Wednesday, 17 December 2014

आप इतने मासूम हैं कि मुस्लिम आतंकवादी शब्द समझ में नहीं आ रहा

 कुछ फेसबुकिया नोट्स


इस्लामिक आतंकवाद इस कदर खौफनाक हो गया है कि पाकिस्तान के पेशावर में सैनिक स्कूल को भी नहीं छोड़ा। अब आज स्कूली बच्चे उन के बंधक हैं । यह तहरीके तालिबान के लोग हैं । कुछ बच्चे और अध्यापक मार भी दिए गए हैं। अभी कल ही सिडनी में भी एक मुस्लिम आतंकवादी १६ घंटे लोगों को आफत में डाले हुए था। इस सब का अंत कब और कैसे होगा , समझ पाना मुश्किल हो गया है। मलाला यूसूफ जई जैसी बच्चियों की बहादुरी ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित हो रही है।

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गनीमत है कि आप को सिर्फ मुस्लिम आतंकवाद शब्द पर ही ऐतराज हुआ। साध्वी प्रज्ञा आदि नहीं याद आए। आने चाहिए। कुतर्क करना ही है तो डट कर कीजिए। यह ठीक है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता लेकिन पूरी दुनिया में अगर धर्म के नाम पर आतंकवाद का झंडा ऊंचा करते जो लोग घूम रहे हैं वह दुर्भाग्य से यही लोग हैं। बताईए कि मलाला को नोबेल मिलने पर पूरी दुनिया झूम गई। लेकिन ऐतराज हुआ किसे ? किसी सिख को , ईसाई को , हिंदू, पारसी , बौद्ध आदि को ? जी नहीं सिर्फ मुस्लिम को। और इसी बिना पर सवा सौ मासूम बच्चों को हम से छीन लिया और आप इतने मासूम हैं कि मुस्लिम आतंकवादी शब्द समझ में नहीं आ रहा। अच्छा है। प्याज खाने की खुराक थोड़ी और बढ़ाइए । अपनी मासूमियत पर थोड़ी मुलायमियत और बढाइए ।

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जहालत की भी हद होती है। कुछ तो शर्म कीजिए। इतने मासूम बच्चों की जान भी आप लोगों का कठमुल्लापन नहीं पिघला पायी ? रही बात मलाला को मिले नोबल मिलने के विरोध की तो यह बात मैं ने कोई सपना देख कर नहीं लिखी है। पाकिस्तान के चैनल जियो टी वी ने यह खबर दी है कि मलाला को मिले नोबेल पुरस्कार के विरोध में तहरीके तालिबान ने पेशावर के सैनिक स्कूल पर हमला किया है । लेकिन आप जैसे कठमुल्लों का कोई कुछ नहीं कर सकता। दुनिया का कलेजा मुंह को आ गया है , लेकिन आप जैसों को कभी शर्म नहीं आएगी। मनुष्यता कांप गई है , पर आप का तो बस इस्लामी आतंकवाद जिंदाबाद !

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 लेकिन आप इस बात की मजम्मत भी कहां कर रहे ? आप तो उन के सुर में सुर मिला रहे हैं । आज तक पर अभी पाकिस्तान के पत्रकार हामिद मीर जो बोल रहे हैं सुनिए और शर्म कीजिए। वह बता रहे हैं कि पाकिस्तान और मुसलमान अपने डबल गेम की कीमत चुका रहे हैं ।

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इस दुःख की घड़ी में क्यों मेरा वक्त खराब कर रहे हैं ? वह बच्चे भी मुसलमान ही थे , जिन के गम में दुनिया बेजार है। आप की मति मारी गई है और लगातार कुतर्क कर रहे हैं। हां, यह मैं ज़रूर कहना चाहता हूं और कि बहुत ज़ोर से कहना चाहता हूं कि ऐसे हिंसक मुसलमानों को दुनिया से निश्चित ही विदा कर देना चाहिए , इन्हें खत्म कर दिया जाना चाहिए ताकि दुनिया जन्नत बन जाए !

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शर्म करना सीखिए। आज मनुष्यता और सभ्यता दोनों कांप गई है इस मुस्लिम जेहाद और आतंकवाद के नाम पर। लेकिन आप जैसे लोग अभी भी इन कुत्तों को कंधा दिए हुए हैं , देते ही रहेंगे । इस दुनिया और सभ्यता पर बोझ हैं आप और आप जैसे लफ्फाज़ !

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तो पूरी दुनिया को ये योगी और यह साध्वी टाइप लोग दहलाए हुए हैं फिर तो आप की नज़र में ? दुनिया की इतनी बड़ी जमात आतंकवादी हो जाए और आप जैसे लोग उस की पैरवी में खड़े हो जाएं तो मुबारक हो आप को आप के यह खयालात !

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कोढ़ी को कोढ़ी कहने वाले लोग इतने बुरे नहीं होते जितना अपने कोढ़ को छुपाने वाले लोग। इस कोढ़ का इलाज कीजिए , छुपाने से ठीक नहीं होगा । जो ऊर्जा आप इधर विरोध जताने में खर्च कर रहे हैं वही ऊर्जा इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैलाने वालों पर खर्च कीजिए । धर्म कोई बुरा नहीं होता , इस्लाम भी नहीं । लेकिन दुर्भाग्य से आज की तारीख में इस्लाम जितना बदनाम धर्म कोई और नहीं । पूरी दुनिया में इस्लाम के नाम पर आतंकवाद की फसल लहलहा रही है , उस को रोकने में अपने को लगाइए। इस्लाम के नाम पर फैल रही बदबू को रोकिए। मनुष्यता और सभ्यता का भला इस में ही है ।

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रायपुर साहित्य समारोह को ले कर वैचारिक शिविरों में चल रहे लफ्फाज़ी विमर्श में मेरी हरगिज कोई दिलचस्पी नहीं है। दिलचस्पी है तो सिर्फ़ और सिर्फ़ यह जानने की कि कोई लेखक, कवि , आलोचक या कोई लफ्फाज़ ही सही इस समारोह के पहले या बाद में बस्तर के या किसी और नक्सल प्रभावित इलाकों में वहां के मसलों की पड़ताल खातिर इन क्षेत्रों में भी गया क्या ? प्रभावित क्षेत्र के आदिवासियों, नक्सलियों या सुरक्षा कर्मियों से ही सही मिला क्या ? आखिर लेखकीय सरोकार का तकाज़ा तो यह था ही । या सिर्फ़ पिकनिक मना कर ही लौट आए सब के सब ? किसी के पास कोई तथ्यात्मक जानकारी हो तो यह ज़रूर दर्ज करे ! लेकिन इस बहाने भी लफ्फाज़ी की इबारत दर्ज करने की ज़रूरत नहीं।
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गीतों की सरिता हो और इस सरिता की संध्या हो और इस में भी सरिता शर्मा की नशीली आवाज़ और गीतों की मादकता में ऊभ-चूभ उन का पाठ हो तो शाम सुरमई हो ही जाती है । इस में भी संध्या सिंह का कविता पाठ जुड़ गया तो शाम कुछ नहीं बहुत ही हसीन और कवितामय हो गई। संवेदना और संकोच में डूबा सरिता शर्मा का आज का काव्यपाठ उन के कवि सम्मेलनी रूप से अलग एक नया ही ठाट रचता रहा , नया ही रंग उपस्थित करता रहा । उन के गीतों की सुगंध के कई-कई मनोहर रंग अभी भी मन में उमग रहे हैं। कुछ फोटो :



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अख़बार या न्यूज़ चैनल किसी भी भाषा के हों अब इन्हें अपने को समाचार-पत्र या न्यूज़ चैनल कहना बंद कर देना चाहिए। क्यों कि इन की कमाई का जरिया अब 90 प्रतिशत विज्ञापन से होता है, समाचार से नहीं । सो इन्हें अब अपने को विज्ञापन पत्र और विज्ञापन चैनल कहना शुरू कर देना चाहिए। इन की सारी कसरत और दौड़ भाग भी विज्ञापन के लिए ही होती है, समाचार के लिए कतई नहीं। विज्ञापन के लोगों से आधी तनख्वाह भी समाचार के लोगों को नहीं मिलती , न ही सुविधा । समाचार की प्राथमिकता भी अब विज्ञापन के लोग ही तय करते हैं। और तय क्या करते हैं लगभग डिक्टेट करते हैं। यह एक भयानक सच है मीडिया का। आप कह सकते हैं कि विज्ञापन जगत के कुत्ते हैं समाचार जगत के लोग।

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 हकीकत से आंख मत मोड़िए। दलाली की कथा तो मीडिया में अनंत है और यह एक अलग विषय है । लेकिन समाचार छोड़ कर जब सिर्फ़ और सिर्फ़ विज्ञापन की बात होने लगी हो तो ? यह सोशल मीडिया ने रहे तो यह विज्ञापन मीडिया तो देश को बेच कर खा चुका है। अख़बार छपता कितना है ? और कि क्या समाचार छापने के लिए छपता है ? कि विज्ञापन के लिए ? आप एक बात बड़े-बड़े अक्षरों में नोट कर लीजिए कि यह बात कोई मैं सपने देख कर नहीं कह रहा। टाइम्स आफ इंडिया के मालिक समीर जैन अब खुद कहने लगे हैं और खुल कर कहने लगे हैं कि वह विज्ञापन जगत के आदमी हैं। अख़बार पहले भी छपते थे , विज्ञापन भी पर अब की तरह विज्ञापन के गुलाम और कुत्ते नहीं थे अखबार। संपादक नाम की एक संस्था थी जो अब समाप्त हो गई है। सो समाचार भी विदा हो चुके हैं।

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कोई माने या न माने आगरा में धर्मांतरण को ले कर लोकसभा में मुलायम सिंह यादव ने जो सर्द रुख़ दिखाया है वह बहुत ही सैल्यूटिंग है। आख़िर आग में घी डालने से किस को फ़ायदा होगा ? मुलायम इस बात को समझते हैं। अखिलेश सरकार ने भी आगरा में जो नपा-तुला कानूनी कदम उठाया है वह भी क़ानून व्यवस्था कायम रखने के हित में है। सख्ती दिखा कर उत्तर प्रदेश को आग में झोंकने से बेहतर है यह सर्द कदम । पतंगबाज़ी में ही नहीं राजनीति में भी ढील दे कर पतंग काटने की पुरानी रवायत है। आखिर एक समय परिंदा भी पर नहीं मार सकता वाला कड़ियल रुख़ अपना कर मुलायम अयोध्या में लंबा भुगत चुके हैं । सो दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर क्या वैसे ही पीता है ? अनुभव भी राजनीति में एक महत्वपूर्ण शब्द है और संभावना भी । तो राजनीति अब भी क्या सर्वदा ही एक संभावना है। ओवैसी जैसे लोग लगाते रहें यह आरोप कि भाजपा और मुलायम मिल गए हैं। इस आरोप से चिढ़ने या भड़कने से बेहतर है उत्तर प्रदेश और देश को सांप्रदायिक आग में झोंक देने से बचा ले जाना ।
  

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