Friday, 24 June 2016

तुम्हारे भीतर मैं ख़ुद को खोजता हूं

पेंटिंग : राजा रवि वर्मा

ग़ज़ल

तुम से मिलता हूं ख़ुद को सोचता हूं
तुम्हारे भीतर मैं ख़ुद को खोजता हूं

जैसे खो जाए भीड़ में कोई बच्चा
खो गया हूं भीड़ में तुम्हें खोजता हूं

अंधेरी रात हो घना जंगल और तुम
घने बादलों के बीच चांद खोजता हूं

धूप में जल जल कर छांह पाने के लिए
गुलमोहर की दहकती आग खोजता हूं

रोटी दाल की जद्दोजहद में सपना टूटा
अब तो पुराने गीतों में सुकून खोजता हूं

फूल पत्ती पक्षी आकाश मछली तालाब
पार जाने के लिए कोई नाव खोजता हूं
 
[ 24 जून , 2016 ]

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (26-06-2016) को "लो अच्छे दिन आ गए" (चर्चा अंक-2385) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत सुन्दर ग़ज़ल

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