Friday, 16 October 2026
अपने-अपने युद्ध का बाइसवां संस्करण
Friday, 2 October 2026
कुतर्क की कुत्तागिरी की कोई हद नहीं
दयानंद पांडेय
वह कौन कृतघ्न और घृणित लोग हैं जिन्हों ने स्मित मच्छार के साहस और शौर्य को सैल्यूट नहीं किया l सैल्यूट ? अरे इस घटना की नोटिस तक नहीं ली l सिर्फ़ इस लिए कि हमलावर को-पायलट मुस्लिम जेहादी था l किसी मुस्लिम संगठन , ओवैसी आदि तो छोड़िए, कांग्रेस , सपा जैसी सभी सेक्यूलर सूरमा पार्टियां भी इस बाबत कब्रिस्तान जैसी ख़ामोशी अख़्तियार किए बैठी हैं l
ऐसे जैसे कुछ घटा ही न हो l और तो और कुछ श्वान तो स्मित मच्छार की मजम्मत में भी उपस्थित हो गए हैं l पूछ रहे हैं कि नेतन्याहू को कैसे यह सब पता चल गया ? और तो और मोदी ने बिना सोचे समझे कैसे नेतन्याहू को आँख बंद कर फालो कर लिया ? अजब-ग़ज़ब सवाल हैं इन श्वानों के l
स्मित मच्छार का दोष सिर्फ़ इतना है कि एक तो वह हिंदू है , तिस पर ब्राह्मण l गुजराती भी l हनुमान चालीसा पढ़ने की बात बताई है उस कठिन घड़ी में , स्मित मच्छार ने l हनुमान चालीसा की ताक़त का बखान किया है स्मित ने l भगवत गीता की बात की l यह सब कहां बर्दाश्त होगा इन अभागों को l फिर ओमान के उस जेहादी को-पायलट के प्लान को क्यों नाकाम कर दिया l कुतर्क की कुत्तागिरी की कोई हद नहीं है l स्मित मच्छार ने अपनी जान पर खेल कर कैसे इतने सारे लोगों को बचा लिया , सारे भौंकते हुए सवाल इसी पर है l या फिर ख़ामोशी !
अल्ला हो अकबर ! का नारा उस ओमान के जेहादी को-पायलट ने ही नहीं , यह सारे कृतघ्न और घृणित लोग भी लगा रहे हैं l बस शब्द बदल गए हैं l भाव और जेहाद वही हैं l
सब से ज़्यादा अविश्वसनीय वोट बैंक कोई है तो दलित ही है
लेकिन सवर्णों में खलबली बहुत है , इस के दुरुपयोग को ले कर l
- - - -गोदी मीडिया कहे जाने वाले लोग भी लगातार उबाल खा रहे हैं l दलित एक्ट को मोदी एक्ट कहते हुए l
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समय रहते सचेत नहीं हुई भाजपा तो सारे किए कराए पर पानी फिर सकता है l
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फिर ऐसा भी नहीं है कि दलित वोट भाजपा के साथ सन्नद्ध हो गया हो l सब से ज़्यादा अविश्वसनीय वोट बैंक कोई है तो दलित ही है l यह किसी भी का नहीं , सिर्फ़ अपने स्वार्थ का है l
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हर किसी को लात मारने का अभ्यस्त l
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ऐसा कोई मित्र नहीं है , मेरे पास l
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फिर सत्ता पर सवार लोग मित्र कहां रह पाते हैं l सत्ता ? अरे पत्रकारिता में ही पद पाते ही लोग अपरिचित हो जाते हैं l भले किसी समय आप से कलम पकड़ना सीखे हों l
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जो भी हो , मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों को एक संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस कर अपनी बात न रखने से , नुक़सान हुआ है l बहुत नुक़सान l
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( एक मित्र से वाट्सअप पर बतकही के कुछ टुकड़े l )
Friday, 25 September 2026
राहुल गांधी नाम की सुलगती रस्सी
दयानंद पांडेय
राहुल गांधी का एक और हवाई फ़ायर
दयानंद पांडेय
Thursday, 24 September 2026
दुर्योधन और तुग़लक़ का मिला जुला कोलाज हैं राहुल गांधी
दयानंद पांडेय
Wednesday, 23 September 2026
सत्ता के नशे में प्याज और जूते दोनों खाने की लत
दयानंद पांडेय
Saturday, 5 September 2026
राजनीति और समाज में दलित ब्लैकमेलिंग का अनूठा रिकार्ड
दयानंद पांडेय
Saturday, 29 August 2026
पूर्णम में अभिनय के नीलकंठ अनिल रस्तोगी
दयानंद पांडेय
एक शानदार अभिनेता जब अपने अभिनय से किसी नाटक को छू देता है तो उसे पारस बना देता है। अनिल रस्तोगी ऐसे ही अविरल अभिनेता है। अभी बीते शनिवार दर्पण द्वारा प्रस्तुत जब पूर्णम नाटक में अनिल रस्तोगी को नीलकंठ उपाध्याय की भूमिका में देखा तो पाया कि वह अभिनय नहीं कर रहे हैं , साक्षात नीलकंठ उपाध्याय बन गए हैं। अनिल रस्तोगी अभिनेता तो कोई और हैं। यह तो नीलकंठ उपाध्याय ही हैं। नीलकंठ उपाध्याय उन के भीतर बैठ गए हैं। पूर्णम की कथा भी बिलकुल अलहदा है। स्वार्थ की सिद्धि में निष्णात एक परिवार है। मां है , बेटा और बहू है। बेटा उलटे सीधे काम कर नंबर दो की संपत्ति बटोर कर जांच एजेंसियों की नज़र में चढ़ गया है।
नाटक की शुरुआत ही एक फोन से होती है जिस में बेटे का कोई दोस्त उसे जांच एजेंसियों से सावधान करता है। कहता है कि जैसे भी हो अपनी नंबर दो की संपत्ति कैश , ज्वेलरी सब हटा दे। जांच के लिए टीम कभी भी उस के घर छापा डाल सकती है। उस का फोन भी सर्विलांस पर है। आदि इत्यादि। परिवार के तीनों सदस्य मां , बेटा और बहू दहशत में आ जाते हैं। पूरे घर को एक सांघातिक तनाव घेर लेता है। ज़रा-ज़रा सी आहट पर तीनों कांप-कांप जाते हैं। हर फोन , दरवाज़े पर हर आहट , हर घंटी उन्हें बेचैन कर देती है। मां , बेटा , बहू लड़ने और डरने में व्यस्त हैं कि काल बेल बजती है। मां दरवाज़ा खोलने जाती है तो अचानक चिल्लाती हुई लौटती है , ' बेटा , तुम्हारे पिता जी ! ' असल में नीलकंठ उपाध्याय की वापसी परिवार में स्वार्थ संधियों की वापसी है। रिसते-छीजते संबंधों में जो भावनात्मक आश्वस्ति थी , उस के टूटने का उदघोष है पूर्णम नाटक में नीलकंठ उपाध्याय की वापसी। जिस पर अब कोई पैबंद लगा कर छुपा पाना नामुमकिन हो गया है। नंबर दो की अवैध संपत्ति की रक्षा के लिए रक्त के संबंध को कैसे तार-तार करने को उद्धत और प्रतिबद्ध है नई पीढ़ी। सुविधाओं की सीढ़ी पति से ज़्यादा ज़रूरी है। नीलकंठ उपाध्याय की परिवार में वापसी हर्ष नहीं , उन के बलि का सबब बन जाती है। ऐसे जैसे वह किसी बकरीद का बकरा हों , यह नीलकंठ उपाध्याय को भी नहीं मालूम। अपमान और अपराध का विष पिलाने के लिए उन्हें पूरा परिवार तैयार खड़ा है। इस विष पीने के अभिनय को अनिल रस्तोगी ने एक नया आयाम दे दिया है पूर्णम में। बिलकुल किसी सदाबहार हवा की तरह।
कंधे पर झोला लटकाए , हल्की दाढ़ी बढ़ाए , बिखरे बालों वाले अस्त-व्यस्त यह नीलकंठ उपाध्याय हैं। जो छत्तीस बरस बाद घर लौटे हैं। पूरा घर सन्नाटे में आ जाता है। घर के किसी भी सदस्य के चेहरे और हाव-भाव में खुशी या चहक नहीं है। पत्नी के भी नहीं। बहू को छोड़ कर मां-बेटे के चेहरे पर तो लगभग घृणा और नफ़रत के भाव हैं। पत्नी तंज में और कर्कश आवाज़ में कहती भी है कि बुढ़ापा काटने के लिए आए हैं। बेटा भी भन्नाया रहता है। एक दृश्य में तो पत्नी खल में तेज़-तेज़ अदरक या कुछ और कूटती हुई अपनी सारी भड़ास निकालती रहती है पति यानि नीलकंठ उपाध्याय की घृणा में लथपथ। इमामदस्ता में ऐसे कूटती है गोया वह कोई वस्तु नहीं , नीलकंठ उपाध्याय को कूट रही हो। नाटक में एक साथ दो माहौल समानांतर चल रहे होते हैं। एक छापे का डर , दूसरे नीलकंठ उपाध्याय की उपेक्षा और उन के भगोड़ा रूप का दंश। इसी बीच एक ट्रांसपोर्टर जो बेटे का दोस्त बताते हुए घर आता है , कि जो भी नकदी , ज्वेलरी जो घर में है सब को कहीं शिफ्ट करना है। लेकिन घर के लोग उस पर यकीन नहीं करते। उन्हें लगता है कि यह कोई जांच टीम का आदमी है , घर की संपत्तियां जान लेना चाहता है। बेटे का फोन नहीं मिलता कि तस्दीक हो सके कि कौन है ? इस बीच नीलकंठ उपाध्याय अचानक घर के भीतर से निकल कर उस ट्रांसपोर्टर से निपटते हैं। उस का गिरेबान पकड़ कर कहते हैं कि हमारे खून में ऐसा काला धब्बा नहीं हो सकता कि उस के पास नंबर दो की संपत्ति हो। और उसे घर से बाहर कर देते हैं। बेटा लौट कर घर आता है और बताता है कि ट्रांसपोर्टर को उस ने ही भेजा था।
बाद की कथा में नीलकंठ अपने 36 बरस लापता होने की कथा बताते हैं। कि कैसे उन का अपहरण हो गया। फिर साज़िशन उन की ही गिरफ्तारी हो गई विभिन्न आरोपों में। तस्करी तक के आरोप लगे। म्यांमार सहित विभिन्न जेलों में सजा काट कर 36 बरस बाद वह घर लौटे हैं। घर में अचानक भावुकता भरा माहौल बन जाता है। बेटा पिता से गले लग कर विह्वल हो जाता है। पत्नी भी लिपट कर रोने लगती है। बहू पहले ही से नीलकंठ उपाध्याय के प्रति भावुक है। अब पूरा घर नीलकंठ उपाध्याय के दुःख में शरीक है। उन के प्रति सहानुभूति की लहरें ऐसे उठती हैं , गोया सागर की लहरें। अचानक बेटा घर के भीतर जाता है। वापस आता है तो नाटक अचानक करवट ही नहीं लेता , पूरा पलट जाता है। सब कुछ तहस-नहस हो जाता है।
बेटा एक लंबा पत्र टाइप कर के ले आता है। पत्र जांच एजेंसी को संबोधित है। पत्र में सारी अवैध संपत्तियों के लिए ज़िम्मेदार नीलकंठ उपाध्याय ने खुद को मान लिया है। बेटा , पिता को पत्र पढ़ कर सुनाता है। फिर पिता को डिक्टेट करता है , चीखते हुए कहता है , इस पर दस्तखत कीजिए। नीलकंठ उपाध्याय अचानक इस बदलाव से सकते में हैं। अचानक बेटे से यह पत्र पत्नी ले लेती है। लगता है जैसे पत्नी , पति का पक्ष लेगी। लेकिन नहीं , वह दांत पीसती हुई नीलकंठ उपाध्याय के प्रति आक्रामक हो जाती है। चीखती हुई कहती है कीजिए साइन ! नाटक में अचानक आए इस बदलाव से नीलकंठ उपाध्याय ही नहीं दर्शक भी सकते में आ जाते हैं। नीलकंठ उपाध्याय पत्र पर दस्तखत करते हुए सारी ज़िम्मेदारी ले लेते हैं और स्वगत संबोधन के बाद पूर्णम कह कर हाथ जोड़ लेते हैं। ऐसे जैसे अपने 36 बरस की अनुपस्थिति का गड्ढा भर दिया हो। जैसे पिता और पति के रूप में विष ही पीने के लिए उपस्थित हैं। इतना कि उन का अभिनय ही नीलकंठ बन जाता है। विषपायी नीलकंठ।
समूचे नाटक में अनिल रस्तोगी इस तरह छाए रहते हैं कि जैसे दिन में धूप , रात में चांदनी और सावन में बरसात। अभिनय की बरसात। अनिल रस्तोगी को विभिन्न नाटकों में पिता की भूमिका में देख चुका हूं। पर वह किसी भी नाटक में खुद को दुहराते नहीं। विभास , आखिरी वसंत , डैडी , कन्यादान , तुम , अपने ही जीवन पर आधारित नाटक बियांड द कर्टेन और अब यह पूर्णम। हर नाटक में अनिल रस्तोगी अभिनय के अपने ही बनाए सांचे को जैसे तोड़ देते हैं। अपने अभिनय यात्रा की नाव को हर बार जला देते हैं। एक नई नाव , एक नए सांचे के साथ वह अगले किसी नाटक में खड़े मिलते हैं। उन की नित नई इस अभिनय यात्रा पर एक पूरी किताब लिखी जा सकती है। उन के भावावेग , उन के मुखाभिनय , उन के चलने और संवाद अदायगी के अंदाज़ कैसे तो अचानक करवट ले लेते हैं , ऐसे जैसे बल खाती कोई नदी अचानक अपनी धारा बदल दे। ऐसे जैसे किसी रूपसी की ज़ुल्फ़ें अपने ही ख़म में किसी को उलझा ले।
लखनऊ के विश्वेश्वरैया प्रेक्षागृह में मंचित लेखक और निर्देशक शुभदीप राहा के नाटक पूर्णम में अनिल रस्तोगी का अभिनय कई मामलों में इस लिए भी बेमिसाल रहा कि वह नाटक के परिदृश्य में कुछ विलंब से उपस्थित हुए पर जब उपस्थित हुए तो फिर उन के अभिनय के सूर्य में सभी समा गए। राजकुमार अभिनीत फिल्म काजल की याद आ गई। काजल में इंटरवल के ठीक पहले अभिनेता राजकुमार उपस्थित होते हैं। डूब रही नायिका मीना कुमारी को बचा कर हाथों में लिए हुए। फिर समूची फिल्म राजकुमार के हिस्से दर्ज हो जाती है। पूर्णम में भी यही हुआ। अनिल रस्तोगी के दृश्य में आने के बाद पूरा नाटक उन के खाते में दर्ज हो गया। अनिल रस्तोगी के अभिनय की आंधी में सभी समा गए। पूर्णम में अनिल रस्तोगी के अभिनय में जो ठहर कर देखने की अदा है , अंगाभिनय है , संवाद अदायगी का जो आहिस्ता-आहिस्ता वाला अंदाज़ और उस के अचानक ठहराव का कोलाहल है , वह मथ कर रख देता है। पूर्णम में अभिनय के यह ठहराव का ठाट ही अनिल रस्तोगी के अभिनय को आख़िरी वसंत से आगे ले कर निकल जाता है। लाइटर आन द लिप्स में डॉन बने अभिनेता अनिल रस्तोगी , पूर्णम के नीलकंठ उपाध्याय की यात्रा भी कर सकते हैं , यह देखना ही रोमांचकारी और रहस्यमय दोनों है। ताजमहल का टेंडर भी याद आता है। कई बार सोचता हूं कि अगर अनिल रस्तोगी के अभिनय को इब्राहिम अल्काजी का निर्देशन मिला होता तो क्या मंज़र होता। फिर भी अनिल रस्तोगी के अभिनय को निर्देशक राज बिसरिया , उर्मिल कुमार थपलियाल और सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ ने गज़ब का रंग दिया है। इस को हम कैसे भूल सकते हैं भला। कोई 41 बरस से तो मैं ही अनिल रस्तोगी के अभिनय की रौशनी में भीग रहा हूं। नाटक हो , धारावाहिक हो , फिल्म हो , हर कहीं वह अपने अभिनय की अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हरीशचन्नर की लड़ाई के कमिश्नर हों या कथा शिवपालगंज के वैद्य।
पूर्णम की पूर्णता में पत्नी की भूमिका में चित्रा मोहन के अभिनय ने नीलकंठ उपाध्याय के चरित्र को जो ऊंचाई और संस्पर्श दिया है वह अनूठा है। चित्रा मोहन और अनिल रस्तोगी की जोड़ी अभिनय में पहले भी बाकमाल रही है पर पूर्णम में बिलकुल नए शेड में उपस्थित थी यह जोड़ी। बहू की भूमिका में अलका विवेक , बेटे इंदर की भूमिका में अंबरीश बॉबी और जगताप की भूमिका में संजय देगलूलकर का अभिनय भी शानदार था।
असल में हयबदन के अभिनेता अनिल रस्तोगी के अभिनय के अनेक आयाम हैं। अनेक रंग हैं। अनिल रस्तोगी के अभिनय का रुआब किसी एक नाटक से हम तय नहीं कर सकते। पर 70 से अधिक फिल्मों में काम कर चुके अनिल रस्तोगी का नाटक पूर्णम उन का 101 वां नाटक है तो यह अनायास नहीं है। पद्मश्री से सम्मानित होने के बाद उन के अभिनय में यह निखार हमें एक गहरी आश्वस्ति देता है कि हम उन के नित नए नाटकों से आगे भी मुखातिब होते रहेंगे। कविता चौधरी के धारावाहिक उड़ान में एस एस पी की उन की भूमिका जब अजय देवगन की रेड में मंत्री के रूप में उपस्थित होती है तो समझ आता है कि अनिल रस्तोगी के अभिनय का फलक कितना विस्तृत और अनुपम है। पूर्णम तो बस एक पड़ाव है , मंज़िल नहीं। अनिल का एक अर्थ प्रकाश भी है। तो अनिल रस्तोगी के अभिनय की रौशनी में हम सब को आगे और भी नहाना है। पूर्णम तो बस एक बहाना है। वैज्ञानिक रहे डाक्टर अनिल रस्तोगी की रंग यात्रा में अभिनय के अनेक रंग उन की प्रतीक्षा में हैं।
Wednesday, 26 August 2026
यह झूठ है कि अंबेडकर द्वारा दिया गया पानी मदन मोहन मालवीय ने नहीं पिया
दयानंद पांडेय
अपनी घृणा में लथपथ कितना तो कम जानते हैं आप मदन मोहन मालवीय के बारे में l जानते तो रमेश भाटी के इस विष में अपना विष भी न मिलाते l आप हाला कि सब जानते हैं पर अपने एजेंडे में इतना व्यस्त , न्यस्त और त्रस्त हो चुके हैं कि तथ्य से आप का अब कुछ लेना देना नहीं रह गया है l कान के लिए कौए के पीछे भागने की लत लग गई है आप को l
मदन मोहन मालवीय और अंबेडकर की उम्र का फर्क जानते हैं ? मदन मोहन मालवीय और गांधी की उम्र का फर्क जानते हैं ? मदन मोहन मालवीय इन दोनों से न सिर्फ़ उम्र में बड़े हैं , काम में भी बहुत बड़े हैं l बस प्रचार के दुकानदार नहीं हैं l जब गांधी और अंबेडकर परिदृश्य में भी नहीं थे तब मदन मोहन मालवीय ने कलकत्ते से अछूतोद्धार आंदोलन शुरू किया था और बहुत सफल रहा था l प्रोफ़ेसर मुकुट बिहारी द्वारा लिखित मदन मोहन मालवीय की जीवनी कभी पढ़िए l मालवीय जी के तमाम काम आप को मालूम हो जाएंगे l
एक वाक़या है बाबू जगजीवनराम का l जगजीवनराम बी एच यू में पढ़ते थे l हॉस्टल में रहते थे l मदन मोहन मालवीय को मालूम हुआ कि जगजीवन राम मेस में नहीं खाते l उन की थाली भी अलग है l उन का भोजन उन के कमरे में दे दिया जाता है l मदन मोहन मालवीय एक दिन भोजन के समय हॉस्टल आए l जगजीवन राम को उन के कमरे से लिवा कर मेस में आए l उन के साथ बगल में बैठ कर न सिर्फ़ भोजन किया बल्कि सब को साथ बिठाया l सब ने साथ भोजन किया l फिर मदन मोहन मालवीय ने जगजीवन राम की थाली भी ख़ुद धोई l
दूसरे दिन से जगजीवन राम मेस में सब के साथ सामान्य ढंग से भोजन करने लगे l माहौल बदल गया था। ऐसे अनेक काम हैं दलित उद्धार और छुआछूत के ख़िलाफ़ मदन मोहन मालवीय के l और आप का प्रिय भाटी बता रहा है कि आंबेडकर का दिया पानी नहीं पिया मालवीय ने और इस बेसिर पांव की बात को ले कर आप अपनी घृणा में ले कर उछल पड़े हैं।
रमेश भाटी तो जहरीला और अनपढ़ आदमी है पर आप को अभी तक पढ़ा लिखा आदमी मानने के लिए मेरा विवेक कहता है l फिर भी बड़े सम्मान और आदर के साथ आप को चुनौती दे कर पूछता हूं कि अंबेडकर द्वारा दिया गया पानी मदन मोहन मालवीय ने पीने से इंकार कर दिया , इस का कोई प्रामाणिक आधार है , आप के पास तो कृपया उपस्थित कीजिए l जानता हूं, आप अपने एजेंडे के तहत ऐसा नहीं कर सकेंगे l इस लिए भी नहीं कर सकेंगे कि इस का कोई आधार या प्रमाण नहीं है दुनिया में l अपने एजेंडे के जहर के प्रभाव में इस कमेंट की नोटिस नहीं लेंगे। इस लिए भी कि लोकतंत्र और संवाद में अब आप का यकीन नहीं रहा। सिर्फ अपनी गोलबंदी के कुएं में ही आप कैद हो कर रह गए हैं। फासिज्म की इंतिहा है यह।
आप नहीं जानते और स्वीकारते तो यह एक तथ्य और जान लीजिए कि मदन मोहन मालवीय महात्मा गांधी के मेंटर थे l गांधी ने यह ख़ुद स्वीकार किया है l गांधी वांगमय में संकलित चिट्ठियों में लिखा है , गांधी ने l स्वदेशी आंदोलन और हरिजन प्रेम गांधी ने मदन मोहन मालवीय से सीखा l स्वदेशी आंदोलन के जनक हैं मदन मोहन मालवीय l उस समय न सिर्फ़ स्वदेशी आंदोलन शुरू किया मालवीय ने बल्कि मुकदमा कर अंग्रेजों को प्रति वर्ष इंग्लैंड भेजी जा रही अंग्रेज़ों को पाँच करोड़ की पेंशन बंद करवा दिया l चौरीचौरा कांड के 99 प्रतिशत को फाँसी की सज़ा से ही नहीं , बाईज्जत बरी करवा दिया l अंबेडकर ने किसी एक भी स्वतंत्रता सेनानी को कभी छुड़ाया ? कोई मुकदमा लड़ा ? थे तो वह भी बैरिस्टर ही। लेकिन दुर्भाग्य कि लोग सिर्फ बी एच यू के लिए जानते हैं मदन मोहन मालवीय को। मालवीय जी ने सिर्फ़ बी एच यू ही नहीं बनाया l आज जो आप उर्दू मिश्रित हिंदी पढ़ते हैं , मदन मोहन मालवीय की देन है l
ऐसा बहुत कुछ है जो आप मदन मोहन मालवीय के बारे में नहीं जानते l बी बी सी वाले मधुकर उपाध्याय को तो आप जानते ही हैं l मदन मोहन मालवीय पर लिखी उन की किताब ही पढ़ लीजिए l मधुकर उपाध्याय न संघी हैं , न भाजपाई l पर आप इन दिनों अपनी घृणा में इतने लथपथ हैं कि कुछ जानने समझने का अवकाश कहां रह गया है आप के पास ?
पुन: चुनौती दे कर पूछ रहा हूं कि अंबेडकर द्वारा दिया गया पानी मालवीय द्वारा न पिए जाने का क्या प्रमाण है ? कोई प्रामाणिक दस्तावेज या कोई किताब है ? कि अंबेडकर ने कहीं लिखा है ? एक बात और जान लेनी चाहिए आप और आप जैसे घृणा और नफरत में लोटपोट लोगों को कि मदनमोहन मालवीय महान स्वतंत्रता सेनानी थे। अंबेडकर स्वतंत्रता सेनानी नहीं , अंग्रेजों के ख़ास पिट्ठू थे। गांधी ने उन्हें इस पिट्ठूगीरी से कैसे और किस कीमत पर निकाला , यह जानने के लिए भी गांधी वांग्मय पढ़िए और पूना पैक्ट के डिटेल भी।
छुट्टी लीजिए अपनी घृणा और नफ़रत से l इस फेर और कुटैव में आप अपनी रचनात्मकता बिसार गए हैं l यह बहुत ही अफ़सोसजनक है हमारे जैसे आप के प्रिय लोगों के लिए l कि आप को मदन मोहन मालवीय जैसे विराट व्यक्ति के बारे में इस तरह कीचड़ में नहाना पड़ा है l नहीं जानते तो अब से जान लीजिए कि मदन मोहन मालवीय बैरिस्टर ही नहीं , बहुत बड़े पत्रकार और संपादक भी रहे हैं l मालवीय जी के संपादक और उस की रीढ़ के बारे में सुनेंगे तो दांतों तले उंगली दबा लेंगे l मदन मोहन मालवीय के संपादक का भी एक क़िस्सा सुन लीजिए। राजा कालाकांकर रामपाल सिंह ने अंग्रेजों से लड़ने के लिए 1887 में इलाहाबाद से एक अख़बार हिंदुस्तान निकाला। मदनमोहन मालवीय को दो सौ रुपए महीने पर संपादक बनाया। जो आज के कोई बीस लाख रुपए महीने से भी अधिक ठहरेगा। अक्सर मालिकान संपादकों से शर्त रखते हैं। हिंदुस्तान में मालवीय जी ने अखबार मालिक से एक शर्त रखी कि जब भी कभी आप शराब पिए हों तो मुझे भूल कर भी नहीं बुलाएं। कोई ढाई साल तक राजा कालाकांकर ने मालवीय जी की इस बात का ख्याल रखा। और शराब पिए रहने पर कभी नहीं बुलाया।
एक रात वह यह बात भूल गए।
शराब पी ली और मालवीय जी को बुला लिया। मालवीय जी गए और उलटे पांव लौट आए । इस्तीफ़ा भेज दिया। राजा कालांकाकर ने इस्तीफ़ा स्वीकार नहीं किया। मालवीय जी फिर भी नहीं गए। पर दो सौ रुपए महीने मालवीय जी के घर राजा कालांकाकर भिजवाते रहे। यह सोच कर कि शायद मालवीय जी लौट आएं। बहुत समय बाद किसी कार्यक्रम में दोनों की भेंट हुई। मालवीय जी ने कहा कि हमने आप के अख़बार की नौकरी छोड़ दी है फिर भी आप पैसे भिजवा रहे हैं। राजा साहब ने कहा कि हमने आप को कर्मचारी नहीं रखा था। आप परिवार के सदस्य हैं। इस लिए पैसे भेजता रहूंगा। मालवीय जी फिर भी अखबार में नहीं लौटे।
जानिए कि एक समय मदन मोहन मालवीय और मोतीलाल नेहरू दोनों ही बड़े वकील थे। दस हज़ार रुपए रोज की प्रैक्टिस थी मालवीय जी की। पर अंग्रेजों से लड़ने के लिए दस हज़ार रुपए की रोज की प्रैक्टिस छोड़ दी। मोतीलाल नेहरू ने आनंद भवन बनाया इलाहाबाद में। एक-एक रुपए बटोर कर मालवीय जी ने बी एच यू बनवाया। कोई भवन नहीं। स्वत्रंत्रता संग्राम के अलावा शिक्षा , वकील , पत्रकार , स्वदेशी , हरिजनों का उद्धार , हिंदी आदि ऐसे अनेक काम हैं मदन मोहन मालवीय के। मदन मोहन मालवीय ने अंग्रेजों की लाठियां भी बहुत खाईं और जेल भी बहुत बार गए। लेकिन अंबेडकर ने न कभी कोई एक लाठी खाई , न जेल गए। पूना पैक्ट ज़रूर किया। अंबेडकर तो टाई बांध कर कार से चलते थे। अंबेडकर ब्राह्मण सरनेम है , आप जानते ही होंगे। अंबेडकर का सही सरनेम सकपाल है। मदन मोहन मालवीय बहुत गरीब परिवार से थे। घर-घर कथा बांच कर अपनी पढ़ाई का , परिवार का खर्च चलाते थे। किसी राजा बड़ौदा या अंग्रेजों के खर्च से पढ़ाई नहीं की मालवीय जी ने। मालवीय जी उपवास भी कर जाते थे कई बार। घर के लोग भी। क्यों कि घर में खाने को कुछ नहीं होता था। यह भी जानिए कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में भी मालवीय जी का क्या योगदान है l सर सैय्यद भी मालवीय जी के शिष्य हैं l बहुतेरी बातें हैं l फिर कभी l
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Vishnu Nagar भारत सरकार ने जैसे गांधी वांगमय सौ खंड में प्रकाशित किया है ठीक वैसे ही अंबेडकर वांगमय के चालीस खंड भी छापा है l इन में से किसी खंड में ऐसा कोई ज़िक्र नहीं है जिस में लिखा हो कि मदन मोहन मालवीय ने अंबेडकर का दिया पानी नहीं पिया l
इतिहास की किसी भी प्रामाणिक पुस्तक, आधिकारिक दस्तावेजों, या डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के संपूर्ण लेखन और भाषणों (BAWS) में इस तरह की किसी भी घटना का कोई उल्लेख नहीं है। यह पूरी तरह से किसी व्यक्ति द्वारा गढ़ी गई एक काल्पनिक कहानी या नैरेटिव है, जिसे भावनात्मक रंग देकर सोशल मीडिया पर वायरल किया गया है। और आप ने अपनी दुकानदारी में इसे गप्प से लपक लिया है l
अम्बेडकर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि स्कूल, बड़ौदा रियासत और कॉलेज के दिनों में उन्हें पानी छूने की मनाही थी।
डॉ. अम्बेडकर ने अपनी आत्मकथात्मक संस्मरण वेटिंग फॉर ए वीजा' में अपने जीवन के कड़वे अनुभवों (जैसे कोरेगांव में बैलगाड़ी की यात्रा, बड़ौदा में रहने के दौरान आवास मिलने में कठिनाई आदि) का जिक्र किया है, और बचपन में सार्वजनिक प्याऊ या स्कूल के बर्तन से पानी पीने को लेकर सामाजिक भेदभाव का सामना करने की बात भी इतिहास का हिस्सा है। लेकिन लंदन के गोलमेज सम्मेलन के दौरान मालवीय जी के साथ पानी की इस तथाकथित घटना का जिक्र उनकी किसी भी आत्मकथा या दस्तावेज में नहीं है।
[ एक मित्र की पोस्ट पर मेरा यह एक कमेंट। ]
ताजी सूचना यह है कि मित्र ने अपनी यह भ्रामक पोस्ट ख़ुद ही मिटा दी है l यह अच्छी बात है कि मालवीय जी की सचाई की आंच वह समझ गए l इस बीच उन्हों ने एक लिंक भी दिया कमेंट में l वह लिंक भी फर्जी निकला l मित्र विद्वान आदमी हैं l संवेदनशील कवि और पत्रकार हैं l 46 बरस पुराने मित्र हैं l आदरणीय हैं , हमारे l बस एजेंडे की नैरेटिव में फंस गए थे l अच्छी बात है कि एजेंडे से बाहर निकल गए l
Tuesday, 18 August 2026
अब पढ़ना कई बार पहाड़ लगता है : दयानंद पांडेय
दयानंद पांडेय से भवतोष पांडेय की बातचीत
स्मृति, पत्रकारिता, कथा और मनुष्य की तलाश
दयानंद पांडेय के बारे में सब से पहली अनुभूति यह होती है कि उन्हें किसी एक विशेषण में बांधना संभव नहीं। वे एक साथ पत्रकार, कथाकार, संपादक, संस्मरणकार, पाठक, मित्र और असहमत सार्वजनिक लेखक हैं। उन की सब से स्थाई चिंता मनुष्य है: उस का संघर्ष, उस का दुःख, उस की स्मृति और उस की जिजीविषा। वे अपने पात्रों को आसपास की दुनिया से उठाते हैं और उन्हें कथा में रखते हुए उन के साथ भावनात्मक संबंध बनाए रखते हैं। पत्रकारिता ने उन्हें प्रश्न पूछना सिखाया; साहित्य ने प्रश्नों को जीवन में बदलना। संपादन ने उन्हें स्मृति बचाने की जिम्मेदारी दी। विवादों ने शायद उन्हें यह विश्वास दिया कि लेखक का काम केवल सहमति पैदा करना नहीं, असहमति को भी भाषा देना है। बात ही बात में वह बताते हैं कि अब पढ़ना कई बार पहाड़ लगता है। आइए आज उन से साहित्य, पत्रकारिता, वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य और उन की विरासत पर बातचीत करते हैं।
स्मृति और आरंभ
● अपने जीवन को पीछे मुड़ कर कैसे देखते हैं? क्या कोई ऐसी घटना या अनुभव है, जिसने आप के भीतर के लेखक को सब से पहले जन्म दिया?
- बीते हुए जीवन और राह चलती स्त्रियों को मुड़-मुड़ कर देखना मेरी पुरानी आदत है। अच्छा लगता है। लेकिन जैसे कई बार पीछे से मुड़-मुड़ कर देखी जाने वाली स्त्री अचानक सामने से देखने पर निराश करती है , ज़िंदगी नहीं करती। बिलकुल नहीं करती। ज़िंदगी के सुखद पल तो याद में अच्छे लगते ही हैं , दुःखद पलों की याद भी सुख से भर देती है। ऐसी अनेक घटनाएं और अनुभव हैं। जो हैं तो दुःखद और त्रासद पर अब उन की याद सुख में डुबोती है। वह दुःख , वह संघर्ष , वह पीड़ा नहीं भोगी होती तो आज ज़िंदगी की जिस बुनियाद पर खड़ा हूं , कैसे खड़ा रहता भला ? वह एक मिसरा है न : हम बुनियाद के पत्थर हैं तराशे नहीं जाते। तो वही स्थिति है। तमाम ऊबड़-खाबड़ पत्थर और ईंटें हमारी ज़िंदगी की बुनियाद में हैं। हमारे लेखक की बुनियाद में हैं। हमारी कविता की बुनियाद में हैं। जो कभी तराशे नहीं गए। बहुत से लोग ऐसे हैं। बहुत सी बातें भी हैं। रही बात लेखक के जन्म लेने की तो लेखक अचानक कहां जन्म लेता है ? कोई कहानी भी अचानक कहां जन्म लेती है ? भीतर-भीतर अंकुआती रहती है , पकती रहती है और अचानक किसी दिन आहिस्ता से कागज पर उपस्थित हो जाती है। मन में तो जाने कितनी बार लिखी जा चुकी होती है। किसी जीव का जन्म भी अचानक नहीं होता। किसी वनस्पति , किसी पर्वत , नदी , वृक्ष का भी जन्म अचानक कहां होता है। अचानक तो कोई दुर्घटना होती है। कोई संयोग और दुर्योग होता है। अचानक तो कोई प्रेम होता है। लव एट फर्स्ट साइट वाला प्रेम। जैसे असल मोहब्बत की शुरुआत अकेले में मुलाकात से होती है , पर हर प्रेम के नसीब में नहीं होती अकेले में मुलाकात की। हमारे समय में तो यही होता था। तो आहिस्ता-आहिस्ता ही मेरा लेखक बना। लेखक से भी पहले कवि। अनायास। देवेंद्र कुमार की कविता पंक्ति है : ‘कविता को अच्छी होने के लिए / उतना ही संघर्ष करना पड़ता है / जितना एक लड़की को /औरत होने के लिए।’ तो यह लड़की के औरत होने वाली मेहनत बाद में बहुत करनी पड़ी है। आज भी यह मेहनत जारी है। धूमिल ने लिखा है : कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है। तो धूमिल की यह तजवीज ही लेखन में ले आई। शुरू में लगता था कि अपने लेखन से हम दुनिया बदल देंगे। दुनिया तो बहुत नहीं बदल पाए पर पाता हूं कि धीरे-धीरे ही सही ख़ुद ही बदलता गया हूं। बदलता जा रहा हूं। हां , अगर आप का आशय किसी क्रौंच वध जैसी घटना से है तो ऐसा कुछ नहीं है। अगर है भी तो वह क्रौंच कोई और नहीं मैं ख़ुद ही हूं। प्रेम के सुख में , प्रेम में टूट कर ही कविता लिखी। कहानी लिखी। आगे के लेखन में प्रेम के अलावा और भी टूटन ने लिखने को बाध्य किया। पारिवारिक , सामाजिक , राजनीतिक टूटन ने भी बहुत लिखवाया है। अविष्कार फ़िल्म में कपिल कुमार के लिखे गीत को कनु रॉय के संगीत में मन्ना डे ने गाया है : हंसने की चाह ने कितना मुझे रुलाया है। कृपया मुझे इसी तर्ज पर यह कहने की अनुमति दीजिए कि लिखने की चाह ने कितना मुझे रुलाया है।
● माँ का आप की रचना और आप के संवेदनात्मक संसार में क्या स्थान है?
- रचना ही नहीं , ज़िंदगी के हर मोड़ पर , हर सांस में मां ही मां है। संवेदना , भावुकता , दुःख और उस की दाहकता मां से ही जाना है। जिया है। जीता हूं। जीवन में ही नहीं , लिखने में भी। हमारी अम्मा पढ़ी-लिखी नहीं थी। अक्षर ज्ञान नहीं था। पर जीवन का ज्ञान और जीवन दृष्टि अद्भुत थी। मेरे लेखन में भी जैसे सूर्य बन कर वह रौशनी दिखाती हुई निरंतर उपस्थित मिलती है। जमील ख़ैराबादी का एक शेर याद आता है : इक-इक सांस अपनी चाहे नज़्र कर दीजे / मां के दूध का हक़ फिर भी अदा नहीं होता।
● गोरखपुर और बैदौली आज भी आप के भीतर किस तरह जीवित हैं? क्या आप की कथा-दृष्टि की कोई बुनियादी जड़ें वहीं मिलती हैं?
- गोरखपुर हमारा गृह जनपद है। बैदौली हमारी जन्म-भूमि। सारी जड़ें वहीं हैं। गर्भ भी वहीं है , नाल भी वहीं। कुछ भी अलग से रोपा हुआ नहीं है। न हमारे जीवन में , न हमारे लेखन में। बुनियाद , जड़ और दृष्टि सब कुछ वहीं से है। वहीं की मिट्टी से है। कुछ भी आयातित नहीं है। आयात करने की ज़रुरत भी कभी महसूस नहीं हुई। अभी तक तो नहीं हुई। अभी तक जाने कितनी कथाएं जो अपने आलस में लिख नहीं पाया हूं। लेकिन मिट्टी और पात्र पुकारते ही रहते हैं।
● लखनऊ ने आप के व्यक्तित्व और लेखकीय यात्रा को क्या दिया?
- आप कह सकते हैं कि लखनऊ हमारी रोजगार की भूमि है। दिल्ली में भी नौकरी की है पर सब से ज़्यादा समय लखनऊ में। इतना कि लखनऊ हमारी आदत , ज़रूरत और सुविधा बन गया है। अब तो आलम यह है कि ज़ौक़ याद आते हैं : कौन जाए ‘ज़ौक़’ पर दिल्ली की गलियाँ छोड़ कर। तो मुझे भी कृपया कहने दीजिए कि कौन जाए पर लखनऊ की गलियां छोड़ कर। रही बात पहचान की तो पहचान तो मेरी आज भी गोरखपुर से ही है। कम से कम मैं तो यही मानता हूं। पहचान मुझे दिल्ली ने भी बहुत दी। लखनऊ ने और ज़्यादा। एक समय तो यह था कि लखनऊ में मुख्य मंत्री कोई भी हो , मुख्य मंत्री से संतरी तक सभी पहचानते थे। बात मानते थे। क्या है कि लखनऊ छोटा शहर है। शांत और साफ़ सुथरा। पचास लखनऊ दिल्ली में समा जाएं। सौ लखनऊ मुंबई में समा जाएं। पूरे नहीं पड़ेंगे वह शहर। पर लखनऊ की पहचान दुनिया में जिस तरह है , किसी और शहर की नहीं। कहते हैं कि जादू सरसो पर पढ़े जाते हैं , तरबूज पर नहीं। तो लखनऊ वही सरसो है। लखनऊ में एक कहावत बहुत मशहूर है , पहले आप ! तो यह पहले आप मतलब , स्वयं को मिटा कर औरों के लिए होना ही है , पहले आप ! और यह लखनऊ सिखाता है। दुनिया का कोई और शहर नहीं। घर हमारा अपने गांव बैदौली में तो है ही , गोरखपुर शहर में , एन सी आर में यानी नोएडा में भी है और लखनऊ में भी। सभी जगह जाता रहता हूं। रहता हूं। पर ज़्यादातर लखनऊ में रहने की आदत बन गई है। तो कह सकते हैं कि व्यक्तित्व और कृतित्व में लखनऊ का हाथ बहुत है। बहुत-बहुत है। लंबे समय तक लखनऊ में पत्रकारिता की है। दिल्ली और लखनऊ की पत्रकारिता ने प्रधानमंत्री , मुख्यमंत्री से लगायत संतरी तक की सोहबत दी है। लोगों को जानने का बहुत अवसर दिया है। सब का मन मिजाज और और उन के बारे में गहरे पैठने का अवसर बहुत मिला है। तह तक धंसने का।
नेता , अभिनेता , अफसर , अपराधी हर किसी से मिलने का खुल्ल्मखुल्ला अवसर। एक बार अमिताभ बच्चन से इंटरव्यू में पूछ लिया था कि अगले जन्म में आप क्या बनना चाहेंगे ? तब वह बोले , आप की तरह पत्रकार बनना चाहूंगा। पूछा कि क्यों ? तब वह कहने लगे कि यह जो सवाल पूछने का अधिकार है न आप के पास और किसी और के पास नहीं है। इस लिए। यह कौन बनेगा करोड़पति के पहले की बात है। वर्ष 1996 की बात है। अब तो बना बनाया प्रश्न ही सही वह बरसों से कौन बनेगा करोड़पति में सब से पूछ रहे हैं। खैर , यह सवाल पूछने ने मुझे ऐसी-ऐसी जगहों पर पहुंचाया कि पूछिए मत। ज़िंदगी में कभी कल्पना तक नहीं की थी। आलम यह था कि कुछ नहीं जानता था , सवाल पूछने की धुन ने बहुत कुछ जनवा दिया। हालां कि इस पूछने में बहुत सी अनर्थ भी घटा। नौकरियां गंवाईं। सम्मान गंवाया। एक बार तो उत्तर प्रदेश के एक राज्यपाल थे रोमेश भंडारी। हरदोई के शाहाबाद तहसील में कवरेज के लिए गया हुआ था। डाकबंगला उन के लिए तैयार किया गया था। ज़रूरत पड़ने पर डाक बंगले के बाथरुम में चला गया। कि तभी राज्यपाल रोमेश भंडारी को भी बाथरूम जाने की ज़रूरत महसूस हुई। वह आए। भीतर मैं था। उन्हें बहुत जल्दी थी तो कम आन , कम आन दो तीन बार किया और अंतत: उन्हें सर्वेंट वाले बाथरूम में जाना पड़ा। जो बहुत गंदा था। बाथरूम से बाहर निकलने पर मुझे वहां के डी एम मिले। थोड़ी सी बातचीत की। और चले गए। डी एम के जाते ही मुझे अरेस्ट कर लिया गया। बताया गया एन एस ए लगा दिया गया है। मैं बहुत भड़का।
पर बाद में राज्यपाल रोमेश भंडारी के हस्तक्षेप पर मुझे छोड़ दिया गया। वह मुझे पहले से जानते थे। इस लिए। दिलीप कुमार और जॉनी वॉकर भी उस कार्यक्रम में आए थे। इतना सब होने पर भी मैं ने दिलीप कुमार का एक शानदार इंटरव्यू भी उसी डाक बंगले में उसी दिन लिया। उन के साथ लंच किया। तो यह सवाल पूछने की तलब और अधिकार ही तो था। इस घटना को ले कर मैं ने मुजरिम चांद नाम से एक लघु उपन्यास भी लिखा। कथादेश पत्रिका में धारावाहिक छपा था तब। जो ख़ूब चर्चित हुआ। एक और बहुत पुराना किस्सा है। उन दिनों लखनऊ में दंगे के चक्कर में कुछ इलाकों में कर्फ्यू लगा हुआ था। कर्फ्यू कवर करने उन इलाकों में जाता था। एक बार तो मेरी जान जाते-जाते बची। दंगाइयों ने चौक के सिरकटा नाले पर बस मेरी हत्या करते-करते रह गए। उन्हों ने तो तलवार , बांका , चाकू सब कुछ चला दिया था। सामूहिक रूप से। खैर एक दूसरी घटना सुनिए।
एक दिन हमारे एक चपरासी ने हम से कहा कि साहब हम को भी कर्फ्यू इलाक़ा अपने साथ घुमा दीजिए। उन दिनों स्कूटर चलाता था। वह स्कूटर पर पीछे बैठ गया। जहां कहीं भी पुलिस मिलती , स्कूटर पर प्रेस लिखा देख जाने देती। कहीं-कहीं प्रेस बताना पड़ता और कार्ड भी दिखाना पड़ता। कर्फ्यू पास भी। चपरासी को प्रेस बताने और दिखने का मजा आ गया। दूसरे दिन चपरासी ने अपनी साइकिल के मडगार्ड पर प्रेस लिखवाया और कर्फ्यू इलाके में चला गया। पुलिस ने रोका तो बड़ी ऐंठ से प्रेस बताया और आगे बढ़ गया। पुलिस ने लपक कर पकड़ लिया। कर्फ्यू पास और प्रेस कार्ड मांगा। वह अपनी साइकिल के मडगार्ड पर लिखा प्रेस दिखाता रहा। पुलिस ने उसे पीट कर थाने ले जा कर हवालात में बंद कर दिया। उन दिनों मोबाईल तो था नहीं। शाम को आफ़िस पहुंचा तो बताया गया कि फला थाने से कई बार फोन आ चुका है। आप का कोई परिचित गिरफ्तार है। थाने में फोन कर पूछा तो बताया गया कि बहुत लोग बंद हैं। नाम बताइए। अब मुझे मालूम तो था नहीं कि कौन है ? भाग कर उस थाने पहुंचा। अब मुझे देखते ही वह चपरासी हवालात के भीतर से चिल्लाया। समझ गया। पूरा किस्सा पता चला। उसे छुड़ा कर ले आया। पर वह चपरासी बहुत दिनों तक मुझ से नाराज रहा। कहता कि आप के चक्कर में बहुत पिट गया। हवालात में बंद हो गया। उस पुलिस वाले को सस्पेंड करवाने की बात कहता। पर किस पुलिस वाले ने पीटा , उसे भी मालूम नहीं था। ऐसी अनेक घटनाएं हैं। प्रशासन की , सरकार की व्यवस्था की।
पत्रकारिता से साहित्य तक
● पत्रकारिता ने आप जैसे लेखक को क्या दिया? क्या पत्रकारिता ने आप को मनुष्य और समाज को देखने की वह दृष्टि दी, जो बाद में आप की कहानियों का आधार बनी?
- पत्रकारिता ने बनाया भी बहुत , बिगाड़ा भी बहुत। कई बार मनबढ़ बनाया। अपनी ही बात को ऊपर रखने की ज़िद और सनक दी। अब पलट कर सोचता हूं तो बहुत अफ़सोस होता है और शर्म भी आती है। लेकिन तब के समय युवा था। बहुत-बहुत व्यस्त था। सड़क पर खुद भले स्कूटर से चलता था उन दिनों पर मुख्य मंत्री आदि के साथ जहाज और हेलीकाप्टर में घूमता था। अकसर। नारायणदत्त तिवारी जैसे मुख्यमंत्री सड़क पर काफिला रोक कर बतिया लेते थे। प्रधानमंत्री रहते हुए भीड़ में से अटल बिहारी वाजपेयी बुलवा लेते थे। सो रिस्क लेने की आदत बहुत थी। किसी से न दबने की आदत पत्रकारिता में बहुत सीखी। कोई कितना भी बड़ा खुदा क्यों न हो उस से बराबरी में रख कर बात करने की आदत हो गई। अक्खड़पना आ गया। नहीं आना चाहिए था। नतीज़तन कई बार बेरोजगारी का समंदर देखा। दिल्ली में भी। लखनऊ में भी। लेकिन अनुभव भी बहुत मिला इस सब से। पत्रकारिता में बेरोजगारी नहीं देखी होती , बेरोजगारी का संघर्ष नहीं देखा होता तो अपने-अपने युद्ध नहीं लिख सकता था। हारमोनियम के हज़ार टुकड़े नहीं लिख पाया होता। हाईकोर्ट और उस का नंगापन नहीं देख पाया होता। व्यवस्था का खोखलापन नहीं देख पाया होता। लेकिन इस संघर्ष में खोना बहुत पड़ा। स्वाभिमानी होने की , खुद्दार होने की कीमत बहुत चुकानी पड़ी। अपनों को पराया होते देखा। जूनियरों का जूनियर बनना पड़ गया नौकरी में। बड़ी अनकही कहानियां हैं ऐसी जो अभी लिखनी शेष हैं। बेरोजगारी के दंश से बड़ा कोई दंश नहीं होता। वह भी तब जब आप दुनिया भर का ग्लैमर और पावर इंज्वाय कर चुके हों। तब के दिनों आलम यह होता कि रमानाथ अवस्थी का एक गीत अकसर गुनगुनाता फिरता : मेरे पंख कट गए हैं / वरना मैं गगन को गाता। बेरोजगारी सचमुच सारे पंख काट लेती है। आप की उड़ान खत्म हो जाती है। और मेरे जीवन में यह बारंबार हुआ है।
● इस के उलट, साहित्य ने पत्रकार को क्या दिया? क्या साहित्य ने पत्रकारिता के तात्कालिक प्रश्नों के पीछे छिपे मानवीय प्रश्नों को देखने की दृष्टि विकसित की?
- तमाम पत्रकारों के पास पाता हूं कि लिखने के लिए शब्दों का टोटा रहता है। अकाल पड़ जाता है शब्दों का। अभिव्यक्ति में चूक जाते हैं। वर्तनी दोष भी बहुत है। साहित्य से जुड़े लोगों के साथ यह संकट अमूमन नहीं होता है। फिर साहित्य ने मेरी पत्रकारिता को जो रंग दिया , जो रुआब दिया वह अतुलनीय है। अलौकिक है। भाषा का जादू ही था जो मुझे साहित्य से मिला। भाषा का जादू ही था जो मुझे पत्रकारिता में सब से अलग कर देता था। लोग मुझे खोजते थे कुछ लिखवाने के लिए। अख़बार मालिक हो , संपादक हो , नेता हो , अभिनेता हो , हर कोई मुझ से लिखवाने के लिए मुझे पूछता फिरता। पत्रकारिता को साहित्य की जुबान जब मिल जाती है तो सोने में सुहागा हो जाता है। तो साहित्य की इस जुबान ने ही मुझे पत्रकारिता में अलग पहचान दी थी। भाषा की तासीर ही थी कि अटल जी , मुलायम , मायावती सभी तब के दिनों पूछते। अमिताभ बच्चन और दिलीप कुमार का इंटरव्यू करने के लिए मुझे ही कहा जाता। जगजीत सिंह , फारुख शेख जैसे लोग उन दिनों मुंबई से ही फोन कर बता देते कि लखनऊ आ रहा हूं। आप के साथ बैठना है। जितेंद्र तो एक बार मुझे एक बार मुंबई ले जाने के लिए अड़ गए थे। लता मंगेशकर , आशा भोंसले , हृदयनाथ मंगेशकर तक से आत्मीयता मिली। संवाद हुआ। इंटरव्यू किया। ऐसे अनेक वाकये , अनेक विवरण हैं। लिखने में संकोच होता है। क्या पता कभी लिखना हो जाए। यह लिखना ही था कि एक बार न चाहते हुए भी मुलायम सिंह के कवरेज में जाना पड़ा। और भयंकर सड़क दुर्घटना का शिकार हुआ। अम्बेस्डर और ट्रक की आमने-सामने टक्कर हो गई थी। हम अम्बेस्डर से थे। मेरे साथ हमारे एक पत्रकार साथी जय प्रकाश शाही और ड्राइवर एट स्पॉट विदा हो गए। बड़ी मुश्किल से मेरा जीवन बचा। छ महीने बेड पर रहा। अभी भी उस दुर्घटना के कुछ निशान और तकलीफें शेष हैं। पर यह जो लिखना है , साहित्य है , उस की ललक है सर्वदा जीने और शानदार ढंग से जीने की ललक को मरने नहीं देता। स्वाभिमानी बनाए रखता है। कहीं घुटने नहीं टेकने देता। पत्रकारिता में कभी दलाल नहीं बनने दिया। बड़े-बड़े प्रलोभनों को लात मारता रहा तो यह साहित्य के संस्कार थे। बेकल उत्साही का एक शेर है : बेच दे जो तू अपनी ज़ुबां , अपनी अना , अपना ज़मीर / फिर तेरे हाथ में सोने के निवाले होंगे। तो कभी सोने के निवाले की नहीं सोची। कभी जुबां , अना , ज़मीर और क़लम नहीं बेची। न साहित्य में , न पत्रकारिता में। साहित्य में भी बड़ी जोड़-तोड़ चलती रहती है। मैं कभी ऐसे जोड़-तोड़ के कुचक्र में भी नहीं पड़ा। कभी किसी गिरोह को ज्वाइन नहीं किया। किसी विचारधारा , किसी गैंग का गुलाम नहीं बना।
● आप की साहित्यिक यात्रा में संपादन की क्या भूमिका रही? किस संपादक ने आप को सब से अधिक प्रभावित किया या किसी निर्णायक अर्थ में ‘बनाया’?
- शुरू में मुझे बहुत अच्छे-अच्छे संपादक मिले। अरविंद कुमार , प्रभाष जोशी , वीरेंद्र सिंह। कन्हैयालाल नंदन , रघुवीर सहाय , मनोहर श्याम जोशी जैसे संपादकों से भी निरंतर संपर्क में रहा। इन के लिए काम भी बहुत किया। पर बाद में पत्रकारिता का पतन जब बहुत ज़्यादा हो गया तो बहुत ख़राब संपादकों , दलाल संपादकों के साथ भी काम करना पड़ा। जिन का लिखने पढ़ने और पत्रकारिता से कोई सरोकार नहीं था। पर अख़बार मालिकों को ऐसे ही भडुवे ही पसंद थे। तो मैं क्या कोई भी कुछ नहीं कर सकता था। शिव सिंह सरोज , राजनाथ सिंह सूर्य , रामकृपाल सिंह , रणविजय सिंह जैसे कुछ ऐसे ही दल्ले और भड़वे संपादक थे। जो संपादक के नाम पर कलंक थे। कुत्ता कह सकते हैं। संपादक मैं भी रहा हूं। पर कभी इस तरह की मूर्खता नहीं की। न कभी सोची। सपने में भी नहीं।
● आप की रचनात्मक यात्रा में पाठक, मित्र और आलोचक: इन तीनों की भूमिकाएँ अलग-अलग रही होंगी। किस आलोचक ने आप को सबसे अधिक समझा?
- साफ़ कहूं तो सिर्फ़ और सिर्फ़ पाठकों ने ही मेरे लेखन को समझा है। मेरे ब्लॉग सरोकारनामा की पाठक संख्या अभी 17 लाख से अधिक है। रोज ही बढ़ती रहती है। आप इसी से अनुमान लगा सकते हैं। सरोकारनामा एकल ब्लॉग है। देश-विदेश में ख़ूब पढ़ा जाता है। बड़े चाव से पढ़ा जाता है। देश ही नहीं , विदेशी लाइब्रेरियों में भी मेरी किताबें हैं। वहां भी लोग पढ़ते हैं। फोन करते हैं। मेसेज भेजते हैं। आदरणीय पाठक मित्रों के प्यार से ही लेखक हूं और ज़िंदा हूं। रहूंगा। असंख्य पाठक हैं हमारे। जो मुझे बहुत प्यार करते हैं। और मैं उन्हें। पाठक ही तो मेरी सांस हैं। ऐसी मेरी बहुत सी कहानियां हैं , कुछ उपन्यास हैं जिन्हों ने पाठकों का जीवन भी बहुत बदला। ख़ास कर स्त्रियों का। बड़की दी का यक्ष प्रश्न पढ़ कर बहुत से लोगों ने बताया कि उन के परिवार में भी ऐसा ही था। कहानी पढ़ कर उन्हों ने अपना व्यवहार और जीवन बदला। सुमि का स्पेस पढ़ कर बहुत सी लड़कियों के माता-पिता बदल गए। पहले के समय में माता-पिता बेटियों को पढ़ने या नौकरी के लिए अकेले बाहर भेजने में हिचकते थे। नहीं भेजते थे। पर सुमि का स्पेस पढ़ कर बहुत से लोगों ने बेटियों को बाहर पढ़ने भेजा। नौकरी के लिए भेजा। कई लोगों ने फोन कर इस बारे में बताया। सैकड़ों लड़कियों ने फोन कर , चिट्ठी लिख कर बताया कि सुमि का स्पेस पढ़ कर हमारे माता-पिता का मन बदल गया। हमें बाहर भेजा और हमारा जीवन बदल गया है। बांसगांव की मुनमुन पढ़ कर भी कई लोगों ने यही बात की। स्त्रियों की ज़िंदगी बदली और उन में साहस का संचार हुआ और उन की ज़िंदगी चमक गई। ऐसी अनेक कहानियां हैं जो मेरी कहानियों को पढ़ कर बनी हैं। कभी लिख सका तो यह सब भी लिखूंगा। कहानी की ही तरह।
मेरे एक संपादक रहे हैं अरविंद कुमार। हिंदी थिसारस के लिए बहुत परिचित हैं। मैं ने उन के साथ शुरुआती दिनों में न सिर्फ सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट , दिल्ली में काम किया , उन से भाषा और तमाम व्यवहारिक बातें भी सीखीं। अरविंद जी मेरे पिता की उम्र के थे। पर मेरा लिखा पढ़ते बहुत थे। वह मेरे पात्रों के मन तक पहुंच जाते थे। बहस करते थे। एक समय वह टाइम्स आफ इंडिया की फ़िल्मी पत्रिका माधुरी के संपादक रहे थे। कोई सोलह साल। फिल्मों में उन के बहुत संपर्क थे। उन्हों ने बहुतेरे फ़िल्मी लोगों से मुझे मिलवाया।
अरविंद कुमार बहुत चाहते थे कि मैं फिल्मों में जाऊं। लिखने और निर्देशन के क्षेत्र में काम करने के लिए। यह अस्सी के दशक की बात है। मेरा भी पहला सपना फिल्म ही थी। मुंबई ही थी। पत्रकारिता या साहित्य नहीं। शायद इस लिए भी। पर फिल्मों में लेखक और सहायक निर्देशक के लिए अपमान के अनेक किस्से दिल्ली में सुनने को मिले। कई लोग गुमनाम बन कर लौट आए थे। बरबाद हो कर। लेखक , अभिनेता , सहायक निर्देशक आदि। मेरी हिम्मत टूट गई। यह सब सुन कर। मुझे भूखे पेट सो जाना आज भी मंज़ूर है पर अपमान बिलकुल नहीं। ज़रा-ज़रा सी बात पर बरसों के याराने चले गए। इस मामले में मैं बहुत टची हूं। सर्वदा से हूं। वैसे भी मैं एक बहुत छोटे शहर गोरखपुर से आता हूं। बल्कि अपने गांव बैदौली से आता हूं। माना जाता है कि छोटे शहर से गए आदमी को बड़ा शहर खा जाता है। बहुत कम लोग अपने को बचा पाते हैं। तो मुंबई जैसे बड़े शहर में जाने से कतरा गया। तो यही अरविंद कुमार मेरे संपादक होने के साथ ही मेरे अनन्य पाठक भी थे। मेरी कहानियों ,उपन्यासों पर बहुत लिखा है अरविंद कुमार ने। बड़ी-बड़ी पत्रिकाओं में लिखा। इंडिया टुडे जैसी पत्रिका में भी। अरविंद जी तो मेरी रचनाधर्मिता पर एक पूरी किताब लिखना चाहते थे। पर समय ने साथ नहीं दिया। कोरोना ने उन्हें छीन लिया। अरविंद कुमार ही नहीं और भी कई लेखकों ने मेरी रचनाओं पर लिखा है। राजेंद्र यादव , रामदेव शुक्ल , नवनीत मिश्र , राजकिशोर , शिवमूर्ति , जितेन ठाकुर , विभांशु दिव्याल, सुधाकर अदीब , गौतम चटर्जी आदि लेखकों ने लिखा है। राजेंद्र यादव ने तो अपने-अपने युद्ध पर हंस में केशव कहि न जाए क्या कहिए शीर्षक से चार पेज की सम्पादकीय भी लिखी। उपन्यास तो सभी हमारे चर्चित हैं पर सब से अधिक समीक्षा बांसगांव की मुनमुन और विपश्यना में प्रेम पर लिखी गई हैं। विपश्यना में प्रेम पर लिखी समीक्षाओं की तो एक किताब भी छप चुकी है। जब कि लोग खोजते सब से ज़्यादा अपने-अपने युद्ध हैं। कुछ उपन्यास अब आऊट आफ प्रिंट भी हैं।
आप ने आलोचक की बात पूछी है। तो आलोचक नाम की संस्था अब कब की मर चुकी है। फिर भी जो थोड़े बहुत अवशेष हैं , मैं ने उन की कभी परवाह नहीं की। न उन्हों ने मेरी। मित्रों ने भी सर्वदा काटने और दुःख देने का ही कुचक्र किया। सहयोग नहीं। साहित्यिक मित्रों में ईर्ष्या भाव बहुत पाया है। खुद लिखें न लिखें , काट तो सकते हैं। फ़तवा तो जारी कर ही सकते हैं। मुहिम तो चला ही सकते हैं।
लेखक और उस की रचनाएँ
● आप की अब तक की रचनात्मक यात्रा में ऐसी कौन-सी रचना है, जो आप के सब से अधिक निकट है? आप की सब से प्रिय रचना कौन-सी है और क्यों?
- सभी रचनाएं प्रिय हैं। सभी मेरे निकट हैं। यह सवाल लेखक से नहीं , पाठक से पूछने वाला है कि उन की प्रिय रचना कौन सी है ?
● और क्या कोई ऐसी रचना है जिसे आज दोबारा लिखने का अवसर मिले तो आप उस में कुछ बदलना चाहेंगे?
- बिलकुल नहीं। गो कि ऐसा बारंबार हुआ है कि कहानी लिखना शुरू किया और वह उपन्यास हो गई। जैसे कि बांसगांव की मुनमुन। उपन्यास लिखना शुरू किया , कहानी हो गई। जैसे कि बड़की दी का यक्ष प्रश्न। ऐसी अनेक रचनाएं हैं। क्या होता है कि कई बार क्या होता है कि पात्र ही हम से लिखवाते हैं। हम उन्हें नहीं लिखते। वह एक भजन है न : जितनी चाभी भरी राम ने उतना दौड़े खिलौना। बाद में यह फ़िल्मी गाना भी बना। तो लिखना-पढ़ना भी कई बार ऐसे ही होता रहा है हमारे साथ। हम लाख कहें कि हम ने यह किया , हम ने वह किया। इस का कोई मतलब नहीं है। उम्र के इस मोड़ पर आ कर तो यही लगता है कि जितनी चाभी भरी राम ने वाली बात में ही बात आ कर ठहर जाती है। प्रारब्ध यही तो है।
● आप की ‘36 कहानियाँ’ में आत्महत्या, मृत्यु, संवादहीनता, प्रेम, राजनीतिक पाखंड, ग्रामीण विस्थापन और स्त्री-देह जैसे विषय अलग-अलग दिखाई देते हुए भी एक साझा ‘नैतिक संकट’ की ओर संकेत करते हैं। क्या आप इस संग्रह को आधुनिक मनुष्य की सामूहिक नैतिक आत्मकथा के रूप में देखते हैं?
- नैतिक संकट तो आप ज़रूर कह सकते हैं पर कृपया आधुनिक मनुष्य की सामूहिक नैतिक आत्मकथा नहीं कहें।
● आप की कहानियों में घटनाओं और नाटकीय निष्कर्षों की अपेक्षा मौन, अधूरापन, असहजता और अनकहे संवाद अधिक महत्वपूर्ण हैं। क्या यह आप की सचेत कथा-रणनीति है? क्या आज के तेज़ और उत्तेजनापूर्ण समय में कहानी का काम उत्तर देना नहीं, बल्कि पाठक के भीतर असुविधाजनक प्रश्न छोड़ना है?
- उत्तर आदि देना प्रवचन आदि में ही ठीक लगता है। लेखक न प्रवचन वाला होता है , न वैज्ञानिक , न शिक्षक , न इंटरव्यूवर। कबीर कहते ही हैं : ज्यों कीं त्यों धर दीनी चदरिया। फिर कबीर यह भी कहते हैं : तू कहता कागद की लेखी मैं कहता आँखिन की देखी। तो लेखन यही है। कम से कम मेरा लेखन इसी अर्थ में देखा जाना चाहिए। लेखक का लिखा किसी जस्टिस का फ़ैसला नहीं है। और जस्टिस का फैसला लेखन नहीं है। जस्टिस का फैसला ग़लत हो सकता है। लेखक का लिखा नहीं। जस्टिस बेईमान हो सकता है। होता ही है। पर लेखक नहीं। लेखक भी अगर बेईमानी करता है तो वह लेखक नहीं रह जाता। एजेंडाधारी लेखकों को इसी लिए मैं लेखक नहीं फ्राड मानता हूं। आप ने तय कर लिया है कि दिन को भी हर हाल में रात ही कहना है तो यह लेखक का काम तो नहीं हो सकता। दिन को रात , रात को रात लिखने और कहने का साहस ही लेखक को लेखक बनाता है। बाक़ी गोबिंद प्रसाद की कविता है न :
राजा बोला—
‘रात है’
मंत्री बोला—‘रात है’
एक-एक कर फिर सभासदों की बारी आई
उबासी किसी ने, किसी ने ली अँगड़ाई
इसने, उसने—देखा-देखी फिर सब ने बोला—
‘रात है...’
यह सुबह-सुबह की बात है...
प्रेम, देह और स्मृति
● ‘तुम्हारे बिना’ में आप ने प्रेम को किसी पारंपरिक प्रेम-कथा की तरह नहीं, बल्कि एक पुरुष के आत्मालाप, स्मृति और विरह के मनोवैज्ञानिक अनुभव के रूप में प्रस्तुत किया है। क्या आप के लिए प्रेम की सब से प्रामाणिक अभिव्यक्ति मिलन में है या उस अनुपस्थिति में, जो प्रेम के बाद मनुष्य के भीतर रह जाती है?
- प्रेम कोई पारंपरिक विषय नहीं है। इस लिए कोई प्रेम कथा भी पारंपरिक नहीं हो सकती। प्रेम की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है। कोई निश्चित फार्मूला नहीं है प्रेम का। प्रेम कोई जोड़ , घटाना या गुणा-भाग नहीं है। कोई एक केमेस्ट्री या कोई एक बीजगणित नहीं है प्रेम की। न कोई रेखागणित। कबीर का प्रेम और है , सूर का अलग , मीरा का अलग , तुलसी का अलग। राम का प्रेम , कृष्ण का प्रेम , शिव का प्रेम भी अलग-अलग ही है। इन की प्रेम कथाएं भी पटरी बदलती हुई चलती हैं। जैसे किसी रेल की पटरी हो। ट्राम की तरह सड़क पर भी चल सकती है। तो एक ही व्यक्ति किसी स्त्री को पचास तरह से प्रेम कर सकता है और सौ तरह से लिख सकता है। वही व्यक्ति किसी और स्त्री से किसी और तरह प्यार कर सकता है। मिलन और विरह दोनों ही प्रेम की नदियां हैं। कौन सी नदी किस के नसीब में है , कौन जानता है ? द्रौपदी को चीरहरण में नंग्न होने से बचाने वाले कृष्ण द्रौपदी के प्रेमी भी थे। इस बात को इस अर्थ में भी देखना लोग क्यों भूल जाते हैं ? चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी उस ने कहा था में तो प्रेमी , प्रेमिका के पति को बचाने के लिए अपने प्राण की बाजी लगा देता है। मीरा राजमहल छोड़ कर वृंदावन होती हुए द्वारका पहुंचती हैं और महल वापस लौटने की बात पर गिरिधर गोपाल से आज्ञा मांगने के बहाने कृष्ण की मूर्ति में समा जाती हैं। प्रेम की इस पराकाष्ठा और परिणति को आप कौन सा नाम देना चाहेंगे ?
● ‘तुम्हारे बिना’ में स्त्री एक पात्र से आगे बढ़ कर पुरुष की स्मृति, संवेदना और आत्मबोध का केंद्रीय अनुभव बन जाती है। देह के अत्यंत अंतरंग और संवेदनशील वर्णन के बावजूद आप उसे केवल शारीरिक आकर्षण तक सीमित नहीं करते। आप प्रेम, देह और स्त्री की अस्मिता के इस त्रिकोण को किस तरह देखते हैं?
- प्रेम एक ऐसी चौखट है जिस में आप अगर तन कर खड़े होते हैं तो सिर चौखट से टकरा जाता है। बार-बार टकरा जाता है। प्रेम गली अति सांकरी की बात भी कही ही जाती है। प्रेम में जब स्त्री देह आप के साथ होती है तो स्त्री और पुरुष की अस्मिता एक हो जाती है। त्रिकोण या किसी और कोण की गुंजाईश कहां होती है तब ? गाने में कहते ज़रूर हैं कि फूल भी हो दरमियां तो फ़ासले हुए पर सुगंध और सुमन जब एक होते हैं तब अपनी समग्रता में होते हैं। दोनों के बीच कोई फ़ासला नहीं होता। तभी तो अंतरंग होते हैं। इस को कृष्ण के एक इस किस्से से समझिए। एक बार नारद और कृष्ण में बहस हो गई कि कौन बड़ा ब्रह्मचारी ? अंतत: तय हुआ कि परीक्षण कर लिया जाए। एक सरोवर में स्त्रियां नहा रही थीं। पहले कृष्ण गए। स्त्रियां सरोवर में नहाती रहीं। कृष्ण के आने से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा। निश्चिंत नहाती रहीं। थोड़ी देर में नारद आए। नारद के आते ही सभी गोपियां परेशान हो गईं। सब अपने-अपने वस्त्र की ओर दौड़ पड़ीं। निर्णय हो चुका था कि कौन बड़ा ब्रह्मचारी है। तो प्रेम में भी अगर कृष्ण जैसा निष्कपट आचरण और समर्पण है तो आप के ही शब्दों में जो कहूं तो स्त्री एक पात्र से आगे बढ़ कर पुरुष की स्मृति, संवेदना और आत्मबोध का केंद्रीय अनुभव बन जाती है।
विपश्यना, वासना और आधुनिक मनुष्य
● ‘विपश्यना में प्रेम’ में एक ओर मौन, ध्यान और आत्मशांति की तलाश है, तो दूसरी ओर मनुष्य के भीतर मौजूद वासना, प्रेम, आकर्षण और बेचैनी का लगातार शोर है। क्या आप यह कहना चाहते हैं कि मनुष्य बाहरी अनुशासन और आध्यात्मिक साधना से अपनी इच्छाओं को दबा तो सकता है, लेकिन उनसे मुक्त नहीं हो सकता?
- वासना , प्रेम और आकर्षण मनुष्य की स्वाभाविक स्थितियां हैं। इच्छाओं से कभी कोई मुक्त नहीं हो सकता। कितना भी बड़ा तपस्वी क्यों न हो। तपस्या भी एक इच्छा ही है। कुछ और नहीं। इच्छाओं का शोर मन में सब से ज़्यादा होता है। आप यह ठीक ही कह रहे हैं कि विपश्यना मौन , ध्यान और आत्मशांति की तलाश है। लेकिन आध्यात्मिक शांति नहीं है विपश्यना। साधना है। सिर्फ साधना। आध्यात्म और साधना दोनों दो बात है। दोनों दो ध्रुव हैं। यह बात ज़रूर समझ लेने की है।
● उपन्यास में विपश्यना के लोकप्रिय होते ‘कूल कल्चर’ और उस के आसपास बन रहे आध्यात्मिक बाज़ार पर भी व्यंग्यात्मक दृष्टि दिखाई देती है। क्या ‘विपश्यना में प्रेम’ मूलतः विपश्यना की आलोचना है, या उस के बहाने आधुनिक मनुष्य की उस मानसिकता की पड़ताल है, जो शांति, आध्यात्मिकता और यहाँ तक कि प्रेम को भी उपभोग की वस्तु में बदल देती है?
- विपश्यना की आलोचना बिलकुल नहीं है। विपश्यना बहुत परिणामकारी और चमत्कारी साधना पद्धति है। पाखंड नहीं है , विपश्यना। ख़ुद से ख़ुद की मुलाक़ात की साधना है। आत्म-अनुशासन सीखना हो तो विपश्यना सीखिए। ख़ुद को समझना हो , बिना शीशा देखे ख़ुद को देखना हो , अपनी पड़ताल करनी हो तो विपश्यना सीखिए। मन को नियंत्रित करने की साधना है यह। अपनी ही आती -जाती सांस को स्पर्श करना सीखने की साधना है विपश्यना। लौकिक को अलौकिक अनुभव में महसूस करना हो तो विपश्यना ज़रूर कीजिए। फिर यह बात दुहरा दूं कि विपश्यना आध्यात्मिक पद्धति नहीं है। आध्यात्म नहीं है , विपश्यना। बाक़ी आप का यह सवाल दुरुस्त है कि विपश्यना में प्रेम उपन्यास आधुनिक मनुष्य की उस मानसिकता की पड़ताल है, जो शांति, आध्यात्मिकता और यहाँ तक कि प्रेम को भी उपभोग की वस्तु में बदल देती है ? मुझ से पूछिए तो कहूंगा की विपश्यना में प्रेम उपन्यास शुद्ध रूप से प्रेम कथा है। एक स्त्री की संतान सुख की प्रेम गाथा है। विपश्यना में प्रेम का प्रिया जलतारे जी ने मराठी में अनुवाद किया है। एक नई बात कही है प्रिय जलतारे ने कि विपश्यना में प्रेम नायक नहीं , नायिका की कहानी है। प्रिया जलतारे ने लिखा है :
कहने को तो नायक प्रधान कहानी है । मेरे लिए ये कहानी नायिका की है । दारिया,माँ बनने के लिए परेशान थी । हर एक इलाज करने को तैयार है । विपश्यना के बीच भी उस का मन ध्यान में नहीं है । बहुत सारा रिस्क उठा कर उसे माँ बनने का सौभाग्य मिला। अपनी देह से अपना अंकुर , नवनिर्मिति के लिए व्याकुल दारिया, आख़िर में यशस्वी हुई । एक माँ की कहानी !
तो विपश्यना में प्रेम की यह ताकत समझ सकते हैं। बहुत से समीक्षकों ने इसे मनोवैज्ञानिक उपन्यास भी बताया है।
लेखक, विवाद और असहमति
● आप की दीर्घ साहित्यिक यात्रा में कौन-सा विवाद आज भी आप को याद आता है? उस विवाद ने लेखक दयानंद पांडेय को क्या सिखाया?
- विवाद में तो हम हमेशा ही रहे हैं अपने लिखे को ले कर। इस से सीखते भी रहे। टूटते भी रहे। बनते भी रहे। अपने-अपने युद्ध को ले कर हाईकोर्ट में कंटेम्प्ट हुआ। एक खबर को ले कर उत्तर प्रदेश विधान परिषद में मेरे खिलाफ विशेषाधिकार प्रस्ताव पेश हुआ। अन्य अनेक मुकदमे हुए। लोगों ने आरोप भी अनेक लगाए। अश्लीलता के आरोप भी हैं मुझ पर। और कि मुसलसल हैं। लोग नाराज भी बहुत हुए। लेकिन बुद्ध कहते हैं न कि कुछ भी स्थाई नहीं है , सब गुज़र जाएगा। तो सब गुज़र गया।
● कौन-सा विरोध आप को सब से अधिक चोट पहुँचा गया ; और क्या कभी ऐसा हुआ कि किसी विरोध ने बाद में आप को अपनी ही रचना या विचार पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया?
- लेखन में विरोध , असहमति , कुचक्र आदि चलता रहता है। यह सब न हो तो सन्नाटा छा जाता है। और सन्नाटा किसी भी सूरत अच्छी बात नहीं। कंधे बदलते रहते हैं , वार झेलते रहते हैं। मसरूर अनवर का शेर है न : हम को किस के ग़म ने मारा ये कहानी फिर सही / किस ने तोड़ा दिल हमारा ये कहानी फिर सही। हां , ऐसी चीज़ों से कभी कोई चोट फोट नहीं लगी।
आज का साहित्य और बदलता समय
● आज के युवा लेखक से आप की सब से बड़ी शिकायत क्या है? और इस के बरक्स ऐसी कौन-सी बात है, जिसे ले कर आप को नई पीढ़ी के लेखकों से सब से अधिक उम्मीद है?
- युवा , बुजुर्ग , समकालीन कैसे भी , किसी भी लेखक से कोई शिकायत नहीं है। न ही किसी से कोई उम्मीद। जिस को जो लिखना है , लिख रहा है। जो करना है , कर रहा है। वह कहते हैं न : यह मयक़दा है कोई जामेजम नहीं है / यहां कोई किसी से कम नहीं है। हर कोई अपने आप में ख़ुदा है। सब की अपनी सहूलियत , ज़रूरत और सुविधा है। तो किसी से कुछ कहना क्या , किसी से कुछ सुनना क्या !
● आज के पाठक से आप की क्या अपेक्षा है? क्या आप को लगता है कि पाठक की पढ़ने की आदत और साहित्य से उस का रिश्ता बदल रहा है?
- समय-समय की बात है। एक समय बहुत पढ़ने वाला मैं ही अब बहुत-बहुत कम पढ़ता हूं। अब पढ़ना कई बार पहाड़ लगता है। पहाड़ चढ़ना , आसान है। आज की तारीख़ में पढ़ना आसान नहीं है। पढ़ना और सीखना लेकिन बहुत ज़रूरी है। पढ़ना आदमी को मनुष्य बनाता है। सकारात्मक सोचने और समझने की दृष्टि देता है।
● बाजार और साहित्य के अंतरसंबंधों को आप कैसे देखते हैं? क्या आज साहित्य की स्वायत्तता पर बाजार का दबाव पहले से अधिक है?
- बाज़ार तो शुरू ही से हमारी ज़िंदगी का एक हिस्सा रहे हैं। पर दुर्भाग्य से अब बाज़ार से ही ज़िंदगी संचालित होने लगी है। संबंध भी बाज़ार से बनने , बिगड़ने लगे हैं। साहित्य भी अब बाज़ार के कंधे पर चढ़ना चाहता है। कोई चढ़ जाता है , कोई नहीं चढ़ पाता। वैसे भी साहित्य और शास्त्रीय संगीत लोकप्रिय कला में शुमार नहीं होते। कभी नहीं हुए। साहित्य और शास्त्रीय संगीत के पाठक या श्रोता , सर्वदा से बहुत थोड़े से होते रहे हैं। मुट्ठी भर। मैं तो ऐसे भी बहुत से लोगों को जानता हूं जो न साहित्य जानते हैं , न फिल्म , न थिएटर , न संगीत , न खेल। और यह लोग कोई अनपढ़ , जाहिल और गंवार लोग नहीं हैं। अपने-अपने क्षेत्र के बॉस लोग हैं। देश और दुनिया चलाते हैं। बहुत से मेरे ऐसे आई ए एस मित्र हैं जो साहित्य से , सिनेमा या संगीत से बिलकुल परिचित नहीं हैं। न्यूज भी वह उतना ही जानते हैं , जितनी ज़रूरत है। पूछने पर कहते हैं कि इस सब के लिए हमारे पास समय कहां है। बहुत से उद्योगपति और राजनेता भी ऐसे ही हैं। उन के पास साहित्य , कला और सिनेमा के लिए समय नहीं है। फाइलों में , पावर में उलझी उन की ज़िंदगी , उन की है ही नहीं। सोचिए कि कभी उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री रहीं मायावती को संगीत तो छोड़िए , चिड़ियों की चहचहाहट भी पसंद नहीं।
एक पुराना किस्सा है कि एक जहाज में टाटा और दिलीप कुमार सवार थे। दिलीप कुमार कई बार टाटा के आसपास से गुज़रे पर टाटा ने उन की नोटिस नहीं ली। अंतत: दिलीप कुमार ने अपने पी ए को टाटा के पी ए के पास भेजा और कहा कि बताओ उन्हें कि दिलीप कुमार भी इसी जहाज में हैं। टाटा के पी ए ने टाटा को बताया भी पर टाटा ने फिर भी दिलीप कुमार की नोटिस नहीं ली। हार कर दिलीप कुमार टाटा के पास खुद ही गए और बताया कि मुझे दिलीप कुमार कहते हैं। टाटा फिर भी खामोश रहे। दिलीप कुमार ने उन्हें बताया कि वह हिंदी फिल्म के स्टार हैं। एक्टर हैं। टाटा मुस्कुराए और बोले , मैं फ़िल्में नहीं देखता। दिलीप कुमार और कुछ कहते कि टाटा बोले , मेरे पास इन सब चीज़ों के लिए समय कहां है ? दिलीप कुमार वापस अपनी सीट पर बैठ गए। ऐसे अनेक किस्से हैं मेरे पास। यह ठीक वैसे ही है जैसे बहुत से लेखक शेयर , सूचकांक , फिल्म , खेल आदि नहीं जानते। न जानना चाहते हैं। तो सब की अपनी दुनिया है। अपना संघर्ष है। साहित्य की स्वायत्तता आदि फालतू की बातें हैं। साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है। यह कहने और लिखने वाले प्रेमचंद खुद राजनीति के पीछे-पीछे चलते थे। बाज़ार और पूंजी के खिलाफ लिखते थे पर बंबई की फ़िल्मी दुनिया में पूजा पाठ करने तो गए नहीं थे। बनारस में सरस्वती प्रेस पूजा पाठ के लिए तो खोला नहीं था। प्रेमचंद से ज़्यादा अमीर लेखक हिंदी में अभी तक कोई दूसरा नहीं हुआ। प्रेमचंद के साहित्य के बूते ही प्रेमचंद के बेटे , पोते अरबों रुपए में खेलते रहे हैं। अंग्रेजी बोलते हुए , हिंदी भूल गए थे प्रेमचंद के नाती पोते। यह बाज़ार नहीं तो और क्या था ?
● आज पुस्तकों के डिजिटल संस्करण भी तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। आप डिजिटल और प्रिंट को एक-दूसरे का विरोधाभास मानते हैं या दोनों के बीच कोई रचनात्मक सम्पूरकता देखते हैं?
- प्रिंट की जगह कोई डिजिटल नहीं ले सकता। बाक़ी हर माध्यम की अपनी उपयोगिता है। इस से भी इंकार नहीं है। अब कि जैसे कोई बात आप सौ पन्ने में लिखते हैं। नहीं कह पाते पूरा। पर एक फ़ोटो हज़ार पन्ने की बात अकेले कह देता है। पर कहीं-कहीं। हर कहीं नहीं । बहुत सी फ़िल्में , ओ टी टी , लिखे हुए साहित्य से ज़्यादा कई बार ज़्यादा संप्रेषणीय हो जाते हैं। पर मन के खुरदुरेपन को , मन की कोमलता को आप दृश्य में कैसे दिखा सकते हैं ? वह तो लिख कर ही बांच सकते हैं। लिख कर ही मन में समा सकते हैं। अंतरतल तक जा सकते हैं। मन को दृश्य में नहीं बांध सकते हैं। मन की मिठास को लिख कर ही समझ और समझा सकते हैं।
● AI और साहित्य एक-दूसरे को किस हद तक प्रभावित कर रहे हैं? क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता लेखक की रचनात्मकता के लिए चुनौती है, अवसर है या दोनों?
- साहित्य , प्रेम , सेक्स और अनुभूति , अभिव्यक्ति यह सब ए आई , फे आई के वश का नहीं है। यह सब स्वानुभूति के अवयव हैं। नकली चीज़ों से मनोरंजन तो हो सकता है , कुछ सुविधा , कुछ जानकारी मिल सकती है पर सुख नहीं। अलौकिक और अनिर्वचनीय सुख तो असल में ही है। अभी कोई ए आई स्त्री आए आप को खूब प्यार करने लगे , आप बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे। साहित्य भी स्वानुभूति की ही तलब रखता है। पढ़ने में भी , लिखने में भी। कोई ए आई स्त्री क्या मेरी मां बन सकती है ? ए आई ? अरे कोई दूसरी स्त्री भी मां बन सकती है ? तो नकली चीज़ें चल भले जाएं थोड़े से समय के लिए पर चुनौती या अवसर भी बन सकती हैं ? मैं नहीं मानता। पर बाज़ार का समय है। कुछ भी हो सकता है। पर मैं इस तरह के बाज़ार में नहीं हूं। न ऐसे बाज़ार के साथ हूं। स्वीकार करना तो बहुत बड़ी बात है। बाज़ार से गुज़रा हूं ख़रीदार नहीं हूं , वाली बात भी कह सकते हैं।
आगे की यात्रा और विरासत
● इतने लंबे लेखकीय जीवन के बाद भी आप की ऐसी कौन-सी अधूरी इच्छाएँ हैं, जिन्हें आप अभी पूरा करना चाहते हैं?
भौतिक इच्छाएं तो कभी किसी की पूरी नहीं होतीं। लेकिन मेरी बहुत सी इच्छाएं पूरी हुई हैं। फिर भी वह भारत भूषण का एक गीत है न : ये असंगति ज़िंदगी के द्वार सौ-सौ बार रोई / बांह में है और कोई चाह में है और कोई। तो यह मेरे साथ भी है। परमानंद श्रीवास्तव का एक गीत है : पल-छिन चले गए / अपनी जैसी इच्छाओं के / वे दिन चले गए। तो यह भी है। इच्छाएं अनंत हैं। फिर भी जो मिलना था , मिल चुका है। जो नहीं मिलना है , नहीं मिलेगा। खोना-पाना सब हो चुका है। अब आगे कोई चमत्कार नहीं होना है। ज़िंदगी की इस वास्तविकता को जान लेने में ही सुख है। इस वास्तविकता को जान चुका हूं। सुखी हूं। भगवान से अब स्वास्थ्य और स्वास्थ्य सुख की ही प्रार्थना है। बस यही इच्छा है। और कुछ नहीं।
● पाठकों को अपनी अगली पुस्तक के बारे में कुछ बताना चाहेंगे? क्या आप की अगली रचना भी आप के अब तक के लेखन की तरह मनुष्य के किसी अनकहे या असुविधाजनक पक्ष की तलाश करेगी?
- अब तक तो कोशिश यही रही है कि कभी ख़ुद को लेखन में दुहराऊ नहीं। आगे भी यही इरादा है। दो-तीन उपन्यास और कुछ कहानियों के बादल बहुत समय से मन में घुमड़ रहे हैं। आलस वश कहिए या परिस्थितिवश कहिए लिख नहीं पा रहा। पता नहीं लिख भी पाऊंगा कि नहीं , नहीं जानता। एक समय कहता घूमता था कि लिखूंगा नहीं तो मर जाऊंगा। लिखना मेरी सांस है। अब लगता है कि यह सब झूठ ही कहता रहा हूं। तब तो कहता था , पीड़ा को स्वर देता हूं। ज़रूर लोगों की पीड़ा को स्वर देता भी रहा हूं। लेकिन क्या जिन की पीड़ा को स्वर देता रहा हूं , उन को भी अपनी पीड़ा का स्वर कभी सुनाई दिया ? हमारी पीड़ा भी किसी ने सुनने की कोशिश की किसी ने ? कभी नहीं। जिन के लिए आप दिन रात मरें , पूरी ज़िंदगी खपा दें , वही अनजान रहें। जान भी जाएं तो दुश्मन हो जाएं। अब लगता है कि लिखना बहुत ही अनप्रोडक्टिव काम है। थैंकलेस जॉब है।
● अंत में, जब आप अपनी पूरी साहित्यिक यात्रा को पीछे मुड़ कर देखते हैं, तो अपनी साहित्यिक विरासत को किस रूप में देखना चाहेंगे? एक कथाकार के रूप में, एक पत्रकार के रूप में, एक असहमत सार्वजनिक लेखक के रूप में या उस लेखक के रूप में जिस ने अपने समय के मनुष्य को उस की जटिलताओं के साथ दर्ज करने की कोशिश की?
- विरासत ? हुंह , विरासत ! अब पढ़ता कौन है ? यह जानते हुए भी लिखना , बुद्धि का काम तो नहीं ही हो सकता। लोग पैसा कमा रहे हैं और हम मुफ्त में लिखे जा रहे हैं। यह बुद्धि का काम कैसे हुआ ? वैसे हमारे लिखने का लक्ष्य धन अर्जित करना है भी नहीं। हम तो अपने सुख और संतुष्टि के लिए लिखते हैं। प्रेम करते हैं अपने लिखे से, अपने पढ़ने वालों से।
पीछे मुड़ कर देखता हूं तो एक अपराधबोध से घिर जाता हूं। कई कारणों से। एक तो यह कि जितना और जैसे लिखना चाहिए था , नहीं लिख पाया। दूसरे यह कि कभी-कभी लगता है कि लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र में आ कर बहुत बड़ी ग़लती की। नहीं आना चाहिए था। न लेखन में , न पत्रकारिता में। शुरू में सोचा था कि लेखन और पत्रकारिता से समाज को बदलूंगा। पर पता नहीं कितना समाज को बदला , कितना नहीं बदला , बिलकुल नहीं जानता। पर मैं खुद बहुत बदल गया हूं। बहुत थैंकलेस जॉब है लेखन और पत्रकारिता। दोनों ही। एक समय बाद समाज आप को छुट्टा जानवर बना कर छोड़ देता है। समय का कसाई आ कर आप को काट देता है। कोई निश्चितता नहीं। हमारे समाज को ईमानदार लेखक और पत्रकार नहीं चाहिए। भ्रष्ट और दल्ले पत्रकार चाहिए। जो आप के पचास काम करवा सके। नेता , अभिनेता , क्रिकेटर चाहिए। उद्योगपति , स्मगलर , चोर , बेईमान चाहिए। जो आप का आर्थिक विकास करवा सके। पाखंडी प्रवचनकर्ता , शंकराचार्य , धर्माचार्य चाहिए। दोगले और जाहिल मुल्ले और पादरी चाहिए।
● आप ने समय दिया , हर मुद्दे पर विस्तार से बातचीत की ; इस के लिए आप का बहुत - बहुत धन्यवाद !











