दयानंद पांडेय
ममता कालिया को पढ़ना मन को वृंदावन करना है। इस लिए नहीं कि वह वृंदावन में पैदा हुई हैं। इस लिए कि उन की कहानियों में सुकून का सुरूर भी है। भाषा में अजब सा ठहराव और गहनता है। साधारण चरित्र और उस के साधारण विवरण से असाधारण कथा संसार रचने वाली ममता कालिया का कथा संसार जितना भरपूर है , संस्मरण संसार भी अपूर्व है। ममता कालिया जब ममता अग्रवाल थीं तब कविता लिखती थीं। क ख ग पत्रिका के मुख पृष्ठ पर छपी इस कविता से वह जैसे चर्चा में आ गई थीं :
प्यार शब्द घिसते - घिसते चपटा हो गया है
अब हमारी समझ में
सहवास आता है।
70 के दशक में इस तरह की भाषा और वह भी एक स्त्री की। लोगों का चौंकना सहज था। लेकिन रवींद्र कालिया ने एक जगह लिखा है कि चंडीगढ़ की एक गोष्ठी में उस से भेंट हुई तो मैं ने पाया कि वह कविताओं में ही बोल्ड है , जीवन में तो सूर्यास्त से पूर्व पापा के डर से घर पहुंच जाने वाली एक औसत लड़की है। तब के समय वह ममता अग्रवाल थीं। पहले अध्यापक फिर आकशवाणी के अफसर विद्याभूषण अग्रवाल की बेटी। लेकिन बाद के समय में ममता अग्रवाल ने अपनी रचनाओं में ही नहीं , जीवन में भी जो छलांग लगाई वह अप्रतिम थी। अपनी रचनाओं और जीवन में ममता कभी औसत नहीं रहीं। दिल्ली और मुंबई में रवींद्र कालिया से लंबी मित्रता के बाद वह ममता कालिया बन गईं। पिता के नक्शे क़दम पर चलते हुए ममता अग्रवाल भी दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कालेज में अंग्रेजी पढ़ाने लगी थीं। फिर मुंबई में भी अंग्रेजी पढ़ाती रहीं। बाद के समय में प्रयाग के महिला सेवा सदन डिग्री कालेज में प्राचार्य हुईं। अंग्रेजी की अध्येता रहीं ममता कालिया पर अमरकांत की सादगी और उन के लेखन का गहरा प्रभाव दिखता है। रवींद्र कालिया पर भी अमरकांत का गहरा प्रभाव था। अमरकांत पर रवींद्र कालिया ने एक विशेषांक भी संपादित किया था जो बाद में पुस्तक रूप में प्रकाशित हुआ।
लोग एक साथ दो उपन्यास नहीं पढ़ सकते। लेकिन ममता कालिया एक साथ दो उपन्यास लिखने की अभ्यस्त रही हैं। कालेज के समय में एक उपन्यास और घर के समय में दूसरा उपन्यास। कोई औसत लेखक तो ऐसा करने से रहा। औसत लेखक ? बड़े से बड़ा लेखक भी ऐसा शायद नहीं कर सकता। अपने ही उपन्यास का अंग्रेजी में रिक्रिएशन करना किसी को सीखना हो तो ममता कालिया से सीखे। अपने ही उपन्यास दौड़ का अंग्रेजी में रिक्रिएशन ममता कालिया ने खुद किया है। तीन लेखक दंपतियों की एक समय बड़ी चर्चा रही है। मोहन राकेश - अनीता राकेश , राजेंद्र यादव - मन्नू भंडारी , रवींद्र कालिया -ममता कालिया। इन में जो पहली जोड़ी मोहन राकेश और अनीता राकेश की है उस में निश्चय ही मोहन राकेश बड़े कथाकार हैं। अनीता राकेश खो जाती हैं। लेकिन कृपया मुझे यह कहने की अनुमति दीजिए कि मन्नू भंडारी , राजेंद्र यादव से बड़ी कथाकार हैं। राजेंद्र यादव को हम कथाकार नहीं , हंस के संपादक के तौर पर याद करते हैं। अन्य अनेक निजी कारणों से भी। इसी तरह ममता कालिया , रवींद्र कालिया से बड़ी कथाकार हैं। रवींद्र कालिया को हम कथाकार से ज़्यादा संस्मरणकार और संपादक के लिए जानते हैं। संपादक तो ममता कालिया भी रही हैं। यह बहुत कम लोग जानते हैं। वर्धा हिंदी विश्विद्यालय की अंग्रेजी में निकलने वाली पत्रिका हिंदी की। पर परिचित हम ममता कालिया के विराट कथा संसार से ही हैं। अलग बात है कि अब की साहित्य अकादमी ममता कालिया को संस्मरण के लिए ही घोषित हुआ है। जीते जी इलाहाबाद के लिए। जीते जी इलाहाबाद के कवर पृष्ठ पर छपा है :
शहर -
पुड़िया में बांध कर
हम नहीं ला सकते
तो क्या !
सच तो यही है। पर एक दूसरा निर्मम सच यह है कि ममता कालिया इलाहाबाद शहर को दिल में टांक कर अपने आंचल में बांध कर , घूमती हैं। जीते जी इलाहाबाद की इबारत ही नहीं उन के उपन्यासों और कहानियों की इबारत भी यही कहती है। हम सभी जानते हैं कि रवींद्र कालिया संस्मरणों के बादशाह थे। इस लिए भी कि वह यारबास थे। फिर ममता कालिया से उन की यारी इतनी प्रगाढ़ थी कि मोहन राकेश या राजेंद्र यादव की तरह उन का दांपत्य कभी खटाई में नहीं पड़ा। प्रगाढ़ होता गया। इतना सफल दांपत्य कम ही लोगों का होता है। तमाम खटपट के बावजूद। उपेंद्रनाथ अश्क के बावजूद। इस की अलग कथा है जिस की हलकी सी आंच रवींद्र कालिया ने ग़ालिब छुटी शराब में परोसी है। अश्क अपना ही नहीं , लोगों का भी दांपत्य तुड़वाने के आचार्य थे। बहरहाल जिन ममता कालिया को हम उन की कहानियों , उपन्यासों के लिए , संबंधों में उन के ममत्व के लिए जानते थे , अचानक उन के संस्मरणों से रूबरू होने लगे। शायद यह रवींद्र कालिया की संगत का प्रताप है। जीते जी इलाहाबाद से भी बेहतर संस्मरण अंदाज़-ए-बयां उर्फ रवि कथा को पाता हूं जो 2020 में प्रकाशित हुआ था। कथा रवि में रवींद्र कालिया की ऐसी भीगी यादें हैं कि पूछिए मत। साधारण से साधारण विवरण में बड़ी-बड़ी बात लिख जाती हैं ममता । ग़ालिब छुटी शराब अगर रवींद्र कालिया के जीवन का दरवाज़ा है तो रवि कथा उस घर की खिड़की है। जिस से झिर-झिर पुरवैया बहती रहती है। रवींद्र कालिया इलाहाबाद को उस के अमरुद की महक से याद करते थे। ममता कालिया इलाहाबाद में रवींद्र कालिया की सुगंध खोजती फिरती हैं।
इलाहाबाद को बहुतेरे लेखकों ने जिया और लिखा है। इलाहाबाद ने इतने लेखक , कवि और शायर दिए हैं , शायद कम शहर हैं , जो दे पाए हों। एक समय इंदिरा गांधी फ़िराक़ गोरखपुरी को राज्य सभा भेजना चाहती थीं। इलाहाबाद से फ़िराक़ को दिल्ली बुलवाया। और यह प्रस्ताव रखा। फ़िराक़ ने कहा फिर तो बिटिया तुम को राज्य सभा को इलाहाबाद भेजना पड़ेगा। इंदिरा गांधी ने कहा कि जब मन करे तब आइएगा। न मन करे तो मत आइएगा। लेकिन फ़िराक़ ने इलाहाबाद छोड़ कर राज्य सभा जाने से इंकार कर दिया। बहुत कम लोग जानते हैं कि महादेवी वर्मा 6 वर्ष लखनऊ रही हैं। पहली विधान परिषद की सदस्य नामित हो कर। पंडित कमलापति त्रिपाठी ने एक जगह लिखा है कि विधान परिषद में जब महादेवी बोलती थीं तब लोग उन्हें मंत्रमुग्ध हो कर सुनते थे। कई बार समय सीमा समाप्त हो जाती थी। पर कोई उन्हें टोकता नहीं था। सभापति भी नहीं। उन को सुनते रहते थे। बहरहाल महादेवी ही नहीं , इलाहाबाद जा कर लेखक लोग बसते रहे। पढ़ते रहे। नौकरियां करते रहे। इलाहाबाद छोड़ते रहे पर इलाहाबाद कभी नहीं भूले। पंत , निराला , अज्ञेय , शमशेर , बच्चन ,अमरकांत , भैरव प्रसाद गुप्त , धर्मवीर भारती , मार्कण्डेय , कमलेश्वर , दुष्यंत , कन्हैयालाल नंदन , सर्वेश्वर दयाल सक्सेना , ज्ञानरंजन , दूधनाथ सिंह आदि अनेक लोग। रवींद्र कालिया और ममता कालिया भर ने नहीं , उपेंद्रनाथ अश्क और उन के बेटे नीलाभ ने भी इलाहाबाद को ख़ूब लिखा है। लौट आओ धार में दूधनाथ सिंह ने भी इलाहाबाद को ग़ज़ब ढंग से लिखा है। ज्ञानरंजन भी इलाहाबाद को जब तब रटते और लिखते रहे हैं। लोकनाथ की मिठाई खाते-खिलाते रहते हैं। हिंदी में बहुत से संस्मरण लेखक हैं। मेरी भी पांच किताबें संस्मरण पर हैं। पर सब से बढ़िया संस्मरण लेखक कांति कुमार जैन को मानता हूं। कांति कुमार जैन ने अनेक संस्मरण लिखे हैं। जिन में एक संस्मरण अपने सहपाठी आचार्य रजनीश पर भी लिखा है। अद्भुत है रजनीश पर लिखा उन का संस्मरण। रजनीश यानी ओशो को समझने का एक नया और अलौकिक मार्ग।
बहरहाल जीते जी इलाहाबाद को लिखने वाली ममता कालिया अब साहित्य अकादमी से संस्मरण के लिए सुशोभित और प्रतिष्ठित हैं। कोई भी पुरस्कार किसी को सुख और दुश्मन दोनों एक साथ देता है। नालायकों , तिकड़मबाज़ों और बनावटी लेखकों की सेहत पर इस सब से कोई फर्क नहीं पड़ता। पर लिखने वाले को बहुत फ़र्क पड़ता है। ऐसे गोया स्वाभिमान का अपमान से समझौता हो गया हो। सारी रचनात्मकता और सारी मेहनत अपमानित हो जाती है इन जलनखोर जीवों की कुढ़न से। लेकिन सर्वदा से ही यह सब कुछ होता आया है। कोई नई बात नहीं है। ममता कालिया को भी इस साहित्य अकादमी ने कई दुश्मन परोस दिए हैं। ममता कालिया को साहित्य अकादमी मिलना बहुतों को खल गया है l बहुत से लोग सिरे से ख़ामोश हैं l कुछ सदमे में ख़ामोश हैं l तो कुछ लोग विरोध में भी खड़े हो गए हैं l यह सब लगभग सभी पुरस्कार में होता रहता है l पर ममता कालिया की कांग्रेस के साथ पक्षधरता की चर्चा भी इस बार चर्चा में है l फ़ेसबुक पर राहुल गांधी के पक्ष में उन की एक पोस्ट की बड़ी चर्चा है l जानना दिलचस्प है कि रवींद्र कालिया और ममता कालिया की कांग्रेस से प्रतिबद्धता और सरोकार, कोई छुपा विषय नहीं है l अशोक वाजपेयी से उन की रिश्तेदारी भी लोग जानते ही हैं l

फ़ोटोग्राफ़ : भरत तिवारी
उन की इस किताब जीते जी इलाहाबाद पर भी विवाद शुरू है l पर इस सब में सब से दिलचस्प यह है कि ममता कालिया कई सारे अपनों को काटती हुई इस बार यह पुरस्कार पा गई हैं l पिछले तीन-चार वर्ष से हर बार वह मुक़ाबले में उपस्थित रहती थीं l और कट जाती थीं l इस बार एक दर्जन लोगों को पछाड़ कर विजेता हैं l ममता कालिया जी को बधाई दीजिए l किन-किन को काट कर ममता कालिया विजेता बनी हैं , उन को इस सूची में देखिए l और जानिए कि निर्णायक मंडल यानी ज्यूरी में थे : अनामिका , अरुण कमल और अरविंदाक्षन l मतलब सभी का नाम अ से शुरू l ऐसे जैसे दुक्खम-सुक्खम का कोई अनिवार्य पाठ हो।
ममता कालिया का एक बहुत महत्वपूर्ण उपन्यास है दौड़। बाज़ार और कैरियर के लिए तबाह होती नई पीढ़ी की अंधी दौड़ का विवरण पढ़ कर देह और मन में जैसे तमाम शीशों की किरिचें टूट कर चुभने लगती हैं। ठीक वही चुभन ले कर लोग उपस्थित हैं तो कोई क्या कर लेगा ? ममता कालिया के लेखन , उन की भाषा और संवेदना को तो नहीं न छीन लेगा। ममता कालिया शब्दों को जिस तरह ठहर कर लिखती हैं भीमसेन जोशी के आलाप का कोई ठाट याद आ जाता है। मन मुरकियां मारने लगता है। जाने यह ममता के वृंदावन में जन्म लेने की तासीर है या उन की भाषा और कथ्य का टटकापन कि राग खमाज अपने सातो सुर में बजने लगता है। ममता की कहानियों का ठाट यही है। उन की कहानियों की स्त्री अपने आप से बतियाती हुई , लड़ती हुई , अपने संघर्ष को तार-तार कर खल चरित्र के लोगों को उलार कर अपने पाठकों को दुलराने लगती है। ममता की कहानियों के ममत्व की छांव में विश्राम का एक यह पाठ भी है।
[ 23 मार्च , 2026 नवभारत टाइम्स , लखनऊ में प्रकाशित ]





जबरदस्त। बहुत कुछ जानने को मिला। भाषा की रवानगी और कथन कला अद्भुत। बहुत बधाई।
ReplyDeleteअति सुन्दर। आपका लेखन भी गजब का है।
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