Saturday, 7 April 2012

हिंदी फ़िल्में पोएटिक जस्टिस देती हैं: अमिताभ बच्चन

अमिताभ बच्चन एक नया शिखर गढ़ कर अब फिर से सक्रिय हैं। मिलेनियम स्टार कोलकाता में कब का भगवान का रूप ले चुके हैं। हां, उन के फैन ने उन का मंदिर बना दिया है तो भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री और फिर पद्म भूषण से भी विभूषित किया है। लंदन के संग्रहालय में कुछ चुने हुए लोगों के साथ मोम से बनी उन की स्टैच्यू भी उपस्थित है। कौन बनेगा करोड़पति के बारी-बारी के दो सीजन ने उन के कैरियर में एक नया आकाश गढ़ा और कभी खुशी, कभी गम से उन की धमक हिंदी फ़िल्मों में जो फिर से शुरु हुई है बरास्ता बागवान, नि:शब्द, ब्लैक, पा और प्रकाश झा की राजनीति से वह अभिनय की एक नई धरती, नया आकाश रच कर सब को अपना मुरीद बना चुके हैं। लोग उन पर वैसे ही न्यौछावर हैं जैसे वह अपने पिता हरिवंश राय बच्चन की कविताओं पर न्यौछावर हैं। लोग उन की अदाओं पर वैसे ही झूमते हैं जैसे झूम कर वह मधुशाला गाते हैं। और बिलकुल अभी नई आई फ़िल्म कहानी में विद्या बालन पर फ़िल्माया गया गीत जो रविंद्रनाथ टैगोर का लिखा हुआ मशहूर गीत है, बरसों से जाने कितने लोग गा चुके हैं, ‘एकला चलो रे !’ को अमिताभ बच्चन ने जिस लय और लगन से गाया है, खास कर उन का जो बांग्ला उच्चारण है, वह विभोर कर देता है। और उन की गायकी तो बस पूछिए मत! यहीं उन की फ़िल्मों में दी गई कुछ यादगार कमेंट्री भी याद आ जाती हैं। सत्यजीत राय निर्देशित शतरंज के खिलाड़ी हो या आशुतोष गोवारिकर निर्देशित लगान। अभी हालिया आई पी एल पर प्रसून जोशी की कविता का पाठ भी यहां जोड़ लेते हैं। अभिनय, आवाज़, विनम्रता और उस की मार्केटिंग का कौशल कहिए, नसीब कहिए या कुछ और अमिताभ बच्चन में यह सब ऐसे घुले-मिले हैं कि कई बार बड़े-बड़े फीके पड़ जाते हैं और अमिताभ बच्चन बाज़ी मार ले जाते हैं। अमिताभ बच्चन अब तो जब-तब लखनऊ आते ही रहते हैं। पर पहले इतना नहीं आते थे। पर १९९६ में जब वह लखनऊ आए थे, तब राष्ट्रीय सहारा के लिए अमिताभ बच्चन से दयानंद पांडेय ने एक लंबी बातचीत की थी। यहां पेश है उसी बातचीत के कुछ अंश:


भावुकता, ग्लैमर और विनम्रता का कोलाज देखना हो तो अमिताभ बच्चन से मिलिए। साफगोई और सलीका उनके शस्त्र है। कोई तीन दशक से लोगों के दिलों पर राज करने वाले अमिताभ बच्चन अगले जनम में अभिनेता नहीं, पत्रकार बनना चाहते हैं, इस लिए कि पत्रकारों के पास सवाल पूछने का अधिकार होता है जो किसी और के पास नहीं होता। बावजूद तमाम सफलता के वह यह बात बड़ी भावुकता के साथ कहते हैं, ‘अगर सलीम जावेद न होते तो हम, हम न होते।’ दीवार को वह अपनी परफेक्ट फ़िल्म बताते हैं और वहीदा रहमान को पसंदीदा नायिका। अपने पिता हरिवंश राय बच्चन का वह ज़िक्र करते हैं और तीन घंटे की हिंदी फ़िल्मों के अंत को ‘पोएटिक जस्टिस’ करार देते हैं। पेश है बातचीत:

कोई तीन दशक[अब चार दशक] से आप का जादू, आप का नशा लोगों पर छाया हुआ है। एक साथ तीन-तीन पीढिय़ां आप पर फिदा हैं। संभ्रांत वर्ग भी फ़िदा है और निम्न वर्ग भी। राज बताएंगे?
-यह सच नहीं है। मैं तो ऐसा नहीं मानता हूं कि ऐसी स्थिति है। यह ज़रूर है कि कुछ ऐसी फ़िल्में कीं, जो सभी वर्ग के लिए पसंद करते हैं। जो आप तीन पीढिय़ों की बात कर रहे हैं वह टेलीविजन की प्रतिष्ठा की वजह से है। टेलीविजन के कारण हमारी याद जागृत हो गई है। कम उम्र के बच्चे जो शायद तब पैदा भी नहीं हुए होंगे, जब मेरी फ़िल्में आईं थीं। आज वह बच्चे भी फ़िल्में देख रहे हैं।

आप ने एक से एक सुपर-डुपर फ़िल्में कीं। पर कोई एक क्लासिक नहीं कीं?
-ऐसी ही फ़िल्मों में काम करेंगे जैसी लिखी जाएंगी। सही मायने में आज के दौर में जो लिखा गया, वही किया।

पर आप को तो फ्रेम में रख कर एक नहीं कई फ़िल्में लिखी गईं।
-हां।

आप चाहते तो अपने लिए कोई क्लासिक भी फ्रेम करवा सकते थे।
-ऐसा भी नहीं रहा।

कहा जाता है कि आप डिक्टेट करने की स्थिति में हमेशा रहे हैं?
-यह सब सुनी सुनाई बातें हैं। सच यह है कि मैं ने कभी किसी को डिक्टेट नहीं किया।

आप ने ग्लैमर और संघर्ष दोनों ही भरपूर जिया है। अगर ज़िंदगी की शुरूआत फिर से करनी हो तो ग्लैमर से शुरू करना चाहेंगे कि संघर्ष से?
-संघर्ष से। संघर्ष ज़्यादा दिलचस्प है।

आप ने एक बार एक इंटरव्यू में यह किस्सा बताया कि आप कार चला रहे थे। चौराहे पर रेड लाइट के नाते कार रोकी तो एक आदमी आया और गाली दे कर बोला कि मेरी मेहनत के तीन रुपए तुम ने बर्बाद करा दिए! आप नाराज होते कि पीछे बैठे पिता ने कंधा पकड़ क़र रोक दिया। पर तब से आप ने दर्शकों की मेहनत की कमाई का ध्यान रखा! पर बाद के दिनों में यह ध्यान मेनटेन नहीं रहा। आप की कई फ़िल्मों ने उदास किया।
-यह घटना सही है। यह तो व्यवहार है पेशे का। कुछ चीज़ें चलती हैं, कुछ नहीं।

राजनीति पर?
-राजनीति एक भावनात्मक डिसीजन (निर्णय) था, जिस में भावना थी, डिसीजन नहीं था, एक भावुक समय था, भावना में बह कर खड़े हो गए। पर राजनीति में भावना के बजाय और चीज़ें काम करती हैं। जो मुझे नहीं आती। अपनी कमियां, त्रुटियां थीं, उन्हें ऐसे माध्यम से जनता के ऊपर डालना ठीक नहीं था। जनप्रतिनिधि की एक दिशा होती है, वह कला मुझ में नहीं थी। ‘फेल्योर’ मान कर छोड़ दिया। जो काम आता नहीं था तो छोड़ दिया।

किसी का नाम भी लेना चाहेंगे इस बावत?
-किसी का नाम क्यों? अपनी ही कमियां थीं।

राजीव गांधी आप के बचपन के मित्र थे। अब नहीं हैं। कैसा लगता है?
-किसी भी मित्र के साथ बचपन के दिन गुज़ारे हों तो न रहने पर बहुत दुख होता है।

आप बार-बार राजनीति से इतर रहने की बात कहते रहे हैं, पर आप एक वोटर भी तो हैं?
-वोटर के कई एक व्यक्तिगत एक्शंस होते हैं, इसे व्यक्तिगत रहने दें।

चलिए छोड़ते हैं। फ़िल्मों पर ही आएं। राजकपूर की हसरत थी आप को डायरेक्ट करने की। आप की हसरत?
-मैं भी चाहता था कि उन के जैसे काबिल डायरेक्टर के साथ काम करूं।

पर हम आप की हसरत जानना चाहते थे?
-हसरत हमेशा ही रहती है। हर कलाकार चाहता है नए सिचुएशन पर काम करें।

मेरा मतलब था कोई खास रोल करने की तमन्ना?
-खास तो तभी होगा, जब कोई दिखाए या सामने आए।

आप के अभिनय में जो संवेदनहीनता या संवेदनशीलता उभर कर सामने आती है, उस संवेदन हीनता या संवेदनशीलता को उभारने में कवि पुत्र होना भी कहीं काम आता है क्या? कहूं कि कहीं कवि पिता की संवेदनशीलता के संस्कार को ‘एक्सप्लायट’ करते हैं क्या आप अपने अभिनय में?
-हिंदी साहित्य का, कविता का माहौल बचपन से ही मिला है। कई एक जगह ऐसा हुआ है। कई बार ऐसे मोड़ पर पहुंचते हैं तो बाबू जी से उन की कविता से निचोड क़र उदाहरण बना कर प्रयत्न करते हैं।

हम कहा कि हमहूं ‘चिड़िया मारि आई’ वाले वीडियो कैसेट पर कई साहित्यकारों ने आपत्तियां जताईं।
-ईर बीर फत्ते की बात कर रहे हैं। पर साहित्यकारों की आपत्तियों के बारे में मुझे नहीं मालूम।

साहित्यकारों की आपत्ति लोकगीत को पॉप में ढालने को ले कर थी।
-लय और रिद्म की कोई भाषा, परिभाषा होती नहीं। चाहें ढोलक बजा लें चाहें आर्केस्ट्रा उसे सुन कर आम आदमी झूमेगा। तो ऐसा कहना कि लोकगीत का निरादर किया गया ठीक नहीं है। उसे बेहतर बनाने के लिए किया।

आप ने कहा था कि लोकगीतों का यह सिलसिला आगे और बढ़ाएंगे। पर फिर कोई नया कैसेट आया नहीं?
-आगे बढ़ाने के लिए समय चाहिए।

आपने बच्चन जी की मधुशाला की भी वीडियो कैसेट बनाने की बात कही थी।
-मधुशाला का वीडियो कैसेट बनाना तो चाहता हूं, पर ध्यान देने भर का समय नहीं है।

फिर भी कब तक ध्यान देने भर का समय मिलेगा। साल, दो साल, दस साल?
-नहीं, नहीं, इतना दूर नहीं। शीघ्र ही।

फ़िल्म से इतर कोई योजना?
-प्रोडक्शन का काम है। सात रंग के सपने, लवेरिया, नाम क्या है आडियो टाइटल्स है। पर फ़िल्म से अलग कोई योजना नहीं।

फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों की हत्याओं पर?
-जाहिर है कि दुखद है। देख सुन कर दुख होता है। इन घटनाओं के चलते बहुत से लांछन फ़िल्म इंडस्ट्री पर लगे हैं, पर जब तक कुछ साबित न हो जाए, तब तक कोई टिप्पणी करना ठीक नहीं है। इस लिए भी कि सब के माथे पर तो लिखा नहीं होता कि वह क्या है और कैसा है? पर इंडस्ट्री में साफ सुथरे लोग रहें, प्रयत्न यही है। साफ-सुथरे वातावरण में काम करें। फ़िल्म इंडस्ट्री हादसों से पीडि़त है, पर यह एक बहुत ही टेंपरेरी फ़ेज़ है। जल्दी ही इस से बाहर निकल आएंगे।

फ़िल्मों में जो आप की सुपर नायक की छवि है, वह अपने पीछे एक भारी शून्य रोपती है। आप की टिप्पणी?
-कोई जगह लेने के लिए काम करता नहीं है। सब अपनी-अपनी जगह पर हैं। हम सब कलाकार हैं, सह कलाकार हैं। सब की अपनी प्रतिष्ठा है। भगवान की कृपा, जनता और माता-पिता का आशीर्वाद है कि लोग देखना पसंद करते हैं।

पर जैसे दिलीप कुमार, राजकपूर, देवानंद, राजेश खन्ना बारी-बारी सभी स्टारडम छोड़ते गए और कोई न कोई किसी न किसी की जगह भरता रहा। पर आप की जगह भरना तो दूर, कोई आसपास भी नहीं है।
-ऐसी बात नहीं है, अभी भी सब हैं। शाहरुख हैं। नई पीढ़ी।

पर आप वाला स्टारडम कहां हैं इन के पास?
-ऐसा नहीं है। मेरी स्वयं अपनी फ़िल्में भी पिटी हैं। समय में भी परिवर्तन हुआ है। दर्शकों का दृष्टिकोण बदला है। मनोरंजन का कोई एक साधन नहीं है। पहले सिर्फ़ फ़िल्म थीं। अब कई विकल्प हैं। फ़िल्में जितनी पहले चलती थीं, अब नहीं चलतीं। इस लिए भी ऐसा हो सकता है।

पर आप के पीछे शून्य तो है न?
-नहीं। शून्य आप के मन में है।

अब तक के फ़िल्मी सफर में आप के मन की फ़िल्में?
-बड़ा कठिन प्रश्न है। अगर आप जिद करेंगे तो अपनी फ़िल्मों को तीन हिस्सों में बांट कर बात करूंगा। आनंद, अभिमान, मिली, चुपके-चुपके आदि ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्में। फिर जंजीर, दीवार, शोले, कभी-कभी आदि देसाई, मेहरा, सिप्पी और चोपड़ा वाली फ़िल्में। तीसरे खंड में अग्निपथ, शहंशाह, खुदा गवाह, टीनू आनंद, मुकुल आनंद आदि की फिल्में।

पर जंजीर और अभिमान दोनों लगभग एक साथ आईं और हिट रहीं। अभिमान भी हिट थी और जंजीर भी। आप चाहते तो अभिमान वाला रास्ता पकड क़र भी चल सकते थे?
-यह कहना बड़ा मुश्किल है। किस के साथ जाएं, किस के साथ नहीं। उस वक्त तो लगता था कि काम नहीं मिला तो कहां जाऊंगा। फिर ऐसा भी नहीं हुआ कि ऋषि दा के साथ मैं ने फिर काम नहीं किया। शोले, दीवार के बाद ही ऋषि दा की बेमिसाल और जुर्माना की। ‘मैं आजाद हूं’ जैसी फ़िल्म भी की, पर चली नहीं। कामर्शियली जब कोई फ़िल्म रिटर्न नहीं देती तो कोई फाइनेंस नहीं करता। नहीं, मैं तो आज भी ऐसी फ़िल्में करने को तैयार हूं।

पर जादूगर जैसी फ़िल्में पिटने के बाद भी उस फ्रेम की फ़िल्में बनती रहीं?
-हां।

अपनी फ़िल्मों में से किसी एक फ़िल्म का नाम लेंगे? जो मुकम्मल लगती हो।
-दीवार जो बहुत ही कंपलीट फ़िल्म थी। स्क्रीन प्ले में कोई दोष नहीं निकाल सकता।

बावजूद इस के दीवार एक निगेटिव फ़िल्म थी।
-हां, निगेटिव थी, यह बात मानता हूं।

पसंदीदा हीरोइन?
-वहीदा रहमान।

पसंदीदा हीरो?
-दिलीप साहब।

पसंदीदा निर्देशक?
-गुरुदत्त, विमल राय। इन की फ़िल्में आज भी देखता हूं।

सलीम-जावेद न होते तो आप क्या होते?
-सलीम-जावेद न होते तो, हम, हम न होते।

सलीम-जावेद की जोड़ी अलग हुई तभी से आप की फ़िल्में भी बदलीं।
-जब से वे अलग हुए तब से कुछ बदला है। अलग होने के बाद उन्हों ने ऐसी चीज़ भी नहीं लिखी।

आप ने एक कराने की कोशिश नहीं की?
-उन का निजी मामला था।

बीते दिनों आप ने बेटी की शादी की। अब कैसा लगता है?
-खुशी का अवसर होता है कि बेटी घर से जा रही है...पिता की भावनाएं होती हैं। हमारे संबंधी बहुत अच्छे हैं।

बेटे की शादी कब कर रहे हैं?
-इस का निर्णय तो मुझे लगता है कि वही करेंगे। उन के बड़े होने, सीखने की उमर है।

आप अगले जनम में क्या बनना चाहेंगे?
-इस जगह, जिस जगह आप हैं।

मतलब?
-पत्रकार बनना चाहूंगा।

ऐसा क्यों? आप जानते हैं कि यहां ग्लैमर नहीं, सिर्फ़ संघर्ष है।
-संघर्ष के बावजूद जो एक अधिकार है पत्रकार के पास सवाल पूछने का अधिकार। कई मायने में मेरे पास नहीं है।

आप निर्देशन भी करना चाहेंगे?
-नहीं। बस अपनी सीमा यहीं तक है।

और क्या-क्या सीमाएं हैं?
-बाप रे! सीमा ही सीमा है। कलाकार के रूप में कितनी सीमाएं हैं। सही ढंग से उस का परिचय हो, प्रतिदिन एक प्रयत्न रहता है।

आप की ही क्या हिंदी फ़िल्मों में एक ट्रेंड सा है सत्य का असत्य पर जीत का। फटाफट जीत का। जब कि समाज में चीज़ें इस से उलट हैं। खास कर अदालत और पुलिसिया मामलों में।
-बाबू जी इन दिनों अस्वस्थ रहते हैं। पर रोज शाम को मेरी फ़िल्में ज़रूर देखते हैं। मैं उन से पूछता हूं क्यों देखते हैं, क्या धरा है इन में? तो वह कहते हैं कि इन फ़िल्मों में तीन घंटे के अंदर जो ‘पोएटिक जस्टिस’ मिल जाता है, वह इंसान को जीवन भर नहीं मिल पाता है। मैं एक बार रूस गया था। वहां मेरी फ़िल्में बहुत चलती हैं। एक आदमी से मैं ने इस बाबत पूछा तो वह बोला कि जब मैं हिंदी फ़िल्म देख कर बाहर आता हूं तो मेरे चेहरे पर हल्की मुस्कान होती है और गाल पर एक बूंद आंसू!

1 comment:

  1. बहुत विस्तार से आपने उनका साक्षात्कार लिया। सवाल भी मिले-जुले थे,,, चाहे व्यक्तिगत हो,, पेशेवर हो या चुभने वाला। पर आखिरी सवाल में हरिवंश राय बच्चन का विचार और रूसी दर्शक का अनुभव​ काफी महत्वपूर्ण लगा।

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