भवतोष पांडेय
‘तुम्हारे बिना’ वरिष्ठ साहित्यकार श्री दयानंद पांडेय का एक भावनात्मक कहानी-संग्रह है, जिसमें प्रेम, वियोग, समाज, संवेदना और स्त्री-पुरुष के जटिल संबंधों की गहराई को मार्मिकता से प्रस्तुत किया गया है। यह संग्रह समकालीन हिन्दी कथा साहित्य में प्रेम के बहाने एक गहन मानवीय खोज है, जिसमें विरह का सौंदर्य, स्मृति की पीड़ा, और स्त्री की आकांक्षाओं का स्वरूप एक नई संवेदना में ढलकर सामने आता है।
कहानी संग्रह : ‘तुम्हारे बिना’ की पहली कहानी
तुम्हारे बिना शीर्षक से है । यह लेखक श्री दयानंद पांडेय की इस संग्रह की की प्रतिनिधि कहानी कही जा सकती है ।
बेहतर होगा कि विस्तार से इस प्रतिनिधि कहानी की चर्चा हो ।
कथा का स्वरूप और संरचना:
‘तुम्हारे बिना’ कोई पारंपरिक कथा नहीं, बल्कि यह एक लंबा आत्मालाप है — एक प्रेमी पुरुष की अंतरात्मा की चीख। इसमें नायक का वाचक (narrator) नायिका से संबोधित होकर एक भावनात्मक अंत:प्रवाह रचता है, जिसमें स्मृति, प्रेम, पीड़ा और वियोग एक साथ बहते हैं।
यह कहानी अपने रूप में मनोवैज्ञानिक प्रेम-मोनोलॉग है, जिसमें किसी बाहरी संवाद या घटनाक्रम की आवश्यकता नहीं, क्योंकि पाठक उस मन में घुस जाता है, जहां प्रेम ने अपने तमाम रंग छोड़े हैं — कभी मीठे, कभी तीखे, और कभी असह्य।
‘तुम्हारे बिना’ एक विरह-वेदना की कथा है, जिसमें नायक अपने जीवन से एक स्त्री — ‘तुम’ — के चले जाने के बाद की खाली ज़िंदगी को शब्द देता है। यह 'तुम' अब न तो लौट सकती है, न मिलती है, न संवाद करती है। लेकिन उसकी स्मृति, उसका प्रेम, उसका स्पर्श, उसकी हँसी, उसका कोप, उसके होठ, उसके बाल, उसकी देह — सब कुछ अब भी नायक के भीतर जीवित है। वह यादों की नदी में बार-बार गोता लगाता है, कभी तैरता है, कभी डूबता है।
वह कहता है:
"तुम्हारे बिना ज़िंदगी टूटे हुए दर्पण की तरह है — जिसमें अब मैं ख़ुद को नहीं देख पाता।"
यह कहानी प्रेम की ऊँचाइयों से गिरकर एक अंतहीन खालीपन में गिरने की प्रक्रिया को दर्शाती है। नायक के लिए प्रेम अब यादों की बारिश बन गया है, जो उसकी हर रचना में भीगती है। उसे नायिका की देह की गंध, नमी, आवाज़, आंसू — सब कुछ याद है, परंतु वो स्त्री अब नहीं है।
स्त्री यहां कोई 'चरित्र' मात्र नहीं, बल्कि एक अनुभव है, प्रतीक है, रचना का केंद्रबिंदु है। वह नायक की ज़िंदगी में नदी की तरह आई — बहती रही — और फिर लहर बनकर छोड़कर चली गई। लेकिन वह लहर अपने पीछे नमी छोड़ गई, स्थायी स्मृति बन गई।
लेखक ने प्रेम को केवल देह तक सीमित नहीं रखा — बल्कि देह के माध्यम से आत्मा तक पहुंचने की कोशिश की है। वह स्त्री के अंगों, उनकी गंध और रंगों का वर्णन करता है, लेकिन उसे केवल 'काया' नहीं मानता — बल्कि एक पूजा की मूर्ति, एक रस की नदी, एक चांदनी के रूप में देखता है।
कहानी में संकेत मिलता है कि यह प्रेम सामाजिक मर्यादाओं के बाहर का प्रेम है। दोनों प्रेमी पूर्ण रूप से एक नहीं हो सकते — क्योंकि दुनिया की दीवारें हैं, रिश्तों की जंजीरें हैं। लेखक कई बार पूछता है:
"क्या यह मोहब्बत थी या ज़रूरत?"
कवित्वपूर्ण गद्य:
भाषा कहीं-कहीं इतनी काव्यात्मक हो जाती है कि कहानी कविता का रूप ले लेती है। उदाहरणस्वरूप:
“जब तुम मिलती थी तो बरखा बन कर, और मैं तुम्हारे भीतर जलतरंग बन कर उतर जाता था।”
नदी, बारिश, कोहरा, चांद, गुलमोहर, आम, झील — ये सभी प्राकृतिक बिंब कहानी को सौंदर्य और गहराई देते हैं।
चिरपरिचित उपमानों का नवप्रयोग भी इस कहानी की केंद्रीय विशेषता है ।
‘दशहरी आम’, ‘बांसुरी’, ‘मालकोश’, ‘नदी की लहर’, ‘कोहरे में ठंड’ — ये प्रतीक प्रेम को बहुत निजी और जीवन्त बना देते हैं।
‘वह’ एक संवेदनशील, भावुक, प्रेम में डूबा हुआ पुरुष है, जो प्रेम में बहुत कुछ हार चुका है — और अब यादों का जीवित शव बन गया है। वह अपने टूटे हुए प्रेम की राख को हर दिन समेटता है, और उसी में तप कर शब्दों का चिराग जलाता है।
‘तुम’
वह प्रत्यक्षतः अनुपस्थित है, लेकिन पूरी कहानी में उपस्थित है। वह प्रेम की नदी है, तो कभी कूल्हों की नमी, कभी मुस्कान की चांदनी। वह पूर्ण है, फिर भी छूटी हुई। वह एक अनुभूति है, प्रतीति है, और पीड़ा भी है।
लेखक अंत तक यह प्रश्न करता है:
* क्या यह प्रेम था या शारीरिक आवश्यकता?
* क्या प्रेम वाकई अमर होता है?
* क्या एक स्त्री समाज के डर से प्रेम को छोड़ देती है?
* क्या ‘तुम’ कभी लौटोगी?
यह कहानी पाठक को अकेला छोड़ देती है — लेकिन यह अकेलापन कातर नहीं, आत्मीय है।
आज के शहरी, व्यस्त, वर्जनाओं से ग्रस्त समाज में 'तुम्हारे बिना' एक मनुष्य की अदृश्य पीड़ा की शिनाख्त है। यह उस प्रेम की कथा है, जो समाज की दीवारों में कैद रह जाता है, और कविताओं में सांस लेता है।
‘तुम्हारे बिना’ कोई प्रेमकहानी नहीं, प्रेम का शोकगीत है। यह उस गहरे, अदृश्य प्रेम का दस्तावेज़ है, जिसे न कोई मंज़िल मिली, न स्वीकृति — लेकिन जिसने जीवन भर जलाया, तपाया, और शब्दों के माध्यम से अमरता दी।
यह एक ‘कहानी’ नहीं, एक प्रेम-विरह उपनिषद है।�एक ऐसा दस्तावेज़ जो पाठक को अंत तक भीतर से गीला करता है।
1. संवेदनशीलता और भावभूमि:�मुख्य कहानी "तुम्हारे बिना" एक आत्म-स्वीकृति और प्रेम के विछोह से जन्मी भाव-सरिता है। इसमें प्रेम के साथ बिताए क्षणों की स्मृति, शरीर और मन की अतल पीड़ाएँ, और एक विरह की आग में जलते पुरुष की मौन पीड़ा को बहुत ही खूबसूरती से अभिव्यक्त किया गया है।
2. भाषा और शैली:�दयानंद पांडेय की भाषा अत्यंत कवित्वमयी, चित्रात्मक और अन्तर्मुखी है। वे प्रेम की भाषा को इंद्रियों के स्तर से उठाकर आध्यात्मिक गहराई तक ले जाते हैं। उदाहरण के तौर पर प्रेमिका को ‘दशहरी आम’ कहने वाले उपमान और जलतरंग, मादक गंध, कोहरा, नदी, झील जैसे प्रकृति-संकेतक उनके शिल्प की सौंदर्यता को दर्शाते हैं।
3. स्त्री-पुरुष संबंधों की पड़ताल:�इस संग्रह की कहानियाँ विशेष रूप से स्त्री की अस्मिता, प्रेम में स्त्री की बराबरी, और संवेदनशील पुरुष पात्रों के माध्यम से सामाजिक परिप्रेक्ष्य पर विमर्श प्रस्तुत करती हैं। विशेष रूप से "तुम्हारे बिना" में स्त्री को केवल देह नहीं, अपितु आत्मा का प्रेम रूप माना गया है।
�'तुम्हारे बिना' महज़ एक कहानी नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक एकालाप है। यह कहानी एक चिट्ठी के रूप में अपने प्रेम को पुकारती है, तलाशती है, प्रश्न करती है और अंतिम सत्य से टकरा कर मौन हो जाती है।
संग्रह की अन्य कहानियाँ:
संग्रह में 'लेकिन', 'शिकस्त', 'हत्यारा', 'सपनों का सिनेमा', 'स्ट्रीट चिल्ड्रेन', 'स्क्रिप्ट से बाहर' जैसी कहानियाँ भी सम्मिलित हैं, जो विभिन्न सामाजिक यथार्थों — जैसे धार्मिक रूढ़ियाँ, मिडिल क्लास की असुरक्षा, स्त्री की चुप पीड़ा, शहर की अकेली रातें, और यथार्थ की टकराहटों को उजागर करती हैं।
* लेखक प्रेम को मात्र कामनाओं का खेल नहीं बल्कि अंतर्मन की पूजा मानते हैं।
* ‘तुम्हारे बिना’ प्रेम का मनोगत भूगोल रचती है, जिसमें पात्र अपने प्रेम को संघर्ष, त्याग, और समर्पण के रूप में जीते हैं।
* भाषा की गहरी भावबद्धता पाठक को भीतर तक भिगो देती है।
* कई हिस्से अत्यंत वर्णनात्मक और आत्मालापी हैं, जो पाठक की संवेदना को लंबे समय तक पकड़ कर रखते हैं।
और अंत में ,
‘तुम्हारे बिना’ प्रेम, विरह, स्मृति और आत्मबोध की एक मनोवैज्ञानिक नदी है, जो पाठक को कभी जल की तरह बहाती है, कभी आग की तरह जलाती है। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए है, जो आधुनिक जीवन में प्रेम की भूमिका, उसकी जटिलताएँ और अंतरंग क्षणों की सघनता को साहित्य के माध्यम से महसूस करना चाहते हैं।
प्रेम-कथाओं के गंभीर पाठक ,स्त्री-विमर्श में रुचि रखने वाले ,आधुनिक हिन्दी साहित्य के शोधार्थी और भावप्रवण गद्य-शैली के प्रेमी पाठक गण को यह कहानी संग्रह ज़रूर पढ़ना चाहिए ।
समीक्ष्य पुस्तक: तुम्हारे बिना
प्रकाशक: अमन प्रकाशन, कानपुर
�मूल्य: ₹375
�लेखक: श्री दयानंद पांडेय
No comments:
Post a Comment