Sunday, 29 January 2012

किन्नर समाज की पुरज़ोर पैरवी और शिनाख्त


दयानंद पांडेय

किन्नर समाज पर बहुत कम लिखा गया है। और लगभग उपेक्षित ढंग से। लेकिन महेंद्र भीष्म का उपन्यास किन्नर कथा पूरी तरह किन्नर समाज पर केंद्रित है। न सिर्फ़ केंद्रित है बल्कि उन की तकलीफ, उन की उपेक्षा, उन की व्यथा और उन की तमाम सम्स्याओं से भी दो चार करवाता है। और बताता है कि किन्नर होना कोई जुर्म, पाप या कि अपराध नहीं है। और कि किन्नरों को भी मुख्य समाज और मुख्य धारा में जीने रहने का अधिकार है और कि होना चाहिए। अगर एक वाक्य में कहूं तो किन्नर कथा उपन्यास किन्नर पीडा की पैरवी में लिखा गया उपन्यास है।



कथा का ताना बाना बुंदेलखंड है। और यह अनायास नहीं है कि वीरता और ओज के लिए छाती चौडी करने वाले एक क्षत्रिय परिवार में जो कि राजपरिवार का भी दर्जा रखता है, राजनीतिग्य भी है के घर पैदा हुई जुडवा संतानों में एक किन्नर निकल जाने का जो रुपक रचा है महेंद्र भीष्म ने वह विरल है। इस उपन्यास में वह समाज, परंपरा और खोखले मूल्यों पर एक साथ चोट करते हैं। इस किन्नर कथा में समानांतर कथाओं के बहाने महेंद्र भीष्म जो रुढियों से रह-रह टकराते मिलते हैं उस से एक नया फलक हमारे सामने उपस्थित होता है। किन्नर कथा के बहाने किन्नरों की आह और उस के निर्वाह का अदभुत संसार हमारी आंखों से गुज़रता दिल में उतरता जाता है। कि किन्नरों की पीर पर्वत बन जाती है। राजा जगत राज जैतपुर के राजा हैं। सांसद भी। उन की पत्नी आभा सिंह जुड्वा संतान की मां बनती हैं। एक संतान बेटी है और दूसरी किन्नर। आभा और उन की खास दासी को ही यह बात पता चलती है। बाकी किसी और को नहीं। आभा दासी को मना भी कर देती है किसी भी को यह बताने के लिए। ममता का बंधन पति को भी यह बात नहीं पता लगने देता। रुपा और सोना दोनों बडी होने लगती हैं। एक ही रुप, एक ही रंग। घर में किलकारियां लेती दोनों बेटियों को राजा जगतराज भी एक जैसा प्यार देते हैं। इस बीच खानदान का चिराग कुंवर भी पैदा हो जाता है। दोनों बहनें उस से खेलती खिलाती रहती हैं, 'चौखरियन से कान कटा लो/ आलो बालो चना चबा लो !' लेकिन एक दिन सोना खेलते खेलते गिर जाती है। कपडा हट जाने से जगतराज को पता चल जाता है कि सोना किन्नर है। अब वह अपने क्षत्रिय कुल और खानदान की झूठी बातों, दिखावे की शान में पड कर सोना को मरवाने का निर्ण्य ले लेता है। पहले तो वह अपने दीवान पंचम सिंह को सारी बात बता कर दासी को ठिकाने लगाता है। पंचम सिंह जब उसे मारने जंगल ले जाता है तो वह दुहाई भी देती है कि उस का जन्म भी उसी ने कराया है। पर वह उस की एक नहीं सुनता, हत्या कर देता है। अब नंबर आता है सोना का। सोना को भी वह सोते ही मुंह अंधेरे उठा ले जाता है। पर जंगल में जिस चाकू से वह उस की हत्या करना चाहता है उसी चाकू से उस की अंगुलियां कट जाती हैं तो सोना द्रवित हो जाती है। पूछ बैठती है, 'अरे कक्काजू ! तुमाई उंगली पे खून...' अपना फ़ीता खोल कर घायल उंगली बांधने का प्रयास करती कहती है, 'हमाए कक्काजू हां चोट लग गई, ठीक हो जेहे....'' पंचम सिं द्रवित हो जाता है। फिर मारने की बजाय एक महंत जी के आश्रम चला जाता है। महंत जी को सारी कथा बताता है। वहीं तारा नामक किन्नर आता है। फिर सोना को महंत जी के कहने पर तारा किन्नर के हवाले कर पंचम सिंह वापस आ कर जगतराज को मार देने की सूचना देता है। पर वह जल्दी ही ऊब कर कामकाज छोड करकहीं चला जाता है। अंतत: संन्यासी रुप में पंद्रह साल बाद लौटता है।तब जब रुपा की शादी की तैयारियां जोरों पर है।

इस बीच बहुत कुछ घट जाता है। पंचम का बेटा सोबरन उस का काम संभाल चुका है। जगतराज का बेटा बडा हो चुका है। उधर सोना भी तारा के डेरे में चंदा बन कर जवान हो कर मनीष नामक लडके के प्यार में है। मनीष कोई और नहीं तारा का भतीजा है। तारा भी एक संभ्रांत व्यवसायी परिवार से है। पर किन्नर होने के नाते घर से बेघर हो जाता है। घर के लोग उसे समाज से भी ज़्यादा अपमानित करते रहते हैं। तारा किन्नरों का गुरु है। संवेदनशील और भाउक है। पर नकली किन्नरों से परेशान रहता है। यह एक अलग कथा है।
वस्तुत: तारा का चरित्र ही पूरे उपन्यास पर न सिर्फ़ भारी है बल्कि इसी बहाने किन्नर जीवन की सारी आह, सारी आंच, सारी कडवाहट और सारी यातना का तार और सार हमारे सामने उपस्थित होता है। तारा है तो उपकथा का चरित्र इस किन्नर कथा में पर कई बार वह मुख्य कथा बन कर हमारे सामने उपस्थित होता है। किन्नरों का समाज और परिवार से सारा संघर्ष भी तारा के बहाने हमें जानने को मिलता है। मातिन नाम की एक औरत भी है तारा के डेरे में। जो किन्नर नहीं है। पर पति की मृत्यु के बाद जेठ की ज़्यादतियों और लालच से भाग कर तारा की शरण में है। और उस की खास भी।

कालांतर में किन्नर कथा में बहुत सारे पडाव आते जाते हैं और खास बात यह कि किन्नर कथा की किस्सागोई में भी यह उतार-चढाव उसी तरह हिचकोले लेता है। कई जगह उपन्यास निबंध या लेख के व्यौरों में चला जाता है। खास कर किन्नरों के बारे में तमाम सूचनाओं और जानकारियों को परोसने में यह समस्या आती है। और कथारस में आघात सा होता है। यह जानकारियां या सूचनाएं संवाद के तौर पर भी परोसी जा सकने की गुंजाइश थी और पूरी तरह थ थी। कुछ असहज दृष्य भी उपन्यास में वर्णित है। खास कर ज़िलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक का प्रसंग। वह जिस तरह किन्नरों खास कर तारा को ले कर चिंतित दिखते हैं और जितना समय देते हैं वह उपन्यास में नकलीपन की छौंक लगाता है। इसी तरह उपन्यास का अंत भी फ़िल्मी होने से लेखक को बचाना चाहिए था। जो वह नहीं बचा पाए। शायद इस फेर में कि उपन्यास का अंत सुखद होना चाहिए। पर दुखद ही है कि इस सुखांत के चक्कर में एक अच्छा खासा उपन्यास फ़िल्मी परिणति की भेंट चढ गया। तो भी उपन्यासकार को इस के लिए बधाई ज़रुर देनी चाहिए कि न सिर्फ़ समाज में बल्कि लेखन में भी एक नितांत उपेक्षित विषय पर न सिर्फ़ उपन्यास लिखा बल्कि किन्नर समाज के लिए समाज और लेखन में एक नया परिवेश, एक नई और सकारात्मक धारणा का भी सूत्रपात किया है। अभी तक तो लगभग सभी समाज में किन्नर उपेक्षा और हंसी का ही पात्र रहे हैं पर यह उपन्यास पढ कर किन्नर समाज के बारे में सम्मान और अपनेपन का स्थाई भाव मन में उपजता है। शायद यही इस उपन्यास की बडी ताकत है। इस उपन्यास को पढते समय खुशवंत सिंह की दिल्ली और मिथिलेश्वर के बाबू जी की भी याद आई और श्याम बेनेगल की फ़िल्म वेलकम टू सज्जनपुर की भी याद आती रही। साथ ही गोरखपुर के दो किन्नर भी याद आए। एक अमरनाथ जो गोरखपुर के मेयर थे और
दूसरे लक्ष्मी तिवारी जो इन बिग बास में अपनी मह्त्वपूर्ण और सम्मनजनक भूमिका निभा रहे है। खुशवंत सिंह के दिल्ली उपन्यास में एक किन्नर ही सूत्रधार है । दिल्ली के निर्माण में किन्नरों की भूमिका और दिल्ली के चरित्र को भी खुशवंत सिंह ने किन्नर से जोड कर एक मोहक रुपक रचा है। पर महेंद्र भीष्म ने अपनी किन्नर कथा में किन्नरों के मनोभाव और उन के समाज में हो रहे अपमान, उपेक्षा और तनाव पर बात की है। किन्नरों को मुख्यधारा में जोडने की प्रकारांतर से पैरवी की है। प्रकृति द्वारा उन पर हुए अन्याय को समाज द्वारा कैसे कम किया जा सकता है, उसे बताने की कोशिश की है। मिथिलेश्वर के उपन्यास बाबू जी में एक अजीब यातना है। बाबू जी नामक चरित्र को नौटंकी और गाने बजाने का शौक है। घर परिवार से उपेक्षित हो कर वह दूर चला जाता है। उस की यातना देखिए कि एक बार वह लौटता भी है अपने गांव तो अपनी ही बेटी की शादी में नौटंकी का सट्टा लिखवा कर नौटंकी करने के लिए ही। यहां किन्नर कथा में भी सोना उर्फ़ चंदा आती है नाचने अपने ही महल में अपनी जुडवा बहन की शादी में नाचने। पर व्यथा और यातना वही बाबू जी वाली ही है। लेखक उस की देहयष्टि का वर्णन भी करता है केले के तने जैसी जाघ ! श्याम बेनेगल के वेलकम टू सज्जनपुर में तो एक किन्नर बाकायदा एक माफ़िया को चुनौती देते हुए चुनाव भी लडता है। अलग बात है कि उस की हत्या हो जाती है। तो यहां किन्नर कथा में भी तारा की हत्या एक माफ़िया ही करवा देता है। उसी के घर में। खैर। 
तमाम बातों के बावजूद महेंद्र भीष्म का यह उपन्यास किन्नर कथा इस अर्थ में अलग और अप्रतिम है कि किन्नर समाज को समाज में सम्मान और मुख्यधारा से जोडने की न सिर्फ़ पुरज़ोर पैरवी करता है बल्कि इसे तर्किक परिणति की ओर भी ले जाता है। महेंद्र भीष्म इसीलिए बधाई के हकदार हैं।


समीक्ष्य पुस्तककिन्नर कथा
लेखक- महेंद्र भीष्म
प्रकाशक- सामयिक प्रकाशन
3020-21, जट्वाडा, दरियागंज, एन.एस. मार्ग, नई दिल्ली- 11002
पृष्ठ 192
मूल्य 300 रुपए

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