Friday, 19 July 2013

प्राण का पिता रूप और उन के चंदन अभिनय की खुशबू

विलेन आफ़ द मिलेनियम कहा ज़रूर गया है प्राण के लिए पर मुझे उन के  अभिनय का पिता रूप ज़्यादा प्रभावित करता है। पाश्चात्य सभ्यता में डूबा वह चाहे पूरब और पश्चिम का पिता हो, बॉबी का पिता हो, अमर, अकबर, एंथोनी का पिता हो या शराबी का पिता। या फिर डॉन का भी पिता क्यों न हो। हर जगह उन के पिता रूप का अभिनय अपनी पूरी दमक में उपस्थित है।

 इसी कड़ी में उपकार का मलंग चाचा। धर्मा का मिर्जा और जंजीर के शेर ख़ान या फिर कालिया के जेलर रघुवीर को भी जोड़ लें। ऐसे ही उन की ललकार, दस नंबरी, शहंशाह और तमाम ऐसी फ़िल्मों को भी जोड़ सकते हैं, फेहरिस्त ख़त्म नहीं होगी उन के अभिनय के दमक की। उन के अभिनय के अवदान की। इस लिए भी कि उन का अभिनय अलहदा है। उन का अंगाभिनय उन की संवाद अदायगी और उन का तन कर खड़े रहना, ज़िद की हद तक अड़े रहना और अचानक मोम की तरह पिघल जाना उन के  कड़ियल चरित्रों की खूबी रही है।

 धर्मा फ़िल्म में एक कव्वाली है, इशारों को अगर समझो राज़ को राज़ रहने दो। उस में प्राण के हिस्से में एक मिसरा है, ‘मैं चंदन हूं, मैं चंदन हूं ,मैं चंदन हूबहू हूं !’ वह सचमुच अभिनय के चंदन थे।

उन का किरदार जैसा भी हो, उन के सहयोगी कलाकार जो भी हों, जैसे भी हों, प्राण के अभिनय की पुलक और उस की आंच में वह तिर ही जाते थे। पग ही जाते थे प्राण के प्राणवान अभिनय में वह चरित्र जैसे प्राण पा जाता था। उन के अभिनय के चंदन में जैसे गमक जाता था। उन के अभिनय की अंतरधारा में नहा जाता था। और उन की संवाद अदायगी जैसे भेड़िया रूक-रूक कर हड्डियां चबा रहा हो। संवाद अदायगी की उन की यह अदा और अंदाज़ ही उन्हें प्राण बनाता था। उपकार फ़िल्म में उन का वह मशहूर संवाद ‘राशन पर भाषण मिल सकता है, पर भाषण पर राशन नहीं, मिलता बरखुरदार!’ यों ही नहीं मशहूर हो गया था। उपकार फ़िल्म का ही वह गीत ‘कस्मे वादे प्यार वफ़ा सब बातें हैं बातों का क्या!’ लिखा ज़रूर इंदीवर ने था, और कल्याण जी आनंद जी के संगीत में मन्ना डे ने गाया ज़रूर पर लगता है कि जैसे यह सब कुछ प्राण पर ही कुर्बान था। ‘देते हैं भगवान को धोखा, इंसा को क्या छोड़ेंगे!’ में जब प्राण का मलंग ‘आसमान को अपनी बैसाखी से इंगित करता है तो यह गीत, गीत नहीं समय की चीख़ बन जाता है, चीख़ चित्कार बन जाती है। तो यह उन के अभिनय का निर्वाह ही तो है जो उन के अंग-अंग से अनायास ही चीख़ और चित्कार के रूप में छलकती है। वास्तव में उपकार में प्राण द्वारा जिया मलंग का चरित्र सिर्फ़ एक फ़िल्मी चरित्र भर नहीं है बल्कि नेहरू की औद्योगिक नीतियों की चक्की तले पिस कर पिछड़ गए किसान की आह का मुक़म्मल प्रतिनिधित्व भी है। नेहरू की नीतियों से उपजी विडंबनाओं का जीता-जागता दस्तावेज़ है उपकार का मलंग जिसे प्राण के अभिनय ने प्राण दिया, इंदीवर ने शब्द दिए और मन्ना डे ने जिसे आवाज़ दी कस्मे वादे, प्यार वफ़ा सब बातें है, बातों का क्या!’

यह एक प्रतिमान है, एक रूपक है धोखा खाई जनता का। शायद इसी लिए यह गीत प्राण के अभिनय का भी एक प्रतीक बन गया।

 नहीं गीत तो प्राण पर और भी बहुतेरे फ़िल्माए गए हैं। ‘यारी है ईमान मेरा, यार मेरी ज़िंदगी!’ जंज़ीर फ़िल्म में उन पर फ़िल्माया गया गीत भी मुहावरा बन कर छा गया लोगों के दिलों पर और प्राण के अभिनय ने इस में जो आंच दे दी तो वह परवान चढ़ गया। प्राण की भूमिका अपनी फ़िल्मों में वास्तव में वही हुआ करती थी जो भूमिका रामायण में हनुमान की थी। जैसे समूची रामायण है तो राम चरित लेकिन हनुमान के कंधों पर ही लिखी गई है, उन्हीं के गुणगान में न्यस्त है। ठीक वैसे ही फ़िल्म कोई भी हो, हीरो कोई भी हो समूची फ़िल्म प्राण के कंधों पर बैठी मिलती है। चाहे वह खल पात्र जी रहे हों चाहे सहयोगी पात्र। जैसे हनुमान ही पहले राम से मिले, सीता को खोजा, लंका में आग लगाई, पुल बनाने में योगदान दिया, अहिरावण के अपहरण से राम-लक्ष्मण को छुड़ाया, संजीवनी लाए, आदि-आदि किया ठीक ऐसे ही अपनी फ़िल्मों में सारा काम तो प्राण ही करते हैं। हीरो हिरोइन तो बस फ़िलर ही होते हैं। यह भी अनायास तो नहीं होता था कि एक राजेश खन्ना को छोड़ दें तो सभी हीरो के मुक़ाबले प्राण ज़्यादा पैसे लेते थे। जैसे कि कहा जाता है कि डॉन में अमिताभ बच्चन को तब ढाई लाख रुपए मिले थे और प्राण को पांच लाख रुपए। तो इसी लिए कि प्राण ही अपनी फ़िल्मों के प्राण थे।

कहा जाता है कि समाज पर फ़िल्मों का असर बहुत होता है। कहीं यह सच भी है। सोचिए कि सत्तर के दशक में पंजाब, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के स्कूलों में किए गए एक सर्वे में पाया गया था कि पिछले तीस सालों से प्राण नाम के किसी भी बच्चे का एडमीशन नहीं हुआ।

क्यों कि तब के दिनों प्राण हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री के सब से बड़े खलनायक थे। और खलनायक के नाम पर कोई अपने बच्चे का नाम रखने को तैयार नहीं था। लेकिन अपनी खलनायकी का डंका बजाने वाले, फ़िल्मों में सब से ज़्यादा पैसा लेने वाले प्राण किसी फ़िल्म में एक रुपए में भी काम कर सकते थे। और उन्हों ने यह किया। बात उन दिनों की है जब मेरा नाम जोकर बना कर राज कपूर भारी नुकसान उठा चुके थे और बॉबी बनाने की फ़िराक़ में थे। ऋषि कपूर के पिता की भूमिका के लिए वह प्राण को लेना चाहते थे पर उन के पास   पैसे की किल्लत थी। सो प्राण को एप्रोच नहीं कर पा रहे थे। प्राण को जब यह पता चला तो वह खुद राज कपूर के पास गए और एक रुपए शगुन के तौर पर ले कर बॉबी फ़िल्म में काम किया। बॉबी का वह कड़ियल पिता आज भी लोगों की जेहन में ज़िंदा है। मैं ने पहले ही कहा कि मुझे प्राण के अभिनय का पिता रूप ज़्यादा प्रभावित, ज़्यादा आह्लादित करता है। पूरब और पश्चिम में वह लंदन में हैं। प्रेम चोपड़ा के पिता के रूप में। दोनों ही खल चरित्र हैं। पाश्चात्य सभ्यता, शराब और शबाब में डूबे हुए।

पूरब और पश्चिम में हालां कि तीन पिता और हैं। सभी अपनी-अपनी यातना में डूबे हुए। एक पिता रूप ओम प्रकाश का भी है। जो ऐसी बेटी का पिता है जिस का पति गोरी मेम के चक्कर में पड़ कर पत्नी और बेटे को बिसार कर उस गोरी मेम से शादी के फेर में पड़ जाता है। गरीब ओम प्रकाश बेटी का जीवन बचाने, बेटी और नाती के साथ लंदन पहुंचे हैं। सायरा बानो के पिता रूप में मदन पुरी हैं। जो बीवी और बेटी के पश्चिमी रंग में रंग जाने पर आहत हैं। और सहगल की आवाज़ में बाबुल मोरा नइहर छूटो ही जाए सुन कर सुकून ढूंढते हैं। अशोक कुमार भी हैं पिता रूप में। बल्कि पितामह रूप में भी। लेकिन इन सब में सब से प्रखर पिता भले खल ही सही प्राण ही हैं जो अपने बेटे की इच्छा पूरी करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। जाहिर है पूरब और पश्चिम का द्वंद्व है समूची फ़िल्म में। भारत बने मनोज कुमार का पूरब जीतता ही है फ़िल्म में पर अभिनय में बाज़ी प्राण के पिता रूप की है। परिचय में भी उन के पिता की तासीर देखते बनती है।

बॉबी में प्राण ऋषि कपूर के पिता हैं। रईस पिता। बच्चे को सुधारने के फेर में उसे बोर्डिंग भेज कर उस से दूर होते पिता। प्राण का यह पिता रूप वास्तव में उस दौर के रईस पिताओं का वह रूप है जो अपनी रईसी में धुत जेनरेशन गैप की राह चले जाते हैं। उस के प्रेम के भी दुश्मन बन जाते हैं। इस लिए वह नौकरानी की बेटी से इश्क फ़रमा बैठता है। पर पिता अंतत: पिता होता है और बेटा, बेटा। पिता पिघलता ही है, बेटे को बचाने के लिए गुंडों से भी लड़ता है और पहाड़ी नदी में भी कूदता है बेटे को बचाने के लिए। बेटे के फेर में नायिका डिंपल को बचाता है। और बेटे को नायिका के पिता प्रेमनाथ बचाते हैं। यह फ़िल्मी ध्रुव है, फ़िल्मी माजरा है पर इन दोनों पिताओं में बीस प्राण ही हैं।

 जाने क्या है कि ऐसे कुछ कलाकार है हिंदी फ़िल्मों के जिन के कंधे पर फ़िल्म लदी होती है पर उन्हें वह सुर्खी, वह इज्ज़त, वह लोकप्रियता कभी नहीं मिलती। प्राण और प्रेमनाथ ऐसे ही कलाकारों में शुमार हैं। अरुणा ईरानी, फ़रीदा जलाल भी ऐसी ही कलाकार हैं। ओम पुरी, नाना पाटेकर, परेश रावल, बोमन ईरानी भी इसी फ़ेहरिस्त में हैं। यह फ़ेहरिस्त लंबी है। लेकिन इन्हें जो इज्ज़त, हैसियत और शोहरत नसीब होनी चाहिए थी, नहीं हुई।

खैर, बात प्राण के पिता रूप की चल रही थी। अमर अकबर एंथोनी में वह फिर पिता हैं इन तीनों किरदारों के। जिन्हें वह खो चुके हैं। पर उन के पिता की तड़प छलक-छलक पड़ती है। देसाई समीकरण और टोटके में लथ-पथ होने के बावजूद इस फ़िल्म में बच्चों के लिए प्राण के पिता रूप की छटपटाहट की इबारत साफ पढ़ी जा सकती है।

 उन की इस पिता रूप की छटपटाहट की इबारत और तल्ख़ और घनी हो कर उभरती है प्रकाश मेहरा की शराबी में। जिस में वह अमिताभ बच्चन के किरदार के पिता हैं। एक बार फिर रईस पिता। रईस पिता की तनहाई एक तरफ़ है, बेटे की जुदाई और तनहाई दूसरी तरफ़। बेटे से एक पिता कितना टूट कर प्यार कर सकता है, करता ही है यह प्राण के पिता रूप का अभिनय, उस की इबारत उन के हर फ़िल्मी पिता रूप ने बार-बार बांची है।

फ़िल्मों में बहुत सारे अभिनेता हुए हैं पर प्राण जैसा प्राण फूंकना, उस को अभिनय का सच देना किसी-किसी ही के हिस्से आया है। और इस में प्राण का पिता हमें हमेशा बीस दिखता है। पिता-पुत्र का द्वंद्व, जैसे फ़िल्मी परदे पर प्राण जीते हैं, जिस तल्ख़ी तुर्शी और तेवर में जीते हैं वह दुर्लभ है, अविरल है और अमिट है। उन के अभिनेता के पर्सेप्शन आफ़ सेल्फ़ के क्या कहने!

 उन के अभिनेता के शेड कई हैं और कहा जाता है कि अपनी कोई साढ़े तीन सौ फ़िल्मों में प्राण ने कभी भी अपने को दुहराया नहीं। दुहराया उन्हों ने जो बार-बार और कमोवेश हर फ़िल्म में तो वह एक शब्द है बरखुरदार ! विक्टोरिया नंबर 203 में वह अशोक कुमार के जोड़ीदार हैं। एक चाभी का ताला खोजते हुए। पूरी रंगीनी में धुत्त, मैं हूं राना, ये है राजा ये दीवाना मैं मस्ताना!’ गीत गाते हुए। अशोक कुमार और प्राण की केमेस्ट्री यहां देखते बनती है।

असल में प्राण का जैसे पिता रूप मुझे प्रभावित करता है वैसे ही उन का दोस्त या भाई रूप भी आंखों के सामने है। जैसे कि जानी मेरा नाम में वह देवानंद के भाई मोती हैं तो कालिया में एक कड़ियल जेलर के साथ-साथ वह परवीन बाबी के भाई भी हैं ही। जंज़ीर में तो वह अमिताभ के साथ यारबास हैं ही यारी है ईमान मेरा यार मेरी ज़िंदगी गाते हुए। मज़बूर में भी माइकल दारू पी कर दंगा करता है गाते हुए हैं। जोशी पड़ोसी कुछ भी बोले, बोले हम कुछ नहीं बोलेगा गाते हुए भी उन की यारी की सिफ़त देखते बनती है। जिस देश में गंगा बहती है में एक गीत है आ अब लौट चलें। फ़िल्माया राजकपूर पर गया है। पर   फोकस प्राण पर ही हैं। प्राण डाकू हैं इस फ़िल्म में। डाकुओं के समर्पण के समय का यह गीत है। प्राण पराजित मन से घोड़े पर बैठे लौट रहे हैं और गाना चल रहा है, अपना घर फिर अपना घर है। प्राण घोड़े को ऐसे चाबुक मारते हैं गोया खुद को चाबुक मार रहे हैं। उन के चेहरे पर समर्पण के मलाल की इबारत इसी रूप में उभरती है। प्राण का एक रूप पुलिस वाले का भी है। उन की चुहुलबाज़ी के भी शेड बहुतेरे हैं। पर उन के  सारे अभिनय पर भारी है उन का खलनायक। जैसे मधुमती में वह उग्र नारायण बने हैं।

उस में दिलीप कुमार उन के लिए एक जगह  कहते हैं नाग की तरह खूबसूरत, डरावना और चपल! सचमुच वह खल अभिनेता रूप में किसी नाग की तरह खूबसूरत, डरावना और चपल तो हैं ही जिस को परदे पर देखते ही दर्शक की देह में अंदेशे की एक लहर पैदा हो जाती है। डर की एक नदी बहने लगती है। उन का धोखादेह अभिनय उन के खूंखार और शातिर रूप को और दहका देता था। इतना कि उन्हें परदे पर देखते ही लोग चिल्ला पड़ते थे, ‘हरमिया!’ सचमुच अभिनय में प्राण फूंकने वाले प्राण जैसे अभिनेता विरले हुए हैं। हिंदी सिनेमा उन्हें सर्वदा शलाका पुरुष के रूप में ही याद करेगा।

एक समय अपने शहर की राम लीला में सीता की भूमिका करने वाले प्राण बहुत पढ़े लिखे लोगों में से नहीं थे। फ़ोटोग्राफ़र बनने की हसरत लिए वह मैट्रिक तक यानी दसवीं तक ही पढ़ पाए थे। पर तब के दिनों मैट्रिक तक पढ़ लेना भी बड़ी बात मानी जाती थी। उन्हों ने एक्टिंग की भी पढ़ाई नहीं की थी। पर अपनी एक फ़िल्म में वह कहते हैं कि मैं ए डब्लू डी हूं। मतलब एडवोकेट विदआऊट डिग्री! तो  विदआऊट डिग्री वाला यह अभिनेता सचमुच धर्मा की कव्वाली के उस मिसरे में जो कहूं तो मैं  चंदन हूं, मैं चंदन हूं, मैं चंदन हूबहू हूं! चंदन ही है। उन के इस अभिनय के चंदन की खुशबू सर्वदा महकती रहेगी। ठीक वैसे ही जैसे दिल्ली के बल्लीमारान में पैदा हुए ग़ालिब की ग़ज़लों की गमक और खुशबू हमारे मन में आज भी बसी हुई है। उसी बल्लीमारान में पैदा हुए प्राण के अभिनय की खुशबू, उन के अभिनय की आंच और उन के संवाद अदायगी की सदा सर्वदा गूंजती रहेगी।

2 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन अमर शहीद मंगल पाण्डेय जी की 186 वीं जयंती - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. बहुत सुंदर संस्मरण।

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