Tuesday, 29 January 2013

अगर चुटकुले न होते तो हम तबस्सुम न होते

उम्र के पांचवें दशक में भी खिली-खिली, खुली-खुली तबस्सुम मानती हैं कि अगर चुटकुले न होते तो हम तबस्सुम न होते। लेकिन हरदम खिलखिलाने वाली तबस्सुम फ़िल्म इंडस्ट्री में न्यू कमर्स के व्यवहार से दुखी और आहत हैं। इन दिनों वह रानी पद्मिनी पर आधारित दास्ताने इश्क नाम से डी.डी-1 चैनल के लिए एक धारावाहिक बना रही हैं। पेश है तबस्सुम से बातचीत :-

इन दिनों आप क्या कर रही है?
- एक तो गृहशोभा पत्रिका का संपादन। दूसरे डी.डी-1 के लिए एक धारावाहिक बना रही हूं- दास्ताने इश्क। यह रानी पद्मिनी की कथा पर आधारित है। इस का निर्देशन एम. फारुख कर रहे हैं। संगीत उषा खन्ना का है।कलाकारों में मुकेश खन्ना, कृतिका देसाई, संजय शर्मा, पंकज धीर, शाहमीन, पृथ्वी, सुरेंद्र पाल आदि हैं। उम्मीद है कि जनवरी- फ़रवरी तक इस का प्रसारण शुरू हो जाएगा।

क्या आप का बेटा भी इस में काम कर रहा है ?
- नहीं इस धारावाहिक में काम नहीं कर रहा। पर इसे बनाने वाली कंपनी का डायरेक्टर है।

पर आप ने अपने बेटे के लिए एक फ़िल्म तो बनाई थी?
- हां पर वह बच्चों के लिए थी।

वह चली नहीं शायद इस लिए अपने बेटे को अभिनय से हटा दिया?
- नहीं ऐसी बात तो नहीं।

आप बचपन से ही फ़िल्म इंडस्ट्री में हैं तब में अब में क्या फ़र्क दिखता है?
- हां मैं बचपन से हूं फ़िल्म इंडस्ट्री में। पचास बरस से। मैं ने तीन तीन दौर देखे। पहले दौर में अशोक कुमार, दिलीप कुमार का फ़र्क था। फिर दूसरे दौर में अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना का फर्क देखा और तीसरे दौर में गोविंदा तथा शाहरुख खान का फ़र्क देख रही हूं।

तो फ़िल्म इंडस्ट्री में पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी का फ़र्क क्या है?
- फ़िल्म इंडस्ट्री की पुरानी पीढ़ी के लोग प्यार और इज़्ज़त देते थे, आज भी देते हैं। पर न्यू कमर्स इज़्ज़त नहीं देती किसी को। नई-नई लड़कियां तक बोल देती हैं तनूजा कम हियर! सीनियर्स-जूनियर्स का खयाल नहीं रखते न्यू कमर्स।

दिल के बारे में क्या खयाल है?
- माना कि कंप्यूटर युग है यह। पर दिल को कंप्यूटर के बजाय दिल ही रहने दिया जाए। एक शेर सुनिए: दिल दो किसी एक को और किसी नेक को/ ये प्रसाद नहीं जो हर किसी को बांट दो।

आज के ताजा हालात पर क्या सोचती हैं?
- एक शेर में कहूं तो चलेगा?

बिल्कुल।
- तो शेर सुनिए: मैं क्या बताऊं मेरा नेता है किस हालात में/ कुछ हवा, कुछ हवाले में, कुछ हवालात में।

एक समय आप और टी.वी एक दूसरे के पर्याय थे?
- आज भी हैं। टी.वी मतलब दूरदर्शन के भी 25 साल हो गए और दूरदर्शन पर कार्यक्रम करते हुए मुझे भी 25 साल हो गए।

आप की इस सफलता का राज क्या है?
- स्टोरी टेलिंग । मतलब कहने की कला। और चुटकुले।

अगर चुटकुले न होते तो आप क्या होतीं?
- चुटकुले न होते तो हम तबस्सुम न होते।

अच्छे कंपोजर के क्या गुण हैं?
- आइटम से ज़्यादा उस की बातें अच्छी लगें। स्टेज क्विक आनी चाहिए। मुझे स्टेज क्विक का एवार्ड मिल चुका है।

आप का धर्म क्या है?
- हमारा सब से बड़ा धर्म इंसानियत है। वैसे पिता हिंदू थे, मां पठान। शादी मेरी अग्रवाल से हुई। गोविंदा मेरा सगा देवर है। मेरी बहू गुजराती है। तो हमारा सब से बड़ा धर्म इंसानियत है। हम तो परिंदों की तरह हैं, चाहे मस्जिद पर बैठे या मंदिर पर। हमारे लिए सब एक है.

घर में लोगों से कैसे निभती हैं?
- सच बताऊं. मेरा बेटा तो गालिब के शेरों की ऐसी-तैसी करता रहता है। वो गालिब का एक मिसरा है न: जब आंख ही से न टपके तो लहू क्या है! तो मेरा बेटा कहता है, सास को जो न पीटे वो बहू क्या है! यह सुन कर उन के साथ खड़ी उनकी बहू भी हसंने लगी और यही तो तबस्सुम की खासियत है! वह खुद भी हंसती हुई चिकन के कपड़े खरीदने चली गईं।
[ [१९९६ में लिया गया इंटरव्यू]

No comments:

Post a comment