Monday, 23 July 2012

बर्फ़ होती मुश्किलों में धूप

गौतम चटर्जी

यह आकस्मिक नहीं है कि इस दौर में एक बार फिर कहानियां लिखी जा रहीं जो विदग्ध स्थतियों के विपर्यय को पूरी विनम्रता से अपदस्थ कर सके। कथाकार दयानंद पांडेय की अद्यतन कथा-दुनिया में भी यदि कुछ आनुपूर्वी है तो वह यही है। उन के पिछले कहानी संग्रह ‘सुंदर लड़कियों वाला शहर’ की कहानियों को यदि आप याद करें तो हां भी विपर्यय को अपदस्थ करने के लिए नायक या नायिका अपने आसपास कोई शक्ति ढूंढ पाते हैं तो वह है प्रेम। दयानंद के इस बिलकुलल नए कहानी संग्रह में वही प्रेम नहीं है, बल्कि प्रेम नए अर्थ और आंच के साथ उन सब से मिलने आया है जिन्हें हम एक शब्द में कृतघ्नता कह सकते हैं। लेखक को विश्वास है कि आज आदमी में मनुष्य से पहले उस की कृतघ्नता मिलती है, और यह विश्वास भी, कि प्रेम ही इसे अपदस्थ भी करेगा।

दस बहुवांचक कहानियों के इस रोचक संग्रह में सारी कहानियां आप एक सांस में पढ़ जायेंगे और फिर भी आप को एक अस्वस्ति मिलेगी, आश्वस्ति नहीं। बेचैनी मिलेगी, बेफिक्री नहीं। इस से पहले कि मैं अपनी प्राश्निकी स्पष्ट करूं, एक बात कौंधती है कि हिंदी साहित्य के ‘रंगकर्म’ का यह कैसा अंधायुग है कि जिसे कहा जाना चाहिए सच्चे अर्थों में कहानी, उसे युवा कथाकार एक अरसे से लिख रहे हैं और उन्हें कोई सच्चे अर्थों में नोटिस नहीं ले रहा। पुस्तक और समीक्षाओं का महज छपना नोटिस लेना नहीं होता। अच्छी कहानियां समकालीन विमर्श का अर्थगर्भ नाभिक बनती हैं। साठ और सत्तर के दशक में लिखी गई हिंदी कहानियां इस तथ्य के प्रमाण हैं। अस्सी के दौर में युवा कथाकारों के उत्तेजक प्रयोगों ने जो प्रतिगामी यथार्थ बोया था उस का फल तो क्राइसिस के रूप में सामने आ गया। अब अगर हम ऐसी कहानियों को समय रहते नोटिस न लें जो इस आलोच्य संग्रह का परिचय हैं तो फिर हम भविष्य की हिंदी कहांनियों पर विमर्श करने लायक भी नहीं रह जाएंगे। उत्तर आधुनिक वक्तव्यों ने एक बात साफ तौर पर सामने रखी थी कि पूरी दुनिया एक टेक्स्ट है। यह पाठ स्वनिर्मित है, सेल्फ कंस्ट्रक्टेड। इस स्वनिर्मित पाठ का अर्थ भी स्वनिर्मित है। देरिदा, फूको और चॉम्स्की के ऐसे वक्तव्यों को सुन कर भारतीय कथा सचेतक अभी तक स्तब्ध हैं और सब रचे हुए और रचे जाने को व्यर्थ मान रहे। उन्हें अभी तक इस उत्तर आधुनिक वक्तव्य का उत्तर नहीं मिल पाया है। उत्तर भारतीय काव्यशास्त्र ने पहले ही दे रखा है। काव्यशास्त्र ने रचनाकार को अपने इसी स्व को, आत्म को व्याप्ति देने का प्रस्ताव दिया है। जैसा स्व होगा वैसी ही निर्मिति होगी और वैसा ही उसका साधारणीकरण (डी-इन्डिविजुअलाजेशन या मास कम्युनिकेशन) होगा। इसी दृष्टि के तहत रचने वाले लगातार रच रहे। गद्य के सावन में यदि अभी हमारे सामने वरिष्ठ कवि कुँवर नारायण की रचना ‘वाजश्रवा के बहाने’ आई है तो कहानियों के भादो में है ‘बर्फ़ में फंसी मछली।’ संग्रह में शीर्षक कहानी को सब से पहले रखा गया है। इस कहानी में उस नायक का एक स्व स्थापित होता है जिसे व्याप्ति मिलनी है अन्य कहानियों में जिसे कथाकार ने अलग-अलग कथा-चरित्रों में छुपाने की सार्थक कोशिश की है। यद्यपि छुप नहीं सका है प्रेम फिर भी प्रेम की आकुलता ने चरित्र का ऐन्थ्रोपोमॉर्फिक रूप ले लिया है ताकि वह अपनी तमाम सांसारिक विवश स्थितियों में प्रतिक्रिया तो कर ही सके। अपने सुपरिचित रंगशिल्प अर्थात संवादशिल्प के सहारे कथाकार ने अंतत: यहाँ भी आकुलता को व्याकुल ही रहने दिया है, उसे उस के अवचेतन में तृप्त नहीं होने दिया है कलिकथा बाइपास या प्रभा खेतान के मुख्य चरित्रों की तरह। इस कहानी के अंतिम दो संवाद हैं- ‘सारा प्यार भस्म हो गया था। बर्फ़ में फंसी मछली वह खुद बन गया था।’ लगभग इसी मूड में चार अन्य कहानियां भी विराम लेती हैं, संगम के शहर की लड़की, कन्हई लाल, मन्ना जल्दी आना और संवाद। संवाद एक पूरी चिट्ठी की शक्ल में लिखी कहानी है और यह पूरी है अपनी कहानी और कहन दोनों में। यह कथाकार की मोनोटोनी हो सकती है कि एक संग्रह की चार कहानी एक मूड के निकष तक ही आ पाती है लेकिन उन चारों कहानी की खूबसूरती भी उन का ऐसा अंत ही है। मैत्रेयी की मुश्किलें और एक जीनियस की विवादास्पद मौत संग्रह की श्रेष्ठ कहानियां हैं। श्रेष्ठ और सुंदर। आज के दौर में इन्हें कहानी के उत्कृष्ट मॉडल के रूप में किसी भी भारतीय भाषा की कहानी के सामने रख सकते हैं। हाल ही में बांग्ला में इसी कोटि की एक कहानी पढ़ने को मिली थी सात्यकि हाल्दार की कहानी ‘बहुरूपी’। इन तीन कहानियों में भाषा का आर्किटेक्चर एक खूबसूरती तो है किंतु उस से खूबसूरत है कि कहानी स्वयं ही अपने को कहती है, सहज और सात्विक ढंग से, लेखक के अहं की परवाह किए बगैर। हालां कि मैत्रेयी में लेखक कहीं-कहीं चाहता है कि मैत्रेयी उस के आधिपत्य से निकल न जाए जब वह उसे उसी की तरह बहने देता है-
‘मैं तितली बनकर आऊंगी।’
‘तितली बन कर क्या करोगी? ’
‘अजय से मिलूंगी।’
‘मतलब अजय को भी तितली बना दोगी? ’
‘और क्या, तभी तो उस से मिलूंगी। मिल कर खूब उड़ूंगी। पूरे पंख पसार के।’
‘तितली अगर किसी डरती है तो गिरगिट से।’
‘फिर मैं वृक्ष या फूल बन जाऊंगी। नहीं, इसे भी मनुष्य नष्ट कर देता है।’
‘तो? ’
‘मैं प्रकृति का अंश बन कर पूरी प्रकृति में रहूंगी। गंगा में, आकाश में, फूलों में, चिड़ियों में बारिश में, मंत्रों के उच्चार में ... ’
दयानंद के काव्यस्पर्शी संवादों में वह मन प्रकट होता है जो व्याप्ति चाहता है। अपने सेल्फ़ या स्व को सहज ही आकाश बनने देने और उस का उन्हीं क्षणों में साक्षी न हो कर मुग्ध भाव से निहारते रहने में कहीं दृष्टि के ठीक पीछे तैनात अंधेरे अनुभवों की विरक्ति से मुक्ति की वासना भी है। तभी वे अपना संग्रह एक बार फिर अपने अनुपूर्वी कहन ‘सुंदर लड़कियों वाला शहर’ से करते हैं। मानों बात इसी से पूरी हो सकती थी। और अंत में, ये कहानियां प्रेम की साधना को शरत चंद्र की साधनानिष्ठ प्रेमकहानियों की तरह इस मनोविन्यास में प्रशस्त करती हैं कि प्रेम के जिस भी निकष पर चरित्र शुरू हुए हों, उसी क्षण से वांछित प्रेम के योग्य बनना ही आज भारतीय चरित्र का तप है जिसकी धूप बर्फ़ होती मुश्किलों को आसान बना सकती हैं। क्यों कि छवियाँ मुश्किलें पैदा करती हैं और प्रेम अग्निरूप अनुतप्त छवियों से मुक्ति में पिघलना शुरू करता है निर्मल झरने की तरह बहने के लिए।

[ इंडिया टुडे से साभार ]

समीक्ष्य पुस्तक:


बर्फ़ में फंसी मछली
पृष्ठ-192
मूल्य-250 रुप॔ए

प्रकाशक
सर्वोदय प्रकाशन
512-बी गली नंबर- 2, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2008



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