दयानंद पांडेय
एक शानदार अभिनेता जब अपने अभिनय से किसी नाटक को छू देता है तो उसे पारस बना देता है। अनिल रस्तोगी ऐसे ही अविरल अभिनेता है। अभी बीते शनिवार दर्पण द्वारा प्रस्तुत जब पूर्णम नाटक में अनिल रस्तोगी को नीलकंठ उपाध्याय की भूमिका में देखा तो पाया कि वह अभिनय नहीं कर रहे हैं , साक्षात नीलकंठ उपाध्याय बन गए हैं। अनिल रस्तोगी अभिनेता तो कोई और हैं। यह तो नीलकंठ उपाध्याय ही हैं। नीलकंठ उपाध्याय उन के भीतर बैठ गए हैं। पूर्णम की कथा भी बिलकुल अलहदा है। स्वार्थ की सिद्धि में निष्णात एक परिवार है। मां है , बेटा और बहू है। बेटा उलटे सीधे काम कर नंबर दो की संपत्ति बटोर कर जांच एजेंसियों की नज़र में चढ़ गया है।
नाटक की शुरुआत ही एक फोन से होती है जिस में बेटे का कोई दोस्त उसे जांच एजेंसियों से सावधान करता है। कहता है कि जैसे भी हो अपनी नंबर दो की संपत्ति कैश , ज्वेलरी सब हटा दे। जांच के लिए टीम कभी भी उस के घर छापा डाल सकती है। उस का फोन भी सर्विलांस पर है। आदि इत्यादि। परिवार के तीनों सदस्य मां , बेटा और बहू दहशत में आ जाते हैं। पूरे घर को एक सांघातिक तनाव घेर लेता है। ज़रा-ज़रा सी आहट पर तीनों कांप-कांप जाते हैं। हर फोन , दरवाज़े पर हर आहट , हर घंटी उन्हें बेचैन कर देती है। मां , बेटा , बहू लड़ने और डरने में व्यस्त हैं कि काल बेल बजती है। मां दरवाज़ा खोलने जाती है तो अचानक चिल्लाती हुई लौटती है , ' बेटा , तुम्हारे पिता जी ! ' असल में नीलकंठ उपाध्याय की वापसी परिवार में स्वार्थ संधियों की वापसी है। रिसते-छीजते संबंधों में जो भावनात्मक आश्वस्ति थी , उस के टूटने का उदघोष है पूर्णम नाटक में नीलकंठ उपाध्याय की वापसी। जिस पर अब कोई पैबंद लगा कर छुपा पाना नामुमकिन हो गया है। नंबर दो की अवैध संपत्ति की रक्षा के लिए रक्त के संबंध को कैसे तार-तार करने को उद्धत और प्रतिबद्ध है नई पीढ़ी। सुविधाओं की सीढ़ी पति से ज़्यादा ज़रूरी है। नीलकंठ उपाध्याय की परिवार में वापसी हर्ष नहीं , उन के बलि का सबब बन जाती है। ऐसे जैसे वह किसी बकरीद का बकरा हों , यह नीलकंठ उपाध्याय को भी नहीं मालूम। अपमान और अपराध का विष पिलाने के लिए उन्हें पूरा परिवार तैयार खड़ा है। इस विष पीने के अभिनय को अनिल रस्तोगी ने एक नया आयाम दे दिया है पूर्णम में। बिलकुल किसी सदाबहार हवा की तरह।
कंधे पर झोला लटकाए , हल्की दाढ़ी बढ़ाए , बिखरे बालों वाले अस्त-व्यस्त यह नीलकंठ उपाध्याय हैं। जो छत्तीस बरस बाद घर लौटे हैं। पूरा घर सन्नाटे में आ जाता है। घर के किसी भी सदस्य के चेहरे और हाव-भाव में खुशी या चहक नहीं है। पत्नी के भी नहीं। बहू को छोड़ कर मां-बेटे के चेहरे पर तो लगभग घृणा और नफ़रत के भाव हैं। पत्नी तंज में और कर्कश आवाज़ में कहती भी है कि बुढ़ापा काटने के लिए आए हैं। बेटा भी भन्नाया रहता है। एक दृश्य में तो पत्नी खल में तेज़-तेज़ अदरक या कुछ और कूटती हुई अपनी सारी भड़ास निकालती रहती है पति यानि नीलकंठ उपाध्याय की घृणा में लथपथ। इमामदस्ता में ऐसे कूटती है गोया वह कोई वस्तु नहीं , नीलकंठ उपाध्याय को कूट रही हो। नाटक में एक साथ दो माहौल समानांतर चल रहे होते हैं। एक छापे का डर , दूसरे नीलकंठ उपाध्याय की उपेक्षा और उन के भगोड़ा रूप का दंश। इसी बीच एक ट्रांसपोर्टर जो बेटे का दोस्त बताते हुए घर आता है , कि जो भी नकदी , ज्वेलरी जो घर में है सब को कहीं शिफ्ट करना है। लेकिन घर के लोग उस पर यकीन नहीं करते। उन्हें लगता है कि यह कोई जांच टीम का आदमी है , घर की संपत्तियां जान लेना चाहता है। बेटे का फोन नहीं मिलता कि तस्दीक हो सके कि कौन है ? इस बीच नीलकंठ उपाध्याय अचानक घर के भीतर से निकल कर उस ट्रांसपोर्टर से निपटते हैं। उस का गिरेबान पकड़ कर कहते हैं कि हमारे खून में ऐसा काला धब्बा नहीं हो सकता कि उस के पास नंबर दो की संपत्ति हो। और उसे घर से बाहर कर देते हैं। बेटा लौट कर घर आता है और बताता है कि ट्रांसपोर्टर को उस ने ही भेजा था।
बाद की कथा में नीलकंठ अपने 36 बरस लापता होने की कथा बताते हैं। कि कैसे उन का अपहरण हो गया। फिर साज़िशन उन की ही गिरफ्तारी हो गई विभिन्न आरोपों में। तस्करी तक के आरोप लगे। म्यांमार सहित विभिन्न जेलों में सजा काट कर 36 बरस बाद वह घर लौटे हैं। घर में अचानक भावुकता भरा माहौल बन जाता है। बेटा पिता से गले लग कर विह्वल हो जाता है। पत्नी भी लिपट कर रोने लगती है। बहू पहले ही से नीलकंठ उपाध्याय के प्रति भावुक है। अब पूरा घर नीलकंठ उपाध्याय के दुःख में शरीक है। उन के प्रति सहानुभूति की लहरें ऐसे उठती हैं , गोया सागर की लहरें। अचानक बेटा घर के भीतर जाता है। वापस आता है तो नाटक अचानक करवट ही नहीं लेता , पूरा पलट जाता है। सब कुछ तहस-नहस हो जाता है।
बेटा एक लंबा पत्र टाइप कर के ले आता है। पत्र जांच एजेंसी को संबोधित है। पत्र में सारी अवैध संपत्तियों के लिए ज़िम्मेदार नीलकंठ उपाध्याय ने खुद को मान लिया है। बेटा , पिता को पत्र पढ़ कर सुनाता है। फिर पिता को डिक्टेट करता है , चीखते हुए कहता है , इस पर दस्तखत कीजिए। नीलकंठ उपाध्याय अचानक इस बदलाव से सकते में हैं। अचानक बेटे से यह पत्र पत्नी ले लेती है। लगता है जैसे पत्नी , पति का पक्ष लेगी। लेकिन नहीं , वह दांत पीसती हुई नीलकंठ उपाध्याय के प्रति आक्रामक हो जाती है। चीखती हुई कहती है कीजिए साइन ! नाटक में अचानक आए इस बदलाव से नीलकंठ उपाध्याय ही नहीं दर्शक भी सकते में आ जाते हैं। नीलकंठ उपाध्याय पत्र पर दस्तखत करते हुए सारी ज़िम्मेदारी ले लेते हैं और स्वगत संबोधन के बाद पूर्णम कह कर हाथ जोड़ लेते हैं। ऐसे जैसे अपने 36 बरस की अनुपस्थिति का गड्ढा भर दिया हो। जैसे पिता और पति के रूप में विष ही पीने के लिए उपस्थित हैं। इतना कि उन का अभिनय ही नीलकंठ बन जाता है। विषपायी नीलकंठ।
समूचे नाटक में अनिल रस्तोगी इस तरह छाए रहते हैं कि जैसे दिन में धूप , रात में चांदनी और सावन में बरसात। अभिनय की बरसात। अनिल रस्तोगी को विभिन्न नाटकों में पिता की भूमिका में देख चुका हूं। पर वह किसी भी नाटक में खुद को दुहराते नहीं। विभास , आखिरी वसंत , कन्यादान , तुम , अपने ही जीवन पर आधारित नाटक बियांड द कर्टेन और अब यह पूर्णम। हर नाटक में अनिल रस्तोगी अभिनय के अपने ही बनाए सांचे को जैसे तोड़ देते हैं। अपने अभिनय यात्रा की नाव को हर बार जला देते हैं। एक नई नाव , एक नए सांचे के साथ वह अगले किसी नाटक में खड़े मिलते हैं। उन की नित नई इस अभिनय यात्रा पर एक पूरी किताब लिखी जा सकती है। उन के भावावेग , उन के मुखाभिनय , उन के चलने और संवाद अदायगी के अंदाज़ कैसे तो अचानक करवट ले लेते हैं , ऐसे जैसे बल खाती कोई नदी अचानक अपनी धारा बदल दे। ऐसे जैसे किसी रूपसी की ज़ुल्फ़ें अपने ही ख़म में किसी को उलझा ले।
लखनऊ के विश्वेश्वरैया प्रेक्षागृह में मंचित लेखक और निर्देशक शुभदीप राहा के नाटक पूर्णम में अनिल रस्तोगी का अभिनय कई मामलों में इस लिए भी बेमिसाल रहा कि वह नाटक के परिदृश्य में कुछ विलंब से उपस्थित हुए पर जब उपस्थित हुए तो फिर उन के अभिनय के सूर्य में सभी समा गए। राजकुमार अभिनीत फिल्म काजल की याद आ गई। काजल में इंटरवल के ठीक पहले अभिनेता राजकुमार उपस्थित होते हैं। डूब रही नायिका मीना कुमारी को बचा कर हाथों में लिए हुए। फिर समूची फिल्म राजकुमार के हिस्से दर्ज हो जाती है। पूर्णम में भी यही हुआ। अनिल रस्तोगी के दृश्य में आने के बाद पूरा नाटक उन के खाते में दर्ज हो गया। अनिल रस्तोगी के अभिनय की आंधी में सभी समा गए। पूर्णम में अनिल रस्तोगी के अभिनय में जो ठहर कर देखने की अदा है , अंगाभिनय है , संवाद अदायगी का जो आहिस्ता-आहिस्ता वाला अंदाज़ और उस के अचानक ठहराव का कोलाहल है , वह मथ कर रख देता है। पूर्णम में अभिनय के यह ठहराव का ठाट ही अनिल रस्तोगी के अभिनय को आख़िरी वसंत से आगे ले कर निकल जाता है। लाइटर आन द लिप्स में डॉन बने अभिनेता अनिल रस्तोगी , पूर्णम के नीलकंठ उपाध्याय की यात्रा भी कर सकते हैं , यह देखना ही रोमांचकारी और रहस्यमय दोनों है। ताजमहल का टेंडर भी याद आता है। कई बार सोचता हूं कि अगर अनिल रस्तोगी के अभिनय को इब्राहिम अल्काजी का निर्देशन मिला होता तो क्या मंज़र होता। फिर भी अनिल रस्तोगी के अभिनय को निर्देशक राज बिसरिया और उर्मिल कुमार थपलियाल ने गज़ब का रंग दिया है। इस को हम कैसे भूल सकते हैं भला। कोई 41 बरस से तो मैं ही अनिल रस्तोगी के अभिनय की रौशनी में भीग रहा हूं। नाटक हो , धारावाहिक हो , फिल्म हो , हर कहीं वह अपने अभिनय की अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हरीशचन्नर की लड़ाई के कमिश्नर हों या कथा शिवपालगंज के वैद्य।
पूर्णम की पूर्णता में पत्नी की भूमिका में चित्रा मोहन के अभिनय ने नीलकंठ उपाध्याय के चरित्र को जो ऊंचाई और संस्पर्श दिया है वह अनूठा है। चित्रा मोहन और अनिल रस्तोगी की जोड़ी अभिनय में पहले भी बाकमाल रही है पर पूर्णम में बिलकुल नए शेड में उपस्थित थी यह जोड़ी। बहू की भूमिका में अलका विवेक , बेटे इंदर की भूमिका में अंबरीश बॉबी और जगताप की भूमिका में संजय देगलूलकर का अभिनय भी शानदार था।
असल में हयबदन के अभिनेता अनिल रस्तोगी के अभिनय के अनेक आयाम हैं। अनेक रंग हैं। अनिल रस्तोगी के अभिनय का रुआब किसी एक नाटक से हम तय नहीं कर सकते। पर 70 से अधिक फिल्मों में काम कर चुके अनिल रस्तोगी का नाटक पूर्णम उन का 101 वां नाटक है तो यह अनायास नहीं है। पद्मश्री से सम्मानित होने के बाद उन के अभिनय में यह निखार हमें एक गहरी आश्वस्ति देता है कि हम उन के नित नए नाटकों से आगे भी मुखातिब होते रहेंगे। कविता चौधरी के धारावाहिक उड़ान में एस एस पी की उन की भूमिका जब अजय देवगन की रेड में मंत्री के रूप में उपस्थित होती है तो समझ आता है कि अनिल रस्तोगी के अभिनय का फलक कितना विस्तृत और अनुपम है। पूर्णम तो बस एक पड़ाव है , मंज़िल नहीं। अनिल का एक अर्थ प्रकाश भी है। तो अनिल रस्तोगी के अभिनय की रौशनी में हम सब को आगे और भी नहाना है। पूर्णम तो बस एक बहाना है। वैज्ञानिक रहे डाक्टर अनिल रस्तोगी की रंग यात्रा में अभिनय के अनेक रंग उन की प्रतीक्षा में हैं।






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