Friday, 16 May 2014

जनादेश को तानाशाही का रंग देना फ़ासिज्म है

कुछ और चुनावी फ़ेसबुकिया नोट्स
  • मित्रो, विरोध करना और जहर उगलना दोनों दो बात है। जनादेश को तानाशाही का रंग देना फ़ासिज्म है। मुमकिन हो तो इस से बच लेने में नुकसान नहीं है। लोकतंत्र का पहला तकाजा विरोध ही है। लेकिन जनादेश को खारिज कर खुद को क्रांतिकारी घोषित करना अपने को सिर्फ़ और सिर्फ़ भ्रम में रखना ही है, कुछ और नहीं।

  • यह अच्छा है कि आज फ़ेसबुक पर सेक्यूलरिज्म की लफ़्फ़ाजी हांकने वाले, बेवजह जातीय और सांप्रदायिक जहर उगलने वाले तमाम साथी विश्राम मोड में चले गए हैं। अब शायद उन की मोतियाबिंद का इलाज भी हो जाए और कि वह समय की दीवार पर लिखी इबारत को पढ़ने लायक हो जाएंगे। हालां कि उन के माइंड सेट उन्हें ऐसा करने देंगे मुझे संदेह है।

  • सोनिया और राहुल गांधी की सदाशयता देखिए कि अपनी हार तो कुबूल कर ली, अगली सरकार को बधाई भी दे दी। लेकिन मोदी का नाम लेने से परहेज कर गए। आखिर एक नीच आदमी का नाम भी कैसे लेते भला? इन के चेहरे की मुसकुराहट भी इन के राजशाही तबीयत को नहीं बदल सकी। और तो और सोनिया ने राहुल को ' नो' कह कर प्रेस से भी बात नहीं करने दिया।

  • मुसलमानों को मोदी का डर दिखा कर उन की हिफ़ाजत का दावा करने वाली कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाजवादी पार्टी जैसी तमाम पार्टियां आखिर अपनी ही हिफ़ाजत क्यों नहीं कर पाईं? यहां तक कि कई जगह अपना खाता भी नहीं खोल पाईं।

  • मुसलमानों को मोदी का डर दिखा कर उन की हिफ़ाजत का दावा करने वाली कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाजवादी पार्टी जैसी तमाम पार्टियां आखिर अपनी ही हिफ़ाजत क्यों नहीं कर पाईं? यहां तक कि कई जगह अपना खाता भी नहीं खोल पाईं।

  • लाल कृष्ण आडवानी को अब राजनीति से सचमुच संन्यास ले लेना चाहिए। नहीं अब जो और राजनीति में रहेंगे तो हर क्षण अपनी मिट्टी पलीद करवाते रहेंगे। मोदी के नेतृत्व में भाजपा की भारी जीत ने उन्हें विक्षिप्त बना दिया है। यह जीत उन्हें हजम नहीं हो रही। डर है कि डायरिया न हो जाए कहीं उन्हें। यह स्थिति भाजपा के भीतर और भी कुछ लोगों की है। भाजपा से बाहर तो खैर कहना ही क्या ! लोग प्रजातंत्र और उस की मर्यादा भी क्यों भूलते जा रहे हैं? व्यक्तिगत पसंद या नापसंद से कम से कम लोकतंत्र तो नहीं चलता। हिटलरशाही कहिए या तानाशाही ही चलती है। आप मोदी को नापसंद करते रहिए यह ठीक है पर भारत की महान जनता की भावना का अनादर तो मत कीजिए।

  • कांग्रेस का तो खैर यह ऐतिहासिक पतन है ही। लेकिन पत्रकारों में जो अघोषित प्रवक्ता थे कांग्रेस के उन का अब क्या होगा?

  • उत्तर प्रदेश में अभी तक बसपा का शून्य पर नज़र आना, खाता भी नहीं खुल रहा बसपा का। सपा का खाता तो खुल रहा है पर वह भी पैक अप की राह पर है।जातिवादी जहर फैलाने वालों को यह बहुत बड़ा सबक है। यह बहुत ज़रुरी था।

  • क्रिकेट की भाषा में जो कहें तो कांग्रेस अब फ़ालो-आन बचाने की कसरत में लग गई है। क्या बच पाएगा फ़ालो-आन?

  • इस चुनाव परिणाम ने दो तीन बात तो तय कर दी है कि सामाजिक न्याय के नाम पर जातीय राजनीति के जहर और मुसलमानों को डराने की राजनीति के दिन तो विदा हो ही गए हैं। साथ ही गठबंधन के नाम पर क्षेत्रीय दलों की ब्लैकमेलिंग के दिन भी विदा हो गए। यह बहुत सैल्यूटिंग है। देश को आगे बढ़ने के लिए यह बहुत ज़रुरी है। कांग्रेस सहित अन्य दलों और वामपंथी दलों को यह भी ज़रुर जान लेना चाहिए मुसलमानों को सेक्यूलर नाम का लेमनचूस थमा कर उन की आंख में निरंतर धूल झोंकना अब काम नहीं आने वाला। यह कार्ड अब सड़ गया है। कश्मीर समस्या का समाधान भी अब बहुत दूर नहीं है। लोगों को मोदी को निरंतर गाली देने के बजाय देश की जनता की भावना का सम्मान करना सीखना चाहिए। मोदी विरोध कायम रखते हुए ही सही।

  • अगर एक्जिट पोल के नतीजों को सही मान लें तो कहना पड़ेगा कि उत्तर प्रदेश और बिहार से सामाजिक न्याय के नाम पर चल रही जातिवादी राजनीति और उस के जहरीले दिन विदा हो गए। यानी सपा और बसपा का भी पैकप !

  • फेसबुक पर अभी भी कुछ सेक्यूलर साथी फुल जोश में हैं और कि पूरी अकड़ के साथ बता रहे हैं की सरकार तो कांग्रेस की ही बनेगी| जय हो !

  • सारी चर्चा एक तरफ लेकिन यह एक चर्चा कोई नहीं कर रहा कि गुजरात का नया मुख्य मंत्री अब कौन होगा?

  • अगर एक बार तमाम एक्जिट पोल के अनुमान को मान ही लिया जाए तो क्या यह भी मान लिया जाना चाहिए कि देश का बहुमत सांप्रदायिक है? यानी देश की बहुसंख्यक जनता सांप्रदायिक है? क्यों कि तमाम राजनीतिक पार्टियों ने यह चुनाव मोदी को सांप्रदायिक करार दे कर ही लड़ा है। मुसलमानों को मोदी का डर दिखा कर ही लड़ा है। और कि मोदी बहुमत ले कर आ रहे हैं। तो क्या देश से इस ' सेक्यूलरिज्म' की लफ़्फ़ा्ज़ी के दिन हवा हो जाएंगे? इस शब्द का दुरुपयोग क्या बंद हो जाएगा अब?

  • आप पा्र्टी के दिल्ली विधायक विनोद कुमार बिन्नी कह रहे हैं कि भाजपा को अरविंद केजरीवाल को धन्यवाद देना चाहिए। क्यों कि अरविंद ने कांग्रेस का वोट बहुत काटा है। अरविंद के कारण भाजपा को ६०-७० सीटें ज़्यादा मिल रही हैं।

  • हार गया चुनाव, लेकिन हार नहीं मानता !

  • उत्तर प्रदेश में दलितों की मसीहा मायावती को भी नरेंद्र मोदी और भाजपा से बड़ी चिढ़ है। इस बिना पर नरेंद्र मोदी का डर दिखा कर मुसलमान वोट उन्हें भी चाहिए। भाजपा की मदद से तीन बार मुख्यमंत्री बनने वाली मायावती यह बात भी निरंतर दुहराती जा रही हैं कि वह सरकार बनाने के लिए भाजपा को समर्थन नहीं देंगी। ठीक बात है। लेकिन समूचा चुनाव प्रचार और चुनाव बीत गया। पर क्या वह नरेंद्र मोदी के विरोध में प्रचार करने बनारस या बड़ौदा गईं? आखिर क्यों नहीं गईं, कोई है पूछने वाला उन से यह तल्ख बात? कोई मीडिया, कोई दलित पुरोधा या कोई सेक्यूलर ठेकेदार? आखिर राजनीतिक लफ़्फ़ाज़ी की भी कोई हद होती है क्या? ज़िक्र ज़रुरी है कि नीच राजनीति की तरकशबाज़ी में सब से ज़्यादा मायावती ही घायल हुई थीं।

  • अजब मंजर है। देश भर के तमाम भाजपाई उम्मीदवार मोदी के नाम पर चुनावी वैतरणी पार करने की फ़िराक में हैं और ज्ञानी लोगों के सवाल फिर भी शेष हैं और मोदी बनारस से हार रहे हैं कि जीत रहे हैं कि बहस से छुट्टी नहीं पा रहे।

  • आप के अरविंद केजरीवाल से जिन लोगों को बनारस में बड़ी उम्मीद थी उन के लिए उदास कर देने वाली खबर यह है कि आज तक के सर्वे में वह ज़मानत ज़ब्त कराते हुए दस प्रतिशत वोट पा कर तीसरे नंबर पर बताए गए हैं। दूसरे नंबर पर पंद्रह प्रतिशत वोट पा कर भी ज़मानत ज़ब्त करवाते हुए ही कांग्रेस के अजय राय हैं। संयोग देखिए कि यह सर्वे रिपोर्ट भी अरविंद केजरीवाल के अभिन्न मीडिया मित्र पुण्य प्रसून वाजपेयी को बताने की ज़िम्मेदारी निभानी पड़ी।

  • अब एक और लतीफ़ा सुनिए। मोदी कहते हैं गंगा ने बुलाया है। और अरविंद केजरीवाल कहते हैं मोदी ने बुलाया है।

  • तो क्या मंडल फैक्टर का पहिया इस चुनाव में उलटा घूम गया है? बताइए कि यादव तक समाजवादी पार्टी का साथ छोड़ चले हैं ! और दलित बहुजन समाजवादी पार्टी का। न यह मैं नहीं कह रहा। आज तक पर एक सर्वे रिपोर्ट बता रही है। भाजपा और आप पार्टी की तरफ यह वोट भारी प्रतिशत में खिसक गए हैं। बनारस में तो ४० प्रति्शत यादव सपा की तरफ तो ४१ प्रतिशत यादव भाजपा की तरफ बताए जा रहे हैं। बाकी ओ बी सी और दलित वोट भी। और कि सर्वे के मुताबिक बनारस में मोदी की विजय के आगे अरविंद केजरीवाल समेत सभी उम्मीदवारों की ज़मानत ज़ब्त हो रही है। यह हो क्या रहा है?

  • दीदी और दंगा बाबू !

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