Monday, 14 December 2015

इस सर्द रात में तुम्हारी आग


पेंटिंग : डाक्टर लाल रत्नाकर

थोड़ी लकड़ी , थोड़ी आग
बैठ कर तुम्हारे साथ 
ली गई कुछ सांस 
तुम्हारी बांह में ली गई उच्छवास
इस चांदनी रात में और क्या चाहिए 

यह मन नहीं , एक धरती है 
तुम मेरे मन में पसर जाओ 
जैसे पसरती है धरती पर चांदनी 
जैसे पसरता है कोहरा किसी झील पर 
फैलती है ख़ुशबू किसी मधुबन में आधी रात

यह रात नहीं है , रात का रंग है 
तुम्हारे कंधे और गरदन के बीच रगड़ खाती 
मेरी नासिका में फैल रही सुगंध है 
यह तुम्हारा खिल-खिल मन और मौन है 
तुम्हारी चूड़ियों की तरह खिलखिलाता हुआ 

समय का कैमरा दर्ज कर ले
इस चांदनी की ख़ुशबू को 
इस चांदनी रात में तुम्हें देखने को 
इस चांदनी रात में तुम्हें चीन्ह कर 
याद की गठरी में बांध ले 

चांदनी मचल ले ज़रा तुम्हारे रूप जाल में 
तुम्हारे घने बाल में , रुको मेरी बांह में 
इस सर्द रात में तुम्हारी आग 
बहुत ज़रूरी है जीने के लिए 
तब तक रुको 

[ 14 दिसंबर , 2015 ]


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