Friday, 22 February 2013

ह्यूमन रिलेशंस के बीच जो भी चीज़ होगी, ताज़ी होगी : कुलभूषण खरबंदा

कुलभूषण खरबंदा का कहना है कि आने वाले दिन छोटे परदे के हैं। संवादों में कसैलापन कूटने और शब्दों को चबा-चबा कर बोलने वाले कुलभूषण खरबंदा अपने खास अभिनय के लिए एक शिद्दत से जाने जाते हैं। पेश है कुलभूषण खरबंदा से बात चीत के मुख्य अंश:

कहा जाता है कि आप राजिंदर  नाथ के अभिनेता हैं?

-राजिंदर नाथ का अभिनेता नहीं हूं। उन के साथ नाटकों में काम किया है। उन का रिगार्ड करता हूं। बस।

तो फिर आप किस के अभिनेता  है? मतलब किस निर्देशक के खाने में अपने आप को पाते हैं?

-किसी एक खाने में नहीं पाता अपने आप को। मैं लकी हूं कि मुझे डिफ़रेंट लोगों के साथ काम करने का मौका मिला है। श्याम बेनेगल, महेश भट्ट, राज कपूर, सिप्पी, हर तरह के लोगों के साथ हर शेड्स में काम किया है।

राजकपूर को ही लीजिए। उन की दो फ़िल्मों प्रेम रोग और राम तेरी गंगा मैली, बल्कि हिना को भी ले लें। तीनों फ़िल्मों में आप का एक ही शेड है। तीनों फ़िल्मों में आप अपने को दुहराते हैं?

-ठीक कह रहे हैं आप। पर दिक्कत यह है कि लोग आप को एक स्लॉट में डाल देते हैं तो इस के बाद आप कुछ कर सकते ही नहीं। तो राजकपूर ने भी मुझे एक स्लॉट में डाल दिया। एक श्याम हैं जो अपनी फ़िल्मों में अलग-अलग स्लॉट देते हैं।

लेकिन आप अपने स्लॉट को अभिनय  से बदल तो सकते हैं ?

-कैसे भई? हमारी फ़िल्मों में कितने तरह के स्लॉट हैं? अमीर, गरीब, प्रेमी, प्रेमिका, नायक, खलनायक जैसे घिसे पिटे फ्रेमों वाले स्लॉट हैं। तो इस में बहुत गुंजाइश मिलती नहीं।

आप की संवाद अदायगी, मूवमेंट्स स्टेप चाहे जैसी भूमिका हो, आप में अकसर एक शेड ही होता है, क्यों?
-डायरेक्टर्स की  स्टाइल तो अलग हो सकती  है, पर एक्टर की नहीं।

क्यों कई डायरेक्टर्स भी ऐसे हैं जिन की स्टाइल हमेशा एक सी रही है।


-हां, अब जैसे मन मोहन देसाई थे उन्हें अरबों रुपए आप दे देते और कह देते कि यह फ़िल्म बनाइए और ‘ऐसे’ बनाइए। तो वह नहीं बना पाते। वह तो अपनी स्टाइल में ही बनाते।

तो क्या आप हिंदुस्तानी सिनेमा को आर्ट फ़िल्म और कामर्शियल फ़िल्म के खाने में रखते हैं?

-फ़िल्म, फ़िल्म होती है। आर्ट तो दोनों हैं। अब लोगों ने नाम दे दिए हैं। पर मैं फ़िल्मों को किसी एक खाने में नहीं डालना चाहता।

आप बीच-बीच में फ़िल्मों के साथ-साथ थिएटर भी करते रहते हैं। क्या ऐसा किसी कमिटमेंट के तहत आप करते हैं?

-कमिटमेंट वगैरह कुछ नहीं। हम तो फ़िल्म हो या थिएटर बस मज़े के लिए करते हैं। हमें अच्छा लगता है। बस।

बस सिर्फ़ मज़ा, और कुछ नहीं?

-वी आर कमोडिटी। आर्ट वार्ट सब बेवकूफी की बातें हैं। देखिए मैं तो बस इतना जानता हूं कि मार्केट प्लेस में हूं। डिमांड और सप्लाई की बात है। डिस्ट्रीब्यूटर हमें इसी डिमांड और सप्लाई के बीच डिस्ट्रीब्यूट करता है।

थिएटर में भी यही डिमांड और सप्लाई की बात है?


-नहीं, थिएटर में यह डिमांड और सप्लाई की बात नहीं है। अब सखाराम करने आता हूं तो आई लूज माई मनी। बल्कि उलटे अपना ही पैसा खर्च करता हूं। संतोष मिलता है बस इस लिए।

इतने बरसों से आप सखाराम बाइंडर कर रहे हैं। कोई नया नाटक भी कर सकते थे?

-नया क्यों नहीं किया-इस के लिए दोषी मैं नहीं हूं। यह श्यामानंद जालान से पूछिए। और फिर आप यह बताइए कि नए नाटक लिखे भी कहां जा रहे हैं। खास कर हिंदी में।

आषाढ़ का एक दिन, सखाराम बाइंडर जैसे नाटक और फिर चक्र, अर्थ जैसी फ़िल्मों की बात लें। इन सभी में आप की भूमिका एकाधिक औरतों के बीच फंसे आदमी की रही है। निर्देशक आप को ही ऐसी भूमिका के लिए क्यों चुनते हैं?

-ह्यूमन रिलेशंस  के बीच जो भी चीज़ होगी, ताज़ी होगी। सेम सेक्स में तो उस तरह की प्राब्‍लम नहीं होती। ड्रामा बनता ही है तब जब इस तरह की रिलेशनशिप हो।

पर बार-बार वही भूमिका, बिलकुल उसी अंदाज़ में करते रहने का क्या तुक है?

-नए ढंग से भी कर सकता हूं। पर सच बताऊं हमेशा डर रहता है रिज़ेक्ट होने का। कि कहीं आडियंस रिज़ेक्ट न कर दे। हरदम एनलाइज़ करना पड़ता है अपने आप को।

अच्छा पुराने नाटकों को जब आज आप कर रहे हैं तो कैसा लग रहा है?

-फिर से करते समय ज़्यादा समझ आई।

आप की संवाद अदायगी में, आप की आवाज़ का जो कसैलापन है, जो आप चबा-चबा कर शब्दों को बोलते हैं। रह रह किचकिचाते हैं, चाहे जिस भी भूमिका में हों, तो क्या इसे आप अपना प्लस प्वाइंट मानते हैं?
-अब प्लस प्वाइंट है कि नहीं, यह आडियंस से पूछिए।

तो क्या यह आप अनायास ही कर जाते हैं कि सायास?


-शायद अनायास ही। अंदर जो है, अंदर की केमेस्ट्री, आप के साथ जो रिस्पांस करती है, आप वही करते हैं। शायद मेरे भीतर की केमेस्ट्री का रिस्पांस है यह।

आप व्यक्तिगत ज़िंदगी और व्यवहार में तो अकसर लो प्रोफ़ाइल में मिलते हैं पर आप परदे पर या स्टेज पर कई बार क्या, अकसर हाई प्रोफ़ाइल में होते हैं?


-मैं जो जीता हूं रीयल ज़िंदगी में, वो नाटक या सिनेमा में भी जिऊं, यह कैसे हो सकता है?

नहीं, मेरा मतलब इस दोहरी ज़िंदगी की दिक्कत?


-कहीं दिक्कत नहीं। ज़िंदगी, ज़िंदगी है। अभिनय, अभिनय है।

आप से पूछूं कि किसी एक पसंदीदा निर्देशक का नाम  लें तो किसी एक का नाम लेंगे?


-मुश्किल है।

अच्छा किसी एक ऐसे निर्देशक का नाम जो आप के अभिनय को पूरी तरह समझता हो?

-ऐसा भी नहीं है। जैसे कि एक औरत में आदमी पूरा नहीं पाता तो चार पांच औरतें ढूंढता है। किसी में कुछ किसी में कुछ पाता है। यही मैं कहूंगा कि एक ही निर्देशक में जो मुझे चाहिए वह पूरा पूरा नहीं मिलता।

सखाराम बाइडंर में आप के हिस्से का एक संवाद है कि यह देह तो वासना का भंडार  है। आप ने अभी कहा कि आदमी एक औरत में पूरा नहीं आता  तो चार पांच औरतें ढूंढता है। आप का स्कोर क्या है?
-काश कि ऐसा होता।

फिर भी?

-बस एक।

झूठ बोल रहे हैं आप?

-चलिए दूसरी बात पर आइए।

अच्छा किसी एक नए निर्देशक का नाम लीजिए जो आप को भाता हो?

-एक क्यों, नए निर्देशकों में कई मुझे पसंद हैं। जैसे जे.पी. दत्ता हैं, सूरज बडज़ात्या, राजकुमार संतोषी हैं। इस तरह नए लड़के बहुत अच्छे निकले हैं।

और पुरानों में?

-पुरानों में किसी एक की बात करना, इस का मतलब है हम खत्म हो रहे हैं। खास कर तब जब हम कहते हैं कि फलां ऐसा था। कई बार मुश्किल होती है ‘ओल्ड गाड’ के साथ बैठने में हमें। कि हमारे वक्त में तो यह होता था। मुझे इसी लिए गुस्सा आता है सेमिनार वगैरह में। मैं नहीं जाता भरसक। क्यों कि वहां यही होता है कि हमारे वक्त में यह होता था।

आप इन दिनों छोटे परदे यानी दूरदर्शन और ज़ी टी.वी. के धारावाहिकों में भी आने लगे हैं। क्या फ़िल्मों की व्यस्तता कम होती जा रही है?
-आप को सच बताऊं?

बिलकुल?

-सच यह है कि टी.वी. पर अब फ़िल्मों से ज़्यादा पैसा मिलने लगा है। एक-एक सीरियल से चार-पांच लाख रुपए तक। और यह भी छोटी-छोटी भूमिकाओं के लिए।

तो क्या आने वाले दिन छोटे परदे के हैं?

-इकोनामिक्स अगर छोटे परदे की ज़रा सी सही हो गई तो आने वाले दिन छोटे परदे के ही हैं। जैसा कि हॉलीवुड में हो भी गया है।

आप की आने वाली नई फ़िल्में कौन-कौन सी है?


-कनाडियन फिल्म ‘सेम एंड मी’ कर के अभी आया हूं। हिंदी में अंगरक्षक, मवाली, एम.एल.ए., बार्डर आदि।

[ १९९५ में लिया गया इंटरव्यू ] 

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