Thursday, 14 April 2016

नरेंद्र मोदी , वामपंथी और आंबेडकर का कंट्रास्ट भरा कोलाज !


इसी लिए मैं आंबेडकर नहीं , गांधी को मानता हूं 

आंबेडकर नाम की जय बोलने में नरेंद्र मोदी का नाम आज की तारीख़ में सब से ऊपर है । तो यह क्या मुफ़्त में है ? वामपंथी भी बहुत ज़ोर से आंबेडकर की जय कर रहे हैं । नरेंद्र मोदी , वामपंथी और आंबेडकर ! क्या कोलाज है , क्या कंट्रास्ट है !

मेरा स्पष्ट मानना है कि आंबेडकरवाद की अराजकता , सेक्यूलरिज्म के पाखंड और फ़ासिज़्म ने मिलजुल कर देश और समाज में जातीय घृणा , नफ़रत और कृतघ्नता का बहुत गहरा जाल बुना है। वोट बैंक की लालच में सभी राजनीतिक पार्टियों ने इस घृणा और नफ़रत को पालने पोसने में बढ़-चढ़ कर अगुवाई की है। सब जानते हैं कि एक संविधान सभा थी , संविधान तैयार करने के लिए जिस में तीन सौ से अधिक सदस्य थे । राजेंद्र प्रसाद इस संविधान सभा के अध्यक्ष थे। इस संविधान सभा में तमाम कमेटियां थीं। जिस में से एक ड्राफ्ट कमेटी भी थी ।  आंबेडकर इस कमेटी के अध्यक्ष थे । कहा जाता है कि गांधी की सिफ़ारिश पर ऐसा किया गया। लेकिन इसी बिना पर आंबेडकर को कुछ अराजक लोगों ने संविधान निर्माता कहना शुरु कर दिया। 

संविधान विशेषज्ञ भी इस का प्रतिवाद मारे डर कर नहीं कर पाते कि वह दलित विरोधी घोषित कर दिए जाएंगे। इसी लिए आज की तारीख़ में आंबेडकर भारतीय राजनीति में ब्लैक मेलिंग का एक बड़ा औजार बन चुके हैं । यह सारी की सारी राजनीतिक पार्टियां और पालतू विचारक आंबेडकर की पूजा का ढकोसला फैला कर सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी दुकान चलाते और सजाते हैं। और जो आंबेडकर बहुत बड़े संविधान निर्माता हैं तो एक बात तो कोई बता दे कि यह संविधान हाथी का दांत बन कर हमारे सामने क्यों उपस्थित है ? आज की तारीख में संविधान मानता कौन है ? नरेंद्र मोदी कि अंबानी , अडानी कि विजय माल्या ? आदि आदि । यह संविधान आज भी गरीबों को और गरीब , अमीरों को अमीर क्यों बनाता जा रहा है ? दलितों , वंचितों की भागीदारी कहां है इस संविधान में ? सिर्फ़ लफ्फाजी के और क्या है संविधान में ? दुनिया भर के संविधान के कापी पेस्ट वाले संविधान में तो यह होना ही था ।

सौ में एक बात यह कि क्या भारत देश संविधान और कानून से चलता है ?

मेरा मानना है कि यह भारत देश संविधान से नहीं , धर्म , माफ़िया और जातियों से चलता है । गुंडई और भ्रष्टाचार से चलता है । मौजूदा संविधान बुरी तरह फेल हो चुका है । फर्जी साबित हो चुका है । बेहिसाब संशोधन हो चुके हैं इस हाथी के दांत वाले संविधान में ।

इसी लिए मैं वोट और बेहिसाब बौद्धिक पाखंड तथा अराजक राजनीतिक अवसरवाद को नहीं मानता । इस लिए आंबेडकर को भी नहीं मानता । मैं गांधी को मानता हूं। गांधी के विचारों को मानता हूं । आंबेडकर के तमाम विचारों से असहमत हूं। यह ठीक है कि गांधी ने ही आंबेडकर को राजनीतिक और सामाजिक स्पेस दिया था और वह एक समय बाद गांधी से ही टकरा गए। लेकिन अगर गांधी न होते तो आंबेडकर कहां होते ? यह विमर्श लोग भूल जाते हैं। जो भी हो मैं किसी भेड़ चाल में शामिल नहीं हूं। इस लिए कि मैं न तो पाखंडी हूं , न कायर । आप को गांधी से या मुझ से कोई दिक्क़त है तो अपने पास रखिए न । अपने गिरोह में उसे शेयर कीजिए । क्यों कि मैं किसी गिरोह में भी नहीं हूं। होना भी नहीं चाहता । ठीक ? इस लिए भी कि आबादी , वोट और उस की गुंडई में ताक़त बहुत दिखती है। बड़े-बड़े विवेकवान बुद्धि से विदा हो गए हैं इस शोर में। गांधी जैसे विराट और विचारवान व्यक्ति को भूल गए हैं ।

क्यों कि गांधी नाम से अब दुकान नहीं चलती , वोट नहीं मिलता । तकलीफ मिलती है । तब जब कि उन का सत्य , सत्याग्रह , अहिंसा और स्वदेशी , उन के  विचार आज भी हमारे लिए प्रासंगिक हैं । ज़रूरी हैं । गांधी नाम ले कर कोई नफ़रत नहीं फैला सकता , ब्लैक मेल नहीं कर सकता । आंबेडकर के नाम पर आज की तारीख़ में कोई कैसे भी अराजकता , छुद्रता , गाली-गलौज कर सकता है , भ्रष्टाचार कर सीना तान कर किसी को ललकार सकता है । ललकार रहा है नफ़रत और घृणा की दुकान लगा कर । लोग डरे हुए यह सब देख रहे हैं । भौंचक हैं । दिक्क़त यह भी दिलचस्प है कि जिन वामपंथियों को आंबेडकर बड़ी घृणा के साथ बंच आफ़ ब्राह्मण ब्वायज कह कर ख़ारिज करते थे , वही वामपंथी आज की तारीख में सब से ज़्यादा आंबेडकर का पहाड़ा पढ़ते , जहर घोलते घूम रहे हैं । 

महर्षि वेद व्यास लिखित महाभारत के मुताबिक़ एकलव्य मगध के राजा जरासंध के सेनापति हिरणाधनु के बेटे थे। क्षत्रिय थे। लेकिन आंबेडकरवादी और सेक्यूलर लोग एकलव्य को आदिवासी और दलित बताते नहीं थकते । गाते  नहीं अघाते अंगूठा कथा । चोरी की सज़ा भूल जाते हैं । इन विद्वानों को अपने कुतर्क में यह भी नहीं सूझ पाता  कि  धनुष पर वाण  चलाने में अंगूठे की कोई भूमिका नहीं होती । ठीक एकलव्य जैसा ही कुतर्क है आंबेडकर को संविधान निर्माता घोषित करना । आंबेडकरवादी अपने जहर फैलाओ अभियान में इतने कृतघ्न हो जाते हैं कि आंबेडकर को पढ़ाने-लिखाने और नौकरी देने वाले बड़ौदा के  सयाजीराव गायकवाड़ कोभूल जाते हैं । उन के व्यक्तित्व निर्माण में उन की ब्राह्मण पत्नी डा शारदा कबीर को भूल जाते हैं । इस लिए कि इस से उन की नफ़रत की दुकानदारी में घाव लगता है । 


अपनी दुकान चमकाने में न्यस्त यह लोग आंबेडकर को सोने के अंडे देने वाली मुर्गी बना चुके हैं । इस फेर में आंबेडकर नाम अब एक अराजक की पर्यायवाची में तब्दील है । आप बहुत साफ देख सकते हैं जितने भ्रष्ट राजनीतिज्ञ , भ्रष्ट सरकारी अधिकारी और कर्मचारी हैं वह बहुत ज़ोर से आंबेडकर बोलते हैं । आंबेडकर का नाम इन के लिए विचार नहीं है , आंबेडकर का नाम भ्रष्ट कारनामों के लिए कुंडल और कवच बन कर आज की तारीख़ में उपस्थित है । मायावती से लगायत यादव सिंह जैसे भ्रष्ट इंजीनियर इस के साक्षात प्रमाण हैं । भाजपा ने मुलायम को संसद की बिसात पर नचा कर सी बी आई सर्टिफाइड ईमानदार बनाया है । भाजपा की ही मदद से मायावती अब सी बी आई सर्टिफाइड ईमानदार बनने की दौड़ में शामिल हैं । मैं वह बात फिर से दुहरा कर कहना चाहता हूं कि आंबेडकर नाम की जय बोलने में नरेंद्र मोदी का नाम आज सब से ऊपर है । तो यह क्या मुफ़्त में है ? वामपंथी भी बहुत ज़ोर से आंबेडकर की जय कर रहे हैं । नरेंद्र मोदी , वामपंथी और आंबेडकर ! क्या कोलाज है , क्या कंट्रास्ट है !

ज़रुरत इस कोलाज और इस कंट्रास्ट को समझने और निपटने की है । गांधी को याद करने की है ।

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (16-04-2016) को अति राजनीति वर्जयेत् (चर्चा अंक-2314) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. जस का तस makingindia.co पर ले रहा हूँ

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