पिछली बार जब गोरखपुर गया तो अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए इलाहीबाग़ मोहल्ले भी गया। इलाहीबाग के एक ऐसे घर भी गया जहां से जाने कितनी यादें जुड़ी हुई हैं। बहुत दिनों बाद इस घर में गया। घर से जुड़ी यादें ही नहीं , घर भी बिलकुल उसी तरह पाया। अब तो हमारे गांव में भी खपरैल वाले घर नहीं रह गए हैं। इक्का दुक्का खंडहर घर ज़रूर रह गए हैं गांव में खपरैल के जिन में बरसों से कोई रहता नहीं। घर के लोग भी इंतज़ार कर रहे हैं गोया घर ख़ुद क्यों नहीं गिर जाते। कि मैदान बन जाए। इस लिए भी कि घर में इतने साझेदार हैं कि एक एक कमरे से ज़्यादा लोगों को नहीं मिल सकता। तो सब दूसरी जगह अपने-अपने पक्के मकान बना कर रहने लगे हैं। गोरखपुर शहर के हमारे इलाहीबाग़ मुहल्ले के भी सभी खपरैल वाले मकान अपना अस्तित्व खो चुके हैं। नए पक्के मकान हो गए हैं। एक घर ऐसा मिला जिस की छत तो पक्की हो गई है पर दो पल्ले वाला दरवाज़ा और दीवार वही रह गया है। यहां तक कि जिस जमींदार साहब के हाता वाले बड़े से घर में हम बतौर किराएदार रहते थे , वह घर भी गिर कर अब मैदान हो चुका है।
लेकिन एक घर ऐसा मिल गया जो न सिर्फ अपने खपरैल के साथ बुलंदी के साथ उपस्थित है बल्कि अपनी पूरी त्वरा के साथ उपस्थित है। सब कुछ ठीक वैसे ही है जैसे हमारे बचपन में था। लोग इस घर में रह भी रहे हैं। पूरे ठाट बाट से रह रहे हैं। फर्क बस इतना भर आया है कि नीचे की फर्श पक्की हो गई है। बस इतना ही। विश्वनाथ पांडेय ऊर्फ पड़ोही चाचा का यह घर अपनी पूरी धजा के साथ जस का तस है। यहां इतने बड़े घर में हम ख़ूब खेलते थे। झूला झूलते थे। बाले मियां के मैदान में जब रामलीला होती थी तो कलाकार इसी घर के बरामदे में मेकअप करते थे। पता चला कि अब रामलीला भी यहीं होती है। जहां गऊशाला होती थी अब वहां रामलीला होती है। घर के पीछे का बड़ा सा किचेन गार्डन अब भी वैसे ही है। अगवाड़ा-पिछवाड़ा , घर , सब कुछ जस का तस। बस नीचे की फर्श पक्की हो गई और गऊशाला अनुपस्थित हो गई है। बाकी सब कुछ वही का वही।
घर के आंगन में खड़े हो कर जब फोटो खिंचवाई तब बच्ची बुआ , लिटिल बुआ बहुत याद आईं। अब यह लोग नहीं हैं। पड़ोही चाचा के बेटे ने यह फोटो खींची। मन मिठास से भर गया है। बचपन से जवान होने की यादों की मिठास। इलाहीबाग़ मोहल्ले की मिठास। बारी-बारी से कई घरों में गया। हर किसी ने पहचाना और याद किया। बैठाया और मान दिया। जलपान दिया। बहुत से समकालीन बल्कि हम से छोटे लोगों के विदा होने की सूचनाएं भी मिलीं। जिन के साथ हम खेले कूदे और जवान हुए। पढ़े-लिखे। झगड़े किए। अच्छे बुरे समय की याद की गई।



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