Wednesday, 27 January 2016

तुम्हारे पास ख़ुद को छोड़ आया हूं



ग़ज़ल 

सुख जितना था सब बटोर लाया हूं
तुम्हारे पास ख़ुद को छोड़ आया हूं 

एक मन था जो तुम से जोड़ आया हूं 
अपनी याद का कोहरा छोड़ आया हूं  

जो जागती है मन में तुम्हारे मिलने  से  
वह खनक तुम्हारे पास छोड़ आया हूं

किसी रात के इंतज़ार का गाना था वह
गा सको जिसे वह गाना छोड़ आया हूं

एक नदी है अनुभूति की जो भीतर 
उस बहती धार को छोड़ आया हूं

बहता पानी हूं मैं संभाल में नहीं आता
स्मृतियों की पावन नदी छोड़ आया हूं

सोचता हूं तुम अकेली कैसे  होगी 
इस ज़िंदगी का रुख़ मोड़ आया हूं

बटोर कर सहेज लेना मुझे आंचल में 
तुम्हारे प्यार की छुअन छोड़ आया हूं

[ 27 जनवरी . 2016 ]

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