Tuesday, 30 December 2014

वर्गीज साहब, आप हमारे दिल में अपनी मय सदाशयता के सर्वदा उपस्थित रहेंगे

  
 हम आप को कभी नहीं भूलेंगे

बहुत कम पत्रकारों के लिए मेरे मन में आदर भाव उपजता है । उन बहुत थोड़े से कुछ लोगों में एक नाम बी. जी. वर्गीज का है । जिन का मैं बहुत-बहुत आदर करता हूं । लेकिन आज अभी उन के निधन की खबर ने मन भारी कर दिया है ।

वर्ष 1983 में जनसत्ता के लिए जब मेरा इंटरव्यू हुआ तो इंटरव्यू लेने वालों में जोशी जी के साथ इंडियन एक्सप्रेस के पूर्व संपादक एम.वी. देसाई और तत्कालीन संपादक वी.जी. वर्गीज तथा एक रिटायर्ड आई.पी.एस. अफसर भी थे। अपने लेखों आदि की छपी कतरनों को एक बड़े ब्रीफकेस में भर कर मैं पहुंचा था। अंदर जाते ही ब्रीफकेस अपने आप खुल गया। रविवार, दिनमान, सारिका, साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी पत्रिकाएं वहां फैल कर बिखर गईं। जोशी जी यह देख कर मुसकुराए। बोले, ‘समझ गया कि आप हर जगह छपे हैं। अब इस सब को बटोर लीजिए।’ मैं ने कहा, ‘देख तो लीजिए।’ वह संक्षिप्त सा बोले, ‘देख लिया। अब रख लीजिए।’ बातचीत शुरू हुई। वर्गीज साहब को जब पता चला कि मैं गोरखपुर का रहने वाला हूं तो उन्हों ने गंडक नहर प्रोजेक्ट के बारे में पूछा। मुझे इस बारे में बिलकुल जानकारी नहीं थी। पर चूंकि सवाल था तो जवाब देना ही था। मैं ने पूरी ढिठाई से कहा, ‘जैसा कि सरकारी योजनाओं के साथ होता है, यह गंडक नहर परियोजना भी वैसी ही है।’

वर्गीज साहब ने टोका, ‘फिर भी?’

मैं ने अपनी ढिठाई जारी रखी और कहा कि, ‘सारी योजना काग़ज़ी है। फर्जी है।’ वर्गीज साहब ने फिर धीरे से पूछा, ‘पर प्रोजेक्ट में है क्या?’ मैं ने अपनी ढिठाई में थोड़ा कानफिडेंस और मिलाया और पूरी दृढ़ता से बोला, ‘कहा न पूरी परियोजना काग़ज़ी है और फर्जी भी।’

बाद में बनवारी जी के हस्तक्षेप से मुझे जनसत्ता में नौकरी मिल गई। बहुत बाद में एक बार एक ख़बर के सिलसिले में डा. लक्ष्मीमल्ल सिंधवी से बात करने जाना था तो जोशी जी ने सख़्त हिदायत दी कि, ‘बातचीत में बहकिएगा नहीं। और कि जिस बारे में जानकारी नहीं हो, उस बारे में उड़िएगा नहीं।’

‘मैं समझा नहीं।’ कह कर मैं अनमना हुआ तो जोशी जी बोले, ‘आप को अपना इंटरव्यू याद है?’
‘जी क्यों?’

‘वर्गीज साहब ने आप से गंडक नहर प्रोजेक्ट के बारे में पूछा था तो आप ने उसे काग़ज़ी और फर्जी करार दिया था?’

‘जी वो तो है।’ मैं अचकचाया।

‘ख़ाक जानते हैं आप?’ जोशी जी बिदके। बोले, ‘आप जानते हैं कि वर्गीज साहब गंडक नहर प्रोजेक्ट पर लंबा काम कर चुके हैं। और आप पूरी बेशर्मी से उन से उसे काग़ज़ी और फर्जी बता रहे थे?’ वह बोले, ‘किसी पत्रकार में कानफिडेंस होना बहुत ज़रूरी है पर यह ओवर कानफिडेंस, फर्जी कानफिडेंस? बिलकुल नहीं चलेगा। अरे नहीं आता तो चुप रहिए। स्वीकार कर लीजिए कि नहीं मालूम। खामखा उड़ने की क्या ज़रूरत है?’

मुझे सचमुच बड़ी शर्मिंदगी हुई। बाद में एक दिन जा कर वर्गीज साहब से मिला और उन से अपनी ग़लती स्वीकार कर क्षमा मांगी। पर वह तो जैसे पहले ही से क्षमा किए हुए थे। बोले, ‘इट्स ओ.के.।’ वर्गीज साहब वैसे भी बहुत कम बोलने वाले आदमी हैं। एक बार इंडियन एक्सप्रेस में किसी बात पर कर्मचारी गरमाए हुए थे। वर्गीज साहब दफ्तर आने के लिए एक्सप्रेस बिल्डिंग की सीढ़ियां चढ़ रहे थे। कर्मचारियों ने उन्हें रोका। धक्का-मुक्की में उन का चश्मा फर्श पर गिर कर टूट गया। पर वह चुपचाप रहे। किसी से कुछ बोले नहीं। चुपचाप चले गए।

वर्गीज साहब की एक बात और याद आ रही है। जनता पार्टी की सरकार के दिनों में गांधी शांति प्रतिष्ठान के काम काज को ले कर इंदिरा गांधी की सरकार ने जांच के लिए एक आयोग बनाया था। जांच आयोग के लपेटे में वर्गीज साहब भी थे। जांच आयोग ने जब रिपोर्ट सरकार को सौंपी तो उस की सिफ़ारिशों को पी.टी.आई. ने चार पांच टेक में जारी किया। हिंदुस्तान टाइम्स से एक सज्जन ने उन्हें फ़ोन किया। आपरेटर ने फ़ोन ग़लती से जनसत्ता में दे दिया। उन को बताया गया कि फ़ोन है तो बड़ी विनम्रता से फ़ोन पर आ गए। उधर से जो भी कुछ कहा गया हो। पर इधर से वर्गीज साहब बोले, ‘आप इस ख़बर का क्या करें, मैं कैसे बता सकता हूं। हां, यह ज़रूर बता सकता हूं कि मैं अपने यहां पूरी ख़बर ले रहा हूं। आप को क्या करना है, यह आप तय कर लीजिए। हां, मैं अपना जवाब कल दे रहा हूं।’ जाते-जाते वह जनसत्ता डेस्क पर भी कह गए कि, ‘आयोग की सिफ़ारिश मेरे खि़लाफ है इस लिए इस ख़बर को अंडर प्ले नहीं किया जाना चाहिए। ख़बर जो प्लेसमेंट मांगती है, वही दिया जाना चाहिए।’

और सचमुच दूसरे दिन इंडियन एक्सप्रेस में पहले पेज़ पर तीन कालम में वह ख़बर छपी। पर उस के बाद अपने जवाब में वर्गीज साहब ने आयोग की सिफ़ारिशों की जो धज्जियां उड़ाईं तो फिर बात ही ख़त्म हो गई। बाद में वर्गीज साहब से पूछा कि, ‘आप चाहते तो पी.टी.आई. से ही ख़बर ड्राप करवा सकते थे। फिर कहीं नहीं छपती।’

‘अरे फिर तो वह ख़बर हो जाती। इस का मतलब होता कि फिर मैं कहीं गिल्टी हूं।’

और यह सब तब था जब वह 1966 से 1969 तक तब प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा गांधी के सूचना सलाहकार भी रहे थे । लेकिन 1975 में आपातकाल लागू करने को ले कर वह इंदिरा गांधी के सब से कट्टर आलोचक हो गए थे। रेमन मेगसायसाय पुरस्कार से सम्मानित वर्गीज साहब इंडियन एक्सप्रेस के अलावा हिंदुस्तान टाइम्स के भी संपादक रहे थे । दून स्कूल में पढ़े , वर्गीज साहब ने दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफन कॉलेज से अर्थशास्त्र में पढाई की और स्नातकोत्तर की शिक्षा कैम्ब्रिज के ट्रीनिटी कॉलेज से की। लेकिन ऐसी पढ़ाई-लिखाई करने वाले वर्गीज साहब गुड़गांव जैसी जगह में रहते हुए भी डेंगू जैसी बीमारी से मरेंगे यह भी भला कौन जानता था ? जो भी हो वर्गीज साहब, आप हमारे दिल में अपनी मय सदाशयता के सर्वदा उपस्थित रहेंगे । हम आप को कभी नहीं भूलेंगे । आप की विनम्रता, विद्वता और बड़प्पन .हमारे मन के दर्पण में सदा सजी रहेगी । 

एक बार वह लखनऊ आए थे एक सेमिनार में शिरकत करने । एक होटल में आयोजन था । उन से मैं लपक कर मिला । जिस को हमारी भोजपुरी में धधा कर मिलना कहते हैं । वह बहुत खुश हो गए । कहने लगे कि अब इस तरह से लोग कहां मिलते हैं । मैं ने उन्हें जनसत्ता इंटरव्यू के दौरान अपनी मूर्खता की याद दिलाई । वह हलका सा मुस्कुराए और बोले , ' अपनी गलती मानने वाले लोग भी , खास कर पत्रकार भी अब कहां रहे ? ' अंग्रेजी तो वह बहुत नफीस  थे , हिंदी भी उन की बहुत अच्छी थी । बहुत धीरे और बहुत कम बोलने वाले वर्गीज साहब जब बोलते थे तब बहुत ही तार्किक बोलते थे । लोग उन्हें निःशब्द हो कर सुनते थे । वह चाहे आफिस हो या सेमिनार ! वह जब इंडियन एक्सप्रेस के संपादक थे तब उन से मिलना भी बहुत आसान था । वह बड़ी सरलता से मिलते थे । उन का व्यक्ति ही सामने होता था, संपादक नहीं । हिप्पोक्रेसी जैसे शब्द से लगता ही नहीं था कि वह अपने जीवन में कभी परिचित भी रहे होंगे ।

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