Friday, 1 April 2016

कम्युनिस्ट हो कर पूजा करना भी बहुत बड़ी लाचारी है



ग़ज़ल

प्रगतिशीलता की आड़ में कट्टर लीगी होना बीमारी है
कम्युनिस्ट हो कर पूजा करना भी बहुत बड़ी लाचारी है

हिप्पोक्रेटों की दुनिया है चहुं ओर उन का ही बाज़ार है
बाहर कुछ भीतर कुछ होना उन की यही दुकानदारी है

बचपन से यही देखा यही भोगा और इसी से हारते आए हैं 
चार सौ बीसी सर्वदा आगे रहती मार खाती ईमानदारी है

जाति की गणित में सांस लेता मज़हब की घृणा वही बांटता
सेक्यूलरिज्म की चादर पर नचाता बंदर वह बड़ा मदारी है

मंहगाई का असर नहीं है खर्चे की पैसा भर परवाह नहीं है
दुनिया जानती है आदमी ईमानदार नहीं पक्का भ्रष्टाचारी है 

 [ 1 अप्रैल , 2016 ]

1 comment:

  1. जय मां हाटेशवरी...
    आपने लिखा...
    कुछ लोगों ने ही पढ़ा...
    हम चाहते हैं कि इसे सभी पढ़ें...
    इस लिये दिनांक 03/04/2016 को आप की इस रचना का लिंक होगा...
    चर्चा मंच[कुलदीप ठाकुर द्वारा प्रस्तुत चर्चा] पर...
    आप भी आयेगा....
    धन्यवाद...

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