Tuesday, 7 February 2012

मेंड़ की दूब


गांव से मां की एक लंबी चिट्ठी आई है। बल्कि कहूं कि हर बार की तरह बुलावा आया है। लेकिन इस बार एक ख़ास तरह का। वह ख़ुद यहां आना चाहती है। इस नाते बुलाया है कि आ कर हमें ले चल।

चिट्ठी के मुताबिक, खेतों में तो आग लग ही गई है, लगान की किस्त न जमा करने से कुर्क अमीन गाय-गोरू भी खूंटे से खुलवा ले गया है। गांव, भाई-बिरादरी से लगभग ख़ाली हो चुका है। सिर्फ कुछ बुजुर्ग लोग और चंद बड़े घरानों के तथा बनिए और बकिया मजूर ही रह गए हैं। मजूरों में भी नौजवान लड़के बंबई-कलकत्ता भागने लगे हैं। क्यों कि मजूरी अब रोजाना से गिर कर आधी हो गई है, वो भी बड़ी मुश्किल से। ट्यूबवेलों से बिजली तो गायब ही थी, अब पंपिंग सेटों का डीजल भी लापता हो चुका है। हां, चोरी-छिपे और बड़ी सोर्स-सिफारिश से कहीं-कहीं ब्लैक में डीजल मिल रहा है, वो भी बड़े मुश्किलन। संझवाती जलाने के लिए मिट्टी का तेल भी ब्लैक में, वो भी बड़े जुगाड़ के बाद।

दुखरना खेत में पानी चलाने के लिए उधार रुपया खोजता रहा, उधार न मिलने पर अपनी औरत और पतोहू की नथिया, बेसर, झूलन, कड़ा-छड़ा, हुमेल और हंसुली आदि सारे जेवर सेठ के वहां गिरवी रख कर उस ने किसी तरह खेत सींचा। कुल-कुल करने के बाद भी खेत में जवानी नहीं लौटी। खेत के सारे धान सूख कर पुआल हो गए। दुखरना अब पगला कर मारा-मारा फिर रहा है।

....पुरोहित जी अपना पंचांग देख कर बता गए हैं, कि इस वर्ष खण्ड वृष्टि का ही योग प्रबल है। कहीं प्रलयंकारी बाढ़ आएगी तो कहीं भयंकर सूखा पड़ेगा। संसार में बड़ा पाप बढ़ गया है। इस पाप से उद्धार होने के लिए हवन-होम, जाप-तप आदि करना पड़ेगा। पुरोहित जी की ही राय से गांव में अनिश्चित अखंड हरिकीर्तन जारी है।

....गांव के छोटे लड़के रोज मेघ राजा को खुश करने के लिए घर-घर, दरवाजे- दरवाजे, घूम कर काच-कचौटी खेलते हैं। हर दरवाजे पर कीचड़ कर के उस में नंगी देह बच्चे दिन-दिन भर लोटते-पोटते रहते हैं....

....गांव की नई लड़कियां दिन में कजरी गाती हैं, बूढ़ी औरतें चारों पहर पानी बरसने के लिए तरह-तरह की मनौतियां मानती हैं। तो रात में जवान औरतें हल-जुआठा ले कर खेतों में नंगी हो कर हल चलाती हैं पर ये बेरहम देव इतना बेईमान ठहरा कि सारे बादरों को हजम कर जाता है। लाख मनौतियों और जुगाड़ों के बाद भी वर्षा की एक बूंद तक पृथ्वी को मयस्सर नहीं होती....

और अब तो बेटवा हालत यहां तक पहुंच गई है कि काहे न आकाश ही धरती पर गिरा दिया जाए, खेतों में हंसिया नहीं जाने की। घर की पूंजी भविष्य को सुधारने में पहले ही डूब चुकी है। कुल मिला कर गांव अब जीता-जागता नरक हो गया है। मैं क्या-क्या गिनाऊं। अब ख़ुद ही आ कर देख लेना।

इन नाते बेटा, चिट्ठी पाते ही तुरंत आ जाओ, हमहूं तैयार बैठी हैं।


सावन-भादों का महीना और आकाश को घेरे ढेर सारे बादल। काले, भूरे, उनीले और तहीले बादलों को देख कर बरसात की उम्मीद बंधती है। लेकिन बेरहम पछुआ हवा बादलों को बटोर अपने डैनों पर चढ़ा कर उड़ा ले जाती है और रह जाता है बादलों से वीरान आग उगलता आसमान....छिटपुट बादलों में कैद सूरज वैसे ही चमकने लगता है जैसे बैसाख और जेठ में दहकता था।
धान, कोदो, सांवा, टागुन और मक्का की फसलें झुलस कर नेस्तनाबूद हो चुकी हैं। नदियां सिमट कर अपने दोनों कगारों के बीच दफन हैं। क्या ताल, क्या पोखर और क्या पोखरी....सब का पेट ख़ाली हो चुका है। सारे मेड़ और चकरोड....बैशाख-जेठ जैसे आग की तरह तपते हैं।

दुर्दिन को झेलना कितना कठिन होता है। सोचता हूं क्या यही वह गांव-जवार है, जहां नदियां-नाले मिल कर बरसात में सागर का रूप धर लेते हैं। बाढ़ में गांव के रास्तों की पहचान डूब जाती है। पड़ोसी गांव तक पहुंचना दूभर हो जाता है। आख़िरकार, हमारे बाप-दादों की यह कहावत, टाटी ओट हजार कोसकिस जालिम ने कैद कर ली है ? विश्वास नहीं पड़ता कि ये वही गांव, वही जवार है जो आज सांय-सांय कर रहे हैं। खेतों की धरती सूखा से दरक गई है।

आगे बढ़ता हूं और अविश्वास ज्यादा देर तक नहीं टिक पाता। परधान काका को देखते ही मोहभंग हो जाता है। ये वही परधान काका हैं, जिन के यहां पिछले साल मैं शीशे के छोटे-छोटे बर्तनों में रखी चावल की कई किस्में देख कर चकित रह गया था, कि इस घामड़ इलाके में....और परधान काका दूध का गिलास हाथ में थमा कर बड़े उत्साह के साथ उन किस्मों के बारे में विस्तार से बताने लगते थे। आज वही परधान काका मुझे देख कर कुछ बोलने के बजाय गुमसुम-से खड़े हो कर मुझे सिर्फ देखते रह जाते हैं। बोलते कुछ नहीं। हैरानी होती है।

मैं परधान काका की सूखी आंखों का सामना नहीं कर पाता और झट मेड़ छोड़ कर आगे कच्ची सड़क पर बढ़ जाता हूं। सड़क के दोनों ओर सांय-सांय करते खेत और भी बोझिल कर देते हैं।
याद आता है, कभी इन्हीं सड़कों पर कुवार-कातिक के महीनों में गुजरते वक्त मादक गंध के बयार में डूब-उतरा जाता था मैं, और सर्वेश्वर के एक गीत की वह कड़ी बरबस मन में गूंजने लगती थी, ‘दादुर, मोर, पपीहा बोले, बोले चूनर धानी रे/  खनखन-खनखन चुरिया बोले, रिमझिम-रिमझिम पानी रे....।

उस अनबूझ गंध में कितनी ही बार आकंठ डूबने का अनुभव कर चुका हूं। इस धूल-भरी सड़क के दोनों ओर, दूर-दूर तक पुरवइया में लहराते धान के काले फूल की गंध में जितना खिंचाव था, उसे सहन करना भी उतना ही कठिन। रोम-रोम में बस जाने वाली वह सुगंध कभी पकड़ में नहीं आई। हिरन की कस्तूरी जैसी, कंटीली चंपा से मिलती-जुलती या इस से अलग, अनोखी सुगंध....।

और आज सड़क वही है, और राही भी वही, पर उस भीनी सुगंध का कहीं नामो-निशान न था। सड़क के दोनों ओर लगातार पड़ने वाली खत्तियों में पहले आदमी के डूबने भर का पानी भरा रहता था। इस बार कहीं-कहीं जरा-जरा पानी दिखाई पड़ा। कीचड़ में बच्चे छोटी मछलियां पकड़ रहे थे। कीचड़-भरी खत्तियों के बाद दूर-दूर तक खेतों में कूचियों जैसे धान के पौधे उगे हुए हैं। उठान एक फुट से अधिक नहीं। फुनगियां धूप से झुलसी हुई जैसे खेतों में आग लग गई हो।

आगे, दूसरी ओर से आते एक अपरिचित बुजुर्ग मिल गए। उन्हें जै राम जी कह कर बात शुरू की तो खेतों की तरफ देखते हुए वह छूटते ही बोले, ‘‘दोहाई राम जी कै झूठ नाहीं बोलब, बबुआ, हमार उमिर साठ-सत्तर बरिस कै हो गईल लेकिन अबले अइसन कब्बो नाहीं भईल रहल कि सावन-भादों के एह तरे दगा दे जायं बरसुआ नाखत बादर....’’ बोलते-बोलते उन का स्वर भर्रा गया।

बगल के खेत में केवल काका बेड़ी से पानी उलीच रहे थे। एक ओर वे, दूसरी ओर उन की घरवाली। कच्चा आठ बिगहा में जया और परी किस्म का धान उन्हों ने बड़ी जतन और उम्मीद से लगाया था। अधबीच जवानी मरते पौधों को बचाने की केवल काका जी-तोड़ कोशिश कर रहे थे। उन के करीब जा कर उस खेत की दरार भरी धरती से अधिक गहरी झुर्रियां उस प्रौढ़ किसान के चेहरे पर मैं ने देखीं और कुछ क्षणों तक देखता ही रहा। सोच रहा था कि बात कहां से शुरू करूं कि केवल काका के कांपते होंठ इतना ही कह सके, ‘‘बचवा अब की सूखा....’’ आगे के शब्द गले के भीतर ही घोंट कर उस दुनिया-देखे किसान ने अपने सूखे खेत के फैलाव को अपनी आंखों में समेटते हुए जब मेरी ओर निगाह उठाई तो उस की पुतलियों पर कांपते-झिलमिलाते अनेक अर्थों को झेल पाना मेरे लिए कठिन हो गया। वह निगाह मन को भीतर तक बेधती चली गई....उन मटमैली पुतलियों में न जाने क्या था ?

‘‘बचवा अब की क सूखा....’’ आगे बहुत कुछ कोटरों में धंसी दो छोटी-छोटी आंखें कह रही थीं। केवल काका के प्रति सांत्वना के दो शब्द भी मैं नहीं कह पा रहा था....। उन के पास यही आठ बिगहा खेत हैं। बड़ी आशा ले कर घर की पूंजी उन्हों ने बीज, खाद, निराई में लगा दी कि अगहन उतरने पर जया, परी धान से उन का घर भर उठेगा। वह उम्मीद सूखा की चपेट में सूख गई। आगे रबी में क्या होगा, इस की आशा किस आधार पर केवल काका के बुझे हुए मन में हरियाली भर सकती थी ? बोझिल मन से सड़क की ओर चलने लगा कि तपते आकाश के सन्नाटे को धारदार तीखी आवाज से चीरता कोई पक्षी सर्राटे से गुजर गया। केवल काका सिर को झटका दे कर आकाश की ओर ताकते-ताकते सिहर उठे। अनबूझा-सा ठिठक कर मैं केवल काका की ओर देख रहा था। वे बोले, कवि घाघ की कहावत है, बेटा !
डोक खोली जाय अकास,
अब नाहीं बरखा की आस।

मैं कुछ कहता कि काकी बोल पड़ीं, ‘‘बेटवा, ईनि ऐसै कहाऊत कहत रहि जईहें। बीसवारन से कहि रहल बाटीं कि ई खेती-बारी में जो अब आगि लागि गईल त कवनो दूसर धंधा देखा। नाहीं अबहिन एक जून खाए के जो मिल तो बा चार दिन बाद दूनो जूनी उपवास होखे लागी....’’ काकी का भाषण जारी रहा। अब यहां और रुकने की सामर्थ्य कम से कम मुझ में नहीं रह गई थी।

एक पढ़े-लिखे सज्जन मिले जो पड़ोसी गांव के प्राइमरी स्कूल में अध्यापक हैं। मिलते ही वे भी शुरू हो गए सूखा पर ही....मैं ने उन्हें छेड़ा कि, पढ़े-लिखे आदमी हो कर आप भी कायरों और बुजदिलों जैसी बातें बक रहे हैं ?उन्हों ने मुझे घूर कर देखते हुए कहा, नहीं भाई साहब, आप इस जवार के आदमी हैं, यहां के उतार-चढ़ाव से वाकिफ हैं, कम से कम आप को ऐसा नहीं कहना चाहिए।वह रुके और बोले, हां, मैं तो भूल ही गया था कि आप को शहरी हवा लग गई है, आप कह सकते हैं।मुझ पर बोली कसने के बाद मास्टर साहब बताने लगे, ‘‘दरअसल, भाई साहब! सच तो यह है कि यहां के लोग बहुधा बाढ़ और छिटपुट सूखा से सदैव जूझते रहे हैं। दैवी आपदाओं से यहां के किसान परिचित हैं, उन्हें वे कितनी ही बार झेल चुके हैं। विपदा से जूझना और फिर उसे भूलना हम किसानों की आदत है। लेकिन इस साल तो जैसे सूखा ने, क्या छोटा काश्तकार और क्या बड़ा, सभी को बुरी तरह झकझोर दिया है।’’

अभी मास्टर साहब से विदा ले कर बागीचे की ओर बढ़ा ही था कि खाद्यान्न योजना के अंतर्गत हो रहे काम में हाजिर बाबू के पद पर कार्य पर रहे बैरागी परसाद मिल गए। बैरागी परसाद मेरे साथ प्राइमरी स्कूल में पढ़े हुए हैं। आगे इन की पढ़ाई न हो सकी। बैरागी परसाद उतावली के साथ मिलते हुए कहते हैं, ‘‘भइया ! इस समय घर जा रहा हूं, रात में घर आऊंगा, तब मजे से बात-चीत होगी।’’ मैं कहता हूं, ‘‘ठीक है, लेकिन आना जरूर....’’

सांझ अब अवसान पर है, गांव के सीवान पर एक छोटी पुलिया है। वहां शाम को प्रायः छोटे-बड़े सभी लोगों का उठना-बैठना होता है। सोचता हूं, सब से मुलाकात हो जाएगी और इसी गरज से पुलिया की ओर बढ़ लेता हूं....रेडियो से ग्राम जगतकार्यक्रम का प्रसारण सुनाई देता है। पुलिया पर पहुंचता हूं। छोटे-बड़े सभी से औपचारिकता पूरी करने के बाद बैठता हूं।

अपनी मेहनत के बल बूते, धरती सरग बनावल जाई !विषय पर जुगानी भाई का रेडियो भाषण चलता ही रहता है, कि मार्कण्डेय जो संभवतः 10वीं या 11वीं कक्षा में पढ़ता है, रेडियो बंद कर देता है। और रेडियो बंद करते ही, मुझ से एक सवाल दाग बैठता है, भइया ! क्या बात है कि ई रेडियो वाले जुगानी के रोज-रोज के इस रूखे भाषण में कभी भी सूखा नहीं होता। उलटे पंप सेटों, ट्रैक्टरों के लिए डीजल की वर्षा होती है। खेतों के लिए बिजली की अनवरत आपूर्ति रहती है और नहरों से पानी का समुंदर बहता है....

दरअसल बात ये है, मार्कण्डेय, कि जुगानी ये सारा कुछ अपने मन से नहीं झींकते हैं, अरे भाई, उन को तो ऊपर से यानी सरकार से जैसा आदेश आता है, वैसा ही उगल देते हैं, वे सरकारी नौकर ठहरे, अब जो सरकार कहेगी, वही तो उन्हें करना है। और करें भी न तो क्या करें....

अभी मैं जवाब दे ही रहा होता हूं कि मेरी बात को लगभग काटते हुए जतन काका, जो रेडियो पर जुगानी का रूखा भाषण रोज सुनते हैं, बोल पड़ते हैं, नाहीं बेटा, तनी जुगानी और सरकार दूनों के लगे चिट्ठी लिख के हमरी ओर से पूछब कि अब कैसे कवन मेहनत करीं, जेसे कि ई धरती सरग बनि जात। वैसी, बेटा....रेडियो क कहना मानीं त रेडियो से त धरती कबकै सरग बनि भईलि बा। अब तूहीं बताव ले बीया खरीदलीं। जरत जेठ में लूह खात बज्जर जस धरती कै छाती चीरलीं। पानी नईखे बरसल। बोरिंग मालिक के पानी के दाम दे के बेहन डरलीं। 25 दिन तक बेहन रखवलीं। टेक्टर के भाड़ा दे के खेत तैयार करवलीं। रोपनी के पहिले खाद डरलीं। मजूरन के मजूरी दे के रोपनी करवलीं। फेर पानी नाई बरसले पर दू-दू बेर खेत सिंचवलीं। एतना मेहनत अउ पूंजी हम लगवलीं और कुलि खेत सूखि गईल। अब बताव हम का करीं ? माथा फोर लेईं ?

अभी जतन काका चुप होते कि रामदीन भी अपनी भड़ास निकालने लगा, ‘‘कोआपरेटिव के अमीन और एकाउंटेंट, तहसीलदार के अमीन और चपरासी, ब्लाक के पंचायत सेवक, सब साले अपना-अपना बस्ता बांध कर गांव में आते हैं। बस्ता और बहीखाता खोल कर अपना-अपना बकाया मांगते हैं। सरकार साली तो ढिंढोरा पीट-पीट कर कहती है कि सारी लगानें माफ हो चुकी हैं और इधर ये कमीने कहते हैं कि अभी आदेश नहीं आया है और साले खूंटे से गोरू खोल ले जाते हैं, हरामी....माधर....!’’

अंधेरा काफी गहरा चला था, बल्कि अब रात हो गई थी, लोग उठ कर धीरे-धीरे घरों की ओर जाने लगे और पुलिया की मीटिंग लगभग डिसमिस हो गई।

मैं भी चला आया।

घर पर दस-बारह लोगों की तादाद देख कर मैं चौंक-सा गया। बाद में मां ने बताया कि हमारे साथ ये भी शहर चलना चाहते हैं। मैं ने माथा ठोंक लिया तो मां ने कहा, काहें ऊंहों कौनो काम नाहीं मिल सकत....।

तुम समझती क्यों नहीं ? अरे शहर कोई कोयले की खदान है या कि बनिए की दुकान कि जैसा चाहा वैसा काम तलाश कर पा लिया। अरे वहां कोई काम पा लेना यहां से भी ज्यादा मुश्किल है।मैं ने मां को लगभग डांटते हुए कहा। मां सिसकने लगी। मैं भी चुप हो गया।

खाना खा कर अभी चारपाई पर लेटा ही था कि बैरागी आ गया।

आओ भाई बैरागी।कहते ही वह आ कर चारपाई पर एक ओर बैठ गया। बोला, मैं सोच रहा था, आप सो गए होंगे, लेकिन तब भी सोचा मिल लूं। सो गए हों, तो भी जगा कर। दरअसल दिन में काम से फुर्सत नहीं मिलती, सो चला ही आया।

हां, भाई ! हाजिर बाबू हो....कमाई कर रहे हो।मैं ने व्यंग्य-भरे स्वर में कहा।

नहीं भइया ! आप हम को गलत न समझिए !

अच्छा बच्चू, चोरी की चोरी, और सीनाजोरी भी ?

सच भइया ! मैं तो सिर्फ चार-छः रुपए ही अपनी मजदूरी से अधिक कमा पाता हूं, सो भी चमचई कर के। घपला तो साले ऊपर वाले कर रहे हैं। अब देखो, एक आदमी पीछे जो अनाज सरकार की ओर से स्वीकृत है, लेकिन ये कमीने ठीकेदार औना पौना नकद दे कर सब को टाल देते हैं....लोग सब कुछ जानते हुए भी मजबूरन चुप रह जाते हैं। और ये ठीकेदार साले सारा अनाज हड़प जाते हैं।

इस तरह एक तरफ तो ये ठेकेदार के पिल्ले सब घोटाला कर अनाज हड़पते हैं; दूसरी ओर माधरचोद बनिये यह अनाज ख़रीद कर अपना गोदाम भर रहे हैं, इन्हीं मजूरों-किसानों को लूटने के लिए।

अच्छा तो अब भाषण भी ख़ूब देने लगे हो मिस्टर बैरागी परसाद ! क्या चुनाव लड़ने का इरादा है ?

नहीं, भाई, अपनी इतनी औकात कहां ? वैसे एक बात पक्की जान लो, इस बार जो भी नेता साला आएगा, वो चाहे किसी भी पार्टी का हो....साला वापस तो नहीं ही जाने पाएगा....।

ऐसा ! लेकिन क्यों ?मैं ने अनजान बनते हुए कहा।

ये भी कोई पूछने की बात है ? अरे अब अनाज तो रहा नहीं, उन्हीं कमीनों को भून कर खाएंगे हम लोग।वह मुझे पछाड़ते हुए बोला।

अच्छा छोड़ ये बकबक। तू अब कुछ ही दिनों में नेता जरूर बन जाएगा। बड़ा नहीं तो छुटभैया नेता तो जरूर ही बनेगा। लेकिन यह तो बता, तेरी खेती-बारी का क्या हाल-चाल है ? तुम ने कुछ बताया ही नहीं ?

मेरी खेती-बारी सुनना चाहते हैं, क्या लोगों से सुनते-सुनते अभी पेट नहीं भरा....कहते-कहते बैरागी एकाएक गंभीर-सा हो गया। बोला, अरे, कुल जर जमा पांच ही बिगहा तो खेत है, जिस में से 4 बिगहे में धान बैठाए था। एक बिगहे में गोरुओं के लिए चरी बोई और बाजरा छिड़क दिया था। धान फूटने के पहले ही सूखने लगे तो काट कर गोरुओं को खिला दिया। चरी की बढ़ोत्तरी नहीं हुई और सूखा के कारण जहर पड़ने के डर से पशुओं को खिला नहीं सकता था....सो वो भी बेकार ही गया।और बैरागी जम्हाई लेने लगा।

तो कुछ भी नहीं हुआ ? बाजरा की भी पैदावार कुछ नहीं हुई ?मैं ने सहानुभूति जताते हुए पूछा।

कहां की बात करते हो भाई, लंदन से उतर कर तो नहीं आए ?

बैरागी ने फिर कहा, बाजरा थोड़े पानी में हो जरूर जाता है। कहावत है....बज्जर परे तो भी बजरा होय। लेकिन, भाई, अब की तो जरूर बज्जर से भी ज्यादा कुछ पड़ गया है, बाजरा भी सूखने लगा।

ठीक कहत हौ बैरागी ! ई सूखा नहीं खेतिहरन पर बज्जर गिरल है, बज्जर। ई विपत्ति पंच कैसे झेली....हे राम !कुछ-कुछ रुआंसी और आतंकित-सी मां ने कहा।

सब झेल लेंगे....बैरागी मां को सांत्वना-सी देते हुए बोल पड़ा, हम तो मेड़ की दूब हैं, काकी ! कितनी बार सूख कर फिर हरे हो गए। सूखना और फिर हरा होना, यही तो जिंदगानी है। और यह बज्जर सूखा सदा थोड़े ही रहेगा।

बैरागी के चेहरे से उदासी एकाएक गायब हो गई थी और उस उदासी की जगह एक आशा ने ले ली थी, जिस से उस के पीले पड़ गए चेहरे पर एकाएक लालिमा दौड़ने-सी लगी थी। और मैं ने देखा, मां की आंखों में आए आंसू जाने कहां उन तहीले-उनीले बादलों की तरह गायब हो गए थे।

मेरी आंखों में, कभी मां का स्थिर चेहरा तो कभी बैरागी का तेज चेहरा और कभी सूखे खेतों की परछाईं तो कभी खेतों में बेड़ी से पानी उलीचते हुए केवल काका की मटमैली पुतलियां और उन के द्वारा धान के पौधों को बचाने की जी-तोड़ कोशिशों की परछाइयां....आड़े-तिरछे नाच-नाच के झांक रही थीं। बैरागी का यह कहना कि हम तो मेड़ की दूब हैं काकी ! कितनी बार सूख कर फिर हरे हो गए। सूखना और फिर हरा होना, यही तो जिंदगानी है।रह-रह कर टीसता है ! नींद नहीं आती। जबरिया सोने की कोशिश करता हूं। सो नहीं पाता।

भिनसहरा हो गया है। मां जाग गई हैं। शहर चलने की तैयारी में जुटी हुई हैं। मैं भी उठ बैठता हूं। चुपचाप बैठते भी नहीं बनता। उठ कर लुंगी लपेटता हूं। कुछ सोचते-सोचते पुलिया की ओर बढ़ लेता हूं। गांव की औरतें खुसुर-फुसुर बतियाती हुई सीवान की ओर से लौट कर वापस आ रही हैं। पुलिया पर कोई नहीं है। दरअसल मैं गलत समय पर आ गया हूं। इस समय मरद लोग इधर नहीं आते।

फिर भी मैं पुलिया पर बैठ लेता हूं।

सोचता हूं कि अगर मैं भी शहर न जाऊं तो कैसा रहे ? 


इस कहानी का मराठी अनुवाद 

मराठी अनुवाद : प्रिया जलतारे

आदरणीय Dayanand Pandey जी की कविताये और कुछ गजले मैने मराठी में अनुवादीत की। आज एक कहानी का अनुवाद किया है। पांडेय जी ने इसे 1979 में लिखा। सूखे का वर्णन हॄदस्पर्शी लिखा है।मेरे महाराष्ट्र के कुछ जिल्हे 5 सालों से सुखेसे ग्रासित है।गरीब किसान आत्महत्या कर रहे है। सरकार पर दबाव है। पिने के पानी की समस्या है। मेरा प्रिय शहर अकोला ,जहां मैं पढ़ी लिखी, इस शहर में महापालिका से 10 दिनों के अन्तराल से पानी मिलत है। 
पांडेय जी की कहानी मुझे मर्मस्पर्शी लगी। इस कहानी का आशावाद , जिंदगी जिने को बल देता है। संबल देता है।
मेरे महाराष्ट्र के किसान भी मेंड़ की दूब से जीवन जीने का गहरा तत्वज्ञान समझे।
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🌱 बांधावरची हरळी 🌱

गावावरुन आईचे एक लांबलचक पत्र आले .खरे म्हणजे, नेहेमीप्रमाणे बोलावणे आले आहेे.पण ह्या वेळेस एका खास प्रकारचे.ती स्वतः च इथे यायचे म्हणतेय. ह्या करता बोलावले की तू ये आणि मला घेवून चल.
पत्राप्रमाणे, ‘शेत तर अगदी उजाड झाले आहे, कर्जाच हप्ते दिले नाहीत म्हणून कुर्क अमीन खूंटाला बांधलेल्या गाय गोर्ह्याला घेवून गेला. गावात नातेवाईक, भाऊबन्द कोणी राहिले नाही.फक्त म्हातारे , तालेवार ,व्यापारी आणि मजूर लोक उरलेत.मजूरांमधली तरुण पिढी देखील मुम्बई ,कलकत्त्याला पळतेय.कारण गावात आता रोजन्दारी सुद्धा अर्धीच मिळते ,तेही मोठ्या मुश्किलीने. ट्यूबवेल ची वीज आता गायब आहे.पम्पिंग सेटचे डिझेल ही गायब.हं, पण चोरून आणि कोण्या मोठ्याच्या शिफारशीने अवैध मार्गाने डिझेल मिळते. ते ही खुप कठिण. सांध्यकाळी दिवा लायायला रॉकेल सुद्धा अवैध मार्गे आणि खूप जुगाड़ करून.
दुखरना शेताला पाणी द्यायला उधार पैश्याची जुळवाजुळव करत होता,उधारी मिळेना, मग बायकोचे होते ते सगळे सावकराकडे तारण ठेवून
कर्ज घेतले.शेताला पाणी पुरवले. पण शेतात नव यौवन सळसळले नाही. सारं पिक वाळून खाक झाले.दुखरना आता वेड लागल्या सारखा फिरतो.
पुरोहित जी, त्यांचे पंचाग पाहुन सांगून गेले की ह्या वर्षी खंड वृष्टी चा प्रबळ योग आहे. कुठे प्रलयकारी महापूर तर कुठे कोरडा दुष्काळ. जगात खूप पाप वाढले आहे.ह्या पापातून उद्धार व्हायचा असेल तर होम-हवन, जप -तप करायला हवे.पुरोहितजींच्या सल्ल्याने गावात अनिश्चित अखंड हरी कीर्तन सुरु आहे.
गावातले छोटे मूलं रोज मेघ राजाला खुश करायला घरोघरी, दारोदारी फिरून खेळ करत होते.प्रत्येक घराच्या अंगणात चिखल करून त्यात नंगे पोर दिवस भर लोळतात.
गावातील नव्या पोरी पावसाचे गाणे म्हणतात, म्हातार्या बायका भरपूर पावसा साठी नवस करतात.तर तरुण बायका रात्री शेतात नांगर चालवतात.पण हा निर्दयी देव इतका बेईमान आहे सगळे ढग लंपास करतो.लाखो नवस सायास करुन ही 
पावसाचा एक थेम्ब काही पृथ्वी वर आला नाही….
आणि बेटा, आता परिस्थिती अशी आहे की आकाशच जमिनीवर खेचावे. घरातले सगळे पैसे शेतावर, भविष्य सुधारायला खर्च झाले. गाव तर आता जीताजागता नरक झाला आहे. मी काय काय सांगू ?आता तू स्वतः च एकदा येवून पहा.
ह्या करता बेटा, पत्र पोहोचले की लगेच ये.मी तयार आहे.’
श्रावण भादव्याचे महीने
आकाशाला घेरुन टाकणारे, अस्ताव्यस्त पसरलेले काळे,काळे, राखाडी ढग पाहीले की पावसाची आस वाटते.पण ही दुष्ट हवा, हे वारे ह्या ढगांना आपल्या कवेत घेऊन कुठे वाहावत नेते आणि मग राहते ते वीराण, आग ओकणारे आकाश….छोटुल्या मेघांनी कैद केलेला सूर्य तसाच चमकत आहे , जसा वैशाख,जेष्ठात चमकत होता.शेतातलं सगळे धान,मका नेस्तनाबूत झाले. नद्या आकुंचन पावल्या.दोन्ही तिरात गाडल्या गेल्या. कसले तलाव,कसले झरे न कसले ओहोळ ,नाले सगळ्यांचे पोट कसे अगदी च रिकामे.सगळे बांध ....वैशाखातल्या कोरड्या जलाशया सारखे भकास.
दुर्दैवाचे दिवस कंठणे अति कठीण.विचार करतोय, काय हेच ते माझे गाव ’जवार’ आहे, जिथे पावसाळ्यात नद्या, नाले एकरूप झाले की समुद्राचे रूप धारण करतात.पुरात रस्ते स्वतः ची ओळख विसरतात.शेजारच्या गावात जाणे अशक्य होते. आमच्या वाडवडीलांची म्हण ,’काखेत कळसा,गावाला वळसा’ ही अशी खरी ठरते. विश्वासच नाही बसत की हे तेच जवार गाव आहे,जे असे ओसाड झाले आहे. कोरड्या दुष्काळाने शेतातली जमीन दुभंगत चालली.
पूढे जातो तर अविश्वास फार काळ रहात नाही.प्रधान काका दिसले की मोह भंग होतो. मागच्या वर्षी ह्याच काकांकडे काचेच्या छोट्या सटांमधे
तांदुळाचे ठेवलेलेे अनेक प्रकार पाहुन
मी चकीत झालो होतो ह्या प्रदेशात तांदूळ?प्रधान काका मोठ्या खुशीत, माझ्या हातात दुधाचा ग्लास देवून,तांदुळाचे प्रकार मला समजावून सांगत होते.आज काका मला पाहुन मौन झाले. त्यांना अबोल पाहुन मी हैराण होतो.
मी प्रधान काकाच्या कोरड्या नजरेचा सामना करु शकत नाही लगेच बांध सोडून कच्या वाटेवर येतो. वाटेवर दुतर्फा कोरडे रखरखीत शेत पाहुन मनावरचा ताण वाढत जातो.
लहानपणाचेआठवते मला, कधी ह्या वाटेवर कार्तिक महिन्यात देखील वातावरणात एक मादक सुगंध भरुन राहायचा.त्या सुरभित शीत लहरीत बुड़ुन जायचो मी, सर्वेश्वर चे एक कडवे मनात गुणगुणायचो,
’दादुर, मोर,पपीहा बोले,
बोले चुनर धानी रे ।
खनखन खनखन चुरिया बोले,
रिमझिम- रिमझिम पानी रे…’
त्या अनोख्या गंधात किती वेळा आकंठ बुडलो, वेड लावणारा अनुभव घेतला होता.धूळ भरल्या वाटेच्या दोन्ही बाजूंना दूर दूर वरच्या शेतातल्या पिकाच्या फुलांचा गंध सहन करणे तेवढेच अवघड.रोमारोमात भिनलेला तो मादक गंध कधी पकडता आला नाही.मृगाच्या कस्तूरी चा, काटेरी चाफ्या सारखा मत्त सुगंध…..
आणि आज तीच वाट, तोच वाटसरु, पण त्या चिरपरिचित सुगंधाचे नामोनिशाण नाही.वाटे जवळ धान्य साठवायचे गड्डे पहिले पाण्याने भरत. आता अगदी तुरळक ठिकाणी पाणी दिसले. चिखलात मुले छोटे मासे पकडत होते.शेतात धान्य उगवले ते एका फूटाच्या वर गेले नाही. रोपटे सुद्धा असे माना टाकलेले, आगीत भाजल्या सारखे, कोमजून गेलेे.
पुढे गेल्यावर एक अपरिचित प्रौढ़ इसम भेटले. त्यांना ,’जय राम जी’ म्हणून बातचीत चालू केली, शेताकडे नजर फिरवत ते म्हणाले,”जय राम जी, 
खोटे नाही सांगत,सत्तरीला आलो, पण ह्या सारखे कधी झाले नाही,श्रावण भादव्यात मेघ बरसले नाही….”बोलता बोलता त्यांचा स्वर भरुन आला.
बाजूच्या शेतात केवल काका पाणी काढत होते. एका बाजूला ते, दुसऱ्या बाजूला त्यांची पत्नी.आठ एकरात ,’जया’आणि ‘परी’प्रकारचे धान्य त्यांनी खूप काळजीने,आशेने लावले .अर्धवट मरणाऱ्या रोपांना वाचवायचा काका जीवतोड प्रयत्न करत होत.त्यांच्या जवळ जावून, त्या शेतातल्या भेगाळलेल्या माती पेक्षा जास्त गहीरे बदल सुरकुत्यांच्या रुपात काकाच्या चेहऱ्यावर वर होते, मी तेच पहातच राहिलो.
विचार करत होतो की आता काय बोलू, केवल काकांचे कापणारे ओठ एवढेच बोलू शकले,” बाळा, हा दुष्काळ…”पुढचे शब्द त्यांनी गिळले,त्या आयुष्यभराच्या अनुभवी शेतकऱ्याने ,आपल्या कोरड्या शेतावर नजर पसरवून, सारे शेत नजरेत सामाऊन घेत, माझ्या कडे नजर वळवून पहिले ,त्यांच्या डोळ्यांच्या पुतळ्यांंमध्ये कंपित अनेक अर्थ झेलणे माझ्या साठी कठीण झाले.ती नजर माझ्या मनात आरपार वेधून गेली ...त्या मातकट पुतळ्यांमधे न जाणो काय होते? 
“ बाळा, हा दुष्काळ…” खोल खोल गेलेले छोटे छोटे डोळे हे बोलत होते. काकाशी सांत्वना दाखल दोन शब्द ही मीे बोलू शकलो नाही.त्यांच्या कडे आठ एकर जमीन आहे .खूप आस ठेवून त्यांनी बियाणे, खत ह्यात घरातले सगळे पैसे गुंतवले ,जया, परी हे धान्य घरात येईल, खूप पैसे मिळतील.ती आशाच दुष्काळात
होरपळून गेली.आता रब्बी त काय होईल, ह्याची आशा कश्याच्या भरावश्यावर, केवल काकाच्या निराश, रुक्ष मनात पुन्हा आशा पालवून देईल? ओढलेल्या मनाने मी वाटेवर चालायला लागलो, तेवढ्यात तप्त आकाशाच्या नीरवतेला कापत, धारदार , विचित्र आवाज करत एक पक्षी जोरात उडत गेला.केवल काका मानेला झटका देवून आकाशाकडे पाहात राहिले. गोंधळून मी त्यांच्या कड़े पाहात होतो .ते म्हणाले की ,”कवी घाग ची म्हणआहे, “बेटा! डोक खोली जाय अकास, अब नाही बरखा की आस।” म्हणजे आता काही शेतीची आशा नाही कारण पावसाचीच शक्यता नाही….
मी काही म्हणायच्या आत काकी म्हणाली,” ह्या म्हणी तर नुसत्या बोलायचे म्हणून. पण कधीची मी ह्यांना समजवते आहे, ह्या वेळी हा असा भीषण दुष्काळ आहे दूसरा धंदा पहा. आता एक वेळ चे तरी जेवत मिळते, चार दिवसांनी हे तरी मिळेल की नाही?दोन्ही वेळेस फाके पडतील”.” काकी चे भाषण सुरु होते. आता अजून इथे थांबण्याचे सामर्थ्य माझ्या अंगी नव्हते.
एक सुशिक्षित सज्जन भेटले, ते शेजारच्या गावात शाळेत शिक्षक आहेत.त्यांचे लगेच ‘दुष्काळ , दुष्काळ’सुरु झाले मी म्हणालो,
“सुशिक्षित असून ही निराशआणि उदास बोलता?”ते रोखून पाहात म्हणाले,” नाही नाही भाऊसाहेब, तुम्ही जवारचे आहात, इथले चढ़ उतार तुम्हाला माहित आहेत, कमीत कमी तुम्ही असे म्हणू नका,”. मग थांबून म्हणाले ,“हो,मी तर विसरलो की तुम्हाला शहराची हवा लागली,तुम्ही बोलू शकता.”मला कडवट बोलून
गुरुजी म्हणाले,” खरे तर ,भाऊ साहेब!
असे आहे की इथले रहिवासी, कधी पूर ग्रासित तर कधी दुष्काळग्रासित नेहमीच असतात. दैवी संकटांची इथल्या लोकांना सवय आहे, सततच आपदांना तोंड देतात.विपदांचा सामना करायचा, परत विसरायचे शेतकऱ्यांची जीवन गाथा असते. पण ह्या वर्षी, ह्या दुष्काळाने गरीबच काय श्रीमंतांचे सुद्धा कम्बरडे मोडले.”
पूढे निघालो तितक्यात खाद्यान्न योजनेत काम करणारे बैरागिप्रसाद भेटले. हे प्राथमिक शाळेत माझ्या सोबत होते. पूढे त्यांना शिकायला मिळाले नाही. ते म्हणाले,”भैया,आता घरी जातो, रात्री तुमच्या घरी येतो, तेव्हा गप्पा मारू.” मी म्हणालो,”ठीक आहे, पण नक्की या…. .”
सांध्यकाळ होत आली.गावाच्या वेशीवर एक पूल आहे. सांध्यकाळी बरेच लोक तिथे बसतात. तिथे जाऊन बसले तर सगळ्यांच्या भेटी होतील, त्या साठी तिकडे वळलो.रेडियो वर ‘ग्राम जगत’ कार्यक्रम चालू झाला.पुलावर पोहोचलो, सगळ्यांना
अभिवादन करुन बसलो.
‘आपल्या बळावर धरतीवर स्वर्ग
बनवू.’रेडियो वर जुगानी भाई चे भाषण चालू झाले आणि दहावी का अकरावी ला असणाऱ्या मार्कण्डेय ने रेडियो बंद केला.त्याने एक प्रश्न केला,
“भैया! हे पहा, रेडियो वर जुगानी भाई
रोज कोरडे भाषण देतात.ह्यांच्या भाषणात कधी दुष्काळ नसतो.उलट 
पम्प सेट,ट्रॅक्टर यासाठी डिझेलचा पाऊस पडतो. शेताला चोवीस तास अखंड विज पुरवठा असतो आणि पाटाला तर समुद्रासारखे पाणी च पाणी.”
“ खरे तर असे आहे मार्कण्डेय, हा जुगानी सगळे काही मनानेच नाही बोलत, अरे त्यांना सरकारी आदेश असेल, तसे बोलतात. ते सरकारी नोकर आहेत.सरकार जे सांगेल तेच बोलावे लागते. बोलेल नाहीतर काय करेल? ….” 
मी बोलत असतानाच माझे बोलणे मधेच काटत जतन काका ,जे रेडिओवर चे जुगानी चे रुक्ष भाषण रोज ऐकतात, म्हणाले,” नाही बेटा
तू आता जुगानी ला आणि सरकार ला पत्र लिही आमच्या तर्फे आणि विचार की आता कशी मेहनत करू, जेणेकरून ही धरती स्वर्ग बनेल.आता
तूच सांगितले ते बियाणे आणले. जाळणाऱ्या जेष्ठ महिन्यात नापिक
जमिनीची मशागत केली.खत टाकले.बोरिंग च्या मालकाकडून पाणी विकत घेतलं. ट्रैक्टरचे भाडेे दिले.मजूरांना पैसे देवून रोपणी केली. मग पाऊस आला नाही . पाणी विकत घेवून सिंचन केले.इतकी मेहनत आणि भांडवल गुंतवले .आणि सम्पूर्ण शेत हेअसे सुकले , आम्ही काय आता डोके फोड़ू?”
जतन काका चुप झाले तर रामदीन काका त्रागा करायला लागले.
“को-ऑपरेटिव संस्थेचे कारकून आणि अधिकारी,तहसीलदाराचे कारकून आणि चपराशी,पंचायत सेवक सगळे आपले बस्ते घेवून गावात येतात.
आपआपला हिस्सा मागतात.इकडे सरकार म्हणते की शेतकऱ्यांचे समूर्ण कर्ज माफ, इकडे हे भ्रष्ट अधिकारी म्हणतात की अजून आदेश आला नाही.जे मिळेल ते घेवून जातात. हरामी….”
अंधार वाढत चालला, सगळे घराच्या मार्गाला लागले .पुलावरची सायं सभा संपली.
मी ही निघालो.
घरी दहा, बारा जण माझी वाट पाहात होते, मला नवलच वाटले. मग आई म्हणाली, ह्यांना पण तुझ्या गावाला यायचे आहे. मी कपाळ बडवून घेतले.आई म्हणाली ,” ते काम शोधतील”.
“तुला समजत नाही आई, शहरात काय कोळसा खदान आहे, वाण्याचे दुकान आहे, लगेच काम मिळायला? तिथे काम मिळणे खुप कठीण असते. मी आईला चांगलेच फैलावर घेतले.तिच्या डोळ्यात पाणी पाहून मी एकदम चुप झालो.
जेवण करून खाटेवर आडवा झालो तर बैरागी आला.
ये, ये बस. खाटेवर बसत तो म्हणाला,” मला वाटले झोपले की काय, पण तरी पाहू म्हणून आलो. दिवसा वेळ मिळत नाही.”
“हो रे बाबा, बाबू आहेस ,कमाई मस्त आहे.”
“नाही भैया, तुमचा गैरसमज आहे .” 
“अच्छा बचु, चोरी वर शिरजोरी!”
“नाही भैया , खरेच सांगतो. मी फक्त दोन ,चार रुपये जास्त घेतो, ते ही चमचेगीरी करून. घोटाळा तर वरचे करतात.आता बघा, एका माणसाला जेवढे धान्य सरकार देते, हे ठेकेदार त्यातले ही धान्य पळवतात. सगळे काही दिसत असून ही काही बोलता येत नाही.”
“ एकीकडे हे ठेकेदार घोटाळा करतात, दुसरीकडे व्यापारी हेच धान्य विकत घेतात .आपले कोठार भरतात.
परत ह्याच ग़रीबांना लुटतात.”
“वा, भाषण पण देतात आता बैरागी प्रसाद, काय निवडणूक लढवायची आता?”
“नाही,माझी कुठली एवढी हिम्मत?तशी एक गोष्ट मात्र निश्चित, ह्या वेळेस जो ही कोणी नेता निवडून येईल, तो कुठल्या का पक्षाचा असेना.. परत जाणार नाही.”
“असं, पण का?” मी असे विचारले, जणू मला काही कळत नव्हते.
“हा काय प्रश्न झाला?आता धान्यच नाही तर आता नेत्यांना भाजून खाऊ!” 
“अच्छा, सोड ही बकबक. काही दिवसांतच तू नेता जरूर बनशील. मोठा नाही तर छोटा नेता तरी नक्कीच होशील. पण हे तर सांग,
तुझ्या शेतीवाडी चा हालहवाल काय?तू काही सांगितले नाही.”
“माझ्या शेतीवाडी चे काय विचारता, इतरांचे ऐकून पोट नाही भरले ?..... सांगता सांगता बैरागी 
एकदम गंभीर झाला.सगळी मिळून
पाच एकर जमीन माझी,चार बिघ्यात 
धान्य पेरले, एका बिघ्यात गुरांसाठी बाजरी लावली. पण पाणी नाही, पाऊस नाही. थोडे फार जे उगवले
ते गुरांसाठी ठेवले.” बैरागी जांभाई
देत म्हणाला.
“मग काहीच नाही हाती आले,
बाजरी पण नाही?”मी सहानुभूती ने विचारले.
“कश्या गोष्टी करता भैया, लंडनहून च आले जसे तुम्ही!”
बैरागी पूढे म्हणाला, “बाजरी थोड्या पाण्यावर होते. नापिक जमिनीवर बाजरी म्हणतो न आपण. पण भैया,ह्या वेळी अति झाले, बाजरी सुद्धा सुकत आहे.”
“खरे आहे रे बाबा,बैरागी हा नुसता दुष्काळ नाही, अगदी वज्रच कोसळले . हे असले संकट कसे झेलावे…हे राम!” रडक्या स्वरात आई बोलली .
“सगळे झेलत राहू….”बैरागी आई ला सांत्वना देत म्हणाला, “आपण तर बांधावरची हरळी आहोत काकी!किती तरी वेळा वाळून जाते तरी परत हिरवी टवटवीट होते हरळी! सूख आणि दुःख हेच तर जीवन आहे.हा असला कोरडा दुष्काळ काही नेहमी थोडा राहील!”
बैरागीच्या चेहऱ्यावरची उदासी एकदम गायब झाली आणि निराशेच्या जागेवर आशा पसरली.पिवळा पडलेल्या चेहऱ्यावर वर मस्त लालिमा पसरली.आणि आई कडे पाहिले तर आश्चर्यच,आईच्या डोळ्यातले आसवं तर त्या दुष्काळातल्या ढगांसारखे झरकन गायब झाले.
माझ्या नजरेत ,कधी आईचा
चेहरा,कधी बैरागीचा तेजस्वी चेहरा, कधी ते दुष्काळातले शेत, तर कधी शेताला पाणी देण्याचा असफल प्रयत्न करणारे केवल काकांचे मातकट
डोळे ,पीक वाचवण्यासाठी जीवतोड मेहनत, प्रयत्नांची पराकाष्ठा ह्या सगळ्या सावल्या उभ्या आडव्या नाचत होत्या.बैरागीचे म्हणणे आहे 
की , “आम्ही तर बांधावरची हरळी आहोत काकी! किती वेळा वाळून जाते तरी पुन्हा हिरवी टवटवीत होते ना हरळी! सूख आणि दुःख हेच तर जीवन आहे.” राहून राहून ही दुष्काळी परिस्थिती वेदना देतेय . झोपच येत नाही.जबरदस्तीने झोपायचा प्रयत्न करतो, पण झोपू शकत नाही.
पहाट झाली, आई उठली.
गावाला जाण्याची तयारी करत राहिली.मी उठलो. चूप बसणे मला जमत नाही.उठलो, लुंगी घालून निघलो. विचारा विचारात पुलाकडे निघालो.गावातल्या महिलांची कुजबुज चालली होती, वेशीवरुन त्या परत येत होत्या.पुलावर आता कोणी नव्हते.मी चुकीच्या वेळी आलो होतो. ह्या वेळी पुरुष इकडे फिरकत नाहीत.
तरी मी पुलावर बसलो. विचार करतोय मी पण जर शहरात परत न गेलो तर कसे राहील ?
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🌹मूळ लेखक- दयानंद पांडेय

🌹अनुवाद -प्रिया जलतारे

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