Friday, 27 January 2012

हारमोनियम के हज़ार टुकड़े

हारमोनियम के हज़ार टुकड़े मतलब थके हारे मीडियाजनों के पराजित मन के असंख्य टुकड़े। मीडिया की चकमक दुनिया में कैसे तो उस का मिशनरी भाव नेस्तनाबूद हुआ और कैसे तो बाज़ार और उस की मार में घायल हो कर एक अप्रत्याशित दलदल को वह न्यौछावर हो गया, यह कथा भर हारमोनियम के हज़ार टुकड़े में नहीं है। कैसे ऐतिहासिक महत्व के दो अख़बार व्यावसायीकरण के व्याकरण में तार-तार हो गए इस की भी कथा है। कथा है पूंजीपतियों और राजनीतिज्ञों की अवैध संतान बन चुके इन अख़बारों से जुड़े तमाम कर्मचारियों की यातना की जिन के घरों के चूल्हे देखते-देखते ठंडे हो गए। कथा है ट्रेड यूनियन के क्षरण और अख़बार मालिकानों के मनमानेपन की। कि कर्मचारी-कर्मचारी नहीं गाय, बैल, बकरी, भैंस की तरह इस हाथ से उस हाथ बिक जाते हैं और, निःशब्द रह जाते हैं। दुनिया भर की आवाज़ बनने वाले अख़बारों के कर्मचारी कैसे वायसलेस होते जाते हैं, होते जाते हैं अभिशप्त। और मनमोहन कमल सरीखे भड़ुओं का आकाश बड़ा, और बड़ा होता जाता है। उन की घास चमकती जाती है। भइया जैसे संपादक कैसे तो इस सिस्टम को भा जाते हैं और सूर्य प्रताप जैसे संघर्षशील पत्रकार आहिस्ता-आहिस्ता दलाली के भंवर में लिपट कर निसार हो जाते हैं। चौहान जैसे थके हारे जब गाना चाहते हैं, ‘हम होंगे कामयाब!’ तो उन की हारमोनियम तोड़ दी जाती है। अख़बार मालिकान का गुंडा संपादक और उस के गुर्गे तोड़ देते हैं हारमोनियम। कर्मचारी सड़क पर आ जाते हैं, उन के घरों के चूल्हे ठंडे पड़ जाते हैं। लेकिन सब की आवाज़ उठाने वाले ये अख़बार वाले अपनी आवाज़ नहीं उठा पाते। वायसलेस हो जाते हैं। इस निस्तब्ध इबारत की ही आंच में पगे हैं हारमोनियम के हज़ार टुकडे। मीडियाजनों के पराजित मन के टुकड़े।
हारमोनियम के हज़ार टुकड़े
पृष्ठ सं.88
मूल्य-150 रुपए

प्रकाशक
जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि.
30/35-36, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2011

बाज़ार, व्यवस्था और बेरोजगारी से संघर्ष कर रहे मीडिया के साथियों के नाम


शराब लोगों और परिवार को बरबाद कर देती है। ऐसे उस ने अनेक क़िस्से सुने और देखे थे। पर शराब किसी संस्था को, वर्षों पुरानी किसी कंपनी को, वर्षों पुराने दो अख़बारों को भी बरबाद कर देगी यह वह पहली बार घटित होते देख रहा था। लेकिन अब सुनील सिवाय अफ़सोस के कुछ कर नहीं सकता था।

अस्सी के दशक में जब वह इस के सहयोगी प्रकाशन और हिंदी अख़बार 'आज़ाद भारत' में काम करने लखनऊ आया था तब वह रोटरी मशीन पर छपता था। बृहस्पतिवार के दिन उसका वास्तविक सरकुलेशन पता चलता था जब संडे मैगज़ीन छपा करती थी। एक ही संस्करण की सवा लाख प्रतियां वह भी हिंदी में तब एक रिकार्ड था, आज भी है। तब जब कि कई बार उस अख़बार में छपी फ़ोटो रोटरी छपाई के चलते पहचान में नहीं आती थी। फ़ोटो के नीचे छपे कैप्शन से फ़ोटो समझ में आती थी। कंटेंट वाइज़ भी यह अख़बार बहुत सुदृढ़ नहीं था फिर भी इस का सर्कुलेशन बहुत सारे अच्छे अख़बारों को न सिर्फ़ पीछे छोड़ता था, दूर-दूर तक कोई उस के आस-पास भी नहीं दिखता था। तो इस के एक नहीं अनेक कारण थे। तब चल रही विभिन्न लाटरियों के रिज़ल्ट, ठेकों के टेंडर, लोकल सिनेमा के विज्ञापन सिर्फ़ इसी अख़बार में छपते थे। और इस अख़बार का शहर में सब से पुराना होने के नाते लोगों की आदत में शुमार हो जाना भी था।

एक दिन दफ्तर की कैंटीन में बातों-बातों में सुनील ने आजिज़ आ कर कह ही दिया कि, ‘इतना रद्दी अख़बार इतना ज़्यादा कैसे बिकता है भला समझ में नहीं आता!’ तो रमताराम कहे जाने वाले मिश्रा जी जो उन दिनों प्रादेशिक पृष्ठों के प्रभारी थे और शहर में होने वाले प्रवचन रिपोर्ट करते थे बोले, ‘तुम अभी तक यह भी नहीं जान पाए?’ वह पूछ ऐसे रहे थे गोया बहुत बड़े रहस्य से परदा उठाने जा रहे हों। वह छूटते ही बोला, ‘आप ही बताइए!’ सुनते ही उन्होंने उसे मुसकुरा कर घूरा और वहीं मेज़ पर पड़ा अख़बार उठाया। अख़बार का मास्टहेड दिखाया और आज़ाद तथा भारत के बीच शंख फूंकते श्री कृष्ण की फ़ोटो दिखाई और बोले, ‘यह बेचते हैं अख़बार, इनके नाते इतना ज़्यादा बिकता है अख़बार!’ और वह फिर मुसकुराने लगे। सुनील भनभना गया। बोला, ‘क्या बेवक़ूफ़ी की बात करते हैं?’

‘अब तुम मत मानो पर सच यही है।’ कह कर वह उठ गए थे।

ख़ैर, अख़बार चाहे जैसा था संपादक अच्छे थे और ख़ासे कड़ियल। किसी के आगे झुकते नहीं थे। प्रबंधन के आगे भी नहीं। उस समय संपादक नाम की संस्था थी भी। उस ने बहुतेरे संपादक देखे और भोगे थे पर ऐसा संपादक तो भूतो न भविष्यति। राजनीति, साहित्य, खेल, साइंस, कामर्स, ज्योतिष, सिनेमा यहां तक कि खगोलशास्त्र पर भी वह हमेशा अपडेट रहते थे। वह सुनता था कि घर में तो वह हमेशा पढ़ते ही रहते थे दफ्तर में भी दिन के समय वह पढ़ते ही मिलते थे। किसी भी विषय पर वह पूरी तैयारी के साथ बोलते या लिखते थे। ख़बर चाहे किसी अल्लाह मियां के खि़लाफ़ भी क्यों न हो वह रोकते नहीं थे। प्रबंधन और मालिकान के लाख दख़ल के बावजूद। यह शायद इसी नीति का नतीजा था कि एक बार पानी सिर से ऊपर निकल गया। और अख़बार मालिकान की एक चीनी मिल के खि़लाफ़ भी विधान परिषद के हवाले से एक ख़बर पहले पेज पर छप गई। संपादक उस दिन छुट्टी पर थे। रिपोर्टर नया था। उसे जानकारी ही नहीं थी कि उक्त चीनी मिल इसी व्यवसायी की है और डेस्क ने भी ख़बर देर रात पास कर दी। बावजूद इस सब के संपादक ने उस रिपोर्टर को नौकरी से निकाला नहीं। उसे रिपोर्टिंग से हटा कर डेस्क पर कर दिया। मालिकान को समझा दिया कि रिपोर्टर को निकालने से ख़बर और उछलेगी फिर आप की बदनामी ज़्यादा होगी। मालिकान मान गए थे। रिपोर्टर की आंख में भी पानी था। उस ने भी जल्दी ही दिल्ली के एक अख़बार में नौकरी ढूंढ कर इस्तीफ़ा दे दिया। इस अख़बार के तब का प्रबंधन और मालिकान भी अख़बार वालों के साथ सम्मान से पेश आते थे।

मालिकान भी तब संपादक से कहते थे, ‘अगर आपके पास समय हो तो बताइए हम मिलना चाहते हैं।’

और संपादक भी ऐसे कि अगर काम का समय हो तो मना कर देने का जिगरा रखने वाले थे।

अख़बार की यूनियन भी तब कड़ियल थी। अगर प्रबंधन बारह परसेंट बोनस का ऐलान करता तो यूनियन की दो घंटे के काम बंद और ज़िंदाबाद-मुर्दाबाद में ही बोनस चौदह परसेंट का ऐलान हो जाता। कर्मचारी भी अगर एक बार नौकरी में आ जाते तो अपने को सरकारी कर्मचारी मान बैठते। यहीं से रिटायर होना वह अपना जन्मसिद्ध अधिकार मान लेते। कहीं किसी के हितों पर प्रबंधन भी चोट नहीं करता। कहीं किसी के साथ किसी कारण कुछ होता भी था तो यूनियन चट्टान की तरह उस के साथ खड़ी हो जाती, प्रबंधन को झुकना पड़ता। उसे याद है कि चौहान नाम का एक चपरासी अकसर शराब के नशे में कुछ न कुछ बवाल कर देता और सस्पेंड हो जाता। यूनियन बीच बचाव करती। वह बहाल हो जाता। एक बार यूनियन के महामंत्री ने आजिज़ आ कर उस से कहा कि, ‘चौहान सुधर जाओ। ऐसे जो हर महीने तुम बवाल काट कर सस्पेंड होओगे तो हम तुम्हारा साथ नहीं दे पाएंगे।’

‘कैसे नहीं दे पाएंगे?’ चौहान भी अड़ गया और अपनी जेब से यूनियन के चंदे की रसीद दिखाते हुए बोला, ‘ई पांच रुपए की रसीद क्या मु़त में कटाइत है हर महीने?’

यूनियन के महामंत्री सहित बाक़ी सदस्य भी हंसने लगे।

वैसे ही यूनियन का एक ख़ास हिस्सा था लखन। लखन था तो अख़बार में पेस्टर। पर जब यूनियन का जलसा होता सालाना हो या कोई और, हड़ताल हो या कोई तात्कालिक मोर्चा! हर किसी मौके़ पर गले में हारमोनियम लटका कर जब वह माइक के सामने खड़ा होता तो क्रांति का जैसे बिगुल फूंक देता।

कोई ढोलक या नगाड़े की जो उसे संगत मिल जाती तो वह एक-एक को अपनी गायकी के ललकार में लपेट लेता। ख़ास कर एक शब्द जय हिंद! जय हिंद!! जय हिंद!!! को तीन तरह के उच्चारण में भर कर नारे में तब्दील करता हुआ नुक्कड़ गीत गाने वालों को मीटर और सुर दोनों देता तो बड़े-बड़े उस के क़ायल हो जाते। कई बार तो बाक़ी अख़बारों के यूनियन वाले भी उसे उस की हारमोनियम के साथ अपने मोर्चे में ले जाते। कभी-कभी यह भी होता कि शासन और प्रशासन से भी प्रेस वालों को अपनी बात मनवानी होती। तो नारे लगाते जुलूस निकाले जाते, मशाल जुलूस निकलते। प्रेस क्लब से जी.पी.ओ. तक का मार्च होता। लखन अपनी हारमोनियम लटकाए सब के साथ होता। कई मौक़ों पर गाना-बजाना नहीं भी होता तो भी लखन हारमोनियम लटकाए ‘बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना!’ गाने को सार्थक करता यहां वहां घूमता रहता।

ऐसे ही थे एक इदरीस मियां। पढ़े-लिखे कुछ ख़ास नहीं थे पर हर किसी मार्च में वह अपने अख़बार के मैनेजमेंट के खि़लाफ़ ही नारे लगाते रहते। भले ही वह मोर्चा या मार्च शासन या प्रशासन के खि़लाफ़ हो पर उन का नारा जैसे शाश्वत रहता, ‘मनेजर साहिब होश में आओ!’ और वह माइक पर गए बिना रहते भी नहीं थे। फ़र्क़ यही था कि लखन पी पा कर बेगानी शादी में अब्दुल्ला बना रहता और इदरीस मियां बिना पिए, बिना छुए। पर दोनों की लय, उल्लास और आकाश एक ही होता!

पर जैसा कि हमेशा होता है, समय करवट लेता है, ले रहा था। पत्रकारिता बदल रही थी, लोग बदल रहे थे, राजनीति बदल रही थी, मैनेजमेंट और उस का एप्रोच बदल रहा था सो यूनियन का मिज़ाज भी बदला और मालिकान की मन मर्ज़ी भी। मालिकानों की दूसरी पीढ़ी काम-काज संभाल रही थी। और जो उन के पिता संपादक से पूछा करते थे कि, ‘अगर आप को समय हो तो बताइए, हम मिलना चाहते हैं।’ वहीं उन के बच्चे अब संपादक से कहते, ‘ज़रा जल्दी आ जाइए हमें कुछ बात करनी है।’ और जो संपादक कहते कि, ‘अभी तो अख़बार के काम का समय है।’ तो मालिकान कहते, ‘फिर बाद में हमारे पास समय नहीं होगा। आप फ़ौरन आइए!’

मालिकान बदले, उन की मन मर्ज़ी शुरू हुई तो प्रबंधन का बदलना भी लाज़िमी था। अब जनरल मैनेजर संपादक से ख़बरों के बारे में टोका-टाकी करने लगे। अख़बार मालिकों की पहले की पीढ़ी अख़बार पढ़ती थी, उस पर बात करती थी। लेकिन यह पीढ़ी हिंदी ही नहीं पढ़ती थी। हिंदी अख़बारों को भी अंगरेज़ी अख़बारों का अनुवाद बनाना चाहती थी। अब वह संपादक से बात करने के बजाय अपने मैनेजर से हुक्म भेजने लगी। हस्तक्षेप बढ़ने लगा। यह ख़बर ऐसे छापिए, वह ख़बर मत छापिए। पर संपादक ने जनरल मैनेजर की बातों की साफ़ अनदेखी की। कहा कि, ‘लाला ने तो कभी ख़बरों के बारे में बात नहीं की, आप भी मत करिए।’ पर जनरल मैनेजर ने संपादक को चिट्ठी लिख कर बाक़ायदा स्पष्टीकरण मांगा। संपादक की समझ में आ गया कि सत्ताइस साल पुरानी नौकरी का आज आखि़री दिन आ गया। अप्रेंटिसशिप से इसी अख़बार में उन्हों ने पत्रकारिता की शुरुआत कर अपने काम, मेहनत और योग्यता के बल पर संपादक की कुर्सी तक वह पहुंचे थे। हिंदी-अंगरेज़ी दोनों अख़बारों की संपादकी संभाली। कोई लालच, कोई दबाव उन के आगे अब तक बेमानी था। वह कभी झुकते नहीं थे। सिद्धांतों, पत्रकारीय मूल्यों को ही वह सर्वस्व समझते थे। सो जनरल मैनेजर की यह चिट्ठी पाते ही उन्होंने हाथ से ही इस्तीफ़ा लिखा, चपरासी बुलाया और एम.डी. के पास भिजवा कर अपना सामान समेटने लगे। एम.डी. भाग कर संपादक के पास आए। पूछा, ‘ऐसा क्या हो गया जो आप ने आनन फ़ानन इस्तीफ़ा भेज दिया?’

‘आपके पिता जी ने भी कभी ख़बरों के बारे में मुझ से स्पष्टीकरण नहीं मांगा इतने सालों की नौकरी में और आज आप के जनरल मैनेजर की इतनी हिम्मत कि मुझ से स्पष्टीकरण मांगे?’ संपादक ने जोड़ा, ‘बिना आप की शह के तो वह ऐसा कर नहीं सकता! सो अब मैं यहां इस तरह काम नहीं कर सकता!’

‘मुझे सचमुच इस बारे में जानकारी नहीं थी।’
‘चलिए अब तो हो गई।’
‘आप अपना इस्तीफ़ा वापस ले लीजिए। प्लीज़!’
‘इस्तीफ़ा तो मैं ने दे दिया!’
‘कोई वैकल्पिक व्यवस्था होने तक ही रुक जाइए!’
‘संभव नहीं है।’
‘कोई नया संपादक तो ढूंढ लेने दीजिए!’
‘मालिकों के इशारों पर कुत्तों की तरह दुम हिलाने वालों की कमी नहीं है। बहुत मिल जाएंगे।’
‘अच्छा अख़बार के भीतर ही कोई वैकल्पिक व्यवस्था बना जाइए ताकि काम चलता रहे। नया संपादक आने तक!’
‘यह व्यवस्था आलरेडी है।’ संपादक बोले, ‘तब तक के लिए मुकुट जी को कार्यकारी संपादक बना लीजिए। वह आप को सूट भी करेंगे। दुम हिलाने में भी वह माहिर हैं।’

मुकुट जी थे तो आज़ादी की लड़ाई के समय के। कवि थे। पर वीर रस की कविता भी ऐसे पढ़ते थे कि करुण रस की कविता भी पानी मांग जाती। वह आज़ाद भारत अख़बार के शुरुआती दिनों से ही थे। सो वह अख़बार के आदि पुरुष कहे जाते थे। जाने कितने लोग आए और गए। पर वह अंगद के पांव की तरह जमे रहे तो जमे रहे। अब रिटायर थे। पर मानदेय पर काम कर रहे थे। उन के तीन सपने थे। अख़बार का संपादक होना। विधान परिषद में जाना और पदमश्री के खि़ताब से सम्मानित होना। तीनों ही से वह वंचित थे। जब कि सहयोगी प्रकाशन और अंगरेज़ी अख़बार के घोष साहब जो उन के साथ के ही थे यह तीनों सपने साध कर रिटायर हुए थे और मुकुट जी की तरह वह भी मानदेय पर अपनी सेवाएं जारी रखे थे। दोनों ही मालिकानों के क़रीबी। दोनों ही दुम हिलाने में एक्सपर्ट। फ़र्क़ बस इतना ही था कि एक हिंदी में हिलाता था दूसरा अंगरेज़ी में। उन दिनों अख़बारों में क्या था कि अस्सी परसेंट पत्रकार काम करने वाले होते थे और बीस परसेंट दलाली करने वाले। और यह अनुपात भी रिपोर्टरों के बीच का ही होता। डेस्क का कोई इक्का-दुक्का ही दलाल पत्रकार होता। तो यह दलाल पत्रकारिता के नाम पर अख़बार मालिकों से ले कर मंत्रियों, अधिकारियों, दारोग़ाओं तक के आगे जी हुज़ूरी और दुम हिलाने में एक्सपर्ट। हिंदी वाले ज़रा जल्दी एक्सपोज़ हो जाते थे, अंगरेज़ी वाले देर से। तो यहां घोष साहब भी पद्मश्री, संपादक और विधान परिषद भोग लेने के बावजूद एक्सपोज़ हो चुके थे और मुकुट जी इन में से कुछ भी न भोग पाने के बावजूद एक्सपोज़ थे। मुकुट जी कवि भी थे और पत्रकार भी। बल्कि कहें कि पत्रकारों में कवि और कवियों में पत्रकार। वस्तुतः दोनों ही वह नहीं थे। न कवि, न पत्रकार। संपादक कहते भी थे कि, ‘मुकुट जी ज़िला संवाददाता होने की भी योग्यता नहीं रखते लेकिन उन की क़िस्मत देखिए कि वह वर्षों से विशेष संवाददाता हैं और विधानसभा कवर करते हैं।’ और अब यही संपादक मुकुट जी को कार्यकारी संपादक बनाने की तजवीज़ एम.डी. से कर रहे थे और बता रहे थे कि, ‘वह आप को सूट भी करेंगे।’

मुकुट जी कार्यकारी संपादक हो गए। अख़बार तो अख़बार शहर में भी खलबली मच गई। संपादक को आफ़िस से जाते वक्त गेट पर दरबान ने रोक लिया और उन्हें उनकी किताबें या पर्सनल चीज़ें भी नहीं ले जाने दीं। यह सब एम.डी. के इशारे पर हुआ। पहले के दिनों में संपादक इस अख़बार से बाक़ायदा फ़ेयरवेल पार्टी ले कर माला पहन कर गए थे पर अब इसी अख़बार से एक संपादक अपमानित हो कर गया। और इस अपमान के विरोध में एक भी पत्रकार, एक भी कर्मचारी खड़ा नहीं हुआ।


अख़बार, प्रबंधन और समाज यहां तक कि यूनियन भी अब एक नए बदलाव में करवट ले रही थी।


यह कौन सी आहट थी?


ख़ैर, मुकुट जी ने ह़फ्ते भर में ही समझ लिया और लोगों ने भी कि संपादक होना मुकुट जी की क़िस्मत में भले रहा हो, उन के वश का यह सब है नहीं। दलाली करना, दुम हिलाना और बात है, अख़बार चलाना और बात! कोई संपादकीय सहयोगी उन के क़ाबू में नहीं आता। वह परेशान हो गए।


उनको लगा कि कहीं पुराना संपादक तो नहीं सब को भड़का कर अख़बार नष्ट करवाने पर तुला है? फिर इसी बीच कुछ अफ़वाह ऐसी भी आई कि कई लोग यह अख़बार छोड़ कर फ़लां-फ़लां अख़बार में जा रहे हैं। मुकुट जी के हाथ पांव फूल गए। उन्हों ने जनरल मैनेजर को यह बात बताई। जनरल मैनेजर ने सब के प्रमोशन की तरकीब बताई और कहा कि इस से सब के पैसे भी बढ़ जाएंगे, कैडर भी सो कोई कहीं नहीं जाएगा।


यह पहली बार हुआ अख़बार में कि ए टू ज़ेड सब का प्रमोशन एक साथ हो गया। पर इस शर्त के साथ कि अगर काम संतोषजनक नहीं हुआ तो यह प्रमोशन रद्द हो सकता है। कुछ नए अप्रेंटिस भी रखे गए। कहां अख़बार में एक डिप्टी न्यूज़ एडीटर था, अब चार-चार न्यूज़ एडीटर हो गए थे। सभी डट कर काम करने में लग गए। अख़बार का सर्कुलेशन मुकुट जी के कार्यकाल में और बढ़ गया। रोटरी की जगह आफसेट मशीन आ गई। लाइनो और मोनो कंपोजिंग की जगह अब कंप्यूटर ने ले ली। अब मुकुट जी की महत्वाकांक्षाएं पेंग मारने लगीं। वह फ्रंट पेज एडिटोरियल लिखना चाहते थे अपने हस्ताक्षर सहित। कार्यकारी संपादक की जगह पूर्ण कालिक संपादक बनना चाहते थे। पद्मश्री, विधान परिषद के लिए भी वह प्रयासरत थे। बाक़ी तो सब कुछ उनके हाथ में नहीं था पर फ्रंट पेज एडीटोरियल उन के हाथ में था। पर वह लिख नहीं पा रहे थे। सहयोगियों से वह सलाह लेते तो वह सब खेल जाते। उन को उत्तरी वियतनाम-दक्षिणी वियतनाम जैसे विषय सुझा देते जो उन को समझ में ही नहीं आते। पर एक दिन वह सुबह मीटिंग में आए तो बहुत प्रसन्न। बोले, ‘यार आज मज़ा आ गया।’ लोगों ने पूछा, ‘क्या हो गया?’


‘महादेवी वर्मा मर गई!’ मुकुट जी बोले।


‘तो इस में मज़ा आने की क्या बात है?’ एक सहयोगी ने सन्न हो कर पूछा।


‘अरे फ्रंट पेज एडीटोरियल आज मैं लिखूंगा। और इस में किसी से मुझे कुछ पूछना भी नहीं पड़ेगा। इतना भी नहीं समझते?’ उन्होंने महादेवी संबंधी किताबें दिखाते हुए कहा कि, ‘देखो यह सब लाया हूं।’


‘ओह!’


लेकिन एक सहयोगी ने उन्हें फ़र्ज़ी फ़ोन कर दूरदर्शन बुला लिया कि, ‘महादेवी जी पर श्रद्धांजलि देने के लिए रिकार्डिंग है आ जाइए।’ अब मुकुट जी परेशान कि क्या करें? उसी सहयोगी ने सलाह दी कि ‘दूरदर्शन जाइए पहले। यहां का एडीटोरियल तो आप के हाथ में है, जब चाहिएगा, लिख लीजिएगा।’


वह जा कर दिन भर दूरदर्शन में बैठे रहे। शाम को पता किया कि, ‘आखि़र रिकार्डिंग कब होगी?’ दूरदर्शन वालों ने पूछा, ‘कैसी रिकार्डिंग?’


मुकुट जी बोले, ‘महादेवी पर! उन को श्रद्धांजलि देनी है।’


‘ऐसा तो कुछ नहीं है।’


वह भाग कर द़फ्तर आए। महादेवी पर एडीटोरियल लिखते-लिखते उन्हें रात के ग्यारह बज गए। डाक एडीशन छप रहा था। तय यह हुआ कि अब एडीटोरियल कल जाएगा। दूसरे दिन सारे अख़बारों में महादेवी पर एडीटोरियल छप चुका था सो फ्रंट पेज पर छपने का प्रश्न ही नहीं था। उन का यह सपना भी टूट गया। वह यह शिकायत ले कर जनरल मैनेजर के पास भी गए। बाद में और भी ऐसी छोटी-छोटी शिकायतें ले कर वह जाते रहे। जनरल मैनेजर उन की सारी शिकायतें एम.डी. को बताता रहा। एम.डी. समझ गया कि जो एडीटर अपना एडीटोरियल अख़बार में नहीं छपवा सकता वह बाक़ी काम भी भला कैसे करता होगा?


नए संपादक की तलाश शुरू हो गई।


नया संपादक मुख्यमंत्री का सिफ़ारिशी था। मुख्यमंत्री ने उसे संपादक बनाने के लिए कई लाख रुपए विज्ञापन के मद में एडवांस सूचना विभाग से अख़बार को दिलवा दिए। मुख्यमंत्री कांग्रेसी था पर संपादक भाजपाई भेजा उस ने। जातीय गणित के तहत! लेकिन यह चर्चा भी जल्दी ही थम गई। नया संपादक रिपोर्टर से सीधे संपादक बना था। दलाली और लायज़निंग में बेहद एक्सपर्ट। अख़बार मालिक के कई छोटे बड़े काम उस ने करवाए। एम.डी., चेयरमैन सभी प्रसन्न। हालां कि अख़बार में फ़र्ज़ी और प्रायोजित ख़बरों की बाढ़ आ गई थी। एक प्रतिद्वंद्वी अख़बार में एक नया आया संपादक जो अपने अख़बार का लगभग सर्वेसर्वा बन कर आया था, हाकर स्ट्रेटजी में लग गया। सुबह-सुबह हाकरों को वह शराब बांटता, घड़ी, पंखा से लगायत मोटरसाइकिल तक इंसेंटिव में देता। और फिर भी जो हाकर नहीं मानता उस की कुटाई करवा देता। हाथ पैर तुड़वा देता। नतीजा सामने था, वह अख़बार आगे जा रहा था, बाक़ी पीछे। आज़ाद भारत तो बहुत ही पीछे। लाटरियां बंद हो गईं थीं सो उन के परिणाम भी कहां छपते? टेंडर नोटिस में भी आज़ाद भारत की मोनोपोली टूट चुकी थी। लोकल सिनेमा के विज्ञापन अब प्रतिद्वंद्वी अख़बारों में भी थे। प्रतिद्वंद्वी अख़बार का नया संपादक आज़ाद भारत का न सिर्फ़ सर्कुलेशन छीन रहा था बल्कि विज्ञापन भी छीन रहा था। अख़बारों में यह संपादक एक ऐसा सवेरा उगा रहा था जिस सवेरे में सूरज नहीं था। उजाला नहीं था, अंधेरा था। लगता था जैसे हर सुबह एक सूर्यग्रहण लग जाता था। अपने अख़बार के संपादकीय विभाग में भी उस की गुंडई तारी थी। वह जिस को चाहता गालियां देता, जिस को चाहता थप्पड़ मारता, जिस को चाहता लात मार देता। कभी चूतड़ पर तो कभी मुंह पर। और जो यह सब नहीं स्वीकार करता उस के पेट पर लात मार देता। जिस महिला सहयोगी को वह चाहता अपनी रखैल बना लेता। कहीं कोई चीत्कार या अस्वीकार नहीं। लोग उस को भइया कहते और वह सब की मइया.......करता!


अजब था।


अजब यह भी था कि कहीं किसी स्तर पर इस का प्रतिरोध नहीं था। न भीतर, न बाहर। भइया नाम के इस संपादक की गुंडई की चहुं ओर स्वीकृति पर सुनील जैसे कुछ लोग शर्मशार थे। पर बंद कमरों में। बाहर प्रतिरोध की हिम्मत उन में भी नहीं थी।


यह वही दिन थे जब अख़बारों में स्ट्रिंगर्स और संवाद सूत्र की फ़ौज खड़ी हो रही थी। पहले के दिनों में अख़बारों में अप्रेंटिस आते थे। साल छः महीने या ज़्यादा से ज़्यादा दो साल में ट्रेनिंग पूरी कर वह उप संपादक या स्टाफ़ रिपोर्टर बन जाते। पर अब वह स्ट्रिंगर बन रहे थे, संवाद सूत्र बन रहे थे। भइया का पैर छू कर यह संवाद सूत्र और स्ट्रिंगर का छूत बाक़ी अख़बारों में भी पांव पसार रहा था। शोषण की एक नई नींव रखी जा रही थी, नई इबारत लिखी जा रही थी, एक नई चौहद्दी बनाई जा रही थी। जिस पर किसी यूनियन, किसी जर्नलिस्ट फ़ेडरेशन, किसी जर्नलिस्ट एसोसिएशन या किसी प्रेस काउंसिल को रत्ती भर भी ऐतराज़ नहीं था।


यह क्या था?


ख़ैर, इन्हीं दिनों आज़ाद भारत के सहयोगी प्रकाशन अंगरेज़ी अख़बार के सवा सौ साल पूरे हो रहे थे। सो तय हुआ कि यह एक सौ पचीसवीं जयंती समारोह पूर्वक मनाई जाए। अख़बार के दलाल संपादक ने वाया मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री से टाइम लेने की ज़िम्मेदारी ले ली। और यह लीजिए प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने टाइम दे दिया। दिल्ली के विज्ञान भवन में समारोह पूर्वक अंगरेज़ी अख़बार की एक सौ पचीसवीं जयंती मनाई गई। अख़बार मालिक ने मौक़े का भरपूर फ़ायदा उठाया। प्रधानमंत्री से मेल मुलाक़ात का। दो केमिकल फै़क्ट्रियों का लाइसेंस ले लिया। फ़टाफ़ट। प्रधानमंत्री के साथ विदेश यात्रा में पत्रकारों की टीम में अपनी जगह फ़िक्स की। और उस विदेश यात्रा में भी दो फै़क्ट्रियों के लाइसेंस जुगाड़ लिए।


अब सवाल था कि इन फ़ैक्ट्रियों को लगाने की पूंजी कहां से आए? कभी देश के औद्योगिक जगत में पांचवें नंबर पर गिने जाने वाले इस व्यावसायिक मारवाड़ी परिवार ने जो अब शहर में भी पांचवें नंबर के पैसे वालों में नहीं रह गया था, इस अख़बार और इस की बिल्डिंग से ही लागत पूंजी निकालने की तरकीब निकाली।


आलम यह था कि बोफ़ोर्स की बाढ़ में राजीव गांधी की सरकार बह चुकी थी और मंडल कमंडल की आंच में वी.पी. सिंह सरकार ध्वस्त हो गई थी।


चंद्रशेखर के प्रधानमंत्रित्व में जीप वाली पार्टी कांग्रेस के ट्रक को खींच रही थी। फ़ैक्ट्रियों के लाइसेंस डूबते दिख रहे थे। अंततः कांग्रेस में एक खे़मा सक्रिय हुआ। और उन दिनों देश के औद्योगिक जगत में पांचवें नंबर पर उपस्थित एक उद्योग घराने ने दोनों अख़बार और अख़बार की नई बन रही बिल्डिंग को कांग्रेस के इशारे पर ख़रीद लिया। यह संयोग भी अजब था कि जो घराना इस अख़बार और कंपनी को बेच रहा था उस ने भी जब इस कंपनी और अख़बार को ख़रीदा था तब देश के औद्योगिक जगत में पांचवें नंबर पर था। और अब नया ख़रीददार भी उसी पायदान पर था। यह अख़बार और यह कंपनी अपने को चौथी बार बिकते पा रहे थे। कभी अंगरेज़ों का रहा यह अख़बार जिस में कभी चर्चिल जैसों ने काम किया था जो बाद में इंगलैंड के प्रधानमंत्री बने थे, अपने सौभाग्य पर एक बार फिर मुसकुरा रहा था। हालां कि तजु़र्बेकार आंखें इसे सौभाग्य नहीं दुर्भाग्य मान रही थीं, इस अख़बार का। पर अभी होशियार टिप्पणीकार कुछ भी कहना जल्दबाज़ी बता रहे थे। गोया दिल्ली भी दूर थी और लंका भी!


अभी तो उस व्यावसायिक घराने के प्रताप के चर्चे थे। काग़ज, शराब और अन्य तमाम मिलों के अलावा शिपिंग कंपनी भी इस घराने के पास थी। सो कितने पानी के जहाज़ हैं इस कंपनी के पास, इस के भी चर्चे थे। इस व्यावसायिक घराने का चेयरमैन पंजाबी था और कुंवारा था। जब कि पिछला घराना मारवाड़ी था। पिछले घराने का चेयरमैन बाल बच्चेदार था। कभी उस की भी तमाम काटन और चीनी मिलें थीं। पर नया चेयरमैन जल्दी ही फ़ेरा क़ानून में पकड़ा गया था, यह ख़बरें भी चलीं। और कि कैसे इस ने क़ानून को तब ख़रीद लिया था, यह चर्चा भी चली। राजीव गांधी सरकार में वित्त मंत्री रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इस उद्योगपति को राजीव के विरोध के बावजूद फ़ेरा का़नून में गिऱतार करवाया था। इस उद्योगपति ने जेल जाने से बचने के लिए तब पानी की तरह पैसा बहाया था। और जैसा कि प्रेमचंद कभी लिख गए थे कि न्याय लक्ष्मी की कठपुतली है, वह जैसे चाहती है वैसे ही यह उठती बैठती है, को सार्थक करते हुए यह उद्योगपति जेल जाते समय रास्ते में रुक कर ज़मानत पा गया था। हुआ यह कि सुप्रीम कोर्ट में लगभग सभी जस्टिसों का दरवाज़ा इस उद्योगपति ने खटखटाया। पर बढ़ते विवाद और वित्त मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सक्रियता को देखते हुए किसी जस्टिस की हिम्मत नहीं पड़ी कि इस उद्योगपति को ज़मानत दे कर इसे जेल जाने से बचा सके। पर क़िस्मत कहिए कि संयोग या कुछ और उसी दिन एक जस्टिस महोदय रिटायर हो गए थे। इस उद्योगपति के कारिंदों ने उन से संपर्क किया। वह रिटायर्ड जस्टिस रिस्क लेने को आनन-फ़ानन तैयार हो गए। बस दिक़्क़त यह भर थी कि उस दिन लंच के पहले उन्हों ने कार्य भार से मुक्ति ले ली थी। मामला फंसा कि रिलीव होने से पहले के टाइम में ही वह ज़मानत दे सकते थे। इस के लिए सुप्रीम कोर्ट की तमाम मशीनरी को साधना था। कारिंदों ने सुप्रीम कोर्ट की इस तमाम मशीनरी को पानी की तरह पैसा बहा कर क़दम-क़दम पर ख़रीद लिया। जस्टिस के रिलीव होने के पहले का टाइम दर्ज हुआ, ज़मानत दर्ज हुई। पर तब तक इस उद्योगपति को तिहाड़ जेल रवाना किया जा चुका था। तब मोबाइल का भी ज़माना नहीं था। तो भी सब कुछ मैनेज किया गया और बीच रास्ते ज़मानत का पेपर दिखा कर इस उद्योगपति को जेल जाने से इस के कारिंदों ने रोक लिया। और बाद में जनमोर्चा के दिनों में ‘पैग़ाम उन का/पता तुम्हारा/बीच में फाड़ा मैं ही जाऊंगा’ जैसी कविता लिखने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह तब कसमसा कर रह गए थे। पर हाथ मलने के अलावा उन के पास और कोई चारा नहीं था।


और अब यही व्यावसायिक घराना आज़ाद भारत और उस के सहयोगी प्रकाशन अंगरेज़ी अख़बार और इस कंपनी का नया मालिक बन चुका था। कोई पचीस करोड़ के इस सौदे में कांग्रेस के एक राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष टाइप नेता आगे-आगे थे जिन के लिए कहा जाता था कि न खाता न बही केसरी जो कहे वही सही! कांग्रेस का अपना अख़बार नेशनल हेरल्ड और नवजीवन बंद हो चुका था। अब उस को अपने अख़बार की ज़रूरत महसूस हो रही थी कि करवाई जा रही थी जो भी हो यह दोनों अख़बार अब कांग्रेस की जेब में थे। हर्र लगे न फिटकरी के तर्ज़ पर। हालां कि जनता पार्टी की सरकार के पतन के बाद जब कांग्रेस दुबारा सत्ता में लौटी थी तब इंदिरा गांधी से किसी पत्रकार ने नेशनल हेरल्ड और नवजीवन के बारे में पूछा तो उन्हों ने साफ़ कहा था कि, ‘अब जब सभी अख़बार हमारी बात ख़ुद कह रहे हैं तब हमें अपना अख़बार निकालने की ज़रूरत भी कहां है?’ पर नवंबर, 1990 में अयोध्या घटना में जब यू.पी. के लगभग सभी अख़बार हिंदुत्ववादी ख़बरों से लैस दिखे ख़ास कर हिंदी अख़बार तो कांग्रेस को इस की चिंता हुई या करवाई गई जो भी हो सो यह सौदा इसी आड़ में करवाया गया।


तो इस घराने ने यह दोनों अख़बार ख़रीदने के बाद दो लाख रुपए महीने का एक सी.ई.ओ. नियुक्त किया। यू.पी. के किसी अख़बार में तब इतने पैसे वाला मैनेजर एक नई और बड़ी घटना थी। आज़ाद भारत की यूनियन इस फ़ैसले पर भौंचक रह गई। कि क्या इतना पैसा अख़बार के पास है कि इतने मंहगे सी.ई.ओ. का बोझ उठा सके? ऐसे तो कंपनी दो दिन में डूब जाएगी और दोनों अख़बार बंद हो जाएंगे। पर बाद में मैनेजमेंट ने साफ़ किया कि इस सी.ई.ओ. को वेतन अख़बार वाली कंपनी नहीं देगी। उस व्यावसायिक घराने की मूल कंपनी देगी। तो मामला शांत हुआ।


बाद में अंगरेज़ी अख़बार के लिए एक नामी गिरामी, ईमानदार और अंगरेज़ी पत्रकारिता में एक शीर्ष नाम मेहता को एडीटर इन चीफ़ बनाया गया। साथ ही ऐलान हुआ कि मेहता दिल्ली में बैठेंगे और कि इस अंगरेज़ी अख़बार की लांचिंग दिल्ली से भी होगी जो बाद के दिनों में हुई भी। मेहता ने लचक गए अंगरेज़ी अख़बार में प्राण भी फूंके। मेहता हिंदी अख़बार के लिए भी हिंदी के एक शीर्ष और सुलझे पत्रकार को संपादक बना कर लाना चाहते थे पर तब तक पुराने भाजपाई संपादक ने अपने कांग्रेसी संपर्कों को खंगाला और केसरी को साध कर अपने को कांटिन्यू करवा लिया। पर बात ज़्यादा दिनों तक चली नहीं। लायज़निंग में सिद्धहस्त मनमोहन कमल ने बरास्ता केसरी ही अपनी नियुक्ति बतौर प्रधान संपादक करवा ली। मनमोहन कमल मूलतः बिहार के मुंगेर ज़िले के निवासी थे। दत्तक पुत्र थे बनारस के एक परिवार में। बनारस में ही उन की पढ़ाई लिखाई हुई थी। पढ़ाई के दौरान ही उन्हों ने वैश्य परिवार की एक लड़की से प्रेम किया। फिर प्रेम विवाह भी। यह अंतरजातीय विवाह था। मनमोहन कमल की पत्नी के परिवार से एक सज्जन कांग्रेस में थे जो बाद में राज्यपाल भी हुए। मनमोहन कमल ने इन राज्यपाल महोदय के संपर्कों को ले कर कांग्रेस में ढेर सारे संपर्क बनाए। एक हिंदी समाचार एजेंसी के संपादक और महाप्रबंधक बन गए। मनमोहन कमल ने इस समाचार एजेंसी में रहते हुए अपने संपर्कों को और प्रगाढ़ और सुदृढ़ किया। चौतरफ़ा! पर समाचार एजेंसी फिर भी बंद हो गई। फिर वह लखनऊ के एक सांध्य दैनिक के संपादक हो गए। सांध्य दैनिक का कलेवर और कंटेंट दोनों ही बहुत बढ़िया बनाया उन्होंने। अख़बार बहुत अच्छा निकलने के बावजूद बंद हो गया। दरअसल लखनऊ जैसे छोटे शहर में सांध्य दैनिक की बहुत ज़रूरत तब थी भी नहीं। अब वह दिल्ली में एक प्रतिष्ठित साप्ताहिक समाचार पत्रिका के संपादक हो गए। जल्दी ही यह पत्रिका अपना स्वरूप बदल कर साप्ताहिक अख़बार बन गई। यह अख़बार भी मनमोहन कमल ने बहुत अच्छा निकाला। कंटेंट, ले आऊट और तमाम मामलों में बहुत ही आगे हो गया अख़बार। पर कहते हैं कि मनमोहन कमल की औरतबाज़ी के फेर में बंद हो गया। जाने यह मसला गासिप था कि सच पर कहानी यह चली कि इस साप्ताहिक अख़बार में एक लड़की पर मनमोहन कमल रीझ गए। उसे खजुराहो कवर करने का एसाइनमेंट दिया। वह टालती रही और यह दबाव बनाते रहे। अंततः एक दिन इन्होंने दो एयर टिकट खजुराहो के मंगवा लिए और लड़की से कहा कि, ‘चलों मैं भी साथ चलता हूं। तुम्हारी मदद कर दूंगा।’ यह पत्रकार लड़की एक वरिष्ठ आई.ए.एस. की बेटी थी। उस ने अपने पिता को मनमोहन कमल की इस हरकत को बता दिया। वह वरिष्ठ आई.ए.एस. अफ़सर भड़क गया। सीधे अख़बार के मालिकों से बात की। मालिकान वैसे भी अपने हिंदी प्रकाशनों को अच्छी नज़र से नहीं देखते थे, यह अख़बार भी भारी घाटे में था। हिंदी का था ही। सो इस अख़बार को बंद करने का फ़ैसला अनान-फ़ानन हो गया। मनमोहन कमल फिर ख़ाली हो गए।


मनमोहन कमल भले हिंदी के पत्रकार थे पर रहते खूब ठाट-बाट से थे। बिलकुल किसी करोड़पति-अरबपति सेठ की तरह। हरदम सफ़ारी सूट में लकदक सेंट से गमकते हुए। गले में मोटी सी चेन, हाथों की अंगुलियों में अंगूठी। लहसुन, प्याज भले न खाते हों पर पीते स्काच ही थे। मंहगी घड़ी, मंहगी चेन, हीरे की अंगूठी और मंहगे कपड़ों में इत्र में गमकते हुए हिंदी पत्रकार तो क्या पत्रकार भी नहीं दिखते थे। किसी कारपोरेट सेक्टर के सी.ई.ओ. की तरह हमेशा चाक चौबंद! लेकिन महिला प्रेम के लिए भी उन की शोहरत कम नहीं थी। जब समाचार एजेंसी में थे तब भी अपनी पी.ए. से ले कर किसिम-किसिम की महिलाओं के लिए उन का अनुराग, उन की आसक्ति अख़बारी लोगों के बीच सुर्खि़यों में रहती। इस समाचार एजेंसी में उनके पूर्ववर्ती संपादक भी एक सिक्खड़ी पी.ए. पर आसक्त रहे थे। और जब वह यहां से विदा हुए तो भी उसे अपने साप्ताहिक अख़बार में भी ले गए थे। खै़र, मनमोहन कमल ने उन की परंपरा को और संवर्धित किया। और जब वह लखनऊ के सांध्य समाचार में थे तब भी उन के महिला प्रेम के क़िस्से तोता-मैना की कहानी की तरह फैले हुए थे। एक सूचनाधिकारी की पत्नी से उन के संबंधों की आंच अभी लोग ताप ही रहे थे कि लोगों ने उसी सूचनाधिकारी की बेटी से भी उन का नाम जोड़ दिया। वह उन के साथ काम भी कर रही थी। अभी यह सब चल ही रहा था कि एक बैडमिंटन खिलाड़ी के साथ भी यह प्रयासरत हो गए। वहां एक दो राजनीतिक और व्यवसायी पहले से ही लगे पड़े थे। कि तभी इन्हों ने एक मंत्री के खि़लाफ़ बिना नाम लिए उस महिला खिलाड़ी को परेशान करने की ख़बरें छापनी शुरू कर दीं। मंत्री आजिज़ आ गया। बुलाया मनमोहन कमल को अपने घर स्काच की दावत पर। स्काच पिलाई और फिर अख़बारी भाषा में कहें तो जैसा कि कहा जाता है, कमरा बंद कर के ख़ूब जूते भी खिलाए। मनमोहन कमल के एक मुंहलगे रिपोर्टर ने मामला विधान सभा में उठवाने की कोशिश की तो उस मंत्री ने उस रिपोर्टर को विधान सभा के गलियारे में ही दबोच लिया।


मनमोहन कमल के महिला प्रेम के ऐसे अनेक क़िस्से उनसे लिपटे पड़े थे गोया जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग, चंदन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग! उन से उन की आसक्ति और बढ़ती जाती उन का कैरियर और उछाल पाता जाता। कोई उन का कुछ बिगाड़ नहीं पाता। क़िस्मत जैसे उन के लिए हमेशा उन की तरक्क़ी का दरवाज़ा खोले बैठे रहती। मनमोहन कमल की एक बड़ी ख़ासियत यह भी थी कि तमाम हिंदी पत्रकारों की तरह रूढ़ियों, दक़ियानूसी ख़यालों और अभावों में वह नहीं जीते थे। उन की समझ और सोच पर कहीं कोई सवाल नहीं था। भाषा जैसे उन की ग़ुलाम थी।




साहित्य और राजनीति में उनकी समझ और सूचनाएं हमेशा अद्यतन रहतीं। सुनील जैसे लोग मनमोहन कमल की तमाम ख़ामियों के बावजूद उनकी भाषा पर मोहित रहते। तो भी जाने क्यों लोग मानमोहन कमल के लिखे पर चर्चा करने के बजाय उन की महिलाओं और लायज़निंग की ही चर्चा करते। और सच यह भी था कि लगातार जो उन की क़िस्मत का दरवाज़ा खुला रहता तो उन की भाषा या समझ के बूते नहीं बल्कि उन की लायज़निंग में निपुणता के चलते ही खुला रहता।


और अब मेहता की नापसंदगी के बावजूद यही मनमोहन कमल आज़ाद भारत के प्रधान संपादक नियुक्त हो गए थे। बरास्ता केसरी। जिन के लिए तब कहा जाता था न खाता न बही, केसरी जो कहे वही सही। केसरी से एक बार पूछा गया कि ऐसा क्यों कहा जाता है आप के लिए? तो उन्हों ने बताया था कि चूंकि वह कोषाध्यक्ष हैं वर्षों से पार्टी के। सो चुनाव के समय उम्मीदावारों को पोस्टर, पैसा, गाड़ी वग़ैरह की ज़िम्मेदारी प्रकारांतर से उन पर ही रहती है।


तो पहले दौर में तो लगभग सभी उम्मीदवार पोस्टर, पर्चा, पैसा वग़ैरह ले जाते हैं। दूसरे दौर में कई उम्मीदवार यह सब मांगने नहीं आते हैं तो मैं समझ जाता हूं कि पट्ठा चुनाव क्लीयर कट जीत रहा है इस लिए इन सब झंझटों से वह छुट्टी पा कर चुनाव लड़ने में लगा है। उस के पास समय कहां है जो यह सब मांगने आए! दूसरे दौर में भी जो उम्मीदवार यह सब मांगने आता तो उस के मांगने का अंदाज़ भांप लेता हूं। कि कौन सेमीफ़ाइनल तक जाएगा और कौन फ़ाइनल तक। और फिर जो तीसरे दौर में भी पोस्टर पैसा मांगने आ जाता है तो मैं समझ जाता हूं कि यह पट्ठा फ़ुल फे़लियर है। कि इसकी ज़मानत बचनी मुश्किल है तो यह पोस्टर पैसे की माया में पड़ा है। इसी आकलन पर चुनाव परिणाम के पहले ही मैं अपना अनुमान घोषित कर देता हूं कि हमारी पार्टी फ़लां-फ़लां जगह से इतनी सीट ला रही है। जो अमूमन चुनाव परिणाम से मेल खा जाती है। सो मेरी बात सही हो जाती है। और लोग कह बैठते हैं कि न खाता न बही केसरी जो कहे वही सही!


तो इन्हीं केसरी की कृपा से मनमोहन कमल आज़ाद भारत के प्रधान संपादक घोषित हो गए। पर वह लखनऊ आए तभी जब उन का ए.सी. चैम्बर बन कर पूरी तरह तैयार हो गया। अब यह अलग बात है कि उन की भाषा का मुरीद रहा सुनील भाजपाई संपादक से भिड़ कर पहले ही अख़बार से बाहर हो गया था। भाजपाई संपादक ने कंपनी के नए सी.ई.ओ. के सामने सुनील को अनुशासनहीनता का मुद्दा बना कर पेश किया। नए सी.ई.ओ. ने भी आनन फ़ानन में सुनील को नहीं निपटाया। निपटाया पर आहिस्ता-आहिस्ता। वह जानता था कि यहां यूनियन मज़बूत है, सीधे मोर्चा लेना ठीक नहीं है।


वह लोगों से ह्युमन मैनेजमेंट की बात करता और इतनी सरलता और सहजता से कि लोग उस की बातों में आ जाते। सो उस ने पहले दौर में सुनील के खि़लाफ़ विभागीय जांच करवाई। चार्जशीट दिया। फिर बाक़ायदा लेबर लॉ के जानकार एक वकील से एक इंक्वायरी करवाई। उसको दोषी साबित किया। फिर उस की बर्खास्तगी की चिट्ठी बनवाई। सुनील को बुलाया, बर्खास्तगी की चिट्ठी दिखाई और समझाया कि इस्तीफ़ा दे देने में ही उस की भलाई है।


सुनील ने बर्खास्तगी की चिट्ठी लेने और इस्तीफ़ा दोनों से इंकार कर दिया। सी.ई.ओ. जानता था कि यूनियन हस्तक्षेप करेगी। यूनियन ने किया भी। उसने यूनियन के नेताओं को दिल्ली बुलाया बातचीत के लिए। सुनील के ख़र्चे पर यूनियन के तीन लोग गए भी दिल्ली उस से बातचीत करने। उसने यूनियन को बधिया बनाते हुए सुनील से कहा कि सारा मामला भाजपाई संपादक के ईगो का है। मैं उस को ही निपटा रहा हूं। तब तक उस का तीन महीने के लिए कानपुर यूनिट में ट्रांसफर कर दिया जा रहा है। भाजपाई संपादक के जाते ही उसे वापस लखनऊ बुला लिया जाएगा। सब लोग ख़ुशी-ख़ुशी लौटे। पर लखनऊ आ कर जो चिट्ठी मिली सुनील को उस में उस की बर्खास्तगी को सिर्फ़ तीन महीने के लिए स्थगित किया गया था। और कहा गया था कि इस तीन महीने में उस का काम काज और व्यवहार वाच किया जाएगा। और जो रिपोर्ट संतोषजनक निकली तो वापस ले लिया जाएगा। वह चला गया कानपुर। चंद्रशेखर सरकार का पतन हो गया था। चुनाव घोषित हो गया था। कि राजीव गांधी की हत्या की ख़बर आ गई। चुनाव की तारीख़ें आगे बढ़ा दी गईं थीं। सुनील का ट्रांसफ़र भी दो महीने के लिए और एक्स्टेंड कर दिया गया। और अंततः उसे लखनऊ बुला कर बर्खास्तगी की चिट्ठी दे दी गई। इन पांच महीनों में सी.ई.ओ. ने यूनियन को बधिया बना दिया था। साम दाम दंड भेद उर्फ ह्यूमन मैनेजमेंट से।


चौहान चपरासी साफ़ कहता कि, ‘भइया सुनील हमारी यूनियन भी पत्रकार हो गई है!’


‘मतलब?’


‘अरे इतना भी नहीं समझते कि पत्रकार माने का होता है?’ और जैसे वह जोड़ता, ‘पत्रकार माने दलाल!’


और चौहान ही क्यों अब कोई भी अख़बार की यूनियन को दलाल कहने में परहेज़ नहीं कर रहा था। सी.ई.ओ. ने यूनियन के महामंत्री को सचमुच ख़रीद कर अपना कुत्ता बना लिया था। महामंत्री और अध्यक्ष को पहले का मैनेजमेंट भी बाक़ायदा हर महीने पैसे देता था। पर इस नए मैनेजमेंट ने एकमुश्त भारी रक़म दे दी थी। लोग कहते कि लाखों में। जो भी हो, जितना भी हो पर यूनियन के महामंत्री का नया घर बनने लगा था।


अख़बार में पहले बात-बात पर आंदोलन की धमकी दे कर चुटकी में मसले हल कर लेने वाला यह महामंत्री अब जो कोई समस्या आती तो आंदोलन की जगह बात की जाएगी की बात करता। और यह बात भी दिल्ली में सी.ई.ओ. से होती संबंधित पीड़ित के ख़र्चे पर। बातचीत में पीड़ित को बधिया बना कर दिल्ली से भेज दिया जाता। और वह पीड़ित फिर सारे अपमान, सारी यातनाएं भुगत लेता पर यूनियन के पास जाने से तौबा कर लेता।


सी.ई.ओ. के ह्यूमन मैनेजमेंट में कर्मचारी, पत्रकार, यूनियन सभी मैनेज हो गए थे।


वैसे भी अख़बारों से ट्रेड यूनियन की विदाई के यह दिन थे।


अख़बारों में लायज़नर्स की चांदी के दिन भी अब उछाल पर थे। और जो पहले यह होता था कि अख़बारों में अस्सी परसेंट पत्रकार काम करने वाले होते थे और बीस परसेंट दलाली करने वाले, अब यह अनुपात भी बदल रहा था। अब अख़बारों में काम करने वालों का अनुपात बीस प्रतिशत पर आ गया था और दलालों का अनुपात अस्सी प्रतिशत पर। संपादक भी अब विद्वान नहीं चाहिए थे मैनेजमेंट को। पी.आर.ओ. या लायज़नर्स टाइप चाहिए थे।


मनमोहन कमल की ख़ासियत यह थी कि वह लायज़निंग में भी निपुण थे और संपादन में भी। एडीटोरियल टीम बनाने में भी उन का जवाब नहीं था। जैसे वह ख़ुद पढ़े लिखे भी थे और लायज़नर भी। तो अपनी टीम में भी दोनों तरह के लोग वह रखते ही रखते थे। यहां आज़ाद भारत में भी रखा। बल्कि यहां तो उन का एक शिष्य रिपोर्टर सूर्य प्रताप तो दो क़दम आगे निकल गया। सूर्य प्रताप के साथ भी यह दुर्लभ संयोग था कि वह कलम का भी धनी था और लायज़निंग का भी। पर उस के साथ एक बड़ी दिक्क़त यह थी कि वह कोई काम छुपा कर नहीं करता था। खुला खेल फर्रुख़ाबादी वाला मामला था उस का। जो काम मनमोहन कमल या उन जैसे लोग एक परदेदारी में करते थे, थोड़ी शालीनता और सोफ़िस्टिकेटेड ढंग से करते, डिप्लोमेटिक ढंग से करते यह सब सूर्य प्रताप को नहीं आता था। वह कहता कि आप मर रहे होते हैं और डॉक्टर के पास जाते हैं पर डॉक्टर बिना फ़ीस लिए आप को छूता भी नहीं है। वकील के पास न्याय की लड़ाई लड़ने जाते हैं बिना फ़ीस लिए एक क़दम भी वह नहीं चलता है। पूरी फ़ीस ले कर भी वह आप का केस जीत ही जाए, कोई गारंटी नहीं। डॉक्टर फ़ीस दवाई के पैसे ले कर भी आप की जान को बचा ले इस की कोई गारंटी नहीं। वहां आप फिर भी चुपचाप पैसा दे आते हैं। उ़फ़ भी नहीं करते। सरकारी दफ्तरों में अफ़सरों, बाबुओं को बात बेबात पैसा दे आते हैं, लेकिन आप हमारे पास आते हैं तो चाहते हैं कि बिना कुछ ख़र्च किए काम चल जाए। चलिए जो हम आप से कोई ख़बर लिखने का पैसा मांगें तो आप हम को दस जूता मारिए। पर आप चाहते हैं कि जहां लाखों का रेट खुला है, वहां आप का ट्रांसफ़र मु़त में करवा दें? करोड़ों का ठेका आप को मु़त दिलवा दें? क्यों भाई क्यों? वह कहता कि बताइए पचीस साल से ऊपर हो गया पत्रकारिता में कलम घसीटते पर खटारा स्कूटर पर चल रहे हैं। अरे कुचीपुड़ी या भरतनाट्यम डांस भी किए होते पांच साल तो राष्ट्रीय स्तर के डांसर हो गए होते। पर यहां क्या? भइया की पिछाड़ी धो रहे हैं। भइया मतलब शहर के नंबर वन अख़बार के संपादक। सूर्य प्रताप उन दिनों उसी अख़बार में शरण लिए बेहतरीन मौके़ की तलाश में था। मास कम्युनिकेशन की डिग्री से लैस सूर्य प्रताप ख़बरों के मामले में बड़ों-बड़ों के कान काटता था। पहले वह कविताएं लिखता था। अब कविताएं बंद थीं। पुराने मित्र पूछते कि, ‘सूर्य प्रताप जी अब कविताएं क्यों नहीं लिखते?’ सूर्य प्रताप कहता, ‘मेरी ख़बरें पढ़ते हो?’ लोग कहते कि, ‘हां।’ तो सूर्य प्रताप कहता कि, ‘अरे मूर्खों यह ख़बरें नहीं, मेरी कविताएं हैं। फिर से पढ़ कर बताना अगर कविता सी तकलीफ़ न हो मेरी ख़बरें पढ़ कर तो बताना!’ तो ख़बरों को कविता की सी मुहब्बत से लिखने वाला सूर्य प्रताप भी अभावों में जीते जीते कब लायज़निंग करने लगा यह उस को भी नहीं पता चला। हां, शुरुआत शराब से हुई यह उसे पता था। फिर कब रात हो गई यह वह नहीं जानता था। वह एक फ़िल्मी गाना गुनगुना कर प्रतीकों में ही बताता, ‘तूने काजल लगाया दिन में रात हो गई/छुप गए तारे नज़ारे ओये क्या बात हो गई।’ सूर्य प्रताप का यह रूपक, यह प्रतीक समझने वाले समझते। नहीं समझने वाले गाने का आनंद ले लेते। तो जिस दिन मनमोहन कमल की नियुक्ति आज़ाद भारत के प्रधान संपादक पद पर हुई, सूर्य प्रताप को तुरंत पता चल गई। सूर्य प्रताप को यह ख़बर मनमोहन कमल ने ही फ़ोन पर बताई। क्यों कि भइया से परेशान सूर्य प्रताप अकसर मनमोहन कमल को दिल्ली फ़ोन करता और कहता, ‘कमल जी कुछ कीजिए। अब यहां भइया को बर्दाश्त करना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है।’ सो उस दिन भी सूर्य प्रताप ने मनमोहन कमल को फ़ोन किया था। और मनमोहन कमल ने सूर्य प्रताप को आज़ाद भारत में अपनी नियुक्ति के बाबत बताया था। शाम का समय था। सूर्य प्रताप से रहा नहीं गया। ख़ुशी सेलीब्रेट करने की गरज से दो तीन पेग एक मित्र के साथ ले लिया। फिर अचानक जाने क्या हुआ कि उस ने स्कूटर स्टार्ट की और पहुंच गया आज़ाद भारत के दफ्तर। सीधे संपादकीय विभाग में पहुंचा। ब्यूरो के रिपोर्टरों से कहा, ‘अब आज से मैं यहां का ब्यूरो चीफ़ अब मुझे सलाम करो!’


‘क्या?’ दो तीन रिपोर्टर एक साथ अचकचा पड़े।


‘हां।’ सूर्य प्रताप बोला, ‘आज से भाजपाई राशन पानी बंद! यह संपादक गया। अब मनमोहन कमल तुम्हारे एडीटर इन चीफ और मैं ब्यूरो चीफ!’


सूर्य प्रताप चलते-चलते बोला, ‘सब मिल कर मुझे सलाम करो।’


बाद में वहां का ब्यूरो चीफ बोला, ‘ससुरे को चढ़ गई है। नादान है।’


पर भाजपाई संपादक के गुर्गों ने सूर्य प्रताप की बात में वज़न ढूंढ लिया था। जा कर संपादक को सूर्य प्रताप की बात और सूर्य प्रताप का तेवर बताया। यह भी बताया कि मनमोहन कमल एडीटर इन चीफ़ बन गए हैं। अपने गुर्गों की बात सुन कर भाजपाई संपादक का चेहरा तनाव में आ गया। हवाइयां उड़ने लगीं। धीरे से बोला, ‘हां केसरी जी के यहां इधर मनमोहन कमल आ जा तो रहे थे। फिर भी पता करता हूं।’


पता क्या करना था दूसरे दिन मनमोहन कमल के प्रधान संपादक बनने की सूचना नोटिस बोर्ड पर लग गई थी।


भाजपाई संपादक छुट्टी पर चला गया। फिर वाया केसरी बहुत संपर्क साधा उस ने पर उस की दाल नहीं गली।


मनमोहन कमल का ए.सी. चैम्बर जब बन कर तैयार हो गया तभी वह आए। उन दिनों संपादक का ए.सी. चैम्बर बड़ी बात माना जाता था। आते ही मनमोहन कमल ने कुछ पढ़े लिखे पत्रकारों की नियुक्तियां कीं। कुछ लायज़नर्स पत्रकारों को भी अख़बार से जोड़ा। कुछ ऐसे लोगों को भी जोड़ा जो दोनों ही कलाओं में पारंगत थे। डिप्टी रेज़ीडेंट एडीटर मानवेंद्र शर्मा और ब्यूरो चीफ़ सूर्य प्रताप तथा कुमारेंद्र भदौरिया जैसे ऐसे ही लोगों में शुमार थे। मनमोहन कमल ने अपनी आदत के मुताबिक़ एक सुंदर सी स्टेनो भी नियुक्त की और कुछ सुंदर महिला पत्रकारों को भी। कुछ बेरोज़गार पर बेहतरीन पत्रकारों का शोषण करते हुए कम पैसों पर रखा। कुल मिला कर जैसे कोई प्राइम मिनिस्टर या कोई चीफ़ मिनिस्टर अपनी कैबिनेट क्षेत्रीय, जातीय तथा अन्य समीकरण बैलेंस कर के बनाता है, मनमोहन कमल ने भी यही किया। यही नहीं कि सिर्फ़ नए लोगों को ही अपनी कैबिनेट में रखा बल्कि कई पुरानों को भी इस में जोड़ा। नतीजा सामने था। अख़बार का रंग रूप निखर गया था। बिलकुल उस विज्ञापन के लहजे में जो कहें कि रूप निखर आया गुणकारी हल्दी और चंदन से! तो अख़बार कंटेंट और ले आऊट दोनों में ही बेहतर हो गया था। पृष्ठ संख्या भी बढ़ गई थी। कई अच्छे लिखने वाले जुड़ गए थे। और कि भाजपाई संपादक के ज़माने में जो फ़र्जी और प्रायोजित ख़बरों की बाढ़ आई हुई थी, अख़बार में, वह बाढ़ विदा हो गई थी। हां, अब चुनी हुई प्रायोजित ख़बरें ही छपती थीं और इस सलीक़े से कि दाल में नमक लगे। नमक में दाल नहीं। कुल मिला कर यह कि आज़ाद भारत अब अपने सहयोगी अंगरेज़ी अख़बार से किसी भी मामले में उन्नीस नहीं था। बराबरी पर आ गया था। अब बारी अन्य यूनिटों और ब्यूरो की थी। तो मनमोहन कमल ने अपनी पसंद के लोग वहां भी बिठाए। दिल्ली आफ़िस में भी बाक़ायदा ब्यूरो चीफ़ और फ़ीचर एडीटर रखे। दिल्ली में बैठ रही फ़ीचर एडीटर लखनऊ की ही थी, उन के साथ लखनऊ के संध्या दैनिक और दिल्ली के साप्ताहिक में काम कर चुकी थी और जो अब लगभग उन की हमसफ़र थी। सुंदर नयन नक्श, सलीक़ा और नफ़ासत। जीवन में भी, लिखने-पढ़ने में भी और बाक़ी काम काज में भी।


अब हो यह गया था कि लगभग हर यूनिट और ब्यूरो में किसी सुदर्शना का होना ज़रूरी था। कि जब कभी मनमोहन कमल वहां जाएं तो उन का सौंदर्यबोध तृप्त हो और उन्हें कामकाज में आसानी हो। लखनऊ में तो तमाम पुरुष साथी महिला साथियों की बढ़ती गति से लाचार हो कर कहते, ‘यार हम लोग भी अब आपरेशन करवा कर अपना जेंडर चेंज करवा लें, सफलता, प्रमोशन, पैसा तभी मिलेगा।’


जो भी हो आज़ाद भारत अख़बार में अब कहीं कोई कमी नहीं थी। बिलकुल पूर्णमासी का चांद था। भरापुरा। कि तभी वह जो कहते हैं न कि हाय ग़ज़ब कहीं तारा टूटा!


तारा टूट गया।


लोग पहले ही से कहते थे कि मनमोहन कमल तो वो गिद्ध हैं जो जिस भी किसी की मुंडेर पर बैठा उस का देहावसान तय है। अख़बारों के बंद कराने का लांछन उन के आगे-आगे चलता था। लांछन पहले आता, वह बाद में आते।


दिल्ली में फ़ीचर एडीटर को ले कर सी.ई.ओ. और मनमोहन कमल में ठन गई। कहा जाता है का जो सहारा ले कर कहें तो सी.ई.ओ. की नज़र भी फ़ीचर एडीटर पर गई। पर फ़ीचर एडीटर ने सी.ई.ओ. को घास नहीं डाली। उलटे मनमोहन कमल को बता दिया। मनमोहन कमल ने सी.ई.ओ. के कुछ गड़े मुर्दे उखाड़े। उस की अनियमितताओं, वित्तीय घपलों की फ़ेहरिस्त तैयार की और सीधे चेयरमैन को दे दी। चेयरमैन सी.ई.ओ. और आज़ाद भारत के प्रधान संपादक के इस झगड़े से चिंतित हुए और ख़फ़ा भी। इतना कि लखनऊ में जब वह इस कंपनी के शेयर होल्डर्स की बैठक में पहली बार आए तो एयरपोर्ट से सीधे होटल पहुंचे जहां शेयर होल्डर्स की मीटिंग थी। मीटिंग की और होटल से सीधे एयरपोर्ट चले गए चेयरमैन। पर रास्ते में ही पड़ने वाले अपने अख़बार के दफ्तर की ओर झांका भी नहीं चेयरमैन ने। तब जब कि तमाम कर्मचारी पलक पांवड़े बिछाए खड़े रहे कि चेयरमैन आएंगे। पर बात वहीं ठहर गई कि वो आए भी नहीं और तमाशा भी न हुआ। लखन अपनी हारमोनियम साफ़ वाफ़ कर के तैयार था कि नहीं कुछ तो जय हिंद का नारा और एक मुर्दाबाद का गीत तो वह गा ही देगा। कि बता देगा कि बाहर से आ रहे लोगों को मोटी-मोटी तनख़्वाह दे कर उन का पेट फुला रहे हो। और पुराने लोगों के पेट की हवा निकाल रहे हो? ठीक-ठाक यूनियन को ‘पत्रकार’ बना दिए हो। आखि़र क्या चाहते हो। पर सुना था कि वो आएंगे अंजुमन में ये बात होगी वो बात होगी.....यहीं सुबह होगी यहीं रात होगी! ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। और वो गा रहा था कि जो निकले थे घर से तो क्या जानते थे कि भरी धूप में यों बरसात होगी।


हां चेयरमैन के आने की धूम लखन की गायकी की बरसात में धुल गई थी। उस की हारमोनियम कैम्पस में अकेले बज रही थी। बिना किसी गायकी के।


इतनी लाचार क्यों हो गई थी लखन की हारमोनियम?


लाचारगी की इस तपन को हर कोई महसूस कर रहा था लेकिन कोई किसी से कुछ भी पूछ नहीं रहा था।


दुमबाज़ भी एयरपोर्ट से लौट आए थे। चेयरमैन को सी ऑफ़ कर के। एक मैनेजर को लखन के हारमोनियम की तान सुनाई पड़ गई। वह उस पर बरस पड़ा। फिर बहुत दिनों तक उस ने हारमोनियम नहीं बजाई। नहीं पहले मौक़ा बे मौक़ा कोई जलसा आंदोलन न भी हो तो भी वह यूनियन आफ़िस में जा कर कोई अवधी लोकगीत गा कर या जय हिंद को कई तरह उच्चार कर ही सही हारमोनियम के तारों का तनाव छांटने की कोशिश करता।


पर वह अपने इस तनाव का क्या करता?


उसका तनाव था कि उस की यूनियन ‘पत्रकार’ यानी दलाल क्यों हो गई है?


उसका सवाल जुनून बन कर भटकता रहता पर किसी के पास कोई जवाब नहीं था।


पहला तारा टूट कर अंतरिक्ष में विलीन हो गया था।


लेकिन सी.ई.ओ. और मनमोहन कमल की जंग कोल्ड वार में कनवर्ट थी। फ़ीचर एडीटर का तबादला दिल्ली से लखनऊ हो गया था। शुरू में वह अपने रिटायर्ड सूचनाधिकारी पिता के साथ रही। पर वहां मनमोहन कमल को दिक्क़त होती थी। एक तो उस की मां वहां होती सो वह वहां सहज नहीं हो पाते। दूसरे, घर भी छोटा था और उन के सौंदर्य बोध के प्रतिकूल भी।


जल्दी ही वह अकेले दूसरे घर में रहने लगी।


लोग कहते मनमोहन कमल ने उससे विवाह कर लिया है। कोई कहता पहली पत्नी के जीवित रहते? कोई कहता वह तो उन की बेटी की उम्र की है। कोई कुछ कहता, कोई कुछ।


लोग चाहे जो कहें पर जल्दी ही दोनों साथ रहने लगे। सरकारी घर में।


बात आई गई होते हुए भी आई गई नहीं हुई। छोटे शहर की सिफ़त ही कुछ ऐसी होती है। कैफ़ियत ही कुछ ऐसी होती है। तफ़सील ही कुछ ऐसी होती है। सारा खुलापन, सारी प्रगतिशीलता घास चरने चली जाती है। एक हिप्पोक्रेसी घर सा बना लेती है।


वो जो कहते हैं कि हर आदमी के भीतर दस बीस आदमी होते हैं। तो मनमोहन कमल के भीतर सौ-पचास आदमी रहते थे। पर नरेश कहता कि, ‘नहीं इसके भीतर हज़ार दो हज़ार आदमी रहते हैं।’ खै़र, वह अपने भीतर के किस आदमी को कब जगा बैठें और कब किस को सुला बैठें यह कोई नहीं जानता था। अब तो दफ्तर में कुछ सुदर्शनाएं भी दबी ज़बान ही सही मनमोहन कमल के लिए कहतीं, ‘ऐसा कोई सगा नहीं जिस को मैं ने ठगा नहीं।


मनमोहन कमल के भीतर के चार-पांच आदमी तो दफ्तर में ही साफ़ देखे जाते थे। चैंबर के भीतर का मनमोहन कमल निहायत शूड, झक्की, निर्दयी और तानाशाह होता। चैंबर के बाहर का मनमोहन कमल निहायत उदार, प्रजातांत्रिक और भाई चारे वाला होता मुसकुराता, इठलाता पानी की तरह छलछल बहता। चैंबर में भी एक मनमोहन कमल आगंतुकों से लचीला, सा़टली और शराफ़त पसंद होता। सहयोगियों से यही मनमोहन कमल उलट जाता। जल्लाद, सनकी और तनाशाह हो जाता। पुरुषों से और, स्त्रियों से और। स्त्रियां जब चैंबर में जातीं तो बाहर का लाल बल्ब जल जाता। जिस का मतलब होता कि कोई भीतर नहीं आए। चपरासी भी उस का सख़्त हो जाता। हरगिज़ किसी को जाने नहीं देता। स्त्री जब चैंबर से बाहर निकलती तो लोग उस के अस्त व्यस्त बाल देखते। उस के होठों के लिपिस्टिक लोग चेक करते कि फैल गई है, कि पुंछ गई है, कि वैसी ही है। साड़ी की सिलवटें देखते कि ज़्यादा तुड़ी-मुड़ी है कि वैसी ही है? प्लेटें वैसी ही हैं जैसी पहले थीं या बदल गई हैं। शलवार शमीज़ में भी लोग ब्यौरे बटोर ही लेते। मनोज जिस दिन ज़्यादा व्याकुल होता तो धीरे से गा ही देता, ‘ अंखियां बता रही हैं लूटी कहीं गई है!’


इसके उलट प्रतिद्वंद्वी अख़बार में भइया सब कुछ कर लेते। एक साथ दो-दो औरतों को गोद में बिठा लेते, खुले आम गालों में चिकोटी काट लेते। ऊपर-नीचे, आगे-पीछे, इधर-उधर दबा देते। किसी की हिम्मत नहीं पड़ती कि सांस भी ले ले, आंख उठा कर देख भी ले। पर मनमोहन कमल सब कुछ थे पर भइया की तरह गुंडे नहीं थे। मनमोहन कमल की गुंडई भी नफ़ासत वाली थी। कि बाबू जी धीरे चलना, बड़े धोखे हैं इस राह में वाले अंदाज़ में।


मनमोहन कमल के चैंबर में जाते समय वैसे भी आदमी जाते ही एक फ़ुट नीचे हो जाता था और वह मुसकुराते हुए आने वाला का नीचा हो जाना देखते। अपने ऊपर होना और अगले का नीचा होना उन्हें सुख भी देता और संतुष्टि भी। मनोज अकसर उन के चैंबर में जाने से बचता। उसे देखते ही मनमोहन कमल मुंह अजीब सा बनाते और कहते, ‘लहसुन खाना बंद करो या मेरे पास आना बंद करो। आते ही बास मारते हो!’ वह अपमानित हो कर रह जाता। एक कवियत्री जाती उन के चैंबर में तो वह उसे देखते ही ख़ुश हो जाते। पर वह उन का ठसका उतारते हुए कहती, ‘यह ए.सी. ज़रा बंद कीजिए। मुझे दिक्क़त होती है। ज़ुकाम हो जाता है।’


‘हां, हां। अभी बंद करता हूं।’ कह कर वह ए.सी. का रिमोट खोजने लगते।


घर में भी मनमोहन कमल बड़े सलीक़े से रहते थे। उन का सौंदर्य बोध साफ़ झलकता।


पूरे घर में बिछी कारपेट। छत पर मख़मली घास वाला लॉन। पीतल के गमलों में पौधे। सब कुछ बड़े सलीक़े से। एरोस्ट्रोक्रेटिक अंदाज़ में। अंदाज़ में ऐरिस्ट्रोक्रेसी, व्यवहार में डिप्लोमेसी, नफ़ासत भरी बातचीत मनमोहन कमल बड़ों-बड़ों को मोह लेते। कोई बात हो तो नौकर को आवाज़ देने के बजाय हाथ में रखा बज दबाते। नौकर घर में कहीं भी हो घंटी सुनते ही आ जाता उन के पास।


एक बार उन की गाड़ी रास्ते में ख़राब हो गई। अब वह परेशान। घर वहां से एक फर्लांग की ही दूरी पर था। पर नफ़ासत और हिप्पोक्रेसी के मारे मनमोहन कमल पैदल कैसे जाएं भला? कॉलोनी के लोग क्या सोचेंगे? कि तभी प्रतिद्वंद्वी अख़बार के संपादक यानी भइया ने उन्हें देख लिया। भइया उन के ही अख़बार की एक महिला रिपोर्टर के साथ थे जो कभी पहले भइया के अख़बार में रिपोर्टर रही थी। भइया ने उन के पास जा कर अपनी गाड़ी रोकी। हालचाल पूछा। तो मनमोहन कमल ने बताया कि, ‘गाड़ी अचानक ख़राब हो गई है। आफ़िस फ़ोन कर दिया है ड्राइवर ने। कोई दूसरी कार आती ही होगी।’ भइया भी बनारस के थे। अपने बनारसी होने का वास्ता दिया और कहा कि, ‘आइए मेरी गाड़ी में बैठ जाइए। आप को आप के घर छोड़ देता हूं।’ नहीं-नहीं कहते-कहते मनमोहन कमल को भइया के दबाव में आना पड़ा। बैठ गए वह भइया की कार में जिसे भइया ख़ुद ड्राइव कर रहे थे। अब भइया ने जब उन को उन के घर छोड़ा तो कर्टसी में उन्हों ने भी अपने घर में तुरंत आमंत्रित कर लिया। नहीं-नहीं कहते हुए भइया भी उन के घर चले गए। भइया भी कोई भिखमंगों की तरह नहीं रहते थे अपने घर में। पूरी शानो शौकत और अय्याशी से रहते थे। पर मनमोहन कमल के घर की एरोस्ट्रोकेसी देख कर वह दंग रह गए। ख़ैर, मनमोहन कमल ने उन्हें अपने ड्राइंग रूम में बिठाया। घंटी बजाई। नौकर आया। उन्हों ने उसे कुछ इशारे से समझाया। स्काच की बोतल, गिलास, पानी, सोडा, बर्फ, स्नैक्स और भुने हुए काजू वग़ैरह सब कुछ सामने था। इधर-उधर की बातें हुईं ड्रिंक्स के दौरान। भइया ने बातें भी डट कर कीं और पिया भी छक कर। इतना कि पेशाब ज़ोर की लग आई। उन्हों ने बाथरूम जाने की इच्छा जताई। मनमोहन कमल ने घंटी बजाई। नौकर आया। भइया को बाथरूम ले गया। भइया बाथरूम में जा कर भी अचकचाए। रजनीगंधा के फूल और अगरबत्ती देख कर। सेंट की गमक ने उन्हें चौंकाया। भइया ने सोचा कि कहीं पूजा घर में तो वह ग़लती से नहीं आ गए? फिर उन्हों ने पॉट देखा तो समझ गए कि सही जगह आए हैं। और वो जो कहते हैं कि फिर छरछरा के मूत दिया। वापस ड्राइंग रूम में आ कर बैठ गए। मनमोहन कमल ने फिर घंटी बजाई। नौकर आया। उसे मनमोहन कमल ने कुछ इशारा किया। नौकर वापस जा कर बाथरूम में बाल्टी-बाल्टी पानी डाल कर धोना शुरू किया। ऐसे जैसे बाल्टियां छर-छर मूत रही हों। भइया को मनमोहन कमल की यह हरकत नागवार गुज़री। यह सब कुछ बड़ा अपमानजनक लगा उन्हें। वह मनमोहन कमल के घर से तब चुपचाप चल दिए थे। पर होली के दिन मानवेंद्र शर्मा के घर पर बैठ कर कुछ साथियों के साथ शराब पीते हुए उन्हों ने अपनी यह अपमानकथा बताते हुए मानवेंद्र से कहा कि, ‘मुझे फिर पेशाब लग गई है। ज़ोर की। चलो मनमोहन कमल के घर चलते हैं। आज उस के ड्राइंग रूम में ही छरछरा कर मूत दूंगा। सारी एरोस्ट्रोकेसी भूल जाएगा साला!’


मानवेंद्र ने हाथ जोड़ा भइया से। तो भइया बोले, ‘मेरे आने के बाद भी वह अपना बाथरूम धुलवा सकता था। यह तो मेरा अपमान था सरासर! तुम्हें क्या पता कि मैंने अपने आप को तब कैसे संभाला था? कैसे ज़ब्त किया था अपने आप को? आखि़र मैं भी संपादक हूं। अपनी कंपनी के डायरेक्टर बोर्ड में हूं। वह साला क्या है?’

भइया की अपमान कथाएं इधर बढ़ती जा रही थीं। पहले दूसरों की निरंतर अपमान कथा रचने वाले भइया, जिस तिस पर जब तब हाथ उठा देने वाले भइया, जिस तिस को गरिया देने वाले भइया अब अपने मान अपमान की फ़िक्र करने लगे थे।


यह सिलसिला कार्ल्टन होटल से शुरू हुआ तो थकने का नाम नहीं ले रहा था। कार्ल्टन होटल में एक प्रेस मीट के सिलसिले में डिनर चल रहा था। लोग आ रहे थे, जा रहे थे। एक रिपोर्टर निगम जो पहले भइया के अख़बार में रिपोर्टर था, कार्ल्टन की सीढ़ियां उतर रहा था। संयोग था कि भइया सीढ़ियां चढ़ रहे थे। अमूमन चार छह चेला टाइप कुत्तों को आजू बाजू ले कर चलने वाले भइया जाने कैसे अकेले ही थे। निगम तीन चार पेग लिए था, भइया उसे अनेक बार ज़लील कर चुके थे पहले के दिनों में। उसे जाने क्या सूझा कि भइया के सामने पड़ते ही तड़-तड़ दो झापड़ रसीद कर दिए उन के मुंह पर। और भइया जब तक कुछ समझते-समझते वह नीचे उतर कर लॉबी में आ गया। लॉबी से पार्किंग में खड़ी स्कूटर स्टार्ट की और फुर्र हो गया। होटल के रिसेप्शन पर बैठे लोग, होटल के कर्मचारी और कुछ पत्रकारों ने भी भइया को पड़े इस थप्पड़ की गूंज सुनी। और भइया जब तक कुछ समझते निगम फुर्र हो गया था।


अब निगम को सबक़ सिखाने की सनक सवार हुई भइया को। तमाम चेलों को लगा दिया। पर निगम हाथ ही नहीं आता। बहुत दिन बीत गए। एक दिन प्रेस क्लब में सूर्य प्रताप और एक रिपोर्टर श्रीवास्तव बैठे शराब सूत रहे थे। निगम एक शुक्ला रिपोर्टर के साथ पी रहा था। सूर्य प्रताप और श्रीवास्तव ने फ़ोन कर भइया को इस की इत्तला की और निगम की मेज़ पर आ कर बात-बात में उसे फंसा कर बैठाने की तरकीब में लग गए। सूर्य प्रताप और श्रीवास्तव तब के दिनों में भइया के अख़बार में ही थे। भइया दल बल के साथ प्रेस क्लब के लिए चले। सूर्य प्रताप ने न सिर्फ़ निगम को बात चीत में उलझाया, बवाल बढ़ाने की भी कोशिश की। निगम ने कुछ सूंघ लिया और बाथरूम के बहाने सरक लिया दूसरे गेट से। भइया और उन के गुंडे आए प्रेस क्लब को घेर लिए। मार डालेंगे, काट डालेंगे के अंदाज़ में पूरे प्रेस क्लब में तोड़-फोड़ मचा दी। पर निगम नहीं मिला। सूर्य प्रताप, श्रीवास्तव भी सरक गए। प्रेस क्लब के सचिव ने एस.एस.पी. को फ़ोन कर बताया कि प्रेस क्लब पर कुछ अराजक तत्वों ने हमला बोल दिया है। लेकिन भइया अपनी टीम के साथ तब तक चले गए थे। एस.एस.पी. फिर भी आया भारी पुलिस बल के साथ। जांच पड़ताल, मौक़ा मुआयना शुरू किया। भइया को जाने क्या सूझा अपने कुत्तों के साथ फिर प्रेस क्लब पहुंच गए अपनी रंगबाज़ी दिखाने। एस.एस.पी. सादे कपड़ों में था और भइया शराब के झोंके में। एस.एस.पी. से ही उलझ पड़े। वह भी भइया का नाम तो जानता था पर भइया की शकल नहीं। सो एस.एस.पी. ने भी आव देखा न ताव तीन चार थप्पड़ भइया को प्रेस क्लब में ही जमा दिए। भइया भी उस की ओर लपके तब तक पुलिस के जवानों ने उन्हें धर दबोचा। उन के साथियों को भी धर दबोचा जो हाकी चेन और तमाम लोकल औजारों से लैस थे। ‘तुम सालों की नौकरी खा जाऊंगा। अभी चीफ़ मिनिस्टर से बात करता हूं।’ भइया चिल्लाते रहे, गरियाते रहे लेकिन पुलिस वालों ने उन की एक न सुनी। सभी को कोतवाली ला कर लाक-अप में ठूंस दिया एस.एस.पी. ने। भइया को भी। हाकी, चेन और तमाम चीजें ज़ब्त कर लीं। प्रेस क्लब पर हमले और तोड़-फोड़ के आरोप में एफ़.आई.आर. दर्ज करवा दी। आधी रात हो चुकी थी। ज़्यादातर पत्रकार पी-पा कर घरों में सोए हुए थे। सब के फ़ोन घनघनाने लगे। लगभग सभी को बताया गया कि पुलिस ने अख़बार के दफ्तर पर छापा मार दिया है। ज़्यादातर पत्रकार नींद तोड़ कर अख़बार के दफ्तर पहुंचे। उन्हें बताया गया कि भइया समेत तमाम लोगों को पुलिस ने लाक-अप में ठूंस दिया है। किस लिए? यह किसी ने नहीं बताया। लोग कोतवाली पहुंच-पहुंच कर पुलिस से उलझने लगे। पुलिस हाथ जोड़-जोड़ बताती रही कि मामला यह नहीं, यह है। अंततः पुलिस वालों को समझा बुझा कर भइया को लाक-अप से बाहर निकाला गया। वकील बुलाया गया। पर धाराएं ऐसी लगी थीं कि बिना मजिस्ट्रेट के भइया छोड़े नहीं जा सकते थे। एक मजिस्ट्रेट उस रात घर से जगा कर बुलाया गया थाने में। दो पत्रकारों ने ज़मानत ली। यह सब होते-हवाते रात के तीन बज गए।


भइया छूट के घर आए।


पर भइया का दूसरा शिकार अब सूर्य प्रताप हो गया।


सूर्य प्रताप ने प्रेस क्लब में एक दिन भइया के नए महिला प्रेम पर टिप्पणी कर दी। कहा कि, ‘बताओ वह रिश्ते में भांजी लगती है और पट्ठे ने उसे भी नहीं छोड़ा।’ भइया को सूर्य प्रताप की इस कमेंट का रात ही पता चल गया। अपने कुत्तों के दल बल के साथ भइया ने सूर्य प्रताप का घर घेर लिया। लगातार बजती काल बेल से सूर्य प्रताप चौकन्ना हो गया। खिड़की से झांका तो भइया और उन के कुत्ते दिखे। सूर्य प्रताप ने जांघिया पहने ही अपने लान के रास्ते घर की चारदीवारी से छलांग लगाई। कंटीले तारों से देह छिल गई। पर इस की परवाह किए बिना वह भागा। जा कर एक दबंग नेता के घर शरण ली। दबंग नेता सूर्य प्रताप को अपनी कार में ले कर सूर्य प्रताप के घर आया। भइया को समझाया-बुझाया। तब कहीं भइया सूर्य प्रताप के घर से रात वापस हुए। सूर्य प्रताप की पत्नी और बच्चे डरे सहमे घिघ्घी बांधे बैठे रहे थे।


सुबह-सुबह भइया के दो कुत्ते फिर सूर्य प्रताप के घर आए। सूर्य प्रताप को जबरिया उठा ले गए भइया के घर। सूर्य प्रताप ने भइया के पैरों पर गिर कर मांफ़ी मांगी तभी उसे छुट्टी मिली।


बहरहाल भइया का फ़ार्म भले लथड़ गया हो पर मनमोहन कमल अभी फ़ार्म पर थे। हालां कि दिल्ली और लखनऊ यानी केंद्र और प्रदेश दोनों ही जगह कांग्रेस का पतन हो गया था और गैर कांग्रेसी मिली जुली सरकारों का दौर था। सो मनमोहन कमल को कांग्रेस अब सूट नहीं कर पा रही थी। वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को साधने में लग गए। हालां कि यह मुख्यमंत्री था तो घनघोर जातिवादी पर राजनीति में वह अपने को समाजवादी बताता। और ऐन प्रेस क्लब में बैठ कर पत्रकारों से बड़ी शेख़ी से बात करता। बात-बात में पत्रकारों से कहता कि, ‘तुम्हारी हैसियत क्या है?’ और पत्रकार अपनी कुत्तागिरी में अपनी-अपनी दुम हिलाते मुसकुराते रहते। मुख्यमंत्री बड़ी हेकड़ी से प्रेस क्लब में बैठ कर कहता, ‘प्रेस हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। क्यों कि हमारा वोटर अख़बार नहीं पढ़ता! तो हमारा क्या बिगाड़ लोगे?’


इस मुख्यमंत्री को इस बात की शर्म नहीं आती कि उस का वोटर पिछड़ा है, दबा कुचला है, अनपढ़ है कि अख़बार भी नहीं पढ़ सकता। बल्कि उस को इस पर फख्र होता। और उस के इस फख्र, इस हेकड़ी की कोई सीमा नहीं थी।


और इसी मुख्यमंत्री को मनमोहन कमल साधने में लगा था। बरास्ता सूर्य प्रताप। सूर्य प्रताप मुख्यमंत्री का मुंह लगा था। ख़ैर मनमोहन कमल ने ख़ुद मुख्यमंत्री का एक शानदार इंटरव्यू किया और उछाल कर छापा। मुख्यमंत्री ख़ुश हो गया। मुख्यमंत्री लाख प्रेस वालों की उन की हैसियत बताता फिरता था पर पब्लिसिटी की उस की भूख बढ़ रही थी। वह अपने बौनेपन को लोहिया जैसे व्यक्तियों से जोड़ कर बड़ा बनाने की कोशिश करता। बार-बार लोहिया की माला जपता। कुछ लोहियावादियों को अपने आजू बाजू शो पीस की तरह रखता। दो एक लोहियावादी लेखकों को भी जोड़ा और सूचना विभाग से उन की लोहिया विषयक किताबें भी छपवाईं। इन्हीं किताबों में से एक में उस ने अपनी कई फोटुएं छपवाईं। जिन में एक ग्रुप फ़ोटो में वह लोहिया के साथ दिखता। पर वास्तव में उस की फ़ोटो ट्रिक से तैयार की गई थी। किसी गुमनाम व्यक्ति का सिर कटवा कर फ़ोटो में उस ने अपना सिर जड़वा दिया था। सूचना विभाग के इस दुरुपयोग की इधर-उधर बड़ी चर्चा हुई। मुख्यमंत्री की पार्टी में भी। पर कोई खुल कर चुनौती देने नहीं आया इस फ़ोटो को या मुख्यमंत्री के फ़र्ज़ी लोहिया प्रेम को। लोहिया कहते थे जाति तोड़ो और यह मुख्यमंत्री जातियों के अहंकार में चूर था, इसी में जीता जागता था।


मनमोहन कमल ने मुख्यमंत्री की प्रचार पाने की लिप्सा को पकड़ लिया। मुख्यमंत्री का जन्म दिन क़रीब था। मुख्यमंत्री ने इस मौक़े पर हल्ला बोल रैली भी प्लान की हुई थी। मुख्यमंत्री को मनमोहन कमल ने खट से एक प्रस्ताव रख दिया कि वह आज़ाद भारत का एक स्पेशल सप्लीमेंट उन के ऊपर केंद्रित कर निकालना चाहते हैं। और जो वह चाहें तो उन की रैली में अख़बार के उस स्पेशल सप्लीमेंट की एक लाख प्रतियां मु़त बंटवा भी देंगे। बस इस का बजट सूचना विभाग से जारी करवा दें।


मुख्यमंत्री मान गए।


पर मुख्यमंत्री ने कहा कि, ‘चूंकि रैली है सो सूचना विभाग से पेमेंट पर अपोज़ीशन भड़क सकता है। पर अख़बार को कैश पेमेंट पार्टी की ओर से करवा देते हैं।’


अब मनमोहन कमल ने सीधे कंपनी के चेयरमैन को प्रस्ताव रखा कि मुख्यमंत्री का जन्मदिन है, रैली है। चढ़ता हुआ पोलिटिशियन है, मिली जुली सरकारों का दौर है, कल को प्राइम मिनिस्टर भी हो सकता है। सो उस पर एक स्पेशल सप्लीमेंट निकाल कर एक लाख कापी रैली में मु़त बंटवा देते हैं।


चेयरमैन भी मान गए।


और सचमुच मुख्यमंत्री की कल्पना से भी आगे जा कर मनमोहन कमल ने कुछ मनमोहक इंटरव्यू, कुछ बढ़िया लेख, तमाम टिट-बिट्स नई पुरानी फ़ोटो, मुख्यमंत्री की नई पुरानी आकांक्षाएं, इच्छाएं, उन का भोजन, व्यायाम, दिनचर्या, मित्र अहबाब, गांव परिवार, पहलवानी, खांसी, जुकाम सब को गूंथ कर एक लाजवाब सप्लीमेंट निकाल दिया। सप्लीमेंट का कंटेंट, उस का कसाव और ले आऊट देखते बनता था। मुख्यमंत्री के यशोगान में ऊभ-चूभ यह अख़बार चंदरबरदाई को भी मात दे गया था। मनमोहन कमल की तो बल्ले-बल्ले हो गई। चेयरमैन के यहां भी और मुख्यमंत्री के यहां भी।


तमाम अख़बार इस कुत्तागिरी में अपने को पीछे पा कर हाथ मल कर, मन मसोस कर रह गए। इनमें प्रतिद्वंद्वी अख़बार के भइया भी थे। लखन और चौहान कहने लगे कि, ‘अभी तक अख़बार की हमारी यूनियन पत्रकार हुई थी। अब हमारा अख़बार भी पत्रकार हो गया।’


‘अख़बार भी पत्रकार हो गया मतलब?’ एक नई आई अंगरेज़ी अख़बार की रिपोर्टर ने चकित हो कर पूछा।


‘रिपोर्टर हैं आप और इतना भी नहीं जानतीं?’ चौहान ने पूछा और लखन ने उस की शंका का समाधान करते हुए कहा कि, ‘पत्रकार! पत्रकार मतलब दलाल।’ उस ने जोड़ा, ‘मुख्यमंत्री वाला विशेषांक उठाइए पता चल जाएगा कि पूरा अख़बार दलाल हो गया है।’


‘ओह!’ रिपोर्टर कंधे उचका कर चली गई।


यह दूसरा तारा टूटा था।


और लखन गा भी रहा था हाय ग़ज़ब कहीं तारा टूटा! पर बिना हारमोनियम के!


उधर रिटायर्ड सूचनाधिकारी और फ़ीचर एडीटर के पिता भी छलकते हुए घूम रहे थे। एक रिटायर्ड पत्रकार सक्सेना ने एक दिन उन की जेब से उन की एक ख़ूबसूरत पेन निकाल कर कहा कि, ‘पेन तो बड़ी ख़ूबसूरत है पंत जी कहां से मार लाए?’


‘मेरे दामाद ने दी है।’ पंत जी चहकते हुए, इतराते हुए बोले।


‘दामाद?’ सक्सेना चौंके। पर जल्दी ही अपनी ग़लती सुधारते हुए बोले, ‘अच्छा-अच्छा! प्रधान संपादक जी ने दी है।’


‘तो?’ कह कर पंत जी ठुमके। पर उन के इस ठुमकने में दामाद कहने वाला चाव थोड़ा कम हो गया था। फिर वह वहां से सरक लिए। क्यों कि वह यह जानते थे कि सक्सेना मुंहफट आदमी है। कब क्या बोल जाए कुछ ठिकाना नहीं है।


‘बताइए लगभग अपनी उम्र के आदमी को दामाद कहते इस आदमी को संकोच भी नहीं होता?’ सक्सेना पंत के जाने के बाद बोले।


उधर अंगरेज़ी अख़बार के एडीटर इन चीफ मेहता ने मनमोहन कमल के रास्ते पर जाने से साफ़ इंकार कर दिया था। अख़बार मालिकों और राजनीतिज्ञों के तलवे सहलाना, या तलवे चाटना उन्हें ज़रा भी नहीं सुहाता था। नतीजतन प्रबंधन से उन की आए दिन ठनी रहने लगी। और हस्तक्षेप जब ज़्यादा बढ़ गया तो मेहता ने इस्तीफ़ा दे दिया। वैसे भी मेहता दो-तीन साल से ज़्यादा कहीं टिक नहीं पाते थे। उन्हें नए अख़बार और नए मालिकान ही सूट करते थे। वह कहते भी थे कि, ‘नए अख़बार में सहूलियत यह रहती है कि शुरू-शुरू में अख़बार मालिकों की ख़्वाहिश रहती है कि किसी तरह अख़बार अच्छा निकल जाए। तो उन का हस्तक्षेप न्यूनतम रहता है। फिर जब अख़बार जम जमा जाता है तो हस्तक्षेप ज़्यादा हो जाता है। तब मैं चल देता हूं।’


मेहता के जाने के बाद मनमोहन कमल ने बहुत कोशिश की कि हिंदी अख़बार आज़ाद भारत के साथ-साथ वह अंगरेज़ी अख़बार के भी एडीटर इन चीफ बना दिए जाएं। चेयरमैन को वह कनविंस भी कर ले गए थे। पर सी.ई.ओ. ने लंगड़ी लगा दी।


मेहता की जगह मित्रा ने ले ली।


मेहता रहते भले दिल्ली में थे पर रहने वाले लखनऊ के ही थे। पढ़ाई-लिखाई लखनऊ यूनिवर्सिटी की थी। उन का एक घर कैंट इलाके में था जो किसी ने कब्ज़िया लिया था। मेहता चाहते रहे होते तो प्रशासन की मदद ले कर चुटकी में अपना मकान ख़ाली करवा लिए होते। पर उन्हों ने अपनी पत्रकारिता का उपयोग निजी काम के लिए नहीं किया। तब जब वह देश के शीर्ष पत्रकारों में तब भी थे, अब भी हैं।


मित्रा जे.एन.यू. के पढ़े लिखे थे। अपने समय के कामरेड थे। हिंदुस्तान टाइम्स जैसे अख़बार में संपादक रहे थे। पर अब वह कामरेडशिप को किक मार कर भाजपाई हो गए थे।


दरअसल यह समय आदर्श, मूल्य और सिद्धांतों के विगलन का था। आदर्श, मूल्य, सिद्धांत अब सुविधाओं के पैकेज में विलीन हो रहे थे। हर जगह, हर हलके में, पत्रकारिता में भी।


और हाय ग़ज़ब कहीं तारा टूटा! फिर!


इसकी आहट हो गई थी। दरअसल चेयरमैन के ग्रुप की एक डिस्टीलरी उन्नाव में थी। जिस के मार्फ़त वह कानपुर में देसी शराब की सप्लाई करती थी। पर वास्तव में यह उन्नाव की डिस्टीलरी चेयरमैन की सिक यूनिट थी। वल्लारपुर डिस्टीलरी से देसी शराब ला कर यहां से सप्लाई होती थी। एक व्यावसायिक घराने ने इस बात को प्वाइंट आउट कर कानपुर में अपनी डिस्टीलरी से देसी शराब सप्लाई करना चाहता था। उस ने मुख्यमंत्री के एक सचिव के मार्फ़त डील चलाई। बात चेयरमैन के कान तक पहुंची। चेयरमैन ने फ़ौरन मनमोहन कमल को फ़ोन किया और सारा मामला बताया। कहा कि मुख्यमंत्री से आप की दोस्ती है इसे रुकवाइए। हमारे ग्रुप के लिए यह प्रेस्टीज इशू है। मनमोहन कमल ने मुख्यमंत्री को संपर्क करने की कोशिश की। पता चला मुख्यमंत्री रायबरेली में हैं। और फ़ोन प्वाइंट पर भी नहीं हैं। मनमोहन कमल ने फ़ौरन सूर्य प्रताप को तलब किया और टैक्सी ले कर सूर्य प्रताप को आनन-फ़ानन रायबरेली भेजा। यह बता कर कि चेयरमैन साहब ने कहा है कि यह उन के गु्रप का प्रेस्टीज इशू है। सूर्य प्रताप रायबरेली पहुंच कर मुख्यमंत्री से मिला। और सारा मामला बताया। कंपनी के प्रेस्टीज इशू का हवाला दिया और कहा कि, ‘इस डील को किसी भी तरह रोकिए!’


मुख्यमंत्री आज़ाद भारत से वैसे ही ख़ुश थे। तिस पर उन का मुंहलगा पत्रकार सूर्य प्रताप फ़रियाद कर रहा था सो वह सारी बात सुन कर बोले, ‘डन सूर्य प्रताप जी, डन!’ लोहिया का पहाड़ा पढ़ने वाले, अंगरेज़ी को दिन रात लानत भेजने वाले मुख्यमंत्री ने जब अंगरेज़ी में अपनी बात फिर दुहराई, ‘डन सूर्य प्रताप जी, डन!’ तो सूर्य प्रताप की बांछें खिल गईं। सूर्य प्रताप ने रायबरेली से ही फ़ोन कर के मनमोहन कमल से कहा, ‘डन कमल जी, डन!’


मनमोहन कमल ने चेयरमैन को फ़ोन कर के कहा, ‘डन सर, डन!’ और फिर धीरे से जोड़ दिया, ‘बट सर, एक करोड़ रुपया भी इस डील में लगेगा।’


‘एक करोड़ तो बहुत ज़्यादा है।’ चेयरमैन बोले, ‘फिर भी इस डील को रोकने के लिए हम कुछ भी करने को तैयार हैं।’ दूसरे दिन एक करोड़ रुपया मनमोहन कमल को मिल भी गया।


मनमोहन कमल की चाल में शतरंज के राजा का भाव आ गया, शतरंज के हाथी का मद आ गया, शतरंज के ऊंट की लंबाई आ गई, शतरंज के घोड़े की ढाई घर चलने की लचक आ गई। और जो शतरंज से उतर कर क्रिकेट की भाषा में कहें तो उन की पिच में उछाल आ गया।


तीसरा तारा यहीं टूटा।


वास्तव में कानपुर में देसी शराब की सप्लाई दूसरे ग्रुप को जा चुकी थी। डील चूंकि पैसे वाली थी, इस लिए मुख्यमंत्री को याद नहीं था। पूछ ताछ और दुनिया भर की क्वेयरी बिना पैसे वाली फ़ाइलों पर होती हैं सो सारी बातें याद रहती हैं। पैसे वाली फ़ाइलों पर तो एक हाथ पैसा लिया, दूसरे हाथ फ़ाइल पर दस्तख़त होते हैं। कुछ याद नहीं रहता किसी को। तो मुख्यमंत्री को कैसे याद रहता भला?


पर डील हाथ से निकलते ही चेयरमैन आग बबूला हो गए। मनमोहन कमल को लानतें भेजीं और सीधे मुख्यमंत्री को फ़ोन किया। शराफ़त में ही सही मुख्यमंत्री को भला बुरा कहा। आज़ाद भारत की एक लाख कापी रैली में बंटवाने का एहसान याद दिलाया, एक करोड़ रुपए पेशगी की चर्चा की और कहा कि, ‘मुख्यमंत्री जी, वर्षों पुरानी हमारी कानपुर में देसी शराब की सप्लाई पर आप ने पानी डाल दिया? हमारी इज़्ज़त, हमारी हैसियत, हमारी प्रतिष्ठा का ज़रा भी ख़याल नहीं किया?’


अब बारी मुख्यमंत्री की थी। बड़ी संजीदगी से वह बोले, ‘आप कह चुके? मैं भी कुछ कहूं?’ फिर मुख्यमंत्री ने भी चेयरमैन की बस मां बहन भर नहीं की पर अंदाज़ वही था। कि, ‘कैसा एक लाख अख़बार? अरे हमने एडवांस पेमेंट किया था। बाद में सूचना विभाग से विज्ञापनों का अंबार लगा दिया आप के दोनों अखबारों में।’ फिर यह किया, वह किया की फे़हरिस्त सुनाई और पूछा कि, ‘कैसा एक करोड़? एक पैसे की पेशगी नहीं ली। कौन दिया हम को एक करोड़? वह आप का रिपोर्टर सूर्य प्रताप, ख़ाली हाथ आया था।’


‘सूर्य प्रताप नहीं, मनमोहन कमल!’ चेयरमैन धीरे से बोला।


‘मनमोहन कमल?’ मुख्यमंत्री भड़क गए, ‘उस से तो इस बारे में मेरी कोई बात भी नहीं हुई!’


‘ओह!’ चेयरमैन बोला, ‘देन सॉरी! सॉरी मुख्यमंत्री जी।’


चेयरमैन ने फिर दूसरा फ़ोन मनमोहन कमल को किया। सारा गुस्सा, सारा फ्ऱस्ट्रेशन, सारा अपमान, सारा ग़ुबार चेयरमैन ने मनमोहन कमल पर उतार दिया। ऐसे जैसे कोई क्रिमिनल अपने रिवाल्वर की सारी गोलियां किसी मरे हुए पर भी उतार दे! मनमोहन कमल ने बड़ी सफ़ाई दी और कहा कि, ‘एक करोड़ रुपए मुख्यमंत्री के सचिव के मार्फ़त दिया गया।’ और फिर ये और फिर वो का ब्यौरा भी दिया। पर चेयरमैन ने साफ़ आदेश दे दिया, ‘अब अख़बार बंद कीजिए! मुझे नहीं चलाना अब कोई अख़बार-वखबार!’ चेयरमैन ने अपनी बात किचकिचा कर दुहराई, ‘क्लोज़ इट!’


मनमोहन कमल को पसीना आ गया।


फिर दो दिन वह आफ़िस नहीं आए। और आए तो पूरा प्रस्ताव बना कर। सूर्य प्रताप को बुलाया और बताया कि ‘भई तुम्हारे डन के बावजूद डील कंपनी के हाथ से निकल गई। एक करोड़ रुपए का मामला भी फंस गया।’ फिर उन्हांे ने सूर्य प्रताप को मुख्यमंत्री के पीछे लगाया कि, ‘किसी भी तरह, किसी भी क़ीमत पर यह देसी शराब की डील को फिर से हाथ में ले ले।’ मनमोहन कमल ने सूर्य प्रताप को बताया कि, ‘यह हम सब के जीवन-मरण का प्रश्न है। नहीं चेयरमैन ने तो अख़बार बंद करने को कहा दिया है।'


‘क्या?’ सूर्य प्रताप हकबका गया।


‘हां।’ मनमोहन कमल संक्षिप्त सा बोले और सूर्य प्रताप से कहा कि, ‘युद्धस्तर पर लग जाओ।’


सूर्य प्रताप ने कमल जी को इतना हताश, उदास और पिटा हुआ इस के पहले कभी नहीं देखा। गोरा चेहरा मलिन और क्लांत पड़ गया था।


ख़ैर, सूर्य प्रताप युद्धस्तर पर लग भी गया। जा कर सीधे मुख्यमंत्री से मिला। कहा कि, ‘आप ने तो डन कह दिया था फिर कैसे सब गुड़ गोबर हो गया।’


‘यह बात मनमोहन कमल से पूछिए।’


‘क्या पूछें?’ सूर्य प्रताप चिंतित हो कर बोला, ‘वह तो जैसे मर गए हैं। चेयरमैन ने उन से अख़बार बंद करने को कह दिया है।’


‘उन्होंने काम ही ऐसा किया है।’ मुख्यमंत्री ने खिन्न हो कर कहा, ‘बताइए हमारे जन्म दिन पर हुई हल्ला बोल रैली में एक लाख अख़बार का दाम हम से नक़द लिया।’


‘क्या?’ सूर्य प्रताप चौंका।


‘हां। और वहां चेयरमैन से कहा कि फ्री बंटवाया। हम पर एहसान लाद दिया। हमारा पैसा, हमीं पर एहसान!’


‘चलिए भूल जाइए!’ सूर्य प्रताप ने मनुहार की।


‘चलिए वह तो तीन लाख का मामला था।’ मुख्यमंत्री बोले, ‘पर अब की तो मेरे नाम पर यह कमल जी एक करोड़ रुपए डकार गए। इस देसी शराब की डील में।’


‘क्या कह रहे हैं आप?’ सूर्य प्रताप जैसे अचकचा गया। फिर उस की आवाज़ ही नहीं निकली।


‘जी सूर्य प्रताप जी!’ मुख्यमंत्री बोले, ‘यह बात किसी और ने नहीं आप की कंपनी के चेयरमैन ने ही मुझे फ़ोन पर बताई है।’


‘तो अब क्या किया जाए?’ सूर्य प्रताप ने हताश हो कर मुख्यमंत्री से पूछा।


‘असल में सूर्य प्रताप जी जिस समय आप ने इस बारे में बात की थी, तब तक यह डील फ़ाइल पर हो चुकी थी। मुझे याद नहीं था। आप से हां कहने के बाद फ़ाइल आई नहीं और आदेश जारी हो गया।’ मुख्यमंत्री बोले, ‘नहीं सूर्य प्रताप जी आप जानते हैं कि मैं कभी आप की बात टालता नहीं हूं। पर अभी तुरत फुरत अपना ही आदेश बदल दूंगा तो बड़ी फज़ीहत हो जाएगी। आप की मीडिया ही उछाल देगी सारा मामला। ऐसी फ़ाइलों की फ़ोटो स्टेट होने में देर नहीं लगती। और फ़ाइल में आप के कंपनी की उन्नाव डिस्टीलरी सिक प्रूव हो चुकी है।’


‘तो क्या चाहते हैं कि चार पांच सौ लोगों की रोज़ी रोटी बंद हो जाए। सब के परिवार सड़क पर आ जाएं?’


‘नहीं ऐसा भी नहीं चाहता। पर कोई कंपनी, कोई अख़बार रातांे रात बंद नहीं हो पाता। आखि़र क़ानून का राज है।’


‘क्यों नवभारत टाइम्स रातों रात बंद हो गया। रात दो बजे तक लोगों ने काम किया और सुबह घर पर सब के चिट्ठी पहुंच गई। कि अख़बार बंद, सेवाएं समाप्त! क्या कर लिया क़ानून के राज ने?’ सूर्य प्रताप बोला, ‘नेशनल हेरल्ड, नवजीवन, नादर्न इंडिया पत्रिका, अमृत प्रभात बारी-बारी इसी लखनऊ में बंद हो गए। क्या कर लिया क़ानून के राज ने? और अब यह आज़ाद भारत भी बंद हो जाएगा? बेकारी वैसे ही फैली हुई है।’


‘कुछ सोचते हैं सूर्य प्रताप जी!’ मुख्यमंत्री यह कह कर उठ खड़े हुए।


सूर्य प्रताप ने वापस आ कर मनमोहन कमल को पूरी रिपोर्ट दी और कहा कि, ‘कमल जी बहुत मुश्किल है।’


‘मुश्किल है सूर्य प्रताप जी तभी तो कहा कि युद्ध स्तर पर लग जाओ।’


‘अब डील के बाद आदेश जारी हो जाने के बाद क्या हो सकता है कमल जी?’


‘हो सकता है।’ मनमोहन कमल बोले, ‘बहुत कुछ हो सकता है।’


फिर उन्हों ने सूर्य प्रताप को डाइग्राम बना कर पूरा प्लान समझाया। बताया कि, ‘कानपुर चला गया कोई बात नहीं। पर इस के बदले उन्नाव से बलिया तक की देसी शराब की सप्लाई जो कंपनी को मिल जाए तो थोड़ी सांस मिल सकती है।’ और कहा कि, ‘इस से भी कानपुर की भरपाई तो नहीं हो सकती पर कुछ न कुछ कंपनसेट तो हो ही जाएगा कि चेयरमैन का मूड ठीक हो सके और अख़बार को बंद होने से रोका जा सके।’


‘ठीक कमल जी!’ कह कर सूर्य प्रताप चला गया।


दूसरे दिन सूर्य प्रताप फिर मुख्यमंत्री से मिला। उन्हें उन्नाव से बलिया तक पूरे उत्तर प्रदेश में देसी शराब की सप्लाई की डील बताई। और कहा कि, ‘शायद इस सब से अख़बार बंद होने से बच जाए।’


‘चलिए आप प्रस्ताव भिजवाइए।’ मुख्यमंत्री बोले, ‘इस से अगर आप का अख़बार बंद होने से बच जाता है तो इस से मुझे ख़ुशी होगी।’


सूर्य प्रताप ने लौट कर मनमोहन कमल को मुख्यमंत्री की हां बता दी और कहा कि, ‘बस प्रस्ताव फ़ौरन भिजवाइए।’


मनमोहन कमल ने तुरंत फ्लाइट ली दिल्ली की और चेयरमैन से मिलने का समय भी। दिल्ली में चेयरमैन से मिल कर अपने फ़ेल्योर के लिए माफ़ी मांगी और नया प्लान बताया। यह भी बताया कि मुख्यमंत्री उन्नाव से बलिया तक की पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश की सप्लाई देने केे लिए सहमत हो गए हैं। चेयरमैन मुसकुराया और बोला, ‘पर कमल जी, जो सप्लाई अकेले कानपुर की थी उस की आधी सप्लाई भी पूरे पूर्वी उत्तरा प्रदेश में नहीं है। यह आप जानते हैं? दूसरे, इस से कंपनी की प्रतिष्ठा को जो ठेस लगी है, इस का अंदाज़ा है आप को? पैसे का जो नुक़सान हुआ है वह तो है ही। वर्षों पुरानी डील निकल गई। वह भी ऐसे ग्रुप ने हम से यह डील छीनी है जो हमारे सामने चींटी कहलाने लायक़ भी नहीं है। ऐसे टुटंपुजिए ग्रुप से हमें आप ने जूता खिलवाया है। आप की लालच और होशियारी ने कंपनी पर एक दाग़ लगा दिया।’


मनमोहन कमल चुप रहे।


बहरहाल, उन्नाव से बलिया तक की देसी शराब की सप्लाई मिल जाने से चेयरमैन का मूड थोड़ा ठंडा हुआ। पर अख़बार बंद करने के फै़सले पर वह फिर भी अड़े रहे। मनमोहन कमल ने कई लोगों को चेयरमैन को समझाने के लिए लगाया पर कोई सफल नहीं हुआ। अंततः मनमोहन कमल ने अख़बार बंद करने की जगह अख़बार बेच देने का प्रस्ताव रखा। और तर्क दिया कि इस से कंपनी पर अख़बार बंद करने का दाग़ नहीं लगेगा और कुछ पैसा भी मिल जाएगा। अनमने मन से ही चेयरमैन ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और मनमोहन कमल से पूछा, ‘इसे ख़रीदेगा कौन?’


‘मैं देखता हूं।’


‘हां जल्दी देखिए।’ और फिर चेयरमैन ने उन्हें इस काम के लिए तीन महीने का समय दे कर टाइम बाउंड कर दिया।


कांग्रेस तब सत्ता से बाहर थी, बल्कि बुरी तरह। राजनीति के हाशिए पर। लगभग अप्रासंगिक थी। और मनमोहन कमल की लगभग सारी चाभियां, सारे संपर्क कांग्रेस से ही थे। एक नया संपर्क उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री था, वह जल्दबाज़ी में नष्ट हो गया था।


अब वह क्या करें?


दो चार मझोले व्यवसायियों को टटोला। अख़बार लेने के तो सभी इच्छुक थे। पर इतनी पूंजी ख़र्च करने की हैसियत किसी की नहीं थी। कोई बड़ा व्यवसायी जिस की थोड़ी बहुत हैसियत थी वह कहते कि विवादित अख़बार में हम क्यों हाथ डालें? निकालना ही होगा तो अपना अख़बार निकालेंगे। इस सब के बीच अब हल्ला हो चला था कि आज़ाद भारत बिक रहा है। फिर उस के सहयोगी प्रकाशन अंगरेज़ी अख़बार के भी बिकने की बात चली। पर ख़रीद कौन रहा है। यह किसी को नहीं पता था। मनमोहन कमल को भी नहीं। ऐसे कि जैसे कोई बंपर सेल लगी हो। पर ग्राहकों से स्टाल के स्टाल ख़ाली हों।


आज़ाद भारत के कर्मचारी सन्नाटे में थे। जैसे सब को सांप सूंघ गया हो।


धीरे-धीरे आज़ाद भारत की हालत यह हो गई कि जैसे कोई वेश्या बाज़ार में अपनी देह बेचने को खड़ी हो पर उस का ग्राहक कौन होगा, वह नहीं जानती हो। और कि आते-जाते ग्राहक को पटाने में लगी हो। और ग्राहक कभी उसे देख कर, कभी उस के दाम सुन कर भाग जाते हों।


पर मनमोहन कमल कोई कच्चे खिलाड़ी नहीं थे। कीटनाशक बनाने और बेचने तथा कोल्ड स्टोरेज चलाने वाले एक व्यवसायी को उन्हों ने फांस लिया। वह अंगरेज़ी तो नहीं पर हिंदी अख़बार बिना बिल्डिंग के ख़रीदने को तैयार हो गया। बारह लाख रुपए में सिर्फ़ अख़बार का नाम ख़रीदने के लिए। और कि जब तक वह अपनी बिल्डिंग नहीं बना लेता तब तक अख़बार का दफ्तर वहीं रहेगा, उसी मशीन पर छपेगा। वह छपाई और किराए का पैसा देता रहेगा। दो लाख रुपए पेशगी दे कर उस ने एग्रीमेंट भी कर लिया।


तब तक आज़ाद भारत में चेयरमैन ने एक नया रेज़ीडेंट एडीटर नियुक्त कर दिया। और अख़बार के प्रिंट लाइन पर उस का नाम भी डाल दिया। जे.एन.यू. का पढ़ा लिखा यह रेज़ीडेंट एडीटर भी मनमोहन कमल की तरह बिहार का ही था। और मनमोहन कमल की ही काट के लिए आया था। हिंदी अंगरेज़ी दोनों में ही उस की समान गति थी। कई अख़बारों, पत्रिकाओं में काम कर चुका यह रेज़ीडेंट एडीटर हीरे की अंगूठी पहनता था और घड़ल्ले से अंगरेज़ी में बतियाता बोलता था।


मनमोहन कमल का नाम तो प्रिंट लाइन पर चेयरमैन ने रहने दिया लेकिन बाक़ी अधिकारों से वंचित कर दिया। सिवाय अख़बार को बेचने को छोड़ कर वह कुछ नहीं कर सकते थे।


अब दस लोग, पचास तरह की बातें।


लेकिन चौहान और लखन के शब्दों में पत्रकार बन चुकी यूनियन थोड़ी कसमसाई, थोड़ी जागी। लखन की हारमोनियम अब फिर साफ़ सूफ़ हो कर उस के गले में आ कर लटक गई थी। अब रोज़ शाम को एक घंटे प्रदर्शन, भाषण, धरना होने लगा। यूनियन का विरोध इस बात को ले कर था कि अख़बार बिकने नहीं देंगे। अब यूनियन के लोग यह क़तई नहीं जानते थे कि अख़बार अगर तीन महीने में नहीं बिका तो बंद हो जाएगा। जानते भी कैसे? यह बात लगभग चार लोग ही जानते थे। चेयरमैन, सी.ई.ओ., मनमोहन कमल और सूर्य प्रताप। और इन चारों ने ही किसी पांचवें के आगे मुंह नहीं खोला था। सिवाय सूर्य प्रताप के। सूर्य प्रताप ने वह भी मुख्यमंत्री को सिर्फ़ अंदेशा जताया था। और चेयरमैन की धमकी का ज़िक्र किया था कि अख़बार बंद हो जाएगा। ऐलान नहीं।


ख़ैर जब यूनियन के लोगों को पता चला कि कीटनाशक बनाने और कोल्ड स्टोरेज चलाने वाला अख़बार को ख़रीदने के लिए एग्रीमेंट कर चुका है तो सब लोग उसी पर सवार हो गए। पहली चिंता लोगों की यह हो गई कि यह पिद्दी सा व्यापारी इतनी तनख़्वाह सब को कहां से देगा? ज़ाहिर है सब को निकाल बाहर करेगा।


सो कुछ पत्रकारों ने उसे धमकाया। उस के फ़र्ज़ी कीटनाशकों का हवाला दिया। कहा कि जो कीटनाशक के नाम पर कृषि विभाग से मिलीभगत कर तुम मिट्टी सप्लाई कर लाखों-करोड़ो कमा रहे हो वही कमाओ। अख़बार में ख़ास कर इस अख़बार पर नज़र मत गड़ाओ। नहीं तुम्हारे यहां किसिम-किसिम के छापे डलवा कर तुम्हें बरबाद कर दिया जाएगा। न यहां के रहोगे, न वहां के। एक पत्रकार ने एक भोजपुरी मुहावरे में भी उसे समझाया। जिस का अर्थ यह था कि अगर मलद्वार नहीं है तो बेल मत खाओ!


कीटनाशक वाला व्यापारी डर गया।


पर अब उस की चिंता अपनी नाक की थी। उस ने अपने सगे संबंधियों, व्यवसायियों और जानने वालों में यह बात फैला दी थी कि वह आज़ाद भारत ख़रीद रहा है। सो उस ने फ़ैसला बदला ज़रूर पर टाला नहीं। उस ने अब तय किया कि आज़ाद भारत न सही अब वह अपना अख़बार निकालेगा। अपनी दो लाख रुपए की पेशगी भी वह भूल गया। नए अख़बार की तैयारी में लग गया। अपने एक परिचित पत्रकार से उस ने कहा भी कि, ‘जब ओखली में सिर डालना ही है तो क्यों न पूरा सिर डाल दिया जाए!’ बाद के दिनों में उस ने चंू चूं का मुरब्बा टाइप एक दैनिक अख़बार निकाला भी। उप संपादक की तनख़्वाह में एक संपादक रख कर।


पर मनमोहन कमल ने भी हार नहीं मानी। एक एग्रो कंपनी चलाने वाले को पकड़ा और आज़ाद भारत ख़रीदने के लिए उसे राज़ी कर लिया। उस ने भी अभी एग्रीमेंट किया ही था कि यूनियन फिर भड़क गई। पर कुछ-कुछ वैसे ही जैसे बहुत गरम होने पर लालटेन का शीशा भड़क कर फूट जाए और फिर भभक कर लालटेन भी बुझ जाए। इसलिए कि चौहान और लखन के शब्दों में यूनियन पत्रकार हो गई थी।


तो भी डेस्क के कुछ पत्रकारों ने यूनियन को उस के हाल पर छोड़ कर एक वकील से संपर्क किया। अख़बार न बिके इस के लिए हाईकोर्ट में एक रिट फ़ाइल करने की तैयारी की। इस रिट को फ़ाइल करने के लिए कर्मचारियों से चंदा लेने की बात चली। सारी रणनीति सड़क पर आ गई। यहां तक कि वकील भी कौन है यह भी मैनेजमेंट को पता चल गया। नए आए रेज़ीडेंट एडीटर को इस की कमान सौंपी गई। उस ने रिट की अगुवाई करने वाले पत्रकार को बुलाया। बैठाया और बतियाया। वह जानता था कि इस पत्रकार की मनमोहन कमल से नहीं पटती। सो कहा कि, ‘बिक रहा है आज़ाद भारत बिकने दीजिए। मनमोहन कमल बरबाद हो रहे हैं होने दीजिए। आप लोग क्यों परेशान होते हैं?’


‘अरे भाई साहब हम लोगों की रोज़ी रोटी जा रही है और आप चाहते हैं कि हम परेशान भी न हों।’ वह उत्तेजित हो कर बोला।


‘उत्तेजित होने की ज़रूरत नहीं है। आज़ाद भारत बिक रहा है, अंगरेज़ी अख़बार थोड़े ही बिक रहा है। और फिर आप को क्या लगता है कि बिना हिंदी के कोई अंगरेज़ी अख़बार ज़्यादा दिन चल पाएगा?’


‘टाइम्स आफ़ इंडिया तो यहां चल रहा है।’


‘टाइम्स आफ़ इंडिया तो छोड़िए।’ रेज़ीडेंट एडीटर बोला, ‘आज़ाद भारत बिकने दीजिए। मनमोहन कमल नामक गंदगी को साफ़ होने दीजिए। फिर आप लोग इस अंगरेज़ी अख़बार के हिंदी संस्करण में आ जाइएगा। जो इसी नाम से प्रस्तावित है।’


‘ऐसा!’


‘तो?’


‘अपना वादा मत भूल जाइएगा।’


‘सवाल ही नहीं उठता।’


घटनाएं तेज़ी से घट रही थीं। आज़ाद भारत में भी और प्रदेश की राजनीति में भी। पत्रकारिता भी बिगड़ रही थी और राजनीति भी। राजनीति कर रहे पिछड़ी और दलित जाति के नेताओं की सामंती प्रवृत्ति अब खुल कर लोगों के सामने आ रही थी। राजनीतिज्ञ अब पूंजीशाह भी बन रहे थे। निरंकुश हो रहे थे। पत्रकारिता भी अब पथरा रही थी। मूल्य खो रही थी। जैसे थाने या कचहरी में पैसे दे कर कोई कुछ भी करवा सकता था, पत्रकारों को भी ऐसे ही पैसे दे कर अख़बारों में कुछ भी छपवा सकता था। यह सब चीज़ें अभी ज़ोर मार रही थीं कि एक बड़ी घटना घट गई। एक दलित पार्टी के समर्थन से साझे में चल रही पिछड़ी जाति के मुख्यमंत्री, जो अपने को समाजवादी होने का स्वांग करता था, की कुछ अनबन हो गई। बात यहां तक पहुंची कि एक अख़बार में दलित नेता के पुरोधा के आगे मुख्यमंत्री की कान पकड़े खड़े होने की फ़ोटो छप गई। ख़बरों में कान पकड़ कर मुख्यमंत्री के उठक बैठक का ज़िक्र हुआ। अनबन यहां तक बढ़ी कि एक दिन एक दलित महिला नेता पर गेस्ट हाऊस में सुबह-सुबह समाजवादी कही जाने वाली पार्टी के कुछ गुंडों ने हमला कर दिया। खुले आम। दलित महिला ने गेस्ट हाऊस के एक कमरे में छुप कर किसी तरह जान बचाई। लेकिन समाजवादी गुंडों ने फिर भी वहां कोहराम मचा दिया। जम कर उत्पात मचाया। दलित महिला नेता के साथ का जो भी मिला उस की डट कर कुटाई की। न्यूज़ चैनलों ने तब के दिनों में बस आंख खोली ही थी। संयोग से एक चैनल का कैमरामैन और रिपोर्टर मौके़ पर किसी और का इंटरव्यू करने पहुंचे थे कि यह घटना घट गई। पूरी दुनिया ने समाजवादी गुंडों को उत्पात करते देखा। लेकिन पुलिस ख़ामोश रही। पर एक पी.पी.एस. दलित पुलिस अफ़सर वायरलेस पर लगातर इस घटना की जानकारी देता रहा। लेकिन कोई बड़ा पुलिस अफ़सर मौक़े पर नहीं पहुंचा। एक दलित आई.ए.एस. अफ़सर ने सारा प्रोटोकाल तोड़ कर राजभवन में राज्यपाल के सामने बवाल काटा। पर कुछ नहीं हुआ। अंततः लोकसभा में इस घटना को एक पूर्व प्रधानमंत्री और यहां के सासंद ने मामला उठाया तो कहीं जा कर उस दलित महिला नेता को सुरक्षा मिली। और उस की जान बची। पूरे देश में समाजवादी गुंडों की थू-थू थी। लखनऊ में भी। पर यह सब बाद की बात है।


पर इस के पहले एक घटना और घटी जो देश, प्रदेश या लखनऊ में बहुत कम लोग जान पाए।


हुआ यह कि जिस सुबह समाजवादी गुंडों ने दलित महिला नेता को मारने के लिए गेस्ट हाऊस में घेरा उस रात काम ख़त्म कर सूर्य प्रताप घर लौट रहा था। प्रतिद्वंद्वी अख़बार के चौराहे पर एक पान की दुकान पर वह पान खाने के लिए खड़ा था। कि प्रतिद्वंद्वी अख़बार के संपादक भइया जी दिख गए। उन्हों ने भी सूर्य प्रताप को देख लिया। ख़ुद सूर्य प्रताप के पास चल कर गए। बोले, ‘तुम्हारे मुख्यमंत्री ने इतना कुछ कर दिया और तुम कहीं दिखे ही नहीं?’


‘हां भइया क्या बताऊं आज सोया रह गया।’


‘तो अभी कौन सी देरी है?’ भइया बोले, ‘अभी साली कुतिया गेस्ट हाऊस में ही दुबकी पड़ी है। जाओ रगड़ आओ!’


‘क्या बताएं भइया डेढ़ सौ रुपए का सवाल है और वह अभी जेब में है नहीं।’


‘अरे दो तारीख़ को भी तुम्हारी जेब में डेढ़ सौ नहीं है?


‘अब नहीं है तो क्या करें?’ सूर्य प्रताप बोला। उन दिनों क्या था कि सूर्य प्रताप जब कुपित होता किसी से तो बस इतना ही कहता कि, ‘क्या बताऊं बस डेढ़ सौ रुपए का सवाल है।’ उन दिनों डेढ़ सौ रुपए में शराब की एक बोतल आ जाती थी। और सूर्य प्रताप पी पा कर किसी की भी ऐसी तैसी कर देता। तो जब वह कभी धीरे से अफ़सोस भरे लहजे में कहता कि, ‘क्या बताएं बस डेढ़ सौ रुपए का सवाल है।’ तो ज़्यादातर लोग सूर्य प्रताप के सामने जद-बद होने के बजाय सरक लेते। पंगा नहीं लेते। और जो पंगा ले लेता वह भुगत जाता। तो सूर्य प्रताप ने जब यहां भी भइया से कहा कि, ‘क्या बताएं भइया डेढ़ सौ रुपए का सवाल है!’ तो भइया ने थोड़े ना नुकुर के बाद कहा कि, ‘तुम एक बोतल की बात करते हो? आओ तुम्हें दो बोतल पिलाता हूं।’


‘दो नहीं भइया बस एक काफ़ी है उस हरामिन कुतिया के लिए।’


फिर भइया और उन के गुर्गों के साथ बैठ कर सूर्य प्रताप ने डट कर शराब पी, मुर्ग़ा खाया और पहुंचा गैस्ट हाऊस। दलित महिला नेता के कमरे के आगे जा कर चीखना चिल्लाना और गरियाना शुरू किया। दरवाज़ा पीट-पीट कर, पैरों से ठोकर मार-मार कर मां-बहन समेत जितनी गालियां थीं, ख़ाली करता गया। दुहराता गया। मार डालूंगा, काट डालूंगा, फाड़ डालूंगा जैसी तमाम बातें चीख़-चीख़ कर चौकड़ी भर-भर कर कहीं। और हर गाली के बाद यह भी बताता गया कि, ‘जान लो मुझे सूर्य प्रताप कहते हैं। ब्यूरो चीफ़ आज़ाद भारत। कमीनी, कुत्ती, साली हमारे मुख्यमंत्री से कान पकड़ कर उठक बैठक करवाती है? अरे फाड़ डालूंगा साली तुम्हारी इतनी कि हगने मूतने लायक़ भी नहीं रहेगी हरामिन!’ वह फिर जोड़ता, ‘जान लो मुझे सूर्य प्रताप कहते हैं।’ और यह गालियों का वाचन और जान लो मुझे सूर्य प्रताप कहते हैं की जुगाली तब तक चली जब तक कि सूर्य प्रताप की देह में भरे पेट्रोल ने काम किया।


इधर पेट्रोल ख़त्म, उधर सूर्य प्रताप का काम ख़त्म!


दलित महिला नेता ने कमरे के भीतर से सूर्य प्रताप की किसी बात का प्रतिवाद तो दूर एक शब्द भी नहीं बोली। यही हाल कमरे से बाहर का था। गेस्ट हाऊस के किसी कर्मचारी या किसी अतिथि ने भी सूर्य प्रताप को न रोका, न छेंका।


सूर्य प्रताप थक थका कर ख़ुद ही लौट गया पर विजयी भाव से, गदगद भाव से। कि मुख्यमंत्री जी के अपमान का बदला ले लिया।


अलग बात है मुख्यमंत्री जी के इस बदले की क़ीमत बाद के दिनों में सूर्य प्रताप ने जो चुकाई, जो यातना और अपमान भोगे, बेरोज़गारी का जो दंश भोगा वह अकथनीय ही है आज तक!


ख़ैर, घटनाक्रम फिर तेज़ी से चला। दलितों और पिछड़ों का गठबंधन टूट गया। दलितों के समर्थन वापसी से समाजवादी मुख्यमंत्री की सरकार गिर गई। और भाजपा के सहयोग से यही दलित महिला मुख्यमंत्री बन गई। कैबिनेट वग़ैरह के बाद पहली फु़र्सत में इस दलित महिला मुख्यमंत्री ने अपने प्रमुख सचिव से पहला सवाल यही पूछा, ‘कि यह ब्यूरो चीफ़ सूर्य प्रताप कौन है?’ कहा कि, ‘इस का पता करो और इस के अख़बार का पता करो। उस का और कारोबार पता करो और अख़बार मालिक से बात करवाओ।’ प्रमुख सचिव ने ज़रा टालमटोल की तो मुख्यमंत्री ने उसे डपटा और कहा कि, ‘प्राथमिकता के आधार पर!’ फिर प्रमुख सचिव ने सीधे अख़बार के चेयरमैन से बात करवाई मुख्यमंत्री की। मुख्यमंत्री ने चेयरमैन से कहा, ‘कि या तो सूर्य प्रताप को निकाल बाहर करो या फिर अख़बार बंद करने की तैयारी करो।’


‘अख़बार तो हम वैसे ही मैडम बंद करने जा रहे हैं।’ चेयरमैन ने ज़रा हेकड़ी से कहा।


‘तो अपने बाक़ी कारोबार भी उत्तर प्रदेश से समेटने की तैयारी करो!’


‘सॉरी मैडम! सॉरी!’ चेयरमैन की हेकड़ी उतर गई थी, ‘सूर्य प्रताप को निकालता हूं। आज ही निकालता हूं।’


‘होशियार आदमी हो!’ कह कर मुख्यमंत्री ने फ़ोन रख दिया। फिर प्रमुख सचिव से पूछा कि, ‘ये पत्रकार पिछले मुख्यमंत्री के तलवे क्यों इतना चाटते थे?’


‘वही पैसा वगै़रह और तमाम अन्य फ़ायदे। सूचना विभाग से टैक्सी, विवेकाधीन कोष से पैसा। स्कूल वगै़ैरह के नाम पर। ट्रांसफ़र पोस्टिंग, ठेका पट्टा वगै़रह।’


‘यह सब तुरंत प्रभाव से बंद करो!’ मुख्यमंत्री बोली, ‘सूचना निदेशक को तलब करो। और सरकारी फंड से जिस भी किसी पत्रकार को पिछली सरकार में जितना भी पैसा दिया गया है, लिस्ट बनवाओ और अख़बारों में छपवा दो। कोई न छापे तो विज्ञापन बना कर छपवा दो।’


उधर आज़ाद भारत के चेयरमैन ने सी.ई.ओ. से सूर्य प्रताप का तुरंत इस्तीफ़ा लेने को कहा। और कहा कि इस्तीफ़ा न दे तो आज ही बर्खास्त करो उस को।


‘पर सर!’


‘नो इफ़ बट!’ चेयरमैन बोला, ‘एक आदमी के लिए हम अपने ग्रुप को बरबाद नहीं कर सकते। चीफ़ मिनिस्टर ने उस को इशू बना लिया है। किसी पोलिटिशियन ने आज तक मुझ से इस बदतमीज़ी से बात नहीं की! इट्स फ़ाइनल एंड ओ.के.।’


सी.ई.ओ. तब दिल्ली में था। पर मौक़े की नज़ाकत समझी। लखनऊ में जनरल मैनेजर और रेज़ीडेंट एडीटर को सूर्य प्रताप का इस्तीफ़ा फ़ौरन ले लेने के लिए कहा। कहा कि चेयरमैन को रिपोर्ट करना है। चीफ़ मिनिस्टर का कोई इशू है।
सूर्य प्रताप को खोज कर आफ़िस बुलवाया गया। सूर्य प्रताप आज़ाद भारत के आफ़िस आया तो पूरा आफ़िस एक अजीब ख़ामोशी में डूबा हुआ था। एक सन्नाटा सा पसरा पड़ा था। लोग अपनी-अपनी कुर्सियों में ऐसे धंसे बैठे थे गोया किसी कसाइबाड़े में बंधी बकरियां हों, मुर्गि़यां हों। हलाल होने के डर से सकते में चुपचाप पड़ी हों।
सूर्य प्रताप सीधे रेज़ीडेंट एडीटर के कमरे में पहुंचा। रेज़ीडेंट एडीटर ने बड़ी तकलीफ़, बड़ी ख़ामोशी, बड़ी शर्म के साथ सूर्य प्रताप से इस्तीफ़े की बात मुख्तसर में की। कहा कि, ‘नहीं अख़बार बंद हो जाएगा।’
‘अख़बार तो वैसे भी बंद होने जा रहा है। मेरे न रहने से, मेरे इस्तीफ़ा दे देने से इस का बंद होना क्या रुक जाएगा?’ सूर्य प्रताप ने भी सांस खींच कर धीरे से आह भरे अंदाज़ में ही बात कही। दफ्तर की छत निहारते हुए कहा, ‘यह तो नहीं रुकने वाला!’
तब तक एक समाचार संपादक सूर्य प्रताप का इस्तीफ़ा टाइप करवा कर ले आया और सूर्य प्रताप के आगे रखते हुए बोला, ‘सूर्य प्रताप जी प्लीज़!’
‘मैं एक बार चेयरमैन से सीधे बात करना चाहता हूं।’ सूर्य प्रताप ने सांस छोड़ते हुए कहा।
‘कोई फ़ायदा नहीं।’ रेज़ीडेंट एडीटर ने कहा, ‘यह सब चेयरमैन के इंस्ट्रक्शन पर ही हो रहा है।’
‘ओह पर क्यों?’ सूर्य प्रताप बोला, ‘मुझे यह जानने का भी हक़ नहीं है?’
‘चीफ़ मिनिस्टर शायद ख़फ़ा हैं।’ रेज़ीडेंट एडीटर ने कहा।
‘ओह!’ सूर्य प्रताप जैसे अपना तनाव छांटता हुआ बोला, ‘तो इस कुतिया हरामिन के दबाव में मेरे खि़लाफ़ यह साज़िश हो गई?’ उस ने जैसे जोड़ा, ‘जिस अख़बार और मैनेजमेंट में एक पिद्दी भर की चीफ़ मिनिस्टर के आगे तन कर खड़ा होने का हौसला भी न हो उस अख़बार में काम करने का वैसे भी कोई मतलब नहीं है, मेरे जैसे मर्द आदमी के लिए! लाइए दस्तख़त कर देता हूं।’ कह कर सूर्य प्रताप ने टाइप किए हुए इस्तीफ़े पर अपने दस्तख़त कर दिए।
किसी विजयी की तरह वह आज़ाद भारत के दफ्तर से निकला। अकेले। कोई भी उस के साथ बाहर तक नहीं आया। अभिमन्यु बना वह, चक्रव्यूह में धराशायी हुआ वह बाहर आया। स्कूटर स्टार्ट कर उस पर ऐसे बैठ कर चला गोया वह स्कूटर पर नहीं किसी घोड़े पर बैठा हो। राणा प्रताप के चेतक पर। गेट के बाहर आ कर पान की दुकान पर वह रुका। पसंदीदा पान लगवाया। मुंह में डाला। कूंचा और थूकते हुए पान वाले से बोला, ‘पता है आज मैं ने इस्तीफ़ा दे दिया इस रंडी अख़बार से!’
‘का सूर्य प्रताप भइया? का कह रहे हैं?’ पान वाला पान लगाते-लगाते अचकचा गया। उस का हाथ रुक गया। आस-पास के लोग अचकचा गए। चलते-चलते थम गए। बोले, ‘क्या?’
सूर्य प्रताप बोला, ‘और क्या?’ और स्कूटर स्टार्ट कर ये गया, वो गया, निकल गया। वह सीधे घर गया। पत्नी से कहा, ‘चाय बनाओ।’ चाय पीते हुए पत्नी से कहा, ‘आज इस्तीफ़ा दे दिया।’
‘क्या?’ पत्नी भी अचकचा गई।
पर सूर्य प्रताप सो गया।
वह सूर्य प्रताप सो गया जो कभी कहता था, ‘सिंह भी सोता है भला कभी?’ लेकिन सूर्य प्रताप नाम का यह सिंह सो गया था।
ज़मीन से जुड़ा सूर्य प्रताप काफ़ी संघर्ष कर के यहां तक आया था। धुर कछार में पैदा हुआ जिस गांव में सूर्य प्रताप उस गांव में आज भी सुविधाओं की रोशनी नहीं पहुंची। सड़क और बिजली नहीं पहुंची। बाढ़ के दिनों में आज भी नाव ही वहां की सवारी है। पिता आबकारी विभाग में सिपाही थे। पिता के साथ किराए के एक कमरे में रह कर खाना बना कर पढ़ाई करने वाला सूर्य प्रताप उन दिनों क़मीज़ पायजामा पहनता था। क़मीज़ पोयजामे में ही वह स्कूल जाता। दो क़मीज़, एक पायजामा, एक हवाई चप्पल। पैदल ही स्कूल जाना होता। स्कूल भी काफ़ी दूर। बाद में जब वह कालेज मंे आया तो बहुत रो गा कर एक पैंट मिली। यूनिवर्सिटी का समय आया तो दो पैंट हो गईं। इसी बीच उस ने कविता लिखनी शुरू कर दी। लाल सलाम वाली कविताएं। कविताएं लिखते-लिखते वह कब अख़बारों की लत में पड़ गया पता ही नहीं चला। पहले एक साप्ताहिक अख़बार में कुछ दिनों तक काम किया। फिर एक दैनिक में अप्रेंटिस हुआ। अप्रेंटिस के बाद उप संपादक। उन दिनों दैनिक अख़बारों में पी.टी.आई. और यू.एन.आई. जैसी एजेंसियों के तार अंगरेज़ी से हिंदी में अनुवाद करने में ही उप संपादकों का तेल निकल जाता था। रात भर अनुवाद के बाद दिन में यूनिसर्विटी की पढ़ाई फिर कविता का नशा सूर्य प्रताप को थकाता नहीं, जगाता था। तभी से वह कहता फिरता, ‘सिंह भी कभी सोता है भला?’ सूर्य प्रताप की कविताओं में उन दिनों चमक होती और इस चमक से वह ख़ुद भी दमकता रहता। अब उस के हाथ में एक सेकेंड हैंड साइकिल भी थी। और चेहरे पर दाढ़ी। कविता के साथ अब दाढ़ी भी सूर्य प्रताप के नशे में थी। सूर्य प्रताप की कविताओं में विज़न, लय और संघर्ष की महक साफ़ दिख रही थी। सूर्य प्रताप की लिखी ख़बरों की चमक में भी कविता की लाय और विज़न समाया रहता। ख़ास कर स्थानीय ख़बरों की रिपोर्टिंग। जो वह कभी कभार ही करता। वह ख़बरों में से ख़बरें निकाल कर राउंड अप या विश्लेषण लिख देता। उस के इस राउंड अप या विश्लेषण का ताप मूल ख़बरों से कहीं ज़्यादा होता। और बात चर्चा में आ जाती। वह स्थानीय विज्ञप्तियों को भी जब तब रीराइट कर ऐसी फड़कती हेडिंग लगा देता कि वह ख़बर की तरह ज़िंदा हो जाती। साथी पत्रकारों में ख़ास कर अनुवाद की क्लर्की में समाए पत्रकारों में ईर्ष्या उपजनी स्वाभाविक थी। लेकिन सूर्य प्रताप के सामने कोई कुछ नहीं बोलता। पीठ पीछे सब खदबदाते। बात सूर्य प्रताप तक पहुंचती तो वह भड़क जाता। और अनायास ही वह बकबक कर सब की ऐसी तैसी कर देता। सूर्य प्रताप में अब दबंगई का लोहा भी मिलता जा रहा था।
इसी बीच सूर्य प्रताप की शादी हो गई।
सूर्य प्रताप भूल गया कविता, पत्रकारिता। वह पत्नी के प्यार में डूब गया। पत्नी गांव में रहती। हर ह़ते वह गांव भाग जाता। साप्ताहिक छुट्टी के अलावा भी छुट्टी मार देता। डुबकी मार जाता। सुनील ने प्रेमिका के प्यार में पागल होते बहुतों को देखा था। पर पत्नी के प्यार में पागल होते वह सूर्य प्रताप को देख रहा था। सिनेमा के पोस्टरों में हीरोइनों को घूर-घूर देखने वाला सूर्य प्रताप, राह में आती जाती लड़कियों और औरतों को घूर-घूर देखने वाला सूर्य प्रताप न अब पोस्टर की हीरोइनों को देखता न राह में आती जाती लड़कियों और औरतों की नोटिस लेता। नहीं पहले तो साइकिल चलाते-चलाते ख़ूब कस के ब्रेक मार देता और एकटक देखने लगता। पोस्टर हो, लड़की हो या औरत! कविता के बाद उस की यह अदा भी शहर के उस के मित्रों में एक समय चर्चा का सबब थी। पर सूर्य प्रताप से अब यह सब छूट गया था। उन दिनों ज़ीनत अमान सरीखी हीरोइनों की धूम थी। पर सूर्य प्रताप को ज़ीनत अमान बिलकुल बर्दाश्त नहीं थी। वह उसे दो कौड़ी का बताता था। एक दिन सूर्य प्रताप को चिढ़ाने की ग़रज़ से सुनील ने ज़ीनत अमान की एक फ़िल्म का पोस्टर दिखाते हुए बोला, ‘सूर्य प्रताप जी वो देखिए!’ पर सूर्य प्रताप ने नहीं देखा। साइकिल लिए दोनों पैदल ही चल रहे थे। कि तभी दो तीन लड़कियां एक साथ पैदल ही गुज़रीं। उन में एक तो बला की ख़ूबसूरत थी। सुनील ने देखा तो फिर बोला, ‘क्या बात है सूर्य प्रताप जी!’ फिर बल्कि सुनील रुक कर पीछे मुड़ कर भी जाती हुई लड़कियों को देखता रहा। पर सूर्य प्रताप नहीं रुका। सुनील जब लड़कियों को लगभग ‘सी आफ़’ कर के मुड़ा तो सूर्य प्रताप कम से कम पचास मीटर दूर निकल चुका था। सुनील साइकिल चला कर सूर्य प्रताप तक पहुंचा। फिर दोनों एक रेस्टोरेंट में बैठ कर समोसा चाट खाने लगे।
समोसा खाते-खाते सुनील बोला, ‘सूर्य प्रताप जी सब ठीक तो है?’
‘कहां ठीक है?’
‘क्यों क्या हुआ?’ सुनील घबराया।
‘अरे पत्नी गांव में है। मैं यहां हूं।’ सूर्य प्रताप ने अपने मस्त अंदाज़ में आंख मटकाते हुए जैसे जोड़ा, ‘अरे सब कुछ तो हो गया है। और आप पूछ रहे हैं कि क्या हुआ? अरे अब इस के बाद भी कुछ हो सकता है क्या? अब बाक़ी क्या रहा?’
सुनील समझ गया कि सूर्य प्रताप जी तनाव में हैं। तो क्या आदमी पत्नी के प्रेम में भी तनाव के तार छूता है?
सूर्य प्रताप की दशा यही बता रही थी।
एक दिन सुनील ने कहा, ‘सूर्य प्रताप जी भाभी जी को यहां शहर में क्यों नहीं बुला लाते?’
‘मां-बाप की इच्छाएं हैं। उन की इच्छाओं को मार दूं?’
‘क्यों? इस में इच्छाओं की मारने की क्या बात है?’
‘है न!’ सूर्य प्रताप बोला, ‘अभी शादी का जुआठा आप के कंधे पर नहीं पड़ा है आप क्या जानें?’
‘क्यों?’
‘माता-पिता चाहते हैं कि बहू उन के साथ रहे। गांव पर रहे कुछ दिन। नहीं पट्टीदारी के लोग क्या कहेंगे? ताना देंगे वगै़रह-वगै़रह।’
‘ओह!’
‘और फिर अपनी भी मजबूरी है!’
‘वो क्या?’
‘इस डेढ़ सौ रुपल्ली की नौकरी में बीवी को यहां रखूंगा कैसे? खिलाऊंगा क्या? शहर आ कर उस की भी इच्छाएं मचलेंगी।’
‘अभी नहीं मचलतीं क्या?’
‘मचलती हैं भाई। मचलती हैं।’ कह कर सूर्य प्रताप होठ गोल कर, आंखें नचा कर अचानक एक फ़िल्मी गाना गाने लगा, ‘आया-आया अटरिया पे कोई चोर आया/वो भाभी आना ज़रा दीपक जलाना/देखो बलम है या कोई और।’ फिर वह बाक़ायदा गाने का भाषण देने लगा, ‘बैरी बलम हो तो चुप रहूं मैं/दूजा कोई हो मचा दंू मैं शोर आया-आया अटरिया पे कोई चोर!’ फिर वह बुदबुदाया, ‘आप अभी क्या समझेंगे सुनील जी, इस अटरिया का अर्थ! बैरी बलम का सच। वो तो कहती है- दूजा कोई हो मचा दूं मैं शोर!’ वह फिर अपनी दाढ़ी में मानीख़ेज मुसकुराहट फैलाता और आंख मटकाता, ‘घर में छिपाया तो जाएगा पकड़ा/मन में छिपा तो फिर क्या है ज़ोर!’
सूर्य प्रताप के मन में मचे इस शोर और ज़ोर की थाह पाना बहुत आसान नहीं था। इस गाने के शोर में डूबे उस के तनाव को सांघातिक तनाव में तब्दील होते देख सुनील तब सकपका गया था।
यूनिवर्सिटी में एक दिन सूर्य प्रताप और सुनील दोनों ही यों ही टहल रहे थे। लड़कियों के दो तीन झुंड गुज़र गए; सूर्य प्रताप ने उन पर नज़र भी नहीं डाली। तब जब कि एक झुंड में एक लड़की वह भी थी जिस को बस देखने भर के लिए सूर्य प्रताप कुछ भी करने को तैयार था। एक दिन सूर्य प्रताप ने उसे छूने भर के लिए अपनी साइकिल उस से लड़ा कर उस के ऊपर गिर पड़ा था, गिर कर उस के होंठ फूट गए थे। सुनील से रहा नहीं गया। अकबका कर बोला, ‘सूर्य प्रताप जी आप ने देखा नहीं? वो जा रही है?’
‘कौन जा रही है?’ सूर्य प्रताप भी अचकचाया।
‘अरे आप वाली।’
‘ओह सुनील जी!’ वह बोला,‘वो हो चाहे कोई और! अब किसी की ओर देखने का मन नहीं करता।’
‘क्यों?’
‘कोई भी मेरी पत्नी सी सुंदर नहीं। सब फे़ल! सारी हीरोइनें फे़ल। अब किसी की ओर देखने का मन ही नहीं करता। नहीं देखता अब। मत दिखाया कीजिए। ख़ुद देख लिया कीजिए।’ कह कर वह अचानक साइकिल पर बैठा और तेज़-तेज़ साइकिल चलाता सुनील को वहीं छोड़ निकल गया।
साइकिल चलाने की तेज़ी में भी सूर्य प्रताप के पत्नी प्रेम का तनाव सुनील साफ़ देख रहा था।
यह पत्नी प्रेम का तनाव था या प्यार के कुसुम का अनंत! वह राह में खड़े गुलमोहर के पेड़ों पर लदे फूलों से पूछना चाहता था। वह अपने आप से भी पूछ रहा था कि जब उस की शादी होगी तो क्या वह भी अपनी पत्नी से इतना ही प्रेम कर सकेगा?
सूर्य प्रताप ने एक दिन यूनिवर्सिटी में सुनील को पकड़ा और कहने लगा, ‘आज गांव जाना है। ज़रा मेरे घर मेरे साथ चले चलिए। अपनी साइकिल रख कर फिर आप के साथ आप की साइकिल पर बस स्टैंड आऊंगा।’
‘चलिए पर बस तो आप के मुहल्ले के पास से भी हो कर जाती है।’
‘हां, पर आज बस स्टैंड से बस पकड़ेंगे।’ पर घर से वापसी में वह सीधे बस स्टैंड नहीं गया। कहा, ‘ज़रा चलिए बाज़ार कुछ सामान भी ख़रीदना है।’ बाज़ार में वह शर्माते सकुचाते तमाम बोर्ड पढ़ते-टटोलते एक अंडरगारमेंट की दुकान के आगे ठिठक गया। शर्माते हुए वह सुनील से बोला, ‘साइकिल खड़ी कर मेरे साथ ज़रा आइए।’ दुकान में दो तीन औरतें भी थीं। लेकिन दुकानदार ने सूर्य प्रताप और सुनील से पूछा, ‘जी बताइए। क्या चाहिए?’ सूर्य प्रताप ने बिना कुछ बोले दुकानदार से ज़रा रुकने के लिए हाथ से इशारा किया। फिर दुकानदार सुनील की ओर मुड़ा तो सुनील ने भी बिन बोले इशारों से बता दिया कि हम दोनों एक साथ हैं। इस पर दुकानदार बोला, ‘जी अच्छा!’ और जब सभी महिलाएं बारी-बारी दुकान से बाहर चली गईं तो दुकानदार फिर सूर्य प्रताप से मुख़ातिब हुआ, ‘जी बताएं। क्या चाहिए?’
‘ब्रा!’ शर्माते, सकुचाते सूर्य प्रताप धीरे से बोला। उसने जोड़ा, ‘मतलब चोली।’
‘नंबर बताइए।’ दुकानदार भी सूर्य प्रताप की तरह ही शर्माता-सकुचाता धीरे से बोला।
‘नंबर? मतलब?’ सूर्य प्रताप घबराया।
‘ब्रा की साइज़!’ दुकानदार फिर धीरे से बोला।
‘यह तो नहीं मालूम!’ सूर्य प्रताप संकट में पड़ गया।
‘फिर कैसे दे दूं?’ दुकानदार खुसफुसा कर बोला, ‘जाइए नंबर पूछ कर आइए।’
‘पर वह तो गांव में है। यहां शहर में नहीं।’ वह बोला, ‘पर ले जाना बहुत ज़रूरी है। पहली बार कुछ कहा है लाने को।’
‘ठीक है।’ दुकानदार बोला, ‘आप अंदाज़े से बताइए।’
‘पहले तो यह बताइए कि यह नंबर क्या चीज़ है?’ सूर्य प्रताप की भटक थोड़ी खुली।
‘नंबर मतलब कि सीने की चौड़ाई और.....और!’
‘अच्छा-अच्छा! मैं अपने हाथों से बताऊं तो आप समझ लेंगे?’
‘बताइए कोशिश करता हूं।’ दुकानदार ने मदद करने के अंदाज़ में बताया।
फिर सूर्य प्रताप ने अपने हाथों से पत्नी को बाहों में भरने का उपक्रम जैसा कुछ किया। दो तीन बार इस उपक्रम को दुहराया। फिर दुकानदार बोला, ‘बस-बस मैं समझ गया।’
फिर उस साइज की कुछ ब्रा दुकानदार ने दिखाए। सब के दाम बताए। सूर्य प्रताप ने दाम के हिसाब से दो पसंद किए और दुकानदार से पूछा, ‘नंबर गड़बड़ तो नहीं होगा?’
‘आप का बताना अगर ग़लत नहीं होगा तो नंबर भी ग़लत नहीं होगा। निश्चिंत हो कर ले जाइए।’
‘ठीक है नमस्कार!’ शर्माता हुआ सूर्य प्रताप दुकान से बाहर आ गया।
फिर गांव से जब वह लौटा तो एक नई आफ़त ओढ़े। सुनील ने पूछा, ‘सब ठीक तो रहा?’
‘ख़ाक ठीक रहा।’
‘क्या साइज़ गड़बड़ हो गया?’
‘साइज़ तो बिलकुल ठीक निकल गया।’
‘फिर?’
‘यह साइज़ ठीक निकलना ही समस्या बन गया।’ सूर्य प्रताप बोला, ‘पत्नी कहने लगी मैंने नंबर आप को बताया नहीं। फिर भी आप एकदम सही नंबर ले आए। इसका मतलब आप बहुत चालू हैं, बहुत अनुभवी हैं।’
‘ओह!’
‘हां, मैंने बहुत समझाया कि अनुभवी या चालू मैं नहीं, वह साला दुकानदार है। पर वह कुछ सुनने को तैयार नहीं।’
‘चलिए सूर्य प्रताप जी भूल जाइए।’ सुनील बोला, ‘कभी शहर ला कर दुकानदार से मिलवा दीजिएगा। वह समझा देगा। बात ख़त्म हो जाएगी।’
‘देखते हैं।’
इधर बार-बार छुट्टियां लेने के चक्कर में सूर्य प्रताप की पढ़ाई चौपट हो रही थी और नौकरी में भी बवाल बढ़ता जा रहा था। संपादकीय प्रभारी कहता, ‘इतनी छुट्टी लोगे तो अख़बार से छुट्टी हो जाएगी।’ सूर्य प्रताप ने इस सब का हल जल्दी ही निकाला। एक साप्ताहिक अख़बार एक पूंजीपति से निकलवा कर। डेढ़ सौ रुपए की जगह चार सौ रुपए तनख़्वाह हो गई। पचहत्तर रुपए में एक कमरा किराए पर लिया। बिजली नहीं थी घर में। पानी भी नीचे से ले जाना पड़ता। हैंड पंप से। बाथरूम, लैट्रीन भी नीचे था। और कमरा तिमंज़िले पर। हवादार। खुली छत। पत्नी को ले आया। स्टोव और ज़रूरी बर्तन ख़रीद कर गृहस्थी शुरू की। बिस्तर नीचे फ़र्श पर लगा दिया। गाड़ी चल क्या दौड़ निकली। उन्हीं दिनों प्रेसीडेंट एवार्डेड एक फ़िल्म आई थी- मृगतृष्णा। पत्नी को दिखाने ले गया। साथ में सुनील और एक साथी को ले लिया। टैक्स फ्ऱी थी। सो टिकट भी सस्ता था। पत्नी के साथ पहली पिक्चर देख कर सूर्य प्रताप की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। पर यह मृगतृष्णा फ़िल्म सूर्य प्रताप की जिंदगी के लिए मृगतृष्णा होने जा रही थी; इस से वह बेख़बर था। साप्ताहिक अख़बार में वह संपादक था। नए-नए प्रयोग करने लगा। नए-नए लोग जुड़ने लगे। आठ पेज का यह साप्ताहिक टेबलायड अख़बार शुरू-शुरू में सूर्य प्रताप ख़ुद ही पूरा का पूरा लिखता। बाद में उस ने नए-नए लोगों से लिखवाना शुरू किया। सुनील भी तब कविताओं में हाथ साफ़ कर रहा था। सूर्य प्रताप ने समझाया कि, ‘कविता लिखेंगे तो इतनी सी जगह मिलेगी अख़बार में। और लेख लिखेंगे तो इतना सारा स्पेस होगा आप के नाम से। और फिर कविता, अच्छी कविता तो हरदम लिखी नहीं जा सकती। पर लेख तो जब तब लिखा जा सकता है।’ सुनील हिचकिचाया। तो सूर्य प्रताप ने कहा, ‘अरे मैं हूं न!’ शुरुआत परिचर्चाओं से हुई फिर लोकल रिपोर्टिंग। नाटक समीक्षा, फिर टिप्पणियां, लेख और एक सिलसिला सा चल पड़ा। सुनील कब पत्रकार बन गया पता ही नहीं चला। फिर सुनील ही क्यों? सुनील जैसे और भी कई युवा सूर्य प्रताप की टीम के स्थाई लेखक बन गए। सूर्य प्रताप अब अख़बार का लीड लेख और संपादकीय भर लिखता। बाक़ी लिखने वालों का तांता लग गया। सूर्य प्रताप का काम हलका हो गया। अब सूर्य प्रताप ने डैने फैलाए। रविवार, दिनमान, संडे और बाक़ी अख़बारों में लिखने लगा। सुनील जैसे मित्रों को भी बाहर लेख रिपोर्ट भेजने के लिए वह उकसाता। उन्हीं दिनों सूर्य प्रताप को आकाशवाणी के एक संवाददाता मिल गए। प्रेस इनफ़ार्मेशन ब्यूरो वाले थे। उन्हें सूर्य प्रताप में प्रतिभा और संभावना दोनों दिखीं। उन्हों ने कहा कि, ‘यह फुटकर पत्रकारिता बंद करो और दिल्ली में मास कम्युनिकेशन जा कर विधिवत मीडिया की पढ़ाई करो फिर क़ायदे की पत्रकारिता करो।’ सूर्य प्रताप की समझ में बात आ गई। मास कम्युनिकेशन में एडमीशन के इम्तहान का फ़ार्म भरा और तैयारियों में जुट गया। एडमिशन लिस्ट में नाम आ गया। अब समस्या आई एडमिशन के ख़र्चे की। दिल्ली में रहने खाने की। कुछ इधर उधर से, कुछ बचत से सूर्य प्रताप ने शुरुआती ख़र्चा निकाला और बोला, ‘आगे की आगे देखेंगे।’ कूच कर गया दिल्ली।
बीच पढ़ाई में लखनऊ से अमृत प्रभात निकला तो सूर्य प्रताप अमृत प्रभात आ गया। छुट्टी ले-ले कर मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई पूरी की। फिर डिग्री ले कर बाक़ायदा लखनऊ आ गया। उन्हीं दिनों सुनील एक बार सूर्य प्रताप से मिलने लखनऊ आया। हज़रतगंज घूमते रेलवे के डी.आर.एम. दफ्तर की ओर से पान कूचते, थूकते, दाढ़ी नोचते वह सुनील के साथ पैदल ही निकला। सड़क की पटरी पर मैक्सी बिक रही थीं। लाइन से। सूर्य प्रताप बड़े रश्क से मैक्सी देखते हुए बोला, ‘क्या बताऊं बीवी जो साथ होती तो दो ठो मैक्सी ख़रीदता!’
‘वैसे भी ख़रीद लेने में नुकसान क्या है?’
‘अरे बिना नाप के?’ सूर्य प्रताप हंसते हुए आंख मटकाते हुए बोला, ‘अरे अब फिर नहीं। कभी नहीं।’ फिर वह गाना गाने लगा, ‘हम तुम्हें चाहते हैं ऐसे/मरने वाला कोई/जिंदगी चाहता हो जैसे।’
फिर सूर्य प्रताप दिल्ली के एक नामी अख़बार का लखनऊ में संवाददाता हो गया। इस अख़बार ने सूर्य प्रताप को एक नई पहचान दी। सूर्य प्रताप की ख़बरों को तेवर, शऊर और ग़ुरूर दिया। सूर्य प्रताप यही तो चाहता था। अब लखनऊ की रिपोर्टिंग सूर्य प्रताप के नाम के बिना अधूरी थी। एक से एक नायाब ख़बरें लिख कर सूर्य प्रताप ने कीर्तिमान क़ायम किया। पर होली के मौके़ पर शराब की एक घटना ने सूर्य प्रताप को जो धक्का दिया उस ने सूर्य प्रताप के बढ़ते कैरियर को पिच पर ही कैच कर लिया। फिर उस की जिंदगी में भइया और मनमोहन कमल जैसे लोग आ गए। एक निर्दोष, मासूम आदमी, एक कवि, एक जुझारू और संघर्षशील पत्रकार को इन लोगों ने अपने हितों के लिए दलाल बना दिया। दलाल पत्रकार का ठप्पा लगा दिया। सूर्य प्रताप के जुझारू तेवर को अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए कुछ राजनीतिज्ञों ने भी साधा। सुविधाओं और शराब की चाशनी में पग कर एक जुझारू पत्रकार जो सिर्फ़ ख़बरों के लिए जीता था, ख़बरों के लिए मरता था, उस का पतन हो गया।
तो होली के दिन शाम को एक साथी पत्रकार के साथ पी पा कर हुड़दंग मचाते सूर्य प्रताप हज़रतगंज चौराहे से गुज़रा। एक दारोग़ा को देख कर मज़ाक में उसे ‘का हो मामा’ कह कर चिढ़ा दिया। दारोग़ा ने कुछ कहा तो उसे गरिया दिया। गाली देते ही स्कूटर रिज़र्व में आ कर बंद हो गई। अब दारोग़ा ने दौड़ा कर दोनों को पकड़ लिया। दो-दो हाथ लगाए दोनों को। दोनों पत्रकारों ने प्रतिरोध किया। कहा कि, ‘मारो मत। कुछ ग़लत किया है तो थाने में ले चल कर बंद कर दो।’ दारोग़ा दोनों को थाने ले आया। थाने के बाहर ही एस.पी. सिटी दिख गया। अब सूर्य प्रताप और साथी पत्रकार एस.पी. सिटी को देखते ही दारोग़ा पर हमलावर हो गए। उस को तबीयत भर पीटा। एस.पी. सिटी से शिकायत की। एस.एस.पी. से शिकायत कर पत्रकारों से अभद्रता के आरोप में उसे सस्पेंड करवा दिया।
सस्पेंडेंड दारोग़ा से सूर्य प्रताप का एक विरोधी पत्रकार मिला। और उसे समझा बुझा कर दिल्ली भेज दिया अख़बार के संपादक के पास। संपादक सूर्य प्रताप को मानते बहुत थे पर गांधीवादी विचारों और प्रवृत्ति वाले संपादक सूर्य प्रताप की ऐसी शिकायत सुन कर भड़क गए। उन्हों ने सूर्य प्रताप के पेंच कसने शुरू किए। पेंच कसते-कसते सूर्य प्रताप का तबादला मुंबई कर दिया। सूर्य प्रताप मुंबई गया पर मंबई रास नहीं आई। वह लौट-लौट लखनऊ आता। पर बाक़ायदा लौट नहीं पाता। उन्हीं दिनों मनमोहन कमल दिल्ली के साप्ताहिक अख़बार में संपादक हुए तो सूर्य प्रताप उस अख़बार का लखनऊ ब्यूरो चीफ़ बन कर लौटा। टूटे हुए सूर्य प्रताप को मनमोहन कमल ने दलाली का स्वाद चखा दिया। सूर्य प्रताप को भी लगा कि अब संघर्ष में कुछ नहीं है। सुनील जैसे लोग जब तब सूर्य प्रताप को टोकते तो वह कहता, ‘अब क्या करें। इन्हीं सालों को ज़माना आ गया है।’ वह अपने सरकारी घर की फ़र्श दिखाता और जैसे जोड़ता, ‘अरे भाई कछार के कीचड़ से इस पक्के तक आए हैं तो क्या मु़त में आए हैं? अरे बड़ी मेहनत की है। अब थोड़ा मज़ा भी ले लें। नहीं यह सब साले कोई साथ नहीं आएंगे। न वे आदर्शवादी, न ये दलाल! अपना किया ही अपने साथ जाएगा।’
दिल्ली का वह साप्ताहिक अख़बार भी असमय बंद हो गया तो सूर्य प्रताप भइया के हाथ आ गया। उन के अख़बार में काम करते हुए उन का औज़ार बना। फिर आज़ाद भारत। और अब यहां से भी छुट्टी!
आज़ाद भारत से छुट्टी के बाद कोई अख़बार सूर्य प्रताप को नौकरी देने को तैयार नहीं हुआ। भइया भी नहीं। कहने लगे, ‘यह मुख्यमंत्री तो तुम से बेहद नाराज़ है। तुम्हें नौकरी दे कर कौन अपनी शामत बुलवाएगा?’
‘पर भइया उस को गरियाने के लिए तो आप ही ने पिला कर भेजा था।’
‘भेजा तो था। पर क्या पता था कि वह मुख्यमंत्री बन जाएगी? और तुम से इतना नाराज़ हो जाएगी?’
‘तो क्या करें?’ सूर्य प्रताप ने टूट कर पूछा।
‘इंतज़ार!’
‘कब तक?’
‘जब तक यह मुख्यमंत्री है तब तक। या जब तक इस का गुस्सा न शांत हो जाए तब तक!’
‘बड़े मर्द बनते थे आप तो!’ सूर्य प्रताप बोला, ‘अरे तब तक तो गोमती का पानी भी सूख जाएगा।’
‘ऐसे थोड़े सूख जाएगा!’ भइया हंसते हुए, सूर्य प्रताप को टालते हुए बोले।
‘क्यों? जब लखनऊ नामर्दों से ठसाठस भर जाएगा तो गोमती तो  त्राहिमाम कर ही बैठेगी।’
‘सूर्य प्रताप तुम ज़्यादा बोल रहे हो। बहुत ज़्यादा फ्रस्ट्रेट हो तुम। जाओ अभी यहां से!’ भइया ने सूर्य प्रताप को झिड़कते हुए कहा।
सूर्य प्रताप को एक अधिकारी ने बताया कि, ‘मुख्यमंत्री ने अभी तुम्हारी नौकरी ली है, अब सरकारी मकान की बारी है।’
‘यह तुम सूचना दे रहे हो या धमकी?’
‘सूचना। सिर्फ़ सूचना!’
‘तो यह सूचना भी देने के लिए आप से तुम पर आना ज़रूरी था?’ सूर्य प्रताप ने तरेर कर पूछा।
‘ओह सॉरी!’
‘फिर भी थैंक्यू!’
सूर्य प्रताप की चिंताएं अब चिता बन रही थीं। साथ देने, साथ खड़े होने को अब कोई तैयार नहीं था। तमाम मशवरा, माथा पच्ची और टोह लेने के बाद एक ठिकाना मिला। एक साप्ताहिक टेबलायड जो एक आदमी लगभग स्वांतः सुखाय निकालता था, और उस की आड़ में छोटी मोटी ठेकेदारी और रंगदारी भी करता था, बड़ी बात यह थी कि सूचना विभाग से कुछ सालों से मान्यता प्राप्त अख़बार था। सूर्य प्रताप को सरकारी घर बचाने भर के लिए काफ़ी था। सूर्य प्रताप ने यहां से बाक़ायदा नियुक्ति पत्र लिया। प्रधान संपादक का। प्र्रिंट लाइन पर बतौर प्रधान संपादक अपना नाम छापा। इस नई नियुक्ति की लिखित सूचना राज्य संपत्ति विभाग और सूचना विभाग में रिसीव करवाई। मकान की चिंता से छुट्टी ली। बदले में अख़बार की छपाई और काग़ज़ का ख़र्चा छोड़ कर उसे स्तरीय बनाने का ज़िम्मा सूर्य प्रताप ने ले लिया। सब कुछ मु़त में। बस प्रिंट लाइन पर नाम जाता रहे। कुछ फुटकर विज्ञापन की व्यवस्था भी वह करवा देता। यह एक नया संघर्ष था सूर्य प्रताप का। लग रहा था गोया पत्रकारिता की शुरुआत वह फिर से कर रहा हो, जिंदगी की शुरुआत फिर से कर रहा हो। पर जिंदगी चल रही थी। और बाहर के लोगों की नज़र में शानदार चल रही थी। पर सूर्य प्रताप के भीतर ही भीतर कितनी टूट-फूट चल रही थी, कोई नहीं जानता था।
पत्नी भी नहीं।
यह सिर्फ़ बेरोज़गारी की टूट-फूट नहीं थी। यह सिर्फ़ अकेलेपन की टूट-फूट नहीं थी। सूर्य प्रताप के सीने के अंदर जाने कितने शीशे टूट रहे थे, इन शीशों की किरिचें टूट रही थीं। मृगतृष्णा की रेत भी इन में मिल गई थी। वह अब एक पुरानी फ़िल्मी ग़ज़ल गुनगुनाता, ‘सीने में जलन आंखों में तूफ़ान सा क्यूं है/इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूं है।’ डिंपल कपाडिया उस की पसंदीदा हीरोइन थी। वह कहता, ‘जब हमारी डिंपल की वापसी हो सकती है तो सुनील जी हमारी क्यों नहीं हो सकती। अरे हमारी भी होगी। फिर वह गाने लगता, ‘सागर जैसी आंखों वाली ये तो बता तेरा नाम है क्या?’ वह आंख मटकाते हुए कहता, ‘होगा कहीं कोई मेरा भी सिप्पी, मेरा भी मेहरा।’ और गाने लगता, ‘कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन!’
और रोने लगता।
उधर भी घटना चक्र तेज़ी से घट रहा था।
दलित महिला मुख्यमंत्री ने पूर्व मुख्यमंत्री के कार्यकाल में विवेकाधीन कोष से पत्रकारों को दिए गए पैसों की सूची आज़ाद भारत में छपवा दी। विस्तार से। जिस ने इलाज आदि के नाम पर एक हज़ार लिया था, उसका भी नाम था और जिस ने दस लाख रुपए लिया था, उस का भी नाम था। एक से एक स्वनामधन्य नाम सामने आ गए थे। लखनऊ से दिल्ली तक के। सब के चेहरों से परदा उठ गया था। किसिम-किसिम की बहस हो रही थी। तिस पर तुर्रा यह कि पूर्व मुख्यमंत्री बड़ी बेशरमी से कह रहे थे कि, ‘सत्ता में आऊंगा तो फिर पत्रकारों को पैसा दूंगा।’ अजीब छिंछालेदर थी। पर न शर्म थी, न हया। इधर भी और उधर भी।
इधर एग्रो कंपनी ने आज़ाद भारत को अंततः ख़रीद लिया। निर्विघ्न! कुछ दिन के लिए आफ़िस, मशीन वहीं रहा। किराए पर। मैनेजमेंट ने फिर भी एक प्रस्ताव रखा कि जो चाहे कंपनी से फ़ाइनल सेटिलमेंट कर ले, जो चाहे अपनी सेवाएं नई कंपनी में ट्रांसफ़र करवा ले। कुछ इक्के दुक्के ही दूर दृष्टि वाले थे जिन्हों ने सेटिलमेंट ले लिया। ज़्यादातर ने नई कंपनी में अपनी सेवाएं ट्रांसफ़र करवाईं। क्यों कि नौकरी का टोटा था। तीन-तीन बंद हुए हिंदी अख़बारों से बेरोज़गारों की फ़ौज टहल रही थी। कहीं कोई नौकरी नहीं थी। पुराने लोगों के लिए तो क़तई नहीं। थोड़े दिनों में दफ्तर नई बिल्डिंग में शि़ट हो गया। पर मनमोहन कमल की वह शान, वह ऱतार नहीं रह गई। और बड़ी जल्दी ही अख़बार के नए मालिक को उन की तनख़्वाह का बोझ कंपनी के बर्दाश्त के बाहर लगने लगा। सो सब से पहले मनमोहन कमल की छींछालेदर शुरू हुई। उन के भत्ते और अनाप शनाप ख़र्चे रोक दिए गए। उन्हों ने दबी ज़बान अपनी पी.ए. से पूछताछ करवाई तो फिर उन्हीं को शिट कर दिया गया। अब दिल्ली से कम पैसों में एक नया संपादक आ गया। अख़बार का स्तर तो उस ने बहुत नहीं गिरने दिया पर नए मालिकों की कई मूर्खताएं उस की बर्दाश्त से बाहर हो गईं। फिर प्रबंधन को लगने लगा कि यह संपादक भी महंगा है। सो उस के भी भत्तों में कटौती हो गई। यह नया संपादक कुछ महीनों में ख़ुद ही चलता बना। अब कंपनी को पुराना स्टाफ़ भी भारी लगने लगा। अब इन को हटाने के लिए बाक़ायदा एक गुंडे को रेज़ीडेंट एडीटर बना दिया गया। इन्हीं दिनों सूर्य प्रताप भी इस अख़बार में नौकरी मांगने आ गया। राजनीतिक परिस्थतियां फिर बदल गई थीं। वह दलित महिला मुख्यमंत्री नहीं रह गई थी। सो सूर्य प्रताप ने कहा, ‘अब तो कोई दिक्क़त भी नहीं है।’
पर अख़बार का नया मालिक जो सूर्य प्रताप का पुराना मित्र भी था, सूर्य प्रताप को वह शराब पिलाता था, सूर्य प्रताप की मिज़ाज़पुर्सी में लगा रहता था छोटे मोटे कामों के लिए, अब की सूर्य प्रताप से ठीक से पेश नहीं आया। पूरा का पूरा इंपलायर बन गया। सूर्य प्रताप ने मित्रवत बात शुरू की पर वह बॉस की तरह बात करने लगा। सूर्य प्रताप ने बरदाश्त किया यह भी। तो भी उस ने सूर्य प्रताप को लखनऊ में रखने से इंकार करते हुए सूर्य प्रताप को उस के गृह नगर में बतौर स्ट्रिंगर काम करने का प्रस्ताव रखा। वह भी कमीशन बेस्ड विज्ञापन के लिए। कहा कि, ‘लेकिन आप की प्रतिष्ठा को देखते हुए आप की पोस्ट ब्यूरो चीफ़ की ही रहेगी।’
सूर्य प्रताप यह प्रस्ताव सुन कर सौ बार मर गया। पर फिर भी हां कर दी। अपने गृह नगर में जा कर कमीशन पर विज्ञापन का काम करने लगा। सूर्य प्रताप के पास अब आंसू बहुत थे। पर कोई पोंछने वाला नहीं था। बीवी बच्चों के सामने भी वह नहीं रोता। पर अकेले में सिसक-सिसक कर रोता। कहता, ‘बताइए हमारे सामने ही एस.डी.एम. कमिश्नर हो गए। डी.एम. चीफ़ सेक्रेट्री हो गया। एस.एस.पी. डी.जी.पी. हो गया। और हम ब्यूरो चीफ़ से स्ट्रिंगर हो गए। स्टार रिपोर्टर थे, हीरो थे ज़ीरो से भी बदतर हो गए। कि अब कोई नौकरी देने को तैयार नहीं।’
इधर आज़ाद भारत में सब की तनख़्वाह में भारी कटौती हो गई। ख़ास कर पुराने लोगों की। जो विरोध करता, गुंडा संपादक या तो ख़ुद पीट देता या अपने गुर्गों से पिटवा देता। अब धरना प्रदर्शन की नौबत आ गई। कर्मचारियों का ख़ून खौलने लगा। लखन की हारमोनियम निकल आई। नारे निकल आए। इंक़लाब जिंदाबाद, मैनेजमेंट मुर्दाबाद होने लगा। माइक पर भाषण होने लगा। इस सारी उहापोह में प्रशासन मैनेजमेंट के साथ दिखा। डी.एम. से ले कर डी.एल.सी. तक प्रकारांतर से मैनेजमेंट के पक्ष में खड़े दिखे। प्रशासन मदद नहीं कर रहा था, और दफ्तर में संपादक की गुंडई अपने पूरे शबाब पर थी। ऐसे में दो महिला पत्रकार अप्रत्याशित रूप से सामने आ गईं। कर्मचारियों के साथ कंधा से कंधा मिलाने। ख़ास कर मिसेज़ गर्ग। मिसेज़ गर्ग डेस्क पर थीं। संपादकीय के साथियों को ख़ूब खिलाने पिलाने के लिए मशहूर। अकसर वह नई-नई डिशेज़ बना कर लातीं और सब को शौक़ से खिलातीं। पूछ-पूछ कर। यहां धरना देने वालों के साथ वह भी धरने पर बैठीं। सब को खिलाती-पिलाती जोश भरती रहतीं। देखा-देखी और महिला कर्मचारी भी धरने में शरीक हो गईं। महिलाओं की वजह से संपादक की गुंडई थोड़ी ठिठकी। पर एक दिन रात में धरना देने वालों को मार पीट कर उन का तख़ता तंबू सब उखाड़ कर संपादक और उस के गुर्गों ने फेंक दिया। यह संपादक बाक़ायदा क्रिमिनल था। हत्या के चार मुक़दमे उस पर लंबित थे। ठेकेदारी करता था। मैनेजमेंट ने उसे सिर्फ़ इस लिए संपादक बना दिया था कि वह पुराने कर्मचारियों को अपनी गुंडई से बाहर कर दे। ख़ैर, दूसरे दिन कर्मचारी पहुंचे थाने पर। उन की एफ़.आई.आर. नहीं लिखी गई। लेकिन तख़ता तंबू फिर लग गया। धरना देने वाले फिर बैठ गए। उत्तेजक भाषण हुए, नारेबाज़ी हुई फिर गाना बजाना शुरू हो गया। कुछ कर्मचारी ‘हम होंगे कामयाब एक दिन/हो हो मन में है विश्वास/हम होंगे कामयाब!’ गा रहे थे। लखन हारमोनियम बजा रहा था और चौहान ढोलक। बाक़ी सब तालियां। कि तभी संपादक अपने गुंडों की एक टुकड़ी के साथ आया। किसी के हाथ में हाकी थी, किसी के हाथ में चेन। संपादक ख़ुद हाथ में रिवाल्वर लिए लहरा रहा था। पर कोई डरा नहीं। गाना और तेज़ हो गया। कि तभी संपादक तमतमा गया। अपने गुर्गों को ललकार कर कर्मचारियों पर हमला बोल दिया। गुंडों ने कर्मचारियों को हाकी और चेन से मारना शुरू किया। कर्मचारी भी भिड़ गए। गुत्थमगुत्था हो गए अपनी ताकत भर। संपादक ने एक हवाई फ़ायर किया। सभी दहशत में आ गए। संपादक धरना मंच पर आ गया। लखन को एक लात मारी। वह लुढ़क गया। फिर उस के हारमोनियम पर वह टूट पड़ा। बोला, ‘ई पिपिहिरी बजा-बजा के नींद हराम कर दी है सालों ने। हारमोनियम को दो लात मार कर उसने मंच से उठा कर नीचे फेंक दिया। हारमोनियम टूट गया। कई-कई टुकड़ों में। लखन मंच से दौड़ा चिल्लाते हुए, ‘अरे इसे भी तोड़ दिया!’ वह अभी मंच से नीचे आता ही कि एक गुंडे ने उस के पैरों पर तड़ातड़ हाकी चला दी। हारमोनियम तो उस का टूटा ही, पैर भी टूट गया। फिर एक दूसरा गुंडा टूटी हुई हारमोनियम पर भी हाकी बजा बजा कर टुकड़े-टुकड़े कर उस पर पिच्च से थूक दिया। चौहान की ढोलक फोड़ दी। जो पिट गए थे, वहीं कराहते हुए पड़े थे। बाक़ी कर्मचारी सिर पर पैर रख कर भागे। अब की कर्मचारी डरे हुए भी थे और आक्रोश से भी मुट्ठी सब की भिंची हुई थी। दांत सब के किचकिचा रहे थे। पर हाथ किसी भी का तना हुआ नहीं था।
ख़ैर, अब कुछ और अख़बारों के लोग साथ आए। कुछ कर्मचारी यूनियनें आईं। मातमपुर्सी के लिए। अब की कर्मचारी थाने नहीं, डी.एम. के पास गए। डी.एम. के हस्तक्षेप पर एफ़.आई.आर. लिखी गई। लेकिन अज्ञात लोगों के खि़लाफ़। लाख कहने पर भी किसी को नामज़द नहीं किया पुलिस ने। उधर मैनेजमेंट ने भी कर्मचारियों के खि़लाफ़ एफ़.आई.आर. लिखवा दी। इस जवाबी क़व्वाली में अंततः मैनेजमेेंट की जीत हुई। कर्मचारी बंट गए। रातों रात एक नई यूनियन बन गई। नई यूनियन ने मैनेजमेंट के साथ समझौता कर लिया। धरना, प्रदर्शन, हड़ताल सब कुछ ख़त्म हो गया। दर्जन भर लोग बर्खास्त हो गए। बाक़ी बचे लोग दुम दबा कर काम पर लौट गए।
कुछ दिन बाद एक से इस्तीफ़ा मांगा गया। फिर दूसरे से, तीसरे से। और जो नहीं दे उसे अपमानित कर-कर के इस्तीफ़ा ले लिया गया। सब लोग यहां अब बायोडाटा ले कर घूम रहे थे। नई नौकरी के लिए। कुछ लोग मैनेजमेंट के पिट्ठू बने मौज कर रहे थे। अख़बार बाज़ार में पिट चुका था। न ख़बर थी, न ले आऊट। बस सरकारी विज्ञापन। लोग कहते, ‘सोने के अंडे देने वाली मुर्गी मार दी आजाद भारत के नए मालिक ने।’
नई यूनियन के अध्यक्ष वशिष्ठ से एक दिन सुनील ने पूछा, ‘तुमने ऐसा क्यों किया?’
‘क्या करें यार नौकरी करनी थी!’
‘अच्छा तुम्हारी नौकरी, नौकरी है और बाक़ी की नौकरी, नौकरी नहीं है?’
‘है तो!’ वह बोला, ‘पर पहले अपनी बचानी थी।’
‘तो ऐसे तो तुम जान लो कि तुम्हारी नौकरी भी नहीं बचने वाली।’
‘यह तुम श्राप दे रहे हो? या भविष्यवाणी कर रहे हो?’
‘न श्राप, न भविष्यवाणी!’ सुनील बोला, ‘वस्तु स्थिति बता रहा हूं।’
और सचमुच कुछ महीनों में ही वशिष्ठ को भी चलता कर दिया गया। बीस बाइस साल की उस की नौकरी थी, पर उसे ग्रेच्युटी भी नहीं दी गई। धोबी के कुत्ते सरीखी हालत हो गई उस की। और वशिष्ठ ही क्यों तीस-तीस साल की नौकरी के बाद रिटायर हो रहे लोगों को भी ग्रेच्युटी या अन्य फं़ड वगै़रह नहीं दिए गए। पिट्ठुओं को भी नहीं। कुछ ने मुक़दमा किया। पर कुछ नहीं हुआ सिवाय तारीख़ों के। लखन, चौहान जैसे तमाम लोग पहले ही बाहर किए जा चुके थे। कुछ पुराने लोगों से इस्तीफ़ा ले कर उन्हें फिर से रख लिया गया। आलम यह हुआ कि बाहर चैनलों या अख़बारों में भले कोई पत्रकार एक करोड़ या डेढ़ करोड़ रुपए के सालाना पैकेज पर काम कर रहे हों पर आज़ाद भारत अख़बार में जो लोग बीस साल पहले पांच हजार रुपए महीने की नौकरी करते थे, बीस साल बाद भी पांच हज़ार की नौकरी करने को अभिशप्त हैं।
इस बीच बहुत सारे बदलाव हुए अख़बारों में भी, समाज में भी।
दिल्ली का एक बड़ा ग्रुप अपने हिंदी अंगरेज़ी अख़बार यहां से छापने लगा। वह समाजवादी मुख्यमंत्री केंद्र की मिली जुली सरकार में रक्षामंत्री हो गए। उन के कहे से दिल्ली से आए बड़े ग्रुप के अख़बार में सूर्य प्रताप को नौकरी मिल गई। पर डिमोशन के साथ। जो कभी आज़ाद भारत में सूर्य प्रताप के साथ जूनियर रिपोर्टर था, वह यहां ब्यूरो चीफ़ था और सूर्य प्रताप उस का प्रमुख संवाददाता। यह रेज़ीडेंट एडीटर की सूर्य प्रताप को काटने की चाल थी। सोचा कि इस से सूर्य प्रताप भड़क जाएगा और ज्वाइन नहीं करेगा। पर सूर्य प्रताप ने हथियार डालते हुए कहा, ‘मैं तो अप्रेंटिसशिप के लिए भी तैयार था भाई। वह कह कर तो देखता! अरे सड़क पर टहलने से तो अच्छा ही है नौकरी करना। नहीं कौन पूछता है भला?’
सचमुच।
इस बीच अख़बारों और चैनलों में अजब अफ़रा-तफ़री मची हुई थी। बिल्डर, माफ़िया और चिट फं़ड कंपनियों के लोग भी अख़बार और चैनल खोल रहे थे। मीडिया को वह अपना नया कुडंल और कवच बना रहे थे। लायज़निंग का प्लेटफ़ार्म बना रहे थे। और इन चैनलों-अख़बारों में मेधावी, जीनियस और स्टार टाइप के पत्रकार काम करने लगे थे। अख़बारों से कुछ क़ौमें ग़ायब हो रही थीं। कंपोज़ीटर, प्रूफ रीडर, पेस्टर ग़ायब अब भले हुए हों पर उन की उपयोगिता पर प्रश्न और छंटनी तभी शुरू हो गई थी। उन्हीं दिनों एक चिट फंड कंपनी के अख़बार में मनमोहन कमल फिर प्रधान संपादक हो गए। अपनी पुरानी रवायत के मुताबिक़ अख़बार भी अच्छा निकला और महिलाएं भी अच्छी रखीं। इस बीच वह दूसरी पत्नी के बच्चे के पिता भी बने। उन की पहली पत्नी का निधन हुआ। पर नए अख़बार के मैनेजमेंट से उन की बहुत नहीं बनी। कि तभी चिट फं़ड कंपनियों के भागने, गिऱतारी आदि का सिलसिला शुरू हुआ। इस अख़बार के मालिक को मनमोहन कमल ने बचाने का ठेका लिया। और साहिल नाम के एक रिपोर्टर को लगाया। जिसे वह आज़ाद भारत से लाए थे। साहिल की ख़ासियत थी कि वह कश्मीरी था और तोता चश्म भी। संपादकों से नज़दीकी बना लेना, उन का ख़ास बन जाना, और फिर अपना उल्लू साधना उस का पुराना शग़ल था। मुस्लिम होने के बावजूद उस ने आज़ाद भारत में भाजपाई संपादक को भी साध रखा था। मनमोहन कमल आए तो उन को भी साधा। और यहां चिट फं़ड कंपनी में वह मनमोहन कमल का सब से ख़ास हो गया। तो उस चिट फं़ड कंपनी वाले ने अपने बचाव के नाम पर मनमोहन कमल और साहिल के पास नंबर दो वाले पैसे भी सौंप दिए। कि वक्त ज़रूरत काम आए। पर मनमोहन कमल और साहिल के लाख प्रयास के बावजूद चिट फं़ड कंपनी का मालिक पहले तो फ़रार हुआ फिर गिऱतार हुआ। कोई बचा नहीं पाया। फिर दो नंबर के पैसे को ले कर मनमोहन कमल और साहिल में जो तू-तू मैं-मैं सार्वजनिक रूप से हुई वह शालीनता की सारी सीमाएं लांघ गई।
मनमोहन कमल ऐसे अपमानित होंगे साहिल के हाथों, किसी ने सोचा भी नहीं था।
यह अख़बार भी बंद हो गया।
पर सूर्य प्रताप ने कभी इस अख़बार की ओर रुख़ नहीं किया। वह कहता, ‘बताइए, कमल जी नेता जी के लिए कहते हैं कि हमारे दोस्त हैं।’ नेता जी मतलब पूर्व मुख्यमंत्री और फिर रक्षा मंत्री। वह कहता, ‘और नेता जी कहते हैं कमल जी के लिए कि कुत्ता है।’ फिर वह पूछता, ‘बताइए अब मैं क्या करूं?’
उधर आज़ाद भारत के तथा उस के सहयोगी अंगरेज़ी अख़बार के ढेर सारे कर्मचारी सड़क पर थे। धीरे-धीरे कोई साढ़े तीन सौ लोग। सहयोगी अंगरेज़ी अख़बार के लोगों को तो पिछली कंपनी ने ग्रेच्युटी वगै़रह दे कर फ़ाइनल सेटिलमेंट कर दिया था। और अख़बार बंद करने के बजाय मित्रा को ही सौंप दिया था कि चलाना हो चलाएं बंद करना हो बंद कर दें। पर मित्रा ने नई कंपनी बना कर अख़बार को जैसे तैसे चलाया और पैसा भी बनाया। इस अख़बार के दम पर ही वह राज्यसभा में भी चले गए। पर जो साढ़े तीन सौ लोग सड़क पर आ गए थे वह लोग किस सभा में जाएं? समझ नहीं पाते थे। हालत यह हो गई कि लोग पुराने दफ्तर के गेट पर आ कर रोज़ बारी-बारी आ कर बैठने लगे। बिना ड्यूटी के ड्यूटी करने लगे। पूछने पर कहते, ‘आखि़र क्या करें?’ एक दिन सूर्य प्रताप वहां से गुज़रा तो लखन दिख गया। लखन ने सूर्य प्रताप को देखते ही बड़ी ज़ोर से नारा लगाया, ‘जय हिंद! अरे सूर्य प्रताप जी जय हिंद!’ सूर्य प्रताप ने स्कूटर रोक दी। मुड़ कर वापस आया। जितने साथी वहां इकट्ठे थे सब को चाय पिलाई, पान खिलाया। चलते-चलते लखन के कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा, ‘और क्या हो रहा है?’
‘कुछ नहीं बस ड्यूटी चल रही है!’
‘अरे कहां?’ सूर्य प्रताप ख़ुश होते हुए उछल कर बोला।
‘यहीं इसी गेट पर!’ लखन धीरे से बोला।
‘ओह!’ सूर्य प्रताप जैसे ज़मीन पर आ गया।
‘अब धरना तो हो नहीं सकता यहां। गाना भी नहीं गा सकता-होंगे कामयाब वाला!’
‘वो क्यों?’
‘हारमोनियम टूट गई न?’
‘ओह हां! सुना था।’ सूर्य प्रताप उदास हो कर बोला।
‘हमारी हारमोनियम के हज़ारों टुकड़े कर दिए कमीनों ने।’ लखन सूर्य प्रताप के कंधों पर झुक कर फफक पड़ा। बोला, ‘हम को पता पड़ गया है। सब पता पड़ गया है। हम सभी को।’
‘क्या?’
‘ये हरामी मनमोहन कमल के चलते यह सब हो गया।’
‘क्या?’
‘आप तो ऐसे बोल रहे हैं जैसे कुछ जानते ही नहीं?’ वह बोला, ‘एक करोड़ रुपए चांप गया तो मालिक नाराज़ हो गया-बोला, अख़बार बंद करो। हम सब को पता चल गया।’
‘अच्छा-अच्छा!’
‘क्या सूर्य प्रताप भइया आप भी तो हिस्सेदार रहे हैं।’ लखन के बगल में खड़ा शकील बोला, ‘साझीदार रहे हैं। और अच्छा-अच्छा ऐसे बोले रहे हैं कि कुछ जानते ही नहीं।’
‘साझीदार तो नहीं हिस्सेदार तो नहीं रहा पैसे रुपए के मामले में। पर हां, एक पाप मुझ से ज़रूर हुआ।’ सूर्य प्रताप हाथ जोड़ कर बोला, ‘वो जो उन्नाव से बलिया तक की सप्लाई मैं ने दिलवा दी, वह नहीं दिलवानी चाहिए थी। वह पाप हो गया।’
‘कितने लोग सड़क पर आ गए। हमारे घरों में कैसे खाना पकता है? बच्चे कैसे पढ़ते हैं? जानते हैं आप? सोचते हैं कभी आप या आप के मनमोहन कमल जैसे लोग? आप लोग तो ए.सी. में सोते हैं और हम लोगों को नींद भी नहीं आती, कभी सोचा है?’ यह चंद्रकिशोर था। वह बोला, ‘अब इस उमर में कहां नौकरी मांगने जाएं? कौन देगा? क्या देगा?’
‘अब क्या बताएं भाई!’ सांस छोड़ता हुआ सूर्य प्रताप बोला, ‘लखन भाई आप का एक हारमोनियम टूटा है और आप गा नहीं पा रहे हैं। यहां हमारे दिल में कितने हारमोनियम टूटे हैं आप क्या जानें? इन टूटे हारमोनियम के सारे टुकड़े इसी सीने की क़ब्र में दफ़न हैं। रह-रह कर खड़बड़ाते रहते हैं तो कितनी तकलीफ़ होती है, आप सब को क्या-क्या बताऊं? हारमोनियम के टूटे तार जब हमारे सीने की क़ब्र में चुभते हैं तो यह क़ब्र भी कलबला जाती है। मन करता है क़त्ल कर लूं अपना पर कहां कर पाता हूं? सो मैं भी नहीं पाता हूं मेरे मित्रों! पर क्या करूं?’ सूर्य प्रताप की आवाज़ रुंध गई। आंखों से आंसू टपक पड़े। वह बोला, ‘अरे मैं तो औजार बन गया। जैसे बजाए कोई और बजे हारमोनियम! ऐसे ही मुझे भी लोग हारमोनियम की तरह बजा गए। और बजा कर तोड़ गए। तोड़ गए मुझे भी! अब कहां ढूंढूं मैं अपने टूटे हुए टुकड़े। अपने टूटे टुकड़े ढूंढूं कि सीने में द़न हुए टुकड़े ढूंढूं? किस को ढूंढूं?’
‘कुछ मत ढूंढिए! घर जाइए। यहां ड्रामा करने की ज़रूरत नहीं है। ऐसे ड्रामे बहुत देखे हैं।’ यह करन वर्मा था। बोला, ‘दलाल पत्रकार ड्रामा करे, और हम देखें, हमें शोभा नहीं देता।’
‘मैं ड्रामा कर रहा हूं। मेरा कहा आप सब को ड्रामा लग रहा है?’ सूर्य प्रताप हाथ जोड़ते हुए बोला, ‘तो भइया आप लोग मुझे माफ़ कीजिए!’ उस ने स्कूटर स्टार्ट किया और सब की ओर देखते हुए धीरे से बोला, ‘जय हिंद!’
‘जय हिंद!’ लखन समेत ढेर सारे साथी ज़ोर से बोल पड़े, ‘जय हिंद सूर्य प्रताप भइया, जय हिंद!’
पर सूर्य प्रताप जो पहले ही से टूटा हुआ था, और टूट गया। टूट गया था करन वर्मा के तंज़ से। शान से चलने वाला सूर्य प्रताप झुक गया था करन वर्मा के तंज़ से। अपनी ही नज़रों में गिर गया था। वह सोचता था कि लोगों की नज़रों में उस के लिए बड़ी इज़्ज़त है। पर अब वह पा रहा था कि अरे, लोग तो उस से नफ़रत भी करते हैं। अब इस नफ़रत के हारमोनियम को कैसे तोडे़? कहां तोड़े? कब तोड़े? क्यों और किस के लिए तोड़े? उसे कभी ख़बरों में पांच क, पांच डब्लू सिखाए गए थे। पर अब वह इन पांच क का क्या करे? तोड़ दे अपनी खोपड़ी इस क वाले हारमोनियम पर। वह अपनी यातना सोचता है फिर इन कर्मचारियों की यातना का ताप तौलता है कि, ‘हमारे घरों में खाना कैसे पकता है? बच्चे कैसे पढ़ते हैं जानते हैं आप?’
घर आ कर वह सो नहीं पाता। शराब पीने लगता है। पत्नी से कहता है, ‘बताओ मैं अपने को बड़का पत्रकार समझता हूं और लोग हमें दलाल समझते हैं!’
‘लोगों की बातों को आप सुनते ही क्यों हैं?’
‘अरे नहीं, वे लाचार लोग हैं। परेशान, बदहाल और बेरोज़गार लोग हैं। उन की परेशानी मैं समझता हूं।’
‘ठीक है अभी आप सो जाइए।’
‘नींद ही तो नहीं आ रही, सोना तो चाहता हूं।’
संसदीय चुनावों का ऐलान हो गया है।
सूर्य प्रताप अब चुनावी सभाओं के कवरेज में व्यस्त है।
दुर्भाग्य ही था कि पूर्व मुख्यमंत्री, समाजवादी नेता और रक्षामंत्री के चुनावी कवरेज में जाते समय एक सड़क दुर्घटना में सूर्य प्रताप का निधन हो गया। शुरू में तो सब दिखे। पर बाद में जैसा कि सूर्य प्रताप कहता था, ‘कोई साथ नहीं देगा!’ तो सचमुच कोई साथ नहीं आया। उस के बीवी बच्चे कैसे जी रहे हैं इस की किसी ने सुधि नहीं ली। उस के सीने में दफ़न हारमोनियम के हज़ार टुकड़े, उस के तार उसे चुभते रहे, उस की इस चुभन को भी किसी ने नहीं देखा जब जीते जी नहीं, तो मरने के बाद ख़ैर कोई क्या देखता? क्यों देखता? किस लिए, कब और कैसे देखता?
ख़ैर, कुछ दिन बाद मनमोहन कमल ने एक बिल्डरनुमा नेता को पटाया। वह एजूकेशन माफ़िया भी था। एक फ्रेंचाइज़ी अख़बार निकाला। और ज़ाहिर है कि ठीक ठाक निकाला। पर वह पुरानी वाली शान और ऱतार मनमोहन कमल की यहां नहीं दिखी। दूसरी पत्नी के लिए एक दफ्तर उन्हों ने पहले के दिनों में ही खोल दिया था। ताकि वह भी व्यस्त रहे। पर वो क्या कहते हैं कि मझोले टाइप के पूंजीपति मनमोहन कमल को रास नहीं आते थे। मनमोहन कमल का तामझाम, तमाम ख़र्चे और नख़रे बर्दाश्त करना इन मझोले पूंजीपतियों के वश का था भी नहीं। मनमोहन कमल जल्दी ही इस फ्रेंचाइज़ी अख़बार से विदा हो गए।
वैसे भी अख़बारों में अब बहुत कुछ बदल गया था। अख़बारों से अब संपादक नाम की संस्था विदा हो चुकी थी। संपादकीय विभाग की सुपीरियारिटी पर अब मैनेजमेंट न सिर्फ़ हावी हो गया था, बल्कि बाक़ायदा चढ़ाई किए रहता। ख़बरें अब पैसा ले कर छापी जाने लगी थीं और खुल्लमखुल्ला। रेट कार्ड छाप कर। कोई परदेदारी नहीं। एडीटोरियल पर ऐडवोटोरियल भारी पड़ गया था। सब एडीटर या चीफ़ एडीटर पेस्टर में तब्दील हो चुका था। ख़बर संपादित करने, पुनर्लेखन वगै़रह अब बासी बातें हो चली थीं, सारा ज़ोर पेज लगाने पर था। कि किसने कितना पेज बनाया। वाक्य ग़लत है, शब्द ग़लत है, वर्तनी की ऐसी तैसी है, इस सबसे अब संपादकीय विभागों की कुट्टी हो चली थी। नौकरी जाने का डर बड़ा हो गया था। नौकरी बचाने के लिए हर कोई अपनी अस्मिता, अपनी आत्मा, अपनी पिछाड़ी, अपना सब कुछ दांव पर लगाए बैठा था। इलेक्ट्रानिक मीडिया ने प्र्रिंट मीडिया में वेैसे ही भूसा भर दिया था। अब अख़बारों में भी एस.एम.एस. और चैनलों वाले तमाम रैकेट स्वीकार कर लिए गए थे। हमेशा चलने वाले पाठक पुरस्कार योजना जैसे फ्राड अब बेमानी हो चले थे। पत्रकारिता मिशन जैसे शब्दों के अवशेष भी अब ढूंढे नहीं मिलते थे। शेष था तो सिर्फ़ और सिर्फ़ व्यवसाय। व्यवसाय। और व्यवसाय!
मनमोहन कमल फिर भी अप्रासंगिक नहीं हुए थे। हर छः महीने बाद कोई नई ख़बर उड़ती कि कमल जी अब फ़लां अख़बार ले कर आ रहे हैं। लोग उन की परिक्रमा शुरू कर देते। मिल कर न सही, फ़ोन पर ही प्रणाम करना नहीं भूलते। एक ख़बर बासी पड़ती, दूसरी आ जाती, तीसरी और चौथी आ जाती। आती रहती और मनमोहन कमल का सूर्य उगा रहता। उन का कमल खिला रहता।
बहुत दिनों बाद कुमारेंद्र के बेटे की शादी में मनमोहन कमल दिखे। अपनी टीनएज बेटी के साथ। पत्नी जाने क्यों नहीं थीं। बेटी खिलखिला रही थी। पापा ये, पापा वो! पर मनमोहन कमल कुछ उदास से दिखे। थे तो लोगों से घिरे हुए लकदक सूट में पर रोशनी में नहाई घास वह देख रहे थे।
सुनील को ज्ञानेंद्रपति की एक कविता ‘ट्राम में एक याद’ की याद आ गई; चेतना पारीक कैसी हो? / पहले जैसी  हो? / कुछ-कुछ खुश / कुछ-कुछ उदास / कभी देखती तारे / कभी देखती घास / चेतना पारीक कैसी दिखती हो? / अब भी कविता लिखती हो?
सुनील के मन में आता है कि ज्ञानेंद्रपति की इस कविता की तर्ज़ पर ही वह पूछ ले कि मनमोहन कमल कैसे हो? पहले जैसे हो? कभी मुंगेर भी जाते हो? मुगेरी लाल के हसीन सपने देखने? या कि लखन की हारमोनियम सुनने कभी उस पुराने दफ्तर भी जाते हो? उस हारमोनियम के हज़ार टुकड़े तुम्हें भी दिख पाते हैं भला? सूर्य प्रताप के सीने में दफ़न हारमोनियम के टुकड़े दिखे कभी तुम्हें भी? आकाश से देख कर तो तुम लखनऊ का बहुत सुंदर और मनोरम वर्णन लिखते थे कभी अपनी परदेसी डायरी में। कभी ज़मीन से भी लिखो उन सैकड़ों परिवारों की भूख, प्यास और अभाव की कथा। लिख सकोगे भला मनमोहन कमल? बोलो-बोलो! पर शादी में संगीत का शोर बहुत है। सुनील कहता तो बहुत कुछ है; पर मनमोहन कमल कुछ भी सुन नहीं पाते।
वह कभी आकाश निहारते हैं तो कभी लान की मखमली घास।
आकाश में ढेर सारे तारे हैं। पर यहां कोई तारा नहीं टूटता। घास चमकती रहती है।
----समाप्त----

2 comments:

  1. आपकी भाषा का जवाब नहीं। बहुत सारी जानकारियां दी हैं। बहुत सारे नाम साफ हैं। मसलन पंकज जो कमल हैं। राना भी जिन्हें पार्टी ने राज्यसभा में भेज दिया। सूर्यप्रताप शायद शाही हैं।

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