Saturday, 28 July 2012

तो क्या सामाजिक न्याय की आंच में सहिष्णुता स्वाहा हो गई है?

तो क्या सामाजिक न्याय की हद अब इतना आगे बढ़ चुकी है, इतना विस्तार पा चुकी है कि सहिष्णुता आदि अब बीते दिनों की बात हो चली है? सामाजिक न्याय की आंच में सहिष्णुता स्वाहा हो गई है? यहां बात मायावती की मूर्ति तोड़ने को ले कर अफ़रा-तफ़री को ले कर है। अगर ऐसे ही मूर्तियां तोड़ने की बात होने लगेगी तो देश और समाज कहां जाएगा भला? आज हम आप की मूर्ति तोडे़, कल आप हमारी मूर्ति तोड़ें। यह सिलसिला जो चल निकला तो क्या होगा? और यह मुश्किलें आगे आने वाले दिनों में और आने ही वाली हैं। सत्ता और जनता की जगह सत्ता और प्रजा का रिश्ता समाज को कितना तोड़ेगा इस का अंदाज़ा लगाना बहुत मुश्किल नहीं है। ऐसे कारणों की पड़ताल और निदान जो समय रहते नहीं किया गया तो देश गृहयुद्ध के मुहाने पर कब आ जाए, कहा नहीं जा सकता।

कबीर का कहा, 'जो तोंको कांटा बुए ताहि बुए तू फूल, तोंको फूल को फूल है वाको है तिरसूल!' को अगर मायावती ने कभी पढ़ा और गुना होता अपनी राजनीति के ककहरे में तो शायद जैसे २६ जुलाई के दिन उत्तर प्रदेश आग के मुहाने पर बैठते-बैठते रह गया वह नौबत नहीं आई होती। यहां अखिलेश यादव की तारीफ़ करनी होगी कि समय रहते ही उन्हों ने सकारात्मक बयान और कार्रवाई कर के उत्तर प्रदेश को जलने से बचा लिया। लेकिन सोचिए कि खुदा न खास्ता अगर अखिलेश ने भी ईंट का जवाब पत्थर से देने की नीति अख्तियार की होती या आंख मूंद लिया होता इस घटना से तो उत्तर प्रदेश की आज क्या हालत होती? दलित उभार की आग में समूचा प्रदेश जल रहा होता। देश के बाकी हिस्से भी झुलस सकते थे। चुनाव के तुरंत बाद ही सरकार बनने की रवायतों के दौरान अखिलेश का एक बयान आया था कि सारी मूर्तियां हटा दी जाएंगी। तो मायावती फ़ौरन गरज गई थीं कि, 'तो पूरे देश की कानून व्यवस्था बिगड़ जाएगी।' और तो और भाजपा तो बीच चुनाव में ही हुंकार भर रही थी कि सरकार बनने के बाद सारी मूर्तियां ढहा दी जाएंगी। भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही यह बयान बार-बार दुहरा रहे थे चुनाव के दौरान। उन की सरकार नहीं बनी यह अलग बात है। पर अगर किसी तरह बन ही गई होती तो क्या वह भी मायावती समेत किसी की मूर्ति हटा या हटवा पाते भला?

भारतीय राजनीति में सर्वदा ही से सहिष्णुता का भाव रहा है। वैष्णव जन तो तेने कहिए, पीर पराई जाणे रे का भाव रहा है। राजनीतिक भेद-मतभेद पहले भी रहते रहे हैं पर सहिष्णुता नहीं जाती थी। पौराणिक गाथाओं में भी यह सहिष्णुता बार-बार मिलती है। महाभारत में जाएं तो सू्र्य अस्त होने के बाद युद्ध स्थगित हो जाता था। तो जो दिन में शत्रु भाव में मारे गए या घायल हो गए के खेमे में दूसरा पक्ष भी दुख जताने जाता ही था। दोनों ही पक्ष यह करते थे। रामायण में भी जाएं तो भले धोखे ही से बालि को राम ने मारा पर उस के पास दुख जताने वह पहुंचे ही। ऐसे ही रावणवध में भी विभीषण की सलाह पर नाभि में तीर मारने के बावजूद दुख जताने और ज्ञान पाने के लिए रावण के पास राम के जाने का विवरण मिलता ही है। यह और ऐसी तमाम घटनाओं से कथाएं और इतिहास भरा पड़ा है।

बहुत पुरानी बात नहीं है। देश आज़ाद हो गया था। विभाजन के बाद लगभग समूचा देश दंगों की आग में दहक रहा था। दंगे रोकने की सारी कोशिशें नाकामयाब हो चली थीं। नेहरु और पटेल आजिज हो गए थे। आखिर उन के पास राजनीति का तो अनुभव था पर प्रशासनिक अनुभव में शून्य थे। हार कर नेहरु और पटेल माऊंटबेटन के पास पहुंचे और बोले, 'संभाल लीजिए फिर से देश की बागडोर। पर इस देश को दंगों की आग से बचाइए। किसी भी तरह।' तो माऊंटबेटन ने दोनों लोगों को समझाया था कि देश की बागडोर मुझे फिर से मत सौंपिए। नहीं यह देश आप लोगों को कभी माफ़ नहीं करेगा।' 'तो देश को ऐसे ही जलने दें?' नेहरु ने विकल हो कर माऊंटबेटन से पूछा था। 'नहीं।' माऊंटबेटन ने उन्हें धीरज बंधाया और कहा कि, 'दंगों पर काबू मैं ही कर दूंगा पर इस के लिए देश की बागडोर मुझे सौंपने की ज़रुरत नहीं है।' उन्हों ने कहा कि आप एक कमेटी बना दीजिए और उस का चीफ़ मुझे बना दीजिए। और जिस-जिस को बता रहा हूं उस-उस को उस कमेटी का सदस्य बना दीजिए।' नेहरु ने ऐसा ही किया। इस तरह बिना राजनीतिक बागडोर हाथ में लिए माऊंटबेटन ने प्रशासनिक बागडोर थाम ली और देश में दंगों पर काबू पा लिया गया। यह भारतीय राजनीति में सहिष्णुता की एक मिसाल है। ऐसी अनेक मिसालें हैं। आप देखिए न कि पाकिस्तान भारत के लिए जब-तब आतंकवाद के कांटे बिछाता ही रहता है पर जब वहां भूकंप या कोई और आपदा आती है तो भारत उस विपदा में उस की खुल कर मदद करता ही है। यह सहिष्णुता ही है। पर क्या मायावती इस सहिष्णुता शब्द से वाकिफ़ भी हैं भला? होतीं तो जो राजनीतिक शिष्टाचार की जगह 'गिव' एंड 'टेक' की खुल्लमखुल्ला शैली विकसित की है उन्हों ने नहीं किए होतीं। वह कभी किसी और पार्टीजन तो छोड़िए अपनी पार्टी के लोगों से भी कोई राजनीतिक या सामाजिक संवाद करती नहीं दिखतीं। कभी किसी के दुख-सुख में शरीक नहीं दिखतीं। वह तो कहती हैं कि संगीत तो संगीत, चिड़ियों की चहचहाहट तक उन्हें पसंद नहीं। उन्हें तो बस सत्ता, पैसा, अपनी हनक, अपनी तानाशाही और हां, अपनी मूर्तियां ही पसंद हैं।

दरअसल मायावती और उन के आका कांशीराम के लिए तो 'तिलक, तराजू और तलवार, इन को मारे जूते चार' ही मुफ़ीद रहा। सहिष्णुता की भाषा और व्यवहार से जैसा उन का कोई सरोकार कभी नहीं रहा। तभी तो गांधी जिन को लगभग समूची दुनिया सम्मान देती है उन को भी मायावती शैतान की औलाद बता देती हैं। और उस कहे पर उन को कोई पछतावा कभी हुआ नहीं। जैसे दलित उभार और दलित वोट ही उन की सांस और ज़िंदगी है। देश, शिष्टाचार आदि से वह जैसे परिचित ही नहीं दीखती। एक समय कांशीराम भी जूते पहन कर गांधी समाधि पर उधम मचा कर सुर्खियां बटोर चुके थे। बताइए कि वह गांधी जिस ने क्विट इंडिया का नारा दे कर ब्रिटशर्स को देश से खदेड़ दिया था, वह ब्रिटिशर्स भी गांधी को क्या तो सम्मान देते हैं। रिचर्ड एटनबरो जैसे बडे निर्देशक उन पर दुनिया की सब से बेहतरीन फ़िल्म तक बनाते हैं। उन गांधी को जिन को देश राष्ट्रपिता मानता है, मायावती एक संवैधानिक पद पर रहते हुए भी, मुख्यमंत्री रहते हुए भी शैतान की औलाद कहने में गुरेज़ नहीं करतीं। उन्हीं दिनों मैं ने एक इंटरव्यू में मायावती से पूछा था कि, 'जिस गांधी को लगभग पूरी दुनिया सम्मान देती है, लगभग पूजती है उस गांधी को आप शैतान की औलाद कह देती हैं। कोई दिक्कत नहीं होती आप को? जनता आप का विरोध नहीं करती कभी?' यह सवाल सुन कर मायावती खिलखिला कर हंसी थीं तब। और मुझ से ही प्रतिप्रश्न कर बैठीं थीं कि, 'क्या कह रहे हैं आप? हमारा समाज तो इस बात को बहुत पसंद करता है। आप को पता है कि इस बयान के बाद हमारी सभाओं में भीड़ बढ़ गई है। हमारा गिफ़्ट बढ़ गया है। पहले जहां हज़ारों की थैली मिलती थी, वहां अब लाखों की थैली मिलने लगी है।' बाद के दिनों में तो खैर उन की यह थैली करोड़ों और फिर अरबों तक पहुंच गई। अंबेडकर जैसे बड़े नेता को उन्हों ने अपने सत्ता और पैसे की चाह में सिर्फ़ दलितों का नेता बना कर रख दिया। सत्ता और पैसे की चाह में वह अंधी हो गईं। जैसे सत्ता और पैसा ही उन की सांस हो गया। लखनऊ को जैसे उन्हों ने हस्तिनापुर बना दिया। धृतराष्ट्र और गांधारी बन गईं। जीते जी अपनी ही मूर्तियां भी वह लगवाने लग गईं। सुप्रीम कोर्ट कहता रहा कि काम बंद कीजिए और यह काम करवाती रहीं। हां, कल्याण सिंह ने जैसे एक समय बाबरी मस्जिद बचाने का शपथ पत्र दिया था, और मस्जिद गिरवा दी थी, उसी तरह यह भी शपथ पत्र देती रहीं कि काम बंद हो गया है। और दिन-रात काम करवाती रहीं। कानून की आंख में धूल झोंकती रहीं। अब तक कामयाब हैं। रहेंगी भी। क्यों कि वह दलित की बेटी हैं। कानून, समाज, परंपरा, शिष्टाचार आदि से ऊपर हैं। अभी कुछ दिन पहले की बात है कि ताज मामले में भी वह क्लीन चिट पा चुकी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने आय से अधिक संपत्ति मामले में उलटे सी.बी आई को डांट दिया कि इस मामले को इस में जोड़ने की क्या ज़रुरत है?

खैर यह एक अलग विषय है।

पर सोचिए कि अगर मायावती ने ४० अरब रुपए से अधिक खर्च कर दलित चेतना का यह मायावी और भ्रष्टाचारी संसार अगर न रचा होता तो क्या तब भी वह चुनाव हार गई होतीं? और कि क्या उन की मूर्ति इस तरह तोड़ कर उन्हें अपमानित किया जाता भला? और जो उन्हीं की तरह शठं-शाठ्यम समाचरेत की धुन पर अखिलेश यादव भी चले होते, रातो-रात नई मूर्ति न लगवाए होते तो सोचिए भला आज की तारीख में उत्तर प्रदेश किस कदर जल रहा होता दलित उभार की आग में। सोचना यह भी लाज़िम है कि मायावती ने अगर अपनी इतनी सारी मूर्तियां बनवा कर न रखी होतीं तो क्या हुआ होता? रातो-रात मूर्ति कहां से आती? सवाल यह भी है कि क्या यह इतना संगीन मामला है कि इस बिना पर उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाए? जैसा कि राज्यपाल से मिल कर बसपा नेताओं ने मांग की है। यह तो कानून व्यवस्था को हाइजैक करना हुआ। तो क्या सामाजिक न्याय अब इतना आगे बढ़ चुका है कि सहिष्णुता आदि अब बीते दिनों की बात हो चली है? सामाजिक न्याय की आंच में सहिष्णुता स्वाहा हो गई है?

वो जो कहते हैं न कि अभी तो यह अंगड़ाई है, आगे और लडा़ई है, वाली स्थिति है। अगर जैसा कि अखिलेश कह चुके हैं कि स्मारकों का इस्तेमाल वह स्कूल, अस्पताल आदि खोलने में करेंगे। भगवान उन्हें सदबुद्धि दें कि ऐसा वह हरगिज़ नहीं करें। अब जो बन गया है उसे वैसे ही रहने दें। यही देश और प्रदेश के हित में है। हालां कि कई बार मन होता है मायावती और उन के कारिंदों से यह पूछने का कि कबीर और रैदास जैसे लोग भी दलित ही हैं, उन की मूर्तियां या उन की अनुपस्थिति इन स्मारकों से क्यों है आखिर? क्या इस लिए कि यह लोग बैर भुला कर सहिष्णुता की अलख जगाने वाले लोग थे? खरी-खरी कहने वाले लोग थे इस लिए? पर इस पर कोई क्यों जवाब देगा, यह भी जानता हूं। काश कि जो तूंको कांटा बुए ताहि बुए तू फूल का पाठ राजनीति की पाठशालाओं में फिर से पढ़ाने की कवायद होती तो क्या बात होती !

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