Wednesday, 20 February 2013

ऐक्टिंग ही मेरी ज़िंदगी हैः श्रीदेवी

चुलबुली, शोख और सुंदर श्रीदेवी आज लखनऊ को अपने औचक सौंदर्य से नहलाने आ गईं। श्रीदेवी ने आज कहा भी कि, ‘लखनऊ पहले नज़र में बहुत खूबसूरत सिटी है, बहुत ‘अच्छे’ सिटी है।’ उन्हों ने जोड़ा, ‘यहां के लोग बहुत प्यारे हैं। पर आज मौका मिला है खुद आ कर लखनऊ देखने का।’ उन्हों ने आज लखनऊ आते ही पहला काम चिकन के कपड़ों की खरीददारी का किया।रुपहले परदे पर ग्लैमर जीने, ‘हवा-हवाई’ कही जाने वाली श्रीदेवी व्यक्तिगत जीवन में बहुत ही शालीन, विनम्र और बिना तड़क-भड़क, मेकअप के लटकों-झटकों से दूर रहती हैं। वह कहती भी हैं, ‘हम भी आर्डिनरी हैं। जैसे फ़िल्मों में चमक-दमक में दिखती हूं, सामान्य जीवन में नहीं।’ देश भर के लोगों के लिए ‘क्रेज़’ बन चलीं श्रीदेवी अपने प्रशंसकों, दर्शकों (फैंस) की बड़ी शुक्रगुज़ार हैं। वह कहती हैं कि, ‘जो इतना नाम, इतनी शोहरत मिली, आज जो कुछ भी मैं हूं वह अपनी फैंस की बदौलत हूं।’‘ज़िंदगी भर एक्टिंग ही करते रहना चाहती हूं।’ कहने वाली श्रीदेवी, मद्रासी टच दे कर हिंदी बोलने वाली श्रीदेवी किसी भी विवादित सवाल के चक्कर में नहीं पड़तीं। ऐसे सवालों वह शालीन जवाब से निपटा देती हैं। अभी वह इंगलिश-विंगलिश कर के फिर चर्चा में हैं। पेश है श्रीदेवी से हुई १९९६ में हुई एक बातचीत का संक्षिप्त अंशः-
  • आप ‘सदमा’ जैसी फ़िल्में भी करती हैं और ‘रूप की रानी और चोरों का राजा’ जैसी फ़िल्में भी करती हैं। जब कि यह दोनों फ़िल्में दो ध्रुव हैं। इन दोनों ध्रुवों को कैसे साधती हैं आप?
-सब तरह की फ़िल्में करनी चाहिए। एक तरह की नहीं करनी चाहिए। हमको सबको खुश करना चाहिए।
  • जैसे कि कुछ लोग अभिनय को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। तो कुछ लोग पैसा कमाने के लिए। एक्टिंग को अपनी ज़िंदगी में आप किस तरह से लेती हैं?
-एक्टिंग मेरी ज़िंदगी है। इस के अलावा मेरे को कुछ मालूम ही नहीं। इस प्रोफ़ेशन को मैं बहुत रिस्पेक्ट करती हूं। हथियार वगैरह जैसी चीज़ें मैं नहीं जानती।
  • आप अगर एक्ट्रेस नहीं होतीं तो क्या होतीं?
-चूंकि बचपन से एक्ट्रेस ही बनी हूं तो ऐसा मौका नहीं मिला कि सोचूं कि एक्ट्रेस के सिवाय कुछ और सोचती।
  • माना जाता है कि ‘चांदनी’ आप की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म है। और यह भी कि अगर आपने सिर्फ़ चांदनी फ़िल्म ही की होती तो भी इसी ग्लैमरस श्रीदेवी के रूप में स्थापित रहतीं। आप की क्या राय है?
-शुक्रिया, जो आप ने मुझे इतना मान दिया है। पर ऐसा मैं नहीं मानती। क्यों कि एक आर्टिस्ट के लिए सिर्फ़ एक ही फ़िल्म काफी नहीं होती। हर पिक्चर में हमारा काम अच्छा होना चाहिए।
  • आप अपनी कुछ और अच्छी फ़िल्मों के नाम लेना चाहेंगी?
-नहीं। मुझे हर फ़िल्म के बाद में लगता है कि और अच्छा कर सकती थी। तो मैं अपनी किसी भी फ़िल्म से सेटिस्फ़ाई नहीं हूं।
  • इन दिनों जो अनाप-शनाप हिंदी फ़िल्में बन रही हैं, उन के बारे में आप की क्या राय है?
-कोई कमेंट करना नहीं चाहती। मैं सिर्फ़ अपनी फ़िल्मों से ही वास्ता रखती हूं।
  • आप की पहली हिंदी फ़िल्म ‘सोलहवां सावन’ थी। पर चली नहीं। फिर ‘हिम्मतवाला’ के साथ वापस आईं। अब फिर ‘आर्मी’ के साथ आप की वापसी की बात चली थी...
-मैं गई ही कब थी कि वापसी की बात होती।
  • नहीं, मैं कहना चाहता हूं जैसे कि ‘आर्मी’ में आप ने मेच्योर रोल किया। मतलब दूसरा दौर शुरू किया?
-दूसरा दौर क्यों? अभी मेरा पहला दौर ही है। ‘आर्मी’ के पहले भी ‘खुदा गवाह’ जैसी कई और फ़िल्मों में भी मैं ने मेच्योर रोल किए हैं। इस में नया क्या है?
  • किस ‘हीरो’ के साथ आप की ज़्यादा अच्छी ट्यूनिंग है?
-मेरी सभी हीरो के साथ ट्यूनिंग अच्छी होती है। सब हीरो के साथ ट्यूनिंग है। मैं इन सब चक्करों में पड़ने के बजाय मैं डिपेंड करती हूं स्टोरी पर और अपने कैरेक्टर पर।
  • ज़्यादातर फ़िल्मों में आप शोख और चुलबुली नायिका हैं। तो क्या आप ऐसे ही करेक्टर जान बूझ कर चुनती हैं?
-नहीं, मैं ने कई तरह के रोल किए हैं। करेक्टर जैसा हो, मैं उसे वैसा ही जीती हूं।
  • पर आप व्यक्तिगत ज़िंदगी में चुलबुली और शोख नहीं दिखतीं?
-मैं ने पहले ही कहा कि हम भी आर्डिनरी हैं। जैसे आप या कोई और। स्टार होना मतलब आसमान पर पहुंचना नहीं। हम भी इंसान हैं।
  • ‘चांदनी’ और ‘लम्हे’ दोनों फ़िल्मों में आप अपने को कैसे डिफ़रेंट बताना चाहेंगी?
-दोनों डिफ़रेंट फ़िल्में ही हैं। ‘चांदनी’ भी अच्छी है और ‘लम्हे’ भी। चांदनी चल गई पर लम्हे भी बहुत बुरी नहीं गई।
  • आप का पसंदीदा फ़िल्मी गीत?
-लम्हे में छोटे से रूम में एक गाना किया था, ‘मेरी बिंदिया, तेरी निंदिया’ मेरा फ़ेवरिट गाना है।
  • पसंदीदा निर्देशक?
-मैं ने सभी फ़ेवरिट डायरेक्टर के साथ ही काम किया है।
  • पसंदीदा संगीतकार?
-सभी म्यूजिक डायरेक्टर फ़ेवरिट, सभी लिरिसिस्ट फ़ेवरिट हैं।
  • आप की कई पूर्ववर्ती नायिकाओं ने जैसे हेमा मालिनी, वैजयंती माला आदि ने फ़िल्मों में अभिनय का दौर खत्म होने के बाद डांस स्कूल या फ़िल्में डायरेक्ट करने जैसे काम भी किए हैं। आप क्या करना चाहेंगी?
-मैं ज़िंदगी भर एक्टिंग ही करती रहना चाहती हूं। कुछ और नहीं। और फ़िलहाल तो आप के लखनऊ में पहली बार आई हूं। खुश हूं कि यहां के अपने फ़ैंस को देखने के लिए आई हूं। मुझे उम्मीद है कि मेरे फ़ैंस भी मुझे देख कर खुश होंगे। मैं अपने फ़ैंस को खुश कर देना चाहती हूं।
  • शादी कब करना चाहती हैं?
-अभी तक कुछ सोचा ही नहीं है।

[१९९६ में लिया गया इंटरव्यू]

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