Friday, 6 December 2019

बताइए भला कि इनकाउंटर देश के लिए बहुत भयानक है लेकिन बलात्कारी बहुत भले !


बताइए भला कि इनकाउंटर देश के लिए बहुत भयानक है लेकिन बलात्कारी बहुत भले ! है न , मेनका गांधी जी ! जो भी हो , न्याय हो और होता हुआ दिखाई दे सूत्र वाक्य की याद आ गई है। पंजाब के के पी एस गिल की याद आ गई है। पंजाब में आतंकियों के सफाए के लिए उन का एक अघोषित स्लोगन था , नो अरेस्ट , नो पेशी , नो सुनवाई। डायरेक्ट ऐक्शन , सीधे इंसाफ ! गिल ने इस में सफलता भी पाई थी। तेलंगाना पुलिस के डी सी पी रेड्डी ने के पी एस गिल को ही फॉलो किया है। सभी आतंकियों और बलात्कारियों के साथ के पी एस गिल के इस स्लोगन , नो अरेस्ट , नो पेशी , नो सुनवाई। डायरेक्ट ऐक्शन ! को फॉलो किया ही जाना चाहिए। इतना ही नहीं बलात्कारियों और आतंकियों को ज़मानत देने और तारीखों में उलझाने वाले जजों के साथ भी यही सुलूक किया जाना चाहिए। और ऐसे मामलों में मानवाधिकार के नाम पर खड़े होने वाले एन जी ओ के टट्टू लोगों को भी निपटा दिया जाना चाहिए। हो सकता है इस स्लोगन का कुछ दुरूपयोग भी हो। लेकिन बलात्कार और आतंक से ऐसे ही निपटना बहुत ज़रूरी हो गया है ।

दिलचस्प यह भी है कि समूचा देश इस इनकाउंटर का स्वागत कर रहा है। पुलिस पर फूल बरसा रहा है। मिठाई खिला रहा है। लेकिन एक असुदुद्दीन ओवैसी इस इनकाउंटर की जांच की मांग कर रहा है। एक जान दयाल भी ओवैसी के सुर में सुर मिला बैठा है। मानवाधिकार के नाम पर। कि क्या देश ऐसे ही चलेगा ? सुप्रीम कोर्ट की रूलिंग के मुताबिक हर इनकाउंटर की जांच होती है। इस की भी होगी। पर ओवैसी और जान दयाल का का दुःख देखिए। हैदराबाद पुलिस कमिश्नर सज्ज्नार वैसे भी ऐसे इनकाउंटर के लिए जाने जाते हैं। कुछ समय पहले एसिड अटैक करने वाले तीन लोगों को भी ऐसे ही इनकाउंटर में मार दिया गया था। यह सिलसिला जारी रहना चाहिए। मैं पूरी तरह अहिंसा में यकीन करता हूं लेकिन अहिंसा के नाम पर बलात्कारियों और आतंकियों को जश्न मनाते भी बहुत दिन तक नहीं देख सकता। जो भी हो डाक्टर प्रियंका रेड्डी की आत्मा को आज ज़रूर शांति मिली होगी। लेकिन काश कि बलात्कारियों को न्यायपालिका के मार्फ़त फांसी हुई होती तो ज़्यादा बेहतर होता। काश कि न्यायपालिका के लोग भी इस ताप को समझ सकते।

न्याय और न्यायपालिका के लिए आज शर्म का दिन है। न्यायपालिका अगर बलात्कार पीड़िताओं का दुःख समझती , उन के परिजनों का संताप समझती तो हैदराबाद पुलिस को आज इनकाउंटर कर डाक्टर प्रियंका रेड्डी को इंसाफ नहीं दिलाना पड़ता। देखिए न निर्भया के दोषियों को 7 साल बाद आज तक फांसी नहीं हुई। बल्कि एक दोषी लापता हो चुका है।

दुर्भाग्य देखिए कि न्यूज चैनलों , फेसबुक , वाट्स अप आदि पर दबी जुबान सही बलात्कारी भी अब सेक्यूलर नान सेक्यूलर हो गए हैं। जाहिर है पूरे देश को पसंद आने वाला हैदराबाद इनकाउंटर सेक्यूलरजन को रास नहीं आया है। सेक्यूलर शब्द ऐसे ही थोड़े बदबू करने लगा है। सत्तानशीनो को तो इस के खिलाफ होना ही है है। उन्हें डर है कि उन की मक्कारी का मजा कहीं पुलिस उन्हें भी न देने लगे। बस रिटायर्ड जज साहबान मुसलसल चुप हैं। क्यों कि इन्हीं मक्कार जजों के चक्कर में पुलिस को मुठभेड़ पर उतरना पड़ा। राहत इंदौरी का वह शेर है न :

नई हवाओं की सोहबत बिगाड़ देती है
कबूतरों को खुली छत बिगाड़ देती है।

वो जो जुर्म करते हैं इतने बुरे नहीं होते
सज़ा ना देकर अदालत बिगाड़ देती है।

जो लोग हैदराबाद इनकाउंटर पर सवाल दर सवाल की बोफोर्स दाग रहे हैं उन सभी से पूछने का मन होता है कि अगर बलात्कार और हत्या की शिकार वह बेटी , आप की खुद की बेटी होती तो ? यही तर्क और यही विमर्श करते ? अरे कमीनों बेटियां साझी होती हैं। वह तुम्हारी भी बेटी थी। सवाल उठाना ही है तो न्यायपालिका में बैठे कमीनों पर उठाओ जिन्हों ने हत्यारों , बलात्कारियों और भ्रष्टाचारियों को तारीखों और कानूनी प्रक्रिया की आड़ में अभयदान दे रखा है। कभी पढ़ते थे कि किसी भी देश के लिए सेना से भी ज़्यादा ज़रूरी होती है न्यायपालिका। पर हत्यारों , बलात्कारियों और भ्रष्टाचारियों को ज़मानत देने वाली यह बेल पालिका उर्फ़ नपुंसक न्यायपालिका तो हरगिज , हरगिज किसी देश को नहीं ही चाहिए होती है। जो रूल आफ ला बलात्कारियों , हत्यारों , आतंकियों और भ्रष्टाचारियों को सिर्फ जीवन देता हो , उस रूल आफ ला को अभी के अभी जला दो। 


2 comments:

  1. विचारोत्तेजक

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  2. आशा है कि आपको रेयान इंटरनेशनल स्कूल गुरुग्राम हत्या कांड याद हो। पुलिस ने एक बस कंडक्टर पर आरोप लगाया था और उसे कक्षा 2 के छात्र की हत्या करने के लिए गिरफ्तार किया था। उसने 'कबूल' भी कर लिया। लेकिन बाद में सीबीआई ने उसे निर्दोष पाया। CBI ने उसी स्कूल के एक 16 साल के लड़के को गिरफ्तार किया। आपके अनुसार बेचारे निर्दोष बस कंडक्टर को पहले दिन ही पुलिस द्वारा मार दिया जाना चाहिए था।

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