Monday, 30 December 2013

गरज यह कि लड़ाई बहुत लंबी है, देश का आम चुनाव दिल्ली का हलवा पूरी नहीं है

कुछ राजनीतिक टिप्पणियां यह भी


  • अपने कुकर्मों, मंहगाई और भ्रष्टाचार से घिरी, हारी हुई कांग्रेस को दिल्ली शहर में हराना तो अरविंद केजरीवाल और उन की आम आदमी पार्टी के लिए बहुत आसान था। अब जीतती हुई भाजपा और मोदी को हराना उन को एक चुनौेती की तरह लेना चाहिए। बछड़ा उत्साह से बचना चाहिए। क्यों कि भारत देश दिल्ली शहर नहीं है। अंगड़ाई से लड़ाई का अंदाज़ा तो लगाया जा सकता है, ज़ज़्बा तो दिखाया जा सकता है लेकिन लड़ाई को जीत में बदलना भी एक कला है। और जीत को संभालना उस से बड़ी कला। आकाश की ऊंचाई छू लेना आसान है पर उस ऊंचाई को मेनटेन रखना किसी-किसी के ही हिस्से आता है। रही बात मीडिया की तो यह बिना पतवार की नाव है कब किधर कौन बहा ले जाए, वह खुद भी नहीं जानती। दूसरे करैला और नीम चढ़ा यह कि यह मीडिया कारपोरेट की रखैल भी है।

    अरविंद केजरीवाल और उन के साथियों को यह भी जानना चाहिए कि भारत देश में जाति और धर्म एक तथ्य है। कम से कम शादी व्याह और चुनाव का अंतिम सत्य। अपवाद छोड़िए। भारत गांव में बसता है और जातियों और धर्म से ही चलता है। अखबार और टी वी का हस्तक्षेप गांव में भी बढ़ा ज़रुर है पर मनोरंजन के तौर पर ज़्यादा चेतना के तौर पर कम। धूर्त राजनेताओं ने चाहा ही यही। लगभग हर चुनाव में मायावती और मुलायम जैसे लोग मीडिया को जी तोड़ खरीदने के बाद यह कहते भी मिल ही जाते हैं और कि पूरी हुंकार के साथ कि मीडिया मनुवादी है। और पूरे गर्व और फ़ुल बेशर्मी के साथ कहते हैं कि अच्छा है कि हमारा वोटर अखबार नहीं पढ़ता। कड़वा सच यह है ही एक अर्थ में। गरज यह कि अधिकांश वोटर पढ़ा-लिखा नहीं है। साक्षर भी नहीं। शहरी पढ़ा-लिखा आम आदमी नहीं है वह। वह तो दबा-कुचला, निरक्षर और चेतना विहीन है। जिन्हें इन धूर्त राजनीतिज्ञों ने धर्म और जातियों के खाने में बांट रखा है। किसिम-किसिम के प्रलोभनों में बझा रखा है। इन को साक्षर बना कर, चेतना संपन्न बना कर ही कोई बड़ी लड़ाई लड़नी संभव है। खास कर चुनावी लड़ाई। यह आदमी बच्चों को स्कूल भेजता भी है तो मीड डे मील खाने के लिए, पढ़ने के लिए नहीं। और दुर्भाग्यपूर्ण यह कि बच्चे यह मीड डे मील खा कर बीमार पड़ जाते हैं, मर जाते हैं। गरज यह कि लड़ाई बहुत लंबी है, देश का आम चुनाव दिल्ली का हलवा पूरी नहीं है।


  • समाजवाद की यह कौन सी इबारत है?

    बताइए कि जया बच्चन समाजवादी पार्टी की सांसद हैं। लेकिन अमिताभ बच्चन मुंबई में एक कार्यक्रम में राज ठाकरे के साथ बैठ गए तो समाजवादी पार्टी की मुंबई इकाई में जलजला आ गया। अब अमिताभ बच्चन के घरों और उन की सुरक्षा के लिए भारी पुलिस तैनात हो गई है। मुजफ़्फ़र नगर के दंगा राहत कैंपों में ठंड से ३४ बच्चे मर गए हैं। दूर-दूर से लोग आ कर मदद कर जा रहे हैं। लेकिन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उन के पिता मुलायम सिंह यादव जो मुसलमानों के बड़े खैरख्वाह भी माने जाते हैं, प्रधानमंत्री पद के तलबगार भी हैं, को सैफई में लड़कियों का डांस देखने से फ़ुर्सत नहीं है। वहां नहीं जाते। उन का एक अफ़सर मूर्खतापूर्ण बयान देता है कि ठंड से लोग मरते होते तो साइबेरिया में कोई नहीं बचता। और तो और मुलायम खुद कह देते हैं कि इन राहत शिविरों में कांग्रेसी और भाजपाई जमे हुए हैं।


    लालू यादव तक पहुंच जाते हैं वहां और फ़ोन कर अखिलेश से कहते हैं कि बहुत बुरा हाल है, देखो भाई। न हो तो चाचा शिवपाल को ही भेज दो। लेकिन अखिलेश और उन की मशीनरी राहत शिविर के तंबुओं को उजाड़ कर बुलडोजर चलवा देते हैं। एक टी वी चैनल रिपोर्ट में दिखाता है कि कैसे तो लोग वहां के तंबुओं में नरक भुगत रहे हैं। बच्चे, औरतें बीमार हैं। लाचार हैं। पीने का साफ पानी तक नहीं है। दवाई तो बहुत दूर की बात है। हर मर्ज की एक दवा पैरासीटामाल है। एक जलौनी लकड़ी के लिए कैसे तो बड़े बूढ़े, औरतें, बच्चे आते ही एक साथ टूट पड़ते हैं। और इस जलौनी लकड़ी की आग में भी बहु्तेरे बच्चे झुलस चुके हैं। पर इन का भी कोई पुरसाहाल नहीं है। यह सारा दृष्य देख कर कलेजा मुह को आता है। यह कौन सा समाजवाद है? समाजवाद की यह कौन सी इबारत है? हम किस प्रजातांत्रिक देश में जी रहे हैं। यह कौन सा कल्याणकारी राज्य है? इस मंज़र के आगे अदम गोंडवी का वह शेर भी फीका पड़ जाता है :

    सौ में सत्तर आदमी फ़िलहाल जब नाशाद है
    दिल पे रख के हाथ कहिए देश क्या आज़ाद है।

    क्यों कि यहां तो सौ फ़ीसदी आदमी नाशाद है !

  • आप के राजतिलक के पहले दिल्ली के पांच कांग्रेसी विधायकों ने जो गुबार निकाला है भले एक स्टिंग में ही सही और अरविंद ने इस के बाद भी जो कहा कि विश्वासमत की चिंता नहीं है। इस के राजनीतिक फलितार्थ क्या होंगे यह तो अब सभी जानते हैं। लेकिन भारतीय राजनीति का स्वास्थ्य भी सुधरेगा इस की क्या गारंटी है ? इस उम्मीद का क्या करें? क्यों कि काग्रेसी लफ़्फ़ाज़ों को तो अभी मोदी के बुखार से ही फ़ुर्सत नहीं है। आंख फूट गई है पर चेहरे पर शिकन नहीं है।

  • बतौर मुख्य मंत्री नारायण दत्त तिवारी को मैं ने मुख्य मंत्री कार्यालय में ही भोजपुरी में आज़ादी के गीत गाते सुना और देखा है। मुलायम सिंह यादव को कार्यक्रमों में गाना सुनते देखा है। मायावती को भी। लालू प्रसाद यादव को लौंडा नाच देखते देखा है। पर किसी मुख्य मंत्री को ठीक शपथ के बाद गाना गाते और भाषण देते पहली बार मैं ने देखा है। वह अरविंद केजरीवाल को देखा। अब अरविंद केजरीवाल सरकार की उम्र कितनी है यह तो नहीं मालूम पर यह ज़रुर मालूम है कि अब राजनीति के तौर तरीके तो बदलेंगे ही। दिल्ली की सरकारी मशीनरी से रिश्वत तो अब विदा होगी, यह भी तय है। रंगे हाथों पकड़वाने का आह्वान रंग दिखाएगा यह भी पक्का है। कांग्रेस और भाजपा के नेताओं के कांतिहीन चेहरे सचमुच बहुत आनंद दे रहे हैं। 'इंसान से इंसान का हो भाईचारा यही पैगाम हमारा !' जय हो !

  • अरविंद केजरीवाल के मार्फ़त थोड़ी बहुत ही सही राजनीति बदल रही है। क्या पत्रकारिता भी कुछ बदलेगी? पत्रकारिता को भी किसी अरविंद केजरीवाल जैसे की कहीं ज़्यादा ज़रुरत है। जो इसे कारपोरेट, दलाली, दिखावे, और साक्षरों की फौज से छुट्टी दिलवाए और जन सरोकार से जोड़ने की मुहिम चलाए। सच मानिए कि अगर पत्रकारिता साफ सुथरी रहती तो राजनीति इतनी पतित नहीं होती।
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