Sunday, 2 November 2014

लेकिन इन प्रेम कहानियों में तो फ़्लर्ट है, छलना है, नाटकीय, प्रायोजित मोड़ और कल्पित संभावनाएं हैं


प्रताप दीक्षित                              

     दयानंद पांडेय अपनी कहानी, उपन्यास, आलेख, वक्तव्य ओैर ब्लॉग के माध्यम से अपने पाठकों से संपर्क बनाए रखने के लिए निरंतर प्रयासरत रहते हैं। पाठक उन की प्राथमिकताओं में हैं। उन की कहानियां मनुष्य के सुख-दुख:, श्वेत-श्याम अनुभूतियों ओर उसके अंतर्विरोधों र्की पडताल करती हैं। समीक्ष्य कृति सात प्रेम कहानयां का केंद्रीय विषय प्रेम है। प्रश्न उठता है कि प्रेम है क्या? रौय क्राफ्ट ने कहा है  - मैं तुम्हें प्रेम करता हूं इस लिए नहीं जो तुम बन गए हो बल्कि इस लिए जो तुम मुझे बना रहे हो। अर्थात अपने को समर्पित कर देना और अपने में उसे महसूस करना - यह है प्रेम। यह अपने क्षुद्रतम से उठ कर अपने ही उच्चतम को पाने का प्रयास है। खुसरो के ब्दों में जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार।

     किसी भी भाषा के साहित्य आरंभिक दौर से ही प्रेम महत्वपूर्ण उपादान रहा है। प्रेम जीवन का एक शाश्वत सत्य है। वस्तुत: प्रेम मनुष्य की स्वतंत्रता की चरम अभिव्यक्ति का प्रतीक है। समाज में पारंपरिक नैतिक मान्यताओं के कारणों से इसे दमित किया गया। परंतु साहित्य में यह सदा जीवित रहां। साहित्य में भी बीच बीच में प्रगतिशीलता की छद्म अवधारणा में कहानी-उपन्यासों यह निष्कासित तो नहीं हुआ लेकिन वर्जनाएं इस पर हावी रहीं। बदलते समय के साथ प्रेम भी वह नहीं रह गया जो कभी था। यह कहानियां प्रेम के इसी बदलते स्वरूप की कहानियां हैं।
 
     संग्रह की पहली कहानी मैत्रेयी की मुश्किलें एक स्त्री की आयामहीन आकांक्षाओं, पंख पसारने और प्रेम की तलाश में भटकने की त्रासदी की असमाप्त गाथा है। मृगतृष्णा के पीछे इसी भटकाव में दो-दो विवाहों की असफलता के बाद वह स्वयं नहीं जानती कि वह क्या चाहती है? कहानी के अंत में, सामाजिक वर्जनाओं को नकारते हुए, वह किसी समय के अपने प्रेमी नागेंद्र , जो विवाहित है, के सानिघ्य में विश्रांति की तलाश करती है। कहानी में एक ओर मैत्रेयी के माध्यम से स्त्री के अवचेतन में दबी असुरक्षा की भावना है, दूसरी ओर उस की आकांक्षाओं और निर्द्वन्द्व सामाजिक नैतिकता की वर्जनाओं का द्व्न्द्व कहानी के अंत में नागेंद्र का स्वकथन, तुम इस नालायक के लिए जो तुम्हें आवारा-रंडी समझता है, के लिए आत्महत्या कर तितली बनना चाहती थीं। एक ओर प्रेम के संबध में स्त्री और पुरुष के नजरिए को बताता है, दूसरी ओर एक पल के लिए नागेंद्र जैसे पुरुष को भी आत्मान्वेषण के लिए विवश करता है।
 
     बर्फ़ में फंसी मछली एक पुरुष की प्रेम की तलाश की असमाप्त यात्रा है। कहानी एक प्रश्न भी करती है कि प्रेम क्या जस्ट गिव एंड टेक है, एक टाइम पास’, ऊब से निजाज पाने का साधन या बाज़ार का एक जिंस जहां भावनाओं, प्रेम सब के दाम रोज तय होते हैं? वस्तुत: कथा नायक तो लडकियों को फ्लर्ट करता है। प्रेम ने स्वयं उसे तलाश लिया है। इस सब के बीच जब उसे इस का अहसास होता है तब सब कुछ समाप्त हो चुका है। उसे प्रतीत होता है कि प्रेम बर्फ़ में फंसी हुर्इ मछली की भांति है जिसे वह देख तो सकता है, छू नहीं सकता।
  
     एक जीनियस की मौत उस अंतर को रेखांकित करती है ​जहां प्रेम अपने मूल स्वरूप में अमूर्त-वायवी होता है। समाज, नियम, विवाह ऐसी सीमाएं इसे नहीं बांध पातीं। प्रेम के नीचे का धरातल आधारहीन होता है। लेकिन समाज, परंपराएं, दुनियादारी, यथार्थ की जमीन पर खडे होते हैं। यह अंतर दोनो को दो अलग अलग द्वीपों में कैद कर देता है। इस से विद्रोह उन दोनों की ही नहीं, उन से संबंधित लोगों की भी, अभिशप्त यातना की त्रासदी का सबब बन जाता है। इन्हीं स्थितियों के कारण प्रेम को छलना, स्वार्थ ऐसी संज्ञा दे कर कटघरे में खड़ा कर देते हैं।
 
     प्रेम अपनी तमाम विसंगतियों-विरूपताओं के बावजूद एक गहन अनुभूति है। फोन पर फ्लर्ट पहला प्रश्न यह उठाती है कि लेखक ने इसे प्रेम कहानी क्यों कहा है? संचार के अधुनातन साधनों, मोबाइल, इंटरनेट, चैटिंग आदि के बीच संबध विकसित हो जाना अस्वाभाविक नहीं। परंतु  कथानायक पीयूष जिस प्रकार अनजाने गलत फोन मिलने पर जिस हद तक वार्तालाप आगे बढाता है वह प्रेम की अवधारणा के विपरीत ही नहीं अयथार्थ और अस्वाभाविक प्रतीत होता है। जिन प्रसंगों को उन की वार्तालाप के बीच लाया गया है वे सचेष्ट लाए गए आरोपित हैं।
 
     प्रतिनायक मैं किशोरावस्था में स्फुरित भावनाओं-आकर्षण की सहज अभिव्यक्ति है। किसी किशोर के मन में किसी के प्रति मौन चाहत पलती रहती है। वह इस का इज़हार भी नहीं कर पाता। जीवन में यह भूली-विसरी कोमल यादों का एक हिस्सा बन कर रह जाती हैं। कभी कभी यह मनोग्रंथि भी बन जाती है। इस कहानी का भावुकतापूर्ण अंत सातवे दशक की एक सफल फिल्म का आधार बनती है।

 
     सुंदर भ्रम भी अनकहे-अनभिव्यक्त प्रेम की स्मृतियों ओर जीवन की दुश्वारियों के बीच उन विवशताओं की कहानी है जहां अतीत कभी वापस नहीं लौटता।
 
     असफल प्रेम (जो विवाह-मिलन के चरम तक नहीं पहुंच सका है) ही सफल होता है। वस्तुत: इसे ही साहित्य और कला में प्रेम की संज्ञा से रूपायित किया जाता है। वक्रता भी, देव ओर अनु की, इसी असफल प्रेम की गाथा है जहां वे एक दूसरे को जीवन-पर्यंत भूल नहीं पाए हैं। अपने प्रेम की स्मृतियों  को चिरजीवित रखने के लिए वे अपनी संतानों (एक का पुत्र, दूसरे की पुत्री) को एक दूसरे का नाम दे देते हैं। स्वाभाविक है कि कहानी के विकास क्रम में उन के पुत्र-पुत्री आपस में प्रेम करते हैं। कहानी के अंत में उन्हें , तामाम संवादों के बाद, अपने बेटे-बेटियों के मिलन से अंतत: संतुष्ट होना ही है। दयानंद ने फिल्मों पर भी काफी लिखा है। उन की कुछ कहानियां, वक्रता सहित, यह प्रमाणित करतीं हैं कि उन में लोकप्रिय फिल्मी-कथा-लेखन की प्रबल संभावनाएं हैं।
 
     संग्रह की अधिकांश कहानियां प्रेम के संबंध में आरंभ में बताई गई परिभाषा के आधार पर प्रेम की कहानियां प्रतीत नहीं होतीं। इन में फ़्लर्ट है, छलना है, नाटकीय, प्रायोजित प्रतीत होते मोड़ और कल्पित संभावनाएं है, तो स्व को समर्पित और विलीन करने की भावना।   
 
     प्रेम जीवन की आदिम गहनतम, एक हद तक अमूर्त अनुभूति है और स्व को विलीन करने की भावना है। रंगों और सुरों के द्वारा सदा से अभिव्यक्त करने की चेष्टा की गर्इ है। संगीत की रागनियां, अजंता, एलोरा, खजुराहो इसके प्रमाण हैं। परंतु इस: इस अकथ गाथा को ब्दों में बांधना कठिन रहा है। कथ्य अपने अनुरूप शिल्प और भाषा ले कर आता है। इन कहानियों की भाषा में उस गहरार्इ की कमी है जो किसी रचना को पाठक की स्मृति-कोष में लंबे समय तक संचित कर देती हैं।

 [ कथाक्रम से साभार ]



समीक्ष्य पुस्तक :
 
सात प्रेम कहानियां
लेखक - दयानंद पांडेय
प्रकाशक
राष्ट्रवाणी प्रकाशन
511 / 1 - ई , शाप नंबर 2 , गली नंबर 2 ,
विश्वास नगर औद्योगिक क्षेत्र , शाहदरा , दिल्ली -110032
मूल्य - 300 रुपए
पृष्ठ - 160  

प्रकाशन वर्ष -  2014  



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