दयानंद पांडेय
होने गोरखपुर ने वैसे तो बहुत पत्रकार देखे हैं l पर ज़िंदगी को दांव पर लगा कर विस्फोटक पत्रकारिता करने वाले दो ही पत्रकार देखे हैं l एक पांडेय बेचन शर्मा उग्र दूसरे , श्यामानंद श्रीवास्तव l ब्रिटिश पीरियड में पांडेय बेचन शर्मा उग्र ने तूफ़ान मचा रखा था l ब्रिटिश हुकूमत के समय वह दशरथ प्रसाद द्विवेदी के स्वदेश से जुड़े थे l बतौर अतिथि संपादक l ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ स्वदेश का एक विशेषांक निकाल कर उग्र अंडरग्राउंड हो गए l दशरथ प्रसाद द्विवेदी गिरफ्तार हो गए l उग्र के ऐसे अनेक किस्से हैं l उग्र ने तब गोरखपुर में रह रहे प्रेमचंद को भी स्वदेश से जोड़ा था l बाद में उग्र की परंपरा को श्यामानंद ने गोरखपुर में जारी रखा , बिस्मिल के मार्फ़त l
बिस्मिल अख़बार श्यामानंद की सांस थी l हथियार भी l ख़ास कर इमरजेंसी के समय l उन की पुलिस और प्रशासन से मुठभेड़ की , फ़रारी की अनेक कहानियां हैं l जिस को चाहते थे रगड़ देते थे l तमाम राजनीतिक लोगों से उन की गहरी दोस्ती थी l वीर बहादुर सिंह से तो उन की गलबहियाँ थी l पर मुख्य मंत्री होने के बाद भी उन्हों ने कभी वीरबहादुर सिंह से कोई लाभ नहीं लिया l कभी बिस्मिल अखबार के लिए विज्ञापन भी नहीं मांगा l
वह जब लखनऊ आते थे , वीर बहादुर से मिलते ज़रूर थे l कई बार साथ मैं भी होता था l सब लोग चले जाते तो वीर बहादुर सिंह उन से पुराने दिन बतियाते l पूछते , श्यामानंद कौनो काम होखे त बताव ! श्यामानंद कहते कि बस तू मुख्य मंत्री बनल रहs ! कह कर वह उठ कर सीना तान कर विदा ले लेते ! कई बार बाहर निकल कर या घर आ कर श्यामानंद जी से मैं कहता भी कि तमाम लोग विज्ञापन लूट रहे हैं , आप क्यों नहीं बात करते ? श्यामानंद जी बात टाल जाते l एक बार मैं ने कहा कि अगली बार मैं बात चला दूं, बिस्मिल के लिए l श्यामानंद जी बिगड़ गए l कहने लगे , बिल्कुल नहीं l जब टोका कि क्यों ? कहने लगे कि, का वीर बहादुर नाई जानत हवै कि हमार छोट अख़बार है l हमहूँ के विज्ञापन चाहीं ? उन्हों ने जैसे जोड़ा , मित्र हवै , मित्रता में कौनो विज्ञापन नहीं l ऐसी और भी अनेक घटनाएं हैं l
पर जब श्यामानंद जी को उन को सिविल लाइंस वाले घर से बेदखल किया गया तो जब मुझे पता चला तो फ़ोन किया l कहने लगे , कुछ नाई दयानंद जी , अभी तक हम सब को रगड़ते रहते थे , अब की हम ही रगड़ा गए ! कह कर जैसे वह बुझ गए l
श्यामानंद जी ऐसी मिट्टी के बने हैं कि टूट जाएंगे, पर झुकेंगे नहीं l श्यामानंद जी के पास स्मृतियों का अनमोल खजाना है l किसी के पास समय और मन हो तो उसे कलमबंद कर लेना चाहिए l या आडियो , वीडियो में रिकार्ड कर लेना चाहिए l वह पुरानी बातें ऐसे बतियाते हैं , गोया उन की आँखों में रील चल रही हो l बिस्मिल के लिए जीने वाले श्यामानंद जी , अंतिम बेला में इस तरह बिस्मिल हो जाएंगे, कोई तो क्या वह भी नहीं जानते रहे होंगे l
बिस्मिल मतलब घायल l
एक बार श्यामानंद जी और हरिहर सिंह साथ लखनऊ चले l हमारे घर ही तब सब लोग आते थे l लेकिन आए अकेले हरिहर सिंह l श्यामानंद जी के बारे में पूछा तो कहने लगे कि हम लोग रात रिक्शे से स्टेशन आ रहे थे l रास्ते में एक घायल साँड़ दिख गया l श्यामानंद ने हम को भी रिक्शे से उतार दिया l रिक्शे पर साँड़ को किसी तरह लाद कर अस्पताल ले कर चले गए l एक बार सीतापुर अस्पताल के पास उन की स्कूटर को किसी कार ने टक्कर मार दी l एक फर्लांग दूर घर पर उन के दोनों कुत्तों को जाने कैसे अहसास हो गया l दोनों दौड़ कर पहुंचे l एक ने श्यामानंद की सुधि ली l दूसरे ने कार वाले को भागने नहीं दिया l दबोच लिया l उन की स्कूटर पर दोनों आगे पीछे ऐसे सवार होते थे जैसे बच्चे l
श्यामानंद जी की पत्नी के श्राद्ध के समय मैं ने उन के कुत्तों , बत्तखों, गाय , साँड़ सब को पंक्तिबद्ध खड़े हो कर आँसू बहाते देखा है l
श्यामानंद जी के घर में खूब बड़े से बेडरूम में तोता , बिल्ली , कुत्ता , बत्तख , साँड़, गाय , बछड़ा आदि उन के साथ ही रात बिताते थे l यह मैं ने बारंबार देखा है l बहुतेरी बातें हैं श्यामानंद जी की l उन की बहादुरी , दिलेरी और न झुकने की l विवश ज़िंदगी की भी l
फिर कभी l
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