Saturday, 25 June 2016

ठीक सामने होती हो तुम और बात नहीं होती

फ़ोटो : गौतम चटर्जी

ग़ज़ल 

कई बार जैसे चाह कर भी तुम साथ नहीं होती
ठीक सामने होती हो तुम और बात नहीं होती 

वो मंज़र सांझ का हो सकता है या सुबह का भी
आसमान में चांद होता है लेकिन रात नहीं होती

बादल बरखा और भीगती रात फिर तुम्हारा साथ 
देखने वाली लेकिन तुम्हारी वह आंख नहीं होती

मुहब्बत में आती रहती हैं अड़चन और भी बहुत 
हाथ में हाथ होता है लेकिन सामने राह नहीं होती 

जुगनू तारे चांद सितारे गाते घूमते गांव नगर सारे 
प्रेम की नाव थम जाती जब नदी में धार नहीं होती 

[ 25 जून , 2016 ]

3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (27-06-2016) को "अपना भारत देश-चमचे वफादार नहीं होते" (चर्चा अंक-2385) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. कुछ भी पाने की तमन्ना जब ना होगी तुमको
    दिल तेरा सिर्फ एक दिल को चाहेगा


    दिल का हर तार जब उस दिल से जुड़ जाएगा
    उसकी मुस्कराहट से चैन तुम्हे आएगा


    साथ देगी सारी कायनात तुम्हे मिलाने में
    राहे- उल्फत का ये दस्तूर है ज़माने में http://www.hindisuccess.com/2016/06/pyar-sachcha-jab-tumhe-ho-jayega-true-love-poem-in-hindi.html

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  3. बहुत खूब ... लाजवाब ग़ज़ल है ...

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