Sunday, 10 February 2013

पुरुषों के खिलाफ क्या बोलूं , पुरुष तो गुड्डे हैं : ऊषा गांगुली

अपने को प्रश्न पीड़ित व्यक्ति और बहुत ही लड़ाकू औरत बताने वाली सुप्रसिद्ध निर्देशिका ऊषा गांगुली शायद हिंदी रंगमंच की इकलौती हैं जो नाटकों में दर्शकों का रोना नहीं रोतीं। वह धारा प्रवाह बोलती हैं गोया बाढ़ में हरहराती नदी। नदी के वेग की तरह अकुलाती और छटपटाती हुई। उन के द्वारा निर्देशित नाटकों की देश भर में धूम है, हाल खचाखच भरे होते हैं। रुदाली, होली, कोर्ट मार्शल, लोककथा, महाभोज, वामा और गुड़िया घर जैसे नाटकों ने हिंदी रंगमंच में ऊषा गांगुली की उपस्थिति को न सिर्फ़ प्रतिष्ठित किया है बल्कि हिंदी रंगमंच को एक नया तेवर और नई दृष्टि भी दी है। ऊषा गांगुली की थिएटर में अभी भी पूरी आस्था है और इस के सिवाय वह कुछ और करना ही नहीं चाहतीं। वह कहती हैं कि, ‘मेरी नस-नस में थिएटर समाया हुआ है। तो थिएटर और सिर्फ़ थिएटर। थिएटर ही मेरा आदर्श है, मेरा ओढ़ना, बिछौना और जीवन है।’ पर ऊषा गांगुली आज की व्यवस्था से भी बहुत खिन्न हैं। वह नाराज हैं और खिलाफ। और लड़ना चाहती हैं। लड़ती भी रहती हैं। इसी लिए वह कहती भी हैं कि ‘मैं बहुत लड़ाकू औरत हूं।’ यह पूछने पर कि क्या पुरुषों से नाराज हैं ? पुरुषों के खिलाफ लड़ना चाहती हैं ? वह कहती हैं कि, ‘नहीं, व्यवस्था के खिलाफ। पुरुषों के खिलाफ क्या बोलें, पुरुष तो ‘गुड्डे’ हैं।’ कह कर वह अर्थपूर्ण ढंग से मुसकुराती हैं। भरतनाट्यम करते-करते थिएटर की राह को अपनी मंजिल, अपनी ज़िंदगी बना लेने वाली ऊषा गांगुली से खास बातचीत पेश हैः-

हिंदी थिएटर की दुर्दशा की बात बहुत चलने लगी है इधर। आप को क्या लगता है ?
- मैं भी आज-कल घबराई हुई हूं थिएटर की स्थिति से। हालांकि हर महीने हम कम से कम 12-14 शो कर रहे हैं। बंगाल से बाहर भी। जयपुर, अहमदाबाद, लखनऊ, गोवा। गरज यह कि देश भर में। घूम-घूम कर नाटक करते हैं। घूमना ज़्यादा होता है इस लिए नाटकों में उपकरणों का प्रयोग मैं कम ही करती हूं ।मकसद ज़्यादा से ज़्यादा दर्शकों के बीच जाना होता है। हमें तो दर्शकों की दिक्कत कभी नहीं होती पर संपूर्ण थिएटर के सामने संकट सचमुच बहुत ज़्यादा है। इलेक्ट्रानिक मीडिया के आक्रमण से सारा देश बिलबिलाया हुआ है, थिएटर ज़रा ज़्यादा ही।

पर इलेक्ट्रानिक मीडिया भी तो थिएटर के लोगों से ही चल रहा है ?
- हां, दरअसल अब नया कलाकार आता है तो हमें इस्तेमाल करने की कोशिश करता है। हमारी उंगली पकड़ कर सीखता है और अचानक फ़िल्म या इलेक्ट्रानिक मीडिया ज्वाइन कर लेता है। इस तरह थिएटर पर अपनों की ही मार ज़्यादा है। पर मुझे लगता है कि इतने आक्रमणों के बावजूद थियेटर मरेगा नहीं। रुकेगा नहीं।

थियेटर को, खास कर हिंदी थिएटर को वह भी हिंदी हलकों में आखिर कैसे संभाला जा सकता है ?
- मैं बार बार लखनऊ आती रहती हूं। और कहती रहती हूं कि उत्तर भारत में थिएटर की सेहत ठीक करने के लिए नियमितता बनाए रखने की ज़रूरत है। अगर एक नियमितता बन गई तो थिएटर नहीं रुकेगा। क्यों कि दर्शक तो भूखा है। उसे अच्छा नाटक चाहिए। मेरा कहना है कि अच्छा नाटक उठाइए। और हफ़्ते का कोई एक या दो दिन तय कर लीजिए। हर हफ़्ते नियमित रूप से नाटक कीजिए। बिना टिकट किसी को घुसने नहीं दीजिए। देखिए क्या होता है ? बंगाल में थिएटर की यह नियमितता ही उस की शक्ति है।

पर यहां तो अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैचों तक के टिकट खरीदने वाले नहीं मिलते। स्टेडियम खाली रहता है। पास पर भी लोग नहीं पहुंचते। ?
- क्रिकेट और थिएटर में कुछ तो फ़र्क कीजिए। आज आप अच्छा थिएटर करिएगा तो ज़रूर लोग आएंगे। टिकट खरीद कर आएंगे। बस उसे नियमित बनाइए। नियमितता लाइए। मैं उत्तर प्रदेश की रहने वाली बंगाल में रहती हूं। इतने नाटक कर रही हूं। मेरे साथ पेशेवर लोग भी नहीं हैं। कहीं कोई नौकरी कर रहा है, कोई अध्यापक है, कोई बेरोजगार है। पर सब नियमितता के साथ हैं। प्रोफ़ेशनली नाटक करते हैं पर नज़रिया पेशेवर नहीं है। थिएटर की बेसिक समझ अगर सही है तो आप को कोई रोक नहीं सकता। आप किसी भी जगह थिएटर कर सकते हैं। पर ऐसा हो नहीं रहा है। इस लिए मैं परेशान हूं थिएटर को ले कर। मेरी नस-नस में घुस गया है थिएटर। इस लिए मैं थिएटर को ले कर बहुत परेशान हूं।

महिला होने के नाते भी दिक्कत होती होगी ?
- हां, महिला हूं यह रियलिटी है। महिला होने के नाते सामाजिक ढांचे में बड़ी दिक्कत होती है। पर स्ट्रांग हो कर फेस करती हूं। हमारी भीतरी लड़ाईयां भी हैं, द्वंद्व भी हैं, पर भीतरी समस्याओं को तो हम बाहर कहते नहीं। फिर भी मैं बहुत लड़ाकू और हूं।

क्या महिला को लड़ाकू होना चाहिए ?
- बिलकुल होना चाहिए। महिला को बड़ा कमजोर माना जाता है न, कि बहुत नाजुक हैं, बहुत भावुक हैं। तो इस लिए लड़ाकू होना चाहिए।

यह लड़ाकूपन पुरुषों के खिलाफ होना चाहिए कि व्यवस्था के खिलाफ ?
- नहीं-नहीं, व्यवस्था के खिलाफ ही। पुरुषों के खिलाफ क्यों बोलें ?पुरुष तो गुड्डे हैं न। (कहते हुए वह एक अर्थपूर्ण हंसी हंसती है।)

खैर बात थिएटर की ही करें ।
- 25 बरस पहले जो मेरा आदर्श था आज भी बना हुआ है। क्यों कि मैं मानती हूं कि अगर समाज को हम बदल सकते हैं, उसे प्रश्न पीड़ित कर सकते हैं तो सिर्फ़ थिएटर से। थिएटर सचमुच हथियार है। अब यह आप पर निर्भर करता है कि उसे कितना पैना, कितना तेज़ बनाते हैं। कितना प्रश्न पीड़ित बनाते हैं। दरअसल मैं खुद भी बहुत प्रश्न पीड़ित व्यक्ति हूं। बचपन से ही। मेरी मां बचपन में हर बात पर डांट देती थीं कि हर बात पर सवाल, हर बात पर सवाल। मां परेशान हो जाती थी। मैं बहुत परेशान करने वाली थी। पूछती ही रहती थी लगातार। ऐसे ही आज भी जब नाटक करती हूं तो चरित्रों के बारे में सवाल पर सवाल करती हूं।

हिंदी रंगमंच की दुर्दशा की खातिर निर्देशकों की मनमानी खास कर स्क्रिप्ट को बूटों तले रौंदा निर्देशक नाम की संस्था ने, क्या इस को ज़िम्मेदार नहीं मानतीं आप ? पार्टी लाइन नाटक भी ज़िम्मेदार नहीं ?
- निर्देशक की मनानी, बूंटों तले रौंदना, पार्टी लाइन- यह सब मैं नहीं मानती। पर यह सही है कि अच्छे हिंदी नाटक नहीं हैं हमारे पास। मैं पूछती हूं कि हिंदी लेखक अच्छी कहानियां, अच्छे उपन्यास लिख सकते हैं तो अच्छे नाटक क्यों नहीं लिख सकते? साहित्यकार को छोटा करने की मेरी मंशा नहीं पर क्षमा कीजिए, निर्देशक निरंकुश नहीं है। बताइए कि मोहन राकेश को निर्देशकों से कभी शिकायत क्यों नहीं हुई ? तो मेरा हिंदी के साहित्यकारों से विनम्र निवेदन है कि वह थिएटर से जुड़ें जैसे मोहन राकेश, शंकर शेष, सुरेंद्र वर्मा, लक्ष्मी नारायण लाल, मृणाल पांडेय जुड़े हैं।

इलेक्ट्रानिक मीडिया या फ़िल्मों में आप को बुलाया नहीं गया या आप गई नहीं ?
- रोज-रोज आमंत्रण आते हैं। हज़ारों रुपए ले कर लोग आते हैं। पर मैं अपने आदर्शों से हटी नहीं। गई नहीं।

25 बरस के थिएटर कैरियर में आप 22 बरस से निर्देशन कर रही हैं। पर 22 बरसों में सिर्फ़ 9 नाटक ही निर्देशित किए हैं ।
- हां, मैं क्वालिटी में विश्वास करती हूं, क्वांटिटी में नहीं। मैं तो भरत नाट्यम करती थी। मृच्छकटिकम नाटक में बुलाया गया। यह 1970 की बात है। 1970 में ही अध्यापिका भी हुई। फिर कोई20-22 नाटकों में अभिनय किया। एवार्ड भी मिले। फिर निर्देशक हो गई।

इन दिनों आप की मुख्य चिंता क्या है ?
- पढ़ाते-पढ़ाते मुझे लगता है कि हमारे बच्चे निजी भाषा भूलते जा रहे हैं। अपनी निजी भाषा में बोलना भूल रहे हैं वे। अपनी अभिव्यक्ति भूल रहे हैं। मैं दूसरों को क्या कहूं, मेरा बेटा भी अपनी भाषा भूल रहा है। मैं उस अर्थ में अंग्रेजी की कट्टर विरोधी नहीं हूं। लेकिन मातृभाषा हम क्यों भूलें ? पर हम अपनी जुबान भूल रहे हैं।

बतौर स्त्री आपको कैसे पुरुष पसंद हैं ?
- स्त्री हूं, यह रियलिटी है। पर मैं चूजी नहीं हूं। कि फलां पसंद है। पुरुष कैसे पसंद ? ऐसी कोई बात नहीं। मेरी चिंता में ऐसी बातें नहीं आतीं। फिर भी मैं सब से मिलना पसंद करती हूं। इस लिए कि मैं बहुत प्रश्न पीड़ित व्यक्ति हूं। और फिर मैं ने आप से कहा ही कि पुरुष तो बेचारे गुड्डे हैं। (कह कर, वह फिर हंसती हैं) पर इस को सचमुच सच मत मान लीजिएगा। मैं तो मजाक कर रही थी।

[यह साक्षात्कार 1997 में लिया गया था।]

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