Sunday, 3 January 2016

एक सपना है मेरे भीतर जो खिल कर सूर्य होना चाहता है


फ़ोटो : गौतम चटर्जी

ग़ज़ल

एक नक्शा है जो मुकम्मल हो कर मंज़ूर होना चाहता है
एक सपना है मेरे भीतर जो खिल कर सूर्य होना चाहता है

फोड़ा पक गया है समस्याओं का पक कर नासूर होना चाहता है
दिल टूटता है तो जुड़ता नहीं है टूट कर मासूम होना चाहता है

यह कौन सा तनाव है कौन सा प्रारब्ध है कौन सी मंज़िल
दफ़्तर दिल्ली में देह काशी में मन संगम नहाना चाहता है

शिव और बुद्ध का कोलाज हर किसी के भीतर घुमड़ता  है
एक मन में गंगा बहती है तो दूसरा सारनाथ होना चाहता है 

ओस में नहाई धरती है भाप में नहाई नदी निर्मल आकाश
हमारे प्यार का शहर बस कर सर्दी में संतूर होना चाहता है

ज़िंदगी क्या है ख्वाहिशों का एक अनबूझ  सा दफ़्तर है  
दिमाग थक जाता है तो दिल चिकमगलूर होना चाहता है  

कभी-कभी नहीं अब दिल रोज मिलना चाहता है 
तुम्हारा इंतज़ार अब बच्चों का स्कूल होना चाहता है

बच्चे लगे रहते हैं दिन-रात कंपटीशन की तैयारी में
सेलेक्शन होता नहीं तो सपना चकनाचूर होना चाहता है


[ 3 जनवरी , 2016 ]

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