Thursday, 1 October 2015

यह ओस की बूंद थी कि तुम्हारा नेह था



तुम्हारी आंखों और होठों का कोलाज
जब तुम्हारे कपोलों पर रच रहा था
तभी ओस की एक बूंद गिरी
और मैं नहा गया तुम्हारे प्यार में
यह ओस की बूंद थी
कि तुम्हारा नेह था
जो ओस बन कर टपकी थी

[ 1 अक्टूबर , 2015 ]

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (03-10-2015) को "तलाश आम आदमी की" (चर्चा अंक-2117) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. उत्कृष्ट प्रस्तुति

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