Tuesday, 18 August 2026

अब पढ़ना कई बार पहाड़ लगता है : दयानंद पांडेय

दयानंद पांडेय  से भवतोष पांडेय की बातचीत 

स्मृति, पत्रकारिता, कथा और मनुष्य की तलाश

दयानंद पांडेय के बारे में सब से पहली अनुभूति यह होती है कि उन्हें किसी एक विशेषण में बांधना  संभव नहीं। वे एक साथ पत्रकार, कथाकार, संपादक, संस्मरणकार, पाठक, मित्र और असहमत सार्वजनिक लेखक हैं। उन की सब से स्थाई चिंता मनुष्य है: उस का संघर्ष, उस का दुःख, उस की स्मृति और उस की जिजीविषा। वे अपने पात्रों को आसपास की दुनिया से उठाते हैं और उन्हें कथा में रखते हुए उन के साथ भावनात्मक संबंध बनाए रखते हैं। पत्रकारिता ने उन्हें प्रश्न पूछना सिखाया; साहित्य ने प्रश्नों को जीवन में बदलना। संपादन ने उन्हें स्मृति बचाने की जिम्मेदारी दी। विवादों ने शायद उन्हें यह विश्वास दिया कि लेखक का काम केवल सहमति पैदा करना नहीं, असहमति को भी भाषा देना है। बात ही बात में वह बताते हैं कि अब पढ़ना कई बार पहाड़ लगता है। आइए आज उन से साहित्य, पत्रकारिता, वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य और उन की विरासत पर बातचीत करते हैं।


स्मृति और आरंभ

 अपने जीवन को पीछे मुड़ कर कैसे देखते हैं? क्या कोई ऐसी घटना या अनुभव है, जिसने आप के भीतर के लेखक को सब से पहले जन्म दिया?

- बीते हुए जीवन और राह चलती स्त्रियों को मुड़-मुड़ कर देखना मेरी पुरानी आदत है। अच्छा लगता है। लेकिन जैसे कई बार पीछे से मुड़-मुड़ कर देखी जाने वाली स्त्री अचानक सामने से देखने पर निराश करती है , ज़िंदगी नहीं करती। बिलकुल नहीं करती। ज़िंदगी के सुखद पल तो याद में अच्छे लगते ही हैं , दुःखद पलों की याद भी सुख से भर देती है। ऐसी अनेक घटनाएं और अनुभव हैं। जो हैं तो दुःखद और त्रासद पर अब उन की याद सुख में डुबोती है। वह दुःख , वह संघर्ष , वह पीड़ा नहीं भोगी होती तो आज ज़िंदगी की जिस बुनियाद पर खड़ा हूं , कैसे खड़ा रहता भला ? वह एक मिसरा है न : हम बुनियाद के पत्थर हैं तराशे नहीं जाते। तो वही स्थिति है। तमाम ऊबड़-खाबड़ पत्थर और ईंटें हमारी ज़िंदगी की बुनियाद में हैं। हमारे लेखक की बुनियाद में हैं। हमारी कविता की बुनियाद में हैं। जो कभी तराशे नहीं गए। बहुत से लोग ऐसे हैं। बहुत सी बातें भी हैं। रही बात लेखक के जन्म लेने की तो लेखक अचानक कहां जन्म लेता है ? कोई कहानी भी अचानक कहां जन्म लेती है ? भीतर-भीतर अंकुआती रहती है , पकती रहती है और अचानक किसी दिन आहिस्ता से कागज पर उपस्थित हो जाती है। मन में तो जाने कितनी बार लिखी जा चुकी होती है। किसी जीव का जन्म भी अचानक नहीं होता। किसी वनस्पति , किसी पर्वत , नदी , वृक्ष का भी जन्म अचानक कहां होता है। अचानक तो कोई दुर्घटना होती है। कोई संयोग और दुर्योग होता है। अचानक तो कोई प्रेम होता है। लव एट फर्स्ट साइट वाला प्रेम। जैसे असल मोहब्बत की शुरुआत अकेले में मुलाकात से होती है , पर हर प्रेम के नसीब में नहीं होती अकेले में मुलाकात की। हमारे समय में तो यही होता था। तो आहिस्ता-आहिस्ता ही मेरा लेखक बना। लेखक से भी पहले कवि। अनायास। देवेंद्र कुमार की कविता पंक्ति है : ‘कविता को अच्छी होने के लिए /  उतना ही संघर्ष करना पड़ता है / जितना एक लड़की को /औरत होने के लिए।’ तो यह लड़की के औरत होने वाली मेहनत बाद में बहुत करनी पड़ी है। आज भी यह मेहनत जारी है। धूमिल ने लिखा है : कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है। तो धूमिल की यह तजवीज ही लेखन में ले आई। शुरू में लगता था कि अपने लेखन से हम दुनिया बदल देंगे। दुनिया तो बहुत नहीं बदल पाए पर पाता हूं कि धीरे-धीरे ही सही ख़ुद ही बदलता गया हूं। बदलता जा रहा हूं। हां , अगर आप का आशय किसी क्रौंच वध जैसी घटना से है तो ऐसा कुछ नहीं है। अगर है भी तो वह क्रौंच कोई और नहीं मैं ख़ुद ही हूं। प्रेम के सुख में , प्रेम में टूट कर ही कविता लिखी। कहानी लिखी। आगे के लेखन में प्रेम के अलावा और भी टूटन ने लिखने को बाध्य किया। पारिवारिक , सामाजिक , राजनीतिक टूटन ने भी बहुत लिखवाया है। अविष्कार फ़िल्म में कपिल कुमार के लिखे गीत को कनु रॉय के संगीत में मन्ना डे ने गाया है : हंसने की चाह ने कितना मुझे रुलाया है। कृपया मुझे इसी तर्ज पर यह कहने की अनुमति दीजिए कि लिखने की चाह ने कितना मुझे रुलाया है। 


माँ का आप की रचना और आप के संवेदनात्मक संसार में क्या स्थान है?

- रचना ही नहीं , ज़िंदगी के हर मोड़ पर , हर सांस में मां ही मां है। संवेदना , भावुकता , दुःख और उस की दाहकता मां से ही जाना है। जिया है। जीता हूं। जीवन में ही नहीं , लिखने में भी। हमारी अम्मा पढ़ी-लिखी नहीं थी। अक्षर ज्ञान नहीं था। पर जीवन का ज्ञान और जीवन दृष्टि अद्भुत थी। मेरे लेखन में भी जैसे सूर्य बन कर वह रौशनी दिखाती हुई निरंतर उपस्थित मिलती है। जमील ख़ैराबादी का एक शेर याद आता है : इक-इक सांस अपनी चाहे नज़्र कर दीजे / मां के दूध का हक़ फिर भी अदा नहीं होता। 

 गोरखपुर और बैदौली आज भी आप के भीतर किस तरह जीवित हैं? क्या आप की कथा-दृष्टि की कोई बुनियादी जड़ें वहीं मिलती हैं?

- गोरखपुर हमारा गृह जनपद है। बैदौली हमारी जन्म-भूमि। सारी जड़ें वहीं हैं। गर्भ भी वहीं है , नाल भी वहीं। कुछ भी अलग से रोपा हुआ नहीं है। न हमारे जीवन में , न हमारे लेखन में। बुनियाद , जड़ और दृष्टि सब कुछ वहीं से है। वहीं की मिट्टी से है। कुछ भी आयातित नहीं है। आयात करने की ज़रुरत भी कभी महसूस नहीं हुई। अभी तक तो नहीं हुई। अभी तक जाने कितनी कथाएं जो अपने आलस में लिख नहीं पाया हूं। लेकिन मिट्टी और पात्र पुकारते ही रहते हैं। 

 ● लखनऊ ने आप के व्यक्तित्व और लेखकीय यात्रा को क्या दिया?

- आप कह सकते हैं कि लखनऊ हमारी रोजगार की भूमि है। दिल्ली में भी नौकरी की है पर सब से ज़्यादा समय लखनऊ में। इतना कि लखनऊ हमारी आदत , ज़रूरत और सुविधा बन गया है। अब तो आलम यह है कि ज़ौक़ याद आते हैं : कौन जाए ‘ज़ौक़’ पर दिल्ली की गलियाँ छोड़ कर। तो मुझे भी कृपया कहने दीजिए कि कौन जाए पर लखनऊ की गलियां छोड़ कर। रही बात पहचान की तो पहचान तो मेरी आज भी गोरखपुर से ही है। कम से कम मैं तो यही मानता हूं। पहचान मुझे दिल्ली ने भी बहुत दी। लखनऊ ने और ज़्यादा। एक समय तो यह था कि लखनऊ में मुख्य मंत्री कोई भी हो , मुख्य मंत्री से संतरी तक सभी पहचानते थे। बात मानते थे। क्या है कि लखनऊ छोटा शहर है। शांत और साफ़ सुथरा। पचास लखनऊ दिल्ली में समा जाएं। सौ लखनऊ मुंबई में समा जाएं। पूरे नहीं पड़ेंगे वह शहर। पर लखनऊ की पहचान दुनिया में जिस तरह है , किसी और शहर की नहीं। कहते हैं कि जादू सरसो पर पढ़े जाते हैं , तरबूज पर नहीं। तो लखनऊ वही सरसो है। लखनऊ में एक कहावत बहुत मशहूर है , पहले आप ! तो यह पहले आप मतलब , स्वयं को मिटा कर औरों के लिए होना ही है , पहले आप ! और यह लखनऊ सिखाता है। दुनिया का कोई और शहर नहीं। घर हमारा अपने गांव बैदौली में तो है ही , गोरखपुर शहर में , एन सी आर में यानी नोएडा में भी है और लखनऊ में भी। सभी जगह जाता रहता हूं। रहता हूं। पर ज़्यादातर लखनऊ में रहने की आदत बन गई है। तो कह सकते हैं कि व्यक्तित्व और कृतित्व में लखनऊ का हाथ बहुत है। बहुत-बहुत है। लंबे समय तक लखनऊ में पत्रकारिता की है। दिल्ली और लखनऊ की पत्रकारिता ने प्रधानमंत्री , मुख्यमंत्री से लगायत संतरी तक की सोहबत दी है। लोगों को जानने का बहुत अवसर दिया है। सब का मन मिजाज और और उन के बारे में गहरे पैठने का अवसर बहुत मिला है। तह तक धंसने का। 

नेता , अभिनेता , अफसर , अपराधी हर किसी से मिलने का खुल्ल्मखुल्ला अवसर। एक बार अमिताभ बच्चन से इंटरव्यू में पूछ लिया था कि अगले जन्म में आप क्या बनना चाहेंगे ? तब वह बोले , आप की तरह पत्रकार बनना चाहूंगा। पूछा कि क्यों ? तब वह कहने लगे कि यह जो सवाल पूछने का अधिकार है न आप के पास और किसी और के पास नहीं है। इस लिए। यह कौन बनेगा करोड़पति के पहले की बात है। वर्ष 1996 की बात है। अब तो बना बनाया प्रश्न ही सही वह बरसों से कौन बनेगा करोड़पति में सब से पूछ रहे हैं। खैर , यह सवाल पूछने ने मुझे ऐसी-ऐसी जगहों पर पहुंचाया कि पूछिए मत। ज़िंदगी में कभी कल्पना तक नहीं की थी। आलम यह था कि कुछ नहीं जानता था , सवाल पूछने की धुन ने बहुत कुछ जनवा दिया। हालां कि इस पूछने में बहुत सी अनर्थ भी घटा। नौकरियां गंवाईं। सम्मान गंवाया। एक बार तो उत्तर प्रदेश के एक राज्यपाल थे रोमेश भंडारी। हरदोई के शाहाबाद तहसील में कवरेज के लिए गया हुआ था। डाकबंगला उन के लिए तैयार किया गया था। ज़रूरत पड़ने पर  डाक बंगले के बाथरुम में चला गया। कि तभी राज्यपाल रोमेश भंडारी को भी बाथरूम जाने की ज़रूरत महसूस हुई। वह आए। भीतर मैं था। उन्हें बहुत जल्दी थी तो कम आन , कम आन दो तीन बार किया और अंतत: उन्हें सर्वेंट वाले बाथरूम में जाना पड़ा। जो बहुत गंदा था। बाथरूम से बाहर निकलने पर मुझे वहां के डी एम मिले। थोड़ी सी बातचीत की। और चले गए। डी एम के जाते ही मुझे अरेस्ट कर लिया गया। बताया गया एन एस ए लगा दिया गया है। मैं बहुत भड़का। 

पर बाद में राज्यपाल रोमेश भंडारी के हस्तक्षेप पर मुझे छोड़ दिया गया। वह मुझे पहले से जानते थे। इस लिए। दिलीप कुमार और जॉनी वॉकर भी उस कार्यक्रम में आए थे। इतना सब होने पर भी मैं ने दिलीप कुमार का एक शानदार इंटरव्यू भी उसी डाक बंगले में उसी दिन लिया। उन के साथ लंच किया। तो यह सवाल पूछने की तलब और अधिकार ही तो था। इस घटना को ले कर मैं ने मुजरिम चांद नाम से एक लघु उपन्यास भी लिखा। कथादेश पत्रिका में धारावाहिक छपा था तब। जो ख़ूब चर्चित हुआ। एक और बहुत पुराना किस्सा है। उन दिनों लखनऊ में दंगे के चक्कर में कुछ इलाकों में कर्फ्यू लगा हुआ था। कर्फ्यू कवर करने उन इलाकों में जाता था। एक बार तो मेरी जान जाते-जाते बची। दंगाइयों ने चौक के सिरकटा नाले पर बस मेरी हत्या करते-करते रह गए। उन्हों ने तो तलवार , बांका , चाकू सब कुछ चला दिया था। सामूहिक रूप से। खैर एक दूसरी घटना सुनिए। 

एक दिन हमारे एक चपरासी ने हम से कहा कि साहब हम को भी कर्फ्यू इलाक़ा अपने साथ घुमा दीजिए। उन दिनों स्कूटर चलाता था। वह स्कूटर पर पीछे बैठ गया। जहां कहीं भी पुलिस मिलती , स्कूटर पर प्रेस लिखा देख जाने देती। कहीं-कहीं प्रेस बताना पड़ता और कार्ड भी दिखाना पड़ता। कर्फ्यू पास भी। चपरासी को प्रेस बताने और दिखने का मजा आ गया। दूसरे दिन चपरासी ने अपनी साइकिल के मडगार्ड पर प्रेस लिखवाया और कर्फ्यू इलाके में चला गया। पुलिस ने रोका तो बड़ी ऐंठ से प्रेस बताया और आगे बढ़ गया। पुलिस ने लपक कर पकड़ लिया। कर्फ्यू पास और प्रेस कार्ड मांगा। वह अपनी साइकिल के मडगार्ड पर लिखा प्रेस दिखाता रहा। पुलिस ने उसे पीट कर थाने ले जा कर हवालात में बंद कर दिया। उन दिनों मोबाईल तो था नहीं। शाम को आफ़िस पहुंचा तो बताया गया कि फला थाने से कई बार फोन आ चुका है। आप का कोई परिचित गिरफ्तार है। थाने में फोन कर पूछा तो बताया गया कि बहुत लोग बंद हैं। नाम बताइए। अब मुझे मालूम तो था नहीं कि कौन है ? भाग कर उस थाने पहुंचा। अब मुझे देखते ही वह चपरासी हवालात के भीतर से चिल्लाया। समझ गया। पूरा किस्सा पता चला। उसे छुड़ा कर ले आया। पर वह चपरासी बहुत दिनों तक मुझ से नाराज रहा। कहता कि आप के चक्कर में बहुत पिट गया। हवालात में बंद हो गया। उस पुलिस वाले को सस्पेंड करवाने की बात कहता। पर किस पुलिस वाले ने पीटा , उसे भी मालूम नहीं था। ऐसी अनेक घटनाएं हैं। प्रशासन की , सरकार की व्यवस्था की। 

पत्रकारिता से साहित्य तक

  पत्रकारिता ने आप जैसे लेखक को क्या दिया? क्या पत्रकारिता ने आप को मनुष्य और समाज को देखने की वह दृष्टि दी, जो बाद में आप की कहानियों का आधार बनी?

- पत्रकारिता ने बनाया भी बहुत , बिगाड़ा भी बहुत। कई बार मनबढ़ बनाया। अपनी ही बात को ऊपर रखने की ज़िद और सनक दी। अब पलट कर सोचता हूं तो बहुत अफ़सोस होता है और शर्म भी आती है। लेकिन तब के समय युवा था। बहुत-बहुत व्यस्त था। सड़क पर खुद भले स्कूटर से चलता था उन दिनों पर मुख्य मंत्री आदि के साथ जहाज और हेलीकाप्टर में घूमता था। अकसर। नारायणदत्त तिवारी जैसे मुख्यमंत्री सड़क पर काफिला रोक कर बतिया लेते थे। प्रधानमंत्री रहते हुए भीड़ में से अटल बिहारी वाजपेयी बुलवा लेते थे। सो रिस्क लेने की आदत बहुत थी। किसी से न दबने की आदत पत्रकारिता में बहुत सीखी। कोई कितना भी बड़ा खुदा क्यों न हो उस से बराबरी में रख कर बात करने की आदत हो गई। अक्खड़पना आ गया। नहीं आना चाहिए था। नतीज़तन कई बार बेरोजगारी का समंदर देखा। दिल्ली में भी। लखनऊ में भी। लेकिन अनुभव भी बहुत मिला इस सब से। पत्रकारिता में बेरोजगारी नहीं देखी होती , बेरोजगारी का संघर्ष नहीं देखा होता तो अपने-अपने युद्ध नहीं लिख सकता था। हारमोनियम के हज़ार टुकड़े नहीं लिख पाया होता। हाईकोर्ट और उस का नंगापन नहीं देख पाया होता। व्यवस्था का खोखलापन नहीं देख पाया होता। लेकिन इस संघर्ष में खोना बहुत पड़ा। स्वाभिमानी होने की , खुद्दार होने की कीमत बहुत चुकानी पड़ी। अपनों को पराया होते देखा। जूनियरों का जूनियर बनना पड़ गया नौकरी में। बड़ी अनकही कहानियां हैं ऐसी जो अभी लिखनी शेष हैं। बेरोजगारी के दंश से बड़ा कोई दंश नहीं होता। वह भी तब जब आप दुनिया भर का ग्लैमर और पावर इंज्वाय कर चुके हों। तब के दिनों आलम यह होता कि रमानाथ अवस्थी का एक गीत अकसर गुनगुनाता फिरता : मेरे पंख कट गए हैं / वरना मैं गगन को गाता। बेरोजगारी सचमुच सारे पंख काट लेती है। आप की उड़ान खत्म हो जाती है। और मेरे जीवन में यह बारंबार हुआ है। 


  इस के उलट, साहित्य ने पत्रकार को क्या दिया? क्या साहित्य ने पत्रकारिता के तात्कालिक प्रश्नों के पीछे छिपे मानवीय प्रश्नों को देखने की दृष्टि विकसित की?

- तमाम पत्रकारों के पास पाता हूं कि लिखने के लिए शब्दों का टोटा रहता है। अकाल पड़ जाता है शब्दों का। अभिव्यक्ति में चूक जाते हैं। वर्तनी दोष भी बहुत है। साहित्य से जुड़े लोगों के साथ यह संकट अमूमन नहीं होता है। फिर साहित्य ने मेरी पत्रकारिता को जो रंग दिया , जो रुआब दिया वह अतुलनीय है। अलौकिक है। भाषा का जादू ही था जो मुझे साहित्य से मिला। भाषा का जादू ही था जो मुझे पत्रकारिता में सब से अलग कर देता था। लोग मुझे खोजते थे कुछ लिखवाने के लिए। अख़बार मालिक हो , संपादक हो , नेता हो , अभिनेता हो , हर कोई मुझ से लिखवाने के लिए मुझे पूछता फिरता। पत्रकारिता को साहित्य की जुबान जब मिल जाती है तो सोने में सुहागा हो जाता है। तो साहित्य की इस जुबान ने ही मुझे पत्रकारिता में अलग पहचान दी थी। भाषा की तासीर ही थी कि अटल जी , मुलायम , मायावती सभी तब के दिनों पूछते। अमिताभ बच्चन और दिलीप कुमार का इंटरव्यू करने के लिए मुझे ही कहा जाता। जगजीत सिंह , फारुख शेख जैसे लोग उन दिनों मुंबई से ही फोन कर बता देते कि लखनऊ आ रहा हूं। आप के साथ बैठना है। जितेंद्र तो एक बार मुझे एक बार मुंबई ले जाने के लिए अड़ गए थे। लता मंगेशकर , आशा भोंसले , हृदयनाथ मंगेशकर तक से आत्मीयता मिली। संवाद हुआ। इंटरव्यू किया। ऐसे अनेक वाकये , अनेक विवरण हैं। लिखने में संकोच होता है। क्या पता कभी लिखना हो जाए। यह लिखना ही था कि एक बार न चाहते हुए भी मुलायम सिंह के कवरेज में जाना पड़ा। और भयंकर सड़क दुर्घटना का शिकार हुआ। अम्बेस्डर और ट्रक की आमने-सामने टक्कर हो गई थी। हम अम्बेस्डर से थे। मेरे साथ हमारे एक पत्रकार साथी जय प्रकाश शाही और ड्राइवर एट स्पॉट विदा हो गए। बड़ी मुश्किल से मेरा जीवन बचा। छ महीने बेड पर रहा। अभी भी उस दुर्घटना के कुछ निशान और तकलीफें शेष हैं। पर यह जो लिखना है , साहित्य है , उस की ललक है सर्वदा जीने और शानदार ढंग से जीने की ललक को मरने नहीं देता। स्वाभिमानी बनाए रखता है। कहीं घुटने नहीं टेकने देता। पत्रकारिता में कभी दलाल नहीं बनने दिया। बड़े-बड़े प्रलोभनों को लात मारता रहा तो यह साहित्य के संस्कार थे। बेकल उत्साही का एक शेर है : बेच दे जो तू अपनी ज़ुबां , अपनी अना , अपना ज़मीर / फिर तेरे हाथ में सोने के निवाले होंगे। तो कभी सोने के निवाले की नहीं सोची। कभी जुबां , अना , ज़मीर और क़लम नहीं बेची। न साहित्य में , न पत्रकारिता में। साहित्य में भी बड़ी जोड़-तोड़ चलती रहती है। मैं कभी ऐसे जोड़-तोड़ के कुचक्र में भी नहीं पड़ा। कभी किसी गिरोह को ज्वाइन नहीं किया। किसी विचारधारा , किसी गैंग का गुलाम नहीं बना। 

आप की साहित्यिक यात्रा में संपादन की क्या भूमिका रही? किस संपादक ने आप को सब से अधिक प्रभावित किया या किसी निर्णायक अर्थ में ‘बनाया’?

- शुरू में मुझे बहुत अच्छे-अच्छे संपादक मिले। अरविंद कुमार , प्रभाष जोशी , वीरेंद्र सिंह। कन्हैयालाल नंदन , रघुवीर सहाय , मनोहर श्याम जोशी जैसे संपादकों से भी निरंतर संपर्क में रहा। इन के लिए काम भी बहुत किया। पर बाद में पत्रकारिता का पतन जब बहुत ज़्यादा हो गया तो बहुत ख़राब संपादकों , दलाल संपादकों के साथ भी काम करना पड़ा। जिन का लिखने पढ़ने और पत्रकारिता से कोई सरोकार नहीं था। पर अख़बार मालिकों को ऐसे ही भडुवे ही पसंद थे। तो मैं क्या कोई भी कुछ नहीं कर सकता था। शिव सिंह सरोज , राजनाथ सिंह सूर्य , रामकृपाल सिंह , रणविजय सिंह जैसे कुछ ऐसे ही दल्ले और भड़वे संपादक थे। जो संपादक के नाम पर कलंक थे। कुत्ता कह सकते हैं। संपादक मैं भी रहा हूं। पर कभी इस तरह की मूर्खता नहीं की। न कभी सोची। सपने में भी नहीं। 

आप की रचनात्मक यात्रा में पाठक, मित्र और आलोचक: इन तीनों की भूमिकाएँ अलग-अलग रही होंगी। किस आलोचक ने आप को सबसे अधिक समझा?

- साफ़ कहूं तो सिर्फ़ और सिर्फ़ पाठकों ने ही मेरे लेखन को समझा है। मेरे ब्लॉग सरोकारनामा की पाठक संख्या अभी 17 लाख से अधिक है। रोज ही बढ़ती रहती है। आप इसी से अनुमान लगा सकते हैं। सरोकारनामा एकल ब्लॉग है। देश-विदेश में ख़ूब पढ़ा जाता है। बड़े चाव से पढ़ा जाता है। देश ही नहीं , विदेशी लाइब्रेरियों में भी मेरी किताबें हैं। वहां भी लोग पढ़ते हैं। फोन करते हैं। मेसेज भेजते हैं। आदरणीय पाठक मित्रों के प्यार से ही लेखक हूं और ज़िंदा हूं। रहूंगा। असंख्य पाठक हैं हमारे। जो मुझे बहुत प्यार करते हैं। और मैं उन्हें। पाठक ही तो मेरी सांस हैं। ऐसी मेरी बहुत सी कहानियां हैं , कुछ उपन्यास हैं जिन्हों ने पाठकों का जीवन भी बहुत बदला। ख़ास कर स्त्रियों का। बड़की दी का यक्ष प्रश्न पढ़ कर बहुत से लोगों ने बताया कि उन के परिवार में भी ऐसा ही था। कहानी पढ़ कर उन्हों ने अपना व्यवहार और जीवन बदला। सुमि का स्पेस पढ़ कर बहुत सी लड़कियों के माता-पिता बदल गए। पहले के समय में माता-पिता बेटियों को पढ़ने या नौकरी के लिए अकेले बाहर भेजने में हिचकते थे। नहीं भेजते थे। पर सुमि का स्पेस पढ़ कर बहुत से लोगों ने बेटियों को बाहर पढ़ने भेजा। नौकरी के लिए भेजा। कई लोगों ने फोन कर इस बारे में बताया। सैकड़ों लड़कियों ने फोन कर , चिट्ठी लिख कर बताया कि सुमि का स्पेस पढ़ कर हमारे माता-पिता का मन बदल गया। हमें बाहर भेजा और हमारा जीवन बदल गया है। बांसगांव की मुनमुन पढ़ कर भी कई लोगों ने यही बात की। स्त्रियों की ज़िंदगी बदली और उन में साहस का संचार हुआ और उन की ज़िंदगी चमक गई। ऐसी अनेक कहानियां हैं जो मेरी कहानियों को पढ़ कर बनी हैं। कभी लिख सका तो यह सब भी लिखूंगा। कहानी की ही तरह। 

मेरे एक संपादक रहे हैं अरविंद कुमार। हिंदी थिसारस के लिए बहुत परिचित हैं। मैं ने उन के साथ शुरुआती दिनों में न सिर्फ सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट , दिल्ली में काम किया , उन से भाषा और तमाम व्यवहारिक बातें भी सीखीं। अरविंद जी मेरे पिता की उम्र के थे। पर मेरा लिखा पढ़ते बहुत थे। वह मेरे पात्रों के मन तक पहुंच जाते थे। बहस करते थे। एक समय वह टाइम्स आफ इंडिया की फ़िल्मी पत्रिका माधुरी के संपादक रहे थे। कोई सोलह साल। फिल्मों में उन के बहुत संपर्क थे। उन्हों ने बहुतेरे फ़िल्मी लोगों से मुझे मिलवाया। 

अरविंद कुमार बहुत चाहते थे कि मैं फिल्मों में जाऊं। लिखने और निर्देशन के क्षेत्र में काम करने के लिए। यह अस्सी के दशक की बात है। मेरा भी पहला सपना फिल्म ही थी। मुंबई ही थी। पत्रकारिता या साहित्य नहीं। शायद इस लिए भी। पर फिल्मों में लेखक और सहायक निर्देशक के लिए अपमान के अनेक किस्से दिल्ली में सुनने को मिले। कई लोग गुमनाम बन कर लौट आए थे। बरबाद हो कर। लेखक , अभिनेता , सहायक निर्देशक आदि। मेरी हिम्मत टूट गई। यह सब सुन कर। मुझे भूखे पेट सो जाना आज भी मंज़ूर है पर अपमान बिलकुल नहीं। ज़रा-ज़रा सी बात पर बरसों के याराने चले गए। इस मामले में मैं बहुत टची हूं। सर्वदा से हूं। वैसे भी मैं एक बहुत छोटे शहर गोरखपुर से आता हूं। बल्कि अपने गांव बैदौली से आता हूं। माना जाता है कि छोटे शहर से गए आदमी को बड़ा शहर खा जाता है। बहुत कम लोग अपने को बचा पाते हैं। तो मुंबई जैसे बड़े शहर में जाने से कतरा गया। तो यही अरविंद कुमार मेरे संपादक होने के साथ ही मेरे अनन्य पाठक भी थे। मेरी कहानियों ,उपन्यासों पर बहुत लिखा है अरविंद कुमार ने। बड़ी-बड़ी पत्रिकाओं में लिखा। इंडिया टुडे जैसी पत्रिका में भी। अरविंद जी तो मेरी रचनाधर्मिता पर एक पूरी किताब लिखना चाहते थे। पर समय ने साथ नहीं दिया। कोरोना ने उन्हें छीन लिया। अरविंद कुमार ही नहीं और भी कई लेखकों ने मेरी रचनाओं पर लिखा है। राजेंद्र यादव , रामदेव शुक्ल , नवनीत मिश्र , राजकिशोर , शिवमूर्ति , जितेन ठाकुर , विभांशु दिव्याल, सुधाकर अदीब , गौतम चटर्जी आदि लेखकों ने लिखा है। राजेंद्र यादव ने तो अपने-अपने युद्ध पर हंस में केशव कहि न जाए क्या कहिए शीर्षक से चार पेज की सम्पादकीय भी लिखी। उपन्यास तो सभी हमारे चर्चित हैं पर सब से अधिक समीक्षा बांसगांव की मुनमुन और विपश्यना में प्रेम पर लिखी गई हैं। विपश्यना में प्रेम पर लिखी समीक्षाओं की तो एक किताब भी छप चुकी है। जब कि लोग खोजते सब से ज़्यादा अपने-अपने युद्ध हैं। कुछ उपन्यास अब आऊट आफ प्रिंट भी हैं। 

आप ने आलोचक की बात पूछी है। तो  आलोचक नाम की संस्था अब कब की मर चुकी है। फिर भी जो थोड़े बहुत अवशेष हैं , मैं ने उन की कभी परवाह नहीं की। न उन्हों ने मेरी। मित्रों ने भी सर्वदा काटने और दुःख देने का ही कुचक्र किया। सहयोग नहीं। साहित्यिक मित्रों में ईर्ष्या भाव बहुत पाया है। खुद लिखें न लिखें , काट तो सकते हैं। फ़तवा तो जारी कर ही सकते हैं। मुहिम तो चला ही सकते हैं। 


लेखक और उस की रचनाएँ

  आप की अब तक की रचनात्मक यात्रा में ऐसी कौन-सी रचना है, जो आप के सब से अधिक निकट है? आप की सब से प्रिय रचना कौन-सी है और क्यों?

- सभी रचनाएं प्रिय हैं। सभी मेरे निकट हैं। यह सवाल लेखक से नहीं , पाठक से पूछने वाला है कि उन की प्रिय रचना कौन सी है ? 

  और क्या कोई ऐसी रचना है जिसे आज दोबारा लिखने का अवसर मिले तो आप उस में कुछ बदलना चाहेंगे?

- बिलकुल नहीं। गो कि ऐसा बारंबार हुआ है कि कहानी लिखना शुरू किया और वह उपन्यास हो गई। जैसे कि बांसगांव की मुनमुन। उपन्यास लिखना शुरू किया , कहानी हो गई। जैसे कि बड़की दी का यक्ष प्रश्न। ऐसी अनेक रचनाएं हैं। क्या होता है कि कई बार क्या होता है कि पात्र ही हम से लिखवाते हैं। हम उन्हें नहीं लिखते। वह एक भजन है न : जितनी चाभी भरी राम ने उतना दौड़े खिलौना। बाद में यह फ़िल्मी गाना भी बना। तो लिखना-पढ़ना भी कई बार ऐसे ही होता रहा है हमारे साथ। हम लाख कहें कि हम ने यह किया , हम ने वह किया। इस का कोई मतलब नहीं है। उम्र के इस मोड़ पर आ कर तो यही लगता है कि जितनी चाभी भरी राम ने वाली बात में ही बात आ कर ठहर जाती है। प्रारब्ध यही तो है। 

  आप की ‘36 कहानियाँ’ में आत्महत्या, मृत्यु, संवादहीनता, प्रेम, राजनीतिक पाखंड, ग्रामीण विस्थापन और स्त्री-देह जैसे विषय अलग-अलग दिखाई देते हुए भी एक साझा ‘नैतिक संकट’ की ओर संकेत करते हैं। क्या आप इस संग्रह को आधुनिक मनुष्य की सामूहिक नैतिक आत्मकथा के रूप में देखते हैं?

- नैतिक संकट तो आप ज़रूर कह सकते हैं पर कृपया आधुनिक मनुष्य की सामूहिक नैतिक आत्मकथा नहीं कहें। 

  आप की कहानियों में घटनाओं और नाटकीय निष्कर्षों की अपेक्षा मौन, अधूरापन, असहजता और अनकहे संवाद अधिक महत्वपूर्ण हैं। क्या यह आप की सचेत कथा-रणनीति है? क्या आज के तेज़ और उत्तेजनापूर्ण समय में कहानी का काम उत्तर देना नहीं, बल्कि पाठक के भीतर असुविधाजनक प्रश्न छोड़ना है?

- उत्तर आदि देना प्रवचन आदि में ही ठीक लगता है। लेखक न प्रवचन वाला होता है , न वैज्ञानिक , न शिक्षक , न इंटरव्यूवर। कबीर कहते ही हैं : ज्यों कीं त्यों धर दीनी चदरिया। फिर कबीर यह भी कहते हैं : तू कहता कागद की लेखी मैं कहता आँखिन की देखी। तो लेखन यही है। कम से कम मेरा लेखन इसी अर्थ में देखा जाना चाहिए। लेखक का लिखा किसी जस्टिस का फ़ैसला नहीं है। और जस्टिस का फैसला लेखन नहीं है। जस्टिस का फैसला ग़लत हो सकता है। लेखक का लिखा नहीं। जस्टिस बेईमान हो सकता है। होता ही है। पर लेखक नहीं। लेखक भी अगर बेईमानी करता है तो वह लेखक नहीं रह जाता। एजेंडाधारी लेखकों को इसी लिए मैं लेखक नहीं फ्राड मानता हूं। आप ने तय कर लिया है कि दिन को भी हर हाल में रात ही कहना है तो यह लेखक का काम तो नहीं हो सकता। दिन को रात , रात को रात लिखने और कहने का साहस ही लेखक को लेखक बनाता है। बाक़ी गोबिंद प्रसाद  की कविता है न :

 राजा बोला—

‘रात है’

मंत्री बोला—‘रात है’

एक-एक कर फिर सभासदों की बारी आई

उबासी किसी ने, किसी ने ली अँगड़ाई

इसने, उसने—देखा-देखी फिर सब ने बोला—

‘रात है...’

यह सुबह-सुबह की बात है...


प्रेम, देह और स्मृति


  ‘तुम्हारे बिना’ में आप ने प्रेम को किसी पारंपरिक प्रेम-कथा की तरह नहीं, बल्कि एक पुरुष के आत्मालाप, स्मृति और विरह के मनोवैज्ञानिक अनुभव के रूप में प्रस्तुत किया है। क्या आप के लिए प्रेम की सब से प्रामाणिक अभिव्यक्ति मिलन में है या उस अनुपस्थिति में, जो प्रेम के बाद मनुष्य के भीतर रह जाती है?

- प्रेम कोई पारंपरिक विषय नहीं है। इस लिए कोई प्रेम कथा भी पारंपरिक नहीं हो सकती। प्रेम की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है। कोई निश्चित फार्मूला नहीं है प्रेम का। प्रेम कोई जोड़ , घटाना या गुणा-भाग नहीं है। कोई एक केमेस्ट्री या कोई एक बीजगणित नहीं है प्रेम की। न कोई रेखागणित। कबीर का प्रेम और है , सूर का अलग , मीरा का अलग , तुलसी का अलग। राम का प्रेम , कृष्ण का प्रेम , शिव का प्रेम भी अलग-अलग ही है। इन की प्रेम कथाएं भी पटरी बदलती हुई चलती हैं। जैसे किसी रेल की पटरी हो। ट्राम की तरह सड़क पर भी चल सकती है। तो एक ही व्यक्ति किसी स्त्री को पचास तरह से प्रेम कर सकता है और सौ तरह से लिख सकता है। वही व्यक्ति किसी और स्त्री से किसी और तरह प्यार कर सकता है। मिलन और विरह दोनों ही प्रेम की नदियां हैं। कौन सी नदी किस के नसीब में है , कौन जानता है ? द्रौपदी को चीरहरण में नंग्न होने से बचाने वाले कृष्ण द्रौपदी के प्रेमी भी थे। इस बात को इस अर्थ में भी देखना लोग क्यों भूल जाते हैं ? चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी उस ने कहा था में तो प्रेमी , प्रेमिका के पति को बचाने के लिए अपने प्राण की बाजी लगा देता है। मीरा राजमहल छोड़ कर वृंदावन होती हुए द्वारका पहुंचती हैं और महल वापस लौटने की बात पर गिरिधर गोपाल से आज्ञा मांगने के बहाने कृष्ण की मूर्ति में समा जाती हैं। प्रेम की इस पराकाष्ठा और परिणति को आप कौन सा नाम देना चाहेंगे ? 

  ‘तुम्हारे बिना’ में स्त्री एक पात्र से आगे बढ़ कर पुरुष की स्मृति, संवेदना और आत्मबोध का केंद्रीय अनुभव बन जाती है। देह के अत्यंत अंतरंग और संवेदनशील वर्णन के बावजूद आप उसे केवल शारीरिक आकर्षण तक सीमित नहीं करते। आप प्रेम, देह और स्त्री की अस्मिता के इस त्रिकोण को किस तरह देखते हैं?

- प्रेम एक ऐसी चौखट है जिस में आप अगर तन कर खड़े होते हैं तो सिर चौखट से टकरा जाता है। बार-बार टकरा जाता है। प्रेम गली अति सांकरी की बात भी कही ही जाती है। प्रेम में जब स्त्री देह आप के साथ होती है तो स्त्री और पुरुष की अस्मिता एक हो जाती है। त्रिकोण या किसी और कोण की गुंजाईश कहां होती है तब ? गाने में कहते ज़रूर हैं कि फूल भी हो दरमियां तो फ़ासले हुए पर सुगंध और सुमन जब एक होते हैं तब अपनी समग्रता में होते हैं। दोनों के बीच कोई फ़ासला नहीं होता। तभी तो अंतरंग होते हैं। इस को कृष्ण के एक इस किस्से से समझिए। एक बार नारद और कृष्ण में बहस हो गई कि कौन बड़ा ब्रह्मचारी ? अंतत: तय हुआ कि परीक्षण कर लिया जाए। एक सरोवर में स्त्रियां नहा रही थीं। पहले कृष्ण गए। स्त्रियां सरोवर में नहाती रहीं। कृष्ण के आने से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा। निश्चिंत नहाती रहीं। थोड़ी देर में नारद आए। नारद के आते ही सभी गोपियां परेशान हो गईं। सब अपने-अपने वस्त्र की ओर दौड़ पड़ीं। निर्णय हो चुका था कि कौन बड़ा ब्रह्मचारी है। तो प्रेम में भी अगर कृष्ण जैसा निष्कपट आचरण और समर्पण है तो आप के ही शब्दों में जो कहूं तो स्त्री एक पात्र से आगे बढ़ कर पुरुष की स्मृति, संवेदना और आत्मबोध का केंद्रीय अनुभव बन जाती है। 

विपश्यना, वासना और आधुनिक मनुष्य

  ‘विपश्यना में प्रेम’ में एक ओर मौन, ध्यान और आत्मशांति की तलाश है, तो दूसरी ओर मनुष्य के भीतर मौजूद वासना, प्रेम, आकर्षण और बेचैनी का लगातार शोर है। क्या आप यह कहना चाहते हैं कि मनुष्य बाहरी अनुशासन और आध्यात्मिक साधना से अपनी इच्छाओं को दबा तो सकता है, लेकिन उनसे मुक्त नहीं हो सकता?

- वासना , प्रेम और आकर्षण मनुष्य की स्वाभाविक स्थितियां हैं। इच्छाओं से कभी कोई मुक्त नहीं हो सकता। कितना भी बड़ा तपस्वी क्यों न हो। तपस्या भी एक इच्छा ही है। कुछ और नहीं। इच्छाओं का शोर मन में सब से ज़्यादा होता है। आप यह ठीक ही कह रहे हैं कि विपश्यना मौन , ध्यान और आत्मशांति की तलाश है। लेकिन आध्यात्मिक शांति नहीं है विपश्यना। साधना है। सिर्फ साधना। आध्यात्म और साधना दोनों दो बात है। दोनों दो ध्रुव हैं। यह बात ज़रूर समझ लेने की है। 

  उपन्यास में विपश्यना के लोकप्रिय होते ‘कूल कल्चर’ और उस के आसपास बन रहे आध्यात्मिक बाज़ार पर भी व्यंग्यात्मक दृष्टि दिखाई देती है। क्या ‘विपश्यना में प्रेम’ मूलतः विपश्यना की आलोचना है, या उस के बहाने आधुनिक मनुष्य की उस मानसिकता की पड़ताल है, जो शांति, आध्यात्मिकता और यहाँ तक कि प्रेम को भी उपभोग की वस्तु में बदल देती है?

- विपश्यना की आलोचना बिलकुल नहीं है। विपश्यना बहुत परिणामकारी और चमत्कारी साधना पद्धति है। पाखंड नहीं है , विपश्यना। ख़ुद से ख़ुद की मुलाक़ात की साधना है। आत्म-अनुशासन सीखना हो तो विपश्यना सीखिए। ख़ुद को समझना हो , बिना शीशा देखे ख़ुद को देखना हो , अपनी पड़ताल करनी हो तो विपश्यना सीखिए। मन को नियंत्रित करने की साधना है यह। अपनी ही आती -जाती सांस को स्पर्श करना सीखने की साधना है विपश्यना। लौकिक को अलौकिक अनुभव में महसूस करना हो तो विपश्यना ज़रूर कीजिए। फिर यह बात दुहरा दूं कि विपश्यना आध्यात्मिक पद्धति नहीं है। आध्यात्म नहीं है , विपश्यना। बाक़ी आप का यह सवाल दुरुस्त है कि विपश्यना में प्रेम उपन्यास आधुनिक मनुष्य की उस मानसिकता की पड़ताल है, जो शांति, आध्यात्मिकता और यहाँ तक कि प्रेम को भी उपभोग की वस्तु में बदल देती है ? मुझ से पूछिए तो कहूंगा की विपश्यना में प्रेम उपन्यास शुद्ध रूप से प्रेम कथा है। एक स्त्री की संतान सुख की प्रेम गाथा है। विपश्यना में प्रेम का  प्रिया जलतारे जी ने मराठी में अनुवाद किया है। एक नई बात कही है प्रिय जलतारे ने कि विपश्यना में प्रेम नायक नहीं , नायिका की कहानी है। प्रिया  जलतारे ने लिखा है :

कहने को तो नायक प्रधान कहानी है । मेरे लिए ये कहानी नायिका की है । दारिया,माँ बनने के लिए परेशान थी । हर एक इलाज करने को तैयार है । विपश्यना के बीच भी उस का मन ध्यान में नहीं है । बहुत सारा रिस्क उठा कर उसे माँ बनने का सौभाग्य मिला। अपनी देह से अपना अंकुर , नवनिर्मिति के लिए व्याकुल दारिया, आख़िर में यशस्वी हुई । एक माँ की कहानी !

तो विपश्यना में प्रेम की यह ताकत समझ सकते हैं। बहुत से समीक्षकों ने इसे मनोवैज्ञानिक उपन्यास भी बताया है।


लेखक, विवाद और असहमति

  आप की दीर्घ साहित्यिक यात्रा में कौन-सा विवाद आज भी आप को याद आता है? उस विवाद ने लेखक दयानंद पांडेय को क्या सिखाया?

- विवाद में तो हम हमेशा ही रहे हैं अपने लिखे को ले कर। इस से सीखते भी रहे। टूटते भी रहे। बनते भी रहे। अपने-अपने युद्ध को ले कर हाईकोर्ट में कंटेम्प्ट हुआ। एक खबर को ले कर उत्तर प्रदेश विधान परिषद में मेरे खिलाफ विशेषाधिकार प्रस्ताव पेश हुआ। अन्य अनेक मुकदमे हुए। लोगों ने आरोप भी अनेक लगाए। अश्लीलता के आरोप भी हैं मुझ पर। और कि मुसलसल हैं। लोग नाराज भी बहुत हुए। लेकिन बुद्ध कहते हैं न कि कुछ भी स्थाई नहीं है , सब गुज़र जाएगा। तो सब गुज़र गया। 

  कौन-सा विरोध आप को सब से अधिक चोट पहुँचा गया ; और क्या कभी ऐसा हुआ कि किसी विरोध ने बाद में आप को अपनी ही रचना या विचार पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया?

- लेखन में विरोध , असहमति , कुचक्र आदि चलता रहता है। यह सब न हो तो सन्नाटा छा जाता है। और सन्नाटा किसी भी सूरत अच्छी बात नहीं। कंधे बदलते रहते हैं , वार झेलते रहते हैं। मसरूर अनवर का शेर है न : हम को किस के ग़म ने मारा ये कहानी फिर सही / किस ने तोड़ा दिल हमारा ये कहानी फिर सही। हां , ऐसी चीज़ों से कभी कोई चोट फोट नहीं लगी। 

आज का साहित्य और बदलता समय

  आज के युवा लेखक से आप की सब से बड़ी शिकायत क्या है? और इस के बरक्स ऐसी कौन-सी बात है, जिसे ले कर आप को नई पीढ़ी के लेखकों से सब से अधिक उम्मीद है?

- युवा , बुजुर्ग , समकालीन कैसे भी , किसी भी लेखक से कोई शिकायत नहीं है। न ही किसी से कोई उम्मीद। जिस को जो लिखना है , लिख रहा है। जो करना है , कर रहा है। वह कहते हैं न : यह मयक़दा है कोई जामेजम नहीं है / यहां कोई किसी से कम नहीं है। हर कोई अपने आप में ख़ुदा है। सब की अपनी सहूलियत , ज़रूरत और सुविधा है। तो किसी से कुछ कहना क्या , किसी से कुछ सुनना क्या !

  आज के पाठक से आप की क्या अपेक्षा है? क्या आप को लगता है कि पाठक की पढ़ने की आदत और साहित्य से उस का रिश्ता बदल रहा है?

- समय-समय की बात है। एक समय बहुत पढ़ने वाला मैं ही अब बहुत-बहुत कम पढ़ता हूं। अब पढ़ना कई बार पहाड़ लगता है। पहाड़ चढ़ना , आसान है। आज की तारीख़ में पढ़ना आसान नहीं है। पढ़ना और सीखना लेकिन बहुत ज़रूरी है। पढ़ना आदमी को मनुष्य बनाता है। सकारात्मक सोचने और समझने की दृष्टि देता है। 

बाजार और साहित्य के अंतरसंबंधों को आप कैसे देखते हैं? क्या आज साहित्य की स्वायत्तता पर बाजार का दबाव पहले से अधिक है?

- बाज़ार तो शुरू ही से हमारी ज़िंदगी का एक हिस्सा रहे हैं। पर दुर्भाग्य से अब बाज़ार से ही ज़िंदगी संचालित होने लगी है। संबंध भी बाज़ार से बनने , बिगड़ने लगे हैं। साहित्य भी अब बाज़ार के कंधे पर चढ़ना चाहता है। कोई चढ़ जाता है , कोई नहीं चढ़ पाता। वैसे भी साहित्य और शास्त्रीय संगीत लोकप्रिय कला में शुमार नहीं होते। कभी नहीं हुए। साहित्य और शास्त्रीय संगीत के पाठक या श्रोता , सर्वदा से बहुत थोड़े से होते रहे हैं। मुट्ठी भर। मैं तो ऐसे भी बहुत से लोगों को जानता हूं जो न साहित्य जानते हैं , न फिल्म , न थिएटर , न संगीत , न खेल। और यह लोग कोई अनपढ़ , जाहिल और गंवार लोग नहीं हैं। अपने-अपने क्षेत्र के बॉस लोग हैं। देश और दुनिया चलाते हैं। बहुत से मेरे ऐसे आई ए एस मित्र हैं जो साहित्य से , सिनेमा या संगीत से बिलकुल परिचित नहीं हैं। न्यूज भी वह उतना ही जानते हैं , जितनी ज़रूरत है। पूछने पर कहते हैं कि इस सब के लिए हमारे पास समय कहां है। बहुत से उद्योगपति और राजनेता भी ऐसे ही हैं। उन के पास साहित्य , कला और सिनेमा के लिए समय नहीं है। फाइलों में , पावर में उलझी उन की ज़िंदगी , उन की है ही नहीं। सोचिए कि कभी उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री रहीं मायावती को संगीत तो छोड़िए , चिड़ियों की चहचहाहट भी पसंद नहीं। 

एक पुराना किस्सा है कि एक जहाज में टाटा और दिलीप कुमार सवार थे। दिलीप कुमार कई बार टाटा के आसपास से गुज़रे पर टाटा ने उन की नोटिस नहीं ली। अंतत: दिलीप कुमार ने अपने पी ए को टाटा के पी ए के पास भेजा और कहा कि बताओ उन्हें कि दिलीप कुमार भी इसी जहाज में हैं। टाटा के पी ए ने टाटा को बताया भी पर टाटा ने फिर भी दिलीप कुमार की नोटिस नहीं ली। हार कर दिलीप कुमार टाटा के पास खुद ही गए और बताया कि मुझे दिलीप कुमार कहते हैं। टाटा फिर भी खामोश रहे। दिलीप कुमार ने उन्हें बताया कि वह हिंदी फिल्म के स्टार हैं। एक्टर हैं। टाटा मुस्कुराए और बोले , मैं फ़िल्में नहीं देखता। दिलीप कुमार और कुछ कहते कि टाटा बोले , मेरे पास इन सब चीज़ों के लिए समय कहां है ? दिलीप कुमार वापस अपनी सीट पर बैठ गए। ऐसे अनेक किस्से हैं मेरे पास। यह ठीक वैसे ही है जैसे बहुत से लेखक शेयर , सूचकांक , फिल्म , खेल आदि नहीं जानते। न जानना चाहते हैं। तो सब की अपनी दुनिया है। अपना संघर्ष है। साहित्य की स्वायत्तता आदि फालतू की बातें हैं। साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है। यह कहने और लिखने वाले प्रेमचंद खुद राजनीति के पीछे-पीछे चलते थे। बाज़ार और पूंजी के खिलाफ लिखते थे पर बंबई की फ़िल्मी दुनिया में पूजा पाठ करने तो गए नहीं थे। बनारस में सरस्वती प्रेस पूजा पाठ के लिए तो खोला नहीं था। प्रेमचंद से ज़्यादा अमीर लेखक हिंदी में अभी तक कोई दूसरा नहीं हुआ। प्रेमचंद के साहित्य के बूते ही प्रेमचंद के बेटे , पोते अरबों रुपए में खेलते रहे हैं। अंग्रेजी बोलते हुए , हिंदी भूल गए थे प्रेमचंद के नाती पोते। यह बाज़ार नहीं तो और क्या था ?

  आज पुस्तकों के डिजिटल संस्करण भी तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। आप डिजिटल और प्रिंट को एक-दूसरे का विरोधाभास मानते हैं या दोनों के बीच कोई रचनात्मक सम्पूरकता देखते हैं?

- प्रिंट की जगह कोई डिजिटल नहीं ले सकता। बाक़ी हर माध्यम की अपनी उपयोगिता है। इस से भी इंकार नहीं है। अब कि जैसे कोई बात आप सौ पन्ने में लिखते हैं। नहीं कह पाते पूरा। पर एक फ़ोटो हज़ार पन्ने की बात अकेले कह देता है। पर कहीं-कहीं। हर कहीं नहीं । बहुत सी फ़िल्में , ओ टी टी , लिखे हुए साहित्य से ज़्यादा कई बार ज़्यादा संप्रेषणीय हो जाते हैं। पर मन के खुरदुरेपन को , मन की कोमलता को आप दृश्य में कैसे दिखा सकते हैं ? वह तो लिख कर ही बांच सकते हैं। लिख कर ही मन में समा सकते हैं। अंतरतल तक जा सकते हैं। मन को दृश्य में नहीं बांध सकते हैं। मन की मिठास को लिख कर ही समझ और समझा सकते हैं। 

  AI और साहित्य एक-दूसरे को किस हद तक प्रभावित कर रहे हैं? क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता लेखक की रचनात्मकता के लिए चुनौती है, अवसर है या दोनों?

- साहित्य , प्रेम , सेक्स और अनुभूति , अभिव्यक्ति यह सब ए आई , फे आई के वश का नहीं है। यह सब स्वानुभूति के अवयव हैं। नकली चीज़ों से मनोरंजन तो हो सकता है , कुछ सुविधा , कुछ जानकारी मिल सकती है पर सुख नहीं। अलौकिक और अनिर्वचनीय सुख तो असल में ही है। अभी कोई ए आई स्त्री आए आप को खूब प्यार करने लगे , आप बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे। साहित्य भी स्वानुभूति की ही तलब रखता है। पढ़ने में भी , लिखने में भी। कोई ए आई स्त्री क्या मेरी मां बन सकती है ? ए आई ? अरे कोई दूसरी स्त्री भी मां बन सकती है ? तो नकली चीज़ें चल भले जाएं थोड़े से समय के लिए पर चुनौती या अवसर भी बन सकती हैं ? मैं नहीं मानता। पर बाज़ार का समय है। कुछ भी हो सकता है। पर मैं इस तरह के बाज़ार में नहीं हूं। न ऐसे बाज़ार के साथ हूं। स्वीकार करना तो बहुत बड़ी बात है। बाज़ार से गुज़रा हूं ख़रीदार नहीं हूं , वाली बात भी कह सकते हैं। 


आगे की यात्रा और विरासत

इतने लंबे लेखकीय जीवन के बाद भी आप की ऐसी कौन-सी अधूरी इच्छाएँ हैं, जिन्हें आप अभी पूरा करना चाहते हैं?

भौतिक इच्छाएं तो कभी किसी की पूरी नहीं होतीं। लेकिन मेरी बहुत सी इच्छाएं पूरी हुई हैं। फिर भी वह भारत भूषण का एक गीत है न : ये असंगति ज़िंदगी के द्वार सौ-सौ बार रोई / बांह में है और कोई चाह में है और कोई। तो यह मेरे साथ भी है। परमानंद श्रीवास्तव का एक गीत है : पल-छिन चले गए / अपनी जैसी इच्छाओं के / वे दिन चले गए। तो यह भी है। इच्छाएं अनंत हैं। फिर भी जो मिलना था , मिल चुका है। जो नहीं मिलना है , नहीं मिलेगा। खोना-पाना सब हो चुका है। अब आगे कोई चमत्कार नहीं होना है। ज़िंदगी की इस वास्तविकता को जान लेने में ही सुख है। इस वास्तविकता को जान चुका हूं। सुखी हूं। भगवान से अब स्वास्थ्य और स्वास्थ्य सुख की ही प्रार्थना है। बस यही इच्छा है। और कुछ नहीं। 

  पाठकों को अपनी अगली पुस्तक के बारे में कुछ बताना चाहेंगे? क्या आप की अगली रचना भी आप के अब तक के लेखन की तरह मनुष्य के किसी अनकहे या असुविधाजनक पक्ष की तलाश करेगी?

- अब तक तो कोशिश यही रही है कि कभी ख़ुद को लेखन में दुहराऊ नहीं। आगे भी यही इरादा है। दो-तीन उपन्यास और कुछ कहानियों के बादल बहुत समय से मन में घुमड़ रहे हैं। आलस वश कहिए या परिस्थितिवश कहिए लिख नहीं पा रहा। पता नहीं लिख भी पाऊंगा कि नहीं , नहीं जानता। एक समय कहता घूमता था कि लिखूंगा नहीं तो मर जाऊंगा। लिखना मेरी सांस है। अब लगता है कि यह सब झूठ ही कहता रहा हूं। तब तो कहता था , पीड़ा को स्वर देता हूं। ज़रूर लोगों की पीड़ा को स्वर देता भी रहा हूं। लेकिन क्या जिन की पीड़ा को स्वर देता रहा हूं , उन को भी अपनी पीड़ा का स्वर कभी सुनाई दिया ? हमारी पीड़ा भी किसी ने सुनने की कोशिश की किसी ने ? कभी नहीं। जिन के लिए आप दिन रात मरें , पूरी ज़िंदगी खपा दें , वही अनजान रहें। जान भी जाएं तो दुश्मन हो जाएं। अब लगता है कि लिखना बहुत ही अनप्रोडक्टिव काम है। थैंकलेस जॉब है। 

 अंत में, जब आप अपनी पूरी साहित्यिक यात्रा को पीछे मुड़ कर देखते हैं, तो अपनी साहित्यिक विरासत को किस रूप में देखना चाहेंगे? एक कथाकार के रूप में, एक पत्रकार के रूप में, एक असहमत सार्वजनिक लेखक के रूप में या उस लेखक के रूप में जिस ने अपने समय के मनुष्य को उस की जटिलताओं के साथ दर्ज करने की कोशिश की?

- विरासत ? हुंह , विरासत ! अब पढ़ता कौन है ? यह जानते हुए भी लिखना , बुद्धि का काम तो नहीं ही हो सकता। लोग पैसा कमा रहे हैं और हम मुफ्त में लिखे जा रहे हैं। यह बुद्धि का काम कैसे हुआ ? वैसे हमारे लिखने का लक्ष्य धन अर्जित करना है भी नहीं। हम तो अपने सुख और संतुष्टि के लिए लिखते हैं। प्रेम करते हैं अपने लिखे से, अपने पढ़ने वालों से।

पीछे मुड़ कर देखता हूं तो एक अपराधबोध से घिर जाता हूं। कई कारणों से। एक तो यह कि जितना और जैसे लिखना चाहिए था , नहीं लिख पाया। दूसरे यह कि कभी-कभी लगता है कि लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र में आ कर बहुत बड़ी ग़लती की। नहीं आना चाहिए था। न लेखन में , न पत्रकारिता में। शुरू में सोचा था कि लेखन और पत्रकारिता से समाज को बदलूंगा। पर पता नहीं कितना समाज को बदला , कितना नहीं बदला , बिलकुल नहीं जानता। पर मैं खुद बहुत बदल गया हूं। बहुत थैंकलेस जॉब है लेखन और पत्रकारिता। दोनों ही। एक समय बाद समाज आप को छुट्टा जानवर बना कर छोड़ देता है। समय का कसाई आ कर आप को काट देता है। कोई निश्चितता नहीं। हमारे समाज को ईमानदार लेखक और पत्रकार नहीं चाहिए। भ्रष्ट और दल्ले पत्रकार चाहिए। जो आप के पचास काम करवा सके। नेता , अभिनेता , क्रिकेटर चाहिए। उद्योगपति , स्मगलर , चोर , बेईमान चाहिए। जो आप का आर्थिक विकास करवा सके। पाखंडी प्रवचनकर्ता , शंकराचार्य , धर्माचार्य चाहिए। दोगले और जाहिल मुल्ले और पादरी चाहिए। 


आप ने समय दिया , हर मुद्दे पर विस्तार से बातचीत की ; इस के लिए आप का बहुत - बहुत धन्यवाद ! 

 



Monday, 10 August 2026

लेखन में अश्लीलता का आरोप ही अपने आप में बहुत अश्लील है

दयानंद पांडेय से विजय पुष्पम पाठक की बातचीत  


आप की लेखकीय अभिरुचि कब और कैसे उत्पन्न हुई? 

- जब टीनएज था। तभी से। अचानक। विद्यार्थी जीवन में अंत्याक्षरी , वाद विवाद प्रतियोगिता में दिलचस्पी थी। अंत्याक्षरी में स्कूल में नियम था कि कविताओं को ही पढ़ना था। फ़िल्मी या इधर उधर के गाने नहीं। फिर भी कविताओं में बस स्कूली कविताओं तक ही दिलचस्पी थी। लिखने की तो कभी सोचा ही नहीं था। मुझे याद है कि एक रात स्कूल में कवि सम्मलेन सुन कर घर लौटा तो सोम ठाकुर का एक गीत मन में बस गया था। जाओ पर संध्या के संग लौट आना तुम ! घर लौट कर तभी लालटेन जला कर बैठ गया। कविता लिखने। सोम ठाकुर और उन का गीत मन में छाए हुए ज़रूर थे पर कविता लिखी। गीत नहीं। कविता का शीर्षक अभी तक याद है : एक किरन। तब ग्यारहवीं कक्षा में था। फिर भूल गया कविता और कविता की उत्तेजना। फिर उन्हीं दिनों लव एट फर्स्ट साइट हुआ। फ़िल्मी गाने गाने लगा। उन दिनों एक फ़िल्मी गाना दिल तो लइ गवा आया था। गाने लगा। एक गाना और था : उल्फत में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ। गाता ज़रूर था कि उल्फत में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ पर ठुकरा नहीं पाया। उस लड़की से प्यार का इज़हार भी नहीं कर पाया। हिम्मत ही नहीं पड़ी। वन वे ही रह गया। ख़ुद ही प्यार किया , ख़ुद ही ख़ुश हुआ। बाद में लगा कि लड़की से न सही , कविता में तो बात कर ही सकता हूं। कविता लिखने लगा। और यह देखिए कहानी भी लिखने लगा। अख़बारों और पत्रिकाओं में छपने लगा। आकाशवाणी पर कविता , कहानी पढ़ने लगा। आज तक यह सिलसिला रुक रुक कर सही क़ायम है। वह एक गाना है न : रुके रुके से कदम रुक कर बार बार चले। 

समकालीन हिंदी लेखकों में आपके पसंदीदा लेखक कौन - कौन हैं? 

- पसंदीदा लेखक बहुत से हैं। कथा में भाषा के स्तर पर हजारी प्रसाद द्विवेदी , अमृतलाल नागर , मोहन राकेश , मनोहर श्याम जोशी। 

आप के इतने अधिक उपन्यास , कहानी संग्रह , संस्मरण और साक्षात्कारों पर पुस्तकें हैं लेकिन हम समकालीन हिंदी साहित्य के समाचारों में आपका नाम ढूंढते ही रह जाते हैं जबकि अमीश त्रिवेदी , चेतन भगत जैसे युवा लेखक एक दो किताबों से ही इतनी अधिक प्रसिद्धि पा जाते हैं और उनकी किताबें बेस्ट सेलर का दर्ज़ा, आपकी इसपर क्या प्रतिक्रिया है? 

- सच तो यह है कि लिखने वाले दीखते नहीं हैं। दिखना प्रदर्शनकारी विधा में होता है। फिल्म , थिएटर , संगीत , गायन और अन्य कलाएं प्रदर्शनकारी कलाएं हैं। लोग ख़ूब दीखते हैं। खेल और राजनीति भी अब ऐसी ही कलाएं हैं। फिर आप ने जिन दो लेखकों का नाम लिया है , यह एक तो अंग्रेजी के लेखक हैं दूसरे , बाज़ार की नब्ज़ पहचानते हैं। और अब बाज़ार से ही ज़िंदगी है। संयोग कहिए या दुर्योग , मैं लेखन के बाज़ार में नहीं आ पाया हूं। बाज़ार को बुरा नहीं मानता पर बाज़ार ही सब कुछ नहीं है। वैसे भी हिंदी के प्रकाशक अपने लेखकों और उन की किताबों की मार्केटिंग नहीं करते। लेखकों से पैसा ले कर किताब छापने के अभ्यस्त हो गए हैं। सरकारी ख़रीद में किताबों को लाइब्रेरियों में दफना कर हिंदी प्रकाशक अपना व्यापार कर रहे हैं। बाज़ार में जब प्रकाशक किताब नहीं ले जाएंगे , कोई कैसे जानेगा किसी लेखक और किसी किताब को। अंग्रेजी के प्रकाशक बाज़ार में किताब ले कर जाते हैं। लेखक और किताब की ब्रांडिंग करते हैं। प्रचार करते हैं। लोग उन्हें जानने लगते हैं। बस इतनी सी बात है। 

लेखन का जिस प्रकार वर्गीकरण हो रहा है मसलन स्त्री लेखन, दलित लेखन, दाहिना बायां लेखन आदि .. क्या लेखन को इस तरह खांचों में बांटना उचित है? 

- लेखन , लेखन होता है। लेखन का कोई चौखटा या सरहद नहीं होती। दाहिना-बायां नहीं होता। दलित-फलित नहीं होता। स्त्री-पुरुष नहीं होता। खांचे में लेखन को वही लोग बांटते हैं जिन्हें लेखन से नहीं , राजनीति से , लेखकीय राजनीति से सरोकार होता है। प्रपंची लोग हैं यह। प्रोपगंडा मास्टर। 

मुक्तिबोध की कविता की एक पंक्ति है 

' अब अभिव्यक्ति के खतरे उठाने होंगे 

तोड़ने होंगे मठ और गढ़ सब '

आपके लेखन में यह उक्ति कहां तक सच साबित होती है ? 

- लिखना अपने आप में ख़तरा उठाना ही होता है। अभिव्यक्ति के ख़तरे कब नहीं थे जो अब नहीं हैं। तुलसीदास के रामचरित मानस पर एक समय अकबर प्रतिबंध लगाने पर आमादा था। यह बात कितने लोग जानते हैं ? तुलसी को अकबर ने कैद किया था। अपमानित किया था। मीरा का विद्रोह कौन नहीं जानता ? मीरा ने क्या अभिव्यक्ति के खतरे नहीं उठाए ? बग़ावत कर राजमहल छोड़ कर नाचती गाती पगडंडियों से वृंदावन आईं। द्वारिका गईं। नाचती गाती कृष्ण की मूर्ति में समा गईं। इस के पहले कबीर को तब के शासकों ने जाने कितनी बार क़ैद किया। मारा पीटा , अपमानित किया। जब कि कबीर के ही समय के अमीर खुसरो को राजदरबार प्राप्त था। ऐसे अनेक और अनगिन क़िस्से हैं अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने के। प्रेमचंद को अपना नाम धनपत राय से प्रेमचंद क्यों करना पड़ा ? सोज़ेवतन की जब्ती करते हुए हमीरपुर के तत्कालीन कलक्टर ने प्रेमचंद को फटकार लगाते हुए कहा था :अपने भाग्य को बखानो कि अंग्रेज़ी अमलदारी में हो। मुग़लों का राज होता तो हाथ काट दिए जाते। दाराशिकोह के साथ औरंगज़ेब ने क्या किया ? अभिव्यक्ति का ही तो मामला था। सोवियत संघ में विद्रोही लेखकों को साइबेरिया भेज दिया जाता था। बहुत से लेखक सोवियत संघ छोड़ कर भाग गए थे। टालस्टाय जैसे लेखक को कितना तो उपेक्षित किया गया था। टालस्टाय के बरक्स गोर्की को उछाला गया। ऐसे अनेक किस्से हैं , दुनिया भर में। क्या महादेवी वर्मा ने अभिव्यक्ति के खतरे नहीं उठाए ? कि चंद्रकिरण सोनरिक्सा ने नहीं उठाए ? कि अजित कौर , मन्नू भंडारी और प्रभा खेतान ने नहीं उठाए ? अभिव्यक्ति के खतरे उठाए बिना लेखक , लेखक नहीं हो सकता। बाकी पोस्टरबाजी और राजनीति भी लेखन में इसी तरह चलती रहती है। 

आप के स्त्री पात्र जुझारू और बेबाक हैं जैसे 'बांसगांव की मुनमुन ' हो या सुमि या फिर वह औरत जो जेल में अपनी डायरी लिखती है कि व्यवस्था की पोल खोल सके , उन्हें रचने की प्रेरणा आपको कहां से मिली? 

- प्रेरणा जैसी कोई बात नहीं है। मुनमुन हो या सुमि सब हमारे आसपास की ही हैं। घर , दुआर की ही हैं। इन को गढ़ना नहीं पड़ा। बस इन्हें उठा कर कागज पर कलम के सहारे उठा कर रख दिया है। बहुत आहिस्ता से। बिना किसी हस्तक्षेप के। बिना किसी तोड़-मरोड़ के। एक औरत की जेल डायरी भी जस की तस उठा कर रख दी है। बेईमानी नहीं की है। आप ध्यान से देखेंगी तो पाएंगी कि हमारी रचनाओं में काल्पनिक पात्र खोजे नहीं मिलेंगे। नकली पात्र या नकलीपन नहीं मिलेगा। मुझे नकलीपन सुहाता नहीं है। इसी लिए यह या अन्य और पात्रों में नुकीलापन सहज ही आ गया है। कागज पर उतरते समय पात्र हमारे भीतर आ कर जैसे बस जाते हैं। हम उन्हें नहीं , वह हमें रचने लगते हैं। पात्रों की अंगुली पकड़ कर किसी बच्चे की तरह मैं उन के साथ चल पड़ता हूं । वह हमारे वश में नहीं रहते , मैं उन के वश में हो जाता हूं। अवश हो जाता हूं , उन के आगे। ऐसे जैसे प्रेम में अवश हो जाता हूं । सच अपने पात्रों से बहुत प्रेम करता हूं। 

आप के अधिकांश पात्र काल्पनिक न हो कर आस पास की दुनिया के ही होते हैं , जैसा कि मुझे आपकी रचनाओं को पढ़ते हुए लगा , तो कभी ऐसा भी हुआ कि आपको उनका विरोध झेलना पड़ा हो? 

- हां , अनेक बार। बवाल हो गए हैं। मुकदमे भी। कंटेम्प्ट आफ कोर्ट तक हुआ है। जेल जाने की नौबत आ गई है। विरोध शब्द बहुत छोटा है , इन सारे विरोध को ले कर। कुछ जीवित पात्र और मृतक पात्रों के परिजन भी बेतरह नाराज हो गए हैं। अपने-अपने युद्ध को ले कर बहुत सारे पत्रकार मित्र नाराज हुए। थिएटर के लोग भी। राजनीति के लोग भी। सब से ज़्यादा वकील और जस्टिस लोग नाराज हुए। कंटेम्प्ट आफ कोर्ट का मुकदमा एक महिला वकील ने करवा दिया। किसी और वकील से। एक डमी आदमी से। कोई वकील हमारी तरफ से यह कंटेम्प्ट का मुकदमा लड़ने को तैयार नहीं था। बड़े से बड़े और छोटे से छोटे वकील ने भी हाथ जोड़ लिए। कि इसी हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करनी है। जस्टिस लोगों से पंगा कौन ले भला। और तो और कोई जस्टिस यह कंटेम्प्ट का मुकदमा सुनने को तैयार नहीं था। कि कौन बर्रैया के छत्ते में हाथ डाले। बड़ी मुश्किल से एक बड़े वकील डाक्टर एल पी मिश्रा तैयार हुए। पहले बहुत पैसा मांगा। लाखों की फीस थी। हमारे पास पैसा था नहीं। फिर बिना पैसे के पूरा मुकदमा लड़ा डाक्टर एल पी मिश्रा ने। हिंदी प्रेमी होने के कारण। एक जस्टिस त्रिवेदी के यहां मुकदमा लगा। हमारे पुराने मित्र थे। पर कोर्ट में जैसा डरा दिया। मित्रता भूल गए। पूरी सख्ती से पेश आए। काउंटर रिज्वाइंडर हुआ। कि तभी उन का निधन हो गया। अब कोई और जस्टिस यह मुकदमा सुनने को तैयार नहीं। सब ने नाट बिफोर कर दिया। अंतत: चीफ जस्टिस के यहां मुकदमा लगा। बड़ी लंबी कहानी है इस की भी। ख़ैर कुछ सालों में मुकदमा ख़त्म हुआ। जेल नहीं जाना पड़ा। बहुत से लेखक मित्र ईर्ष्यालु हो गए। अपने-अपने युद्ध उपन्यास की देशव्यापी चर्चा से। मेरे जेल जानी की बड़ी उम्मीद थी लेखक मित्रों को। यह उम्मीद भी टूट गई। घुमा फिरा कर अपने-अपने युद्ध को अश्लील घोषित करने लगे। आप किसी व्यक्ति से तो लड़ सकते हैं। लंबा लड़ सकते हैं। किसी रचना से कब तक लड़ सकते हैं ? मित्र लोग हार गए। अपने-अपने युद्ध 26 बरस से आज भी पढ़ा जाता है। छपता रहता है। लोग चर्चा करते रहते हैं। तब जब अपने-अपने युद्ध छप न सके , इस के बड़े यत्न कुछ लेखक मित्र करते रहे थे। प्रकाशकों को निरंतर भड़काते रहे थे। लेकिन उन की साज़िश पर पानी पड़ गया। 

लोक कवि अब गाते नहीं उपन्यास भोजपुरी के लोक गायक बालेश्वर के जीवन पर आधारित है। सब जानते हैं। छुपाने जैसी कोई बात नहीं। भोजपुरी हमारी मातृभाषा है। भोजपुरी की यातना को स्वर देने की कोशिश की है इस उपन्यास में। बालेश्वर मेरे गहरे मित्र थे। आए दिन का साथ उठना बैठना था। लोक कवि अब गाते नहीं को ले कर लोगों ने बालेश्वर को भी भड़का दिया। कोई दो साल तक हमारी बोलचाल बंद थी। एक सुबह अचानक बालेश्वर हमारे घर आए। मेरे पैर पकड़ कर बैठ गए। रोते-रोते कहने लगे , पांडेय जी बड़ी भारी गलती हो गई। आप ने तो हम को जीते जी अमर कर दिया। हम समझ नहीं पाए। अनपढ़ आदमी हूं। लोगों ने भड़का दिया था। लेकिन अब पूरी किताब हम पढ़वा कर सुन लिया हूं। आप से कोई शिकायत नहीं है। हम को माफ़ कर दीजिए। हम फिर साथ उठने बैठने लगे। उन के मरते दम तक हमारा साथ बना रहा। अंतिम समय अस्पताल में हमारे हाथ में हाथ डाल कर विदा हुए। बालेश्वर के परिवार से आज भी पारिवारिक रिश्ता है। बालेश्वर के संगी साथी और उन के बच्चे हमारा बहुत आदर करते हैं। उन की हर जन्म-तिथि और पुण्य-तिथि पर हम उन के घर आयोजित कार्यक्रम में सर्वदा उपस्थित रहते हैं। 

बांसगांव की मुनमुन की मुनमुन और उस के परिवारीजन बहुत नाराज हैं। उन की नाराजगी लगता नहीं कि कभी ख़त्म होगी। बस मुकदमा नहीं हुआ। बाकी सब हुआ। तब जब कि मुनमुन हमारी रचनाओं की सब से चमकदार चरित्र है। सर्वाधिक चर्चित। पर है तो है। सब का अपना निजी होता है। हालां कि जो कहते हैं न कि हर कथाकार दूधिया होता है। पानी मिलाता ज़रूर है दूध में। पर दूध कहां से बदल देगा। कहीं का ईंट , कहीं का रोड़ा , भानुमति ने कुनबा जोड़ा। लिखने में यह होता ही है। पर खुशबू कहां छुपती है भला। ऐसे ही अन्य कई रचनाओं में भी हुआ है। होता रहता है। घोड़े वाले बाऊ साहब कहानी पर तो मुझे बहुत धमकियां मिलीं। बम से उड़ा देना , फोन पर गाली गलौज भी सुनना पड़ा। सुंदर भ्रम कहानी में भी कुछ लोगों ने मारने के लिए एक बार घेर लिया। सुंदर भ्रम प्रेम कहानी है। ख़बरों को ले कर धमकियों , मुकदमों का अभ्यास था। पर कहानी , उपन्यास के लिए भी यह सब भुगतना पड़ा है। पता नहीं कब यह सिलसिला ख़त्म होगा। हारमोनियम के हज़ार टुकड़े उपन्यास को ले कर बहुत से पत्रकार मित्र आज तक नाराज हैं। आजीवन रहेंगे। कुछ पत्रकारों ने गाली गलौज की। कानपुर के एक कथाकार मित्र तो हमारे बड़े प्रशंसक थे। पर हारमोनियम के हज़ार टुकड़े के एक खल पात्र उन के प्रिय मित्र थे। उन्हों ने मुझे ही अपना खल मित्र मान लिया। लखनऊ के कुछ पत्रकारों ने भी उन के सुर में सुर मिला लिया। नफ़रत करने लगे। ऐसे अनेक विवरण हैं। तुम्हारे बिना कहानी की मुख्य पात्र ने भी मुंह फुला लिया। 

और तो और तीन साल पहले आया उपन्यास विपश्यना में प्रेम पढ़ कर भी कोई नाराज हो सकता है भला ? हमारे एक अभिन्न कथाकार मित्र न सिर्फ नाराज हुए बल्कि संबंध ही ख़त्म कर लिए। प्रेम में डूबे एक मनोवैज्ञानिक उपन्यास ने उन का दिल तोड़ दिया। क्या तो उन का एक बेटा विपश्यना शिविर से जुड़ा हुआ है और हम ने यह उपन्यास लिख कर विपश्यना को बदनाम करने का काम किया है। अब इस लांछन का भी क्या करें। आप को बताऊं कि भारत में सब से ज़्यादा विपश्यना शिविर महाराष्ट्र में लगते हैं। और विपश्यना में प्रेम का मराठी में अनुवाद हुआ है। बहुत पसंद किया गया है , मराठी में। हिंदी में भी बहुत स्वीकार्यता और प्रशंसा मिली है। मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी ने इसे राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया है। 

लेखन जगत में शीघ्र स्वीकार्यता और प्रसिद्धि के लिए अनावश्यक अश्लीलता भी परोसी जा रही है जिसे प्रगतिशीलता और खुलेपन का नाम दिया जाता है , लेकिन क्या वास्तव में ऐसे लेखन के ज़रिए कोई लंबी दौड़ का घोड़ा बन सकता है? 

- लेखन में अश्लीलता का आरोप ही अपने आप में बहुत अश्लील है। अश्लीलता को सिर्फ़ देह तक सीमित करना नादानी है। स्त्री देह प्रकृति द्वारा रचित अनूठी कृति है। हम जिस स्त्री कोख से पैदा हो कर , उस का दूध पी कर जीवन पाते हैं , वह अश्लील कैसे हो सकती है भला ? मंटो की कहानी ठंडा गोश्त पर अश्लीलता का मुकदमा चला , पाकिस्तान में। फैज अहमद फैज ने मंटो की इस कहानी को अश्लील बताते हुए , मंटो के खिलाफ सिर्फ इस लिए गवाही दी कि मंटो ने प्रगतिशील लेखक संघ में सदस्य बनने का उन का प्रस्ताव ठुकरा दिया था। मंटो को जेल हो गई। मंटो टूट गए। पहले भी बहुत शराब पीते थे। जेल से बाहर आ कर और पीने लगे। मर गए। बताइए कि फैज का आरोप अश्लील था कि मंटो की कहानी ? पढ़िए न कभी ठंडा गोश्त। रोयां-रोयां सिहर उठता है। दिल कचोट उठता है। कोई अश्लील कहानी पढ़ कर यह भाव उमड़ सकता है भला ? अश्लीलता आप की आंख और व्यवहार में है। साहित्य में नहीं। अगर सचमुच कोई नीली कथा है , कोई नीली फिल्म है तो बात और है। वह तो है अश्लील। अश्लील साहित्य और साहित्य में अश्लीलता दोनों दो बात है। साहित्य में कई बार स्त्री देह की यातना को भी , बलात्कार दृश्य , रूमानी दृश्य को भी लोग अश्लीलता का सर्टिफिकेट थमा देते हैं। यह गुड बात नहीं है। यहां दो फिल्मों का ज़िक्र कर बात को स्पष्ट किए देता हूं। एक फिल्म है घर। दूसरी फिल्म है बैंडिट क्वीन। घर में रेखा हैं और बैंडिट क्वीन में सीमा विश्वास। दोनों फिल्म में बलात्कार दृश्य देख कर मन हिल जाता है। रोंगटे खड़े हो जाते हैं। रोना आ जाता है। कलेजा मुंह को आ जाता है। पर लोगों ने पर यहां भी अश्लीलता का सर्टिफिकेट थमा दिया। बाकी देखना ही है तो साहित्य से ज़्यादा अश्लीलता हमारे आस-पास है। भ्रष्टाचार , आरक्षण , न्याय में देरी , हिंसा , सांप्रदायिकता , राजनीतिक पतन , बेरोजगारी , मंहगाई , स्कैम आदि कहीं ज़्यादा अश्लील हैं। 

समाज, राजनीति, कला, संगीत, मीडिया , हर क्षेत्र पर आपका लेखन है लेकिन सबसे अधिक रुचिकर आपके लिए किस पर लिखना है?

- राजनीति , मीडिया , सिनेमा , संगीत , अपराध आदि पर हम रोज लिख सकते हैं। निरंतर लिख सकते हैं। लिखते ही रहते हैं। पर यह सब एक सीमा के बाद ऊब और चिढ़ पैदा कर सकते हैं। करते ही हैं। पर कहानी , कविता या उपन्यास आप रोज नहीं लिख सकते। ख़ास कर उपन्यास। उपन्यास लिखना साधना है। निजी तौर पर उपन्यास को ही लिखना मानता हूं। बाक़ी सब टाइम पास है। मूंगफली खाना है। ताश खेलना है। फेसबुक और इंस्टाग्राम है। रील देखना है। 

अदब और गंगा जमुनी तहज़ीब के इस शहर में तमाम साहित्यिक समरोह और गतिविधियां होते रहते हैं।साल भर सरगर्मियां बनी रहती हैं लेकिन देखने में अक्सर आता है कि आयोजकों के अपने सेलेक्टेड वक्ता और श्रोता होते हैं । इस का अर्थ तो यही हुआ कि अदब के साथ जबरदस्त बेअदबी हो रही है । इस मुद्दे पर आप क्या कहना चाहेंगे ? 

- यह बेअदबी वामपंथी संगठनों की देन है। लखनऊ ही नहीं , भारत के कमोवेश हर शहर में है। वामपंथी संगठनों , प्रलेस , जलेस , जसम में आपस में भी बहुत मारकाट है। नफ़रत है। अभी देखिए न तस्लीमा नसरीन कोई बीस साल बाद कोलकोता गईं। बांग्लादेश से निर्वासित हो कर भारत आईं तब कोलकोता में ही वह रहना चाहती थीं। पर पश्चिम बंगाल की तब की वामपंथी सरकार ने मुस्लिम सांप्रदायिकता के तुष्टिकरण में तस्लीमा नसरीन को कोलकोता में रहने नहीं दिया। खदेड़ बाहर कर दिया। किसी प्रलेस , जलेस या जसम ने तस्लीमा नसरीन का साथ नहीं दिया। उलटे तस्लीमा नसरीन का विरोध किया। डट कर विरोध किया। प्रतिरोध की बात करने वाले इन पाखंडी लेखकों ने सरकार के सुर में सुर मिला कर तस्लीमा का विरोध किया। सिर्फ़ इस लिए कि तस्लीमा नसरीन मुस्लिम सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ लिखने के लिए परिचित हैं। बाद में तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी सरकार ने भी तस्लीमा को पश्चिम बंगाल में घुसने नहीं दिया। वही मुस्लिम सांप्रदायिकता का तुष्टिकरण। क्या तो तस्लीमा के वहां आने और रहने से आग लग जाएगी। लेकिन अब जब ममता बनर्जी के बाद नई सरकार आई है। भाजपा की शुभेंदु सरकार ने तस्लीमा नसरीन को कोलकोता आने दिया। वह गईं। वही मुसलमान हैं , वही क़ानून है। वही पश्चिम बंगाल है , वही कोलकोता भी। एक पैसा का दंगा फसाद नहीं हुआ। कोई विरोध नहीं। विरोध में किसी का एक बयान तक नहीं दिखा। एकदम शांति रही। यह क्या है ? सलमान रश्दी के साथ भी इन्हीं वामपंथी लेखक संगठनों ने भेदभाव किया। मुस्लिम सांप्रदायिकता के साथ सुर में सुर मिला कर खड़े हो गए। जो सलमान रश्दी या तस्लीमा नसरीन के साथ खड़ा हो जाए , वह संघी है। भाजपाई है। लेखक नहीं। अजब नैरेटिव है। 

ज़िंदगी भर इस्लाम की सेवा में हर रचना लिखने वाले अमीर खुसरो सूफी बता दिए जाते हैं। सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा जैसे गीत में भी इस्लाम की बादशाही का जहर उगलने वाले पाकिस्तान के संस्थापक और कट्टर मुस्लिम लीगी अल्लामा इक़बाल या फिर बस नाम रहेगा अल्ला का लिखने वाले फैज प्रगतिशील घोषित रहते हैं। लेकिन तुलसीदास , मीरा , सूर , मैथिलीशरण गुप्त , रामधारी सिंह दिनकर , श्याम नारायण पांडेय आदि की बात करने वाला हिंदुत्ववादी है। दुनिया के सब से बड़े कवि तुलसीदास के साथ उन का यह घटिया रवैया है। तो बाक़ी का क्या ही कहें। राहुल सांकृत्यायन , रामविलास शर्मा , निर्मल वर्मा आदि तो घोषित कम्युनिस्ट लेखक थे। अपनी जड़ों की बात करते ही यह लोग भी बारी-बारी हिंदू घोषित हो गए। घटिया हो गए। बाद में तो नामवर सिंह के साथ भी यही सुलूक़ हुआ। बस दबी जुबान। बस हिंदू घोषित नहीं किया गया नामवर सिंह को पर उपेक्षित भरपूर किया गया। नामवर सिंह एक टी वी इंटरव्यू में कह दिया था कि हमारा भगवान किसी से कमज़ोर तो नहीं है। लेकिन क्या किसी के उपेक्षित करने से कोई तुलसीदास , कोई राहुल सांकृत्यायन , कोई रामविलास शर्मा , कोई निर्मल वर्मा या कोई नामवर सिंह ख़त्म हो जाता है ? परिणाम आप के सामने है। 

  आजकल  जैसा  कि ट्रेंड चल रहा है सेलेक्टिव विरोध का , आपकी विचारधारा से यदि किसी का इतर विचार हुआ तो विरोध करना ही है , चाहे आप गलत ही क्यों  न हों, जैसा कि पुरस्कार , सम्मान वापसी गिरोह कर रहा है , इसपर आप का विचार जानना चाहूंगी ! 

- सेलेक्टिव विरोध और सेलेक्टिव चुप्पी भी एक किस्म का कैंसर है। एड्स है। छुआछूत से बड़ी समस्या है यह। तथ्य और तर्क को लात मार कर यह लोग गुंडई करने लगते हैं। गिरोहबंदी के मारे यह लोग दिन को रात सिद्ध करने में एक्सपर्ट हैं। सामाजिक न्याय के नाम पर जातिवादियों और सेक्यूलरिज्म के नाम पर अतिवादियों का यह संयुक्त गठजोड़ है। इन की गैंगबाजी के आगे बड़े-बड़े अपराधी और माफिया गिरोह शर्मा जाएं। चित भी इन की , पट भी इन की। सरकार भले इस समय भाजपा वाली है पर व्यवस्था सारी अभी भी इन्हीं की है। विश्वविद्यालयों , कालेजों में नियुक्ति , पुरस्कार , सम्मान , यात्रा , पाठ्यक्रम , अकादमी सब इन के ही हाथ है। बस पाठक संसार नहीं है इन के पास। यहीं मार खा जाते हैं। खुद ही लिखते हैं , खुद ही पढ़ते हैं। आलोचना के नाम पर एक दूसरे की पीठ खुजाने का बहुत अच्छा अभ्यास है इन सभी को। रही बात साहित्य अकादमी पुरस्कार वापसी की तो वह मुहिम और खुन्नस अशोक वाजपेयी की थी। आई ए एस अफ़सर रहे अशोक वाजपेयी कांग्रेस के चाकर रहे हैं। उन की कांग्रेसी निष्ठा किसी से छुपी नहीं रही कभी। विश्व कविता समारोह के आयोजन को ले कर साहित्य अकादमी के तत्कालीन अध्यक्ष रहे विश्वनाथ प्रसाद तिवारी से उन की अनबन हो गई। अशोक वाजपेयी को एक मुद्दा मिल गया। मोदी विरोध के नाम पर वामपंथियों को पिट्ठू बना कर कांग्रेस के पक्ष में बढ़िया इस्तेमाल किया। वामपंथियों को इस्तेमाल करना बहुत आसान रहता है। हमेशा से। पर यह पुरस्कार वापसी मुहिम जल्दी ही पिट गई। न विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की सेहत पर कोई असर पड़ा न ,साहित्य अकादमी , न नरेंद्र मोदी सरकार की सेहत पर। 

 अब अधिक सवाल न पूछते हुए जानना चाहूंगी लेखन से इतर आपकी गतिविधियों के विषय में ... 

- वह कहते हैं न कि और भी ग़म हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा ! तो लेखन के सिवा भी बहुत कुछ है मेरे हिस्से। लेखन बहुत-बहुत कम है जीवन में। आलस और सोना बहुत-बहुत है। किसी को आलस के सौंदर्यशास्त्र पर कुछ लिखना , जानना हो , रिसर्च करना हो तो मैं उस के लिए बेस्ट नमूना हूं। होते हैं कुछ लोग जो चौबीसों घंटे लेखक बने रहते हैं। उसी धुन में आकुल व्याकुल रहते हैं। मैं बिलकुल नहीं रहता। सामान्य आदमी हूं , सामान्य बना रहता हूं। पुरुषोचित खूबियां-खामियां भी भरपूर हैं मुझ में। पूरी तरह हैं। अच्छा खाना खाना , अच्छे कपड़े पहनना , अच्छी और सुंदर औरतों को देखना , शालीन और सुंदर स्त्रियों की संगत में रहना। मनपसंद गाने सुनना , फ़िल्में देखना। आनंद से रहना। फालतू की समस्याओं और टेंशन आदि की मूर्खताओं से कोसों दूर रहना। किसी के फटे में पांव भूल कर भी नहीं डालता। किसी का बुरा नहीं करता। किसी का बुरा नहीं सोचता। अपनी पूरी क्षमता से सब की मदद और सहयोग करता हूं। जीवन में ख़ुश रहना और आनंद से रहना , सब के नसीब में नहीं होता। भगवान की कृपा से मेरे नसीब में है। भरपूर है। ज़िंदगी का मक़सद भी यही है। इच्छाएं बहुत कम हैं। अपेक्षा किसी से कुछ करता नहीं। संघर्ष और मेहनत बहुत किया है जीवन में। पर वह कहते हैं न कि सुख से मेरा पुराना रिश्ता , दुःख का दावेदार नहीं हूं। क्यों कि जंह बैठे , तंह छांव !

● आप ने समय निकाला और अपने विचार रखे इस के लिए हम आपके आभारी हैं । मैं ने  प्रयास किया है वही सवाल आप के सामने रखने का जो तमाम  पाठक अपने  प्रिय लेखकों से जानना चाहते हैं  । आप का बहुत बहुत आभार व धन्यवाद।


इलाहीबाग़ मोहल्ले की मिठास



पिछली बार जब गोरखपुर गया तो अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए इलाहीबाग़ मोहल्ले भी गया। इलाहीबाग के एक ऐसे घर भी गया जहां से जाने कितनी यादें जुड़ी हुई हैं। बहुत दिनों बाद इस घर में गया। घर से जुड़ी यादें ही नहीं , घर भी बिलकुल उसी तरह पाया। अब तो हमारे गांव में भी खपरैल वाले घर नहीं रह गए हैं। इक्का दुक्का खंडहर घर ज़रूर रह गए हैं गांव में खपरैल के जिन में बरसों से कोई रहता नहीं। घर के लोग भी इंतज़ार कर रहे हैं गोया घर ख़ुद क्यों नहीं गिर जाते। कि मैदान बन जाए। इस लिए भी कि घर में इतने साझेदार हैं कि एक एक कमरे से ज़्यादा लोगों को नहीं मिल सकता। तो सब दूसरी जगह अपने-अपने पक्के मकान बना कर रहने लगे हैं। गोरखपुर शहर के हमारे इलाहीबाग़ मुहल्ले के भी सभी खपरैल वाले मकान अपना अस्तित्व खो चुके हैं। नए पक्के मकान हो गए हैं। एक घर ऐसा मिला जिस की छत तो पक्की हो गई है पर दो पल्ले वाला दरवाज़ा और दीवार वही रह गया है। यहां तक कि जिस जमींदार साहब के हाता वाले बड़े से घर में हम बतौर किराएदार रहते थे , वह घर भी गिर कर अब मैदान हो चुका है।


लेकिन एक घर ऐसा मिल गया जो न सिर्फ अपने खपरैल के साथ बुलंदी के साथ उपस्थित है बल्कि अपनी पूरी त्वरा के साथ उपस्थित है। सब कुछ ठीक वैसे ही है जैसे हमारे बचपन में था। लोग इस घर में रह भी रहे हैं। पूरे ठाट बाट से रह रहे हैं। फर्क बस इतना भर आया है कि नीचे की फर्श पक्की हो गई है। बस इतना ही। विश्वनाथ पांडेय ऊर्फ पड़ोही चाचा का यह घर अपनी पूरी धजा के साथ जस का तस है। यहां इतने बड़े घर में हम ख़ूब खेलते थे। झूला झूलते थे। बाले मियां के मैदान में जब रामलीला होती थी तो कलाकार इसी घर के बरामदे में मेकअप करते थे। पता चला कि अब रामलीला भी यहीं होती है। जहां गऊशाला होती थी अब वहां रामलीला होती है। घर के पीछे का बड़ा सा किचेन गार्डन अब भी वैसे ही है। अगवाड़ा-पिछवाड़ा , घर , सब कुछ जस का तस। बस नीचे की फर्श पक्की हो गई और गऊशाला अनुपस्थित हो गई है। बाकी सब कुछ वही का वही।

घर के आंगन में खड़े हो कर जब फोटो खिंचवाई तब बच्ची बुआ , लिटिल बुआ बहुत याद आईं। अब यह लोग नहीं हैं। पड़ोही चाचा के बेटे ने यह फोटो खींची। मन मिठास से भर गया है। बचपन से जवान होने की यादों की मिठास। इलाहीबाग़ मोहल्ले की मिठास। बारी-बारी से कई घरों में गया। हर किसी ने पहचाना और याद किया। बैठाया और मान दिया। जलपान दिया। बहुत से समकालीन बल्कि हम से छोटे लोगों के विदा होने की सूचनाएं भी मिलीं। जिन के साथ हम खेले कूदे और जवान हुए। पढ़े-लिखे। झगड़े किए। अच्छे बुरे समय की याद की गई।



Friday, 31 July 2026

विपश्यना में प्रेम अब मराठी में


गुरु पूर्णिमा पर मराठी में
एक नायिका की कहानी विपश्यनेमधील प्रेम का उपहार

आज की सुबह , इतनी सुंदर होगी , कल नहीं जानता था। लेकिन प्रिया जलतारे जी के एक संदेश ने आज की सुबह सुंदर बना दिया। दिन बना दिया। प्रिया जलतारे जी का संदेश हालां कि कल रात ही आ गया था। जो उन्हों ने गुरु पूर्णिमा के उपलक्ष्य में उपहार स्वरूप भेजा था। देखा हम ने आज सुबह। हर्ष की बात है कि विपश्यना में प्रेम उपन्यास का मराठी अनुवाद पूरा हो गया है। प्रिया जलतारे जी ने मेरी कई सारी कविताओं , ग़ज़लों और अनेक कहानियों का मराठी में अनुवाद किया है। सभी रचनाओं के अनुवाद ने ख़ुशी दी है। पर विपश्यना में प्रेम के मराठी अनुवाद ने अपार ख़ुशी दी है। आप आदरणीय मित्रों के साथ इस ख़ुशी को साझा कर रहा हूं।

जुलाई , 2023 में जब विपश्यना में प्रेम छप कर आया प्रिया जलतारे जी ने तभी इस का अनुवाद कार्य शुरू कर दिया। लेकिन तभी 27 अक्टूबर , 2023 को उन की सासु जी का बाइपास हो गया। काम रुक गया। सासु जी की सेवा सुश्रुषा से छुट्टी मिली तो दिसंबर , 2023 में उन के पतिदेव का स्वास्थ्य भी गड़बड़ हुआ। लगा कि उन का भी बाईपास होगा l लेकिन नहीं हुआ l और भी समस्याएं आती रहीं। पारिवारिक समस्याएं आती रहीं। जाती रहीं। विपश्यना में प्रेम का अनुवाद स्थगित होता रहा। लेकिन तमाम मुश्किलों के प्रिया जी ने हार नहीं मानी। अंतत : अनुवाद पूरा किया। और गुरु पूर्णिमा की रात मुझे यह संदेश भेजा। संदेश के साथ ही विपश्यना में प्रेम का मराठी अनुवाद भी। विपश्यनेमधील प्रेम। विपश्यना में प्रेम की कथा का नया स्वर और नया प्रतिमान भी स्थापित कर दिया है। बता दिया कि यह नायक नहीं , नायिका की कहानी है। सावन पहले दिन की बरसात की तरह प्रिया जी का आत्मीय संदेश भी आप आदरणीय मित्रों के साथ साझा कर रहा हूं :

आदरणीय सर,

नमस्ते 🙏

पारिवारिक जिम्मदारियों के कारण, ‘विपश्यना में प्रेम ‘ इस उपन्यास का अनुवाद कार्य विलंब से हुआ ।

कहने को तो नायक प्रधान कहानी है । मेरे लिए ये कहानी नायिका की है ।

दारिया,माँ बनने के लिए परेशान थी । हर एक इलाज करने को तैयार है । विपश्यना के बीच भी उसका मन ध्यान में नहीं है । बहुत सारा रिस्क उठाकर उसे माँ बनने का सौभाग्य मिला। अपनी देह से अपना अंकुर , नवनिर्मिति के लिए व्याकुल दारिया, आख़िर में यशस्वी हुई । एक माँ की कहानी !

गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर, ‘विपश्यना में प्रेम’ इस उपन्यास का मराठी अनुवाद आपको भेज रही हूँ ।

—-प्रिया जलतारे

30 july 2026







Sunday, 26 July 2026

मोदी और भाजपा का कोर वोटर उन से बिदक गया है

 दयानंद पांडेय


जंतर मंतर का एक संदेश यह भी है कि यू जी सी से नाराज लोग धर्मेंद्र प्रधान के पक्ष में किसी सूरत खड़े नहीं हो सकते थे l सो एक चुप , हज़ार चुप l भले कमान नरेंद्र मोदी के हाथ में है पर विश्वनाथ प्रताप सिंह और अर्जुन सिंह के बाद सवर्ण छात्रों का सर्वाधिक नुक़सान धर्मेंद्र प्रधान ने किया है l सो जातीय नफ़रत का दुर्ग उन्हें सार्वजनिक रूप से ले डूबा l

दलित , ओ बी सी वोट के चक्कर में मोदी से लगायत लगभग समूची भाजपा चुप रही l सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से कुछ पानी पड़ा ज़रूर पर ग़ुस्सा नहीं गया l नहीं जाएगा l दलित मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला पलटना भी ग़ुस्से का सबब है l पर यू जी सी इस से बड़ा है l बच्चों का भविष्य कोई अभिभावक नहीं बर्बाद करना चाहता l आरक्षण वैसे ही गले की फांस बना हुआ है l कोई कितना और कब तक सहे l

काकरोच मूवमेंट इसी लिए भस्मासुर बन गया l जंतर मंतर पर मोदी को अभद्र और अश्लील गालियां देने वाली ज़्यादातर ओ बी सी , दलित और मुस्लिम स्त्रियां , लड़कियां इसी लिए बेलगाम हो गईं l कि उन्हें कोई अब काऊंटर नहीं कर सकता l ब्रेक नहीं लगा सकता l यू जी सी से सताए हुए लोग , अब भी चुप हैं l मोदी और भाजपा का कोर वोटर यही है l है अभी भी भाजपा और मोदी के साथ लेकिन उन के लिए युद्धरत नहीं है l नहीं रहेगा l टेकेन फार ग्रांटेड मान लिया गया है इन्हें l राहुल देव जैसे तमाम फ्रस्ट्रेटेड लोग इन गालियों के पक्ष में खुल कर खड़े हो गए हैं l जे एन यू कैंपस की गालियां वाया जंतर मंतर अब रील बन कर देश के कैनवस पर छा गई हैं l वाम ब्रिगेड के लेखकों और पत्रकारों ने इन गालियों पर खुल कर सहमति दे दी है l ऐसे जैसे हरी झंडी l अभी माहौल और बदलेगा , और बिगड़ेगा l संस्कृत के एक श्लोक से लवणेन भोज्यम का अनर्थ मोदी के मुँह में डाल कर परोसा जा रहा है l

ग़लत सही , सब कुछ जानते हुए भी सब लोग चुप हैं l चुप रहेंगे l कूटनीति और कुटिलता से वोट बैंक नहीं संभलता l कोर वोटर भी भागने लगता है l भाजपा और मोदी जब तक इस तथ्य से परिचित नहीं होते , मुश्किल थमने वाली नहीं l गणेश का सिर काटना आसान है , उस की जगह हाथी का सिर लगाने के लिए शिव बनना पड़ता है l शिव का वह चातुर्य भाजपा और मोदी के यहाँ फ़िलहाल अनुपस्थित है l आरक्षण के ख़िलाफ़ भी मूवमेंट की सुगबुगाहट है l पर सारी सरकार परिसीमन के खेल में न्यस्त और व्यस्त है l परिसीमन ज़रूरी है पर इन मुश्किलों से भी आँख मूँद लेना किसी भी सरकार के लिए शुभ नहीं है l अहिंसक और देश प्रेमी लोगों को मुसलसल उपेक्षित करते रहना भी देश के लिए अशुभ है l

कटी पतंग की कैफ़ियत

दयानंद पांडेय

मोदी सरकार की एक बड़ी ख़ासियत यह है कि वह लोकतांत्रिक होने की बिना पर अपने विरोधियों को उछल कूद करने की पूरी छूट देती है l यहाँ तक कि हिंसा आदि की भी l भरपेट l उग्रता की हद तक l पुलिस पीटने के बजाय, पिटने लगती है l

इतनी कि भाजपा और मोदी समर्थक भी बौखला कर मोदी को गरियाने लगते हैं l मोदी की ऐसी-तैसी कर देते हैं l मोदी की इस उदारता और सदाशयता की बैंड बजा देते हैं l

फिर अचानक यही मोदी सरकार किसी अजगर की तरह सारे रंग बिरंगे सापों को बहुत आहिस्ता से क़ानूनी आलिंगन में अनायास लपेट लेती है l कस कर जकड़ लेती है l पागल बना देती है l इतना कि उन का सांस लेना दूभर हो जाता है l लाश बना कर छोड़ देती है l बधिया बना देती है l कश्मीर से लगायत दिल्ली , ग़ाज़ियाबाद और अयोध्या आदि तक का यही सिलसिला है l

ट्रंप, चीन , पाकिस्तान, बंग्लादेश , मीडिया आदि हर कहीं आप इस बधिया बनाओ नीति का अवलोकन कर सकते हैं l हमारे लखनऊ, गोरखपुर में इसे ढील दे कर पतंग काटने की बात कही जाती है l प्याज और जूते का नैरेटिव भी इस में चाहें तो जोड़ सकते हैं l राहुल गांधी की मनोदशा और उन की बयान बहादुरी की शेख़ी भी l

मोदी की यह निराली अदा है l

दिल्ली में काकरोच जनता पार्टी , सोनम वांगचुक और इस बहाने अनेक रंग बिरंगे साँप मोदी सरकार के हाथ लग गए हैं l अब कटी पतंगों को उड़ते और गिरते हुए देखने का लुत्फ उठाने का समय आ गया है l

तो कल ही मोदी सरकार का इस्तीफ़ा हो गया होता

दयानंद पांडेय


निरंतर झूठ बोलने के अभ्यस्त राहुल गांधी कल की प्रेस कांफ्रेंस में बहुत से झूठ के साथ एक बहुत ही शातिर सा झूठ भी बोल गए l हंसते हुए बोले कि पुलिस वाले मुझे घसीट कर भले ले गए , पंच मारा, पर कान में कह रहे थे कि आप इस सरकार को हटा दीजिए l एक नहीं कई पुलिस कर्मी l कोई हरियाणा का , कोई कहीं का l सचमुच अगर वह पुलिस कर्मी इस सरकार को हटाने के इच्छुक थे तो उन के लिए बहुत आसान था कि कल की खींचा तानी में राहुल गांधी को गोली मार देते l जैसे कभी इंदिरा गांधी को उन के घर में ही मार दिया था l जैसे श्रीलंका में राजीव गांधी को एक सैनिक ने बंदूक की बट से मारा था l कहा था कि झाड़ू भी हाथ में होता तो भी मार देता l बिना किसी इफ बट और बिना किसी देरी के मोदी सरकार का इस्तीफ़ा हो जाता l राहुल गांधी शहीद हो जाते l कांग्रेस के पक्ष में देश में तूफ़ान आ जाता l जनता मोदी को मारने के लिए दौड़ा लेती l बिल्कुल श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल की तरह l जैसी की राहुल गांधी की इच्छा भी है l मनोकामना भी l

बहरहाल, राहुल के इस शातिर झूठ की तस्दीक़ में किसी पुलिस वाले की राहुल के कान में कुछ बोलते हुए कोई वीडियो , फ़ोटो मैं ने तो नहीं देखी l किसी ने देखी हो तो बताए भी l

सच यह है कि राहुल गांधी का संसदीय राजनीति और संसदीय गरिमा से कोई परिचय नहीं है l हंगामा खड़ा करना ही उन का मक़सद है l संसद हो या संसद से बाहर l देश हो या परदेस l संसद चलती है तो वह टपोरियों की तरह संसद के बाहर चमचों के साथ सीढ़ियों पर बैठे चाय पीते रहते हैं l संसद में कभी जाते हैं तो लोगों को अराजकता के लिए उकसाते रहते हैं l नियम से विपरीत उल्टी सीधी बात करते हैं l अपना मज़ाक उड़वाते रहते हैं l जेन जी की हिंसा से उन्हें बहुत उम्मीदें हैं l संसदीय चुनाव से नहीं l राहुल अपने सामंती आचरण में हर किसी को अपना ग़ुलाम मानते हैं l सत्ता पक्ष हो , विपक्ष हो , कोई संस्था हो , हर किसी को बंधुआ बना कर रखने की उन की ख़्वाहिश उन्हें कहां से कहां बहा ले गई है , उन्हें पता ही नहीं l कल उन्हें सड़क पर पुलिस ने घसीटा है , बहुत जल्दी संसद में उन्हें संसद का मार्शल घसीटेगा l सत्ता से दूर रख कर जनता घसीट ही रही है l

पप्पू से घसीटा राम होने में बहुत देरी नहीं है l अब तक के भारतीय संसदीय इतिहास में ऐसा अपमानित और अराजक नेता प्रतिपक्ष कोई एक दूसरा नहीं देखा l ब्रिटिश राज में भी नहीं l कि पुलिस को घसीटना पड़े l पुलिस आई तो गांधी हों , नेहरू हों या कोई और सब ने अपनी गरिमा बनाए रखी l पुलिस के साथ शांति से चल पड़े l इमरजेंसी में भी सभी बड़े नेता गरिमा पूर्वक चल दिए l बाद में जनता राज में इंदिरा गांधी भी l रथ यात्रा में आडवाणी भी शांति से पुलिस के साथ चल दिए l बाद के दिनों में अराजक लालू भी बारंबार l अभी ही अपनी यादवी लंठई के लिए परिचित ऐ पुलिस ! बोलने वाले अखिलेश यादव भी बस में बैठ कर हंसते हुए पूछ रहे थे कि पुलिस भाई कहां ले जा रहे हो ! क़ायदे के अपराधी भी अब पुलिस से रगड़ा-रगड़ी नहीं करते l चुपचाप पुलिस के साथ चल देते हैं l

लेकिन अराजक और हिंसक राहुल गांधी ?

लगता है कभी कोई पंच नहीं खाया l खाया होता पुलिस का पंच तो उठ कर खड़े होने लायक़ नहीं रहते l झूठ पर झूठ बोलने लायक़ बिल्कुल नहीं l छीना झपटी में नाक रगड़ खा कर लाल हो गई तो चमचे नाक से बहता ख़ून दिखाने लगे l मुझे तो पट्ठे के मार्शल आर्ट पर भी संदेह होता है l

Monday, 6 July 2026

शुक्लाइन चाची की कहानियों का स्वर और स्वाद

 दयानंद पांडेय 

जैसे कोई शिक्षक किसी छात्र की ग़लती पर पतली सी छड़ी सटाक से मार दे। माधुरी महाकाश की कहानियां ऐसे ही सटाक से छड़ी मारती चलती हैं। सटाक-सटाक ! ज़रा-ज़रा सी बात पर यही ध्वनि। लेकिन जैसे शिक्षक की वह छड़ी छात्र को अच्छे नंबर से पास करने की कड़ी और लड़ी बन कर अचानक उपस्थित हो जाए तो छात्र का बड़ा सा दुःख , अनिर्वचनीय सुख में बदल जाता है। ठीक वैसे ही माधुरी महाकाश की कहानियों में छाया अकुलाया उदासी का बीज अचानक सारे पत्थर तोड़ते हुए हरे पौधे के रूप में उपस्थित हो कर हर्ष के पुष्प और फल में तब्दील हो जाता है। गदराया हुआ। कहानियों का उदास और हताश विवरण जैसे सावन का बादल बन उमंग की बौछार बन कर बरसने लगता है। माधुरी की कहानियों की कुल तासीर यही है। कहानी का अंत सुखद पड़ाव की ओर सहसा मुड़ जाता है। माधुरी महाकाश के कहानी संग्रह शुक्लाइन चाची की लगभग सभी कहानियों का स्वर और स्वाद यही है। जैसे किसी लैंपपोस्ट की दिपदिपाती लाइट में बच्चे पढ़ रहे हों , माधुरी महाकाश की कहानियां अपने पात्रों के मन को पढ़ती मिलती हैं। पुरुष कथाकार ऐलानियां तौर पर स्त्री मन को पढ़ने की लालसा , अभिलाषा में दुबले होते रहते हैं। माधुरी महाकाश बिना किसी ऐलान के पुरुष मन को पढ़ती हैं। पुरुष मन और मनोविज्ञान को बांचती हैं और किसी विद्यार्थी की तरह इस इबारत को आहिस्ता से लिख देती हैं। यह आहिस्ता ही माधुरी महाकाश की कहानियों की बड़ी ताक़त है। ऐसे जैसे रात की नीरव शांति में कोई आकाश में चमकते तारे गिन रहा हो मन ही मन। और अचानक कोई तारा टूट कर गिर पड़े। यह तारे का टूट पड़ना ही , माधुरी की कहानी का हासिल है। जैसे कोई एक शेर किसी ग़ज़ल का हासिल हो। 

कई बार लगता है कि माधुरी कहानी नहीं , इमला लिख रही हों। पात्र बोल रहे हों , वह सर झुका कर लिख रही हों। बिना कोई हस्तक्षेप किए। बिना कोई सवाल जवाब किए। माधुरी जिस बेबाकी और सहजता से इमला लिखती मिलती हैं अपनी कहानियों में वह आसान नहीं है। इमला मतलब कथा में लेखक का कोई हस्तक्षेप नहीं है। जैसा कि अमूमन कहानियों में कथाकार करते मिलते हैं। शायद इसी लिए माधुरी की कथाओं में विवरण बहुत हैं। कह सकते हैं कि माधुरी विवरण प्रिय कथाकार हैं। रेशे-रेशे का विवरण रखती हैं। कहानी लंबी होती जाती है तो हो जाए। अपनी बला से। माधुरी लेकिन विवरण बताने में कोई कंजूसी नहीं बरततीं। हर चीज़ बता देना चाहती हैं। कुछ भी मिस नहीं होने देतीं। राजमा चावल बनाया है तो खिलाए बिना नहीं छोड़ने वाली कहानी में। चाय पकौड़ी ठेले से आई है तो क्या। खानी है वह भी। शुक्लाइन चाची कुंभ के मेले में नहाने समय डुबकी मार कर हेरा गई हैं। लोग हैरान हैं। तो क्या आख़िर में चौबाइन की शॉल ढलका कर , क्रीम रंग की शॉल ओढ़ कर मंद-मंद मुस्कुराती खड़ी भी मिलती हैं। बालू लिपटे पेटीकोट और भीगे ब्लाऊज में पगलिया बन कर घूमने वाली चाची का त्रास और निराश भाव जैसे क्रीम कलर की शॉल में औचक सौंदर्य बन कर कहानी के विवरण में ऐसे उजास भरता है जैसे घने बादल बीच अचानक सूर्य उपस्थित हो जाए। घर , घर के भीतर की बतकही को कहानी में ढाल लेने की कला किसी को सीखनी हो तो माधुरी महाकाश से सीखे। कुछेक अपवाद छोड़ दें तो माधुरी की कहानियों की सीमा भी यही है। घर , देहरी ,आंगन नहीं छोड़तीं वह। शायद इसी लिए माधुरी की कहानियां किसी एजेंडे के फ्रेम से बहुत बाहर हैं। किसी विमर्श के फंदे में भी नहीं हैं। चौंकाती भी नहीं हैं। कछुआ चाल चलती हुई जाने कितने खरगोशों को पछाड़ कर कहानी की लय को साध लेती हैं। किसी साधक संगीतकार की तरह। 


गजमुक्ता कहानी में प्रेम , दान और लालच का क्या ही कलेवर है। श्राद्ध की श्रद्धा कैसे एक लालची ब्राह्मण छीन लेता है। ख़ुद खाने का ठिकाना नहीं पर दान में दरवाज़े पर बंधी हाथी मांग लेता है। गजमुक्ता का अपने स्वामी के प्रति अथाह प्रेम का वर्णन भी माधुरी की वर्णन प्रियता में माधुर्य का अनिर्वचनीय पाठ उपस्थित करता है। कहानी में छोटे-छोटे वर्णन और प्रसंग भी कहानी को एक नया रंग देते हुए बड़ी से बड़ी बात कह जाते हैं। समाज के प्रति माधुरी का ऑब्जर्वेशन भी कहानी के संवादों में , वर्णन में स्पष्ट झलकता रहता है। ऐसे जैसे किसी झील के जल में वृक्ष की मनोहर छाया हो। जल के कल-कल में पक्षी का कलरव हो। जल की गहनता में स्त्री का सौंदर्य छलकता हो। मायके की मनुहार में पगी लीलावती कहानी में पति की ससुराल की चुस्की भर मुस्की के रंग के भी क्या कहने। छोटे-छोटे सुख और दुःख की देहरी कब पीपल का पात की तरह हिलती डुलती परात में पांव धोने की परंपरा से प्रीत का सुगंध का एक नया ही बिरवा रच जाती है। माधुरी की कहानियों में माटी की महक किसी इत्र से भी ज़्यादा रची-बसी है। पूर्वी उत्तर प्रदेश की माटी की यह महक नोएडा , दिल्ली की सरहद छू कर भी अपनी माटी में किसी ज़िक्र की तरह लौट आती है। पुरवा हवा में लिपट कर लहक जाती है। आजी , मधुमालती , सखी भी ऐसी ही कहानियां हैं जिन में माटी की खनक भी है और लोच भी। माधुरी अपनी इन कहानियों में जैसे कोई संगीत रचती चलती हैं। खटका , मुरकी , आरोह , अवरोह अनायास माधुरी की कहानियों के सुर और साज़ में समाते जाते हैं। किसी स्त्री की पायल की तरह , कांच की चूड़ी की तरह खनकते सुर कहानी की कब कमानी बन जाते हैं , कब मेरुदंड , पाठक जान ही नहीं पाता। बस एक आलाप ले कर रह जाता है। अचानक। घर गृहस्ती की चक्की में उलझी स्त्री या पुरुष ही माधुरी की कहानी में नहीं है बोर्ड परीक्षा की ब्लैक ब्यूटी भी है। इस का अलग ही रंग है। पुरुष मन की थाह और उस के मनोविज्ञान की पड़ताल तो माधुरी की कहानियों का मुख्य स्वर है ही , बाक़ी समाज का भी थर्मामीटर है। स्त्री उस की सीढ़ी। इस सीढ़ी पर चढ़ कर ही वह बहुत आहिस्ता से शानदार कथाकार बन जाती हैं। यह आहिस्ता ही माधुरी महाकाश की कहानियों की पृथ्वी है। माधुरी की यह पृथ्वी घूमती रहती है। निरंतर घूमती हुई भाषा की चाशनी में कठोर से कठोर बात बड़ी मुलायमियत से कह जाती है। गजमुक्ता कहानी की इस एक पंक्ति पर गौर कीजिए : 

आधी आबादी तो ऐसा ब्लाऊजपीस दान में देती है कि इमरजेंसी पड़ जाए और छन्नी ना मिले तो चाय भी छन जाए। 

माधुरी महाकाश की कहानियां सचमुच आधी आबादी का वही दान वाली ब्लाऊजपीस हैं जो समाज को क़दम-कदम पर बिना कुछ अतिरिक्त कहे अनायास छानती रहती हैं। पुरुष मनोविज्ञान को अपनी कहानी की ही तरह बेसन में लपेट कर पकौड़ी की तरह छान कर परोस देती हैं। गरम-गरम। चुटीली भाषा में जादू और कसाव , संवादों में कांटों जैसा नुकीलापन और कथ्य में सुमन जैसी सुगंध ही माधुरी महाकाश की कहानियों का स्वर है और स्वाद भी। उन की कहानियों का माधुर्य भी यही है। 








समीक्ष्य पुस्तक :

शुक्लाइन चाची 

लेखक : माधुरी महाकाश 

प्रकाशक : हिंद युग्म ब्लू 

सी -31 , सेक्टर - 20 नोएडा - 201301 

मूल्य : 249 रुपए 

पृष्ठ संख्या  : 211

संस्करण : 2026