Saturday, 28 April 2012

भोजपुरी फ़िल्मों के साथ एक-दो दिक्कत होती तो चल जाता : राकेश पांडेय

राकेश पांडेय सत्तर के दशक में हिंदी फ़िल्मों मे जैसे धूमकेतु की तरह आए थे। मृगतृष्णा जैसी फ़िल्मों के नायक बन कर वह आए और राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाज़े गए। सारा आकाश से लगा कि जैसे अब हिंदी फ़िल्मों का आकाश अब उन्हीं का है। एक गांव की कहानी में भी उन की सफलता की कहानी सब के सामने थी। पर जाने क्या हुआ कि वह अचानक बिसरने लगे। माया नगरी उन्हें किनारे लगा ही रही थी कि वह अचानक बलम परदेसिया जैसी भोजपुरी फ़िल्म के नायक बन कर छा गए। गोरकी पतरकी रे गाना गली-गली, सड़क-सड़क पर, खेत-खलिहान, मेड़, गांव, गिराव हर कहीं गाने लगे लोग, बजाने लगे लोग। लेकिन जल्दी ही यह दौर भी निकल गया। दूरदर्शन पर धारावाहिकों का दौर आ गया। राकेश पांडेय धारावाहिकों में भी सक्रिय हुए। पर जल्दी ही वह निर्माता-निर्देशक बनने की राह पर आ गए। क्या बड़ा परदा, क्या छोटा परदा दोनों ही जगह उन के अभिनय की उपस्थिति पर जैसे विराम लग गया। अब जब फिर भोजपुरी फ़िल्मों धारावाहिकों का दौर चला तो वह निर्माता-निर्देशक के साथ ही चरित्र भूमिकाओं में भी आने लगे हैं। कभी कभार हिंदी फ़िल्मों में भी वह संक्षिप्त भूमिकाओं में दिख जाते हैं, और अपनी गहरी छाप छोड़ जाते हैं। १९९१ में वह लखनऊ आए थे, फ़ैज़ाबाद और अयोध्या भी गए थे। अमृतलाल नागर के उपन्यास मानस के हंस पर तब वह मोहित थे। और उसी पर धारावाहिक बनाने की गरज से वह लखनऊ आ जा रहे थे। मानस का हंस पर धारावहिक हालां कि बाद के दिनों में खटाई में पड़ गया। पर तब वह न सिर्फ़ सक्रिय थे बल्कि एक जुनून सा उन पर सवार था मानस का हंस को ले कर। नवभारत टाइम्स के लिए दयानंद पांडेय ने उन से बात की थी तब यह बातचीत।



कोई ५०-६० से अधिक फ़िल्मों के नायक राकेश पांडेय उत्तर प्रदेश और बिहार सरकारों के भोजपुरी फिल्मों के प्रति उदासीन रवैए से बहुत दुखी, क्षुब्ध और छटपटाए हुए थे तब। राकेश पांडेय इन दिनों मानस के हंस उपन्यास पर दूरदर्शन धारावाहिक बनाने के लिए लखनऊ में लोकेशन देखने आए हैं। अमृतलाल नागर के उपन्यास मानस के हंस को चूंकि वह प्रमाणिक ढंग से बनाना चाहते हैं, इस लिए वह शूटिंग से पहले की तैयारियों में व्यस्त हैं। वह कहते हैं कि नहीं, मैं ने दूरदर्शन पर महाभारत भी देखी है और उस महाभारत में जो गंगा दिखाई गई है उस से मैं बचना चाहता हूं। मैं बंबई में अयोध्या नहीं दिखाना चाहता। मैं सचमुच की अयोध्या दिखाना चाहता हूं। प्रामाणिक ढंग से। क्या विवादित इमारत भी दिखाएंगे? जवाब देते हैं, नहीं, यह मेरा विषय नहीं है। पर सरकार अगर इजाजत देगी तो कनक भवन, सरयू, यह सब चीज़ें दिखाऊंगा। फिर वह तुलसीदास का एक छंद सुनाते हैं। ‘मैं मांग के खइबो, मासित[मस्जिद] में सोइबो/ लेबो के एक न देबो के दो।’ वह कहते हैं कवितावली में उन का यह छंद आंखें खोलने वाला है। फिर वह बताते हैं कि अमृतलाल नागर जी का चौक स्थित मकान भी शूट करूंगा। फिर वह जैसे जगते हैं ‘राम मंदिर की भी शूटिंग करूंगा, अगर सरकार इज़ाज़त दे दे।’

‘और जो दूरदर्शन इस फेर में आप का सीरियल रद्द कर दे इस बिना पर तो?’

वह बोले, ‘मैं तो आशान्वित हूं कि मानस का हंस इतने बड़े लेखक की रचना दूरदर्शन रिजेक्ट नहीं करेगा। यह टोकने पर कि, ‘अगर रिजेक्ट फिर भी हो गया तो?’ उन का कहना था, ‘मैं ने यह मान कर भी आवेदन नहीं किया कि रिफ्यूज नहीं होगा।’


‘तो क्या बड़े लेखक का नाम भुनाना चाहते हैं आप?’

‘नहीं, ऐसी बात भी नहीं है। 1975 में एक गांव की कहानी की शूटिंग के दौरान सी एस दुबे ने मानस का हंस पढ़ने को दिया था। तब से यह उपन्यास मेरे दिमाग में था। मैं मानस का हंस पर फ़िल्म बनाना चाहता था, पर फ़िल्म चूंकि बड़ा ग्लैमर मांगता है और कठिन भी है तो मैं ने टी.वी. सीरियल की सोची।

राकेश पांडेय मूल रूप से बनारस के रामनगर के निवासी हैं, पर वह पले बढ़े और बी.ए. तक पढ़े शिमला में। अब वह बंबई में रहते हैं, पर उन की ढेर सारी रिश्तेदारियां उत्तर प्रदेश में ही है। जैसे कि उन की एक बहन यहीं लखनऊ में हेवलक रोड पर रहती हैं। ढेरों भोजपुरी और हिंदी फ़िल्मों में अभिनय कर चुके राकेश पांडेय की पहली फ़िल्म आंसू बन गए फूल थी। सारा आकाश, मृगतृष्णा, एक गांव की कहानी, बलम परदेशिया, भईया दूज आदि उन की महत्वपूर्ण फ़िल्में हैं। इस के अलावा गुजराती और नेपाली फ़िल्मों में भी उन्हों ने काम किया है। बंसुरिया बाजे गंगा तीर तथा तुलसी सोहे हमार अंगना जैसी भोजपुरी फ़िल्मों का निर्देशन भी राकेश पांडेय ने किया है।

भोजपुरी फ़िल्मों की दरिद्रता की बात चली तो राकेश पांडेय बिलबिला गए। कहने लगे ‘भोजपुरी फ़िल्मों के साथ एक-दो दिक्कत होती तो चल जाता। यहां तो दिक्कतें ही दिक्कतें हैं। कोई थाह नहीं है इन की। भोजपुरी दर्शकों का अपनी भाषा के प्रति सम्मान नहीं है तो सरकारों को भी इस की परवाह नहीं है।’ कहते हुए वह जैसे छटपटाने लगते हैं, ‘हालत यह है कि भोजपुरी दर्शक पहले अमिताभ बच्चन की फ़िल्म देखता है फिर समय मिला तो खुली खिड़की टाइप दक्षिण की फ़िल्म देखेगा। अंग्रेजी फ़िल्में देखेगा, भोजपुरी फ़िल्में देखने को उस के पास समय नहीं है, जब कि बाकी क्षेत्रीय भाषाओं की फ़िल्मों के साथ ऐसा नहीं है। वह जोड़ते हैं, नहीं एम.जी. रामचंद्रन बतौर अभिनेता मुझे कभी अच्छे नहीं लगे, पर उन के दर्शक उन्हें पूजते हैं। वह दर्शक पहले रामचंद्रन की फ़िल्म देखेगा, फिर अमिताभ या किसी और की फ़िल्म।‘

राकेश पांडेय बताते हैं कि, ‘वहां की सरकारें भी उदार हैं। वह गुजराती और मराठी फ़िल्मों का ज़िक्र करते हैं कि ज़्यादातर उन फ़िल्मों पर मनोरंजन कर वहां माफ होता है। अगर लगता भी है तो वह पैसा उन के नाम पर जमा रहता है। दूसरी फ़िल्म बनाने खातिर उन्हें वह पैसा फिर मिल जाता है। इस तरह टिकट का पैसा कम रहने पर दर्शक और पैसा दोनों ही उन फ़िल्मों को मिल जाते हैं। यहां भोजपुरी फ़िल्मों के साथ ऐसा नहीं है। एक तो बिहार और उत्तर प्रदेश दोनों ही जगह गरीबी है। सिनेमा लोगों की जेब से दूर हो रहा है। समय नहीं है। टिकट महंगा है। सरकार अगर सिर्फ़ छह महीने ही भोजपुरी फ़िल्मों को मनोरंजन कर से मुक्ति दिला दे तो देखिए भोजपुरी फ़िल्मों का नक्शा बदल जाए। दुर्दशा से छुट्टी मिल जाए। पर इन दोनों सरकारों को भोजपुरी फ़िल्मों की चिंता नहीं है। तो भोजपुरी फ़िल्मों की दरिद्रता दूर करने का ठेका सिर्फ़ कलाकारों, निर्माता, निर्देशकों के ही जिम्मे क्यों डाल देना चाहते हैं आप?’ वह पूछते हैं।

राकेश कहते हैं, मैं तो गोदान पर फिल्म बनाना चाहता हूं, लेकिन डर है कि गोदान जैसी बड़ी कृति को लोग कहीं नकार न दें।’ वह बताते हैं कि, ‘भोजपुरी फ़िल्मों के साथ एक दिक्कत यह भी है कि कम पैसे में बनीं और चल गई तो लोगों को लगता है कि हम भी क्यों न भोजपुरी फिल्म बनाएं। सो, 50-60 फिल्में भोजपुरी में बनने लगती है। फिर सब पिट जाती हैं।’ वह बताते हैं कि, ‘बलम परदेसिया के बाद यही हुआ और बलम परदेसिया भी चल गई तो इस लिए कि काफी समय बाद कोई भोजपुरी फ़िल्म आई थी। विदेसिया के बाद सब से कामयाब हिट भोजपुरी फ़िल्मों में बलम परदेसिया ही है।’ वह जैसे जोड़ते हैं, ‘नहीं, बंसुरिया बाजे गंगा तीर मैं ने लीक से हट कर बनाई। गंगा को जितनी खूबसूरती से एक्सप्लायट कर सकता था, किया। पर फ़िल्म पिट गई। कैसे बनाऊं, अच्छी फ़िल्म? वह पूछते हैं।’

यह कहने पर कि, ‘बात यह नहीं। भोजपुरी फ़िल्मों के नकलीपन पर, भोजपुरी परिवेश से उन के दूर होते जाने, उस की संवेदना और शिल्प को न समझ, सतही चीज़ों को दरिद्र ढंग से फ़िल्माने की बात मैं कर रहा था कि आज के गांवों से कोसों दूर क्यों हैं भोजपुरी फ़िल्में? आज के भोजपुरी समाज की धड़कन क्यों नहीं धड़कती है हमारी भोजपुरी फिल्मों में। बिलकुल नकली और सच से इतर क्यों बनती हैं यह फ़िल्में? ’ जैसे सवालों को राकेश पांडेय फ़ार्मूला फ़िल्म और बाक्स आफ़िस की मजबूरियां बता कर टाल गए।

हिंदी फ़िल्मों में भी नौकरों की ही भाषा क्यों होती है भोजपुरी? जैसे सवालों को भी राकेश पांडेय ने इधर-उधर की बातों में सुलटा दिया। हिंदी फ़िल्मों में उन के काम की बात चली तो वह कहने लगे, ‘हिंदी फिल्मों से अलग हूं आजकल। भोजपुरी फ़िल्मों का ही इतना काम है कि हिंदी फ़िल्मों के लिए वक्त नहीं निकाल पाता। दूसरे हिंदी फ़िल्मों में अब बदलाव भी बहुत आ गया है। मैं वहां अपने को फिट नहीं पाता।

‘फ़िल्म में आप नहीं होते तो क्या होते?’ पूछने पर वह बोले, ‘सोचा ही नहीं, कभी कि क्या होते।’

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