Wednesday, 23 September 2026

सत्ता के नशे में प्याज और जूते दोनों खाने की लत

दयानंद पांडेय


सहमति और असहमति की अंत्याक्षरी में देश झुलस रहा है l तो भी चुनाव आयुक्तों के बीच असहमति कोई पहली बार नहीं हुई है l मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना की अवधारणा प्राचीन है l चुनाव आयोग में पहले के भी असहमति के अनेक किस्से हैं l सुप्रीम कोर्ट , हाई कोर्ट की बेंच में भी निरंतर असहमति आम बात है l कोई भी फ़ैसला बहुमत या सर्वसम्मत से होता रहता है l देखिए न सुप्रीम कोर्ट में भी अभी इसी चुनाव आयोग के मुद्दे पर मतभेद की ख़बर आ गई है l दो जज इस मसले को सुन रहे थे l आपसी सहमति न होने पर मामला चीफ़ जस्टिस को सौंप दिया गया है l यह एक प्रक्रिया है l पुरानी है , नई नहीं l

लेकिन विपक्ष और मीडिया की रोजी रोटी भी एक तत्व है l आनंद लीजिए इस रोज़ी रोज़गार का l चिंतित नहीं l बिल्कुल नहीं l लोकतंत्र ख़तरे में नहीं है l ख़तरे में तो हमारा समाज है l जाति, आरक्षण , दलित की ब्लैकमेलिंग में है l

अब देखिए न बिहार के जमुई में नाबालिग लड़की के साथ अभद्रता की बात बहुत ज़ोर शोर से उठी l आरोपियों के भगवा गमछे ने आग लगा दी l लेकिन जैसे ही पता चला कि आरोपी यादव और मुस्लिम हैं , आग बुझ गई l प्रतिपक्ष और उस का पालतू मीडिया ख़ामोश हो गया l तेजस्वी यादव को साँप सूंघ गया है l

मुंबई में आई आई टी मामले में भी असहमति का आनंद देखिए l जिस लड़के ने आत्महत्या की , उस के पिता और माता शोक में नहीं , आंदोलन के मूड में है l अव्वल तो उन्हें मुआवजा तुरंत चाहिए l बाक़ी उन के तेवर बता रहे हैं कि वह चुनाव लड़ने की तैयारी में है l बेटे की लाश पर वह नेता बनने की तैयारी में है l पिता जाँच हुए बिना वह प्रोफ़ेसर की गिरफ़्तारी का पहाड़ा पढ़ रहा है l उपदेश दे रहा है l प्रोफ़ेसर को एकतरफा दोषी बता देने की बात पर असहमतियों का सागर हिलोरें मार रहा है l ग़नीमत बस यही है कि प्रोफ़ेसर गुल्ला भी ओ बी सी हैं l खुदा न खास्ता अगर सवर्ण होते तो ? उस में भी अगर ब्राह्मण होते तो ?

मुंबई आग के हवाले हो गई होती l आई आई टी ही जला देते l धुआँ-धुआँ हो गई होती l अभी तो देश की लगभग सभी आई आई टी की फैकल्टी प्रोफेसर को नैतिक समर्थन दे कर साथ खड़ी हैं l यह बहुत बड़ी बात है l पर दलित एक्ट को इसी तरह सभी राजनीतिक पार्टियां वोट बैंक के चक्कर में तलवार बना कर चमकाती रहीं तो देश और समाज किस मोड़ पर खड़ा मिलेगा , सोच कर एक बार देख लीजिए l मेडिकल की सीटों पर माइनस चालीस का बुखार चढ़ा ही है अब आई आई टी को भी इस में झुलसाने की तैयारी हो गई है l

आरक्षण के भिखारी और कोढ़ी एडमिशन तो आरक्षण से पा जाते हैं l फ़ीस मुफ़्त हो जाती है और हास्टल भी l पर पढ़ाई के लिए अपेक्षित बुद्धि और मेहनत तो आरक्षण से नहीं मिल पाता l अर्जित करनी पड़ती है l नहीं मिलती तो नकल करते हैं l पकड़े जाते हैं l दलित फलित का ड्रामा करते हैं l लांछन लगाते हैं l आत्महत्या कर लेते हैं l अभी-अभी मेडिकल के एक यादव छात्र की आत्महत्या की ख़बर आ रही है l

करेला और नीम चढ़ा पहले ही सा था पर मोदी सरकार ने लाखों के मुआवजे का विष पिला कर दलितों को भस्मासुर बना दिया है l यू जी सी रोल बैक पर अगर धर्मेंद्र प्रधान हटा दिए गए होते तो काकरोचों से इस तरह अपमानित न होना पड़ता l लेकिन मोदी और उन की सरकार को सत्ता के नशे में प्याज और जूते दोनों खाने की लत लग गई है l संसद में फ़ैसला बदल कर सुप्रीम कोर्ट के हाथ बांध दिए हैं l संसद और सुप्रीम कोर्ट की इस असहमति का क्या करेंगे ?

संविधान में ही तमाम असहमतियां और अंतर्विरोध के बीज भरे पड़े हैं l

तो क्या देश में जातीय आग लगा देने के बाद ही सभी राजनीतिक पार्टियों का सत्ता सुख लेना फ़ार्मूला बन गया है l जातियों की सहमति और असहमति की यह अंत्याक्षरी देश को किस तरह खोखला और निर्जीव बना गई है , देखना दुर्भाग्यपूर्ण है l

1 comment:

  1. वाक़ई आज़ादी के इतने वर्षों बाद आरक्षण का ख़ात्मा होना चाहिए

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