दयानंद पांडेय
उस कुलपति ने तो जो अभद्रता की सो की पर साथ बैठे लेखकों ने जो धतकर्म किया , उस का क्या ? लेखकों ने सामूहिक विरोध करते हुए पूरे कार्यक्रम का बहिष्कार क्यों नहीं किया ? सारा विरोध और प्रतिरोध सोशल मीडिया और ज्ञापन तक ही सीमित रह गया है l यह लफ़्फ़ाज़ लेखक , प्रकाशक से अपनी रायल्टी मांगने के बजाय पैसा दे कर किताब छपवाते हैं और बाहर क्रांति का बिगुल बजाते हैं l
इन गगन बिहारी लेखकों के अनेक वाक़ये हैं l एक कार्यक्रम में विष्णु खरे के साथ अभद्रता हुई l कांग्रेस राज था l पर वह चुप रहे l क्यों कि जहाज का टिकट , होटल आदि फंसा था l जब सब भुगतान हो गया तो वापस घर जा कर चिट्ठी लिख कर विरोध भी दर्ज कर दिया l तो उपस्थित लेखकों के साथ भी फ़्लाईट , ट्रेन का टिकट , होटल आदि फंसा था l सोशल मीडिया , ज्ञापन और चिट्ठी का विरोध अपनी जगह है l आर्थिक नुक़सान कोई नहीं उठाना चाहता l सब कायर बन जाते हैं l ख़ामोश रह जाते हैं l क़ायदे से मनोज रूपड़ा को कुलपति की आंख में आंख डाल कर पूछना था , कुलपति से कि आप होते कौन हैं मुझे यहां से बाहर जाने के लिए कहने वाले ? आप के पिता जी द्वारा आयोजित कार्यक्रम नहीं है यह। जनता के पैसे से साहित्य अकादमी और केंद्रीय विश्वविद्यालय गुरु घासीदास विश्वविद्यालय , विलासपुर ने आयोजित किया है। अलग बात है , मनोज रूपड़ा यह पूछने का साहस नहीं कर पाए। किसी आज्ञाकारी विद्यार्थी की तरह सभागार से बाहर निकल गए। बाहर आ कर कुछ समय बाद विरोध की रणनीति बनाई। खोखली रणनीति। देवेंद्र कुमार की एक कविता याद आती है :
समन्वय, समझौता, कुल मिला कर
अक्षमता का दुष्परिणाम है
जौहर का किस्सा सुना होगा
काश! महारानी पद्मिनी, चिता में जलने के बजाए
सोलह हजार रानियों के साथ लैस हो कर
चित्तौड़ के किले की रक्षा करते हुए
मरी नहीं, मारी गई होती
तब शायद तुम्हारा और तुम्हारे देश का भविष्य
कुछ और होता!
यही आज का तकाजा है
वरना कौन प्रजा, कौन राजा है?
लेकिन अफ़सोस कि मनोज रूपड़ा ने जल कर मरना पसंद किया। वैसे भी किताब में क्रांति करना और हक़ीक़त में क्रांति करना दो बात है। वैसे भी कुलपति ने अगर आप का लटका मुख देख कर पूछ ही लिया कि आप बोर तो नहीं हो रहे ? तो विषय पर बोलिए का डिक्टेशन देने की ज़रूरत भी क्या थी। हिंदी में अधिकांश लोग हैं जो विषय कुछ होता है , बोलते कुछ हैं। कुछ विद्वान् तो हर बार एक ही विषय पर बोलने के लिए परिचित हैं। इतिहास पर बोलना हो तो भूगोल पर बोलने लगते हैं। भूगोल पर बोलना हो तो इतिहास पर बोलने लगते हैं। क्यों कि उन्हें वही आता है। जो जानते हैं , वही तो बोलेंगे। बहुत से विद्यार्थी परीक्षा की कॉपी में राम-राम ही लिखने के अभ्यस्त होते हैं। वक्ता भी उसी विद्यार्थी की तरह होते हैं। कुलपति आलोक कुमार चक्रवाल भी हो सकता है , इसी कला के कलाकार हों। अशोक वाजपेयी जैसे लोग भी कई बार विषय से जुदा बोलते हुए मिलते हैं। विषयांतर के बादशाहों की कमी नहीं है। कई लोगों को फ़िल्मी गाना या लतीफा सुनाते भी देखा है। आप को सिर पीटना हो तो अपना ही पीटें। किसी अन्य का नहीं।
एक बड़े संपादक हुए हैं प्रभाष जोशी l उत्तर प्रदेश में तब राष्ट्रपति शासन था l मोतीलाल बोरा राज्यपाल थे l मध्य प्रदेश फ़ैक्टर था l सो जोशी जी को पसंद करते थे l तब के समय जोशी जी जनसत्ता के संपादक थे l मोतीलाल बोरा ने उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की गांधी समिति में सदस्य बनवा दिया l बाद में तब के समय ढाई लाख का हिंदी संस्थान का पुरस्कार भी घोषित करवा दिया l लेकिन जब पुरस्कार लेने का समय आया तब तक राष्ट्रपति शासन समाप्त हो गया l मायावती मुख्य मंत्री बन गई थीं l उन्हीं दिनों गांधी को शैतान की औलाद बताने का धतकर्म भी मायावती ने कर दिया l पर जोशी जी सम्मान समारोह में न सिर्फ़ आए बल्कि राजकीय अतिथि बना कर मोतीलाल बोरा ने बुलाया l राजकीय विमान से सपरिवार बुलाया l जोशी जी सपरिवार आए l राज भवन में ठहरे l समारोहपूर्वक सम्मान लिया l राजकीय विमान से सपरिवार लौटे l लौट कर मायावती के गांधी को शैतान की औलाद वाले बयान के विरोध में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की गांधी समिति से इस्तीफ़ा दे दिया l
ग़ज़ब था यह विरोध भी l
ऐसे अनेक लोगों के अनेक उदाहरण हैं l पर एक क़िस्सा और l अस्सी का दशक था l हरियाणा के तत्कालीन मुख्य मंत्री देवीलाल लखनऊ आए थे l मीरा बाई मार्ग स्थित स्टेट गेस्ट हाऊस में ठहरे थे l वहीं प्रेस कांफ्रेंस की l इंडियन एक्सप्रेस के विशेष संवाददाता थे एस के त्रिपाठी l देवीलाल से कुछ अप्रिय प्रश्न पूछ लिए l देवीलाल टाल गए l तो सवाल फिर दुहराया त्रिपाठी जी ने l देवीलाल तैश में आ गए l अपनी हरियाणवी लंठई पर आ गए l बेहूदगी से बोले , चुप कर ! त्रिपाठी जी चुपचाप उठ कर खड़े हो गए l जाने लगे l मैं बगल में ही बैठा था l पूछा क्यों जा रहे हैं ? त्रिपाठी जी बोले , जिस बेहूदगी से इस ने चुप रहने के लिए कहा है , रुकना चाहिए ?
मैं भी उठ कर खड़ा हो गया l मेरे बगल में यू एन आई के सुरेंद्र दुबे बैठे थे l उन्हों ने मुझ से पूछा क्या हुआ ? बताया उन्हें , वह भी उठ कर खड़े हो गए l धीरे-धीरे सभी पत्रकार उठ कर खड़े हो गए l अब देवीलाल हक्का-बक्का !
देवीलाल ने हाथ जोड़ कर पूछा , क्या हुआ ?
उन्हें सामूहिक रूप से बताया गया l देवीलाल की सारी हरियाणवी हेकड़ी निकल गई l जाट होने का गुरूर उतर गया l हाथ जोड़ कर बोले , ग़लती हो गई ! माफ़ करो !
लोग बैठ गए थे l
अगर इस कुलपति के सामने भी सारे उपस्थित लेखक एक साथ उठ कर खड़े हो गए होते l स्टैंड ले लिया होता l तो कुलपति अरे , मुख्य मंत्री और राज्यपाल भी माफ़ी मांग लेते l हटा दिया जाता यह कुलपति l
पर नहीं , रीढ़हीन लेखकों के पास स्वाभिमान नाम की चीज़ कब की ग़ायब हो चुकी है l यह सिर्फ़ लफ़्फ़ाजी जानते हैं l ज़रा सा आर्थिक हित टकरा जाए , पुरस्कार , यात्रा आदि की सुविधा ख़तरे में आ जाए तो थूक कर चाटने में अव्वल बनने की होड़ लग जाती है l फ़ेसबुक पर कुत्तों की तरह भौंकना आसान है l ट्रंप और मोदी को हवा हवाई गाली देना , रोज़ सरकार गिरा देने का दिवा स्वप्न देखने वालों को लोकतंत्र और स्वाभिमान से कोई सरोकार नहीं रहा l
क्या कहा , लेखकीय अस्मिता ?
यह किस चिड़िया का नाम है ?
एक समय था राजस्थान के मुख्य मंत्री जगन्नाथ पहाड़िया ने महादेवी वर्मा के लिए अप्रिय टिप्पणी कर दी l लेखकों का विरोध आग की तरह फैला l जगन्नाथ पहाड़िया को मुख्य मंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा l वह महादेवी तो प्रयाग में रहते हुए भी खुलेआम कहती थीं , नेहरू को हिंदी नहीं आती l नेहरू की अंग्रेजी पर उसी शहर में फ़िराक़ के सवाल अपनी जगह थे l तो महादेवी के पास नैतिकता, शुचिता और स्वाभिमान सब था l बेहिसाब था l जो मनोज रूपडा और वहाँ उपस्थित लेखकों के पास नहीं है l होता तो उस कुलपति की हैसियत नहीं थी, ऐसा कुछ करने की l
लेखकों और पत्रकारों का मान-सम्मान क्यों गौरैया की तरह फुर्र हो गया है ? लेखकों को इस पर गंभीरता से सोचना चाहिए l
अच्छा विचारधारा !
विचारधारा की नपुंसकता की दुहाई भी मत दीजिए l आर एस एस , भाजपा के पहाड़े पुराने पड़ गए हैं l फिर अगर यह पहाड़ा याद ही था तो वहां कौन सी क्रांति करने गए थे ? कुछ साल पहले वामपंथी नेता डी राजा ने ऐन हिंदी दिवस के दिन कहा कि हिंदी, हिंदुओं की भाषा है l आज तक किसी वामपंथी लेखक ने डी राजा के इस बयान पर ऐतराज नहीं जताया l
तो क्या सचमुच हिंदी , हिंदुओं की भाषा है ? संस्कृत पंडितों की और उर्दू मुसलमानों की ?
लेखक, ऐतराज भूल चुके हैं l तनी हुई मुट्ठी, छुपी हुई कांख के साथ कुत्तों की तरह जीने के अभ्यस्त हो गए हैं l कभी किसी मीट की दुकान के आसपास किसी कुत्ते को भौंकते देखा है ?
यह लेखक भी नहीं भौंकते l इन के अपमान के ऐसे अनेक किस्से हैं l सब के पास l हम कह देते हैं , लोग नपुंसक विरोध के क़ायल हैं और चुप रहते हैं l मीट की दुकान के बाहर इन के खड़े रहने का यही हासिल है l फिर देवेंद्र कुमार ही याद आते हैं :

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