Thursday, 10 May 2012

पूर्वांचल के एक लोकप्रिय गायक की जीवन की स्थितियों के समानांतर रची गई दुनिया

- शिवमूर्ति

युवा उपन्यासकार दयानंद पांडेय का सद्यः प्रकाशित यह उपन्यास आज के इलेक्ट्रानिक मीडिया के युग में परंपरा से जन मानस में अपना प्रभावी स्थान बनाए लोक कलाकारों की ह्रासोन्मुखी स्थिति की प्रामाणिक व चिंताजनक तस्वीर पेश करता है। सामान्य ज़िंदगी की धारा से हट कर अपनी रूझानों को पुष्पित पल्लवित करने की आकांक्षा पालने वाले ऐसे विरल कलाकारों की स्थितियां कैसे दिनोदिन दयनीय होती जा रहीं हैं, इस का प्रमाणिक आख्यान है यह उपन्यास।

उपन्यास का प्रारंभ प्रांत की राजधानी में अपना रसूख व संपर्क बना कर कला के अस्तित्व को बनाए रखने की एक कलाकार की जद्दोजहद के विवरण से होता है और क्रमशः फ्लैश बैक में कलाकार के बचपन तक की यात्रा कराता है। अपनी कला के प्रदर्शन के दौरान निरंतर ग्लैमर से आह्लादित और अनिश्चित भविष्य से आक्रांत होने के चलते कैसे कलाकार स्वयं बाज़ारू और विकृत आदतों का शिकार हो जाता है, इस का यहां प्रामाणिक चित्रण हुआ है। यह उपन्यास केवल कलाकार के संघर्ष या कला के महत्व को ही रेखांकित नहीं करता है बल्कि जनता की बदलती हुई, या कहें कि विकृत होती रूचि का चित्रण भी करता है जिस के चलते लोक कार्यक्रमों में युवा लड़कियों को शामिल करना कलाकार की मजबूरी हो जाती है।

उपन्यास में अमृत धारा की एक गंगोत्री भी प्रवाहित है। वह है लोक कलाकार और बचपन की सखी धाना के प्यार का आख्यान। बहुत दिनों बाद कलाकार के गॉव में आयोजित उस के सम्मान समारोह के अवसर पर इन दोनों के पुनर्मिलन और प्रेयसी द्वारा भाव विभोर हो कर अपने प्रेमी कलाकार की परिछन करने (आरती उतारने) का स्थल तो इतने नाजुक हाथों से छुआ गया है कि पाठक को लगता है कि इस स्थल का साक्षी हो कर उस ने उस पवित्र गंगोत्री में स्नान कर लिया है। बचपन की प्रीति कैसे क्रमशः परवान चढ़ती है। कोई अवरोध नहीं मानती। कोई वर्जना कोई दूरी इस के स्रोत को समाप्त नहीं कर पाती, इस का अत्यंत मनोहारी और विह्लल कर देने वाला रूप दिखाता है यह उपन्यास। इस स्थल तक आ कर उपन्यास उल्लेखनीय ऊँचाई हासिल कर लेता है।

इसी से जुड़ा हुआ एक अन्य प्रसंग है निरक्षर धाना का अपने बिना देखे हुए पति के लिए गॉव के एक छोटे लड़के के हाथ से सौगात, भेंट, उपहार या ‘चीन्ह‘ भेजना। विवाह मे नाऊन ने हाथ भर का घूँघट काढ़ दिया था जिस के चलते वह अपने पति की सूरत तक नहीं देख पाई। बिना सूरत वाले पति की याद करती रहती है वह। उस के पास पति के लिए सौगात भेजने के लिए कुछ नहीं है, तो वह पड़ोस के घर से नया स्वेटर चुराती है। कई दिनों तक इसे छिपा कर रखती है। फिर एक झोली में सीलबंद कर के भेजती है लेकिन बीच रास्ते में संवदिया के पकड़ लिए जाने के कारण भेद खुल जाता है। कितना उपहास, कितने ताने झेलती है, इस के लिए अबोध धाना, इसे पढ़ने से ज़्यादा कल्पना में महसूस किया जा सकता है। सखा-सखी भाव के इतने स्थल हैं इस उपन्यास में कि कभी-कभी लगता है कि इन स्थलों की तुलना में कलाकार के संघर्ष और संत्रास गौण हैं। उपन्यास में जितने नारी पात्र हैं, चाहत के, प्रेम के, स्नेह के यहॉ तक कि वासना के भी उतने ही रूप हैं। इन के चलते उपन्यास बहुत सारे ऐसे अनुभवों का साक्षी बन जाता है जिन का पाठक के अनुभव के दायरे में अन्यथा आ पाना मुश्किल था।

सात समुंदर पार विकराल रूप धर चुका एड्स कैसे दबे पॉव पूर्वाचल के गॉवों में प्रवेश कर रहा है और एक-एक कर के सैकड़ों लोगों को बल्कि कहें सैकड़ों बहुओं को अपनी चपेट में ले रहा है जिन की इस मामले में तनिक भी गलती नहीं है। एक से दूसरे को, दूसरे से तीसरे को अपनी चपेट में लेने वाली इस महामारी का लोग नाम भी नहीं बताना चाहते। कहते हैं कोई पूछे तो बता देना कि कैंसर था। एड्स का नाम हर्गिज मत लेना।

चाहे पूरी दुनिया में अपनी कला का डंका पीट दें लोक गायक, लेकिन चूंकि वह नगण्य हैसियत वाली पिछड़ी जाति का है इस लिए एक ऐसी ब्राह्मणी भी जिस के पास अपनी बेटी का विवाह करने के लिए चंद सिक्के तक नहीं हैं अपनी जाति की उंचाई के अभियान में लोक गायक से कोई आर्थिक मदद लेना मंजूर नहीं करती जब कि वह जानती है कि पैसे के अभाव में उस की बेटी के हाथ पीले नहीं हो पाएंगे। गॉव में विलेज बैरिस्टर कहे जाने वाले गणेश तिवारी जैसे चरित्र भी हैं जो अपना नुकसान उठा कर भी दूसरे की बहन बेटियों की लगी लगाई शादी काटने में अपनी सारी अक्ल और प्रभाव लगा देते है। गॉव का सामान्य आदमी गणेश तिवारी जैसे सॉप के कॉटने पर कैसे पानी मॉगने के पहले ही दम तोड़ देता है, इसे गॉव के फौजी की दुर्गति दिखा कर लेखक पूरी तरह स्पष्ट कर देता है।

विश्व में या देश के अन्य हिस्सों में लोककला का चाहे जितना भी सम्मान हो पर हिंदी पट्टी में विद्यापति और भिखारी ठाकुर से ले कर आज के लोक कलाकार तक हैसियत सिर्फ़ नचनिया पदनिया भर की है, यह दर्द लोक कलाकार को लगातार सालता है। भले उस का शुभचिंतक चेयरमैन नाम का चरित्र तरह-तरह का उदाहरण दे कर उस का हौसला बनाए रखने की कोशिश करता है लेकिन उस का यह दर्द उस के दिल से कभी निकल नहीं पाता।

पूर्वाचंल के एक लोकप्रिय गायक की जीवन की स्थितियां के समानांतर रची गई उपन्यास की यह दुनिया आज के समाज व राजनीति में व्याप्त जातिवादी सोच को इस रूप में रेखांकित करती है कि अन्य क्षेत्रों के साथ-साथ कला और संस्कृति की दुनियां में भी ऐसी जड़ और पूर्वगामी मान्यताएं निर्णायक भूमिका अदा करती है।

संचार की दुनिया में क्रांति के साथ-साथ गायक को लगा था कि उस की हालत में भी सुधार आएगा इस लिए वह अपने गीतों के कैसेट निकलवाने के लिए लगातार प्रयास करता रहता था। पर बाद में उसे अनुभव हुआ कि उस की भाषा भोजपुरी गरीबों की भाषा है, गॅवारों की भाषा है इस लिए इस भाषा में गा कर उसे वह हैसियत नहीं प्राप्त हो सकती जो पंजाबी, कन्नड़, बंगाली, मद्रासी जैसे गायकों को मिलती है। लोक गायक सोचता है कि यदि ऐसा न होता तो दूसरी भाषाओं में इतने-इतने टी॰वी॰ चैनल खुले हैं। भोजपुरी में एक्कौ चैनल काहे नही खुला? दलेर मेंहदी जैसी हैसियत उसे क्यों हासिल नहीं हुई?

यह उपन्यास यह भी स्पष्ट करता है कि भले लोक जीवन में कला और संस्कृति के प्रति आदर भाव है और सरकारें भी लोक तत्व को बढ़ावा देने का ढिढोरा पीटती हैं लेकिन वास्तव में लोक कलाकार की हैसियत क्या है, इसे वे लोक कलाकार को चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की नौकरी दे कर स्पष्ट कर देती है।

एक अन्य दृष्टिकोण से भी यह उपन्यास महत्वपूर्ण है। आज के ज़माने में एक लोक कलाकार को अपने उपन्यास का विषय बनाना। इन कलाकारों के ज़िंदगी के यथार्थ से हमारा जुड़ाव इतनी दूर का हो चुका है कि उन के जीवन की अंतरंग स्थितियॉ जानने की कोई सूरत नहीं रह गई है। हम उन की बाहर की चमक दमक की दुनिया से ही परिचित रहते हैं, अंदर के दर्द से रूबरू नहीं हो पाते। यह उपन्यास कालीन उलट कर हमें उस के नीचे छिपे कूडे़ करकट से रूबरू कराता है। हम एक स्वप्न के असली चेहरे से परिचित होते हैं। कुल मिला कर यह एक ज़रूरी उपन्यास है।


[हिंदुस्तान से साभार]

समीक्ष्य कृति:-





लोक कवि अब गाते नहीं
पृष्ठ सं.184
मूल्य-200 रुपए

प्रकाशक
जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि.
30/35-36, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2003 



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