Wednesday, 7 March 2018

उत्तर प्रदेश के कुख्यात एन.आर.एच.एम. घोटाले की चपेट में आए लोगों के जेल जाने की कहानी

अनूप शुक्ल 


समाज ने अपने संचालन के लिये कानून की व्यवस्था की है। उन के अनुसार काम न करना अपराध की श्रेणी में आता है। अपराध करने पर अपराधी के दण्ड की व्यवस्था है। कुछ में जुर्माना कुछ में जेल। जेलों की वयवस्था के पीछे उद्धेश्य व्यक्ति को सुधारना रहा होगा। लेकिन आम तौर पर देखा गया है कि जेल जा कर व्यक्ति और बड़ा अपराधी बन जाता है। साथ ही जेल से बचने के गुर भी सीख आता है।

एक औरत की जेल डायरी -प्रख्यात लेखक दयानन्द पांडेय की नई कृति है। पांडेय जी अनेक किताबों के रचनाकार हैं। जबरदस्त किस्सागोई के हुनर के साथ उन्होंने बांसगांव की मुनमुन, वे जो हारे हुए , हारमोनियम के हज़ार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, दरकते दरवाजे, जाने अनजाने पुल जैसे उपन्यास और कई कहानी संग्रह, गजल संग्रह, संस्मरण, साक्षात्कार, अनुवाद , संपादन के जरिये तीस से ऊपर किताबें लिखी हैं। एक औरत की जेल डायरी इस मामले में खास है कि इस में वे बकौल उन के ही इस को पेश करने का माध्यम हैं। किताब की भूमिका में पांडेय जी लिखते हैं:

विश्वनाथ प्रताप सिंह की एक कविता का शीर्षक है लिफ़ाफ़ा:

पैगाम तुम्हारा
और पता उन का
दोनों के बीच 
फ़ाड़ा मैं ही जाउंगा।

तो डायरी की नायिका लिफ़ाफ़ा बनने को अभिशप्त हो गई । एक निरपराध औरत की जेल डायरी की नायिका का सब से त्रासद पक्ष यह है कि इस लिफ़ाफ़ा का डाकिया हूं। डायरी मेरी नहीं है। बस मैं परोस रहा हूं। जैसे कोई डाकिया चिट्ठी बांचता है, ठीक वैसे ही मैं यह डायरी बांट रहा हूं। एक अनाम और निरपराध औरत की जेल डायरी परोसते हुए उस औरत की यातना, दुख और संत्रास से गुजर रहा हूं। उस के छोटे-छोटे सुख भी हैं भी हैं इस डायरी की सांस में। सांस-सांस में। पति और दो बच्चों की याद में डूबी इस औरत और इस औरत के साथ जेल के सहयात्री स्त्रियों की गाथा को बांचना सिर्फ़ उन के बड़े-बड़े और छोटे-छोटे सुख को बांचना ही नहीं है। एक निर्मम समय को भी बांचना है। सिस्टम की सनक और उसकी सांकल को खटखटाते हुये प्रारब्ध को बांचना है।“

’एक औरत की जेल डायरी’ उत्तर प्रदेश के कुख्यात एन.आर.एच.एम. घोटाले की चपेट में आए लोगों में से एक के जेल जाने की कहानी है। इस घोटाले के सूत्रधार कभी आई.ए.एस. के टापर रहे अधिकारी थे। मंत्री की शह पर उन्होंने यह घोटाला अंजाम किया। बाद में घोटाला खुलने पर वे भी जेल गए , मंत्री साथ में और तमाम अनगिनत ऐसे लोग भी जिन को शायद पता ही नहीं था कि वे भी अनजाने इस घोटाले में शामिल हैं। आई.ए.एस. टापर ने घोटाले में भी टॉप किया। उन के बारे में बताते हुए महिला लिखती हैं:

“सोचिए तीन-तीन विभागों के कैबिनेट मंत्री तीन थे पर इन सब का प्रमुख सचिव एक ही जो यही थे। सारे घोटाले के जनक यही। बीबी भी आई.ए.एस.। पूरा परिवार आई.ए.एस. लेकिन पैसे की हवस नहीं गई। तब के प्रधानमंत्री कार्यालय में इन के एक रिश्तेदार आई.ए.एस. तैनात थे। मतलब कि पीएमओ का भी जोर था। लेकिन फ़िर भी बच नहीं सके।

जो भी हो जब कभी कचहरी में व्हील चेयर पर उन्हें बैठे देखती हूं तो बहुत तरस आता है। कभी यह गाजियाबाद के जिलाधिकारी हुआ करते थे। बतौर जिलाधिकारी इस पूरी कोर्ट का शिलान्यास इन के ही हाथों हुआ है। जिस कोर्ट का शिलान्यास हुआ उसी में कोर्ट में मुजरिम। और तो और जिस डासना जेल में बार-बार आते जाते रहते हैं बतौर कैदी उस डासना जेल का शिलान्यास भी बतौर डी.एम. यही जनाब कर गए थे। वहां भी इन जनाब का नाम पत्थर पर लिखा हुआ है। जहां यह बतौर कैदी दिन गुजारते हैं। समय क्या-क्या न करवा दे।“

डायरी में जेल जीवन से जुड़ी अनेक घटनाओं के विवरण हैं। जेल जीवन कैसा है। लोग वहां कैसे रहते हैं। सुविधायें , असुविधायें कैसी हैं। तमाम बंदिशें हैं लेकिन उन में भी कैसे लोग खुश रहने का उपाय खोजते हैं। कैसे निरपराध लोग जेल आते हैं। कोई छूट जाता है , कोई बना रहता है। जेल में आरुषी हत्याकांड में बंदी तलवार दम्पति हैं तो घोटाले में पकड़े गए विधायक और तमाम लोगों की भरमार भी। जेल में आई महिला बच्चे को जन्म भी देती है। प्रेम पत्र भी इधर-उधर होते हैं। शादी की सालगिरह में महिला के लिए कपड़े भी सिलती हैं जेल की साथी और चाकलेट भी खिलाती हैं। सुविधाओं की लड़ाई और असुविधाओं में जीने की कहानी है यह डायरी। अपने घर से अलग जेल में रहते हुए जीवन की वास्तविकताओं के एहसास को दर्ज करने की कहानी है यह जेल डायरी।

जेल डायरियां तो बड़े-बड़े, प्रसिद्ध हो गए लोगों ने भी लिखी हैं। लेकिन यह डायरी इस मामले में खास है कि इस में एक आम इंसान की नजर से घटनाओं को दर्ज करने की कोशिश है। जेल डायरी में कोई बनावट नहीं है। ’जैसा दिखा वैसा लिखा’ वाले अंदाज में रोजमर्रा की घटनाओं को दर्ज किया गया है इस में। यही इस की खासियत है।

जेल डायरी के अनुभव लिखने वाली महिला और उसको डाकिये के रूप में सामने लाने वाले दयानंद पांडेय दोनों ही इस मामले में बधाई के पात्र हैं कि उन्हों ने एक आम इंसान की नजर से जेल जीवन की तस्वीर पेश की।

किताब दुनिया भर की महिला कैदियों को इस आशा के समर्पित की गई है कि उन का जीवन सुंदर हो। इस कामना के दायरे में डायरी लिखने वाली महिला लेखिका भी आती हैं। कामना करता हूं कि उनकी आशा फ़लीभूत हो। 

जेल डायरी के कुछ अंश यहां पेश हैं

1. 25 सितंबर को भंडारे में आग लग गई थी। तब से खाना आदमियों की तरफ़ से आ रहा है। लेकिन साथ ही यह एहसास भी हो रहा है कि जिन्दा रहने के लिये बहुत कम जरूरते हैं।

2. जिंदगी की जरूरतें बहुत थोड़ी हैं। आधा लीटर दूध लेती हूं। कल चूल्हा बना कर उस में बोरा जला कर दूध गरम किया और चाय बनाई। कहां बिना गैस के काम नहीं चलता और कहां पुराना कपड़ा , बोरा , पॉलीथीन सब जला कर चाय बनाई। यह भी जिन्दगी का एक रूप है।

3. जमीन पर सोना, बैठना , खाना इन सब की आदत नहीं रही। अब एक-एक चीज का महत्व पता चल रहा है। एक हाल में 50-60 महिलायें रहती हैं। 10-12 ट्यूब लाइट परमानेंट जलती ही रहती हैं। कई रात से रोशनी से नींद नहीं आती थी। दो दिन से आंख में दुपट्टा रख कर सोते हैं।

4. आज हमारे बैरक के बाथरूम में कुछ लीकेज है तो पानी बंद कर दिया गया है। हम लोग 6.30 बजे शाम से अन्दर बंद कर दिये गये हैं और अब सुबह 6 बजे ही ताला खुलेगा तभी नीचे बाथरूम जा सकता है इंसान। सोचो ये होती है बेबसी। इंसान की कोई इज्जत नहीं, कीमत ही नहीं।

5. जेल रेलवे क्रासिंग के बाद है और ये क्रासिंग लखनऊ वाली है। जब भी ट्रेन की आवाज आती है मन करता है दौड़ कर इस पर चढ जायें और लखनऊ पहुंच जायें।

6. बुलबुल बेटा आज सुबह से तुम्हारी शक्ल आंख के सामने से हट ही नहीं रही है। ऐसा लग रहा है तुम बहुत उदास हो। तुम्हारे साथ तो नाइंसाफ़ी हो ही रही है। बेटा माफ़ कर देना हमें, अपनी जिम्मेदारी हम निभा नहीं पा रहे, तुम्हें अकेला छोड़ दिया है।

7. अब तुम्हारी नौकरी तुम्हारे लिए बहुत जरूरी है। मां बाप के जेल यात्रा होने का कलंक तो साथ लग ही गया है अब इसे कंपनसेट तो तुम्हें अपनी नौकरी से ही करना है।

8. यहां पर एक बात और समझ में आई कि जेल को आराम से ही काटा जा सकता है। अगर सारी एनर्जी इसी में लगा दो कि कैसे निकलेंगे तो तबियत और खराब होगी और होगा कुछ नहीं। इसलिए जिंदगी जीने के लिये जो न्यूनतम आवश्यकतायें हैं उन को पूरा करते हुये सब्र के साथ समय काटना चाहिए ।

9. आज मम्मी बहुत याद आ रही हैं। सोचो कितना दर्द होगा कि मम्मी याद आ गईं।

10. आजकल लिखने का भी मन नहीं करता। कितने निगेटिव हो गए हैं आजकल हम। हर समय शिकायत , शिकायत। लेकिन क्या करें पाजिटिव कुछ है ही नहीं।

11. जेल में रह कर इतना इंडिफ़रेंट हो गए हैं कि अब कहीं भी कैसे भी रह सकते हैं। कहीं भी एडजस्ट हो सकते हैं। अब तो लोगों की बातें भी बुरी नहीं लगती। कोई कुछ भी कहता रहे।

12. हे हे हे मेरी बेल हो गयी। विश्वास ही नहीं हो रहा। विधायक जी ने सुनाली से खबर भिजवाई है। डिटेल तो पापा से शनिवार को मिलेगी। बस इतनी न्यूज मिली। सुनते ही रोना आया।

13. जिंदगी में हार या बुरा वक्त भी उतना ही जरूरी होता है जितना जीत या अच्छा वक्त। ये आप को आसमान से जमीन पर लाता है। बताता है कि हर समय जीतते ही रहोगे। ऐसा नहीं है।

14. यहां पर वर्चस्व की भी लड़ाई चलती रहती है कि मैं ही बॉस हूं। मैं तो चुप ही रहती हूं। सोचो मेरे स्वभाव के विपरीत है बिल्कुल ये। लेकिन अपने मन को इस तरह से समझाते हैं कि नहीं ये तुम्हारा क्षेत्र नहीं है।

15. जेल यात्रा ने हमें चालाक भी बना दिया है। किस से कैसा व्यवहार करना है ये भी सीख ही रहे हैं।

16. आज शाम को जब सुंदर कांड पढते-पढते रोने लगे तो पुरानी लड़कियों ने समझाया आंटी आप तो 11 महीने बाहर रह आईं। हम तो निकल भी न पाए। तब लगा वाकई हम तो भाग्यशाली हैं कि कुछ दिन तो बाहर रह आए । लेकिन ये बच्चियां तो बाहर दो साल से गईं ही नहीं।

17. बैरक में रहना बिल्कुल ऐसे लगता है जैसे आप प्लेटफ़ार्म पर बैठ कर अपनी ट्रेन का इंतजार कर रहे हैं कि कब ट्रेन आएगी ।

18. डेढ हाथ की जगह मिलती है जिस पर अपना बिस्तर बिछाना होता है। इसे फ़ट्टा कहते हैं। जेल की तरफ़ से एक कंबल बिछाने को और एक कंबल ओढने को मिलता है। और इसी की सीध में सीखचों के सामने अपना सामान रखना होता है। बस इतनी ही जगह आप को मिलती है। और इसी को बनाए रखने का संघर्ष भी रोज का है। अगला आप की तरफ़ अपना सामान बढ़ाता ही जाता है कब्जा करने के लिए ।

19. 45 लोगों के लिए एक वाशरूम है। दिन में तो कोई बात नहीं, बैरक खुला रहता है आप बाहर के वाशरूम में भी जा सकते हैं। लेकिन बैरक बंद होने के बाद उसी एक वाशरूम का सहारा होता है।

20. दहेज हत्या अधिनियम का कितना दुरुपयोग हो रहा है ये जेल आ कर ही पता चला। लड़की वाले अपनी लड़की की मौत को भुनाते हैं और उस पर राजनीति करते हैं, अपना ईगो संतुष्ट करते हैं। इधर लड़की मरी नहीं , उधर लड़के का पूरा परिवार जेल के अंदर चाहे वो बुजुर्ग पिता हों या कम उम्र ननद।

21. इतनी राजनीति तो संसद में भी नहीं होती होगी जितनी जेल में है। और अपनी पढाई-लिखाई समझदारी सब यहां बेकार हैं। कदम-कदम पर राजनीति। एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश। चुगलखोरी आदि औरतों के सारे गुण यहां मौजूद हैं।

22. आदमियों की तरफ़ तो सुनते हैं पूरा हाता ही एन.आर.एच.एम. को दे दिया है। ऊपर नीचे दोनों बैरक मिला कर पूरा हाता। मिनिस्टर साहब का स्टॉफ़ बच्चा बैरक में। दो हिस्से में बंटा हुआ है पूरा एन.आर.एच.एम.।

23. मिनिस्टर साहब भले जेल में हैं लेकिन पर उन का प्रमुख सचिव जो आई.ए.एस. है, बीमारी के बहाने सुप्रीम कोर्ट से बेल करा कर जेल से बाहर है। नौकरी कर रहा है। अपने बैच का आई.ए.एस. टॉपर है। और इस एन.आर.एच.एम. घोटाले का भी टॉपर है।

24. सोचिए तीन-तीन विभागों के कैबिनेट मंत्री तीन थे पर इन सब का प्रमुख सचिव एक ही जो यही थे। सारे घोटाले के जनक यही। बीवी भी आई.ए.एस.। पूरा परिवार आई.ए.एस. लेकिन पैसे की हवस नहीं गई। तब के प्रधानमंत्री कार्यालय में इन के एक रिश्तेदार आई.ए.एस. तैनात थे। मतलब कि पीएमओ का भी जोर था। लेकिन फ़िर भी बच नहीं सके।

25. जो भी हो जब कभी कचहरी में व्हील चेयर पर उन्हें बैठे देखती हूं तो बहुत तरस आता है। कभी यह गाजियाबाद के जिलाधिकारी हुआ करते थे। बतौर जिलाधिकारी इस पूरी कोर्ट का शिलान्यास इन के ही हाथों हुआ है। जिस कोर्ट का शिलान्यास हुआ उसी में कोर्ट में मुजरिम। और तो और जिस डासना जेल में बार-बार आते जाते रहते हैं बतौर कैदी उस डासना जेल का शिलान्यास भी बतौर डी.एम. यही जनाब कर गए थे। वहां भी इन जनाब का नाम पत्थर पर लिखा हुआ है। जहां यह बतौर कैदी दिन गुजारते हैं। समय क्या-क्या न करवा दे।

26. जेल में कपड़ा सुखाने को रस्सी नहीं मिलती। पुराने दुपट्टे फ़ाड़ कर जोड़-तोड़ कर रस्सी बनाई जाती है और कपड़े सुखाए जाते हैं।

27. जिंदगी में जब जेल कचहरी आदि परेशानियां आती हैं तो मौत का भय खत्म हो जाता है। ज़िंदगी जब पल- पल भारी होने लगे। रोज के संघर्ष खत्म ही न हों तो मौत आसान लगने लगती है।

28. जेल में पर्ची कटती है। मतलब जब कोई नया कैदी आता है तो उसे जेल का काम करना पड़ता है, हर तरह का। जो नहीं करना चाहता उसे पर्ची कटवानी होती है। पुरुषों की ग्यारह हजार की पर्ची कटती है। महिलाओं में बारह सौ की। जो महिलायें पर्चा नहीं कटवातीं उन्हें झाड़ू , पोंछा, बरतन धोने आदि का काम करना पड़ता है। रोटी भी बनानी पड़ती है। इस बार देख रहे हैं पुलिस वाली पीछे ही पड़ जाती है कि पर्चा कटवाओ क्यों कि इस का हिस्सा सभी पुलिसवालियों में बंट जाता है।

29. जेल में ’सब सुनों और मुंह मत खोलो’ का सिद्धांत चलता है। अगर आप ने बिना सोचे समझे मुंह खोल दिया तो आप की फ़जीहत तय है।

30. आज तीनों बैरकों की तलाशी हुई। एक-एक सामान झाड़-झाड़ कर देखा गया। एक महिला के पास मोबाइल भी मिला जो उस ने अपने झोले के अंदर कपड़े के नीचे सिल रख था। झोला झाड़ने पर जमीन पर टन्न से बोला। पूरी बैरक में हल्ला मच गया। पुलिस वालियां तो घबड़ा गईं। तुरंत बात को दबाने लगीं कि बात ज्यादा फ़ैली तो उन्हीं पर कार्यवाही होगी।

31. यहां भी लोग कमाई के धंधे ढूंढ लेते हैं। हम जैसे कुछ लोग हैं जो लाइन में लग कर खाना नहीं लेते, बर्तन नहीं मांजते, उन लोगों के ऐसी कई औरतें मिल जाती हैं, जो आप का खाना ला देती हैं बर्तन साफ़ कर देती हैं। आप का बिस्तर झाड़ देती हैं। कपड़े धो कर, सुखा कर तहा कर रखती हैं। इस काम के एक हजार रुपए महीने लेती हैं तो उन का खर्च आराम से चल जाता है।

32. आज सभी लोग 50-50 रुपए इकट्ठा कर रहे हैं। कल त्योहार पर अच्छा खाना बनाया जाएगा । जेलर साहब को सब ने घेर लिया कि पनीर मंगा दीजिए । बेचारे बड़े परेशान कि अब आखिरी समय पर कहां से व्यवस्था करूं।

33. आज मेरी शादी की सालगिरह है। शादी को 26 साल हो गए । क्या 26 साल पहले शादी करते समय सोचा था कि कोई सालगिरह जेल में भी पड़ेगी? इस बार तो लग रहा सब कुछ यहीं जेल में पड़ेगा। लेकिन ये भी जेल का रुख है कि सुबह जगने पर गिनती करने आई ड्यूटी वाली ने ही सब से पहले बधाई दी। फ़िर औरों ने भी दी। ड्यूटी वाली से कुर्ती का कपड़ा मंगवा कर मोहिनी ने खुद सिल कर मुझे दिया कि ये पहनना है। ड्यूटी वाली नीता ने एक डियो और चाकलेट दी।

34. कल सकीना को लड़का हुआ। आज वो अस्पताल से भी आ गई। बिल्कुल नार्मल डिलीवरी हुई। सकीना बलात्कार के केस में आई है। उस की ननद ने आरोप लगाया था कि अपने ब्वायफ़्रेंड के साथ मिल कर भाभी ने मेरा रेप कराने की कोशिश की। इस चक्कर में सकीना और उस का दोस्त दोनों ही अंदर आ गए । लगता था कि शायद पहले जमानत हो जाएगी । लेकिन नहीं बच्चा यहीं हो गया उस का। कोई नहीं बैरक को एक रौनक मिली।

35. आज जेलर ने सकीना के लिए जेल की तरफ़ से सारे मेवे भेजे जिस के लडडू बनाए गए कि उस को कुछ तो ताकत मिले।

36. समय बीतता है और खर्च हम होते हैं। अत: हर क्षण का उपयोग करें। बात सही है धीमे-धीमे समय तो बीत ही रहा है अच्छा या बुरा। लेकिन अगर इसी में जूझे रहे तो हम वो तो नहीं रहे जो पहले थे। समय के चक्कर में जूझ कर हम ने अपने को भी गंवा दिया।

37. आज चार औरतें आईं। बेटी, मां, मौसी और नानी। इन लोगों ने दामाद को दहेज के केस में फ़ंसा कर अंदर करवा दिया। दामाद जब जेल से निकला तो उसने बीवी को घर से निकाल दिया। इन लोगों ने बड़ा धरना-प्रदर्शन किया। इसी चक्कर में मार-पीट हुई और दामाद ने एफ़.आई.आर. कर इन चारो को जेल भेजवा दिया।

38. इंसान छोटी-छोटी बातों में खुशियां ढूंढ लेता है। यहां कोई महिला बंदी अगर पार्लर का काम जानती है तो सारी महिलायें उस के पीछे पड़ जाती हैं।

39. जेल में रह कर मेरा गाना खूब निखर गया है। हमें तो लगता था कि बस काम चलाऊ है। लेकिन यहां तो सब फ़रमाइश कर-कर के गाना सुनते रहते हैं।

40. यहां पर एक कैदी है अब्दुल, आजीवन कारावास में है वो। उसे मेडिकल की थोड़ी बहुत जानकारी थी बाकी यहां रह कर उस ने धीमे-धीमे सीख लिया है और कंपाउंडर बन गया। अब तो खैर वो डाक्टर से भी बड़ा हो गया है। महिला बैरक का अस्पताल वही संभालता है।

41. कोर्ट कहता है कि जेल में आप का आचरण सुधारा जाता है। यहां आने पर पता चला कि उसे और बढ़ावा मिलता है।


समीक्ष्य पुस्तक :

नाम: एक औरत की जेल डायरी
लेखक: दयानंद पांडेय 
प्रकाशक : जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि.
30/35-36 गली नं 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
पेज -151 , हार्डबाउंड 
मूल्य- 400.00










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1 . एक औरत की जेल डायरी 


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