Thursday, 7 January 2016

असल में हम जुड़वां ही थे , आज भी हैं



एक बहुत पुरानी फ़ोटो गोरखपुर में गुज़रे बचपन और उस की याद की। नीचे बैठी हैं बाएं बड़की माई , दाएं अम्मा , बीच में मैं । बड़की माई की गोद में छोटा भाई विवेकानंद पांडेय , अम्मा की गोद में परमानंद पांडेय । पीछे खड़े हैं पिता जी और मुझ से एक महीने पांच दिन बड़े भाई अखिलानंद पांडेय । 

अखिला भाई और हम ने ज़िंदगी के बेशुमार रंग जिए हैं एक साथ । सालों-साल । जैसे साझा ज़िंदगी हो। एक रंग के कपड़े पहनते , एक ही सेक्शन में पढ़ते हुए। एक साथ खेलते हुए एक जैसी शैतानियां करते , एक साथ पिटते हुए हम बड़े हुए हैं । ज़िंदगी में वह साथ , वह अनुभूतियां , वह टटकापन हमारे बीच आज भी वैसे ही उपस्थित है जैसे किसी घास पर सुबह-सुबह की ओस । 

बचपन में हम जब बड़की माई के साथ कहीं घूमने निकलते तो राह में स्त्रियां हम दोनों को एक ही रंग के कपड़े पहने देख हंसती हुई पूछती रहतीं , जेऊंवा [ जुड़वां ] हवें का ? बड़की माई जवाब देते-देते थक जातीं कि , ' नाईं , ई हमार , ई देवरे क !' लेकिन लोगों का सवाल खत्म नहीं होता था । असल में हम जुड़वां ही थे , आज भी हैं । वैसे ही एक दूसरे को समझते हुए । वगैरह-वगैरह करते हुए ।

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