Tuesday, 19 February 2013

नाटक तो हमारे लिए व्यवस्थाजन्य संघर्ष है:मुद्राराक्षस

मुद्राराक्षस हिंदी का एक बहुचर्चित नाम है। कविता, कहानी, उपन्यास और नाटक सभी में मुद्राराक्षस अपनी सोच दृष्टि और प्रस्तुति में सब से अलग हैं। और काफी कुछ अपनी प्रखर रचनाधर्मिता के कारण विवादास्पद भी।

मुद्राराक्षस रंगमंच से पूरी तरह न केवल जुड़े हैं बल्कि उन के द्वारा समय-समय पर किए जाने वाले प्रयोग रंगमंच के लिए देन भी साबित होते रहे हैं। यहां प्रस्तुत है रंगमंच के संदर्भ में मुद्राराक्षस से बातचीत:

आप ने अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम रंगमंच क्यों चुना?
-अभिव्यक्ति का माध्यम मेरे लिए रंगमंच ही नहीं बल्कि सारी रचनाधर्मिता है। कवि, कथाकार, समीक्षक और नाटककार के रूप में। हां, इन सब के बीच रंगमंच एक खास माध्यम ज़रूर है। और खास तौर पर रंगमंच हमारे लिए सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया से जोड़ने का एक माध्यम है। राजनीति वाले इसे दूसरे ढंग से करते हैं, मैं अपने ढंग से।

आप रंगमंच को अपने जीवन में क्या स्थान देते हैं?
-मैं सामाजिक परिवर्तन में विश्वास रखता हूं। और उस से जुड़ना चाहता हूं। इस लिए एक तरह से हमारे लिए व्यवस्थाजन्य संघर्ष बल्कि लड़ाई कह लें, का स्थान (नाटक का) अपनी ज़िंदगी में देता हूं।

मंचन के लिए नाटकों का चुनाव आप किस दृष्टि से करते हैं?
-दो दृष्टि से अलग-अलग प्रयोग करता हूं।

१. एक तो जिसमें रंगमंचीय प्रयोगों की संभावनाएं हैं।
२. दूसरा चुनाव उस के सामाजिक कथ्य क्या हैं?

आप नाटक क्यों करते हैं? आखिर उद्देश्य क्या है?
-जो किसी भी रचनाधर्मिता का होता है। हां, कोई भी कला इस में शक नहीं कि ऐसा दस्तावेज तो होती नहीं जिसे संसद में प्रस्तुत किया जाय, और फिर समाज में काम हो। रचना इतना ज़रूर करती है कि लोगों में वस्तु स्थिति का बोध कराती है। दूसरे जो स्थिति है उस के प्रति सही आलोचनात्मक दृष्टि पैदा करती है। और यह नाटक, कविता और पेंटिंग्स में भी हो सकती है। इस तरह से नाटक जो है, हमारे लिए एक अदालत है। जहां पूरे समाज को ला कर खड़ा किया सकता है। और उस के बारे में फ़ैसले लिए जा सकते हैं।

रंगमंच आप के लिए व्यवसाय है या शौक? या प्रतिबद्धता?
-प्रतिबद्धता। वो भी इस लिए कि मेरे लिए हर विधा जिस में रंगमंच भी शामिल है, एक खास मकसद को पूरा करने के लिए है। और वह मकसद है बुनियादी तौर पर सामाजिक परिवर्तन यानी इस सामाजिक धुरी को बदलना।

आप की दृष्टि में वर्तमान संदर्भों में रंगमंच की क्या समस्याएं हैं?
-एक तो सब से बड़ी समस्या यही है कि इस पर वर्ग स्वार्थ या कह लें निहित स्वार्थ होता जा रहा है। जिन के पास साधन और सुविधाएं हैं और जो समाज में शोषण के ज़िम्मेदार हैं उन लोगों का अधिकार होता जा रहा है। इस लिए वहां से उन के प्रभाव से नाटक को मुक्त करना है। दूसरी समस्या जो है, वो अच्छे नाटककारों के अभाव की है।

अंत में चलते-चलते वह कहते हैं कि, ‘ नाटक की एक बहुत बड़ी चीज़ या खासियत है कि सारी कलाएं जहां वरिष्ठ पीढ़ियों की कलाएं होती हैं, वहां रंगमंच में हिस्सा लेने वाले अधिकांश नई पीढ़ी के होते हैं। बुड्ढे कम। और ऐसा हर समय में होता है। इसी लिए रंगमंच एक जीवंत विधा है।



[१९७८ में लिया गया इंटरव्यू]

No comments:

Post a comment