Thursday, 24 December 2015

तुम्हारी मुहब्बत का जहांपनाह होना चाहता हूं

 
पेंटिंग : राजा रवि वर्मा

  ग़ज़ल 

मजनू नहीं , रांझा नहीं , शाहजहां  होना चाहता हूं 
तुम्हारी मुहब्बत का जहांपनाह होना चाहता हूं 

पहाड़ों में बर्फ़ गिरती है , मचलते रोज हैं बादल 
तुम्हारे प्यार के जंगल में गजराज होना चाहता हूं

प्यार की काशी में पूछते फिरते हैं बादल तुम्हारा ही पता 
उसी काशी में बरखा  की  पहली बौछार होना चाहता हूं 

धरती , वृक्ष , चांद , यह आकाश के जगमग सितारे
मैं तुम्हारे प्रेम से जगमग नदी की धार होना चाहता हूं

नदी की हर मचलती धार में मिलती धड़कन तुम्हारी 
इस धार में बसे वृंदावन का वंदनवार होना चाहता हूं 

पसंदीदा ठंड का मौसम है , रजाई है , आग है , तुम भी
इसी लिए अब सर्दियों की मीठी धूप होना चाहता हूं

हमारे खेत के मेड़ पर बिछी है तेरे क़दमों की हर आहट
प्यार के फागुन में खिल कर कचनार होना चाहता हूं

आते-जाते ही राह बनती है  मन की कच्ची मिट्टी पर 
इस महकती मिट्टी की पुकार हर बार होना चाहता हूं

प्रेम का आकाश और धरती हर इच्छा से बड़ी है  
प्यार के चांदनी की प्रथम मनुहार होना चाहता हूं

लोग देख लेंगे , क्या कहेंगे , तोड़ दो यह सारी वर्जनाएं
प्यार की अजान और नमाज सरे राह पढ़ना  चाहता हूं 

दीवारों में चुना जाऊं या किसी किले में कैद हो जाऊं
तुम्हारी पाकीज़ा  रूह की झंकार  होना चाहता हूं

तुम्हारे हुस्न की दीवानगी मार ही डालेगी किसी रोज 
तुम्हारी खूबसूरत  मांग का चटक सिंदूर होना चाहता हूं

[ 24  दिसंबर , 2015  ]

1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (25-12-2015) को ""सांता क्यूं हो उदास आज" (चर्चा अंक-2201) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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