Monday, 1 December 2014

मुस्लिम और इसाई समाज : वोट बैंक की जायदाद होने का गुमान इन्हें बीमार बनने में और मदद करता है


कुछ फेसबुकिया नोट्स 


यह मोदी विरोधी और मोदी भक्त दोनों ही चरस बने हुए हैं। कोई किसी से कम नहीं हैं। तर्क और तथ्य से दोनों ही की मुलाकात नहीं है । लगता है होगी भी नहीं कभी ।

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नहीं मैं हिंदुत्ववादी नहीं हूं। बिलकुल नहीं हूं। न कभी हो सकता हूं। लेकिन यह तो सोच ही सकता हूं कि आख़िर मुस्लिम और इसाई संगठनों को ही इन से क्यों भयभीत रहना पड़ता है। सारे गिले शिकवे इन दोनों को ही इन से क्यों होते हैं बार-बार। इस देश में पारसी , जैन, बुद्धिष्ट , सिख आदि भी बतौर अल्पसंख्यक ही रहते हैं। इन के संगठनों की तरफ से कभी कोई ऐसी दिक्कत , कोई ऐतराज़ आते हम क्यों नहीं देख पाते। और कि हिंदू संगठनों को भी इन लोगों से कभी कोई मुश्किल नहीं पेश आती । सिर्फ़ मुस्लिम और इसाई संगठनों से ही यह भी भिड़े रहते हैं । या इलाही ये माज़रा क्या है ?

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Shams Hussain आप लोगों की इन्हीं प्रवृत्तियों ने देश को साम्प्रदायिक आग में झोंक रखा है। देश दुनिया में पीछे होता जा रहा है । मुस्लिम संगठन दुनिया भर में बवाल मचाए हुए हैं लेकिन किसी एक का नाम आप की जुबान से नहीं निकल सकता न आप उन की मजम्मत कर सकते हैं।

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Shams Hussain लफ्फाजी बहुत झोंक चुके आप। आरोप -प्रत्यारोप भी। इन एकतरफा बातों का कोई अर्थ नहीं है। स्वस्थ बहस के बजाय आप पोस्ट के मंतव्य से लगातार भटक और भटका रहे हैं। मुख्य बिंदु से लगातार कतरा रहे हैं, अपने नकली घाव दिखा रहे हैं। अरुण कांत जी ने निदा फाजली का एक शेर कोट किया है , उठ उठ के मस्जिदों से नमाजी चले गए / दहशतगर्दो के हाथो इस्लाम रह गया. इस पर आप चुप क्यों हैं ? कुछ रौशनी इस पर भी डाल लीजिए। आप के स्वास्थ्य के लिए मुफ़ीद रहेगा।

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Shams Hussain अच्छा तो कौन सा वह धर्म है जिस में हिंसा को जायज बताया गया है ? कोई एक भी धर्म ऐसा नहीं है। लेकिन बात तो यहां किसी धर्म की, की भी नहीं मैं ने । बात संगठनों और उन की जहालत की हो रही है। पर कहा न कि आप बात को लगातार भटका रहे हैं । बहुत बड़े ड्रामेबाज़ हैं आप । यह नौटंकी छोड़िये। बात आम की हो रही है और आप लगातार बबूल के बाग़ में घूम रहे हैं। बंद कीजिए यह। मुख्य बिंदु पर लौटिए, लौट सकिए तो। लफ्फाजी ही झोंकनी है तो कृपया विदा ले लीजिए ।  

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Shams Hussainअब आप जैसे फ़ासिस्ट लीगी से मुझे किसी सर्टिफिकेट की दरकार नहीं है। अपना सर्टिफिकेट अपनी जेब में रखिए। लोग और मैं जानता हूं कि मैं क्या हूं। आप के पास सिवाय जहालत के कुछ कहने के लिए है नहीं । जाइए ISIS में सीधी भर्ती ले लीजिए। यहां खट्टी-खट्टी डकार लेने से कोई फ़ायदा नहीं।

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Shams Hussain मैं ने तो पहले ही कहा था कि यह बहस आप के वश की नहीं है , आप विदा ले लीजिए। आप जैसे जहालत के मारे हुए कठमुल्लों की मेरी मित्र सूची में रहने की ज़रूरत भी नहीं है। कि जो तर्क और सत्य जानता ही न हो , न जानना चाहता हो ।

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Jaishankar Gupta जयशंकर जी , जब 1984  के दंगे हुए थे तब दुर्भाग्य से मैं दिल्ली में ही रहता था। दंगे मैं ने बहुत से देखे , कवर किए हैं पर वैसा दंगा तो न भूतो न भविष्यति ! यह दंगा अमानवीय तो था ही लेकिन आतंकवाद का प्रतिरोध भी था। इस दंगे के पहले सिखों का इतना आतंक हुआ करता था कि दो सिख अगर सामने से आते दिख जाते थे तो लोग रास्ता बदल लेते थे या सहम कर किनारे खड़े हो जाते थे। ऐसे असंख्य दृश्यों का साक्षी हूं । भिंडरावाले के आतंक का वह दौर था। बसों से उतार कर गैर सिखों को लाइन से खड़ा कर सब को एक साथ मार दिया जाता था । वह दौर भी बहुत भयावह था । लेकिन इस सब के बावजूद सिख समुदाय ने जिस तरह अपने को बदला और बड़ी तेज़ी से वह भारतीय समाज की मुख्य धारा से फिर से जुड़ गए वह निश्चित ही सैल्यूटिंग है । अब यह सिख अपनी गलतियों से सीख ले करअल्पसंख्यक की तरह नहीं भारतीय की तरह रहते हैं। लेकिन मुस्लिम समुदाय के या इसाई समाज के लोग अपने को अल्पसंख्यक बना कर देवता बन कर एक ख़ास किस्म का प्रिविलेज ले कर एक बीमार की तरह जीने की लत लगा चुके हैं। वोट बैंक की जायदाद होने का गुमान इन्हें बीमार बनने में और मदद करता है। एक फैक्टर इन के दिमाग में यह भी रहता है कि यह लोग पुराने शासक हैं। मकबूल शायर राहत इंदौरी के तीन शेर यहां गौर फरमाइए :

कब्रों की जमीनें देकर हमें मत बहलायिये
राजधानी दी थी राजधानी चाहिए ।
 
सच बात कौन है जो सरे आम कह सके
मैं कह रहा हूं मुझ को सज़ा देनी चाहिए
 
सौदा यहीं पे होता है हिंदुस्तान का
संसद भवन में आग लगा देनी चाहिए।

तो यह माईंडसेट भी इन्हें पगलाए रखता है । यह प्रजातंत्र क़ुबूल करना ही नहीं चाहते । रहते भी हैं तो वोट बैंक की जायदाद बन कर ही। देश का यही दुर्भाग्य है ।

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आज एक कार्यक्रम से घर लौटे ही थे कि छोटी बेटी ने फ़ोटो खींच लिया फटाफट । हम घर में भी गुड ही रहते हैं मित्रों !
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तो क्या इमरान खान पाकिस्तान के नरेंद्र मोदी बनना चाहते हैं। वह लगातार नरेंद्र मोदी की तारीफ़ कर रहे हैं और साथ ही पाकिस्तान का काला धन भी वापस लाने की बात कर रहे हैं। जो भी हो अभी तो वह नवाज़ शरीफ़ की नाक में दम किए हुए हैं। चुनाव के जरिये नवाज़ का तख्ता पलट वह कर देंगे तो हैरत नहीं होगी।

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मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव अब समधी नहीं लमधी बनने जा रहे हैं । मैनपुरी से नवनिर्वाचित सांसद तेज प्रताप यादव और लालू की छोटी बेटी राजलक्ष्मी की शादी तय हो जाने की खबर है । सगाई का बाजा दिसंबर में बजने और शादी फागुन में होने की सुनगुन है । कभी लालू प्रसाद यादव अपनी बेटी मीसा का विवाह मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश से करना चाहते थे । इस के सूत्रधार अमर सिंह थे । मुलायम तैयार भी थे । लालू से तमाम खटास के बावजूद । सो लालू मीसा को ले कर लखनऊ आए भी थे समेत मुख्य मंत्री पत्नी राबड़ी और छोटी बेटी भी । ताज होटल में ठहरे थे लालू प्रसाद यादव । मुलायम खुद एयरपोर्ट रिसीव करने पहुंचे थे लालू को । मैं इस सारे नज़ारे का तब का साक्षी हूं । खैर कभी मुलायम के प्रधान मंत्री बनने में सब से बड़े रोड़ा बने लालू ने तब ऐलान किया था कि अब वह मुलायम को प्रधान मंत्री बनवा कर ही दम लेंगे। यह वर्ष 1998 की बात है । लेकिन सब कुछ के बावजूद बात बिगड़ गई । अखिलेश और डिंपल का प्रेम सामने आ गया । अखिलेश की शादी डिंपल से हो गई। पर लालू भी हार मानने वाले नहीं हैं । बच्चों की फौज है उन के पास । तेज प्रताप मुलायम के भतीजे रणवीर सिंह यादव के सुपुत्र हैं । बेटा न सही पोता ही सही मुलायम और लालू रिश्ते की डोर में बंधने जा रहे हैं। समधी न सही लमधी ही सही ।

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तो क्या यह कविताएं दीवार हैं और मैं रो रहा हूं ? कविता लिख कर रो रहा हूं कि जी रहा हूं ! मुझे तो लगता है कि मैं जी गया हूं । जी रहा हूं ।    

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जाने क्या है कि मैं इन दिनों कविया गया हूं।


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काला धन स्विस बैंक से लौटाने के मसले पर नरेंद्र मोदी का वादा कहिए, दावा कहिए अब विश्वनाथ प्रताप सिंह के बोफ़ोर्स का कमीशन लौटा लेने के वादे में तब्दील है । इतिहास जैसे दुहरा रहा है अपने आप को। लोक सभा में आज वित्त मंत्री अरुण जेटली के जलेबी छाप भाषण ने बहुत उदास किया है। मृगतृष्णा की भी कोई हद होती है ।

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कोई माने न माने काठमांडू में नरेंद्र मोदी ने नवाज़ शरीफ़ को नाप में ला दिया। मोदी ने अपने भाषण में आतंकवाद के मद्दे नज़र पाकिस्तान की लानत-मलामत की। और बिन कुछ बोले अपनी बाडी लैंग्वेज़ से अनदेखी और हिकारत की इबारत लिख कर मक्खी-मच्छर से भी गया-गुज़रा बना दिया नवाज़ शरीफ़ को। नवाज़ शरीफ़ के लिए बस वह एक मिसरा याद आता है , बड़े बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले । नवाज़ शरीफ़ को इस दृश्य में देख कर लग रहा था कि वह जाने कितने जूते खा लिए हैं । लग ही नहीं रहा था कि यह वही मोदी और नवाज़ शरीफ़ हैं जो कुछ समय पहले शपथ समारोह में गले मिल रहे थे। एक दूसरे की मां को तोहफ़े दे-ले रहे थे। पर यहां तो देखा देखी भी नहीं हुई । जो लोग गले मिलते अघा नहीं रहे थे , उन्हों ने ही हाथ भी नहीं मिलाया। पाकिस्तान के प्रति भारत की यह बेरुखी और सख्ती सचमुच बहुत ज़रुरी थी । 


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विदेश नीति और कूटनय का ढिढोरा पीटने और डंका बजाने वाले नरेंद्र मोदी आख़िर अमरीकी कूटनीति के ट्रैप में फंस ही गए। अभी आज ही नरेंद्र मोदी झारखंड में अपनी पीठ ठोंकते हुए एक जनसभा में कह रहे थे कि पूरी दुनिया में भारत की जय-जय हो रही है । खैर संभावना बढ़ गई है कि वह नेपाल में नवाज़ शरीफ़ से टाक करेंगे ही। दल्ला मीडिया चीख़-चीख़ कर बता रहा है कि नवाज़ शरीफ़ से मोदी की मुलाकात हो सकती है । मोदी ने यह खबर लीक कर ही दी है । नेपाल पहुंच कर नवाज़ शरीफ़ ने भी कह दिया है कि पाकिस्तान भी भारत के साथ बात करना चाहता है। गेंद भारत के पाले में है । तो क्या सारी हुंकार, अब डकार में बदल जाएगी? 26 जनवरी को ओबामा को मेहमान बनाने की यह कोई कीमत तो नहीं? और कि कहीं अफगानिस्तान और पाकिस्तान की तरह भारत भी तो अमरीकी उपनिवेश बनने की राह पर तो नहीं आ गया ? कहीं हिंदी-अमरीकी भाई-भाई तो नहीं होने जा रहा , बतर्ज़ हिंदी-चीनी भाई-भाई ! नरेंद्र मोदी का सारा इम्तहान दो ही चीज़ों पर तो होना है। एक पाकिस्तान , दूसरे मंहगाई ! पहला मोर्चा फ़िलहाल पाकिस्तान पर फंस गया दीखता है। अमरीकी ट्रैप और दबाव से बच ले गए अगर मोदी तो कूटनीति में वह इंदिरा गांधी से भी आगे जा सकते हैं।मंहगाई पर काबू पा लेना तो मोदी के हाथ है पर पाकिस्तान पर अगर कोई काबू पा सकता है तो वह सिर्फ़ और सिर्फ़ अमरीका । कम से कम मोदी के अकेले वश का हरगिज़ नहीं है पाकिस्तान। इंदिरा गांधी की बात और थी । उन के साथ सोवियत संघ का हाथ भी था। मोदी इस मामले में निहत्थे हैं । 


 

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