Thursday, 8 January 2026

मौन, अस्तित्व, पीड़ा, संयम और सौंदर्य की समकालीन हिंदी कथा-पाठ

 भवतोष पांडेय


    
      
                        

    हिंदी कथा-साहित्य का इतिहास यह प्रमाणित करता है कि प्रत्येक युग अपनी संवेदना के अनुरूप कथाकारों का चयन करता है। प्रेमचंद का समय सामाजिक अन्याय और वर्ग-संघर्ष का था, अज्ञेय और नई कहानी का दौर व्यक्ति की आंतरिक जटिलताओं और आत्मसंघर्ष का, जबकि समकालीन हिंदी कहानी का वर्तमान समय नैतिक विघटन, संबंधों की अस्थिरता और मौन में डूबे मनुष्य का समय है। वरिष्ठ कथाकार श्री दयानंद पांडेय की ये 36 कहानियां इसी समकालीन मनुष्य की कथा कहती हैं-एक ऐसे मनुष्य की, जो बोल सकता है, पर बोलना नहीं चाहता; जो जानता है, पर जताना नहीं चाहता; और जो जीता है, पर जीवन को प्रदर्शन नहीं बनने देता।

    यह कहानी-संग्रह किसी वैचारिक आंदोलन का घोषणापत्र नहीं है। यह उस सूक्ष्म जीवन-दर्शन का दस्तावेज़ है, जो साधारण घटनाओं के भीतर चुपचाप आकार लेता है। इन कहानियों में न कथा-कौशल का प्रदर्शन है, न भाषा का अलंकरण-यहां संयम ही सौंदर्य है और मौन ही सब से मुखर वक्तव्य।

     कहानीलेकिन” इस संग्रह की मूल संवेदना को पहली ही बार में उद्घाटित कर देती है। पंडित जी का जीवन, उन का मौन, उन की सादगी और अंततः उन का लगभग गुमनाम अंत-यह किसी एक व्यक्ति की कथा नहीं रह जाती, बल्कि उस समाज का रूपक बन जाती है जहाँ जीवित मनुष्य उपेक्षित है और मृत व्यक्ति अचानक श्रद्धेय। पंडित जी का कथन-

  मैं हिंदू हूँ, ब्राह्मण हूँ। आत्महत्या को पाप मानता हूं।
   इसी लिए आत्महत्या नहीं की।
   पर हाराकिरी-आहिस्ता-आहिस्ता-कर रहा हूं।”

समकालीन शिक्षित मध्यवर्ग की उस त्रासदी को उद्घाटित करता है, जहां जीवन छोड़ा नहीं जाता, पर जीने की आकांक्षा भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है।

वरिष्ठ पत्रकार श्री दयानंद पांडेय की कहानियों का केंद्रीय कथ्य अस्तित्वगत नैतिक संघर्ष है। यह संघर्ष किसी बाहरी सत्ता से नहीं, बल्कि स्वयं से है। उन के पात्र न तो क्रांतिकारी घोषणाएं करते हैं, न किसी बड़े निष्कर्ष तक पहुंचने की हड़बड़ी दिखाते हैं। वे जीवन को चुपचाप ढोते हैं-और यही ढोना इन कहानियों की सब से बड़ी करुणा बन जाता है।

इस संग्रह में मौन केवल एक शैलीगत उपकरण नहीं, बल्कि एक नैतिक अवधारणा के रूप में उपस्थित है। “सौ दुखों की एक दवा है-चुप रहना” जैसे वाक्य मौन को पलायन नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक हिंसा के विरुद्ध एक आत्मचयनित नैतिक प्रतिरोध के रूप में स्थापित करते हैं। यह मौन न तो मजबूरी का है, न ही दमन का-यह वह मौन है, जो बोल सकने की क्षमता के बावजूद चुना गया। 

यहां मौन किसी पलायन का संकेत नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक हिंसा के विरुद्ध एक सूक्ष्म प्रतिरोध है। यह मौन महात्मा बुद्ध के करुणामूलक मौन और कबीर के आंतरिक विवेक से संवाद करता हुआ प्रतीत होता है।

अकादमिक दृष्टि से देखें तो यह मौन Subaltern Silence नहीं है, बल्कि Self-chosen Ethical Silence है-जहाँ व्यक्ति बोल सकता है, पर बोलने से इंकार करता है।

श्री पांडेय कहानियों के शीर्षकों के चयन में न सिर्फ सावधानी बरतते हैं बल्कि कथा के केंद्रीय भाव से भी न्याय करते हैं। विषय की विविधता के साथ-साथ कहन का इंद्रधनुष पाठकों के मन को आद्योपांत रंजित और विस्मित करता रहता है ।

कहानी आग आधुनिक शहरी मध्यवर्ग की सफलता–केंद्रित जीवन-दृष्टि और उस के नैतिक खोखलेपन की तीखी आलोचना प्रस्तुत करती है। नायक का पतन किसी आकस्मिक दुर्घटना का नहीं, बल्कि संबंधों की उपेक्षा और संवेदनशीलता के क्षरण का परिणाम है। लेखक ने अस्पताल, व्हाट्सऐप श्रद्धांजलि और पैकेज्ड सेवा-प्रणाली के माध्यम से मृत्यु के भी बाज़ारीकरण को रेखांकित किया है। अंत में श्मशान की आकांक्षा केवल आत्महत्या की इच्छा नहीं, बल्कि अर्थहीन, एकाकी और जली हुई चेतना का प्रतीक बन जाती है। यह कथा सफलता और मानवीय रिश्तों के बीच के भयावह अंतर्विरोध को प्रभावी ढंग से उजागर करती है।

भीड़, भक्ति और आधुनिक जीवन के अंतर्विरोधों का सूक्ष्म मानवशास्त्रीय दस्तावेज़ बन जाती है कहानी भींगना । लेखक ने सावन, वर्षा और कालभैरव के बहाने आस्था की अव्यवस्था, राजनीति की अनायास घुसपैठ और निजी संबंधों की नाज़ुकता को एक साथ पिरोया है। नन्हे बच्चे का “बम-बम भूले” पूरे कथानक में निर्मल श्रद्धा और भाषिक भोलेपन का प्रतीक बन कर उभरता है, जो शोरगुल भरी धार्मिकता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। कथा की शक्ति इस के विवरणों में नहीं, बल्कि उस अनुभूति में है जहां मनुष्य भीगता है—कभी प्रेम में, कभी भक्ति में और कभी भीड़ के भय में। यह रचना आस्था को प्रदर्शन नहीं, अनुभव के रूप में देखने का आग्रह करती है।

स्क्रिप्ट से बाहर  रंगमंच, नशे और रचनात्मक स्वच्छंदता के द्वंद्व को प्रभावी ढंग से उभारती है। नायक का “स्क्रिप्ट से बाहर” जाना केवल मंचीय प्रयोग नहीं, बल्कि कलाकार के अहं, आकस्मिक प्रतिभा और नैतिक अस्पष्टता का संकेत है। कथा यह प्रश्न उठाती है कि क्या तात्कालिक स्फूर्ति और दर्शकीय तालियां कला को वैध ठहराने के लिए पर्याप्त हैं। शिमला का परिवेश और थिएटर का अनुशासन इस अराजक सृजनशीलता के विरुद्ध एक मूक प्रतिरोध बनता है। कुल मिला कर, यह रचना कला और आत्मसंयम के बीच की खतरनाक लेकिन आकर्षक रेखा को उजागर करती है।

मातृत्व, अधिकार और भावनात्मक उपेक्षा के सूक्ष्म मनोविज्ञान को अत्यंत मार्मिक ढंग से उद्घाटित करती है उपेक्षा । दादी का स्नेह और संस्कार प्रेमपूर्ण होते हुए भी, बच्चे को मां से अलग करना एक गहरी भावनात्मक हिंसा में बदल जाता है। दो वर्षीय बच्ची की चुप्पी और दूरी किसी विद्रोह से अधिक असहाय प्रतिरोध का रूप ले लेती है। कथा यह रेखांकित करती है कि रिश्तों में प्रेम के साथ संवेदनशील सीमाओं की पहचान अनिवार्य है। अंततः यह रचना मातृत्व को जैविक नहीं, बल्कि निरंतर उपस्थिति और सुरक्षा का अनुभव सिद्ध करती है।

रिश्तों के बीच संवाद की मात्रा और उस की शैली एक संक्रमण कला से गुजर रही है । संवाद रचना पिता–पुत्र संबंधों की जटिल मानसिक संरचना और संवादहीनता की त्रासदी को गहन आत्मस्वीकृति के साथ उघाड़ती है। पत्र के रूप में व्यक्त कथन सैद्धांतिक कठोरता और व्यक्तिगत सत्य के टकराव को नैतिक व भावनात्मक स्तर पर विश्लेषित करता है। लेखक की भाषा आरोप से अधिक आत्मालोचना की ओर झुकी है, जिस से पीड़ा करुणा में बदल जाती है। यह कहानी संवाद की अनुपस्थिति को ही कथा का केंद्रीय संवाद बना देती है। अंततः यह रचना संबंधों में “सही” होने से अधिक “मानवीय” होने की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

प्रेम के आत्मीय अनुभव को सत्ता, स्वामित्व और असंतुलित आसक्ति त्रासदी में रूपांतरित कर सकती है। मछली–जल–जाल का रूपक प्रेम में भ्रम, निर्भरता और नियंत्रण की जटिल मनोविज्ञान को गहराई से उद्घाटित करती है कथा हत्यारा । स्त्री यहां केवल प्रेमिका नहीं, बल्कि शक्ति-संपन्न, नियंत्रक और अंततः आत्म-विनाश की ओर बढ़ती चेतना बन जाती है, जब कि पुरुष अपराध-बोध और असहायता में घिरा हुआ है। भाषा काव्यात्मक, आत्मालापी और प्रतीक-प्रधान है, जो पाठक को नैतिक निर्णय के बजाय करुण विवेक की अवस्था में छोड़ देती है। यह कहानी प्रेम की सुंदरता से अधिक, प्रेम के अतिरेक और स्वामित्व-बोध के विनाशकारी परिणामों की मार्मिक आलोचना है।

 

भावनाओं के प्रदीर्घ विस्तार ने कुछ कथाओं को लंबी कथा बना दिया है लेकिन ये बोझिल नहीं हैंतुम्हारे बिना विरह को स्मृति, देह और प्रकृति के रूपकों में घोल कर प्रस्तुत करती है, जहां प्रेम एक सतत अनुभूति बन जाता है, घटना नहीं। भाषा की अतिशय इंद्रियात्मकता पाठक को भावनात्मक रूप से बांधती है, किंतु कहीं-कहीं यही विस्तार आत्मसंयम की कमी भी उजागर करता है। कथा का बल प्रेम की अविनाशी अवधारणा पर है, पर विवाहेतर प्रेम की नैतिक जटिलताओं से वह टकराने के बजाय उन्हें भावुकता में ढक देती है। स्मृति यहां आश्रय भी है और दंड भी जो पात्र को जीवित भी रखती है और लगातार जलाती भी है। कुल मिला कर, यह रचना प्रेम को अमर सिद्ध करती है, पर पीड़ा की जिम्मेदारी अकेले स्मृति पर छोड़ देती है।

कहानी प्रतिनायक मैं  एकतरफा संवाद और दबी हुई स्मृतियों के माध्यम से अपूर्ण प्रेम की त्रासदी को उघाड़ती है। नायक की वाचालता के बरक्स नायिका की चुप्पी एक नैतिक और सामाजिक सीमा का प्रतीक बन जाती है, जिसे वह लांघ नहीं पाती। भाषा में आत्मसंघर्ष, आरोप और आत्मकरुणा का घनत्व है, जो भावनात्मक तीव्रता तो रचता है पर संतुलन को चुनौती भी देता है। कथा का केंद्रीय द्वंद्व प्रेम नहीं, बल्कि कह न पाने और सुन न सकने की विफलता है। अंततः यह रचना स्मृति को संबंध का विकल्प बना कर छोड़ देती है, जहाँ प्रेम जीवित है, पर संवाद मृत।

कथावाचक की स्मृतियाँ करुण हैं, पर वे धीरे-धीरे आसक्ति और आत्मपीड़न का रूप भी ले लेती हैं। प्रेम यहाँ संवाद न बन कर निगरानी, कल्पना और अनुमान में बदल जाता है, जिस से नैतिक असहजता पैदा होती है। भाषा भावप्रवण और संस्मरणात्मक है, किंतु विस्तार कई बार संयम तोड़ देता है। अंततः यह रचना प्रेम से अधिक अपूर्णता और मनोवैज्ञानिक जकड़न की कथा बन जाती है। एकतरफा प्रेम, प्रतीक्षा और न कहे जा सके भावों की लंबी मनोयात्रा का दस्तावेज़ है सुंदर भ्रम

ख़ामोशी कहानी वामपंथी आदर्शों के क्रमिक नैतिक पतन और अवसरवादी रूपांतरण की तीखी, निर्मम पड़ताल है। कामरेड मनमोहन का चरित्र विचारधारा, सत्ता, भ्रष्टाचार और देह-राजनीति के गठजोड़ का प्रतीक बन जाता है, जहां ‘जनपक्षधरता’ केवल उपयोगी मुखौटा रह जाती है। लेखक ने व्यंग्य, विवरण और यथार्थ की अतिरेकपूर्ण परतों के माध्यम से यह दिखाया है कि संस्था-विरोधी राजनीति कैसे स्वयं एक सत्ता-संरचना में बदल जाती है। भाषा जानबूझ कर असंयत और विस्तारप्रिय है, जिससे कथा का नैतिक क्षरण पाठक को असहज करता है। अंततः यह रचना किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि आधुनिक राजनीतिक-सांस्कृतिक पाखंड की सामूहिक जीवनी बन जाती है।

शिकस्त की बारी ख़ामोशी के बाद आती है जो सत्ता, पूंजी और देह के गठजोड़ में फंसे  आधुनिक राजनीति-पुरुष की नैतिक रिक्तता और आत्म-विसर्जन की तीखी पड़ताल करती है। मंत्री का पतन किसी आदर्श से नहीं, बल्कि सत्ता से बाहर होते ही उपयोगी औज़ार में बदल जाने की त्रासदी से घटित होता है। स्त्री-देह, कारपोरेट सौदे और राजनीतिक पद यहां मानवीय संबंध नहीं, बल्कि विनिमय की वस्तुएं बन जाते हैं। भाषा जानबूझ कर असंयत, क्रूर और नग्न है, जो पाठक को झकझोरती है और किसी नैतिक दिलासे की गुंजाइश नहीं छोड़ती। अंततः यह कथा व्यक्ति की नहीं, बल्कि लोकतंत्र के भीतर पनप चुके दलाली-तंत्र और ‘व्हाइट हाउस’ के ब्लैक हो जाने की गहरी आलोचना है।

सुंदर लड़कियों वाला शहर  स्मृति, शहर और पुरुष दृष्टि के टकराव की जटिल पड़ताल करती है। शरद का नॉस्टैल्जिया और प्रमोद की भोगवादी दृष्टि एक-दूसरे के बरक्स रख कर लेखक ने संवेदनशील स्मृति बनाम उपभोगात्मक नजर का तीखा द्वंद्व रचा है। शहर यहां केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि स्मृतियों, मूल्यों और नैतिक बोध का विस्तार है, जिसे प्रमोद की दृष्टि बार-बार वस्तु में बदलना चाहती है। संवादों में यथार्थ की कड़वाहट और व्यंग्य है, पर कहीं-कहीं स्त्री को देखने का पुरुष-केंद्रित आग्रह असहज भी करता है। अंततः यह रचना बताती है कि शहर बदलते हैं, पर स्मृति का शहर और दृष्टि का शहर कभी एक नहीं होते।

लेखक प्रेम को अनुभवात्मक सत्य के रूप में देखता है, पर कथा धीरे-धीरे कामना, अकेलेपन और आत्ममोह की गुत्थी में बदल जाती है। इंटरनेट यहां संबंधों को जोड़ने का नहीं, बल्कि भ्रम और शोषण का माध्यम बन कर उभरता है। रशियन स्त्री का प्रसंग प्रेम की आशा जगाता है, पर अंत उसे गहरी विडंबना में बदल देता है। बर्फ़ में फंसी मछली प्रेम की बहुलता, आधुनिक तकनीक और भावनात्मक छलावे के बीच फंसे व्यक्ति की त्रासदी को उघाड़ती है। कुल मिला कर यह रचना प्रेम नहीं, बल्कि अधूरी तृप्ति और आधुनिक मनुष्य की भावनात्मक असहायता की कहानी है।

ग्रामीण सामंती मानसिकता, पुरुष-अहं और वंश-केंद्रित सोच की गहरी आलोचना कुछ कहानियों के केंद्र में है। घोड़े वाले बाऊ साहब में बाऊ साहब का चरित्र शान, आन और नियंत्रण की लालसा का प्रतीक बन जाता है, जो बदलते समय के साथ हास्यास्पद और करुण दोनों हो उठता है। स्त्रियां यहां त्याग, शोषण और चुप्पी की वाहक हैं, जिन की एजेंसी अंततः छल और विवशता में बदल जाती है। कथा में यौन नैतिकता, धर्म, संतान और पितृसत्ता का घालमेल तीखे व्यंग्य के रूप में उभरता है। अंततः बैलगाड़ी की ‘लगाम’ केवल सवारी की नहीं, बल्कि खोते हुए वर्चस्व को बचाने की अंतिम भ्रमात्मक कोशिश का प्रतीक बन जाती है।

सोशल मीडिया जैसे फ़ेसबुक आदि केवल तकनीकी मंच नहीं, बल्कि आधुनिक मनुष्य के अकेलेपन, आत्म-प्रदर्शन और मानसिक द्वंद्व के प्रतीक हैं । राम सिंगार भाई का चरित्र नैतिक विवेक और डिजिटल आकर्षण के बीच झूलते मध्यवर्गीय मन की सटीक तस्वीर है। लेखक ने सोशल मीडिया की सतही लोकप्रियता, कामुकता और आत्ममुग्धता के बरक्स जन-सरोकार और मानवीय संबंधों की उपेक्षा को तीखे व्यंग्य में उघाड़ा है। अंततः फ़ेसबुक में फंसे चेहरे प्रश्न छोड़ती है कि समस्या फ़ेसबुक की नहीं, बल्कि उसे देखने और जीने वाले समाज की मानसिक संरचना की है।

मेड़ की दूब सूखे के बहाने ग्रामीण जीवन के सामाजिक, आर्थिक और नैतिक संकट का गहन यथार्थपरक चित्र प्रस्तुत करती है। प्रकृति की क्रूरता, प्रशासनिक उदासीनता और सरकारी भाषणों की खोखलाहट एक साथ मिल कर गांव को “जीता-जागता नरक” बना देती है। भाषा लोकजीवन से उठी हुई, संवेदनशील और दृश्यात्मक है, जो पीड़ा को अनुभूति में बदल देती है। बैरागी का कथन—“हम तो मेड़ की दूब हैं”—कथा को निराशा से ऊपर उठा कर संघर्षशील मानवीय जिजीविषा में रूपांतरित करता है। अंततः यह रचना पलायन और जड़ों से जुड़े रहने के द्वंद्व को अत्यंत मार्मिक ढंग से छोड़ देती है।

स्त्री मनोविज्ञान ,देह रचनाशास्त्र और सौंदर्य प्रेम विज्ञान के वर्णन में श्री दयानंद का  कोई सानी नहीं है । विपश्यना में प्रेम जिन लोगों ने पढ़ी है ,वो इस से भली भांति परिचित होंगे

सत्ता, देह और कला के त्रिकोण में फंसी स्त्री-अस्मिता की एक अत्यंत तीव्र, असहज और विघटनकारी कथा है देह-दंश । देह-संगीत और राजनीति के टकराव के रूपक के माध्यम से लेखक ने दिखाया है कि कैसे सत्ता स्त्री की देह को साधन, प्रतीक और उपभोग की वस्तु में बदल देती है। भाषा बिंबात्मक, उन्मादी और कभी-कभी जानबूझ कर अतिवादी है, जो पाठक को नैतिक आराम से बाहर खींच लाती है। कथा में पुरुष-सत्ता का नग्न, हिंसक और अवसरवादी चेहरा बिना किसी शालीन आवरण के प्रकट होता है। अंततः यह कहानी प्रेम या वासना की नहीं, बल्कि कला की पराजय, देह के अपमान और सत्ता की अमानवीय संरचना की करुण गवाही बन जाती है।

इन कहानियों की सब से बड़ी विशेषता उन की उभयनिष्ठता है। यहां नायक पूर्ण निर्दोष नहीं, न खलनायक पूर्ण दानव। निर्णय पाठक पर छोड़े गए हैं। कई कहानियां अधूरी-सी समाप्त होती हैं-जैसे जीवन स्वयं अधूरा रहता है। यह अधूरापन कोई शिल्पगत कमी नहीं, बल्कि लेखक की जीवन-दृष्टि का अनिवार्य हिस्सा है। भाषा अत्यंत संयत, लगभग न्यूनतम है -

मौन रहना साधना है। कठिन काम है।”
इस एक वाक्य में दर्शन, मनोविज्ञान और जीवन-अनुभव एक साथ सघन हो उठते हैं।

दयानंद पांडेय की भाषा Minimalist Aesthetics का उदाहरण है। यहां भाषा न तो दृश्य रचने में व्यस्त है, न भावनात्मक उछाल में। वह लगभग निर्लिप्त हो कर भाव को वहन करती है।

इस संग्रह की कहानियां किसी पारंपरिक कथा-वक्र (Plot Curve) का पालन नहीं करतीं। इन में आरंभ, उत्कर्ष और समाधान की अपेक्षा अनुभव का क्रम अधिक महत्वपूर्ण है। उदहरणार्थ कहानी लेकिन में पंडित जी की मृत्यु कोई सनसनी नहीं रचती, कोई नाटकीय क्लाइमैक्स नहीं लाती। वह ठीक वैसे आती है जैसे जीवन में मृत्यु आती है-अचानक नहीं, बल्कि लंबे समय से तैयार होती हुई।

  इन 36 कहानियों का संयुक्त प्रभाव यह है कि पाठक स्वयं को किसी एक कथा में नहीं, बल्कि अनेक कथाओं के छोटे-छोटे टुकड़ों में पहचानता है-कहीं वह पिता है, कहीं पुत्र; कहीं स्त्री है, कहीं समाज; कहीं दोषी है, कहीं पीड़ित।

अंततः, दयानंद पांडेय की ये कहानियां आधुनिक भारतीय समाज की एक ऐसी नैतिक आत्मकथा बन जाती हैं, जिस में नायक कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि हम सब हैं-अपने मौन, अपनी विफलताओं, अपनी छोटी-छोटी नैतिक जीतों और बड़ी-बड़ी चुप्पियों के साथ।दयानंद पांडेय की ये कहानियाँ तेज़ समय में लिखी गई धीमी, गंभीर और आत्मालोचनात्मक कहानियां हैं। ये पाठक से धैर्य, संवेदनशीलता और आत्मनिरीक्षण की अपेक्षा करती हैं। अकादमिक दृष्टि से यह संग्रह-नैतिक दर्शन ,अस्तित्ववाद ,सामाजिक मनोविज्ञान और समकालीन मध्यवर्गीय अध्ययन के लिए एक महत्वपूर्ण पाठ बन सकता है। यह पुस्तक पढ़ने के बाद पाठक को उत्तर नहीं मिलते—प्रश्न मिलते हैं। और गंभीर साहित्य का यही सब से बड़ा गुण है।

[ डायमंड बुक्स द्वारा प्रकाशित 36 कहानियां की भूमिका ]



36 कहानियां 
दिल्ली 
लेखक : दयानंद पांडेय 
पृष्ठ : 448 
मूल्य : 450 रुपए 

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रा लि 
X - 30 ओखला इंडस्ट्रियल एरिया , फेस - 2 
नई दिल्ली - 110020


 


 

 

 

 

 

 

 

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