Sunday, 16 February 2014

हिंदी फ़िल्मों में पत्रकारिता का दारिद्रय

मणिरत्नम की ताजा़तरीन, विवादास्पद और तहलका मचाने वाली फ़िल्म ‘बांबे’ का नायक पत्रकार ही है और कुछ दृश्यों में पत्रकारिता के तेवर भी वह दिखाता है। ख़ास कर दंगे के बीच पुलिस अधिकारी, और दंगा पीड़ितों से बात चीत में, दंगा कराने वाले मठाधीशों के इंटरव्यू में। इस तरह ‘बांबे’ का पत्रकार विनोद पांडेय के ‘रिपोर्टर’ के पत्रकारों से अलग है। वह ‘राबिन हुड’ नहीं है तो यह सुखद लगता है। दरअसल हिंदी फ़िल्मों में इधर पत्रकारिता कुछ ज़्यादा ही भाव में है। ठीक वैसे ही जैसे साठ के दशक तक हिंदी फ़िल्मों के केंद्रीय पात्रा कवि-लेखक बन कर छलकते-चहकते थे और कवि लेखक की ऐसी तैसी कर के रखते थे। आज भी हिंदी फ़िल्मों के केंद्रीय पात्र में ढला पत्रकार हो या सहायक पात्र या एक्स्ट्रा में गढ़े गए पत्रकारों के चरित्र की चौहद्दी भी चू-चूं के मुरब्बे में सनी सड़ी संड़ाध देती दीखती है। तो भी पत्रकारों को केंद्र में रख इधर कई फ़िल्मों के निर्माण की घोषणाएं हुई हैं। और होती जा रही हैं। इस नब्बे के दशक में दूरदर्शन धारावाहिकों में भी पत्रकारिता का ‘रौब’ पांव पसारे पड़ा है। ‘रिपोर्टर’ और ‘आज की ताज़ा ख़बर’ ऐसे ही धारावाहिक हैं। वैसे अस्सी के दशक में बनी हर दसवीं फ़िल्म का सरोकार पत्रकार या अख़बार से अनायास ही देखने को मिल जाता है। ‘कमला’ ‘न्यू डेल्ही टाइम्स’, ‘सुर्खियां’ और ‘न्यू दिल्ली’ फ़िल्में तो बिलकुल अख़बारी दुनिया में ही रची बसी बनी हैं। और ये चारों फ़िल्में अलग-अलग कारणों से विवाद में भी पड़ी और उन्हों ने तहलका भी ख़ूब मचाया।

टी.वी. सीरियल ‘कक्का जी कहिन’ की कहानी में भी पत्रकार और पत्रकारिता की दुनिया हर कड़ी की एक गुत्थी बनी हुई थी पर इतनी बचकानी क्यों थी, ‘कक्का जी कहिन’ की पत्रकारिता की दुनिया? यह भी एक अहम सवाल है जिस की चर्चा ज़रा रुक कर। कमला तो एक सच्ची घटना ‘कमला कांड’ पर ही आधारित थी। कमला फ़िल्म का सरोकार भी अख़बारी दुनिया के कुछ ‘चर्चों’ से था। फिर भी कमला कांड का हक़ीकत में भंडाफोड़ करने वाले इंडियन एक्सप्रेस और उस के संवददाता अश्विनी सरीन ने ‘कमला’ फ़िल्म का ज़बरदस्त विरोध किया। इंडियन एक्सप्रेस के तब के करता-धरता रामनाथ गोयनका और संवाददाता अश्विनी सरीन तो इस मामले को ले कर कोर्ट तक गए और पूरी कोशिश की कि ‘कमला’ प्रदर्शित न होने पाए। गोयनका और सरीन का कहना था कि फ़िल्म में कथ्य को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है। इस तरह अख़बारी सरोकार भले ही निरा छद्म नहीं था। कमला कांड पर तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का आरोप तो लगा ही। अलग बात है ‘कमला’ पर रूमानियत का भी आरोप लगाना चाहिए था जो नहीं लगा। ‘कमला’ में एक बात और नोट करने लायक़ थी वह यह कि कमला (दीप्ति नवल) को ख़रीद कर दिल्ली के प्रेस क्लब में जब पत्रकार बने मार्क जुबेर एक प्रेस कांफ्रेंस में पेश करते हैं उस प्रेस-कांफ्रेंस का दृश्य इतने दारिद्रयपूर्ण ढंग से फ़िल्माया गया है कि तबीयत तंग हो जाती है।
फिर कमला में ही क्यों जाने क्यों कमोवेश सभी फ़िल्मों में यदा-कदा किसी हादसे पर या किसी मसले पर प्रेस कांफ्रेंसों की दरिद्रता बिलकुल दौड़ा लेने वाली होती है। प्रेस-कांफ्रेंस क्या होती है ज़मूरेबाज़ी होती है। बल्कि फ़िल्म वाले जमूरे को ज़रा ठीक ढंग से दिखा भी देते हैं पर प्रेस कांफ्रेंसों में पत्रकारों को इतनी चुगद ढंग से क्यों फ़िल्मा देते हैं फ़िल्म-दर-फ़िल्म। यह एक पहेली ही है कि इतना वेग क्यों होता है पत्रकारों वाले दृश्यों में।
बंबईया फ़िल्मकारों को चलिए एक बार बख्श भी दूं इस बेहूदगी के लिए पर अपने यथार्थवादी फ़िल्मकारों का क्या किया जाए? प्रकाश झा की ‘दामुल’ देखिए। एक-एक फ्रेम बड़े कसे हुए और रोंगटे खड़े कर देने वाले। बड़ी सहजता में गांव की चाक-चौबंद राजनीति और उस के माहौल को शिद्दत से महसूस करवाने वाले प्रकाश झा प्रेस कांफ्रेंस वाले दृश्य में बिखर गए हैं। बहुत असहज हो गया है प्रेस कांफ्रेंस का दृश्य दामुल में। बिलकुल बंबइया फ़िल्मकारों की तर्ज पर प्रकाश झा की दामुल में भी प्रेस कांफ्रेंस निपटा दी गई है। चलिए यहां तक गनीमत। पर पत्रकारों से बात कर रहे हैं, मंत्री जी। पत्रकार ज़्यादतियों की ओर ध्यान दिलाते हैं तो मंत्री हंस कर कहते हैं अरे रसगुल्ला खाइए और लीजिए पत्रकार भी हंस कर खाने लगते हैं।
क्या सचमुच पत्रकारों की यही और सिर्फ़ यही भूमिका है? सिर्फ़ यही चरित्र है देश में अपने पत्रकारों का? पूछा था मैं ने प्रकाश झा से। वह अकड़े-अकड़े से बोले, ‘हां और क्या?’ फिर यह पूछने पर कि ‘आप कहां-कहां और किन-किन पत्रकारों से मिले हैं एकाध नाम बताएंगे आप, जिन में यह छवि दिखी हो आप को?’ तो प्रकाश झा बगले झांकने लग गए और बोले, ‘दरअसल कस्बाई पत्रकारों को आप नहीं जानते। वह ऐसे ही होते हैं।’
‘फिर यह टोकने पर कि आप की फ़िल्म दामुल की प्रेस कांफ्रेंस में तो पटना, जो बिहार की राजधानी है, से आए पत्रकार बताए गए हैं, तो प्रकाश झा बड़ी मासूमियत से दाढ़ी नोचते हुए बोले, ‘माना कि यहां हम से ग़लती हो गई, पर फ़िल्म की समग्रता में आप इसे देखें तो कुछ बहुत नहीं खटकेगा यह फ्रेम।’ फिर कस्बाई पत्रकारों के भी बारे में अपना भ्रम तोड़ने पर वह विवश हुए और बोले, ‘आइंदा ध्यान रखूंगा।’

प्रकाश झा चलिए नए फ़िल्मकार है। पर श्याम बैनेगल तो नए नहीं हैं। उन की फ़िल्म ‘आक्रोश’ की याद कीजिए जिस में एम.के. रैना पत्रकार बने हैं और कितने तो बचकाने ढंग से उन के किरदार को श्याम बेनेगल ने फ़िल्माया है कि दारिद्रय की भी इंतिहा हो जाती है। पर बेनेगल थोड़ा फिर भी ‘जस्ट’ कर जाते हैं तो सिर्फ इस लिए कि उन का ‘आक्रोश’ आदिवासियों के ताने-बानों में है और अख़बार भी छोटा है। कस्बे, गांव के पत्रकार के रूप में एम.के. रैना का संघर्ष भी रेखांकित हुआ है ‘आक्रोश’ में।

पर टी.वी. सीरियल ‘कक्का जी कहिन’ के पत्रकारों पर तो खासा तरस आता है। तब तो और भी कि पंडित मनोहर श्याम जोशी जो इस के लेखक हैं, बड़े भारी बरगद पत्रकार भी हैं बार-बार और बात-बात पर अनशन करना तो चलिए समझ में आता है, कक्का जी की चाची के पति पत्रकार का। व्यवस्था में मोहभंग और भ्रष्टाचार पर आक्रोश का भी। पर उस को मज़ाक बना उस का सतहीकरण करना क्षुद्रता की हदें पार कर जाता है। बात यहीं तक होती तो ग़नीमत। ‘कक्का जी कहिन’ की प्रेस कांफ्रेंस भी उसी दारिद्रय में धंसी पड़ी है जिस में बंबइया फ़िल्मकारों की फ़िल्में पटी पड़ती हैं। बस फ़र्क है तो बस इतना कि यहां उस का विस्तार है और थोड़े परिष्कृत ढंग से। और चूंकि मामला दिल्ली के पत्रकारों का है माहौल भी कुछ मुलायमियत और अजाक-मजाक का है तो सवाल टाल कर ओमपुरी जो उन्हें ‘अमृत पान’ पर उकसाते हैं तो यहां वह फिट पड़ता है। पर प्रेस कांफ्रेंस के बचकाने तेवर से तो भभकी आती ही है। जोशी जी यहां थोड़ा जंजाल कर गए हैं।
रमेश शर्मा की ‘न्यू डेलही टाइम्स’ ही एक अकेली इकलौती हिंदी फ़िल्म है जिस में ‘पत्रकार और पत्रकारिता की दुनिया से उस के सरोकार छद्म होने के बजाए सच के सांचे में ढले दीखते हैं क्या छोटा अख़बार और क्या बड़ा अख़बार दोनों की सीमाएं और समय को तो यह फ़िल्म रेखांकित करती ही है राजनीतिक उठा-पटक और चली गई चालों को भी चाक करती है न्यू डेलही टाइम्स और सब से बड़ी बात जो बिन कहे यह फ़िल्म कह जाती है, वह यह कि पत्रकार एक इस्तेमाल भर की चीज़ है। ख़बरों के बहाने राजनीतिक या कोई ऐसा ही दूसरा स्रोत भी जाने अनजाने कैसे तो इस्तेमाल करता है पत्राकार को। भइया मगन हैं कि बड़ा भारी स्कूप मार लिया है, पर हक़ीक़त में वह मुख्यमंत्री की गढ़ी और फ़ीड की गई ख़बर है अपने प्रतिद्वंद्वी के खि़लाफ। यह वह शशि कपूर का पत्रकार कहां जानता है भला और जब जानता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और दोनों प्रतिद्वंद्वी एक हो चुके होते हैं फिर सुबूत तो सुबूत उस का सिरा भी सिरे से नष्ट हो चुका होता है। इस तरह बड़ी खूबसूरत फ़िल्म बन पड़ी थी न्यू डेलही टाइम्स। पर विसंगति देखिए कि यह फ़िल्म अपनी खूबसूरती, सचाई और सच को सहजता से कहने के लिए नहीं- जानी गई। जानी गई तो दंगे के एक दृश्य के लिए जो मुश्किल से चार-पांच मिनट का एक दृश्यबंध था। टी.वी. पर इस फ़िल्म के प्रदर्शन की घोषणा के बाद भी इस दंगे की ओर दृश्य को ले कर नहीं दिखाई गई। जब कि हक़ीक़त में इस फ़िल्म का सच यह दंगा नहीं बल्कि गंदा राजनीतिक गठजोड़ था जिसे फ़िल्म में बड़े सलीके़ से पेश किया गया था।
अब पत्रकारों के बहाने माफ़ियागिरी का भी ख़ून फ़िल्मकारों के मुह लग गया है। कुछ समय पहले आई फ़िल्म ‘मशाल’ में दिलीप कुमार भी पत्रकार हैं, शुरू में तो उन की शुरूआत सरल से सरलतम हुई दीखती है। पर एक माफ़िया से उन की ठन जाती है तो अख़बार की नौकरी छोड़, वह अपना अख़बार निकालने लगते हैं। उधर उन पर मर मिटने वाले अनिल कपूर गली की दादागिरी छोड़ पत्रकार बनते हैं साथ में नायिका रति अग्निहोत्री भी पत्रकार बन लेती हैं। पर अपने दिलीप कुमार पत्रकार कम माफ़िया बन लेते हैं। राबिनहुड तो ख़ैर वह नहीं बनते पर खलनायक से बदला ले लेते हैं। मैं समझता हूं दिलीप कुमार का अभिनय इस फ़िल्म में बेमिसाल था। कुछ दृश्य तो दिल हिला देने वाले थे। ख़ास कर दंगा और दंगे के बाद घायल पत्नी (वहीदा) को आधी रात में बंबई की नंगी सड़क पर जो मदद के लिए वह दहाड़ें मारने वाले दृश्य तो रोंगटे खड़े कर देने वाला था। फिर बाद में अनिल कपूर को ला कर उस दहाड़ने की पुनरावृत्ति सिर्फ़ दिलीप कुमार ही कर सकते थे। यह सब तो ठीक था, पर पत्रकारिता में माफ़ियागिरी की गंध का क्या करें?
‘न्यू दिल्ली’ भी अख़बारी दुनिया की कहानी कहने के बहाने अख़बारी माफ़िया की कहानी कह गई। इस फ़िल्म में पत्रकार बने जितेंद्र पत्रकार क्या पूरे राबिन हुड हैं। मर्डर दर मर्डर और उस की अख़बार में विस्तृत ख़बर, बतौर एक्सकलूसिव। अख़बार और पत्रकारिता तो बहाना थी। दरअसल जितेंद्र के किरदार को तो फार्मूले के हिसाब से बदला लेना था। वह पत्रकार नहीं डाक्टर बन कर या पुलिस इंस्पेक्टर बन कर या ऐसे ही ऐसा वैसा, कुछ भी बन-बना कर भी वह और वैसा वैसा ही करते जैसा न्यू दिल्ली में सनसनीखेज ढंग से किया। पर वह पत्रकार बने तो सिर्फ़ इस लिए जैसा कि शुरू में कहा न कि हिंदी फ़िल्मों में पत्रकार और पत्रकारिता का भाव इन दिनों कुछ ज़्यादा ही है।

गोविंद निहलानी की फ़िल्म ‘पार्टी’ लेखकों, पत्रकारों और अभिनेताओं आदि की ही पार्टी है। पार्टी काफी देर से चल रही है। पर बिलकुल आखि़री घड़ियों में ओमपुरी पत्रकार अविनाश की भूमिका में जब आते हैं तो समूची पार्टी का रंग ही बदल जाता है। और इस छोटी सी भूमिका में वह प्रतिबद्ध पत्रकारिता के सच की  आंच थमा जाते हैं।
नहीं महेश भट्ट की फ़िल्म ‘दिल है कि मानता नहीं’ मैं आमिर खान भी पत्रकार ही बने हैं। पर पूरी फ़िल्म में वह पत्रकारिता नहीं नायिका के नखरे ही झेलते दीखते हैं पत्रकारिता उन के लिए प्यार नहीं, सच नहीं, खिलवाड़ है। और यह काम वह पत्रकार, डाक्टर, इंजीनियर, पाकेटमार, कुछ भी बन कर कर सकते थे। महेश भट्ट की ‘डैडी’ में भी पत्रकारिता का यही ‘हश्र’ देखने को मिलता है। यही हाल ‘सुर्खियां’ में नसिरुद्दीन शाह की भूमिका का है। बस ‘न्यू दिल्ली’ से थोड़ा सा फ़र्क यह है कि वह यहां अख़बार का सर्कुलेशन ज़्यादा करने की गरज़ से पहले एक अपराधिक ख़बर लिखते हैं और फिर ‘अपराध’ कर उस ख़बर को ‘सच’ बना देते हैं। चूंकि उस अपराध का पूरा सिलसिलेवार ब्यौरा सिर्फ़ उन्हीं के अख़बार में होता है सो सर्कुलेशन बढ़ना भी लाजिमी हो जाता है। पर एक डाके में एक बच्चे द्वारा पहचान लेने और एक अख़बारी सहयोगी को इस ‘साजिश’ की गंध पड़ जाने के कारण वह पकड़े जाते हैं। कथ्य फैंटेसी भरा भले ही हो, अंगरेजी, फ़िल्म की नकल भी सही पर फ़िल्म अच्छी बन पड़ी थी।
ठीक वैसे ही जैसे नाना पाटेकर की ‘प्रहार’ फ़िल्म अच्छी बन पड़ी है। साथ ही पत्रकारिता के एक भयानक सच को भी उद्घाटित कर गई है। फ़िल्म के नायक नाना इलाके़ के गुंडों और पुलिस के खिलाफ़ शिकायत ले कर संपादक के पास जाते हैं। तो संपादक इसे ख़बर मानने से ही इंकार करते हुए छापने में असमर्थता जता देता है। पर ठीक उसी समय एक फ़ोन आता है जिस पर संपादक को सूचना दी जाती है कि मंत्री जी को जुकाम हो गया है। तो संपादक छूटते ही कहता है, ‘छापता हूं। पहले पेज पर छापता हूं।’
नहीं, मिस्टर इंडिया में श्री देवी भी पत्रकार बनी हैं। पर सचमुच में पत्रकारिता से उन का क्या सरोकार है? श्री देवी कुछ और भी बनी होतीं डाक्टर, वकील वगैरह-वगैरह तो भी उन को उन्हीं अनिल कपूर के साथ ठुमके लगा कर भीग-भाग कर ‘आई लव यू’ या ‘करते हैं हम प्यार, मिस्टर इंडिया से’ ही गाना था। अन्नू कपूर जो हास्यास्पद हरकतें संपादक बन कर करते हैं, वह किसी थाने में दीवान बन कर या किसी दफ़्तर में बड़े बाबू बन कर भी कर सकते थे और अनिल कपूर को श्री देवी से मिल कर अमरीश पुरी का कचरा निकालना ही था। पर श्री देवी यह सब करती हैं तो पत्रकार ही बन कर।
पहले भी फ़िल्मों में पत्रकारों के किरदार मिलते थे। लेकिन लाख छद्म सरोकारों के थोड़ा बहुत उन का संघर्ष भी रेखांकित होता था और उन का सरोकार भी। जैसे कि रिचर्ड एटनबरो की गांधी फ़िल्म में या बी.आर. चोपड़ा के टी.वी. सीरियल बहादुर शाह ज़फ़र को देखें। इन दोनों ही जगहों पर पत्रकार हैं। अंगरेजी पत्रकार हैं। पर अपनी पूरी हैसियत में हैं। फिर पत्रकारों के साथ काहे खेल जाते हैं यह हिंदी फ़िल्मकार। यह समझना एक पहेली भी हो सकता है। ठीक वैसे ही जैसे राजकपूर अभिनीत फ़िल्म चोरी-चोरी में वह फ़िल्म में सब कर-धर कर अचानक, नायिका (नरगिस) के घर जहां उस की उस दिन शादी होने वाली है, उस के पिता से इंटरव्यू लेने पहुंच जाते हैं। क्या तो वह पत्रकार हैं। एकदम पहेली की तरह।

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