Sunday, 22 November 2015

फिर खिलने की प्रतीक्षा में है प्रेम


पेंटिंग : राजा रवि वर्मा

तुम मिलती हो तो
मन जैसे अमृत से भर जाता है लबालब
अमृत-अमृत होता है मन
और देह नदी बन जाती है
नदी में प्रेम की मछली कुलांचे मारती है

तुम मिलती हो तो
मन पृथ्वी बन जाता है
खिल उठते हैं
इच्छाओं के अनगिन फूल
आग सुलग जाती है प्रेम की झोपड़ी में

तुम मिलती हो तो
मन नील गगन बन जाता है
प्यार पक्षी
सांझ जल्दी हो जाती है
उड़ती हुई चिड़िया ठहर जाती है

तुम चल देती हो अचानक
प्रेम की इस बेला में
घड़ी की सुई जैसे ठहर जाती है
नदी जैसे विकल हो जाती है
तापमान शून्य हो जाता है

तापमान का यह शून्य तोड़ देता है मन
बहती नदी बर्फ़ बन जाती है
बिछोह बन जाता है ग्लेशियर का टुकड़ा
ठिठुर कर सुन्न हो जाता है
प्रेम का गीत

तुम फिर मिलोगी क्या
बर्फ़ के पिघलने की प्रतीक्षा में है प्रेम
फूल की तरह
फिर खिलने की प्रतीक्षा में है प्रेम
प्रेम जो अमृत हो जाना चाहता है



[ 22 नवंबर , 2015 ]

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