Saturday, 29 November 2014

मैं आदर्शहीन हूं, चरित्रहीन भी लेकिन लोग मुझे अपना आदर्श मानते हैं

 पेंटिंग : एस एच रज़ा

मैं चरित्रहीन हूं
और चाहता हूं कि लोग मुझे चरित्रवान मानें

मैं कायर हूं
लेकिन चाहता हूं कि लोग मुझे बहादुर मानें

मैं नपुंसक हूं
लेकिन चाहता हूं कि लोग मुझे पौरुष का प्रतीक मानें

मैं जातिवादी हूं
लेकिन चाहता हूं  कि लोग मुझे जाति  विरोधी मानें

मैं देशद्रोही हूं
लेकिन चाहता हूं कि लोग मुझे देशभक्त मानें

मैं महाभ्रष्ट हूं
लेकिन चाहता हूं कि लोग मुझे ईमानदार मानें

मैं कम्यूनल हूं
लेकिन चाहता हूं कि लोग मुझे सेक्यूलर मानें

मैं गद्दार हूं
लेकिन चाहता हूं कि लोग मुझे भरोसेमंद मानें

मैं बेवफ़ा हूं
लेकिन चाहता हूं कि लोग मुझे वफ़ादार मानें

मैं लंपट हूं
लेकिन चाहता हूं कि लोग मुझे सदाशय मानें

मैं समाज का दुश्मन हूं
लेकिन चाहता हूं कि लोग मुझे अपना दोस्त मानें

मैं हिंसक हूं
लेकिन चाहता हूं कि लोग मुझे अहिंसक मानें

मैं कुत्ता हूं
लेकिन चाहता हूं कि लोग मुझे शेर मानें

मैं दानव हूं
लेकिन चाहता हूं कि लोग मुझे देवता मानें

मैं पतन की पराकाष्ठा हूं
लेकिन चाहता हूं कि लोग मुझे उन्नति का सबब मानें 

मैं वह सब कुछ हूं
जो नहीं होना चाहिए

मैं रावण भी हूं , कंस भी , भस्मासुर , दुर्योधन और शकुनि भी
लेकिन चाहता हूं कि लोग मुझे राम और कृष्ण की तरह मानें
शंकर भी, युधिष्ठिर और अर्जुन भी
और मुझे पूजें भी

मुझे बेहद खुशी है इस बात की
कि
सब कुछ जानते हुए भी लोग मुझे वैसा ही  मानते हैं
जैसा कि मैं उन से अपेक्षा करता हूं

जानते हैं कि क्यों

मेरे पास पैसा है
मेरे पास ताकत है
सत्ता भी

सो मैं जैसा चाहता हूं
लोग मेरे बारे में
वैसा ही सोचते हैं

वैसा ही सोचेंगे

यह मीडिया , यह लेखक , यह कवि
यह टिप्पणीकार , यह इतिहासकार,
यह अफ़सर , यह राजनीतिज्ञ
यह सविधान और यह क़ानून
सब मेरे चाकर हैं

और यह न्यायाधीश भी
वैसा ही फ़ैसला लिखते हैं
जैसा मैं चाहता हूं

यह सब के सब
जैसा मैं कहता हूं
वैसा ही सोचते हैं
वैसा ही लिखते हैं
वैसा ही करते हैं

इन सब को मैं सांस देता हूं
और फांसी भी

लब्बोलुवाब यह कि
मैं आदर्शहीन हूं, चरित्रहीन भी
लेकिन लोग मुझे अपना आदर्श मानते हैं
माई-बाप , गुरु और भगवान भी

लोग हैं कि मेरे लिए जान दे देना चाहते हैं
दे ही रहे हैं

ऐसा ही मैं चाहता भी हूं

इतना कुछ जानने के बाद 
आप अब भी मुझे नहीं जान पाए

मैं 
कार्पोरेट हूं
कार्पोरेट सेक्टर कहते हैं मुझे
और यह दुनिया मेरी है

यह नदियां , यह पर्वत , यह वन
यह समुद्र  , यह रत्नगर्भा धरती, इस धरती की  खदाने
यह मनुष्यता
सब मेरे चरण पखारते हैं

आख़िर मैं कार्पोरेट हूं
शक्ति का नया पुंज , नया मठ
मेरी आरती उतारो मनुष्य ,आरती उतारो !
तुम सब मेरे समक्ष हारने के लिए ही उपस्थित हो
अपना सब कुछ हारने के लिए

तुम्हारे बच्चों का कॅरियर , पैकेज और भविष्य
सब कुछ मैं ही हूं
तुम्हारा देश , तुम्हारा समाज
तुम्हारी चूहा दौड़ का जनक भी

तुम ही तो हो जो
सब कुछ भूल कर
मुझ पर निसार हो
और मैं तुम्हें बिसरा देना चाहता हूं

पूंजी और पूंजी से और पूंजी बनाने का गणित यही है
कार्पोरेट इसी तरह बहुगुणित होता है
हज़ार प्रतिशत सालाना ग्रोथ क्या ऐसे ही होती है
यह बात भी तुम नहीं जानते

[ 29  नवंबर , 2014 ]

3 comments:

  1. मैं वह सब कुछ हूं
    जो नहीं होना चाहिए ==
    मुझे दोगला कहोगे
    तो इसे मैं अपना सम्मान मानूंगा
    मुझे खुद भी नहीं है मालूम कि मेरे कितने चेहरे हैं ?

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  2. priy dayanad bhai,
    ek se ek nayab kavitayen in dino aap likhte jaa rahe hain. kahan chhipi thi yah sarjanatmak pratibha! mai daanto tale ungli dabaakar inhe padh raha hun. dar hai ki kahin ungli kat n jaye...
    buddhinath mishra

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  3. इन दिनों आप के अंदर भावनाएं हिलोरें मार रही हैं. एक कविता संग्रह निकालिये. यह खूब लोकप्रिय होगा.

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