से दरक गई है।
आगे
बढ़ता हूं और अविश्वास ज्यादा देर तक नहीं टिक पाता। परधान काका को देखते ही
मोहभंग हो जाता है। ये वही परधान काका हैं, जिन
के यहां पिछले साल मैं शीशे के छोटे-छोटे बर्तनों में रखी चावल की कई किस्में देख
कर चकित रह गया था, कि इस घामड़ इलाके में....और परधान काका दूध का गिलास
हाथ में थमा कर बड़े उत्साह के साथ उन किस्मों के बारे में विस्तार से बताने लगते
थे। आज वही परधान काका मुझे देख कर कुछ बोलने के बजाय गुमसुम-से खड़े हो कर मुझे
सिर्फ देखते रह जाते हैं। बोलते कुछ नहीं। हैरानी होती है।
मैं
परधान काका की सूखी आंखों का सामना नहीं कर पाता और झट मेड़ छोड़ कर आगे कच्ची
सड़क पर बढ़ जाता हूं। सड़क के दोनों ओर सांय-सांय करते खेत और भी बोझिल कर देते
हैं।
याद
आता है,
कभी इन्हीं सड़कों पर कुवार-कातिक
के महीनों में गुजरते वक्त मादक गंध के बयार में डूब-उतरा जाता था मैं, और सर्वेश्वर के एक गीत की वह कड़ी बरबस मन में
गूंजने लगती थी,
‘दादुर, मोर, पपीहा बोले, बोले चूनर धानी रे/ खनखन-खनखन
चुरिया बोले,
रिमझिम-रिमझिम पानी रे....।’
उस
अनबूझ गंध में कितनी ही बार आकंठ डूबने का अनुभव कर चुका हूं। इस धूल-भरी सड़क के
दोनों ओर,
दूर-दूर तक पुरवइया में लहराते
धान के काले फूल की गंध में जितना खिंचाव था, उसे
सहन करना भी उतना ही कठिन। रोम-रोम में बस जाने वाली वह सुगंध कभी पकड़ में नहीं
आई। हिरन की कस्तूरी जैसी,
कंटीली चंपा से मिलती-जुलती या इस
से अलग, अनोखी सुगंध....।
और
आज सड़क वही है,
और राही भी वही, पर उस भीनी सुगंध का कहीं नामो-निशान न था। सड़क के
दोनों ओर लगातार पड़ने वाली खत्तियों में पहले आदमी के डूबने भर का पानी भरा रहता
था। इस बार कहीं-कहीं जरा-जरा पानी दिखाई पड़ा। कीचड़ में बच्चे छोटी मछलियां पकड़
रहे थे। कीचड़-भरी खत्तियों के बाद दूर-दूर तक खेतों में कूचियों जैसे धान के पौधे
उगे हुए हैं। उठान एक फुट से अधिक नहीं। फुनगियां धूप से झुलसी हुई जैसे खेतों में
आग लग गई हो।
आगे, दूसरी ओर से आते एक अपरिचित बुजुर्ग मिल गए। उन्हें
जै राम जी कह कर बात शुरू की तो खेतों की तरफ देखते हुए वह छूटते ही बोले, ‘‘दोहाई राम जी कै झूठ नाहीं बोलब, बबुआ, हमार
उमिर साठ-सत्तर बरिस कै हो गईल लेकिन अबले अइसन कब्बो नाहीं भईल रहल कि सावन-भादों
के एह तरे दगा दे जायं बरसुआ नाखत बादर....’’ बोलते-बोलते
उन का स्वर भर्रा गया।
बगल
के खेत में केवल काका बेड़ी से पानी उलीच रहे थे। एक ओर वे, दूसरी ओर उन की घरवाली। कच्चा आठ बिगहा में जया और
परी किस्म का धान उन्हों ने बड़ी जतन और उम्मीद से लगाया
था। अधबीच जवानी मरते पौधों को बचाने की केवल काका जी-तोड़ कोशिश कर रहे थे। उन के
करीब जा कर उस खेत की दरार भरी धरती से अधिक गहरी झुर्रियां उस प्रौढ़ किसान के
चेहरे पर मैं ने देखीं और कुछ क्षणों तक देखता ही रहा। सोच रहा था कि बात कहां से
शुरू करूं कि केवल काका के कांपते होंठ इतना ही कह सके, ‘‘बचवा अब की सूखा....’’ आगे
के शब्द गले के भीतर ही घोंट कर उस दुनिया-देखे किसान ने अपने सूखे खेत के फैलाव
को अपनी आंखों में समेटते हुए जब मेरी ओर निगाह उठाई तो उस की पुतलियों पर
कांपते-झिलमिलाते अनेक अर्थों को झेल पाना मेरे लिए कठिन हो गया। वह निगाह मन को
भीतर तक बेधती चली गई....उन मटमैली पुतलियों में न जाने क्या था ?
‘‘बचवा अब की क सूखा....’’ आगे
बहुत कुछ कोटरों में धंसी दो छोटी-छोटी आंखें कह रही थीं। केवल काका के प्रति
सांत्वना के दो शब्द भी मैं नहीं कह पा रहा था....। उन के पास यही आठ बिगहा खेत
हैं। बड़ी आशा ले कर घर की पूंजी उन्हों ने बीज, खाद, निराई में लगा दी कि अगहन उतरने पर जया, परी धान से उन का घर भर उठेगा। वह उम्मीद सूखा की
चपेट में सूख गई। आगे रबी में क्या होगा, इस
की आशा किस आधार पर केवल काका के बुझे हुए मन में हरियाली भर सकती थी ? बोझिल मन से सड़क की ओर चलने लगा कि तपते आकाश के
सन्नाटे को धारदार तीखी आवाज से चीरता कोई पक्षी सर्राटे से गुजर गया। केवल काका
सिर को झटका दे कर आकाश की ओर ताकते-ताकते सिहर उठे। अनबूझा-सा ठिठक कर मैं केवल
काका की ओर देख रहा था। वे बोले, ‘कवि
घाघ की कहावत है,
बेटा !
डोक
खोली जाय अकास,
अब
नाहीं बरखा की आस।’
मैं
कुछ कहता कि काकी बोल पड़ीं, ‘‘बेटवा, ईनि ऐसै कहाऊत कहत रहि जईहें। बीसवारन से कहि रहल
बाटीं कि ई खेती-बारी में जो अब आगि लागि गईल त कवनो दूसर धंधा देखा। नाहीं अबहिन
एक जून खाए के जो मिल तो बा चार दिन बाद दूनो जूनी उपवास होखे लागी....’’ काकी का भाषण जारी रहा। अब यहां और रुकने की सामर्थ्य
कम से कम मुझ में नहीं रह गई थी।
एक
पढ़े-लिखे सज्जन मिले जो पड़ोसी गांव के प्राइमरी स्कूल में अध्यापक हैं। मिलते ही
वे भी शुरू हो गए सूखा पर ही....मैं ने उन्हें छेड़ा कि, ‘पढ़े-लिखे आदमी हो कर आप भी कायरों और बुजदिलों जैसी
बातें बक रहे हैं ?’ उन्हों ने मुझे घूर कर देखते हुए कहा, ‘नहीं भाई साहब, आप
इस जवार के आदमी हैं,
यहां के उतार-चढ़ाव से वाकिफ हैं, कम से कम आप को ऐसा नहीं कहना चाहिए।’ वह रुके और बोले, ‘हां, मैं तो भूल
ही गया था कि आप को शहरी हवा लग गई है, आप
कह सकते हैं।’ मुझ पर बोली कसने के बाद मास्टर साहब बताने लगे, ‘‘दरअसल, भाई
साहब! सच तो यह है कि यहां के लोग बहुधा बाढ़ और छिटपुट सूखा से सदैव जूझते रहे
हैं। दैवी आपदाओं से यहां के किसान परिचित हैं, उन्हें
वे कितनी ही बार झेल चुके हैं। विपदा से जूझना और फिर उसे भूलना हम किसानों की आदत
है। लेकिन इस साल तो जैसे सूखा ने, क्या
छोटा काश्तकार और क्या बड़ा, सभी को बुरी
तरह झकझोर दिया है।’’
अभी
मास्टर साहब से विदा ले कर बागीचे की ओर बढ़ा ही था कि खाद्यान्न योजना के अंतर्गत
हो रहे काम में हाजिर बाबू के पद पर कार्य पर रहे बैरागी परसाद मिल गए। बैरागी
परसाद मेरे साथ प्राइमरी स्कूल में पढ़े हुए हैं। आगे इन की पढ़ाई न हो सकी।
बैरागी परसाद उतावली के साथ मिलते हुए कहते हैं, ‘‘भइया ! इस समय घर जा रहा हूं, रात में घर आऊंगा, तब
मजे से बात-चीत होगी।’’ मैं कहता हूं, ‘‘ठीक है, लेकिन
आना जरूर....’’
सांझ
अब अवसान पर है, गांव के सीवान पर एक छोटी पुलिया है। वहां शाम को
प्रायः छोटे-बड़े सभी लोगों का उठना-बैठना होता है। सोचता हूं, सब से मुलाकात हो जाएगी और इसी गरज से पुलिया की ओर
बढ़ लेता हूं....रेडियो से ‘ग्राम जगत’ कार्यक्रम
का प्रसारण सुनाई देता है। पुलिया पर पहुंचता हूं। छोटे-बड़े सभी से औपचारिकता
पूरी करने के बाद बैठता हूं।
‘अपनी मेहनत के बल बूते, धरती
सरग बनावल जाई !’ विषय पर जुगानी भाई का रेडियो भाषण चलता ही रहता है, कि मार्कण्डेय जो संभवतः 10वीं या 11वीं
कक्षा में पढ़ता है,
रेडियो बंद कर देता है। और रेडियो
बंद करते ही, मुझ से एक सवाल दाग बैठता है, ‘भइया ! क्या बात है कि ई रेडियो वाले जुगानी के
रोज-रोज के इस रूखे भाषण में कभी भी सूखा नहीं होता। उलटे पंप सेटों, ट्रैक्टरों के लिए डीजल की वर्षा होती है। खेतों के
लिए बिजली की अनवरत आपूर्ति रहती है और नहरों से पानी का समुंदर बहता है....’
‘दरअसल बात ये है, मार्कण्डेय, कि जुगानी ये सारा कुछ अपने मन से नहीं झींकते हैं, अरे भाई, उन
को तो ऊपर से यानी सरकार से जैसा आदेश आता है, वैसा
ही उगल देते हैं,
वे सरकारी नौकर ठहरे, अब जो सरकार कहेगी, वही
तो उन्हें करना है। और करें भी न तो क्या करें....’
अभी
मैं जवाब दे ही रहा होता हूं कि मेरी बात को लगभग काटते हुए जतन काका, जो रेडियो पर जुगानी का रूखा भाषण रोज सुनते हैं, बोल पड़ते हैं, ‘नाहीं बेटा, तनी
जुगानी और सरकार दूनों के लगे चिट्ठी लिख के हमरी ओर से पूछब कि अब कैसे कवन मेहनत
करीं,
जेसे कि ई धरती सरग बनि जात। वैसी, बेटा....रेडियो क कहना मानीं त रेडियो से त धरती कबकै
सरग बनि भईलि बा। अब तूहीं बताव ले बीया खरीदलीं। जरत जेठ में लूह खात बज्जर जस
धरती कै छाती चीरलीं। पानी नईखे बरसल। बोरिंग मालिक के पानी के दाम दे के बेहन
डरलीं। 25
दिन तक बेहन रखवलीं। टेक्टर के
भाड़ा दे के खेत तैयार करवलीं। रोपनी के पहिले खाद डरलीं। मजूरन के मजूरी दे के
रोपनी करवलीं। फेर पानी नाई बरसले पर दू-दू बेर खेत सिंचवलीं। एतना मेहनत अउ पूंजी
हम लगवलीं और कुलि खेत सूखि गईल। अब बताव हम का करीं ? माथा फोर लेईं ?’
अभी
जतन काका चुप होते कि रामदीन भी अपनी भड़ास निकालने लगा, ‘‘कोआपरेटिव के अमीन और एकाउंटेंट, तहसीलदार के अमीन और चपरासी, ब्लाक के पंचायत सेवक, सब
साले अपना-अपना बस्ता बांध कर गांव में आते हैं। बस्ता और बहीखाता खोल कर
अपना-अपना बकाया मांगते हैं। सरकार साली तो ढिंढोरा पीट-पीट कर कहती है कि सारी
लगानें माफ हो चुकी हैं और इधर ये कमीने कहते हैं कि अभी आदेश नहीं आया है और साले
खूंटे से गोरू खोल ले जाते हैं, हरामी....माधर....!’’
अंधेरा
काफी गहरा चला था,
बल्कि अब रात हो गई थी, लोग उठ कर धीरे-धीरे घरों की ओर जाने लगे और पुलिया
की मीटिंग लगभग डिसमिस हो गई।
मैं
भी चला आया।
घर
पर दस-बारह लोगों की तादाद देख कर मैं चौंक-सा गया। बाद में मां ने बताया कि हमारे
साथ ये भी शहर चलना चाहते हैं। मैं ने माथा ठोंक लिया तो मां ने कहा, ‘काहें ऊंहों कौनो काम नाहीं मिल सकत....।’
‘तुम समझती क्यों नहीं ? अरे
शहर कोई कोयले की खदान है या कि बनिए की दुकान कि जैसा चाहा वैसा काम तलाश कर पा
लिया। अरे वहां कोई काम पा लेना यहां से भी ज्यादा मुश्किल है।’ मैं ने मां को लगभग डांटते हुए कहा। मां सिसकने लगी।
मैं भी चुप हो गया।
खाना
खा कर अभी चारपाई पर लेटा ही था कि बैरागी आ गया।
‘आओ भाई बैरागी।’ कहते
ही वह आ कर चारपाई पर एक ओर बैठ गया। बोला, ‘मैं सोच रहा था, आप
सो गए होंगे,
लेकिन तब भी सोचा मिल लूं। सो गए
हों, तो भी जगा कर। दरअसल दिन में काम से फुर्सत नहीं
मिलती,
सो चला ही आया।’
‘हां, भाई ! हाजिर
बाबू हो....कमाई कर रहे हो।’ मैं ने
व्यंग्य-भरे स्वर में कहा।
‘नहीं भइया ! आप हम को गलत न समझिए !’
‘अच्छा बच्चू, चोरी
की चोरी,
और सीनाजोरी भी ?’
‘सच भइया ! मैं तो सिर्फ चार-छः रुपए ही अपनी मजदूरी
से अधिक कमा पाता हूं,
सो भी चमचई कर के। घपला तो साले
ऊपर वाले कर रहे हैं। अब देखो, एक आदमी
पीछे जो अनाज सरकार की ओर से स्वीकृत है, लेकिन
ये कमीने ठीकेदार औना पौना नकद दे कर सब को टाल देते हैं....लोग सब कुछ जानते हुए
भी मजबूरन चुप रह जाते हैं। और ये ठीकेदार साले सारा अनाज हड़प जाते हैं।’
‘इस तरह एक तरफ तो ये ठेकेदार के पिल्ले सब घोटाला कर
अनाज हड़पते हैं;
दूसरी ओर माधरचोद बनिये यह अनाज
ख़रीद कर अपना गोदाम भर रहे हैं, इन्हीं
मजूरों-किसानों को लूटने के लिए।’
‘अच्छा तो अब भाषण भी ख़ूब देने लगे हो मिस्टर बैरागी
परसाद ! क्या चुनाव लड़ने का इरादा है ?’
‘नहीं, भाई, अपनी इतनी औकात कहां ? वैसे
एक बात पक्की जान लो,
इस बार जो भी नेता साला आएगा, वो चाहे किसी भी पार्टी का हो....साला वापस तो नहीं
ही जाने पाएगा....।’
‘ऐसा ! लेकिन क्यों ?’ मैं
ने अनजान बनते हुए कहा।
‘ये भी कोई पूछने की बात है ? अरे अब अनाज तो रहा नहीं, उन्हीं कमीनों को भून कर खाएंगे हम लोग।’ वह मुझे पछाड़ते हुए बोला।
‘अच्छा छोड़ ये बकबक। तू अब कुछ ही दिनों में नेता
जरूर बन जाएगा। बड़ा नहीं तो छुटभैया नेता तो जरूर ही बनेगा। लेकिन यह तो बता, तेरी खेती-बारी का क्या हाल-चाल है ? तुम ने कुछ बताया ही नहीं ?’
‘मेरी खेती-बारी सुनना चाहते हैं, क्या लोगों से सुनते-सुनते अभी पेट नहीं भरा....’ कहते-कहते बैरागी एकाएक गंभीर-सा हो गया। बोला, ‘अरे, कुल जर जमा
पांच ही बिगहा तो खेत है, जिस में से 4 बिगहे
में धान बैठाए था। एक बिगहे में गोरुओं के लिए चरी बोई और बाजरा छिड़क दिया था।
धान फूटने के पहले ही सूखने लगे तो काट कर गोरुओं को खिला दिया। चरी की बढ़ोत्तरी
नहीं हुई और सूखा के कारण जहर पड़ने के डर से पशुओं को खिला नहीं सकता था....सो वो
भी बेकार ही गया।’ और बैरागी जम्हाई लेने लगा।
‘तो कुछ भी नहीं हुआ ? बाजरा
की भी पैदावार कुछ नहीं हुई ?’ मैं ने
सहानुभूति जताते हुए पूछा।
‘कहां की बात करते हो भाई, लंदन से उतर कर तो नहीं आए ?’
बैरागी
ने फिर कहा, ‘बाजरा थोड़े पानी में हो जरूर जाता है। कहावत
है....बज्जर परे तो भी बजरा होय। लेकिन, भाई, अब की तो जरूर बज्जर से भी ज्यादा कुछ पड़ गया है, बाजरा भी सूखने लगा।’
‘ठीक कहत हौ बैरागी ! ई सूखा नहीं खेतिहरन पर बज्जर
गिरल है,
बज्जर। ई विपत्ति पंच कैसे
झेली....हे राम !’ कुछ-कुछ रुआंसी और आतंकित-सी मां ने कहा।
‘सब झेल लेंगे....’ बैरागी
मां को सांत्वना-सी देते हुए बोल पड़ा, ‘हम तो मेड़ की दूब हैं, काकी
! कितनी बार सूख कर फिर हरे हो गए। सूखना और फिर हरा होना, यही तो जिंदगानी है। और यह बज्जर सूखा सदा थोड़े ही
रहेगा।’
बैरागी
के चेहरे से उदासी एकाएक गायब हो गई थी और उस उदासी की जगह एक आशा ने ले ली थी, जिस से उस के पीले पड़ गए चेहरे पर एकाएक लालिमा
दौड़ने-सी लगी थी। और मैं ने देखा, मां
की आंखों में आए आंसू जाने कहां उन तहीले-उनीले बादलों की तरह गायब हो गए थे।
मेरी
आंखों में, कभी मां का स्थिर चेहरा तो कभी बैरागी का तेज चेहरा
और कभी सूखे खेतों की परछाईं तो कभी खेतों में बेड़ी से पानी उलीचते हुए केवल काका
की मटमैली पुतलियां और उन के द्वारा धान के पौधों को बचाने की जी-तोड़ कोशिशों की
परछाइयां....आड़े-तिरछे नाच-नाच के झांक रही थीं। बैरागी का यह कहना कि ‘हम तो मेड़ की दूब हैं काकी ! कितनी बार सूख कर फिर
हरे हो गए। सूखना और फिर हरा होना, यही
तो जिंदगानी है।’ रह-रह कर टीसता है ! नींद नहीं आती। जबरिया सोने की
कोशिश करता हूं। सो नहीं पाता।
भिनसहरा हो गया है। मां जाग गई हैं। शहर चलने की तैयारी में
जुटी हुई हैं। मैं भी उठ बैठता हूं। चुपचाप बैठते भी नहीं बनता। उठ कर लुंगी
लपेटता हूं। कुछ सोचते-सोचते पुलिया की ओर बढ़ लेता हूं। गांव की औरतें
खुसुर-फुसुर बतियाती हुई सीवान की ओर से लौट कर वापस आ रही हैं। पुलिया पर कोई
नहीं है। दरअसल मैं गलत समय पर आ गया हूं। इस समय मरद लोग इधर नहीं आते।
फिर
भी मैं पुलिया पर बैठ लेता हूं।
सोचता
हूं कि अगर मैं भी शहर न जाऊं तो कैसा रहे ?
-32-
भूचाल
उन के अंतर्विरोध उन्हें इस तरह
डंसे हुए थे कि उन्हें समझना किसी एक के लिए क्या पूरे शहर के लिए मुश्किल था।
शायद वह खुद भी अपने को समझ नहीं पाती थीं। संभवतः इसी लिए लगभग हर किसी पर आरोप
दर आरोप मढ़ती वह यहां से वहां भागती फिरतीं। कभी बनारस, कभी लखनऊ तो
कभी दिल्ली एक किए रहतीं।
पता नहीं क्या था कि जब भी कभी वह
कुंदन से क्या किसी भी से मिलतीं या फोन करतीं तो हमेशा शिकायतों का पिटारा खोल
बैठतीं। और अब तो कई दफा वह यह भी नहीं देखतीं कि अगला उन का परिचित है कि
अपरिचित। वह तो बस शुरू हो जातीं तो शुरू हो जातीं। उन की राय में जैसे हर कोई उन
के खि़लाफ साजिश रच रहा होता था। अगर वह कभी बीमार भी होतीं और जो उन्हें देखने
कोई पहुंच जाए तो वह इस में भी कोई साजिश सूंघ लेतीं और उस के जाते ही किसी दूसरे
से पूछ बैठतीं, ‘आखि़र
यह मुझे देखने आया ही क्यों था ?’ ‘अगला आदमी चुप भी रहता तो वह ख़ुद ही जवाब भी दे
लेतीं, ‘कुछ
तो सबब रहा होगा वरना यह शख्स तो यूं ही नहीं आने वाला।’ वह जोड़तीं, ‘कुछ तो दाल
में जरूर काला है।’
अब वह कोई पचास बरस की थीं। पर
बीते जमाने में कभी बहुत अच्छी कविताएं लिखती थीं। हिंदी में भी और अंगरेजी में
भी। पर बतौर कवियित्री उन्हें कभी ठीक से जाना नहीं गया। कवियित्री होने की
मान्यता तो बहुत दूर की कौड़ी थी। विभा जी अब तो यदा-कदा लेखादि लिखती हैं और
पुरानी कविताओं को ही नई बता-बता कर जब-तब सुनाया करती हैं। हां, डायरी भी वह
लिखती हैं पर अंगरेजी में तो भी उन के पास शहर के बूढ़े कवियों, रिटायर्ड
अफसरों और पस्त हो चुके नेताओं और बुद्धिजीवियों का आना जाना लगा रहता है। उनको वह
ख़ूब खिलाती पिलाती हैं और साथ ही साजिशों की गंध भी हेरती फिरती हैं।
उन के आरोपों की फेहरिस्त शायद
इसी लिए इतनी लंबी है कि ख़त्म ही नहीं होती। उन के आरोपों से उन का इकलौता बेटा
भी बरी नहीं है। वह बेटे के लिए एक दिन फोन पर कहने लगीं, ‘साले को
गोली मार दूंगी और फांसी चढ़ जाऊंगी। पर अब और बर्दाश्त नहीं कर सकती।’ उसे लगा कि
वह इस बात को लाइटली कह रही हैं तो उसी अर्थ में चुहुल करते हुए कुंदन ने कहा भी
कि, ‘हां, ‘मदर इंडिया’
में भी नरगिस ने बेटे बने सुनील दत्त को मार दिया था। यह कहते हुए कि, ‘लाज नहीं दे
सकती हूं। बेटा दे सकती हूं।’ सुन कर वह बिफरीं। बोलीं, ‘हां, नरगिस ने तो
डायलागबाजी की थी। मैं तो वह भी नहीं करूंगी।’ वह दहाड़ीं, ‘सीधे गोली
मार दूंगी।’ गनीमत बस यही थी कि वह टेलीफोन पर दहाड़ रही थीं। सामने नहीं थीं। सो
वह सुरक्षित था। जो भी हो वह समझ गया कि बात ज्यादा गंभीर हो गई है। सो वह टालते
हुए बोला, ‘जाने
भी दीजिए। बीती बातों को बिसार दीजिए। आखि़र कुछ भी है, है तो आपका
बेटा ही !’
‘लेकिन बलात्कार से पैदा हुआ।’ वह
पूरी सख़्ती से बोलीं, ‘बलात्कार
से जन्मा बेटा, बेटा
नहीं होता। और यह बलात्कार से जन्मा है।’
‘फिर भी है तो आप का ही अंश। आप का
ही ख़ून।’ उस ने बात को नरम करते हुए कहा,
‘आप की ही कोख से पैदा हुआ !’
‘हां, है तो।’ वह
थोड़ी संयत होती हुई बोलीं, ‘तभी
तो मेरा गोरा रंग पा गया है। मेरी नाक-नक्श और बुद्धि भी मेरी पा गया है। तो सफलता
की सीढ़ियां चढ़ता जा रहा है।’ वह बोलती जा रही थीं,
‘नहीं वह है क्या ! सब कुछ मेरी
वजह से ही है। नहीं अब जिस पोजीशन पर वह है अपने बाप के बूते तो नहीं हो सकता था।’
‘ये तो है।’ वह बोला।
‘यहां लखनऊ से ले कर दिल्ली तक मैं
ने ही उस को सब से इंट्रोड्यूस करवाया। पी॰ एम॰ हाउस से ले कर हर जगह तक। सारे
मिनिस्टर्स मुझे जानते हैं। करीब करीब सभी पोलिटिकल पार्टियों में मेरे लोग हैं।’
‘अच्छा !’ कहते हुए वह समझ गया कि
विभा जी अब ज्यादा फेंकने लगी हैं।
‘मेरी पोलिटिकल इनफ्लूएंस का
तुम्हें शायद पता नहीं है।’ वह उस को थाहते हुए बोलीं, ‘मैं जो
चाहूं आज भी करवा सकती हूं। वह आज जो स्टार बना हुआ है तो मेरे ही बूते।’
‘आखि़र आप का बेटा है।’ कुंदन ने
खुशी जताते हुए कहा। लेकिन वह बिदक गईं। बोलीं,
‘क्या बेटा-बेटा लगा रखा है।
तुम्हें बताया कि बलात्कार से पैदा हुआ बेटा नहीं होता।’ उन की आवाज की सख़्ती फोन
पर जारी थी।
‘लेकिन अभी तो आप कह रही थीं कि आप
का गोरा रंग, आप
की नाक नक्श और आप की बुद्धि भी पा गया है।’ कुंदन ने बात को फिर से पटरी पर लाने
की कोशिश की।
‘वह तो मैं ने ठीक कहा।’ वह बिफरीं, ‘बुद्धि तो
मेरी जरूर पा गया है। पर उल्लू के पट्ठे साले ने आदतें तो अपने बाप की पाई हैं।’
उन्हों ने जैसे जोड़ा, ‘वही
टुच्चई, वही
धूर्तई, वही
मक्कारी सारा कुछ बाप का ! साले ने मेरी एक भी आदत नहीं ली।’ कह कर उन्हों ने लंबी
सी सांस भरी।
थोड़ी देर दोनों ओर से ख़ामोशी
तारी रही। फोन पर। फिर अचानक विभा जी ही बोलीं,
‘देखो कुंदन तुम अब मुझ से उसे
बेटा-बेटा मत कहना।’ कह कर वह रुआंसी हो गईं। बोलीं,
‘अब की जब दिल्ली गई थी तो पता है
तुम्हें प्रज्ञान ने मेरे साथ क्या-क्या किया ?’
‘क्या किया ?’
‘यह पूछो कि क्या नहीं किया ?’ वह ऐसे बोल
रही थीं जैसे नदी कोई बांध तोड़ कर बह रही हो,
‘एक रात दो बजे वह शराब पी कर आया।
मैं सोई थी। गालियां दे कर मुझे जगाया। फिर कलाईयां दोनों हाथों से जोर से पकड़े
खींच कर वह लॉबी में लाया और चीख़ा,
‘कुत्ती हरामजादी सुबह 4 बजे तक यहां
से निकल जाओ सुबह तक मैं तेरा चेहरा नहीं देखना चाहता।’ बताते-बताते विभा जी फफक
कर फोन पर ही रो पड़ीं। वह रोते-रोते बोलीं,
‘कुंदन मैं तुम्हें क्या-क्या
बताऊं। प्रज्ञान चाहता क्या हैं ? उस की कौन-कौन सी इच्छाएं पूरी करूं।’ वह रुकीं और
बोलीं, ‘वह
तो इतना गिर गया है कि अपने कॅरियर के लिए अपनी बहनों तक से प्रास्टीच्यूट करवा दे
!’
‘क्या कह रही हैं आप ?’ कुंदन
भौंचकिया गया।
‘हां भई, दो तीन बार
इस तरह के अटेंप्ट भी वह कर चुका है।’ विभा जी बोलीं।
‘यह तो हद है !’
‘अब मैं तुम्हें क्या-क्या बताऊं।’
वह बोलीं, ‘कुछ
बातें तो ऐसी हैं जिन्हें बताते भी नहीं बनता।’
‘मसलन !’
‘अब क्या बताऊं ?’
‘तो भी !’
‘सोचो मेरी सलवार तक खोल दी गई !’
वह उबलती हुई बोलीं।
‘क्यों ?’ कुंदन फिर
अचरज में पड़ गया।
‘क्यों कि मैं अपने पैसे, ज्वेलरी सब
कुछ सलवार की जेब में ही रखती हूं। चेन लगवा रखी है।’
‘ओह !’ कुंदन कुछ निश्चिंत हुआ।
फिर पूछा, ‘क्या
प्रज्ञान ने ऐसा किया?’
‘पता नहीं। मुझे तो स्लीपिंग पिल्स
खिला कर सुला दिया था।’ वह बोलीं, ‘हो सकता है उस की बीवी ने सलवार खोली हो। पर खोली तो
प्रज्ञान की मर्जी से ही होगी।’
‘हां, ये तो है।’
कुंदन संक्षिप्त सा बोला।
‘पर मेरी ज्वेलरी, पैसे सब
निकाल लिए। बाद में महरी से मैं ने पूछा तो वह कहने लगी मैडम कहीं और भूल आई होंगी
आप।’ वह बोलीं,’ ‘अब
इस का मैं क्या जवाब देती भला ?’
‘तो क्या कहीं और गई थीं क्या आप ?’ कुंदन ने
पूछा।
‘ह्वाट यू मीन बाई कहीं और गई थीं
क्या आप !’ वह और भड़कीं, ‘तुम
तो प्रज्ञान वाली भाषा बोल रहे हो !’
‘ऐसा नहीं है विभा जी। आप गलत सोच
बैठीं।’ कुंदन ने प्रतिवाद किया।
‘गलत क्यों सोचूंगी। प्रज्ञान भी
ऐसे ही कहता है। कहता है कि मैं इंज्वाय करने के लिए लखनऊ में अकेले रहती हूं।’ वह
जरा रुकीं और बोलीं,‘क्या
तो मर्दों की संगत ख़ातिर !’
‘यह तो बड़ी अफसोस की बात है।’
कुंदन ने कहा, ‘बेटे
को मां के बारे में इस तरह नहीं बोलना चाहिए।’
‘तुम ने फिर बेटा कहा !’ कहते हुए
वह थोड़ा मद्धिम पड़ीं। कहने लगे, ‘चलो कुछ भी मुझे वह कहे या मैं भी उसे जो कहूं सच तो
यह है ही कि वह मेरा बेटा है। चलो बलात्कार से पैदा हुआ।’ वह बोलीं, ‘बेटा होने
के नाते उसे ऐसा नहीं कहना चाहिए। पर वह सभी सर्किल में यही कहता फिरता है तो
तकलीफ तो होगी न !’
‘बिलकुल होगी।’ कुंदन ने कहा, ‘किसी को भी
होगी।’
‘क्या-क्या बताऊं कुंदन ! प्रज्ञान
मेरा बेटा है जरूर पर मुझ पर कैसे कलंक लगा दे वह इसी फिराक में लगा रहता है।’ वह
बताने लगीं कि, ‘एक
बार उस की बीवी ने घर में ऐसा तांडव किया दिल्ली में कि उस का घर छोड़ कर मुझे एक
गेस्ट हाऊस में जा कर ठहरना पड़ा।’ वह बोलीं,
‘फिर जानते हो प्रज्ञान ने क्या
किया? मेरी
जासूसी उस गेस्ट हाऊस में करवाने लगा कि कौन-कौन मिलने आता है। किस-किस के फोन आते
हैं।’ बिसूरती हुई वह बोलीं, ‘और यह सब वह अपनी मोटी बीवी के इशारे पर करता रहा।’
‘बच्चे कितने हैं ?’
‘बच्चे हुए कहां ?’ वह बोलीं, ‘शादी के
पहले जाने कितने एबारशन करवा चुकी है तो बच्चे होंगे कैसे ?’ वह बोलीं, ‘अब भी जब तब
जिस-तिस के साथ भाग जाती है। प्रज्ञान भी परेशान रहता है। करे भी तो क्या करे
बेचारा !’
‘प्रज्ञान की बीवी करती क्या है ?’ कुंदन ने
दबी जबान पूछा।
‘करेगी क्या ! बाप ब्लैकमेलर
जर्नलिस्ट था। वह भी वही जर्नलिस्ट है। बाप भी हाथी था। वह भी हथिनी है।’ वह
बिफरीं, ‘मोटी
इतनी कि प्रज्ञान की बीवी नहीं मां लगती है।’
‘नौकरी कहां करती है ?’ कुंदन ने
पूछा, ‘क्या
वह भी उसी टी॰ वी॰ चैनल में है ?’
‘नहीं एक इंगलिश मैगजीन में हैं।’
फिर उन्हों ने एक बड़ी मैगजीन का नाम लिया।
‘वह तो अच्छी मैगजीन है।’
‘पर यह मोटी तो अच्छी नहीं है।’ वह
बोलीं, ‘प्रज्ञान
को जब तब बरगलाती रहती है। बाप किताबें लिख-लिख कर लोगों को ब्लैकमेल करता था यह
प्रज्ञान की आड़ में मुझे ब्लैकमेल करती है।’
‘यह तो हद है।’
‘और तो और मेरी सलवार तक खोल देती
है।’ वह बोलीं, ‘और
प्रज्ञान है कि मेरे खि़लाफ लखनऊ में भी जासूस लगा रखे हैं। एक नहीं कई-कई। जिसे
देखो वही मुंह उठाये चला आ रहा है।’ वह उदास होती हुई बोलीं, ‘पर अब तो
मेरी बर्दाश्त से बाहर हो गया है।’ वह फिर भड़कीं,
‘अब तो मैं साले को गोली मार
दूंगी। छोड़ूंगी नहीं।’
‘लेकिन प्रज्ञान ऐसा करता क्यों है
?’
‘प्रापर्टी !’ वह बोलीं, ‘सब कुछ
प्रापर्टी के लिए।’
‘इसके लिए यह सब करने की क्या
जरूरत है ? आप
की प्रापर्टी तो है ही उसी की।’
‘यही तो ! यही तो मसला है !’ वह
बोलीं, ‘साला
बाप पर गया है न ! बाप की आदतें बिरसे में मिली हैं न साले को !’ वह बोलीं, ‘पता है अब
की मेरी तबीयत ख़राब हुई। अपने जासूसों से साले को पता चल गया। भाग कर आ गया लखनऊ!
क्या तो मेरी देख रेख करने !’ वह बोलीं,
‘देख-रेख के नाम पर साले ने
डॉक्टरों को मिला लिया। पता नहीं क्या दवा खिला दी। मैं सुध-बुध खो बैठी। इसी बीच
जाने कहां-कहां मेरी दस्तखत ले ली। पावर आफ एटार्नी भी करा ली। विवाद न बढ़े इस
लिए बहनों को भी बुला लिया। मिल-जुल कर सब सालों ने मेरी आधी से अधिक प्रापर्टी
बेच डाली। और एक भी पैसा तो देना दूर उलटे मुझे साइकिक डिक्लेयर करवा दिया।’ कह कर
वह फिर से रोने लग गईं।
‘ऐसा कर दिया प्रज्ञान ने ?’
‘और नहीं तो क्या ?’ वह बोलीं, ‘फिर मुझे
दिल्ली उठा ले गया।’
‘क्यों ?’
‘उसे पी॰ एम॰ के साथ फारेन विजिट
पर जाना था।’ वह बोलती जा रही थीं,
‘तो पी॰ एम॰ के साथ जाने का जुगाड़, पासपोर्ट, वीजा सब
मेरे कंधे पर बैठ कर करवाना था। मेरे कांटेक्ट और इनफ्लूएंस को कैश करना था।’ वह
बोलीं, ‘तो
कुछ दिनों के लिए मैं मम्मी जी बन गई थी और काम ख़त्म होते ही कुतिया साली
हरामजादी हो गई।’ कह कर वह रोने लगीं,
‘बताओ मैं साली कुतिया हरामजादी
हूं कि मां हूं उस की।’
‘जाहिर है कि आप प्रज्ञान की मां
ही हैं और मां ही रहेंगी।’
‘जाने आगे क्या रहूंगी। अभी तो
साली कुतिया हरामजादी हूं।’ वह फिर से फोन पर ही सुबुकने लगीं।
‘इतनी दरार आप मां बेटे के बीच आई
कैसे ?’ कुंदन
ने पूछा।
‘दरार !’ उन्हों ने पलट कर पूछा, ‘अब तो दरार
नहीं भूचाल है हमारे बीच!’ वह बोलीं,
‘सब कुछ वह अपने कमीने बाप की तर्ज
पर कर रहा है। तब जब कि उसे पढ़ाया लिखाया मैं ने। मैं ही उंगली पकड़ उसे प्रिंट
मीडिया और बाद में इलेक्ट्रानिक मीडिया तक ले गई। टेलेंटेड तो था ही रिपोर्टर से
कंपेयरर तक पहुंचाया।’ वह बोलती जा रही थीं,
‘हमेशा ही उस की मम्मी जी थी। पर
अचानक जाने कब घुन की तरह हमारी जिंदगी में वह मोटी समा गई। पता हीं नहीं चला। वह
दिल्ली में था और मैं लखनऊ में। जब मुझे पता चला तो मैं गई दिल्ली। पता चला तीन
महीने से साथ ही रह रही है। तो भी सब पर पर्दा डाल कर धार्मिक रीति रिवाज के
मुताबिक बाकायदा शादी करवाई। आशीष दिया। ताकत भर खर्च बर्च किया। अलग से पैसे दिए।
ताकि बच्चों को कोई तकलीफ न हो। अब क्या पता था कि बच्चे तो मेरी ही तकलीफ का
ताना-बाना बुन रहे हैं।’
‘चलिए वह सब तो खुश हैं न ! बच्चे
सुखी रहें इस से ज्यादा मां को क्या चाहिए ?’
कुंदन ने कहा।
‘कैसे सुखी रहेंगे ?’ वह डपटीं, ‘मुझे दुखी
कर के, मुझे
अपमानित कर के भला सुखी रह पाएंगे ?’
‘जाने भी दीजिए अपना दुख, अपना अपमान
!’ कुंदन ने लगभग राय दी, ‘बच्चों
के खुश रहने में ही आप की भी खुशी है।’
‘कहीं तुम भी तो प्रज्ञान से नहीं
मिल गए हो !’ वह भड़कीं।
‘नहीं विभा जी। मैं तो कभी मिला ही
नहीं। कभी बात भी नहीं की।’ कुंदन ने कहा,
‘बस टी॰ वी॰ पर ही देखता हूं जब-तब
!’
‘हूं।’ उन्हों ने एक गहरी सांस ली, ‘फिर तो ठीक
है।’ वह बोलीं, ‘देखो
मैं ने सोच लिया है कि बची हुई प्रापर्टी का कुछ हिस्सा अब मैं भी बेंच दूं।’ वह
अचानक ट्रैक बदलती हुई बोलीं, ‘रायबरेली में इंडस्ट्रियल एरिया में एक बड़ी जमीन है
मेरी। उसे बेंच कर एक कोई अच्छी-सी कार ख़रीदूंगी और बाकी पैसे बैंक में जमा कर
दूंगी। फिर लाइफ को इंज्वाय करूंगी।’ वह बोलीं,
‘बोलो तुम कुछ मदद करोगे?’
‘कैसी मदद ?’ वह अचकचाया।
‘यही जमीन के बिकवाने में ?’
‘मैं कैसे बिकवा दूंगा ?’ दबी जबान
में कुंदन बोला।
‘चलो मैं ही कुछ करती हूं।’ वह चुप
नहीं हुईं। बोलती नहीं, ‘पहले
इस जमीन को बेंचती हूं। फिर कार ख़रीद कर फार्म हाउस को भी थोड़ा ठीक-ठाक करवाती
हूं। और हां, एक
डिक्लेयरेशन भी करनी है !’
‘वो कैसी !’
‘यही कि मेरी प्रापर्टी का एक भी
पैसा अब प्रज्ञान को नहीं मिले।’
‘ऐसा क्यों करना चाह रही हैं ?’
‘इस लिए कि मेरी कोई भी प्रापर्टी
उस के बाप की नहीं बल्कि मेरे बाप की है जिस पर उसका कोई हक नहीं है।’
‘इस में जल्दबाजी मत करिए। थोड़ा
समय ले कर सोच समझ लीजिए।’
‘सब सोच समझ लिया है। अब कुछ नहीं
सोचना।’ वह खुश-सी होती हुई बोलीं।’
‘अच्छा यह बताइए प्रज्ञान अपने नाम
के आगे सरनेम किस का लिखता है? आप का या अपने पिता का।’
‘उल्लू का पट्ठा साला कोई सरनेम
नहीं लिखता !’
‘स्कूली सर्टिफिकेट में कुछ तो
लिखा ही होगा कभी।’
‘साला अपने कमीने बाप का नाम लिखता
था ! एस॰ के॰ सक्सेना !’ कह कर वह पूछने लगीं,
‘क्यों क्या हुआ ?’
‘कुछ नहीं बस ऐसे ही पूछ लिया था।’
‘तुम यह सब छोड़ो। पहले
डिक्लेयरेशन का कुछ करो और जमीन भी बिकवाने का कुछ करो।’ वह चहकीं, ‘नहीं होगा
तो इस पैसे से एक मैगजीन भी निकाल लेंगे। एक इंगेजमेंट भी हो जाएगा मेरा।’
‘देखिए देखता हूं।’ कुंदन ने इस
बात को लगभग टालते हुए कहा। क्योंकि वह जानता था कि विभा जी के पास रोज क्या हर
घंटे एक नई स्कीम, एक
नया मुद्दा इजाद होता रहता है। फिर भी उस ने बात चालू रखी और उन से पूरे अदब और
लिहाज से पूछा, ‘आप
की शादी तो लव मैरेज थी न ?’
‘लव और मैरिज ?’ वह बोलीं, ‘क्या
बेवकूफी की बात करते हो ?’ वह
तुनकीं, ‘इस
का मतलब कुछ जानते ही नहीं तुम।’
‘आप ने कभी कुछ बताया ही नहीं।’
संकोच घोलता हुआ कुंदन बोला।
‘पंद्रह साल की लड़की क्या जाने लव
और मैरिज !’
‘क्या मतलब ?’
‘मतलब यह कि मेरी मां जब मरी तो
मैं ढाई तीन बरस की थी। फिर पिता ही मेरी मां थे और बाप भी। बनारस में मेरे पिता
वकील काली प्रसाद चतुर्वेदी का बड़ा नाम था। पैसे वालों में भी और विद्वानों में
भी। प्रज्ञान का बाप एस॰ के॰ सक्सेना मेरे पिता का जूनियर वकील था। मेरे पिता जब
मरे तो मैं सिर्फ पंद्रह साल की थी। मेरे कोई और भाई बहन नहीं था। इकलौती थी। जो
थे चचाजात थे। तो यह सक्सेना साला बरगला कर वेलविशर बन मुझे लखनऊ उठा लाया। मैं
पंद्रह की थी और यह छत्तीस बरस का। लंगड़ा था सो अलग। मैं नासमझ थी कुछ समझी नहीं।
जब तक समझती-समझती बहुत देर हो चुकी थी। तीन बच्चों की मां बन चुकी थी। जाति
बिरादरी, पट्टीदारी-रिश्तेदारी
में मेरा बहिष्कार हो चुका था क्या अब भी है। तभी तो मेरी यह दुर्दशा हो रही है।’
वह बोलती गईं, ‘इस
कमीने सक्सेना ने लखनऊ में प्रैक्टिस शुरू की। चली नहीं तो मेरे बाप की प्रापर्टी
बेंच-बेंच कर खाने लगा।’ कहते हुए उन्हों ने लंबी सांस ली, बोलीं, ‘जब तक बाप
जिंदा था वह सताता रहा अब बेटा सता रहा है।’ कह कर वह रोने लगीं। पूछने लगीं, ‘बताओ कुंदन
मैं क्या करूं, मैं
तो टूट गयी हूं, पूरी
तरह। करूं तो क्या ! हूं ?’ वह
कहने लगीं, ‘बेटे
का यह हाल है। बाकी ससुरालीजनों से मुझे नफरत है और मायके में मेरा बायकाट ! दो
चार पुरुष मित्र मिले भी तो नोचने और छलने वाले !’ वह हरहराती नदी की मानिंद बोलती
रहीं ‘बाकी अकेली औरत जान कर ये अधेड़,
ये बूढ़े लार टपकाते जब देखो तब
चले आते हैं। दुख पर मरहम लगाने के बहाने लिजलिजी लार बहाने लगते हैं। तंग आ गई
हूं ऐसे लिजलिजे लोगों से। ऐसे अकेलेपन से। जो सिर्फ संत्रास देता है। मैं ढूंढ़ती
हूं भावनात्मक सुरक्षा और मिलती है लिजलिजी भावुकता और गिद्धों की नोच खसोट। कोई
प्रापर्टी नोचता है तो कोई मन, कोई तन-मन दोनों।’ बोलते-बोलते वह फफक कर रो पड़ीं, ‘लोग, बेटा और
दोस्त कहते हैं कि मैं साइकिक हो गई हूं। बोलो कुंदन क्या मैं साइकिक हो गई हूं ? क्या इस तरह
टूट जाने को, लोगों
से अलग-थलग पड़ जाने को ही साइकिक कहते हैं ?
हूं ?’ वह रुलाई
रोकती हुई बोलीं, ‘जरा
पूछना किसी डॉक्टर से। फिर बताना। अगर जिंदा रही तो जान लूंगी।’
‘क्या ?’ कुंदन भी
भावुक होता हुआ बोला, ‘क्या
जान लेंगी ?’
‘कि मैं साइकिक नहीं हूं।’ कह कर
उन्हों ने उस रोज भी फोन हमेशा की तरह अचानक ही काट दिया।
-33-
प्लाजा
प्लाजा
वह पहले भी सैकड़ों दफा आया था। कभी कनॉटिंग करते टहलते हुए, कभी सिनेमा
देखने, कभी
किसी लड़की के साथ तो कभी फिल्म फेस्टिवल के दौरान लगातार आता। पर जैसे वह आज आया
था ऐसे तो कभी नहीं आया था प्लाजा !
बल्कि
एक बार तो जब वह थोड़े से तनाव में प्लाजा आया था तो वह तनाव यहां से छांट कर गया
था। बल्कि तनाव ख़ुद ब ख़ुद छंट गया था,
फिल्म देख कर। और जिंदगी का एक
अहं फैसला वह फिल्म तय कर देगी, यह तब वह नहीं जानता था। फिल्म थी महेश भट्ट की
‘अर्थ’। और कुलभूषण खरबंदा का इंदर वाला जो चरित्र दो औरतों के बीच जिस तरह नरक जी
रहा था उसी नरक के अंकुर राकेश की जिंदगी में भी अंकुआ रहे थे। वह तय नहीं कर पा
रहा था कि अनचाहे ब्याह वाली पत्नी के साथ आगे की जिंदगी बसर करे या दूसरी शादी कर
ले ! दूसरी शादी के लिए उस ने गुपचुप लड़की भी देख ली थी। और लड़की ही नहीं उस के
मां-बाप भी शादी के लिए न सिर्फ राजी थे बल्कि शादी फटाफट हो जाए इस के लिए उस से
ज्यादा वह लोग परेशान थे। यह जानते हुए भी कि राकेश शादीशुदा है ! शायद उन की
विवशता यह थी कि राकेश से उन की लड़की की शादी बिना दहेज और बिना तामझाम के होने
वाली थी। यह बात जब राकेश ने बार-बार महसूस की तब उस ने एक बार लड़की से पूछा भी था
कि, ‘शालू
सच-सच बताओ कहीं तुम किसी दबाव में मुझ से शादी करने को तो नहीं तैयार हो गई हो ?’
‘नहीं जी !’ वह बड़ी संजीदगी से
बोली, ‘बिलकुल
नहीं !’
‘तुम जानती हो कि मैं पहले से
शादीशुदा हूं ?’ राकेश
ने पूछा, ‘और
मेरा तलाक भी नहीं हुआ है।’
‘हां जी !’ वह बोली, ‘ये भी जानती
हूं और यह भी कि आप की उस से पटती नहीं। आप उस को पसंद भी नहीं करते !’ उस ने जोड़ा, ‘आप की
मजबूरी जानती हूं।’
‘कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम भी मजबूर
हो मुझ से शादी करने के लिए ?’ राकेश ने पूछा।
‘नहीं जी। मैं क्यों मजबूरी में
करूंगी आप से शादी ?’
‘दहेज की मजबूरी ?’
‘ना जी !’ कह कर वह दुपट्टे की कोर
मुंह में दबा कर सकुचाई थी। बावजूद उस सकुचाने के मजबूरी उस के चेहरे पर चस्पा हो
गई थी। जिस को वह अपनी पंजाबी बोली के लहजे में ठूंस कर चबाती हुई बोली, ‘आप के लिए
नाश्ता लाती हूं जी !’
राकेश समझ गया था कि वह नाश्ता
लाने के बहाने अपनी मजबूरी को भगाने गई थी अपने चेहरे से। सचाई तो यह थी कि शालू
की एक सगाई दहेज के चक्कर में ही टूट गई थी। और इसी लिए उस के मां-बाप जल्दी से
जल्दी राकेश से उस की शादी कर देने पर आमादा थे। इस के लिए वह किसी भी हद तक गिरने
को तैयार थे। इशारा यहां तक था कि राकेश शालू के साथ अकेले घूमे-फिरे और जो चाहे
तो हमबिस्तर भी हो ले। पर जैसे भी हो शादी कर ले। लेकिन राकेश ने ऐसा कुछ चाह कर
भी नहीं किया। उस की अंतरात्मा ने रोक लिया और रही-सही कसर प्लाजा में ‘अर्थ’
फिल्म देख कर निकल गई।
उस
ने दूसरी शादी का इरादा छोड़ दिया।
क्यों
कि दो औरतों के बीच वह अपनी जिंदगी नरक करने को तैयार नहीं था। जो जहन्नुम उस के
हिस्से का था, एक
औरत के साथ ही भुगतने के लिए वह तैयार हो गया। प्लाजा की बालकनी से सीढ़ियां
उतरते-उतरते ही उस ने फैसला कर लिया था।
कोई
16 बरस
पहले की यह घटना राकेश को एक झटके से याद आ गई।
पर
आज प्लाजा की सड़क पर बनी रेलिंग पर वह घंटे भर से बैठा था और कोई फैसला नहीं कर पा
रहा था। उस के साथ हालांकि महेश जी भी बैठे थे और उसे रह-रह ढाढस बंधा रहे थे, ‘घबराओ नहीं
राकेश फैसला तुम्हारे ही पक्ष में होगा!’
फैसला
जो सामने की एक बिल्डिंग में होना था। यूनियन के लोग जहां मैनेजमेंट से बात चीत
करने गए थे ! वहां जाने बातचीत हो भी रही थी कि नहीं। या हो भी रही थी तो बात-चीत
क्या रूख़ अख़्तियार कर रही थी यह न तो राकेश जानता था न ही महेश जी। राकेश की तो
धड़कन लगातार बढ़ती जा रही थी और दूसरी तरफ महेश जी लगातार उसे ढाढस बंधाते जा रहे
थे ! सुबह 9 बजे
से बैठे-बैठे राकेश ऊबने के बजाय धड़क रहा था। कभी-कभी तो उसे लगता कि उस का दिल
बैठ जाएगा। दिन के साढ़े ग्यारह बज गए थे और राकेश ने नाश्ता तक नहीं किया था।
खाने-पीने के नाम पर सिर्फ दो गिलास पानी पिया था। बस।
पर
उसे भूख भी तो नहीं लग रही थी ! उलटे बेरोजगारी की दस्तक का दंश उसे रह-रह डंस रहा
था। तिस पर मार्च की धूप भी अब उसे डाह रही थी। कभी प्लाजा की इस रेलिंग पर खिली
धूप में अधबैठे वह आती-जाती बेपरवाह लड़कियों और औरतों की ‘लो कट’ ब्लाउजों या
समीजों से झांकती छातियों की धड़कन और ‘उभरती’ हिप के ‘मूवमेंट्स’ दर्ज करते नहीं
अघाता था। पर आज यह सब कुछ उसे बेमानी जान पड़ रहा था। बेपरवाह लड़कियों और औरतों की
आवाजाही आज भी पहले ही की तरह थी पर उन की छातियों की धड़कन या हिप की मूवमेंट दर्ज
करना तो दूर उन के आने-जाने की नोटिस भी वह नहीं ले पा रहा था। सेंट में गमकती
सारी औरतें उसे कठपुतली की तरह बेजान और मद्धिम जान पड़ रही थीं। तिस पर आते-जाते
‘फटफट’ या कारों का शोर भी उसे लगातार डिस्टर्ब कर रहा था।
चढ़ती
हुई धूप को सड़क पर छोड़ कर अब राकेश और महेश जी दुकानों के बरामदे में आ गए थे।
रेलिंग यहां भी थी। वह रेलिंग पर बैठा सड़क उस पार की बिल्डिंग में क्या हो रहा है
उस के बारे में सोच ही रहा था कि महेश जी ने पूछा,
‘कुछ खाओगे ?’
‘नहीं।’ वह संक्षिप्त सा बोल कर
चुप हो गया।
‘चलो कुछ खा आते हैं।’ थोड़ी देर
बाद महेश जी फिर बोले।
‘मुझे भूख नहीं है।’ राकेश ने महेश
जी से बड़े इसरार से कहा।
‘पर मुझे तो भूख लग रही है।’ महेश
जी बोले, ‘पास
के किसी रेस्टोरेंट में कुछ हलका-फुलका खा लेते हैं। चलो चलें।’ रेलिंग छोड़ कर खड़े
हो कर अपना बैग संभालते हुए वह बोले।
‘पर मुझे सचमुच भूख नहीं लगी है।’
राकेश बोला, ‘आप
जाइए कुछ खा पी आइए। मैं यहीं हूं।’
‘अच्छा चलो तुम थोड़ा बहुत कोई
स्नैक्स ही ले लेना।’ वह उस का हाथ पकड़ते हुए बोले।
‘आप का साथ देने के लिए चलने में
कोई हर्ज तो नहीं। पर अगर सामने से मेरा बुलावा आ गया तो ?’ राकेश संकोच
बरतते हुए बोला।
‘कहीं कोई बुलावा नहीं आएगा।’ महेश
जी खीझ कर बोले, ‘मुझे
तो लगता है तुम्हारी यूनियन वाले बस फार्मेलिटी में आए हैं।’
‘नहीं, ऐसा तो लगता
नहीं।’ राकेश ने विनम्रता से कहा।
‘तो फिर ससुरे चार घंटे से वहां कर
क्या रहे हैं ?’ सवाल
जड़ते हुए वह बोले, ‘मुझे
तो लगता है कि तुम्हारा मैनेजिंग डायरेक्टर उन से मिला ही नहीं और यह ससुरे वहां
बैठे-बैठे उस से मिलने के लिए ही घिघिया रहे होंगे। या वहीं विजिटर्स सोफे पर बैठे
सो रहे होंगे !’
‘क्या पता ?’ डिप्रेस
होते हुए राकेश बोला, ‘समझ
नहीं आता कि क्या करें?’
‘करना क्या है,यह तो
तुम्हारी यूनियन नहीं तय करेगी।’
‘क्यों ?’
‘क्यों कि तुम्हारी यूनियन बेदम है
!’ वह बोले, ‘अगर
तुम्हारी यूनियन में जरा भी दम होता तो वह बात-चीत में तुम्हें भी साथ ले गई
होती।’ वह थोड़ा और खीझे, ‘तुम्हारे
बारे में बात-चीत। और तुम्हें सड़क इस पार छोड़ गए हैं। इस के क्या मायने हैं ?’
‘हो सकता है मैनेजमेंट मुझे देख कर
भड़क जाता। इस लिए नहीं ले गए हों?’
‘गलत ! अगर मैनेजमेंट तुम्हें
बात-चीत के लिए देख कर ही भड़क जाने वाला है तो तुम दो चीजें नोट कर लो। एक तो
तुम्हारी यूनियन मैनेजमेंट की पिट्ठू है। दूसरे,
अगर यह तुम्हें वापस भी किसी सूरत
में ले लेते हैं तो भी तुम्हें अब कोई दूसरी नौकरी ढूंढ़नी चाहिए !’
‘नौकरी ढूंढ़ने वाली बात तो अलग है।
पर यूनियन हमारी मैनेजमेंट की पिट्ठू नहीं है !’ राकेश ने जोड़ा,’ आफ्टर आल
मैं भी यूनियन का इक्जीक्यूटिव मेंबर हूं। इलेक्टेड मेंबर !’
‘भूल जाओ !’ महेश जी बुदबुदाए, ‘जब तुम अब
नौकरी में नहीं हो तो मानो यूनियन में भी नहीं। और तुम अपने को यूनियन में मानो तो
मानो तुम्हारा मैनेजमेंट और तुम्हारी यूनियन दोनों ही तुम्हें यूनियन में नहीं
मानते। जो मानते होते तो तुम्हें भी बात-चीत में ले गए होते !’
‘हां, यह बात तो
ठीक कह रहे हैं आप।’ राकेश बुझे मन से बोला।
‘और जो बात चीत में न रखते साथ तो
कम से कम बात-चीत से बाहर ही सही रिसेप्शन पर ही तुम्हें बैठने देते। कोई नारेबाजी
तो यहां होती नहीं। कोई यूनिट तो है नहीं यहां जो लेबर इकट्ठे हो जाते !’ वह खीझे, ‘पर कहां ? तुम्हें तो
वह उस बिल्डिंग में छोड़ो उस सड़क पर भी ये नहीं देखना चाहते। वह लोग जो तुम्हारी
यूनियन के लोग हैं, मैनेजमेंट
के नहीं !’
‘अब क्या करूं ?’
‘अब आज तो जो कर रहे हो वह कर लो।
पर दुबारा यह जलालत मत उठाना!’
‘सवाल ही नहीं उठता !’
‘एक मिनट में जरा आता हूं।’ कह कर
महेश जी रेलिंग पर से उठने लगे।
‘क्यों क्या हुआ ?’
‘नहीं, कुछ नहीं।
बस एक मिनट में आता हूं।’ कह कर वह गए तो पास के ठेले से कुछ केले लिए हुए लौटे।
बोले, ‘लो, खा लो !’
‘हां।,’ बेमन से वह
केले ले कर छीलने लगा।
‘अच्छा यह बताओ कि तुम्हारे एम॰डी॰
ने तुम्हारी यूनियन को कोई एप्वाइंटमेंट भी दिया है कि ससुरे यों ही भिखारियों की
तरह ‘दे दाता के नाम’ करते हुए चले गए हैं ?’
‘नहीं, एप्वाइंटमेंट
तो दिया था दिन के साढ़े दस से ग्यारह के बीच का।’ राकेश बोला।
‘तो फिर अपनी यूनियन की औकात समझ
लो ! चलो बात नहीं हो रही तो कम से कम कोई यहां आ कर बता ही देता कि क्या हो रहा
है ? कोई
यूं ही शकल दिखा देता !’
‘अब क्या बताऊं महेश जी !’ केला
खाते हुए वह बोला, ‘कुछ
तो दिक्कत होगी ही !’ कहते हुए वह दूसरा केला छीलने लगा। अब उसे लग रहा था कि ख़ूब
ढेर सारा केला खा ले। बेहिसाब !
‘और केले लाऊं ?’ महेश जी पूछ
भी रहे थे।
तो क्या यह ढेर सारे केले राकेश
डिप्रेशन में खा लेना चाह रहा था ?
शायद हां ! और जब महेश जी ने
दुबारा पूछा कि, ‘और
केले लाऊं ?’ तो
वह बुदबुदाया, ‘हां।’
और महेश जी केले के ठेले की तरफ लपक गए थे।
महेश
जी !
जो
पहले उस के बॉस थे। उस के पसंदीदा बॉस। इसी कंपनी में। बात बे बात अकड़ जाने वाले
महेश जी बेहद भावुक भी हैं यह वह आज महसूस कर रहा था। एक बार तो उन की अकड़ और
राकेश के स्वाभिमान के बीच जंग हो गई। बात इतनी बढ़ी कि राकेश ने महेश जी से
बात-चीत बंद कर दी। पर इस की इंतिहा यहीं नहीं थी। एक दिन महेश जी ने राकेश को
बुलवाया अपनी केबिन में। कहा कि, ‘आप किसी दूसरी नौकरी का बंदोबस्त कर लीजिए राकेश जी
!’ राकेश को ‘तुम’ से संबोधित करने वाले महेश जी उस रोज उसे ‘आप’ से नवाज रहे थे
तो राकेश इस खाई की गहराई नापते हुए बोला,
‘मेरी कोई गलती ढूंढ़ पाइए तो ढूंढ़
कर निकाल दीजिए। मैं यों ही नौकरी नहीं ढूंढने वाला !’
‘मुझे जो कहना था कह दिया। अब
आप जा सकते हैं।’ कह कर महेश जी ने खाई जो गहरी तो थी ही उसे और चौड़ी कर दी थी।
राकेश
फिर भी नहीं झुका था।
फिर
बाद की स्थितियों ने ही राकेश को महेश जी का करीबी बना दिया। वह उस के स्वाभिमानी
होने को मान देने लगे। और आज वह महेश जी के करीबी होने की ही कीमत चुका रहा था कि
प्लाजा की रेलिंग पर आज का दिन उदासी और खीझ में गुजार रहा था। क्यों कि एक रोज
महेश जी की अकड़ उन के लिए भारी पड़ गई पर वह झुके नहीं। इस्तीफा दे कर बाहर हो गए।
सेकेंड भर भी नहीं लगा उन्हें इस्तीफा देने का फैसला लेने में।
फिर
उन्होंने कोई नौकरी नहीं की। कंसलटेंसी शुरू कर दी थी। कंसलटेंसी अब उन्हें रास आ
गई थी।
जैसे
महेश जी की नौकरी अकड़ में गई थी वैसे ही राकेश की नौकरी स्वाभिमान की आन में गई।
महेश जी जैसे लोग तो स्वाभिमानी को मान देते थे पर सभी लोग तो ऐसा नहीं करते ? कुछ लोग ईगो
की एक नई शब्दावली ही हेर बैठे हैं,
‘फाल्स ईगो !’
‘लो केले खाओ
!’ महेश जी बोले, ‘और
डिप्रेशन को केले के छिलके की तरह कूड़ेदान में फेंक दो ऐसे कि कोई दूसरा भी न
फिसले !’
‘चार बज रहे हैं। पर यूनियन के
साथियों का कोई अता-पता नहीं है।’ महेश जी की बात को टालते हुए घड़ी देखता हुआ
राकेश बुदबुदाया।
‘कैसे अता-पता मिलेगा ?’ महेश जी
बोले, ‘तुम्हारा
एम॰डी॰ बड़ा मक्कार है। मैं बहुत बेहतर जानता हूं उसे। कुत्तों की तरह तुम्हारी
यूनियन वालों को अभी रिसेप्शन पर ही बिठाए होगा। मीटिंग का बहाना कर के।’ वह
तिड़कते हुए बोले, ‘या
यह भी हो सकता है कि अभी तक इस वाले आफिस में आया ही न हो ! किसी और आफिस में चला
गया हो !’
‘ऐसा तो नहीं होना चाहिए !’ राकेश
बुझा-बुझा बोला।
‘इस मक्कार मैनेजमेंट और तुम्हारी
कुत्ता यूनियन दोनों ही से मेरा वास्ता पड़ता रहा है। सो मैं जानता हूं।’
‘हां, आप भी तो
मैनेजमेंट में रहे हैं ?’ राकेश
ने धीमे से तंज किया।
‘कायदे से कंपनी का हर
इक्जीक्यूटिव मैनेजमेंट का हिस्सा है। तो इस हिसाब से तुम भी मैनेजमेंट में हुए कि
नहीं ?’
‘मेरा मतलब हायर मैनेजमेंट से है
!’
‘कहीं कोई हायर, लोअर
मैनेजमेंट नहीं होता !’ महेश जी बोले,
‘सचाई यह है कि पूंजीपति जो चाहते
हैं वही होता है। हायर-लोअर मैनेजमेंट तो कर्मचारियों लेबरों की गाली सुनने के लिए
यह साले कवच की तरह इस्तेमाल कर गटर में बहा देते हैं।’ वह बोले, ‘अब मुझे ही
देखो ! क्या मुफ्त में इस्तीफा दे आया था ?
और क्या तुम यों ही यहां खड़े हो ?’
‘खड़े तो आप भी हैं ?’
‘यह तो तुम्हारे लिए राकेश !’ वह
भावुक होते हुए राकेश के सिर पर हाथ फेरने लगे।
फिर
बड़ी देर तक दोनों चुप रहे। बिलकुल चुप !
शाम
के कोई साढ़े छ बज रहे थे कि यूनियन के लोग उस पार की सड़क पर दिखे। राकेश बुदबुदाया, ‘निकले तो सब
बाहर !’ और उठ कर खड़ा हो गया। महेश जी ने उसे रोक कर फिर से रेलिंग पर बिठा लिया।
बोले, ‘उधर
जाने की जरूरत नहीं। उन्हीं सब को इधर आने दो !’
‘लेकिन,!’
‘कोई लेकिन वेकिन नहीं। चुपचाप
बैठो !’ महेश जी उस की बात काटते हुए बोले।
थोड़ी
देर में यूनियन के सभी लोग प्लाजा पर आ गए। तो महेश जी बोले, ‘सब ढूंढ़
नहीं पाएंगे चलो हम लोग मिल लेते हैं !’
मिलते ही यूनियन का जनरल
सेक्रेटरी उछला, ‘महेश
जी आप ?’ वह
चहका, ‘आप
को कैसे पता पड़ा कि हम लोग यहां हैं ?’
‘यह सब छोड़ो तुम यह बताओ कि राकेश
के बारे में तय क्या हुआ ?’
‘तय तो अभी पूरी तरह नहीं हुआ।’
जनरल सेक्रेटरी उदास होता हुआ बोला,
‘लेकिन यह जरूर तय हुआ कि राकेश जी
की सेवाएं बहाल रहेंगी लेकिन....!’
‘लेकिन क्या ?’
‘हो सकता है इन को ट्रांसफर कर
दिया जाए !’
‘कहां ?’ राकेश
परेशान हो कर बोला।
‘शायद चंडीगढ़।’
‘यह तो कोई बात नहीं हुई ?’ राकेश चिढ़ा।
‘घबराने की बात नहीं। यह ट्रांसफर
शायद साल-छ महीने का ही होगा।’
‘क्यों ?’
‘वह शायद आबजर्वेशन पर रखेंगे। फिर
रिपोर्ट ठीक मिली तो वापस बुला लेंगे।’
‘यह तो मेरा ह्यूमीलिएशन है !’
राकेश बिदका।
‘ये तो है। पर तुम यह बताओ कि यह
आर्डर राकेश को कब तक मिल जाएगा।’ महेश जी जनरल सेक्रेटरी से पूछने लगे।
‘शायद इस महीने के भीतर ही।’
यूनियन का प्रेसीडेंट बोला।
‘लेकिन मैं चडीगढ़ जाऊं ही क्यों ?’ राकेश
तुनका।
‘अभी तो जाना पड़ेगा राकेश जी।’
प्रेसीडेंट बोला, ‘यहां
अभी एम॰डी॰ मान नहीं रहे।’
‘पर आप सोचिए कि चंडीगढ़ जाने का
मतलब डबल इस्टेबिलिशमेंट। फेमिली वहां ले जा नहीं सकता !’ राकेश बोला, ‘वाइफ को
सर्विस छोड़ने को कहना बेवकूफी होगी। बच्चे पढ़ रहे हैं। सो अलग। और अभी-अभी हमने
डी॰ डी॰ ए॰ का फ्लैट ख़रीदा है वो अलग। कैसे छोड़ सकता हूं मैं दिल्ली ? भला आप लोग
ही सोचिए !’
‘कौन तुम्हें दिल्ली छोड़ने को बोल
रहा है ?’ महेश
जी बोले, ‘अभी
यह आर्डर मिलने में तुम्हें दस-पंद्रह रोज लगेंगे। तब तक तुम यहां किसी दूसरी
कंपनी में ट्राई करो ! आर्डर मिलता है तो चंडीगढ़ ज्वाइन कर इस्तीफा दे दो।
तुम्हारा फंड वंड नहीं रुकेगा इस से। और इज्जत भी बनी रह जाएगी !’
‘और जो पंद्रह रोज में कहीं कुछ
नहीं हुआ तो ?’ राकेश
बोला।
‘तो भी कोई बात नहीं।’ महेश जी
बोले, ‘चंडीगढ़
ज्वाइन कर के छुट्टी मार देना। फिर किसी जगह ट्राई करना।’ वह मुसकुराए, ‘फिर भी बात
नहीं बने तो बोलना। मैं कुछ करूंगा। नहीं कुछ बना तो कंसलटेंसी तो मैं तुझे सिखा
ही दूंगा।’ वह बोले, ‘अभी
यहां से चलो। अच्छी सी ख़बर मिली है तो तुम लोगों को अच्छा सा ‘ट्रीट’ करवा दूं।’
कह कर वह सभी को लिए दिए प्लाजा से चल कर ‘होस्ट’ रेस्टोरेंट आ गए। यहां आ कर भी
राकेश को गुमसुम देख कर महेश जी बोले,
‘इतनी सुंदर-सुंदर औरतें बैठी हैं
और तू देवदास की तरह उदास बैठा है ?
चल खुश हो जा।’ वह मजाक करते हुए
बोले, ‘बोल
जिस औरत से कह तेरी हेलो करा दूं ?’
‘नहीं, महेश जी
प्लीज !’ राकेश बुदबुदाया। तो महेश जी भी मजाक छोड़ मैनेजमेंट की तुगलकी बारीकियों
के ब्यौरों में चले गए। कहने लगे, ‘आख़िर एक आदमी का ईगो सेटिसफाई करने के लिए, एक आदमी की
जिद पूरी करने के लिए कंपनी कितनों की बलि चढ़ाएगी ?
समझ नहीं आता !’
यूनियन
के जनरल सेक्रेटरी, प्रेसीडेंट
सभी चुप थे। सिर्फ महेश जी ही गर्दन घुमा-घुमा कर बोल रहे थे। अचानक वह जनरल
सेक्रेटरी से पूछ बैठे, ‘लेकिन
तुम लोगों को इतनी सी बात करने के लिए पूरा दिन क्यों लग गया ?’
‘पूरा दिन कहां ?’ प्रेसीडेंट
बोला, ‘एम॰डी॰
तो जैसे पूरी बात पहले ही से ड्राफ्ट किए बैठा था। जाते ही दो मिनट में उस ने अपना
यह प्रपोजल बता दिया।’
‘तो तुम लोग दिन भर वहां क्या कर
रहे थे ?’ महेश
जी ने पूछा।
‘इंतजार ! और क्या ?’ जनरल
सेक्रेटरी बोला, ‘साढ़े
दस-ग्यारह बजे की एप्वाइंटमेंट थी पर एम॰ डी॰ आए शाम के साढ़े चार बजे। आते ही एक
मीटिंग में लग गए। हम लोग तो शाम सवा छ बजे मिल पाए !’
‘बैठे-बैठे बोर हो गए !’
प्रेसीडेंट ने जोड़ा।
‘हां, एक बात तो
बताना भूल गए !’ जनरल सेक्रेटरी बोला,
‘एम॰ डी॰ ने राकेश जी को एक स्टेप
डिमोट करने की भी बात कही है !’ कह कर वह उदास हो गया। लेकिन राकेश फूट पड़ा, ‘यह क्या बात
हुई ?’ वह
बोला, ‘आप
लोग वहां एम॰डी॰ से समझौता वार्ता करने गए थे या डिक्टेशन लेने ?’ वह बोला, ‘हद है कि
मेरी गलती भी नहीं फिर भी एक सनकी की जिद पूरी करने के लिए मेरा ही ट्रांसफर, मेरा ही
डिमोशन !’ राकेश इतना तेज बोला कि रेस्टोरेंट में बैठे लोग उसी को घूरते हुए
बिदकने लगे। रेस्टोरेंट का मैनेजर उस की सीट के पास आ कर खड़ा हो गया उस के साथ ही
सिक्योरिटी वाले भी।
महेश
जी समझ गए कि बात ज्यादा बिगड़ गई है। उन्हों ने राकेश का हाथ पकड़ कर दबाया और
आंखों ही आंखों में चुप रहने का इशारा किया और वेटर को बुला कर कहा कि, ‘बिल लाओ!
जल्दी !’
हालांकि
बिल उस ने देखा काफी ज्यादा था। पर बिल दे कर महेश जी राकेश को पकड़े बाहर आए। उसे
समझाने लगे, ‘हैव
पेसेंस !’ राकेश का हाथ पकड़े-पकड़े वह भावुक होने लगे। बोले, ‘आओ तुम्हें
मैं घर छोड़ देता हूं।’ कह कर वह कनॉट सर्कस से पालिका बाजार की कार पार्किंग की ओर
बढ़ने लगे। पर राकेश बोला, ‘नहीं
आज मैं बस से जाऊंगा।’ बोला, ‘प्लीज महेश जी !’
‘अच्छा चलो टैक्सी ले लो।’
‘नहीं आज तो डी॰टी॰सी॰ की बस से
जाऊंगा।’ उस ने जोड़ा, ‘बेरोजगार
हो गया हूं न।’ कहते हुए वह पस्त हो गया और जैसे ख़ुद से गुपचुप पूछने लगा, ‘बेरोजगारी
कहीं भावुक और नपुंसक तो नहीं बना देती ?’
पर उस ने महेश जी से कुछ नहीं
कहा।
‘किसने कहा कि तुम बेरोजगार हो गए
हो !’ उधर महेश जी भावुक होते हुए बोले,
‘अभी मैं हूं तेरे लिए !’ वह उस का
हाथ पकड़ कर बोले, ‘चल
तुझे बस स्टैंड छोड़ दूं।’ फिर वह यूनियन वालों की तरफ पलटे, ‘मैं इसे छोड़
देता हूं।’
जनपथ
बस स्टैंड पर आ कर राकेश महेश जी के साथ खड़ा हो गया। महेश जी ने बैग से कुछ रुपए
निकाले। राकेश को देते हुए बोले, ‘इसे रखो। तुम्हारे काम आएगा !’
‘और तो सब ठीक है। पर यह नहीं।
महेश जी प्लीज !’ उस ने बड़ी लाचारी से जोड़ा,
‘बेराजगार हुआ हूं, भिखारी नहीं
बना हूं। नहीं, महेश
जी प्लीज !’
‘ठीक ! कोई बात नहीं।’ वह बोले, ‘पर कोई ऐसी
वैसी बात हो तो मुझ से बोलना। संकोच नहीं करना।’ वह बोले, ‘बाकी मैं भी
कहीं देखता हूं।’
‘हां यह ठीक है !’ राकेश बोला। तब
तक उस की बस आ गई थी। वह बस में चढ़ने लगा तो महेश जी बुदबुदाए, ‘आई एम
प्राउड आफ यू !’
वह
लपक कर उन से लिपट गया। यह पहली बार हुआ कि वह उन से लिपट रहा था।
दोनों
ही भावुक हो गए थे !
-34-
कन्हई लाल
‘मैं हत्यारा
हूं!’
‘क्या बक रहे हो कन्हई लाल!’
‘हां साहब, हमने अपनी
मेहरिया को मार डाला।’
‘क्या कह रहे तुम!’
‘सही कह रहा हूं साहब।’
‘कैसे?’ कहते हुए
मैं ने चश्मा उतारा और पूछा, ‘तुम सच कह रहे हो?’
‘हां साहब, बिलकुल सच
कह रहा हूं।’
‘तो मेरे पास क्यों आए हो? पुलिस में
जाओ और सरेंडर कर दो।’ मैं जरा रुका और चश्मा लगा कर उसे देखते हुए बोला, ‘इसमें मैं
क्या तुम्हें कोई भी नहीं बचा पाएगा।’
‘मैं आप से बचाने के लिए नहीं कह
रहा हूं साहब।’
‘तो फिर?’
‘कुछ नहीं बस वैसे ही।’ कह कर वह
रोने लगा।
‘आखि़र बात क्या हुई थी?’
‘कुछ नहीं साहब, थोड़ी
हुसियारी हो गई, थोड़ी
ग़लती हो गई। बस सब कुछ लुट गया।’ कह कर वह तेज-तेज सुबकने लगा। सुबकते-सुबकते रोने
लगा।
कन्हई
लाल का इस तरह रोना और सुबकना देख कर मैं समझ गया कि कन्हई लाल ने फिर कुछ गड़बड़ कर
दिया है। और कम से कम अपनी पत्नी की हत्या तो उस ने नहीं की है। दरअसल कन्हई लाल
की सूरत और सीरत दोनों ही इस कदर कंफ़्यूजिंग थी कि उस की कही किसी भी बात पर जस का
तस और तुरत-फुरत कोई, फैसला
लेना किसी भूचाल से कम नहीं होता। दफ़्तर के गलियारों में कन्हई लाल से कोई काम
लेना तो आसान होता पर कोई सूचना पाना ओखली में सिर डालना होता था।
आज
भी यही हो रहा था।
सिर
पर खिचड़ी बाल लिए, सिर
एक तरफ झुकाए बेहिसाब बेफ्रिकी चाल,
बिलकुल किसी मस्त हाथी की तरह
झूमते हुए चलते कन्हई लाल की ढेर सारी दंत कथाएं बन चुकी थीं लेकिन कन्हई लाल इन
सब से बेफिक्र अपनी धुन में मगन रहता।
लोग
बताते हैं कि कन्हई लाल शुरू में ऐसा नहीं था। ‘हुसियार’ वह जरूर था पर इस कदर
कंफ़्यूज नहीं और न ही कोई सूचना देने में भूचाल लाता। पर हुआ यह कि कुछ बरस पहले
एक हत्या में वह चश्मदीद गवाह बन गया। पुलिस के रिकार्ड में। उस ने अपनी आंखों से
हत्या होते देखा था और ‘हुसियारी’ में ही वह चश्मदीद गवाह बना। न सिर्फ़ चश्मदीद
गवाह बना बल्कि अख़बारों की सुर्खियां भी। सिद्दीकी हत्याकांड चूंकि एक लड़की के
चक्कर से बावस्ता था तो सुर्खियां बटोर रहा था सो कन्हई लाल भी एकमात्र चश्मदीद
गवाह के रूप में ख़बरों की सुर्खियों पर चढ़ा रहता था। न सिर्फ़ अख़बारों में बल्कि
ख़बरिया चैनलों पर भी जब तब उन दिनों चढ़ा रहता था। टीवी में अपना चेहरा देख कर उसे
अच्छा भी लगता। लेकिन यह चार दिन की चांदनी थी। जल्दी ही उसे धमकियां मिलने लगीं।
एक बार रास्ते में वह पिट भी गया। धीरे-धीरे उस का होश ठिकाने लगने लगा, और जोश
किनारे होने लगा। नतीजा यह निकला कि सिद्दीकी हत्याकांड कोर्ट में आते-आते कन्हई
लाल गवाही से पलटा खा गया। वकील ने उस को समझा दिया,
समझा क्या रटा दिया कि जज के हर
सवाल का जवाब वह ‘नहीं साहब हमने नहीं देखा’ और ‘नहीं साहब हमें कुछ नहीं मालूम।’
और कन्हई लाल ने भी इन दोनों संवादों को इस तरह कंठस्थ कर लिया कि आज भी अगर
मिस्टर ए भले उस के ठीक सामने खड़े हों या बैठे हों और आप कन्हई लाल से पूछ लें कि, ‘मिस्टर ए
कहां हैं?’ तो
कन्हई लाल छूटते ही कहेगा कि, ‘नहीं साहब हमें कुछ नहीं मालूम।’ या फिर, ‘नहीं साहब
हमने नहीं देखा।’ और जो आप टोकते हुए डपट दें कि,
‘मिस्टर ए तो सामने खड़े हैं और तुम
कह रहे हो कि हमने नहीं देखा!’ तो भी वह फिस्स से हंसते हुए हाथ जोड़ते हुए मस्त
हाथी की तरह आगे बढ़ जाएगा और आप अपने सवाल में ही उलझ कर रह जाएंगे।
ऐसी
अनेक कथाएं कन्हई लाल की जिंदगी से जुड़ी दफ़्तर के गलियारों में तैरती मिल जाती
हैं। कन्हई लाल अपने काम की वजह से कम अपनी ऐसी कथाओं की वजह से दफ़्तर के तमाम
चपरासियों से ज्यादा मशहूर हैं।
अभी
कुछ ही दिनों की बात है। एक दिन वह मेरे पास आया और हाथ जोड़ते हुए कहने लगा, ‘हुजूर हमार
एक काम करवाय दीजिए!’
‘काम बताओ!’
‘हुजूर हमारे बच्चों को आरक्षणनहीं
मिल रहा है नौकरी में, आरक्षणदिलवाई
दीजिए।’
‘एस.सी. हो कि बैकवर्ड?’
‘बैकवर्ड हूं साहब।’
‘तो दिक्कत क्या है।’
‘ई तो साहब हम को मालूम नहीं पर
लोग कहते हैं कि मुख्यमंत्री जी ही आरक्षण दे सकते हैं।’
‘मुख्यमंत्री जी क्यों? अगर तुम
बैकवर्ड हो तो संवैधानिक अधिकार है तुम्हारा। कोई भीख थोड़े ही मांग रहे हो।’
‘तो साहब मुख्यमंत्री जी से आप ही
कहला देते तो हमारे बच्चों को नौकरी में आरक्षण मिल जाता। और आरक्षण मिल जाएगा तो
नौकरी भी मिल जाएगी।’
‘अच्छा चलो कल तुम अपने बच्चों की
मार्कशीट वग़ैरह ले आना।’
‘जी साहब।’
दूसरे दिन कन्हई लाल अपने दोनों
बच्चों की मार्कशीट वग़ैरह ले आया। देखते ही मैं बोला, ‘कन्हई लाल
तुम हम से झूठ क्यों बोलते हो?’
‘नहीं साहब, झूठ नहीं
बोल रहा हूं।’
‘तो ये श्रीवास्तव लोग कब से
बैकवर्ड होने लगे?’ मैं
ने कन्हई लाल के बच्चों की मार्कशीट उसे दिखाते हुए पूछा!
‘श्रीवास्तव तो साहब ग़लती से लिख
गया।’
‘एक मार्कशीट में ग़लती से लिख गया, दूसरी
मार्कशीट पर ग़लती से लिख गया, तीसरी पर ग़लती से लिख गया, और दोनों
बच्चों की मार्कशीट पर ग़लती से लिख गया?’
मैं ने कन्हई लाल को तरेरते हुए
कहा, ‘क्या
बेवकूफी फैला रखी है?’
‘अब गलती तो हो गई साहब।’ वह हाथ
जोड़ते हुए बोला।
‘तो तुम ने शुरू में ही इसे क्यों
नहीं ठीक करवाया?’
‘अब क्या बताएं साहब।’
‘वैसे तुम्हारी जाति क्या है?’
‘नाऊ हैं साहब!’
‘तो बच्चों के सर्टीफिकेट में
श्रीवास्तव क्यों लिखवाया?’
‘क्या करें साहब, यही तो ग़लती
हो गई।’
‘आख़िर क्या सोच कर श्रीवास्तव
लिखवाया?’
‘असल में साहब क्या हुआ कि एक
श्रीवास्तव साहब यहां हमारे साहब थे। हम को बहुत अच्छे लगते थे। बड़े ठाट-बाट से
रहते थे। उन्हीं दिनों हमने अपने बच्चों का नाम स्कूल में लिखवाया। तो बच्चों के
नाम के आगे यह सोच कर श्रीवास्तव लिखवा दिया कि हमारे बच्चे भी बड़े हो कर श्रीवास्तव
जी जैसे बड़े अफसर बन जाएं और ठाट-बाट से रहें।’
‘तो कन्हई लाल अब मुख्यमंत्री जी
क्या, मुख्यमंत्री
जी के पिता जी भी तुम्हारे बच्चों को आरक्षण नहीं दिलवा पाएंगे। कम से कम तब तक तो
नहीं ही, जब
तक तुम्हारे बच्चों के नाम के आगे श्रीवास्तव लिखा हुआ है।’
‘कोई रास्ता नहीं है साहब?’
‘अब दो ही रास्ते हो सकते हैं।’
मैं बोला, ‘या
तो संसद द्वारा श्रीवास्तव जाति को भी पिछड़ी जाति में शामिल कर दिया जाए या फिर
तुम हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में जा कर इसके लिए रिट फाइल करो कि साहब ग़लती से
ऐसा हो गया है, इसे
ठीक कर दिया जाए।’
‘हुजूर ई सब हम कहां कर पाएंगे।’
‘तो फिर कुछ नहीं हो सकता।’
कन्हई लाल अपने बेटों की मार्कशीट
वग़ैरह संभालते हुए सिर झुकाए चला गया।
और
अब बहुत दिनों बाद वह अपनी पत्नी का हत्यारा होने की सूचना दे रहा था। वह रोता जा
रहा था और बार-बार दुहराए जा रहा था कि,
‘मैंने अपनी मेहरिया को मार डाला!’
‘आख़िर हुआ क्या कन्हई लाल?’
‘कुछ नहीं साहब डॉक्टर ने तो हमको
पहले ही बता दिया था, पर
हम ही हुसियारी में गड़बड़ कर दिए।’
‘डॉक्टर ने क्या बताया था?’
‘यही कि हमारी मेहरिया को कैंसर
है।’
‘क्या?’
‘और कहा था कि घबराने की बात नहीं
है, ठीक
हो जाएगा।’
‘तो?’
‘साहब हम ही लापरवाही कर गए।’
‘क्यों?’
‘असल में डॉक्टर ने बताया था कि
हमारी मेहरिया को बच्चेदानी में कैंसर है और कहा था कि बच्चेदानी निकलवा दो, सब ठीक हो
जाएगा।’
‘फिर बच्चेदानी निकलवा दिया?’
‘नहीं साहब, यही तो ग़लती
हो गई?’ वह
बोला, ‘हमने
सोचा साहब अब बच्चे पैदा करना ही नहीं है तो बच्चेदानी का काम ही क्या है? फिर काहे
झंझट मोल लें। हम दुबारा डॉक्टर के पास गए ही नहीं।’
‘अपनी बीवी को भी यह बात बताई थी?’
‘नहीं साहब, हम सोचे झूठ
ही परेशान होगी तो उस को भी नहीं बताया।’
‘फिर?’
‘फिर का साहब, कुछ दिन में
कैंसर पूरी देह में फैल गया। बड़ी कोशिश किए। पर बची नहीं। मर गई हमारी मेहरिया। तो
साहब हम हत्यारे हो गए कि नहीं अपनी मेहरिया के?’
‘हो तो गए।’ मैं ने पूछा, ‘पर तुम इतना
रो क्यों रहे हो?’
‘साहब हम उस को बहुत पियार करते थे, और वह भी
हमको बहुत परेम करती थी। तो अब रोएं भी न तो क्या करें?’ कह कर वह
फिर फूट-फूट कर रोने लगा।
-35-
राम अवतार बाबू
राम
अवतार बाबू बिलकुल निराले किसिम के आदमी थे। वह जब पढ़ते थे तब भी बहुत अलग-अलग से
रहते थे। उनका ज्यादातर समय तालाब के किनारे,
बाग में या गाय भैंसों के बीच
गुजरता था। लगता था जैसे मानव संसार से उनका कोई रिश्ता नहीं था। पढ़ने लिखने में
वह औसत ही थे। लेकिन कभी किसी क्लास में फेल नहीं हुए। कद उनका छोटा जरूर था और
काया दुबली पतली लेकिन सोचने-समझने में वह लोगों पर अकसर बीस पड़ते थे। बातें वह
बहुत कम करते लेकिन जब करते तो बिलकुल किसी क्रांतिकारी की तरह। उनके मन में
सुलगती आग लगता जैसे पूरा शहर जला देगी। लेकिन हिंसा उन्हें छूती तक नहीं थी। वह
जब यूनिवर्सिटी जाने लगे तो जैसे और लड़के,
सिनेमा या लड़कियों की ओर मुखातिब
होते, वह
ऐसा भी कुछ नहीं करते। रास्ते चलते भी वह लोगों की ओर कम देखते। लेकिन उन्हें कोई
गाय, कोई
कुत्ता, कोई
बकरी मिल जाए तो उसे जरूर पुचकार लेते। और यदि यह सब भी न मिलें तो वह किसी पेड़ या
पौधे को देख कर मुसकुरा लेते। अजब ही थे राम अवतार बाबू। पढ़ाई ख़त्म करते-करते
उन्हें छोटी-सी नौकरी मिल गई। एक सरकारी विभाग में बाबू हो गए थे। दफ्तर में भी वह
किसी से ज्यादा बातचीत नहीं करते थे। घर में भी वह घर के तोते से ही बात करते।
खाना या और जरूरत की कोई चीज वह शायद ही किसी से मांगते। अकसर बिन मांगे उनकी मां, भाभी या बहन
उनके समय पर उन्हें खाना दे देतीं। और वह बिन बोले चुपचाप खाना खा कर घर से निकल
लेते। नौकरी लगने के बाद उनकी शादी के रिश्ते आने लगे। देख समझ कर उनके पिता ने दो
एक जगह बात चलाई। तब राम अवतार बाबू ने बिन बोले ही हाथ हिला कर मना कर दिया। उनके
पिता नाराज हो गए और मां दुखी। लेकिन पिता की नाराजगी और मां का दुख भी उनके फैसले
को नहीं बदल सका।
अब वह शहर के एक मंदिर में जाने
लगे। वह घंटों निःशब्द बैठे रहते। कोई कहता राम अवतार बाबू सधुआ गए हैं, कोई कहता
कायर हैं तो कोई पगलेट बताता। लेकिन राम अवतार बाबू को इन सबकी फिकर नहीं थी। वह
तो अपनी ही दुनिया में मगन थे। अपने मुहल्ले की एक बकरी से उनकी दोस्ती हो गई। वह
उससे हंस-हंस कर बोलते-बतियाते। वह बकरी भी उन्हें दूर से देख कर ही छलांग लगाती।
अचानक उनकी जिंदगी में दो कुत्ते भी आए। ये कुत्ते उन्हों ने कहीं से ख़रीदे नहीं
थे। शहर ही के थे ये कुत्ते। बकरी तो अपने मालिक के घर जा कर सोती लेकिन ये कुत्ते
पहले राम अवतार बाबू के दरवाजे पर सोते थे। बाद में धीरे-धीरे इन कुत्तों का
प्रवेश राम अवतार बाबू के कमरे तक हो गया। बाद में वह इनकी चारपाई के इर्द-गिर्द
ही सो जाते। इन कुत्तों में भी अजीब परिवर्तन आ गए थे। वैसे तो और किसी को देख कर
वह कुत्ते भौंकते लेकिन राम अवतार बाबू को देखते ही वह निःशब्द हो जाते। सिर्फ दुम
हिलाते और जीभ निकाल कर उन्हें चाटने लगते। मुहल्ले में ही क्या अब शहर में भी राम
अवतार बाबू और इन कुत्तों की मौन भाषा मशहूर हो गई थी।
राम अवतार बाबू ने अब तक स्कूटर
भी ख़रीद लिया था। सो अब वह साइकिल के बजाय स्कूटर से ही चलते। कई बार अद्भुत
नजारा होता। राम अवतार बाबू स्कूटर से चलते तो एक कुत्ता उनकी पिछली सीट पर बैठ
जाता ठीक वैसे ही जैसे एच. एम. वी. के रिकार्डों पर हिज मास्टर वायस वाला कुत्ता
बैठा रहता था। जब कि दूसरा कुत्ता जो जाहिर है पहले कुत्ते से उम्र में थोड़ा छोटा
था और भोला भी, वह
बिलकुल किसी छोटे बच्चे की तरह स्कूटर का हैंडिल पकड़ कर आगे खड़ा हो जाता। हालां कि
ऐसे मौके कम आते लेकिन जब आते तो लोग बड़े रश्क और शौक से देखते।
राम अवतार बाबू के ऐसे दोस्तों की
संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही थी। तोता उनके घर में पहले से ही था। अब कुछ
कबूतर और बतख भी उन्होंने पाल लिए थे। शौक उनका बढ़ता ही गया। घर के पिछवाड़े गड्ढा
खोद कर मछलियां भी पाल लीं। एक बिल्ली भी उनकी हमसफर बन चुकी थी। उन मछलियों को यह
बिल्ली तो नहीं खाती, न
ही उनके कुत्ते और न ही उनके बतख लेकिन अकसर उनका गड्ढा मछलियों से ख़ाली हो जाता।
क्यों कि मुहल्ले के कुछ लड़के उनके पीछे पड़ गए थे और यह मछलियां उनके गड्ढे से
निकाल लेते थे। लेकिन राम अवतार बाबू फिर कुछ मछलियां उस गड्ढे में ला कर डाल
देते। उनका घर अब एक अजायब घर बन चुका था। आजिज आ कर उनके पिता और भाइयों ने
उन्हें घर का एक हिस्सा दे कर अलग कर दिया था। शुरू में उनका खाना उनकी मां बना
देती थीं। मां के निधन के बाद फिर से उनकी शादी की बात चलाई गई। लेकिन राम अवतार
बाबू ने बिन बोले ही सिर हिला कर फिर मना कर दिया।
यह भी अजब ही था कि राम अवतार
बाबू के घर में या ‘परिवार’ में तोता,
कबूतर, बतख, मछली, कुत्ता, बिल्ली, सांड, ऐसे रहते
गोया एक दूसरे को कितनी अच्छी तरह वे जानते हों। और सब लगभग साथ रहते थे। एक तोता
भर पिंजड़े में रहता था बाकी सब निरापद,
स्वच्छंद। राम अवतार बाबू जब
खटिया पर सोते तो वहीं पास में सोफे पर कहीं कबूतर,
बतख और बिल्ली भी सो जाते। नीचे
फर्श पर कुत्ते और सांड़। और सबके सब बिन बोले निःशब्द। इन सबका भाईचारा देखते बनता
था। राम अवतार बाबू को अपने खाने की इतनी फिकर नहीं रहती जितना अपने ‘परिवारीजनों’
की। खाना बनाने के लिए उन्होंने एक नौकर रखा था और जो खाना वह खुद खाते वही खाना
अपने ‘परिवारीजनों’ को भी खिलाते। हां कभी-कभी अपने दुलारे कुत्तों के लिए बेईमानी
भी कर जाते और उनके लिए मांसाहारी खाना बनवाते। इतना ही नहीं वह जब भी किसी दावत
में जाते तो अपने परिवारीजनों के लिए खाना तो नहीं ला पाते लेकिन इन कुत्तों के
लिए उस दावत में से मुर्गे या गोश्त की हड्डियां जरूर बांध कर लाते। तो यह कुत्ते
भी राम अवतार बाबू और उनके घर की सुरक्षा में कोई कसर न छोड़ते। एक बार तो राम
अवतार बाबू के घर से कोई फर्लांग भर दूर उनके स्कूटर को किसी कार वाले ने टक्कर
मार दिया। राम अवतार बाबू को कस के चोट लगी। वह जोर से चीख़े और उनका स्कूटर गिर
पड़ा। साथ ही राम अवतार बाबू स्कूटर के नीचे दब गए। वह अभी कुछ समझते कि उनके ये
दोनों कुत्ते आनन-फानन जाने कहां से सूंघते-सूंघते दौड़ कर उनके पास पहुंच गए। एक
कुत्ते ने राम अवतार बाबू की सुधि ली और दूसरे ने लपक कर कार वाले को पकड़ लिया।
कार वाले ने बड़ी कोशिश की छुड़ाने की लेकिन कुत्ते ने छोड़ा नहीं और दूसरे कुत्ते ने
भौंक-भौंक कर लोगों को राम अवतार बाबू के पास बुला लिया। लोगों ने राम अवतार बाबू
के स्कूटर और राम अवतार बाबू को उठा कर खड़ा किया। राम अवतार बाबू ने दूसरे कुत्ते
से कार वाले को छोड़ने को जब कहा तभी उसने छोड़ा। फिर राम अवतार बाबू के स्कूटर पर
बैठ कर दोनों कुत्ते घर आ गए। दुर्घटना की ख़बर सुन कर अगल-बगल के लोग देखने आ गए।
लेकिन जैसी कुशलक्षेम उनके गाय, सांड़,
बतख, कबूतर और
तोते ने पूछी, कोई
नहीं पूछ पाया। राम अवतार बाबू के ‘परिवारीजनों’ ने जिस प्रकार हाल किया, वह उनके
पड़ोसियों के लिए भी विस्मयकारी था।
विस्मयकारी ही था राम अवतार बाबू
का उम्र के इस चौथेपन में अचानक विवाह करना। नहीं,
उन्होंने कोई प्रेम विवाह नहीं
किया। टोटली अरेंज्ड मैरिज किया। तो भी विवाह समारोह में उनके अधेड़ होने की चर्चा
ज्यादा नहीं चली। चेहरे-मोहरे, कद-काठी से वह अधेड़ लगते भी नहीं थे। छरहरे बदन वाले
राम अवतार बाबू की देह में समाई फुर्ती उन्हें अधेड़ दीखने भी नहीं देती। रही बात
सफेद हो रहे सिर के छिटपुट बालों की तो उसे उन्होंने डाई करवा लिया था। लेकिन
चर्चा इस बात की भी नहीं चली। चर्चा चली तो राम अवतार बाबू की शादी में प्रदेश
सरकार में एक कैबिनेट
मंत्री के आमद की। यह कैबिनेट मंत्री राम अवतार बाबू के क्लासफेलो थे और राजनीति
में जाने और फिर मंत्री बनने के बाद भी राम अवतार बाबू और उनका याराना जस का तस का
बना रहा। सो मंत्री जी याराना निभाने न सिर्फ राम अवतार बाबू की शादी में शरीक हुए
बल्कि जब तक शादी संपन्न नहीं हो गई तब तक जमे रहे और बतौर सहबाला चुहुल भी करते
रहे। ख़ैर, शादी
हुई और देर से सही राम अवतार बाबू गृहस्थ जीवन में आ गए। उनके संगी-साथियों को ले
कर शुरू-शुरू में उनकी पत्नी को अड़चन हुई,
इस को ले कर दोनों में अनबन भी
हुई पर बात धीरे-धीरे पटरी पर आ गई। लेकिन इस सबके बावजूद जाने क्यों उनके दांपत्य
में निखार नहीं आया। उनकी पत्नी की कोख हरी नहीं हुई। राम अवतार बाबू ने इसके लिए
कोई ख़ास कोशिश भी नहीं की पर उनकी पत्नी ने पूजा-पाठ, दवा-दारू सब
की। बात जांच-वांच तक पहुंची। राम अवतार बाबू की भी जांच की बात चली तो उन्होंने
इसे सिरे से टाल दिया।
कहा कि, ‘कोई जरूरत
नहीं है।’ पत्नी ने प्रतिवाद किया। बोलीं,
‘पर बिना बच्चे के जिंदगी कैसे
बीतेगी ? बुढ़ापा
कैसे कटेगा ?’
‘क्यों? यह सब क्या
हैं ?’ राम
अवतार बाबू ने अपने संगी साथी तोता,
बिल्ली, कुत्ता, सांड़, बतख, गाय, मछली के
झुंड की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘हमारे बाल बच्चे ही तो हैं !’
‘बाल बच्चे हैं कि शंकर जी की
बारात हैं !’ कह कर उनकी पत्नी मायूस हो गईं। रूठने के अंदाज में उठ खड़ी हो गईं।
कुछ दिन बाद कोई बच्चा गोद लेने
की बात चलाई पत्नी ने, पर
राम अवतार बाबू यह बात भी टाल गए। दिल टूट गया राम अवतार बाबू की पत्नी का। रही
बात राम अवतार बाबू की तो वह अपने कुत्ते,
बतखों और नौकरी में समाये रहते।
पत्नी के लिए भी उनके पास कम ही समय होता। लेकिन समय का बदलता मोड़ जैसे उनकी राह
देख रहा था। उनके मिनिस्टर दोस्त का भाग्य पलटा और वह चीफ मिनिस्टर हो गए। उनके
शपथ ग्रहण समारोह में शरीक होने वह लखनऊ भी गए और अपने शहर लौटे तो मारे खुशी के
राम अवतार बाबू ने क्लर्की की नौकरी से इस्तीफा दे दिया। बोले, ‘अब सामाजिक
काम करूंगा !’
‘तो यह शंकर जी की बारात कौन
संभालेगा ?’ पत्नी
ने आकुल हो कर पूछा।
‘संभालने की जरूरत पड़ी है क्या कभी
इन सब को ?’ वह
बोले, ‘अरे, यह सब हमें
संभालते हैं!’ पत्नी निरुत्तर हो गईं।
कुछ दिन बाद शहर में जब लोगों को
पता चला कि राम अवतार बाबू ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया है तो लोग चौंके। कुछ
लोगों ने राम अवतार बाबू से पूछा भी कि,
‘यह क्या किया ?’
‘क्या किया ?’ वह बोले, ‘अरे, दोस्त
मुख्यमंत्री बन गया है।’
‘तो?’
‘तो क्या, अब दोस्त के
मातहत हो कर नौकरी करेंगे ?’ राम
अवतार बाबू कहते, ‘अब
दोस्त के साथ सामाजिक कार्य करेंगे।’
‘पर खर्चा-बर्चा कहां से चलाएंगे ?’
‘बाप दादों की खेती बारी है न?’ वह कहते, ‘क्लर्की की
नौकरी से वैसे भी खर्चा कहां चलता था हमारा?’
राम अवतार बाबू सचमुच सामाजिक
कामों में लग गए। निःस्वार्थ ! लोगों को,
उनकी पत्नी को कुछ क्या ज्यादा
अटपटा लगता लेकिन राम अवतार बाबू को किस को क्या लग रहा है इसकी परवाह लगभग नहीं
होती। उनकी पत्नी अब अकसर बीमार रहने लगी थीं। लेकिन कुत्ता, बतख, गाय, बिल्ली की
तकलीफ समझने वाले, सामाजिक
कार्यों में निःस्वार्थ लगे रहने वाले राम अवतार बाबू को पत्नी की बीमारी की परवाह
नहीं होती। पत्नी झल्लाती रहतीं, कुढ़ती रहतीं। कहती रहतीं डाक्टर के यहां चलने को। पर
राम अवतार बाबू के पास इतना समय कहां होता कि वह पत्नी को डाक्टर के यहां दिखाने
ले जाएं ! टालते हुए वह कुछ देसी दवाएं तजबीज करते हुए कहते, ‘कुछ नहीं
हुआ, सब
ठीक हो जाएगा।’
अजीब थी यह उनकी लापरवाही।
पर पशु-पक्षियों यानी अपने
संगी-साथियों के प्रति वह कभी लापरवाह नहीं रहे। इतना ही नहीं उनके क्लासफेलो
दोस्त जो अब प्रदेश के मुख्यमंत्री भी बन गए थे,
वह भी राम अवतार बाबू के
पशु-पक्षी प्रेम की गिरफ्त में आ गए थे। उन्होंने भी अपने बंगले पर पशु-पक्षियों
की संख्या बढ़ा दी थी। अब चूंकि वह मुख्यमंत्री थे सो सुविधाएं भी ज्यादा थीं और
दो-दो बंगलों में जगह भी सो मुख्यमंत्री के लिए अधिकृत सरकारी बंगले में तो नहीं
पर दूसरे वाले सरकारी बंगले में हिरन,
खरगोश, सारस यहां
तक कि किस्म-किस्म के सांप भी उन्हों ने पाल लिए थे। उन पर कई बार जानवरों को कैद
कर कानून तोड़ने का आरोप भी प्रतिपक्ष के छुटभैया नेताओं ने लगाया। पर वह राम अवतार
बाबू द्वारा सिखाए गए पशु-प्रेम को छोड़ नहीं पाए। इतना ही नहीं राम अवतार बाबू को
मान-सम्मान देने के लिए एक बार तो उन्हें विधान परिषद में चुने जाने की जोड़-तोड़ भी
कर ली। उनका नामांकन तक भरवा दिया। पर पार्टी में ही कई लोगों ने सवाल उठा कर बात
हाई कमान तक पहुंचा दी। कहा कि पूरे प्रदेश को चिड़ियाघर बना देंगे ये लोग ! विवश
हो कर राम अवतार बाबू को नामांकन वापस लेना पड़ा। राजनीति से उन्हें पहले भी कुछ
बहुत लेना देना नहीं था पर अब विरक्ति-सी हो गई। हां, समाज सेवा
उनकी जारी रही। वैसे भी बाद में उनके दोस्त को राजनीतिक उठा-पटक के चलते
मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ गया। पर जल्दी ही उन्हें केद्रीय मंत्रिमंडल
में जगह मिल गई। बतौर केद्रीय मंत्री वह पेरिस में आयोजित एक कांफ्रेंस में हिस्सा
लेने गए। वहीं उनका स्वास्थ्य इतना बिगड़ गया कि निधन भी हो गया। यह ख़बर सुन कर
राम अवतार बाबू बहुत रोए। कहने लगे,
‘बताइए, दुनिया भर
की बेटियों की शादी के लिए अनुदान देते रहे और अपनी ही बेटियों की शादी किए बिना
गुजर गए!’ ख़ैर, राम
अवतार बाबू मित्रा की अंत्येष्टि में शामिल हुए और बाद में उनकी एक बेटी की शादी
में भी। फिर उन्हों ने राजनीति की ओर मुड़ कर नहीं देखा। पर सामाजिक कार्यों में वह
जरूर लगे रहे।
राम अवतार बाबू के साथ अब एक और
समस्या घर कर गई थी। समाज सुधार करते-करते वह कुछ पियक्कड़ टाइप के समाज सुधारकों
की संगत में आ गए। शुरू-शुरू में कभी-कभी पर बाद में लगभग नियमित पीने लग गए थे
वह। रात को भरपेट पीते और सुबह उठते ही नहा धो कर पूजा-पाठ करने लगते। सूर्य देवता
को तो कूद-कूद कर नाचते, ताली
बजाते वह जल देते। अजब अंतर्विरोध उपज आया था उनमें। लेकिन पशु-पक्षियों के प्रति
उनकी संवेदना, उनकी
निष्ठा अब भी जस की तस थी। एक रात वह लखनऊ जाने के लिए ट्रेन पकड़ने के लिए रिक्शे
से स्टेशन जा रहे थे। पिए हुए थे और साथ में एक स्थानीय नेता भी थे। अचानक एक जगह
उन्होंने रिक्शा रुकवाया। साथ के नेता जी ने पूछा भी कि, ‘क्या बात है
?’
‘यह देखिए!’ रिक्शे से उतरते हुए
राम अवतार बाबू बोले, ‘यह
घायल हो गया है।’ सड़क किनारे घायल पड़े एक सांड़ को इंगित करते हुए वह बोले, ‘यह हमारा ही
सांड़ है। कान कटवा कर छोड़ दिया था।’ वह बोले,
‘लगता है किसी ट्रक ने टक्कर मारी
है। फिर वह जमीन पर बैठ कर सांड़ की गरदन सहलाने लगे। बोले, ‘बहुत ज्यादा
चोट लग गई है।’ वह उसके घाव से बहते खून को देखते हुए बोले, ‘अस्पताल ले
जाना पड़ेगा।’
‘लेकिन तब तक तो ट्रेन छूट जाएगी
राम अवतार बाबू !’ नेता जी अकुला कर बोले।
‘मैं तो नेता जी अब लखनऊ जा भी
कहां पाऊंगा, इसे
ऐसे छोड़ कर!’
‘क्या?’
‘हां, अब आप इस
रिक्शे से उतरिए और दूसरा रिक्शा खोजिए।’ वह बोले,
‘इस रिक्शे पर मैं इसे अस्पताल ले
जा रहा हूं।’
‘अरे, आपको नहीं
जाना है तो मत जाइए। हमारी ट्रेन तो मत छुड़वाइए।’ नेता जी बोले, ‘आप दूसरा
रिक्शा ले लीजिए।’
‘अब दूसरा रिक्शा इतनी रात क्या
जाने कब मिलेगा ?’
‘वही तो !’ नेता जी बोले, ‘मुझे जाने
दीजिए। नहीं, ट्रेन
छूट जाएगी। बहुत कम समय रह गया है।’
‘क्या झिक-झिक कर रहे हैं तभी से।’
राम अवतार बाबू बोले, ‘अभी
ट्रेन छूट जाएगी तो सुबह ट्रेन पकड़ लीजिएगा। लेकिन यह सांड़ अभी मर गया तो सुबह फिर
नहीं जी पाएगा।’ वह सांड़ का घाव दिखाते हुए बोले,
‘देखिए कितना खून बह रहा है !’ फिर
उन्होंने रिक्शे वाले और नेता जी की मदद से सांड़ को उठा कर रिक्शे पर लादा और उसे
जानवरों के अस्पताल ले गए।
नेता जी वहीं सड़क पर अपनी अटैची
लिए अकेले रह गए किसी रिक्शे की आस में। अंततः नेता जी की ट्रेन छूट गई पर उस
छुट्टा सांड़ को राम अवतार बाबू ने बचा लिया था। सुबह तक वह जानवरों के अस्पताल में
ही रहे।
राम अवतार बाबू की हिचकोले खाती
जिंदगी ऐसे ही कटती रही कि तभी उनकी पत्नी का स्वास्थ ज्यादा बिगड़ गया। तब राम
अवतार बाबू घर क्या, शहर
में भी नहीं थे। सांप्रदायिक सद्भावना यात्रा पर निकले हुए थे। पड़ोसियों ने उनकी
पत्नी को अस्पताल पहुंचाया और राम अवतार बाबू को पत्नी की अस्वस्थता की ख़बर।
सद्भावना यात्रा बीच में छोड़ कर आने को वह तैयार नहीं थे। पर जब पत्नी की ज्यादा
अस्वस्थता और अस्पताल मे भर्ती की ख़बर दूसरे दिन दुबारा दी गई तो वह किसी तरह
सद्भावना यात्रा बीच में ही छोड़ कर लौटे। अस्पताल गए।
पत्नी की तबीयत सचमुच ज्यादा बिगड़
गई थी राम अवतार बाबू की लापरवाही से। कोई बहुत बड़ी बीमारी नहीं थी लेकिन अब थी
लास्ट स्टेज पर, इसलिए
बीमारी बड़ी हो गई थी। डाक्टरों ने टी. बी. बताया और कहा कि इसका इलाज शुरू से किया
गया होता तो अब तक ठीक हो गया होता। टी. बी. अब कोई बीमारी नहीं रही और साल डेढ़
साल की दवा में ठीक हो जाती है। लेकिन इनको तो कभी कोई दवा दी ही नहीं गई। सो अब
भगवान का नाम लीजिए!
राम अवतार बाबू यह सब सुन कर अवाक
रह गए। पत्नी उनकी पहले ही से सूख कर कांटा हो गई थीं। अब वह अवसन्न कर देने वाली
स्थिति में थीं।
अब राम अवतार बाबू की तारीफ करने
वाले भी उन पर थू-थू करने लगे। शहर के ज्यादातर लोगबाग, परिवार और
नाते रिश्तेदारी के लोग तो उन्हें पहले ही से पगलेट डिक्लेयर किए हुए थे। ख़ैर, लोक-लाज के
डर से ही सही राम अवतार बाबू ने पत्नी इलाज की सुधि ली। पर देरी इतनी हो चुकी थी
कि सब कुछ बेकार हो गया था।
अंततः उनकी पत्नी चल बसीं।
अंत्येष्टि में भारी भीड़ थी।
सामाजिक कार्यकर्ता होने के कारण राम अवतार बाबू के इस शोक में शहर के सभी तबके के
लोग श्मशान घाट पर पहुंचे। हां, उनके तोते,
बिल्ली, गाय, बतख तो नहीं
पर कुत्ते और उनका छुट्टा सांड़ भी अनायास पहुंचे। कोई उन्हें हांक कर नहीं ले गया
था। इस सांड़ और कुत्तों के बहाने श्मशान घाट पर भी राम अवतार बाबू की पगलेटई पर
गुपचुप-खुसफुस ही सही टिप्पणियां जारी रहीं। किसिम-किसिम की। कई टिप्पणियां
अश्लीलता की हदें भी पार करती रहीं।
राम अवतार बाबू की शाम की महफिल
के एक राजनीतिज्ञ मित्र को शाम की महफिल में जब उनकी अनुपस्थिति खटकी तो उन्होंने
बाकी लोगों ने पूछा भी कि, ‘‘आज
कल राम अवतरवा नहीं दिखाई दे रहा है ?’
‘आपको मालूम नहीं क्या ?’ एक साथी ने
अचरज करते हुए पूछा।
‘काहें क्या हो गया ?’
‘अरे, उनकी
धर्मपत्नी का आज स्वर्गवास हो गया!’
‘अभागा है !’
‘कौन ?’
‘राम अवतरवा और कौन!’ वह बोले, ‘जवानी भर
औरत का सुख नहीं भोगा और अब बुढ़ापे में भी बिना औरत के रंडुओं की तरह भटकेगा। औरत
से ‘भेंट’ नहीं होगा। अभागा कहीं का ।’ कह कर वह निर्विकार अपना पेग बनाने लगे।
फिर राम अवतार बाबू के बारे में
टिप्पणियों पर टिप्पणियां शुरू हो गईं,
जैसे-जैसे शराब चढ़ती गई, टिप्पणियां
भी लोगों की बढ़ती गईं। महफिल में शरीक एक नौजवान चिंतक की मुद्रा में आ गया। बोला, ‘पर मेरी समझ
में यह नहीं आता कि कुत्ते, बिल्लियों, पशु-पक्षियों
के प्रति हद से ज्ष्यादा संवेदनशील रहने वाला व्यक्ति अपनी पत्नी के प्रति इतना
संवेदनहीन कैसे हो गया ? कि
दवा के अभाव में वह मर गई!’
‘एकदमै पागल हो तुम भी का भई?’ वह
राजनीतिज्ञ उस नौजवान से मुखातिब हुए !
‘क्यों इसमें पागलपन की क्या बात
है ?’
‘बहुत साफ है!’ वह बोले, ‘तुम राम
अवतरवा के बारे में तब कुछ जानते ही नहीं हो। अब मैं बता रहा हूं तुम सब जान लो।’
वह बोले, ‘राम
अवतरवा का सारा कमिटमेंट पशु-पक्षियों के साथ है,
मनुष्यों के साथ उसका कोई
कमिटमेंट है ही नहीं।’
‘क्या मतलब ?’
‘अभी लौंडे हो, तुम नहीं
बूझोगे!’ वह बोले, ‘दुनिया
बहुत बड़ी है। अभी कुछ देखो समझो फिर बतियाना!’
महफिल यहीं ख़त्म हो गई थी और बात
भी। जो भी हो पत्नी की चिकित्सा पर राम अवतार बाबू ने भले ही ध्यान नहीं दिया पर
पत्नी के श्राद्ध के दिन भोज में जैसे सारा शहर उन्होंने न्यौत दिया था। और
दिलचस्प यह कि आने वालों की अगुवानी भी राम अवतार बाबू के पुराने संगी साथी यानी
वही पशु-पक्षी इस विनम्रता और ख़ामोशी से खड़े हो कर रहे थे कि उनका शोक देख बाकी
लोगों का शोक और गाढ़ा हो जाता था। सांड़,
गाय, कुत्ता, बतख आदि
दरवाजे पर लाइन से सिर झुकाए ऐसे खड़े-खड़े आने वाले लोगों को ‘रिसीव’ कर रहे थे और
जाने वालों को ‘सी आफ’ कि कई लोगों की हिचकियां बंध गईं। हां, बिल्लियां
घर के भीतर थीं। सहमी-सहमी इधर-उधर धीरे-धीरे भटकतीं।
और राम अवतार बाबू ? उनकी चिंता
यह थी कि बिना भोजन के किए कोई वापस न जाए। एकाध ख़ास मित्रों को देखते ही वह
भरभरा कर रो पड़ते। पर दूसरे ही क्षण वह पलट कर इंतजाम देखने लग जाते। बाल मुड़ाए
धोती पहने, थकन
से चूर वह फिर भी इधर-उधर भटक रहे थे छटपटाते हुए। दूसरे ही दिन उन्होंने बरसी भी
कर दी। छुट्टी मिल गई उन्हें पत्नी के क्रिया-कर्म से। कुछ दिनों तक वह खोए-खोए, सोए-सोए से
रहे पर जल्दी ही रुटीन पर आ गए।
हां, अब जब बाल
उनके बड़े हुए तो डाई नहीं करवाया उन्होंने। फिर खिचड़ी से दिखने लगे उनके बाल। पर
जल्दी ही झक सफेद हो गए। अब उनकी कृश काया पर यह बड़े-बड़े सफेद बाल उन्हें कभी
संन्यासी का रंग देते तो कभी वह डरावने लगने लगते।
अब वह शहर भर के लिए डिक्लेयर्ड
पगलेट हो गए। बावजूद इस सब के उनका पशु-पक्षी प्रेम और समाज सेवा का काम फिर भी
जारी रहा !
और शाम की महफिल भी।
-36-
देह-दंश
प्यार के पहले पहर में भी मनुहार
की नायिका नहीं थी वह।
क्योंकि देह भी वह राजनीति ही की
राग में भोगता था। वह नहीं जानता था कि देह के देश में एक तार हमेशा ही अपरिभाषित
होता है। लेकिन बजता है सितार की तरह,
सारंगी की तरह, वीणा, बैंजो और
गिटार की तरह। मन के कोने में कहीं संतूर की सी मिठास की तरह, भीमसेन जोशी
के किसी आलाप की तरह नेह का कोई धागा कहीं गुंथता है, कहीं गूंजता
है तब ही देह, देह
होती है, देह
का संगीत बजता है।
जो तार इस देह संगीत को सुर में
बांधता है उसे हम सिर्फ प्यार नहीं कहेंगे। देह का नेह और दुलार भी नहीं कहेंगे।
कोई मौन सा, मनुहार
सा शब्द भी इस देह संगीत के नेह को नमस्कार कह देगा जो हम इस अपरिभाषित तार को
परिभाषित कर दें, कोई
शब्द दे दें। जिस दिन दे दिए कोई शब्द,
दे दी कोई परिभाषा तार टूट जाएगा, देह संगीत
थम जाएगा। देह का नेह नत होता जाएगा। और फिर मेघ नहीं बरसेगा।
मन का मेघ।
राजनीति के जिस गलियारे से वह
गुजरता हुआ मुझ तक, मेरी
देह तक पहुंचा था यह उस का कोई पहला पड़ाव नहीं था। उस के लिए देह का अर्थ देह नहीं
था, मन
का मेघ नहीं था, वह
नहीं जानता था देह संगीत। तो क्या उस अपरिभाषित तार का कोई तंतु भी उस के मन में
नहीं था ?
भला कहां समाता ?
देह तो उस ने बहुतेरी देखी थी ।
वह कहता, ‘राजनीति
का बियाबान बिना देह के धांगा जा सकता है क्या ?
आख़िर दिन भर की सारी थकान कहां
उतारी जाए? सिर्फ
दारू पर ? नहीं।
दारू और देह दोनों ही चाहिए। नियमित नहीं,
न सही, अकसर तो
चाहिए ही। पर क्या यह देह, दारू
का संयोग सभी राजनीतिज्ञों के नसीब में है ?
अरे नहीं !’ वह कहता और ठहाके
लगाता।
वह दारू के दो चार ख़ुराक लगाता, मेरी देह
‘धांगता’, ठीक
अपनी राजनीति की तरह और ध्वस्त हो जाता अपनी थकान मिटाता हुआ, मेरी थकन की
परवाह किए बिना। थकन जो कभी बुझती नहीं। वह तार जो कभी बजता नहीं।
वह अपने गले का हार छूती है।
सोचती है क्या इसे भी वह फेंक दे जैसे सुबह कूड़े में उस के गले के फूलों वाले हार
फेंक देती है कभी कभार। पर वह अपने इस हार का क्या करे। इस थकन और इस हार का क्या
करे जो उस की देह में बजा ही नहीं,
मन में बसा ही नहीं, किसी बरसात
में बजा ही नहीं, बसा
ही नहीं। बरसा ही नहीं वह आकुल मेघ जो वह व्याकुल धरती की तरह समेट लेती, अपनी देह
में दबोच लेती। वह तो दो देशों में बंट गई थी,
जैसे धरती किसी और देश में हो, मेघ किसी और
देश में। दोनों ही जब भी उस से मिले परदेस के पांव छूते मिले। राजनीति और कला की
तरह।
जाने किस घड़ी में उस ने वह वंदना
गाई। क्या वह वंदना ही छल थी ? या कि मेरी गायकी ही,
गायकी का नेह ही, गायकी में
बरसता मेह ही मुझे छल गया? कि
मेरा रूप, रंग
और लावण्य ही इतना छलक गया कि मुझे छल गया ?
कि छल गई भातखंडे की पढ़ाई ? न पढ़ती, न वंदना
गाती, न
छली जाती। और फिर क्या देह का संगीत भी जान पाती ?
और उस तार को ? उस
अपरिभाषित तार को जो देह में कभी बजता है तो कभी डोलता है !
हां, अब तो डोलता
है, बजता
नहीं। नहीं बजता वह अपरिभाषित तार। नहीं धड़कता दिल। और नहीं बोलती यह देह भी। बाजे
बिन बोले कैसे ?
बोला था उस दिन वह। कार्यक्रम का
उद्घाटन भाषण राष्ट्रपति अंगरेजी में पढ़ चुके थे। हिंदी अनुवाद चल रहा था।
राष्ट्रीय संग्रहालय के उस समारोह में हम लड़कियां भी जैसे संग्रहीत हो गई थीं।
सारी पुरुष आंखें हमारी लाल बार्डर वाली सिल्क साड़ियों को जैसे भस्म कर देह की
एक-एक देहरी देख लेना चाहती थीं कुछ ऐसी भी आंखें थीं जो सिर्फ हमें देख कर आंखों
में यूरिया भरते रहे थे और बाहर जा कर आह भी भरी। पर वह बाहर नहीं गया। उस
आई॰ए॰एस॰ अफसर के साथ आया जो सांस्कृतिक कार्य विभाग का निदेशक था। हमें इस समारोह
में समारोह पूर्वक बुला लाया था। इस विधुर निदेशक के अपने कई किस्से थे पर फिलहाल
वह मुझे किस्सा बनाने पर आमादा था। उस ने बताया,
‘यह विधायक जी हैं।’ किसी राजनीतिक
से इस तरह यह मेरा पहला व्यावहारिक परिचय था। वह मिश्रा था और मैं पाठक। बात उसे
कुछ जम गई और मैं नहीं जान पाई। भातखंडे वापस आ कर ‘‘हम होंगे कामयाब एक दिन’’ के
रिहर्सल में समा गई। वह मेरे डॉक्टर पिता से मिला। अकसर मिलता रहा। दो चार महीने
इलाज का फितूर बांधे रहा। और मैं रिहर्सल में जूझती रही, ‘या कुंदेंदु
तुषार हार धवला। या शुभ्र वस्त्रवृता....। या वीणा वरदंड मंडित करा या श्वेत
पद्मासना....’ तब क्या ख़बर थी कि वीणा तो अब बंधने वाली है। तब तो गजल का सुरूर था, ‘क्यों
इशारों से बात करते हो साफ कह दो कि हम तुम्हारे हैं।’ ताल की निबद्धता इतनी
नीरवता में नचाएगी, नहीं
जानती थी। नहीं जानती थी, ‘आंखों
ने तो काम किया है काजल क्यों बदनाम हुआ है।’ को बांचना अब बाउर हो जाएगा। और सच
उस ने ऐसा बाउंस मारा कि क्षण भर को तो मैं बउरा ही गई। और पिता ? पिता क्या
घर में सभी बउराए हुए बता रहे थे, ‘मिनिस्टर बनने वाला है।’ मैं ने भी तभी जमा लिया मन
में कि, सांस्कृतिक
मंत्री। तब क्या पता था उसे संस्कृति से भी सरोकार नहीं था। सांस्कृतिक होना तो
बहुत दूर की कौड़ी थी। वह तो जुलूसों,
रैलियों, पोस्टरों
परचियों का मारा था। भाषणों का भूखा,
मिनिस्टरी की मनौती में मरता वह
कितनों को राजनीतिक मौत सुला चुका था इस का भाष्य बताता, वह मुझे
बाहों में भरता नहीं था, दबोचता
था। वह मुझे समेटता नहीं, धांगता
था। धांगता और दुत्कार देता। दारू में धुत्त धुन देता। अकसर नहीं, कभी-कभी। एक
रोज उसे ज्यादा नहीं चढ़ी थी, शायद बीयर में था और खीझा हुआ भी। बोला, ‘तुम्हारे
पिता प्रमथ नाथ पाठक अगर डॉक्टर नहीं पटवारी होते तो ?’
‘तो
क्या ? मुझे
नहीं किसी और को धांगते। बांध लाते रूप से सराबोर किसी विष बाला को और बदल देते
उसे हिम बाला में।’
‘ज्वाला
नहीं बनो मेरी कोकिला।’ वह बोला, ‘पहली बात पर आओ पटवारी पुत्री। पहली बात पर।’
‘बोलो
भाषण बिहारी।’
‘पटवारी
पुत्री होती न तुम, तब
भी तुम्हें मैं धांगता। धांगता ख़ूब धांगता,
पर बांधता नहीं क्यों कि मेरी
कुंडली में तुम लिख गई थी। आंखों की कुंडली में तुम बिंध गई थी....। फिर उस ने उस
रोज विस्तार दिया था अपनी आंखों की कुंडली का,
ब्यौरा दिया था कि कितनी देह
देहरियां उस ने लांघीं, धांगी
पर बांधीं नहीं। यह सब बताते हुए वह यह भी बताता गया, आज की
राजनीति की राह में यह रंग भी जरूरी है। नहीं कैसे कटेगा जीवन ?’
उसी रोज उस ने फैसला किया था और
उस से कह दिया था कि, ‘मुख
मैथुन अब बंद! आख़िर जो देह इतनी धुरियों में नाची हो वह मेरी देह में कैसे डोलेगी ?’ उस ने कहा
था, ‘मुख
में तो कतई मंजूर नहीं।’
‘चल
हट्ट।’ वह बोला था और बाहर जा कर पी॰डब्ल्यू॰डी॰ के किसी ठेकेदार से टेंडर-वेंडर
करने लगा था। उस की बातों में कहीं देह गंध भी तिरने लगी थी। फिर थोड़ी देर बाद कार
स्टार्ट होने की आवाज आई।
आवाज तो यहां इस देह में भी
गुनगुनाई। पर गूंजी नहीं। कुनमुनाई। वह तार बिन झंकार के झांय-झांय करता रहा। सुबह
नहीं भोर के सन्नाटे में वह पलटा पर बेसुध हो कर अक-बक बड़बड़ाता हुआ। बखान करता हुआ
जिस का मुंह मार कर वह आया था। बखिया उधेड़ता हुआ मेरी कि, ‘बड़ी पवित्रा
बनती है साली पति से ही। कलाकार क्या अइसे ही बन गई होगी ? हुंह ! मुंह
में नहीं....। कहती है साली। पटवारी की पोती ! पोतड़े बांध के आई है। हरामजादी !’
बाबा उस के पटवारी रहे थे।
सुबह उस के खर्राटे चल रहे थे और
एक पत्रकार परची पर परची भीतर खोंसे जा रहा था। नहीं माना इंटरकाम पर जूझ गया हम
से, भाई
साहब ने हमें ख़ुद बुलाया था। बिलकुल सुबह। अब तो आठ बज रहे हैं। वह बोला, ‘हाऊस नहीं
जाएंगे क्या? अरे, बहुत जरूरी
बात थी।’
पत्रकार की आकुलता बूझ कर बाहर आ
गई। क्या ख़बर थी कि यह वही होगा जो यूनिवर्सिटी में साइकिल दौड़ाए लड़कियों से
फोटुएं मांगता रहता था, विचार
पूछता रहता था और हबड़-तबड़ में नोट कर हांफता हुआ किसी और के पीछे भाग लेता था यह
कहता हुआ, ‘जब
छपेगा तो बताऊंगा।’
धीरे-धीरे वह लंबा परिचर्चाकार हो
गया।
फिर भातखंडे संगीत महाविद्यालय
में वह एक रोज अचानक अवतरित हुआ, ‘पहचाना नहीं ?’
कहते हुए बोला, ‘पुलिस लाइन
में आप का परफार्मेंस बहुत अच्छा लगा था। तभी सोचा आप से बात करूं। संकोच कर गया।
पर कल टी॰ वी॰ पर राष्ट्रीय कार्यक्रम में आप छा गईं। मजा आ गया। एक बढ़िया
इंटरव्यू करना चाहता हूं। दो तीन रोज वह आता रहा इंटरव्यू के ब्यौरे बतियाने।
गायकी के गांव से कोई नाता तो दिखा नहीं उस का,
उस की बातचीत में पर बात वह शऊर
से करता रहा तो बतियाती रही। सितार वाली सरोज बोली थी, ‘वह संगीत
नहीं संगत चाहता है तेरी।’ ‘जी नहीं,
आंखों को बस यूरिया ही मिलती रहे
बहुत है अपने लिए।’ कह कर वह चला गया।
फिर नहीं आया। इंटरव्यू भी जो वह
ले गया, फोटो
भी, कुछ
भी कहीं नहीं छपा। नहीं आया फिर अपनी आंखों को खाद देने, अपनी आंखों
में यूरिया समेटने।
ढेर सारे कागज समेटे वह आया तो
फिर विधायक/चेयरमैन निवास ही में। और विधायक जी समय दे कर सो रहे थे। मुंह बाए।
क्या किसी महिला मुंह की आस में ?
पत्रकार मुझे यहां देख कर चकराया।
चकराया मेरी गदराई देह-देख कर। चकराया उस बिन छपे इंटरव्यू के संकोच को सोच कर।
चकराया वह मेरी उनींदी आंखें देख कर। वह चौन्हाया मेरी यहां उपस्थिति पा कर।
यूरिया के यूज में नहीं पोटाश की पिनक में,
पांव से अपनी चप्पलों की उधड़ी
सीवनें ढांपता हुआ, मेरी
देह की सीवनों को झांकता और आंखों में बांटता हुआ। गोया कोई अपराध कर दिया हो उस
ने। बोला, ‘शर्मिंदा
हूं। वह इंटरव्यू न छप पाने पर। तब के संपादक ने छपने नहीं दिया था।’ कह कर जैसे
वह कहीं छुप जाने की जगह खोजने लगा। और मैं ने देखा वह छुप गया विधायक जी की बाहों
में। विधायक जी की नींद टूट गई थी। और वह कुम्हलाया-कुम्हलाया सा पत्रकार हरियरा
गया था। मेरी उपस्थिति को वह बेशर्मी के एक ही घोंटे में पी गया था।
‘भाई
साहब।’ वह बोल रहा था, ‘बड़ी
देर से दर्शन के लिए बैठा था।’
‘बैठे
तो बहुत हैं बाहर लॉन में। पर आप आज चलो। फिर बताएंगे।’
‘और
वह ख़बर ? भाई
साहब हाऊस में हंगामा न करवा दूं तो कहिएगा।’
‘कौन
सी ख़बर ?’
‘अरे
वही पी॰ डब्ल्यू॰ डी॰ वाली भाई साहब।’
‘ऐसा
है। इसे आप जाओ भूल। मेरे एक आदमी का काम एक तो बन गया है दूसरे, पी॰
डब्ल्यू॰ डी॰ मिनिस्टर भी अब अपने यार हैं। सो आप इस को तो छोड़ दो।’
‘लेकिन
भाई साहब !’
‘देखो
भाई आप मेरे शुभचिंतक तो हो ना। हो ना। तो क्या चाहते हो जिंदगी भर इस टुटपुंजिए
कारपोरेशन की चेयरमैनी में गुजार दूं। चुनाव जीत कर आया हूं तो चेयरमैनी नहीं
मिनिस्टरी का मन बना कर आया हूं। आप भी जाओ माहौल बनाओ एक्सपेंशन होने वाला है। आप
ही को सिर्फ पता है। स्कूप है स्कूप। जाओ आज यही छाप मारो।’
‘पर
भाई साहब ! यह तो आज के एक अख़बार में छप गया है।’
‘तो
आप फालो-अप करिए जी। अंदाजा लगाइए कौन-कौन मंत्री ! मेरा भी नाम। समझे।’
‘जी
भाई साहब।’ पत्रकार चहका।
‘हां
भाई, मुख्यमंत्री
खुद फोन पर थे। रात दो बजे। कोई पी॰ ए॰,
सी॰ ए॰ नाहीं।’
‘तब
तो परफेक्ट ख़बर है भाई साहेब।’
‘तब
?’
पत्रकार विधायक जी से हाथ मिला कर
चला गया। मुझ से कोई औपचारिकता भी वह भूल गया। खिड़की से देखा वह खटारा साइकिल पर
नहीं स्कूटर पर था।
स्कूटर नई थी।
पर रात दो बजे मुख्यमंत्री के फोन
वाली बात ? यह
तो रात दो बजे किसी के मुंह में रहा होगा। फिर मुख्यमंत्री का फोन ?
यह कोई नई बात नहीं थी उस के लिए।
‘जल्दी
ही दौरा बना रहे हैं....
‘जी
नेता जी बड़ा जरूरी हो गया है।’
‘घबराइए
नहीं राय साहब आप के स्कूल के अनुदान वाली फाइल भी करवा दी है....।’
‘लेकिन
विधायक जी वो मिट्टी वाला ठेकवा....।’
‘अब
जाइए भी राय साहब मिट्टी का ठेका ! अरे स्कूल का ठेका कम पड़ रहा है। क्यों ?’
‘अरे
नहीं लेकिन त।’
‘त
जाइए भी।’
‘विधायक
जी थानेदार बड़ा सरकस आ गया है। हटाना पड़ेगा। और अबही तो चलना ही पड़ेगा। ब्लाक
प्रमुख यादव जी को धर लिया है। छुड़ाना नितांत जरूरी है।’
‘अरे
थाने-थाने ही हम को घुमाते रहना चाहते हैं। अइसे ही आप लोग हमारा पत्ता कटवा
देंगे। जानते नहीं हैं एक्सपेंशन की हवा है। और मुख्यमंत्रिया हम को रेतने पर लगा
है। हम इहां गोट बिठा रहे हैं अउर आप थाने में ही पिट पिटा रहे हैं। अरे जाइए
सचिवालय। कुछ लाबिंग वाबिंग करिए। हवा बनाइए। हम को भी अभी हाऊस जाना है। नहाना
धोना है।’
यह प्रातः दर्शन था।
आया नहाया, धोया। नींबू
पानी ले फिर मुंह बा गया। पी॰ ए॰ ने बताया,
‘सर हाऊस।’ तो गुर्राया, ‘स्साला ई
हाऊस नहीं तो क्या जहन्नुम है। अरे लंच बाद देख लेंगे हाऊस भी। आज कारपोरेशन नहीं
जाएंगे। समझा !’ कह कर वह मुंह बा गया।
फोन घनघनाया।
‘सर
आप सदन आ जाते। मंत्री जी चाहते थे।’ ‘अरे भाई तिवारी तुम तो जानते हो जीरो आवर्स
की जमात का जवान हूं। बजट विद्वान नहीं। विद्वानों को बजट बजड़ने दो। आ जाएंगे
देर-सवेर हम भी। दस्तखत तो करि जाएंगे। सोने दो भई अभी । रात बड़ी देर क्षेत्र से
आया हूं और मुंह बा गया।
नाक बज गई।
पर देह नहीं।
पर इधर दिन में ही देह में संगीत
सिर उठाए पड़ा है। किसी पोर में बांस बजता है तो किसी कोर में तसला। बांस का संगीत
बांसुरी का गीत नहीं बन पाता।
तसले का संगीत वह ताव, वह तेवर
नहीं बीन पाता जो देह से बिसर गया है,
देह के गांव से बिछड़ गया है। दूर
हो गया है। बहुत दूर। ठीक वैसे ही जैसे उस से उस की मिनिस्टरी और मुझ से मेरी
गायकी। उस की मिनिस्टरी का मान और मेरी गायकी की राह क्या एक नहीं हो सकती। सज
नहीं सकती उन राहों के रंग में हम दोनों की देह देहरी। तसले बांस का रूपक, वीणा, बांसुरी का
क्षेपक, सारंगी, सितार और
संतूर का शहद हमारी देह पर काहें नहीं गिरता। बैंजो,
गिटार की बिजली आख़िर कब गिरेगी
हमारे मन पर कि दोनों के नेह बटुर जाएं और परोस जाएं एक अप्रतिम संगीत। रच जाएं
कोई अविस्मरणीय गीत। गीत जो मन गा सके। संगीत जो देह बजा सके। पर वह तो देह का
दंगल ही जानता है। संगीत के किसी सिरे की समझ भी नहीं सिसकती, थिरकती उस
के मन के किसी कोर में, देह
के किसी पोर में। वह तो बस पसर जाता है तो पसर जाता है कला और राजनीति के जंगल में
मुंह बाए, मुंह
की तलब में तैर जाता है वह और उस का मन।
वह सोचती है जीवन का रंग इतना
बदरंग क्यों है ? वह
भी बहना चाहती है इस रंग में। क्या ?
हां। देह की दाहकता दूह लेती है।
सारा देह संगीत और देह दंगल में कूद लेती है वह भी। देह के गांव से वह देह के देश
में आ कर धंस जाती है पर कहीं किसी बांस की फुनगी पर, कहीं किसी
वीणा के तार पर, बांसुरी
की राग पर, सितार, सारंगी और
संतूर के किसी भाग पर तबला तल्ख़ हो गया है। हारमोनियम हार गई है। बैंजो और गिटार
गीत गाना बिसार गए हैं। तसले का संगीत सिर्फ बाकी है सच, मन बड़ा
एकाकी है। लेकिन बांस की फुनगी उसे फाड़ रही है। और वह है कि देह को निभा रही है, दंगल में
दौड़ रही है, दौड़ा
रही है। देह के देश में है अब वह। देह की दुनिया में जाग रही है। पीपल के पत्तों
की तरह, प्याज
की परतों की तरह, किसी
अख़बार में छपे कोलाज की तरह वह अपनी ही देह में भाग रही है। अनथक। देह संगीत बिसार
वह देह का बिगुल बजा रही है। ‘विधायक जी !’ वह बुदबुदा रही है कि, ‘वह
अपरिभाषित तार अभी भी अपरिभाषित है। नेह और मन के मेघ के मनुहार में मूर्छित। मान
मर्दित मुंह की सांस में आहत आंखों की आस में गदराई देह के वनवास में। राजनीति और
कला के जाल जंजाल रूपी फांस में।’
लेकिन उसे तो जाल नहीं लंगर
चाहिए। ऐसा लंगर जो मंत्री पद की ठांव में उस की नाव बांध सके। लेकिन मंत्री बनाने
वाला मुख्यमंत्री ही उस की फांस बना पड़ा है। क्या वह मुख्यमंत्री पद की ही लड़ाई
शुरू कर दे ? कि
मुख्यमंत्री ही को गिराने की लड़ाई लड़नी होगी उसे। मुख्यमंत्री मान गया तो मान गया
नहीं, कुछ
तो करना ही पड़ेगा। कारपोरेशन की चेयरमैनी की ऐसी-तैसी। इस्तीफा दे दे क्या ? सक्रिय
राजनीति की मुहर मार ले ? पर
जो असंतुष्ट घोषित कर दें सब तो ? तो मंत्री पद तो गया बूझिए।
‘सबर
से, समझ
से काम लें श्रीमान।’ कोई सलाह दे रहा है,
‘घबराने से तो कार्य चलता नहीं।
धीरज-धीरज।’ वह बता रहा है। बता रहा है टेलीफोन से। नहीं यहीं बंगले के ताड़ वाले
पेड़ पर लटका देता साले को श्रीमान धीरज रखिए,
धीरज को।
हद है चेयरमैनी के चांस पर यह
बंगला कब तक कब्जे में रहेगा भाई। बंगले को रोकने ही के लिए सही मंत्री पद तो
अवश्य। अवश्य। नहीं तो असंतुष्टई से काम नहीं चलने वाला। ई कला साहित्य तो है नहीं
कि राग रचना है, रचना
करनी है। राजनीति है, राजनीति।
राज करना है, रचना
नहीं। रचना ही जो कुछ है तो ब्यूह कि मुख्यमंत्री साला फंसे, चाहे मरे।
दिल्ली से आई सूची में हम को भी समझ ले। समझ ले नहीं साले की ख़ैर नहीं। स्कूप पर
स्कूप प्लांट करूंगा। साला पट्ट हो जाएगा। और जो पट जाए तो बात ही क्या। हम मंत्री
ऊ मुख्यमंत्री। फीता उहो काटेगा और हम भी। ऊ बड़ा फीता, हम थोड़ा
छोटा। अध्यक्षता हम, उद्घाटन
ऊ। पत्थर पर नाम दोनों का। कमीशन उस का,
टेंडर हमारा। बंगला हमारा। नहीं
तो झेलेगा साला बाउंस हमारा।
विधायक जी सोच रहे हैं। सोच रहे
हैं और विधान सभा जा रहे हैं। विचार यह भी गूढ़ है कि वह पहले सदन में जाएं कि
एनेक्सी में ही मुख्यमंत्री को नमस्कार कर लें। और जो मुख्यमंत्री विधान सभा में
हुए तो ? हुंह
! वहां कौन क्या करेगा। ऊ तो साला बजट बड़बड़ाएगा। बड़बड़ाएगा बढ़िया बजट। बढ़िया
मंत्रिमंडल नहीं बताएगा। हम जो नहीं हैं मंत्रिपरिषद में। तो मंत्री तो बनना ही
पड़ेगा। बढ़िया मंत्रिमंडल सदन में कह सकें मुख्यमंत्री, सो शपथ तो
स्वीकारनी ही पड़ेगी। पर क्या स्वीकारेंगे वह भी मुझे मंत्री परिषद में ? महामहिम की
शपथ वाली सूची में नाम होगा हमारा ?
कट तो नहीं जाएगा जातियों, घटकों के
गठजोड़ में। गांठ नहीं पड़ जाएगी। इस से तो अच्छा होता संसद की ही सीट लड़वाए होते।
ऐसे ही मारे-मारे फिरते रहते। पी॰ एम॰ हाऊस से फोन आता, ‘पी॰ एम॰
मिलना चाहते हैं।’ वह सोचते हैं और जोड़ते हैं,
‘पी॰ एम॰ भोज भी तो देते रहते हैं।
और यहां ?’
यहां तो खुद ही चौखटा दिखाओ। दांत
निपोरो। चले आओ। वहां फोन आता है, ‘पी॰ एम॰ मिलना चाहते हैं। यहां हमहीं फोन करते हैं, ‘हम मिलना
चाहते हैं।’ ससुरा कोई सुनगुने नहीं देता है।
उल्लू का पट्ठा साला।
वह सोच रहे हैं। सोच रहे हैं कि
जब खुद मुख्यमंत्री बन जाएंगे तो सभी विधायकों को फोन पर खुद बताया करेंगे, ‘हम मिलना
चाहते हैं।’
पर कब होंगे मुख्यमंत्री ?
‘अभी
तो मंत्री पद ही में मार-पीट पसारे पड़े हैं ससुरे जाहिल।’ वह ख़ुद ही से कहते हैं।
देह और राजनीति के दोआबे का यह
निवासी नत है मंत्री पद के आगे। और देह की दाहकता में दग्ध गायिका बालिका ? उस का तो मन
तीर बन गया है और देह धनुष। धनुष सी खिंच गई है वह। पर तीर है कि चल नहीं रहा है।
सध नहीं रहा है। वह साध्वी भी तो नहीं है कि सध ही जाए। वह तो तीर भी है, धनुष भी, खुद में ही
बिंधी हुई, विंध्याचल
बनी खुद को बेधती हुई। बिदकती हुई। देह तृष्णा में निष्णात। नैवेद्य बन कर वह चढ़ना
चाहती है किसी पुरुष रथ पर। पूरे मनोयोग से हांकना चाहती है वह पुरुष रथ ! रथ के
रंज वह खुशी के रंग में डुबो देना चाहती है। रंग ही देना चाहती है कबीर के
रंगरेजवा की तरह। बीन ही देना चाहती है प्यार की झीनी-झीनी चदरिया। फिर वह ख़ुद ही
से पूछ भी लेती है, ‘कहीं’
देह की तो नहीं ?’
नहीं।
वह झीनी-झीनी बीनी चदरिया
गुनगुनाती है बिलकुल मन के स्तर पर। फिर बुदबुदाती है। रंगरेजवा से रंगवानी तो
पड़ेगी। और जो कहीं रंग सुर्ख़ चटक हुआ तो देह पर जरा देर डाल लेगी तो कबीर का क्या
बिगड़ जाएगा। देह के किसी पोर का चोर उस के मन की कोर क्यों रह-रह चीर देता है।
चीरता रहता है। देह भी धागा क्यों नहीं बन जाती,
बन जाती तो तन मन दोनों ही बीन
डालती। वह गुनगुनाती जा रही है, ‘झीनी-झीनी’ बिलकुल ‘झनक-झनक’ की तर्ज् पर, ‘झनक झनक
तोरी बाजे पायलिया।’ उस का संत्रास ही यही है कि वह बाजती नहीं है। उस की देह में
संगीत के सुर क्यों नहीं फूटते। क्यों नहीं रिझते उस के मन के फूल देह के भगोने
में। आकुल मन, व्याकुल
तन के तार क्यों नहीं एकमेव बन लेते ?
शार्ट शर्किट का ख़तरा है क्या ? इस लिए? पर हियरा
में क्या कम आग लगी है जो शार्ट शर्किट का डर दबोचे बैठा है। तो क्या राजनीति और
देह के तारों में शार्ट शर्किट के योग नहीं बनते ?
बनते तो वह विधायक कैसे बनता।
बनता कैसे कारपोरेशन चेयरमैन। पर मंत्री क्यों नहीं बन पा रहा ? क्या शार्ट
शर्किट हो गया है। देह और राजनीति का द्वंद्व मुखर हो गया है ?
शायद नहीं।
यह तो अपने मन को समझाने की बात
करती है तू। ‘झीनी-झीनी’ भी ‘झनक-झनक’ में झाड़ देती है। झाड़ देना चाहती है
‘झीनी-झीनी।’ मिल वाली चदरिया ज्यादा मुफीद पड़ने लगी है। तो यह गायकी और जीवन का
गैप भर नहीं है। यथार्थ है यह। झीनी-झीनी गाने के लिए ठीक है पर बिछाने-ओढ़ने के
लिए मिल वाली ही ठीक है। चदरिया !
पर झीनी-झीनी अकारथ में तो नहीं
गाती वह। देह और मन के तार ही नहीं झुलसाती। झुलसती देह को शांति मिलती है
‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ गा कर। पर यहीं वह बेबस भी हो जाती है। निर्वस्त्र बेबसी।
झुलसती देह फिर सुलग जाती है। कबीर भी तो भगवान ही से मिलने के लिए यह गाते बजाते, बताते थे।
पर तू किस से मिलना चाहती है ?
किसी पुरुष रथ से ?
पुरुष रथ, जिस के तार
इतने दग्ध हों और खुले कि शार्ट शर्किट हो जाए। शार्ट शर्किट हो जाए और आग लग जाए।
आग इतनी लग जाए की भीतर की आग समाहित हो जाए। और हांक दे पुरुष रथ। शांत हो जाए तन
भी, मन
भी। फिर चलें कबीर साहब के दरबार में ‘झनक-झनक’ को झटक कर। झीनी-झीनी को बीन कर।
कहें कि चल कबीर चलें भगवान के पास,
तेरे साहिब के पास, तेरे
राम-रहीम के पास।
पर कबीर काहें जल रहा है ?
कबीर भी जल रहा है। यह सोच कर वह
उन्मादित हो जाती है, क्या
मुझे पाने के लिए ? कि
अपनी मां की मर्दित देह का भाष्य जानने ख़ातिर जल रहा है, जला रहा है
पूरी दुनिया को। भाष्य भाखता है भगवान का साहिब का,
भूख भाखता है देह का, पेट का और
पावन बन जाता है। भूल जाता है किसी देह की आग ने,
किसी शार्ट शर्किट ने ही उसे जना
था और जनाजा निकाल दिया था तालाब में। लहरतारा के तालाब में।
पर क्या कबीर के पुरखों के जमाने
में भी शार्ट शर्किट होता था ? शार्ट शर्किट देह का। शार्ट शर्किट मन का, भगवान का, उन के भाष्य
का, स्त्री
की मर्दित भावनाओं का, पुरुष
जनित इच्छाओं, आकांक्षाओं
और आह्लादित अत्याचारों का। चरम पर पहुंची देह के दुआबे का, किसी घर के
दरवाजे का, किसी
रथ के पहचाने जाने का, पस्त
पर मुकम्मल बयान। बयान देह की भट्ठी का। बयान मन के मुर्छाने, फिर मर जाने
का। तब स्वर फूटता है, ‘झीनी-झीनी
बीनी चदरिया।’ फिर कथा शुरू होती है मन के चरम,
मन के मरम को भरमने भरमाने की।
मन का वह अपरिभाषित तार फिर भी
अपरिभाषित रहता है, भाष्य
नहीं मिलता। मिलती है तो गूंज।
उस तार की गूंज जो मन में बाजता
है, देह
में कौंधता है, काटता
है शार्ट शर्किट। काट देता है शार्ट शर्किट। पर वह अपरिभाषित तार राजनीति के
तंतुओं में क्यों नहीं जीता। क्यों नहीं जागता राजनीति की उन दग्ध शिराओं में जो
देश को देह बना मुख मैथुन में रत हैं। रत हैं रतजगे के रंग और राग में। रात जगते
हैं, दिन
जागते हैं। तो सोते कब हैं ? वह पूछती है। फिर ख़ुद बताती है सुबह। सुबह मुंह बाए।’
क्या किसी महिला मुंह की आस में ?
नहीं।
मंत्री पद की आस में।
रोज ही थोड़े महिला मुंह की मार
बर्दाश्त है इन्हें। यह तो शगल है। शतरंज है। शह और मात है। देह के दंगल का एक
दांव है।
पर मंत्री पद ?
मंत्री पद तो बिसात है। देश को
देह में बदलने की बिसात। देह के देश में विचरने की बिसात। इन्हें महिला मुंह नहीं, अब देश का
मुंह चाहिए मुख मैथुन ख़ातिर। योजनाओं,
उद्घाटनों से, ठेकों, सूखा और बाढ़
से बजबजाता मुंह।
उस की देह पर एक दाना है।
अकस्मात उग आया है यह दाना। कहीं
उसे एड्स तो नहीं हो गया ? जाने
कितनी पामेलाओं का मुंह भोगता आता है घर,
अबलाओं के देह भोगता आता है घर, घर जिस में
हम को बांधता है। देह को साधता है,
गोया देह सुख नहीं घुड़सवारी सुख
में हांफा जा रहा हो। हां, घुड़सवारी
देह पर, मेरी
देह पर, देह
की एक-एक पोर, एक-एक
छोर पर नीला, काला
आसमान रचता हुआ। स्त्री रथ हांकता हुआ। पुरुष रथ मैं नहीं हांक पाती और वह मुंह बा
जाता। राजनीति और देह के दोआबा का यह दुभाषिया,
मेरी देह की भाषा नहीं बांच पाता।
लिखित शब्दों को भी वह मुश्किल ही से बांचता है। यह तो फिर भी देह की भाषा है, देह की भूख
की नहीं देह संगीत की भाषा। और इस ही का कोई भाष्य नहीं है उस पुरुष रथ के पास।
झीनी-झीनी बीनी नहीं बांच पाता। बांचना नहीं जानता,
कि बांचना नहीं चाहता। उस का
चातुर्य कुछ समझने नहीं देता उसे। उस की गायकी उसे गाने नहीं देती। मन भरमाने नहीं
देता कि, ‘वादियों
में खो जाएं हम तुम।’ ‘देह की वादियों में कि देह संगीत की वादियों में ?’ वह पूछती है
खुद से।
यह भी कहीं अपरिभाषित है। उस तार
की तरह जो शार्ट शर्किट के शोर में सन्न कर देता है। पर यह भी क्यों होता है कि आग
कैसे भी लगी हो आंख मूंद कर बता देते हैं,
‘शार्ट शर्किट से।’ जिन तारों में
करंट ही न हो वहां भी शार्ट शर्किट कैसे हो जाता है और जहां तार भी न हो वहां भी
कैसे शार्ट शार्किट हो जाता है। यह भी अबूझ परिभाषा है, पहेली है, अकेली
अकुलाई है। औंधे गिर पड़ी है बरास्ता शार्ट शर्किट।
शार्ट शर्किट का संत्रास राजनीति
के बियाबान में भी बज रहा है। मुख्यमंत्री और उस के बीच जो पनप रहा है, अंकुआ रहा
है, असमय
पक रहा है, फसल
नहीं फोड़े की तरह। वह क्या है? शार्ट शर्किट ही तो है,
शार्ट कट से। पर शॉट लग गया है।
उस की देह की तरह उस की राजनीति भी धनुष हो गई है। पर लक्ष्य दो हैं। वह देह संगीत
साधना चाहती है, तीर
का भी संगीत साधना चाहती है। और यह मंत्री पद को बेध कर, भेद कर
बंधना चाहता है। लक्ष्य स्पष्ट है। यह अर्जुन है,
वह अर्जुन नहीं है। इस के पास
सुभद्रा, द्रौपदी, कृष्ण, गांडीव है, होम करने के
लिए अभिमन्यु है। और उस के पास ? द्रौपदी होती हुई भी सारे पांडव उस के पास नहीं हैं।
वह तो अर्जुन के पाश में बंधी बिंधी,
व्याकुल आकुल अपना एकांत, अपना सुख, अपना चैन चर
रही है। किसी मकलाई भैंस की तरह, किसी बउराए बांस की तरह, किसी शार्ट
शर्किट की तरह, किसी
बाल मुड़ाए श्रीमान की तरह। झीनी-झीनी की लगन,
झनक-झनक की राग और झटकार की तरह।
भटकाव को भेंट रही है, लगाव
को लपेटे, देह
को समेटे उस की दुनिया सिकुड़ रही है,
राजनीति में सिसक रही है, वह, उस की गायकी, ‘या कुंदेंदु
तुषार हार धवला, या
शुभ्र वस्त्रवृता या वीणा वरदंड मंडित करा या श्वेत पद्मासना....।’ वह नहीं उच्चार
रही है। वह नहीं गा रही है, ‘झीनी
रे झीनी बीनी चदरिया।’
नहीं गा रही है। पर जा रही है
अपने रंगरेजवा के पास। वह राज भवन जा रही है। सुर्ख चटक लाल बार्डर वाली क्रीम कलर
की उसी सिल्क साड़ी में। रंगरेजवा के पास। रंगरेजवा राजभवन में बैठा है। मंत्री पद
की शपथ स्वीकारने।
हां, देश अब देह
में तब्दील है।
और गायकी ?
कहा न अर्जुन वह है, यह नहीं। यह
मछली है, खौलते
कड़ाहे पर लटकने के लिए। द्रौपदी ख़ातिर लक्ष्य बन बिंध जाने के लिए। वह ही द्रौपदी
भी है, वह
ही देह, वह
ही देश है। वही मछली भी। लक्ष्य द्रौपदी ही थी,
मछली तो निशाना थी। वह मंत्री बन
गया है, उस
की द्रौपदी उसे मिल गई है। द्रौपदी,
जुए में हारने के लिए, महाभारत
जीतने के लिए। मछली तो मर गई है। पर द्रौपदी जिंदा है। देह, देश, द्रौपदी और
वह।
लेकिन देह का दंश ?
देह का दंश तो उसे अब भी डाहता
है। देह संगीत में उस का मन कहीं अब भी कुनमुनाता है, ‘देह सब जूठी
पड़ी है, प्राण
फिर भी अनछुए हैं’ के अर्थ में वह अब भी डोलती है। इस समारोह में, उस समारोह
में। पर अब वह गाती नहीं, गीत
सुनती है।
और संगीत ?
सिहर उठती है वह संगीत से।
वंदना गाती लड़कियों को देखते ही
वह डर जाती है कि बेचारी जाने किस आंख की यूरिया बन जाएं। बंध जाएं। भूल जाएं
संगीत, देह
संगीत, आत्मा
का गीत और उस से प्रीति करना भूल जाएं। देह डोले,
देह संगीत बोले। आकुल व्याकुल
अपने ही को बिसारते। जैसे मैं जी रही हूं। हुंह ! जी रही हूं ! जी रही हूं और फीते
काट रही हूं। पुरस्कार बांट रही हूं। मुसकुराती हुई। आज फोटो छपी है अख़बार में।
समझ नहीं आता पुरस्कार बांट रही हूं कि खुद को बांट रही हूं। तो क्या मैं राजनीति
में जा रही हूं। मैं भी ?
मैं भी ?
राजनीति का रेशा रेशम तो नहीं ही
होता। खद्दर भी पैमाना नहीं। अब पैमाना है तो सिर्फ यह कि कौन किस के लिए कैसी
खंदक खोदता है। खोदने के नाम पर सिर्फ खरोंच भर मार पाने वाले बकचोंच नेताओं ही ने
नाश किया है राजरंग का? पर
राजनेताओं की नेत्रियों, पत्नियों, पुत्रों, पुत्रियों, पतियों, पति जनों की
पहचान किस वस्त्र में होती है ?
का फटहे वस्त्र में राज का रंग
समा पाता है। यह भी बता जाइए कि इन के वस्त्र इतने गमकते क्यों हैं। महकते क्यों
है ? भरमाने
के लिए कि भरमने के लिए। महकने के लिए,
मनाने के लिए कि किसी पर मर जाने
के लिए।
मर तो मैं भी रही हूं महक तो मैं
भी रहीं हूं मचल तो मैं भी रही हूं। प्यार में नहीं,
देह राग में नहीं, किसी
दुर्निवार अंगार में नहीं। मैं तो आकुल हूं कि मुख्य अतिथि हमारी ओर एक भरपूर नजर
डाल लें। मुख्य अतिथि बनवाया ही था मुख्यमंत्री जी को इसी लिए कि वह हमारी भी
उपस्थिति दर्ज कर लें। गलती बस यही हो गई,
मैं मंच पर बैठ गई। नीचे बैठना
चाहिए था। मंच पर वह पलट कर देखें भी तो कैसे। कैसे वह पूछें कि मैं कैसी हूं। पर
दांत निपोरे कलूटे भैंसे विधायक से तो वह पीछे पलट-पलट कर बतिया ले रहे हैं, उसे डांट भी
दे रहे हैं। और डांट खा कर भी वह कलमुहा खींसें निपोर रहा है। मैं सुन रही हूं
मुख्यमंत्री उस से दो बार कह चुके हैं,
बिलकुल दुत्कार कर कह चुके हैं, ‘नीचे चलो, बाद में
मिलना।’ पर वह है कि दो-तीन दरख्वास्तों पर अभी,
बिलकुल अभी आदेश पा लेना चाहता
है। चाहता है कि इंजीनियर वाले आवेदन का निपटारा तो अभी ही हो जाए। मुख्यमंत्री
उसे टटोलते हुए फुंफकारते भी हैं कि,
‘क्या एडवांस ले लिया है ?’ वह बता रहा
है, ‘जी
नहीं भाई साहब। यह तो ख़ास रिश्तेदार हैं।’
‘कितने
रिश्तेदार तुम्हारे इंजीनियर हैं ?’
मुख्यमंत्री उसे खा जाने वाली
नजरों से देखते हुए कहते हैं, ‘अभी परसों एक आई॰ ए॰ एस॰ को तुम रिश्तेदार बता रहे
थे। और वह दारोगा भी तुम्हारा रिश्तेदार ही है। जब इतने खाते-पीते रिश्तेदार हैं
तुम्हारे, फिर
भी तुम हरदम भुखाए रहते हो। काहें भाई। काहें।’ कहते जाते हैं मुख्यमंत्री और वह
हीहियाता जा रहा है। हिहिया रहा है,
रिरिया रहा है और आंख भी मार रहा
है। फोटोग्राफर को कि वह फोटो खींच ले। और मुख्यमंत्री के कान में निहुरे-निहुरे
घुसा जा रहा है। क्या सब लोग यह सब देख नहीं रहे हैं ? निश्चय ही
देख रहे होंगे।
पर मेरा सवाल तो यह नहीं है। मेरा
सवाल यह है कि मुख्यमंत्री हमारी ओर क्यों नहीं देख रहे हैं ? वह पछता रही
है कि कार्यक्रम की संचालिका ही बन गई होती तो अच्छा था। तब तो वह देख ही लेते।
देख लेते तो कुछ कहती। पर संचालिका का वजूद क्या उस के ‘वजन’ को सूट करता ? संचालिका तो
सलीका होती है, वजूद
नहीं, वजन
नहीं। पर एक वहम होती है वह जो हटाए नहीं हटती। माइक पर रहना उस की जरूरत नहीं
फितरत होती है। पर यह फितूर उस के दिमाग में फुसफुसा ही क्यों रहा है। फोड़ा क्यों
बना जा रहा है। मंच की गरिमा को क्या वह कोई गंध नहीं दे पा रही। कि वंदना गाने की
गमक उस में हिचकोले भर रही है। कि यूरिया बनने की लचक में वह लहराने को बेताब हो
रही है। तो क्या वह यूरिया होती, वह वंदना गायिकाओं के कोरस का प्रमुख स्वर होती तो
मुख्यमंत्री उस ओर, उस
की ओर निहारते। नहीं निहारते तब भी। वह कलूटा विधायक बेइज्जती की हद तक तब भी
लिपटता रहता उन से। तो ? क्या
वह इस विधायक को उतरवा दे मंच से। कि उस के लिए भी एक कुर्सी धरवा दे मंच पर।
उस ने सोचा।
सोचा और संयोजिका को संकेत दिया।
कुर्सी मंच पर अतिरिक्त लग गई। विधायक फिर भी नहीं बैठा। कहने पर भी नहीं बैठा। उस
के आवेदन पर आदेश नहीं हुए थे, मुख्यमंत्री के। मुख्यमंत्री और विधायक की इस मुहब्बत
में समूचा कल्चरल माहौल, एग्रीकल्चरल
बन गया था। पर मसला फिर भी जस का तस था. मुख्यमंत्री हमारी ओर नहीं देख रहे थे।
वहशते दिल, वहशी देह और
वायलिन सा वेग उसे जैसे हिला गया था। मुख्यमंत्री उठ खड़े हुए। भाषण दिया और जाने
लगे। मजलिस बिगड़ गई थी। वह लपकी। भारी स्तनों का जतन भूल गई और लपकी। मुसकान फेंकी
भरी-भरी। और बुदबुदाई, ‘शुक्रिया
! बहुत-बहुत शुक्रिया !’ वह शुक्रिया कह रही थी,
और देह पर अगल-बगल से भार बढ़ता जा
रहा था। पीछे नितंबों की ख़ैर नहीं थी। दबाव कुछ ज्यादा ही था। अशिष्ट और अर्थपूर्ण
दबाव। क्षण भर को वह तिलमिलाई पर बोल रही थी,
‘शुक्रिया !’
वह बिलबिलाई भी पर बोली, ‘बहुत-बहुत
शुक्रिया।’ उसे लगा जैसे वह नंगी ही आई है इस समारोह में। अपने इस नंगेपन का एहसास
अशिष्ट भीड़ के अर्थपूर्ण दबाव में वह नहीं जान पाई थी, भीड़ ने तो
बस यही जताया था कि अब उस की साड़ी खुल जाएगी,
केश छिटक जाएगा। पर नहीं खुली
साड़ी, केश
नहीं छिटके। वह ही छिटक गई मुख्यमंत्री के बगल से। भीड़ अपना काम कर रही थी और
मुख्यमंत्री भीड़ में अपना अर्थ बता रहे थे,
हाथ जोड़ रहे थे, हाथ उठा रहे
थे, हाथ
गिरा रहे थे। जब वह शुक्रिया कहती हुई उन की ओर लपकी थी तो उन के उठे हाथ ऊपर से
नीचे आ रहे थे। उस के उरोज उन की उंगलियों को छू गए कि उंगलियां उन की उस के
उरोजों पर अनायास ही पड़ गईं वह ठीक-ठीक समझ नहीं पाई। पर जब एकाधिक बार ऐसा हुआ तब
वह समझी कि सब कुछ अनायास ही नहीं घट रहा। अनायास के रंग में सायास उंगलियां घुली
मिली हैं। मुख्यमंत्री की उंगलियां उस के उरोजों को छू नहीं कुरेद रही थीं, खोद रही
थीं। जैसे कुछ हेर रही थीं। वह पीछे हटना चाहती थी। पर नितंबों पर भीड़, उरोजों पर
मुख्यमंत्री। मुश्किल में वह, अपमान की आंधी में बह रही थी, बिफर रही
थी।
मुख्यमंत्री मुसकुरा रहे थे। अपना
हाथ अब वह जांघों तक पहुंचा रहे थे,
फिरा रहे थे। भीड़ का भाड़ वह मेरी
जांघों ही पर जुगाड़ रहे थे।
वह अब धीरे, बहुत धीरे
चल रहे थे। एक हाथ हवा में दूसरी मेरी जांघों पर हिला रहे थे। दबाव जब ज्यादा
दरिद्र हो गया, देह
जब ज्यादा अपमानित हो गई और लगा कि भीड़ साड़ी खोले न खोले यह मुख्यमंत्री मेरा
पेटीकोट जरूर खोल देगा, मैं
छिटकी। उस की बगल से, बड़े
वेग से छिटकी। छिटकी तो छुटकारा मिला उन सर्पीले हाथों से। नगाड़ा बन गए नितंब पर
बढ़ते दबावों से। मुख्यमंत्री के साथ भीड़ भी आगे निकल गई थी। मैं ने देखा उस के
सर्पीले हाथ अब जुड़ गए थे।
पर देवी जी जब वह हाथ सर्पीले थे, आंखें इतनी
गिरी हुई थीं तो आख़िर आप दुबली ही क्यों हो रही थीं कि ‘मुख्यमंत्री हमारी ओर देख
नहीं रहे हैं ? क्या
तब के क्षणों में आप गीली थीं और अब के क्षणों में सूख गईं ?
भई वाह इतनी जल्दी राजनीति सीख
गईं ?
वह पूछ रही हैं अपने ही से किसी
पुरुष की तरह, किसी
लुकिंग लंदन, ताकिंग
टोकियो सी आंखों वाले पत्रकार, परिवार और आचार्य की तरह। वह मन ही मन मसोस रही हैं।
मसोस रही हैं कि काहें गाया था, ‘मोहिं चाकर राखो जी।’ मीरा का विष उस के गीतों को
सताता था, यह
तो वह जानती थी पर क्या जानती थी कि मीरा के गीत गाने वालियों को भी वह विष इस तरह, इस तरह
सताएगा। ‘मोहिं चाकर राखो जी !’ जो उस ने नहीं गाया होता तो शायद आज सा दरिद्र दिन
वह नहीं देखती, अपमान
की आंधी में वह इस तरह नहीं उजड़ती। नहीं उखड़ती इस तरह अपने ही ताने तंबुओं के
खंभों की तरह। रस्सियों से बंधे, जालियों में फंसे खंभों की तरह। वह भी खूंटा बन जाती, वह छोटा
खूंटा, बांस
का बना खूंटा जो तंबुओं का आधार होते हैं। आधारशिला बन जाते हैं तंबुओं के। तंबू
उखड़ता है तो वह भी उखाड़ लिए जाते हैं। छुट्टा नहीं छोड़ दिए जाते अपमानित होने के
लिए। अपमानित हो कर किसी को घाव देने के लिए। हरे बांस के खूंटे हों या सूखे बांस
के खूंटे, वह
चले जाते हैं अपने तंबुओं के साथ, अपने लंबुओं के साथ। वह घूम-घूम नहीं गाते, ‘मोहिं चाकर
राखो जी !’
तब जैसे मैं गाती थी, मीरा को
गुनगुनाती थी। मीरा के इसी गीत ने आज से दस बरस पहले मुझे इनाम दिलवाया था संगीत
नाटक अकादमी का। यही मुख्यमंत्री था तब के दिनों में भी। इन्हीं हाथों से पुरस्कार
पा पुलकित हो गई थी। उस पुलक का ही प्रताप था कि मंच पर बैठी बार-बार यही जोहती
रही कि, ‘मुख्यमंत्री
हमें देख लें।’ पहचान लें कि वही लड़की हूं,
‘मोहिं चाकर राखो जी’ को पूरी
तन्मयता के साथ जो कभी गाती थी, मीरा के इस विष बुझे गीत को पावन बनाती थी, पागल बना
देती थी, सुनने
वालों को, भक्ति
में भर देती थी, वही
लड़की हूं।
मुझे देखो और हलो कहो मुख्यमंत्री
! इसी आस में सुलगती रही कि, मुख्यमंत्री हमें क्यों नहीं देख रहे हैं ? क्या ख़बर थी
मुख्यमंत्री देख रहा है मुझे, मेरी देह
को देख रहा था। यूरिया, पोटाश, सल्फेट सब
फेंट रहा है, नहीं
देख रहा है उस लड़की को जिस को उस ने पुरस्कृत किया था। नहीं देख रहा है उस लड़की को
जिस से ‘मोहिं चाकर राखो जी’ सुन कर वह झूम गया था और अपने भाषण में इस का लालित्य
लटका गया था। वह लालित्य जिसे, इस औरत बन चुकी उस लड़की ने मन में कहीं टांक कर रखा
था, अभी-अभी
उधड़ गया है।
अभी, बिलकुल अभी
उस की सीवनें उधड़ी हैं। सर्पीले हाथों ने लाज के लालित्य को ललकार दिया है, दुत्कार
दिया है, ‘मोहिं
चाकर राखो जी’ के नेह और मनुहार को। देह के दारिद्रय में डुबो दिया है। लालित्य
गीत का, मन
का, गीत
और मीरा का, मीरा
के विष का, भक्ति
का, उस
भाव को जो उस लड़की ने कभी भरा था, इस औरत ने जिसे अभी तक भर कर रखा था। अभी-अभी रीती है
उस की भक्ति। मुख्यमंत्री के सर्पीले हाथों ने उड़ेल दिया है विष उस के उरोजों पर, उस की
जांघों पर। यह विष मीरा के हिस्से का नहीं,
उसी के हिस्से का है। मीरा ने पी
लिया था तब, पर
वह नहीं पिएगी अब। इसी लिए वह छिटक गई है। विष को बटोरे छिटक गई है। भीड़ छंट गई
है। पर बाकी भीड़ भी सनकी हुई है।
क्या यह सनक सेंट की है, संकोच की है, इस शहर की
है, कि
शेम-शेम की।
शेम-शेम की इस राजनीति के कोलाज
कई हैं। कोई कोलंबस भी कंप्यूटर ले कर लग जाए,
इन सारे कोलाजों का ब्यौरा नहीं
ढूंढ सकेगा। अगर ढूंढ़ लिया तो समझिए कि वह कोलाज शेम-शेम की राजनीति के असली कोलाज
नहीं हैं। वह कोलाज जो कोलबंस ने ढूंढे़ हैं। दरअसल राजनीतिज्ञों के ही कुछ धड़ों
ने उन्हें इस लिए थमा दिए हैं कि कोलंबस का वर्चस्व बना रहे, उस की
बेइज्जती नहीं हो, रोटी
दाल उस की चलती रहे सो कुछ ‘सो-सो’ वाले कोलाज थमा दिए महोदय कोलंबस को कि तीसरी
दुनिया तो आप ने खोजी थी, अब
लीजिए भोगिए चौथी दुनिया। चौथी दुनिया और उस के कोलाज। हम तो नाम कमा रहे हैं आप
भी नाम कमाइए। स्कूप मार कर, एक्सक्लिसिव मान कर।
सक्सेना साहब आज ऐसा ही एक
एक्सक्लिसिव पा कर लौटे हैं। फोटो भी उन को फीड है पर संपादक थोड़ा घबरा रहे हैं।
बता रहे हैं कि, ‘मसला
पॉलिटिकल है। तो भइया सक्सेना सोच समझ कर।’ ‘नहीं भाई साहब। स्टोरी न भी जाए तो
फोटो कैप्शन से ही काम चल क्या पूरा-पूरा बन रहा है।’ जोड़ रहे हैं जनाब माथुर और
सक्सेना की काट रहे हैं, उन
की स्टोरी साफ कर रहे हैं। मकसद माथुर का इस स्टोरी ही को रोकना है। फोटो तो वह भी
जानते हैं, छपने
वाली नहीं है। जो अख़बार माताएं बहनें पढ़ती हैं उस में जो ऐसी फोटो छपी तो अनर्थ
नहीं हो जाएगा ? माथुर
यह जानते हैं सो संपादक साले की पिद्दी सोच में इस फोटो ही को फ्लैश करना है, इस फोटो को
ही बार-बार फीड करना है ताकि उसे लगे कि यह ख़बर नहीं है, ख़बर से
ज्यादा नारी जाति का अपमान है और फिर इस से भी बढ़ कर जब सुबह-सुबह अख़बार घर में
पहुंचेगा, वह
कहीं बच्चों ही के हाथ पड़ गया तो ?
छोटी बहन देख ले तो ? और जो अम्मा
पिता जी देखेंगे तो वह क्या कहेंगे ?
संपादक ऐसे ही सोचता है। यह माथुर
को मालूम है कि संपादक साला ऐसे इफ बट में ही जीता है, मक्खनबाजों, महिलाओं और
दरबारियों में जीता है। ख़बर में नहीं। सरोकार ही नहीं हैं जब समझ से तो ख़बर की
खलिस का विस्तार वह क्या जाने ?
कैसे जाने भला ?
वह जानता है खुंदकी ख़बरों का
खुलासा। बशर्ते ख़बर की प्लांटिंग में वह भी इस्तेमाल हो। उस ख़बर से उसे सरोकार हो
जाता है। जहां स्कॉच, चिली
और उपहार का व्यवहार हो। व्यवहार हो दलाली की दाल में पत्थर पचाने का, संबंध कोयला
कराने का तो इस ख़बर से सरोकार है उसे। बुश कुवैत को ठढ़िया देने की ठौर में हैं, बेनजीर
बर्खास्त हो गई हैं। ऐसी ख़बरों का उसे वजन नहीं मालूम, इन का असर
नहीं मालूम। उस को यह भी नहीं मालूम पेरेज द क्वयार क्या कहते हैं, क्या करते
हैं। वह तो पूछता है ई पेरेज द क्वयार कौन है ?
बताने पर ‘अच्छा अच्छा वो है’
कहता हुआ कमीज के बटन पकड़ चल देगा। गोया पेरेज द क्वयार, उस के
क्लासफेलो रहे हों। फुटबाल को अंगरेजी में सॉकर कहते हैं उसे नहीं मालूम। वह तो
सासर कहता है। और इस अर्थ में कहता है जैसे खेल दुनिया में भी उस का ख़ासा दखल है !
हां, उस का इस
में दखल जरूर है कि फलां आई॰ ए॰ एस॰ की बेटी किस क्लास में किस नंबर से पास हो रही
है। और जाहिर है आई॰ ए॰ एस॰ की बेटी है तो वह टॉप भी करेगी ही। कैसे टॉप कर गई वह।
क्या बाप के असर से ? जी
हां, ऐसी
ख़बरें वह ख़ुद ब्रीफ करता है रिपोर्टरों को कि,
‘कैसे-कैसे’ ऐसे-ऐसे....हूं....।’
पर यह नहीं ब्रीफ करता कि इसी आई॰ ए॰ एस॰ ने पिछले साल पांच इंजीनियरों के तबादले
ख़ातिर इस की सिफारिश सिरे से ठुकरा दी थी। ठुकरा दी थी तो भुगत रहा है, चुका रहा है
पत्रकार से टकराने की कीमत। पत्रकार को यह भी पता लग गया है कि कैसे उस की बीवी ने
उस की कुर्सी का फायदा उठाया, संस्था बनाई और अनुदान झटक लिया। पचास हजार रुपए का
अनुदान। पत्रकार के पास ख़बर है और आई॰ ए॰ एस॰ के पास तबादले का पावर। मतलब दोनों
टक्कर में हैं एक-दूसरे से दोनों का अच्छा पाला पड़ा है। लगता यही है कि असर उस का
फिर काम आएगा और यह ख़बर रुकवा लेगा। आसार इस के भी बुरे नहीं है। लगता है
इंजीनियरों का तबादला हो जाएगा। तबादला हो जाएगा तो बयाना तो बच जाएगा। नहीं साले
जान खाए हुए हैं, ‘भाई
साहब, भाई
साहब। भाई साहब कुछ करिए।’
भाई साहब कुछ करना चाहते हैं। उस
फोटो का। फोटो जो सक्सेना लाए हैं,
भाई साहब पूछ रहे हैं, ‘कहां से मार
लाए सक्सेना साहब ?’ ‘बस
मिल गई भाई साहब।’ सक्सेना स्रोत बताने में संकोच खा रहे हैं। वह सोख लेते हैं
संपादक का सवाल, ‘बड़ी
मुश्किल से मिली है।’ वह जोड़ते हैं,
‘पी॰ एम॰ हाऊस भी भेजी गई है वहां
लोग देख सकते हैं तो हमारे पाठक क्यों नहीं देख सकते। क्यों नहीं देख सकते अपनी
निर्वाचित विधायिका की निर्वस्त्र देह,
दारू में धुत्त देह। जिसे वह आख़िर
कहीं तो दिखा ही रही हैं। दिखातीं नहीं तो फोटो कैसे खिंचती। बस फोटोग्राफर साला
चूतिया था। लगता है प्रोफेशनल नहीं था। विधायिका की टांगों में टंगा रह गया वह, उस का कैमरा, कैमरे का
लेंस। टांगें मुड़ी हुई, जांघें
खुली हुई। जांघों के बीच ठहरी हुई उस माया ही को समेटने में ही खर्च हो गया साला।
खर्च हो गई उस की फोटोग्राफी। नंग धड़ंग बेसुध पड़ी विधायिका के सिरहाने
एरिस्ट्रोकेट प्रीमियम की आधी ख़ाली पड़ी बोतल को फ्लैश करने में। क्लोज-अप वह
जांघों और जांघों के बीच बसे उस हिमालयी हिम टापू का ही लेता रह गया, गल गया उस
का कैमरा उस निर्वस्त्र बेशर्म, विधायिका की हिमालयी देह के गिरे तापमान में। भूल गया
कि इन जांघों का क्लोज-अप चेहरे के क्लोज-अप के साथ ही अर्थवान बनेगा। चेहरा
जांघों से भी ज्यादा स्पष्ट होना चाहिए था। पर वह तो साला चेहरे और जांघ का जैसे
कोलाज रच रहा था। फोटो स्कूप नहीं।
क्या वह जो आधी ख़ाली एरिस्टोक्रेट
प्रीमियम की बोतल माननीया विधायिका जी के सिरहाने पड़ी दीख रही है उस को ख़ाली करने
में यह फोटोग्राफर भी तो चीयर्स, चीयर्स नहीं कर गया था,
कि उस के कैमरे में जांघ समा गई, चेहरा कठिन
हो गया। कि उसे शर्म आ गई थी क्लिक करते हुए। कि नारी जाति के अपमान के बोध में
बंध गया था वह। या कि उस नारी देह को उसे भोगने नहीं दिया गया था। जांघों का क्लोज
अप बताता तो यही था कि इन जिन जाघों को वह देह से नहीं भोग पाया उसे और उसी देह की
जांघ को वह कैमरे से भोग रहा है। भोग रहा है एक क्लिक में।
पर क्या एक ही क्लिक में वह फोटो
फिनिश कर पाया होगा ?
या कि उसे जल्दी थी, कि फोटो
जल्दी करो, कहीं
होश में न आ जाएं माननीया विधायिका। और वह चेहरे का चिन्ह नहीं ले पाया क्लोज-अप
में। बिलकुल अंगूठे की तरह क्लोज शॉट नहीं हो पाया,
लांग शॉट हो गया चेहरे का किसी
दस्तख़त की तरह। दस्तख़त जो वह विधायिका जी की देह पर नहीं कर पाया अपने पौरुष, अपनी भूख, अपनी वहशी
देह की दस्तख़त। आंखों की सिगनेचर से ही उसे बस करना पड़ा, कैमरे की
आंख से वह भी। नहीं आंखों की दस्तख़त तो जब तब जो जब चाहे जिस पर कर ले। इस पर कोई
संवैधानिक बंधन नहीं, कानूनी
बंधन नहीं, सामाजिक
बंधन भी बह ही जाते हैं। आंखों, की दस्तख़त,
आंखों की मुहर में। पर आंखों की
दस्तख़त निर्वस्त्र देहों पर भी कभी कारगर कहां होती है। आंख तो तब जब देह पर
वस्त्र पड़े, हां, तब ही
दस्तख़त का सुकून पाती है, संयम
सोचती है तब देह, जब
उस देह पर भी वस्त्र हो। पर जब निर्वस्त्र हो वह देह तब यह भुखाई देह भी दस्तख़त की
दरख़्वास्त देती है, दस्तक
दे देती है उस देह पर। दहकती देह पर मेह बरसा देती है।
और इन विधायिका जी की भी देह तो
निर्वस्त्र थी। वश में ही नहीं थीं वह,
उन की वहशी देह। उस वहशी देह को
फोटोग्राफर भी जो अपने वहशीपन से नहला देता तो विधायिका जी का क्या बिगड़ जाता।
बिगड़ जाता तो वह जांघ खोले, टांग
मोड़े एक ख़ास एंगिल में, आमंत्रित
सी करती वह उन की देह, उन
का जंघा प्रदेश पुकार क्यों रहा था ?
लेकिन अगर फोटोग्राफर भी वहां उस
कमरे में फागुन हो गया होता, गीला हो गया होता तो विधायिका जी का बिगड़ जाता थोड़ा
बहुत। जांघों को, उन
के जंघा प्रदेश को भोगने के बाद जांघ को ही सिर्फ क्लोज शॉट में नहीं भरता चेहरे
का भी क्लोज-अप कर लेता वह फोटोग्राफर। जांघ ही और जांघ का बीच ही उस की आंख में
उस के कैमरे में नहीं उतरती। नहीं उतरता विधायिका जी का छितराया हुआ छाते सा तना
हुआ जंघा प्रदेश उस के कैमरे में, इस फोटो में,
हो यह भी सकता था कि विधायिका जी
की देह भोगने के बाद वह कुछ सहज हो जाता और एक सामान्य सी, सपाट सी
फोटो मार देता। जंघा प्रदेश ही नहीं गूंजता उस के कैमरे में और वह फोटो इतनी विराट
नहीं बन पाई होती। हो यह भी सकता था कि ‘कृतज्ञता वश’ वह यह फोटो ही नहीं खींचता !
लेकिन क्या पता फोटो खींचने के
बाद, कैमरे
की किन्हीं छोटी सी क्लिक के बाद फोटोग्राफर ने जगा दिया हो उन अलमस्त सोई हुई, छाते की तरह
तनी हुई जांघों को। विधायिका जी की जांघों को जगा दिया हो। जाघों में बसे उस
महादेश को जगा दिया हो, नाप
ली हो उस की गहराई, भिगो
दिया हो वह समुद्र तल मेघों की फुहार से,
वहशी देह से, वहशी मेह को
मिला दिया हो, ‘गा
दिया हो, नदी
मिले सागर से’, गुनगुना
दिया हो, ‘कोई
जाने ना।’
यह और ऐसी सारी संभावनाओं पर सिरे
से सोचे जा रहे हैं। बंधू सक्सेना,
रिपोर्टर सक्सेना, बुद्धू
सक्सेना कि, यह
होता तो ऐसे होता, ऐसे
नहीं होता तो कैसे होता।
और वह जो विधायिका ही नहीं होतीं
तो ?
और फोटोग्राफर ?
फोटोग्राफर जो वह नहीं होता तो
कोई और होता और रिपोर्टर जो मैं नहीं होता तो कोई और होता।
कहीं ऐसा तो नहीं और भी
रिपोर्टरों को यह फोटो फीड हुई हो ?
सक्सेना सोचते हैं।
सक्सेना फिर फोटोग्राफर की सोचते
हैं कि कहीं फोटो देने ही वाला फोटोग्राफर भी नहीं है ? नहीं फोटो
इतनी कच्ची नहीं होती। वह विचार रहे हैं कि मौके पर इस देह विरुदावली की, इस देह गाथा
की, इस
देह भाषा का भाष्य लिखने के लिए, रिपोर्टिंग करने के लिए सच को सच कहने के लिए वह भी
वहां क्यों नहीं थे ?
वह विचार रहे हैं इस संभावना पर
भी कि कहीं यह फोटो पुरानी तो नहीं है। यह देह जब विधायिका नहीं बनी थी, जब और जवान
थी और महान थी, तब
की तो फोटो नहीं है यह। सत्ता का स्वाद चखने के बाद कुछ शऊर तो आ ही जाता है, देह को भी, नारी देह को
भी। क्यों कि नेह तो चुक ही जाता है न?
राजरंग सोख लेता है नेह। बाकी रह
जाता है सिर्फ मेह जो कभी कभार देह में बरसता है,
कभी देह पर बरसता है। सड़क भींज
जाती है, ख़बरें
भींज जाती हैं इतनी कि छप नहीं पाती हैं। क्या तो गीली-पीली हैं।
गीली हो कर भी नहीं भींजती देह।
काहें कि देह से नेह ख़ारिज है। मेह से नेह भाग गया है। कि बिला गया है। कि सड़क
भींज जाती है, ख़बर
भींज जाती है, देह
नहीं भींजती। नहीं भींजती।
क्यों नहीं भींजती ?
सोच-सोच कर आंखें मींच लेते हैं
सक्सेना। रिपोर्टर सक्सेना। वह सब सोचते हैं,
सारा पक्ष सोच लेते हैं। नहीं सोच
पाते तो सिर्फ अपना पक्ष कि वह यह फोटो ले ही क्यों आए ? ले ही आए जो
फोटो तो ख़बर लिखने ही पर क्यों आमादा हैं। आमादा क्यों हैं कि यह फोटो छपे ही।
क्या सिर्फ इस लिए कि फोटो देने वाले को वह वादा दे आए हैं कि, ‘जरूर
छपेगी।’ जब कि देने वाला भी कह रहा था,
जोर दे-दे कर कह रहा था कि, ‘नहीं छपेगी।
नहीं छाप पाएंगे बंधु सक्सेना। यह फोटो नहीं छाप पाएंगे आप। आप के अख़बारों में दम
ही नहीं है। लंदन के अख़बार ही छाप सकते हैं यह स्कूप। हमारे अख़बार आजाद नहीं हैं।’
वह कहता रहा सक्सेना से कि, ‘पामेला
के संबंध जो हिंदुस्तानी नेताओं से रहे होते तो क्या वह यहां ठीक वैसे ही कह सकती
थी कि, ‘संसद
हिला दूंगी, सरकार
गिरा दूंगी।’ अरे नौबत ही नहीं आती हिंदुस्तान में। पहले ख़बर छपी तब पामेला बोली, ‘हिला
दूंगी।’
वह कहता रहा, ‘यहां ख़बर ही
नहीं छपती। वह संसद क्या हिलाती, सरकार क्या खा कर गिराने को बोलती बंधु। बोलिए बंधु
सक्सेना। यहां तो पामेला को पामेला बनने के लिए परदेस जाना पड़ता है। पामेला सिंह
से पामेला बोर्डस बनना पड़ता है तब बनती है पामेला।’ ‘क्यों ?’ ‘क्यों कि
यहां तो प्रेस को बात-बात में सुबूत चाहिए। गोया अख़बार नहीं कचहरी हो। लीजिए दे
रहा हूं सुबूत भी। पर जानता हूं नहीं छपेगी फिर भी यह फोटो। सत्ता के सिरहाने
डोलने वाली है यह विधायिका।’ उस ने जोड़ा,
‘समझे के नहीं बंधु।’
सक्सेना बुदबुदा देते हैं, ‘छपेगी भाई
साहब। जरूर छपेगी।’
सक्सेना अपना वादा विचार रहे हैं।
विचार रहे हैं एक बार फिर कि कहीं यह फोटो विधायिका बनने के पहले की तो नहीं है ? हो सकता है
विधान सभा का टिकट पाने के लिए बेचारी इस लाचारगी में लटक गई हो, फोटो खिंच
गई हो। क्या पता। कुछ भी हो सकता है। सत्ता के गलियारे में कुछ भी गूंज सकता है
जैसे उस की देह कैमरे में गूंज गई है। गूंज गया है विधायिका की देह में कैमरा। कि
कैमरे में कूद गई है माननीया की देह।
विचार रहे हैं सक्सेना। फोटो
फिर-फिर देख रहे हैं। वह देख रहे हैं। एरिस्टोक्रेट प्रीमियम बोतल के बगल में रखा
फोन, फर्नीचर
और कमरे का रंग। कि है तो विधायक निवास ही का कमरा। वही सज्जा है, वही फर्नीचर
है। वैसे ही मेज पर फोन रखा है जैसे विधायक निवासों के कमरों में मेज पर फोन होता
है। है तो विधायक निवास ही। बस फोन के बगल में एरिस्टोक्रेट की बोतल ऐसे आधी ख़ाली
पड़ी नहीं होती। वह विचार रहे हैं। पर यह भी कि ऐसी निर्वस्त्र और धुत देह क्या
होती है कैमरे के सामने विधायक निवासों में ?
होती होगी।
आख़िर विधायक निवास है।
यह विचारते ही उन्हें ख़बर का
इंट्रो भी मिल गया है। हेडिंग भी और ख़बर का वजन भी,
‘मंत्री बनने के लिए देह दान।’
बिलकुल सात्विक शीर्षक। फोटो कैप्शन पर सिर्फ वह एक टिप्पणी जड़ना चाहते हैं। क्या
लिखें, ‘देह
दुर्दशा, देह
अपमान, देह
दरिंदगी कि देह की दरिद्रता ?’ वह विचार रहे हैं और बुदबुदा रहे हैं, नहीं कैप्शन
भी सात्विक ही चाहिए। नहीं बिना कैप्शन के ही फोटो फहरा देंगे। पर पहली चिंता अब
भी जस की तस है, ‘फोटो
छप जाएगी कल ?’ और
फोटो नहीं छपेगी तो ख़बर का क्या ठिकाना ?
भाई साहब यह भी रोक दें। चपरासी
बता भी रहा है कि, ‘संपादक
जी बुला रहे हैं।’
सक्सेना सीट से उठ रहे हैं और सोच
रहे हैं, ‘ख़बर
तो लगता है मर गई है।’ वह ख़ुद ही को टोकते है बुदबुदाते हैं, ‘नहीं, ख़बर मर रही
है।’ पर क्यों मर रही है ख़बर !
किसी खोज में, किसी की ख़ैर
में कि किसी खुन्नस में ?
खुन्नस ही में हैं मुख्यमंत्री
भी। रात का यह रंग उन्हें उकता-उकता रहा है। वह भोज में हैं पर बिस्तर का ‘व्यसन’
उन्हें बौराए हुए है। वह बिगड़े पड़े हैं कुछ अधिकारियों पर। जिस-तिस को वह डपट रहे
हैं। वह बउराए हुए हैं। वह बउराए हुए हैं कि बाउंसर बाउंस हो गया है। उस की देह
गंध अभी भी उन के नथुनों में फुरक रही है। वह सोच रहे हैं एक छींक ही आ जाती कि यह
गंध, उस
गदराई देह की गंध गुजर जाती इन नथुनों से जो बस गई है, कहीं बिसर
जाती। वह अमराई जो उन के दिल में, उन की देह में अंकुआई थी अभी-अभी इसी शाम, जिस यौवना
की अंगड़ाई में वह अलसाए थे इस शाम,
जिस ने बार-बार उन की ओर कातर
निगाहों से निहारा था, निहुरे-निहुरे
उन के मन का महुआ बीना था, इसी
शाम उसी बाला के बालों में तो वह आज समाना चाहते थे।
वह नहाना चाहते थे उस के साथ आज
रात बाथ टब में। ठीक वैसे ही जैसे बिल क्लिंटन सारी सुरक्षा को धता बताते हुए रात
के अंधरे में अपनी पत्नी को ले कर उतर गए थे स्वीमिंग पूल में। वह भरना चाहते थे, साबुनी
झागों के झकोरों सहित उसे अपनी बाहों में,
बाहों में भर कर उसे चूमना चाहते
थे फेनिल जल में। बाथ टब के जल में। फेनिल जल में जल तरंग बजाना चाहते थे उस की
देह पर। देह की पोर-पोर पर। जल तरंग। बज जो जाता जल तरंग तो वह उसे कुछ तो अर्पित
कर ही देते। किसी कारपोरेशन की चेयरमैनी। किसी कमेटी में डाल देते। परदेस घुमवा
देते। कहती तो आई॰ ए॰ एस॰ नामनी करवा देते। विधान परिषद में बइठवा देते।
परफार्मेंस ठीक देती तो मंत्री भी।
पर कैसे भाई ?
वह तो मन ही मार गई। अब कोई लौंडे
तो हैं नहीं कि आप छिटकीं, छमक
कर छिटकीं तो हम भी कदमताल कर लें। भीड़ को भाड़ में डालें छौंक दें अपनी कुर्सी, होम कर दें
सत्ता फिर आप की देह तापें, आप
को जापें। नहीं भाई नहीं। हमारी भी एक मर्यादा है !
हम कैसे क्या करें ?
अउर जो इतने सती साध्वी थीं तो
मंच पर बइठे-बइठे काहें सनका रहीं थीं। किसी बिरहिणी सी आंखों की कोटरें काहें
बा-बा बो रही थीं, तन
मन में आग। हम तो अपने कलुआ विधायक से बतिया रहे थे। आप ही ने कुर्सी लगवाई, मैं देख रहा
था। आप के उठते-बैठते उरोजों को भी देख रहा था। साफ देख रहा था आप का निमंत्रण।
महुए सा महकता निमंत्रण, पलाश
सा दहकता निमंत्रण, बेला, चमेली, रात रानी सा
खिलता महकता निमंत्रण। आम की बौरों को देख कर हमारा जी भी जो बउरा गया तो मेरा
क्या कुसूर। मैं तो फिर भी जबह किए रहा अपने जंगल को, अपने जंगल
की आग को। पर देवी जी आप दौड़ी आईं॰ हांफती-डांफती हुई आईं तो किस हनक में आईं ?
सिर्फ शुक्रिया का शहद चटाने ?
कि देह की हनक में, शहद से मीठे
होंठों का हठ तोड़ने आई थीं। तोड़ने आई थीं भरी भीड़ में मेरा भरोसा, अपनी कोपलों
सी नर्म बांहों में आख़िर क्या भरने आप दौड़ी भागती आई थीं। मेरे हाथ जब कुनमुनाए
तभी क्यों नहीं छिटक गईं आप। तब तो मैं ने देखा आप सिहर रही थीं। सिहर रही थीं आप
तब भी, जब
मैं ने आप के कटि प्रदेश का स्पर्श किया। आप के स्पर्श सुख का शहद सोखते हुए एक
बार मैं ने अपनी गरिमा को भी गरल की भेंट कर दिया। नहीं परवाह की जनता जनार्दन की, नहीं परवाह
की पास भटक रहे कैमरा साधे फोटोग्राफरों,
पत्रकारों और टी॰वी॰ वीडियो वालों
की। पर आप तो ऐसे छिटकीं कि जैसे किसी बिछुआ का डंक लगा हो, किसी सर्प
का दंश चढ़ा हो, ऐसे
छिटक गईं कि पांव शोलों पर चढ़ गए हों। छिटक गईं और हमें छितरा गईं। मेरा दिल धक रह
गया। भला हो भीड़ का जो मर्यादा बचा ली। नहीं मुझे तो ले ही डूबी हैं, मेरी जीवन
भर की कमाई भी ले डूबतीं आप। फिर क्या आप को ले कर माला जपता। और आप फिर भी कह
पातीं, ‘शुक्रिया’
उसी तरह हाफंती-डांफती, देह
में डंक मारती, आंखों
में नहीं बांहों और जांघों में आग लिए अकुलाती दौड़ती आतीं मुझे व्याकुल बनाने ? वइसे ही
मछली सी तड़फड़ाती आतीं भला मुझ से मछुआरे के मन के द्वार, तन के तार
बजाने।
देह गीत गाने।
गाती जैसे गिरिजा देवी गाती हैं, ‘सेजिया चढ़त
डर लागे।’ वही खटका, वही
मुरकी देतीं, मन
को भी, जो
गिरिजा देवी पंडित हनुमान प्रसाद मिश्रा के साथ जुगलबंदी में देती हैं। मिश्रा जी
की सारंगी और गिरिजा देवी के गायन की जुगलबंदी। जुगलबंदी चल रही है....डर
लागे....लागे डर लागे....डर लागे.... सेजिया चढ़त....चढ़त डर लागे ला....गे। सेजिया
चढ़त डर लागे।’....सेजिया चढ़त डर लागे। पंडित जी मगन हैं। मगन हैं गिरिजा देवी की
मुरकियों पर। पर मुख्यमंत्री जी ?
मुख्यमंत्री जी भी आलाप रहे हैं, अमवा
बउरेलैं। पिया नाहीं अइलैं, नाहीं
अइलैं हो रामा....अमवा बउरलैं।’ वह आलाप रहे हैं। बिना लय ताल, बिना खटके
मुरकी के मन ही मन आलाप रहे हैं बेरोक टोक आलाप रहे हैं, ‘पिया नहीं
अइलैं।’
काहें नाहीं अइलैं पिया ?
इहां त पिया अइलैं। बकिर परेशान।
पिया यहां परेशान हैं। मुख्यमंत्री के जलसे में जो भी कुछ घटा, रिपोर्ट
पिया के पास आ गई है। पिया आज पीये हुए भी नहीं है। पर नींबू पानी लिए हुए हैं।
कला में किलोल कूचती वह अपनी परकीया हो चुकी नायिका से कुछ कहना चाहते हैं। कहना
चाहते हैं मेरी नाक पर नींबू रगड़ लो पर अपनी देह जिस-तिस के साथ नहीं रगड़ो। मुझ से
घर में ही जितना झगड़ना हो झगड़ लो, रगड़ना हो रगड़ लो पर मुख्यमंत्री से अपनी देह मत
रगड़वाओ। रगड़वाओगी तो न अपनी कोई वकत रखोगी,
न मेरी रहने दोगी। मेरी नजर भी
मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है। ऐसा ही शौक है रगड़वाने का मुख्यमंत्री से तो मेरी
मदद करो, मुझे
मुख्यमंत्री बनवाने में। फिर जितना कहोगी उतना रगड़ दूंगा, भीतर बाहर
सब रगड़ दूंगा। पर इस से तो मत रगड़वाओ। यह तो साला गिद्ध है, गिद्ध। जिस
भी देह पर बैठा है, बिला
गई है वह देह।
देह की आकृति बदल दी है। अरे, उस से मिलना
ही था, शुक्रिया
कहना ही था तो पहले यह बताती कि मैं मिसेज मिश्रा। आप के मंत्रिमंडल वाले मिश्रा
जी की पत्नी। फिर शुक्रिया कहती न कहती,
यह दिन, यह दरिद्र
दरिंदगी नहीं देखती। कोई और होती, राजनीति नहीं जानती,
नेताओं को नहीं जानती तो बात और
थी। पर तुम तो मिसराइन सब जानती थी। जानती थी मिसरी का मीठापन, मीठे शहद का
संकरापन। वह सर्रे से सब कुछ कह देना चाहते हैं,
मिसेज मिश्रा से।
पर दिक्कत यह है कि वह अब तेज बोल
नहीं सकते। घर में लोगों से ज्यादा संतरी रहते हैं और धीरे से बोलने के लिए
खुसफुसा कर कहने के लिए तल्ख़ हो कर खुसफुसाने के लिए दो चार पेग तो चाहिए-चाहिए
होता है और अभी-अभी वह संभव नहीं है। वह अपनी पत्नी को सक्रिय भी देखना चाहते हैं।
मंचों पर बैठे देखना भी चाहते हैं। पर इस उस की रगड़ से भी बचाना चाहते हैं। लेकिन
इस के लिए भी रगड़घिस्स जरूरी नहीं मानते। सोचते हैं फिर कभी समझा लेंगे, अभी तो भीड़
है। तरह-तरह की भीड़। उन्हों ने यह भी देख लिया है कि मिसेज मिश्रा की आंखें आहत
हैं, वह
कुछ उगलना चाहती हैं, बिफरना, बिसूरना
चाहती हैं। पर वह भी क्या करें भीड़ बहुत है।
लेकिन जब वह इस शाम रगड़ी गईं तो
क्या भीड़ नहीं थी ? ओह
! तब तो भीड़ की भगदड़ थी। भगदड़ ही में तो वह रगड़ी गईं। भीड़ ने रगड़ा, मुख्यमंत्री
ने रगड़ा, और
अब वह खुद को रगड़ रही हैं।
रगड़ रही हैं बाथ टब में डूबी अपनी
देह। जैसे सारा अपमान इस शाम को, रगड़-रगड़ कर धो देना चाहती हैं मैडम मिश्रा। उन के शहद
से मीठे, पतले
होंठ बार-बार कुछ बुदबुदा रहे हैं। बुदबुदा रहे हैं शायद, हरामी, कुत्ता, पिल्ला, कमीना, लंपट, बास्टर्ड, नानसेंस....।
उन की डिक्शनरी में शायद यही, इतनी ही गालियां हैं। और बताइए चली हैं राजनीति करने
!
मंच वाली राजनीति !
बताइए भी भला चल पाएगी इन और इतनी
ही गालियों के बूते इन से देश की राजनीति। राजरंग में कैसे समा पाएंगी यह। जी नहीं
पाएंगी अगर यही हाल रहा। हज़ामत बनाने वाले पग-पग पर हैं, देह पर
दस्तक देने वाले, जब
तब रगड़ देने वाले हर पायदान पर हैं और पाए की गालियां तक नहीं हैं आप के पास ?
तो कर चुकीं राजनीति !
आज शाम जब आप रगड़ी गईं, अपमानित की
गईं तभी जो शुरुआत ही में कोई गाली उच्चार दी होती,
बाथरूम में जो उच्चार क्या
बुदबुदा रही हैं, वहीं
इन्हीं गालियों को सही, ले
कर बर्रा पड़ी होतीं तो मजाल थी किसी की जो आप के नितंबों पर दस्तक देता। बार-बार
अर्थपूर्ण दबाव नहीं झेलती आप की समूची देह। और जो मुख्यमंत्री पियानो की तरह आप
को इस छोर से उस छोर तक छकते मथते रहे,
रगड़ने की हद तक उतर आए, नहीं आ पाए
होते। जो आप संकोच की शिला हटा, इन्हीं गालियों हरामी,
कुत्ता पिल्ला ही कह कर पिल पड़ी
होतीं।
पर आप तो देवी जी अहिल्या की
मानिंद डटी रहीं। सेक्स शिला बन कर डटीं रहीं कि कोई तो राम आएगा सेक्स शिला से
नारी बनाएगा ‘यत्रा नार्यस्तु पूज्यंते’ वाली नारी। तो देवी जी भूल गईं आप की कि
आप अहिल्या नहीं सेक्स शिला हैं और भीड़ की भगदड़ में हैं। और कि आप त्रोता में नहीं
कलयुग में हैं। उस कलयुग में जहां राम भी जो आ जाते उस भगदड़ में तो, इस सेक्स
शिला का पहले तो वह स्वाद ही चखते। ‘नारी’ आप को बनाते भी तो बाद में, पहले वह
पुरुष ही बनते। और क्या पता बनाते भी कि नहीं बनाते। सेक्स शिला के स्वाद ही में
कहीं जो रम जाते तो ?
आख़िर मुख्यमंत्री जी कौन थे ?
आज के राम ही तो थे।
क्या नहीं किया उन्हों ने। वास्तव
में ज्ञान तो मुख्यमंत्री ही ने दिया कि ‘तुम केवल सेक्स शिला हो।’ किंचित उन्हों
ने ही देवी की देह में अपमान का साबुन रगड़ा। इतना रगड़ा कि झाग के मानिंद उसे
छिटकना पड़ा। मरती हुई मछली की मानिंद फुदकना पड़ा। पर फजीहत करा कर। देह में अंगार
की, अपमान
की फांस लगा कर।
छिछोरई की इंतिहा थी यह।
वह सोच रही हैं इस बुढ़ौती में भी
मुख्यमंत्री की उंगलियां नहीं शरमाईं। अपनी टोपी की भी लाज नहीं जान पाए वह। मान
नहीं रख पाए वह। वह सोच रही हैं। और पूछ रही हैं,
क्या इस को भी शार्ट शर्किट कहते
हैं ?
खुद ही से पूछ रही हैं वह।
पूछ तो कन्हैया जी भी रहे हैं, ‘कहो, अइसे ही
मंत्री बने हैं मिश्रा जी ? मिसराइन
के पेटीकोट के बूते !’ मछरी की बोटी भकोस रहे हैं और खींच रहे हैं रम। खींच रहे है
रम और ज्ञान दे रहे हैं, ‘पेटीकोट
बहादुर मिश्रा, अइसे
बने हैं मंत्री। न हो, परभाकर
जी।’
अब क्या कहें प्रभाकर जी। कैसे
कहें जब कुछ बूझ ही नहीं रहे हैं।
न हो परभाकर, न हो परभाकर, जब ज्यादा
हो जाता है तो पूछ लेते हैं प्रभाकर जी भी,
‘का पहेली बुझा रहे हैं, का कनई में
मछरी मार रहे हैं। किलियर-किलियर बताइए बात क्या है। पेटीकोट क्या है। किस का
पेटीकोट कहां से आ गया ? साफ-साफ
बताइए। जो भी लाया होगा उस को अभिये बाहर भगा देंगे। हमारे कमरे में ई सब नहीं
चलेगा। हम को ऐसी बदनामी मंजूर नहीं है।’ कहते हैं एक सांस में प्रभाकर जी।
कहते हुए बिगड़ते हैं।
‘चढ़ि
जादा गई है का। अरे हम मंत्री जी की बात कह रहे हैं। जानते तो हम भी हैं कि इहां
महिला नहीं रहती। आप का काम लौंडों से ही चल जाता है। पर हम तो विधायक जी, मिसिर
मंत्री के मिसराइन का पेटीकोट बता रहे थे। काहें से कि मुख्यमंत्री जी का तंबू
वोहीं गिरा है इन दिनों....।’
‘का
?’
प्रभाकर जी की चेतना कुछ चैतन्य
हो गई है, ‘का
कह रहे हैं आप। भाई ! जरा धीरे बोलिए बगल के हाल में कार्यकर्ता लोग हैं, क्षेत्र के
लोग हैं। धीरे बोलिए भाई।’ खुसफुसा रहे हैं और आंख मार रहे हैं कि कन्हैया जी
दीजिए अब पूरा ब्यौरा। कन्हैया जी ब्यौरा क्या देते,
कैसे देते, ‘जवाब क्या
देते खो गए सवालों में।’ वह गुनगुनाने लगे। लगे भौंचक ताकने उसे निपट देहाती जवान
को। जो दांत भींचे, नथुना
फुलाए, अगियाया
हुआ खड़ा था, बोल
कुछ नहीं रहा था गोया मार कर भाग जाएगा। कन्हैया जी को तो कुछ सूझा नहीं, प्रभाकर जी
को खोदिया दिया। देख तो उसे वह भी रहे थे पर अनदेखा किया। रम में डूबे रहे।
कन्हैया जी ने खोदियाया तो वह कुछ बोलते-बोलते अटके,
आ-आ किया और उंगलियां मुंह में
धुसेड़ दीं उ हूं हूं कहते हुए।
‘का
हुआ भाई कांटा गड़ गया का प्रभाकर जी।’ पूछ रहे हैं कन्हैया जी।
‘कांटा
नहीं गड़ेगा।’, जवाब
दे रहे हैं जवान जी, दरवाजे
में भिड़े, कुछ-कुछ
उठंगे हुए से टेक लिए हुए से, ‘अकेले-अकेले मछरी भकोस रहे हैं, शराब ढकेल
रहे हैं। जनता का चूतिया बना रहे हैं। हम को चार दिन हो गया। न काम करा रहे हैं न
खिया रहे हैं। दुई जून से हम भुखाए हैं। लेकिन दरवाजा बंद कर के अपने मुर्ग
मोसल्लम उड़ा रहे हैं, मछरी
भकोस रहे हैं। अरे हमहूं से कब्बो एको बेर झुठहूं पूछे हैं, का हो खइबा।
भुलाऊ के नाहीं। दलाल ले के बइठ गए हैं। भकोस रहे हैं।’
‘त
करें का ? बोल
! करजा खाएं हैं का तोर।’ बोल रहे हैं विधायक प्रभाकर जी। कुछ-कुछ तल्ख़ी में, कुछ-कुछ
नरमी में।’
‘नाहीं
करजा त हम खाए हैं न वोट दियाने का। बूथ बटोरवाने का। आइएगा अब की क्षेत्र में।
फइसला होई जाएगा कि कवन किस का करजा खाया है। बुझा जाएगा अब की जो एक्को वोट हमरे
जवार से पा जाएं।’ बिगड़ रहा है जवान।
‘ठीक
है। ठीक है। जो भाग इहां से। वोटवे नाई देबे। मत दीहे, जन दियइहे।
भाग भोंसड़ी के इहां से। मार सारे के भगाव इहां से। ससुर ! अब रोज पचास जने यहां
आते हैं। सब को खिलइबै करेंगे। भाग इहां से। भगाव इस को भाई।’ बमक रहे हैं विधायक
जी बिलकुल ‘बम-बम’ स्टाइल में।
जवान का भी धीरज टूट गया है। फूट
पड़ा है। लगभग रोने लगा
है। रोने लगा है और दहाड़ रहा है, ‘हां हां गाल मीजवा लिए हुए होते वोह रात। जो मउगई कर
रहे थे चुपचाप करने दिए होते। चूमने चाटने दिए होते तब खियाते। अरे कहता हूं, फिर कहता
हूं आइएगा। फिन ओट मांगने। तब बताऊंगा। तब हम बताऊंगा। बूझते का हैं अपने आप को।
क्षेत्रा में शकल नाई देखाने पाइएगा। तब बूझिएगा। बूझिएगा तब।’
पूरे हाल की भीड़ इस बमचिक में
बटुर आई है। प्रभाकर जी की रम रंगे हाथ पकड़ ली गई है। कन्हैया जी को मछरी अब माहुर
जान पड़ रही है। पर प्रभाकर जी का आत्मबल कहीं से फिर बहिराता है, वह खड़े हो
गए हैं। कुर्ते की बांह मोड़ी है, गरियाया है जवान को। कहा है, ‘गांडू साले
!’ दिए हैं खींच कर इस कनपटी, उस कनपटी को थप्पड़ और गरजे हैं, ‘भोंसड़ी के
भाग जाओ। नहीं मार लेंगे तुम्हारी यहीं पटक कर। भगाओ साले को यहां से।’ भीड़ को
ललकार दिया है प्रभाकर जी ने। और भीड़ जुट गई है,
गाली, लात-मुक्का
और जवान का कोलाज बनाने में। कोलाज बन रहा है और कोहराम मच रहा है, आधी रात को।
एकाध खिड़कियां, दरवाजे
भी खुलने लगे हैं, खिड़कियों
से दिख रही है, कुछ
फ्लैटों में बत्तियां भी जलने लगी हैं।
कन्हैया जी समझ गए हैं, गड़बड़ जादे
हो गई है। पर रम कम है सो वह नजाकत भी समझते हैं। एक लंबा पेग बनाते हैं, खटाक से
उतारते हैं और बाहर आ जाते हैं। बोल पड़ते हैं,
‘चोर है, चोर है, चोर है।’ बस
भीड़, कोलाज
बनाती भीड़ को एक नारा भी मिल गया है,
‘चोर है, चोर है।’
शोर धीरे-धीरे थम रहा है। राय
साहब भीतर ही भीतर अफना रहे हैं, लगता है जैसे वह बहुत बड़ा दांव हार गए हैं। मुंह बा
कर जम्हाई लेते हैं, बोलते
हैं, ‘हे
राम, हे
राम !’
‘का
बाति है राय साहब,’ पूछ
रहे हैं समुझ यादव, ‘कुछ
बिला गया है का। कि कुछ चोरी हो गया है आप का भी ?’
‘का
हो गया है यादव। तुम को भी क्या मजाक सूझ रहा है। हमारे पास है ही क्या जो चोरी हो
जाएगा ?’ कहते
हुए वह पहले धोती के फेंटे में बंधा रुपया टोह लेते हैं फिर सिरहाने रखे सिल्क के
कुरते को सहेज लेते हैं। भर नजर।
‘नाहीं
कुछ तो चोरी हो गया है। राय साहब।’
‘का
मतलब है तुम्हारा यादव ?’
‘यही
कि लौंडा चिक्कन था !’
‘हां
चिक्क्न तो था।’ लंबी सांस भरते हैं राय साहब,
‘और एहीं हमरे बगलिए में ससुरा दुई
दिन सोया। का बताएं हमें का मालूम था,
ससुरा एह तर नींद उड़ा ले जाएगा।’
कह रहे हैं राय साहब। कह रहे हैं और पछता रहे हैं। पछता रहे हैं कि काहें न एक बार
उन्हों ने भी ट्राई कर लिया।
यादव जी ढाढस बंधा रहे हैं राय
साहब को, ‘जादा
पछिताएं नहीं। कल जा के जमानत करवा दीजिए उस का। फिर आप और ऊ। ऊ अवर आप।’
‘का
पुलिस ले गई सारे को।’ पूछ रहे हैं राय साहब और बेकल हो गए हैं, ‘पुलिस वाले
भी छोड़ेंगे नहीं साले को। काम लगा देंगे। साला सोया रहता तो का बिगड़ जाता। मछरी
खाने गया था, खुदै
मछरी बन गया....गोल्टू साला।’ कहते हैं राय साहब और एक टांग उठा कर हवा ख़ारिज करते
हैं। तेज-तेज।
विधायक निवास के इस कक्ष के इस
हाल में दरी पर लाइन से पसरे लोग अपनी नाकें दाबने लगते हैं। गोया लेटे-लेटे
प्राणायाम कर रहे हों।
‘का
खाए थे आज राय साहब।’
‘कवनो
और बम त नाई बाकी है।’
‘चलो
भाई सोने दो साइरन बज गया है।’
‘बत्ती
बंद करो।’
तरह-तरह की मिली-जुली आवाजें हैं।
बत्ती बंद हो जाती है।
पर एक आवाज अभी भी बुदबुदा रही
है। वह है राय साहब की आह भरी आवाज। रह-रह वह उच्चार रहे हैं, ‘हे राम, हरे राम।’
उन्हों ने अब फिर टांग उठा दी है। धीरे से और बड़ी सहजता से।
‘हद
हो गई राय साहब।’ कोई सोए-सोए ही बिगड़ता है।
‘हद
क्या हो गई ? अरे
भिनसहरा हो गया है।’ कह कर राय साहब समस्या का निदान बता रहे हैं कि कारण ? समझना कठिन
है।
‘कठिन
था उस जवान को भोगना भी।’ बता रहे हैं प्रभाकर जी,
कन्हैया जी को।
‘क्या
सुपाड़ा धर दिया था ?’ जिज्ञासा
है कन्हैया जी की।
‘त
का वइसे ही बउरा गया था भोंसड़ी का।’ बिफरते हैं प्रभाकर जी।
‘जानता
हूं, जानता
हूं परभाकर जी।’ कन्हैया जी की जिज्ञासा शांत हो गई है। पर क्या करें वह इस तलब
का। रम की तलब का और रम ख़त्म हो गई है। कैसे शांत करें वह इस तलब को। वह घड़ी देखते
हैं। पाते हैं कि तीन बज गए हैं। कहां मिलेगी अब ?
सोच कर वह लंबी सांस छोड़ते हैं।
सो जाते हैं, सो
जाते हैं कन्हैया।
पर प्रभाकर जी ? वह नहीं सो
पाते। नहीं सो पाते। सोचते हैं, सुबह अख़बार देख ही कर सोएंगे। अख़बार में संध्या जी की
फोटो देख कर सोएंगे। संध्या सिंघल की निर्वस्त्र जांघों की और जांघों के बीच की
फोटो। वैसे भी क्या नींद आए। रंग रम का उतर गया है। उतर गया है नशा। उतार गया है
जवान। वह चिक्क्न जवान। यह ख़ुमारी उतरने वाली नहीं है। उतरेगी ख़ुमारी तो अब संध्या
जी के अंग-प्रत्यंग देख ही कर। अख़बार में छपे अंग।
अख़बार छप गए हैं, सुबह हो गई
है। पर पौ अभी नहीं फटी है। अख़बार नहीं बटे हैं अभी घर-घर। अभी एजेंटों, हांकरों के
हाथों वह गिने-बीने जा रहे हैं। पर हाकर आज हकबक हैं। बीस-पचीस आदमी जाने कहां से
अतिरिक्त आ गए हैं। हाकर हैं नहीं,
एजेंट हैं नहीं, ख़रीददार भी
नहीं हैं। कौन हैं यह लोग ? यह
कोई नहीं समझ पाता।
समझ नहीं पा रहे हैं प्रभाकर जी
भी कि अभी तक अख़बार क्यों नहीं आया। उन का चिर प्रतिक्षित अख़बार। संध्या जी के
सांगोपांग वर्णन वाला अख़बार। कहा तो श्रीवास्तव ने यही था कि, ‘पत्रकार जी
को पूरा पंप कर दिया है भाई साहब। चित्र तो छपेगा मय वर्णन के।’ पूरी गारंटी के
साथ कहा था श्रीवास्तव ने। तो चित्र तो छपेगा ही। छपेगा भी क्या छप गया होगा।
निश्चिंत हैं प्रभाकर जी। पर अख़बार क्यों नहीं आया अभी तक। यह सोच कर किंचित बेचैन
भी हैं।
इधर मिसिराइन सन्न हैं फोटो देख
कर। वह बिफरते हुए पूछ रही हैं, ‘यह इतनी फूहड़ फोटो।’
‘फूहड़
प्रसंग करेंगी तो फूहड़ फोटो नहीं आएगी मिसेज मिश्रा। सर्द किंतु सख़्त स्वर में सनक
रहे हैं मिश्रा जी, ‘वह
तो कहो भला हो उस पत्रकार का जिस ने बता दिया था कि फोटो छप रही है। समय से मालूम
हो गया नहीं आज तो आप मुझे भी गवइया बना देतीं। किस-किस से गाता फिरता, नहीं बात
ऐसी नहीं है, वैसी
है। वैसी नहीं, ऐसी
है।’
‘आप
को मालूम था कि फोटो छप रही है ?’ पूछ रही हैं श्रीमती मिश्रा, श्रीमान
मिश्रा से।
‘हां
मालूम था।’
‘ओह
!’
‘इसी
लिए। इसी लिए तो छपने नहीं दिया।’
‘ओह।’
संक्षिप्त सा संवाद देती हैं
श्रीमती मिश्रा। और चद्दर ओढ़ पसर जाती हैं,
सिर पकड़े। मिश्रा जी बकबका रहे
हैं, अभी
तो रोक लिया है। ले लिया है निगेटिव भी। पर जो आज यह ख़बर बन गई कि मंत्री ने
निगेटिव ख़रीदे तो समझती हैं इस का मतलब ?
इस का मतलब है मंत्री नहीं रहेंगे
हम। मर्यादा नहीं रहेगी कोई हमारी। सारी राजनीतिक कमाई एक फोटो में फिट हो जाएगी
गायिका जी। बड़ी गई थीं समारोह में। मुख्यमंत्री से रगड़वाने। रगड़वाने की फोटो
खिंचवाने। देखिए कैसे तो मुख्यमंत्री से दुबक कर चिपक कर खर्ड़ी हैं। मुख्यमंत्री
साले से भोंपू बजवाती गोया स्तनों को दबवा नहीं रही,
उद्घाटन करवा रही हों।’ बड़बड़ाते
हुए बाहर निकल जाते हैं मिश्रा जी।
कार स्टार्ट होने की आवाज। शायद
मुख्यमंत्री के यहां जा रही है कार। कार और शायद मिश्रा जी भी। श्रीमती मिश्रा फिर
बोल रही हैं, ‘ओह।’
‘ओह।’
बोल रहे हैं इधर प्रभाकर जी भी। पन्ने पर पन्ने पलटे जा रहे हैं। व्यापार और खेल
तक के पन्नों में आंखें डाल दी हैं ,
बसा दी हैं दोनों पुतलियां एक-एक
कालम, एक-एक
लाइन, एक-एक
पेज में। पर नहीं मिलती है फोटो। संध्या जी की फोटो। श्रीवास्तव भी साला निरा
चूतिया बना गया। अब वह क्या जवाब देंगे दिल्ली में अंसारी साहब को। वह सोच रहे हैं
और बोल रहे हैं, ‘ओह।’
बिगड़ रहे हैं अपने ही पर कि क्या जरूरत थी रात ही अंसारी साहब को जगा कर यह बताने
की कि छप रही हैं संध्या जी। छप जाएंगी सुबह तक। उधड़ जाएगी उन की बुलंद देह, भारत की
बुलंद तसवीर की तरह। काहें बताया था भाई। बरगलाया क्यों था भाई अंसारी साहब को। वह
सोच रहे हैं निरंतर सोच रहे हैं, काहें,
क्यों ?
‘हे
रमेसवा !’ वह चिघ्घाड़े हैं। हांफता,
डांफता, भागता है
रमेश विधायक जी के कमरे की ओर, ‘जी शाब।’
‘देखो
दिल्ली से फोन आता है तो बताओ हम यहां नहीं हैं। दूसरे, श्रीवास्तव
को घर से बुलवाओ। जल्द से जल्द।’
‘जी।’
और भागता है वह।
‘हे
! सुन सारे, हई
फोनवा तो उठा ले जो इहां से !’ निर्देशते हैं प्रभाकर जी रमेसवा को।
रमेश !
रमेश रंग है प्रभाकर जी का। रमेश
राज है प्रभाकर जी का। प्रभाकर जी का राग है रमेश। दुख, सुख तन-मन
में बसा है रमेश प्रभाकर जी के। दिन-रात सेवा करता है। दिन भर तो यहां-वहां
दौड़ता भागता है। रात में भी जो प्रभाकर जी का तनाव बढ़ता है तो वह रमेसवा ही को
बुलाते हैं, पैर
दबाने के लिए और दाब देते हैं उसे। वह कभी ना नुकुर नहीं करता। नहीं करता आह ऊह।
सदैव समर्पित। तेल पानी ले कर समर्पित। कभी सौतिया डाह भी नहीं उपजता रमेसवा के मन
में। न ही वह दूसरों के दांव में आता है। यह कन्हैया जो अभी मुंह बाए नाक बजा रहा
है, एक
बार शौकिया गया। शौकिया गया पैर दबवाने के लिए। इसी कमरे में। रमेसवा आया
निर्विकार पैर दबाता रहा ई कलमुहा कन्हैयवा जब उसे पलटने के फेर में चूमने-चाटने
लगा तो एक ही झटके में परे कर दिया। बड़ी मान मनौव्वल की। नोट-सोट दिखाए। लेकिन
रमेसवा राजी नहीं हुआ। कन्हैयवा कहता रहा अच्छा हाथ ही से कुछ कर करा दे, रमेसवा तिस
पर भी तैयार नहीं हुआ। तैयार नहीं हुआ उस का ताव मिटाने को। लात मार खा लिया पर
कन्हैयवा की आग नहीं बुझाई। यह सब कुछ एक झटके में सोच जाते हैं प्रभाकर जी।
रमेसवा प्रभाकर जी की देह का ही
राज नहीं है, उन
की राजनीति का भी राज है। उन को तो संभालता ही है,
क्षेत्र से आए लोगों को भी
संभालता है, चिट्ठी-पत्री, डील वील के
भी हिसाब-किताब वही संभालता है। विधायक निवास के इस कक्ष का वही केयर टेकर है।
इतने अनाचार के बावजूद पांव छूता है वह प्रभाकर जी का। क्यों पूजता है इतना
प्रभाकर जी को यह रमेसवा ?
चाकरी तो यहां करता है। कहने वाले
कहते हैं यह प्रभाकर जी की एक लड़की पर मरता भी है। मर मिटा है उस बालिका पर।
बालिका के बालपन पर । बिंध गया है उस का मन प्यार के उस तार की धार से। कि वह यह
अनाचार भी सत्कार के स्वर में सहता है। सहता है और सिसकता है प्यार की पुकार में, परिताप में, पुरनम पापी
प्यार के दुत्कार में, उस
के दुलार में। क्या यह भी शार्ट शर्किट है ?
स्वार्थ है, साथ है, कि सांच है।
क्या पता ?
रमेसवा को भी नहीं पता।
देह के द्वैतवाद में दहलता वह तो
प्यार के पाश में, प्यार
की फांस में, प्यार
की आस में अफनाया हुआ ख़ुद को दफना रहा है। किसी वीणा, किसी वायलिन
के वेग की तरह नहीं, किसी
पिया की सेज की तरह नहीं, रमेसवा
की तरह, रमेश
की तरह नहीं। तरहें बहुत हैं इस प्यार के तार की। तार के मनुहार, अनुराग और
आन की। आन ही रखा रहा है अपने प्यार की वह। पर अपनी आन मिटा कर।
क्या प्यार इसी को कहते हैं ?
कि पलाश वन ऐसे ही जलते हैं !
जलते हैं जो ऐसे कैसे जिंदा रहते
हैं ?
जलालत का जंगल उगा कर, शायद के
सपनों में, संभव
के सांचों में, सिसकियों
के सींकचों में, सर्द
सन्नाटों, संकोच
की सिलवटों में सने सहमे, संशय
की रात में लोग कैसे सोते हैं। पर क्या कीजिएगा रमेसवा जैसे लोग ऐसे ही जीते, ऐसे ही सोते
हैं। पर क्या सचमुच सोते हैं ? सो पाते हैं भला ! प्रभाकर जी सोने देते हैं कहीं ?
जीने देते हैं कहीं ?
जीने नहीं देंगे मिश्रा जी भी अब
मुख्यमंत्री महोदय को। मिसिराइन का अपमान उन के मस्तक पर सवार है। राजनीति नहीं
करनी होती तो वह गोली मार देते मुख्यमंत्री माधरचोद साले को। पर क्या करें राजनीति
भी करनी है और हिसाब भी बराबर करना है। यही सब वह सोच रहे हैं। सोच रहे हैं कार
में। जा रहे हैं कहीं कार में। लालबत्ती वाली कार में।
क्या रेड लाइट एरिया जा रहे हैं
मंत्री जी। नहीं, वह
तो जब पढ़ते थे तब जाते थे। ठेकेदारी करते थे तब जाते थे। अब तो जब से राजनीति शुरू
की है तब से बात ही कुछ और है।
शुरू-शुरू में महिला कार्यकर्ताओं
ही में छांट बीन कर लेते थे। इस के चलते वह कई बार फजीहत फेज से भी गुजरे। दो बार
तो पार्टी से निष्कासन झेलना पड़ा। कुछेक बार शर्मिंदगी। लंबी शर्मिंदगी। पर क्या
करें, यहां-वहां
मुंह मारने की उन की बान पड़ गई थी। छुड़ाए नहीं वह कभी यह आदत। न ही छूटी उन से कभी
यह आदत।
पर वह मुख्यमंत्री की आदत छुड़ाने
निकल पड़े हैं।
विवाहेतर संबंध उन के भी बहुतेरी
सुंदरियों से हैं, फिल्म
हीरोइनों तक से हैं। पर इस का मतलब यह थोड़े ही है कि वह सार्वजनिक तौर पर ही उन का
मान मर्दन करते चलें। तो क्या उन की पत्नी के भी मुख्यमंत्री से विवाहेतर संबंध
हैं ?
क्या पता ?
इन औरतों की इस मामले में कोई
सीमा रेखा तो अब रही नहीं। संग रहती हैं किसी के,
प्यार किसी से और ‘व्यवहार’ किसी
से। उपभोक्ता संस्कृति की सब से ज्यादा शिकार औरतें ही तो हुई हैं। वह सोचते हैं
और ‘शिकार’ शब्द पर जरा ज्यादा देर तक सोचते हैं।
सोचते हैं कहीं मुख्यमंत्री ने
अपने मंत्रिमंडल में इसी लिए तो नहीं ले लिया है कि वह मेरी पत्नी निर्मला मिश्रा
के कायल हैं।
कायल हैं निर्मला मिश्रा के।
कि निर्मला पाठक के ?
वह पछताते हैं। पछताते हैं अपने
कई फैसलों पर।
अव्वल तो इस गायिका से शादी करने
के फैसले पर। घर द्वार नाते-रिश्तेदार से झगड़ा मोल ले कर। दूसरे, निर्मला जी
को शादी के बाद भी सार्वजनिक जीवन जीने देने का सम्मान दे कर, खुला जीवन
जीने की रियायत दे कर।
वह पछताने लगते हैं। पछताने लगते
हैं कि सुबह-सुबह वह मुख्यमंत्री के यहां क्यों जाने का फैसला कर बैठे।
बीच रास्ते ही में ड्राइवर को वह
‘काशन’ दे देते हैं, ‘वापस
घर चलो।’ कहते हैं और सोचते हैं कि क्या सचमुच निर्मला, निर्मल नहीं
है ? मैल
है क्या कहीं उस के मन में, कहीं
उस के तन में, तन-मन
के तंतुओं में, तंतुओं
की शिराओं में, शिराओं
की कोशिकाओं में, उपकोशिकाओं
में भी ?
लेकिन उस का निर्विकार टटकापन ? खुलापन ?
टोटका तो नहीं है ?
क्या पता !
मिश्रा जी का मन बड़ा उद्विग्न है।
मलिन है, खिन्न
है। खिला-खिला मन अचानक कुम्हला गया है किसी कुम्हड़े की बतिया की तरह। बसिया गया
है मन, बिलबिला
गया है, जैसे
कहीं कुछ महत्त्वपूर्ण बिला गया हो।
बुझ गए हैं वह।
इतना कि घर भी जाने का मन नहीं हो
रहा उन का। फिर बीच रास्ते ही में ही ड्राइवर को ‘काशन’ दे देते हैं, ‘गेस्ट हाउस
चलो।’ चल देता है ड्राइवर स्टेट गेस्ट हाउस।
सुबह अब सुनहरी हो रही है। पर यह
सब है क्या ? संत्रास, सांघातिक
तनाव, शंका, शील, संकोच, सनक कि
शेम-शेम ?
आख़िर क्या घुमड़ रहा है मिश्रा जी
के मन में कि फ्रूट चाट की तरह, मिक्स वेजीटेबिल की तरह यह सब कुछ एक साथ उमड़ रहा है, घुमड़ रहा है
! समझना कुछ नहीं, बहुत
कठिन है।
वह ख़ुद भी नहीं समझ पा रहे हैं।
शायद इसी लिए वह मुख्यमंत्री के यहां जाते-जाते नहीं गए हैं। घर नहीं जा रहे हैं।
स्टेट गेस्ट हाउस जा रहे हैं। आख़िर यह किस कूटनीति का कोलतार है, कोबरा है कि
कोई कोलाज है।
यह कूतना भी कठिन है। किंचित कठिन
है।
और निर्मला मिश्रा ?
उन पर यह सुबह भारी है। और इस
सुबह पर भी भारी है सितार। वह तारों को पूरे सुर में साधे हुई बजा रही हैं सितार
और उच्चार रही हैं....‘या वीणा, वरदंड मंडित करा या श्वेत पद्मासना।’ पर सितार तो
पूरे सुर में है लेकिन उन का स्वर मद्धम है। बहुत मद्धम है। हालां कि वह अपने आप
से भीतर ही भीतर कहती भी जा रही हैं कि स्वर बहुत मद्धम है, इसे जरा
जाहिर करिए। जाहिर करिए निर्मला मिश्रा। पर यह जाहिर करना शायद उन के हाथ में नहीं
है। उन के वश में नहीं है। वह विवश हैं। वह तो सितार के तारों को सनका कर जैसे
अपनी सुलगती सासों को सनका देना चाहती हैं। अपने आप को भस्म कर देना चाहती हैं।
ऐसे में वह उच्चार क्या फुंफकार रही हैं,
‘या कुंदेंदु तुषार हार धवला....।’
सितार, संगीत और
स्वयं को वह एकमेव कर देना चाहती हैं। अचानक ही वह ‘या कुंदेंदु....’ छोड़ कर
‘झीनी-झीनी, बीनी
चदरिया’ पर आ गई हैं। पर वह पा रही हैं कि सितार तो उन से सध रहा है। पर स्वर नहीं
साध पा रही हैं वह। आवाज उन की भर्रा गई है। पर टेर रही हैं, ‘घट-घट में
पंछी डोलता, आप
ही डंडी, आप
तराजू, आप
ही बैठा तोलता।’ वह उच्चारती जा रही हैं,
‘आप ही बगिया, आप ही माली, आप ही
कलियां तोड़ता।’ बिलकुल किशोरी अमोनकर के से शास्त्रीय अंदाज में। हालां कि वह गाना
चाहती हैं, ‘मोहि
चाकर राखो जी।’ पर ‘सुर’ नहीं फूटता। वह सन्न हैं। बंगले के संतरी भी सन्न हैं।
सन्नाटे में हैं कि आज मेम साहब को क्या हो गया है ?
संतरी आपस में एक दूसरे को घूरते
हैं। एक संतरी पैर से गमले को हिलाता है और अपनी राइफल ढीली छोड़ कहता है, ‘बरसै कंबल
भीजे पानी।’ कह कर मुसकुराता है और बंगले में खड़े ताड़ वृक्ष को निहारने लगता है।
तो यह क्या है ? देह का दंश
है की दंश की देह ?
संपर्क :
1 -
2 / 276 विराम खंड ,
गोमती नगर , लखनऊ - 226010
2 -
टावर - 1 /
201 श्री राधा
स्काई गार्डेंस
सेक्टर 16 बी , ग्रेटर नोएडा वेस्ट - 201306
मोबाइल 9335233424
dayanand.pandey@yahoo.com
________________________________________

